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ThanksBahut hi shaandar update diya hai TheBlackBlood bhai....
Nice and lovely update....
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कॉल डिस्कनेक्ट हुई तो प्रिया को अपने कानों में सांय सांय सा महसूस होने लगा।
अभी वो उस भंवर में फंसी ही हुई थी कि तभी मीरा कमरे में दाख़िल हुई।
उसने बताया कि लंच रेडी कर दिया है उसने और अब वो जा रही है।
प्रिया ने ख़ामोशी से उसे जाने की इजाज़त दी और बेड पर धम्म से इस तरह बैठ गई जैसे बहुत ज़्यादा थक गई हो।
Bahut hi badhiya update diya hai TheBlackBlood bhai....Update ~ 17
अशोक खत्री अब बिल्कुल स्वस्थ्य हो चुका था और अपने निश्चित समय पर कंपनी पहुंच जाता था।
वो खुद महसूस कर रहा था कि अब सब कुछ बहुत ही बढ़िया चलने लगा है।
जी-आई प्लांट में भी बाकी तो सब ठीक ही था लेकिन ज़िंक की लागत में अब भी वैसी कमी नहीं आ रही थी जितने कि वो अपेक्षा कर रहा था।
इसी सिलसिले में पंद्रह दिन पहले नौजवान अधिकारी यानि विशाल ने उसे थोड़ा प्रेशर दिया था, वैसे एक तरह से ये कहा जाए तो ग़लत न होगा कि उसने उसे परेशानी में डाल दिया था।
मगर,
अब जैसे वो इस मामले में बेफ़िक्र हो चुका था।
होता भी क्यों नहीं, नौजवान अधिकारी यानि विशाल अग्निहोत्री उसकी बीवी की दोस्त साक्षी का हसबैंड जो था।
एक्सीडेंट की घटना ने उसके साथ एक नया रिश्ता जो बना दिया था।
उसे यकीन हो चुका था कि विशाल अब ज़िंक वाले मामले में उसे किसी भी तरह से परेशान नहीं करेगा।
अशोक खत्री पिछले एक हफ़्ते से इस सबके चलते बड़ा खुश था और बेफ़िक्र हो कर अपना काम कर रहा था।
पाईप में कितना ज़िंक खर्च हो रह है इससे अब जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं रह गया था।
उसके इस बर्ताव से वॉचमैन वगैरह थोड़े हैरान थे।
आमतौर पर वो पाइप में कम कोटिंग के लिए उन पर दबाव डालता रहता था लेकिन अब वो इस मामले में उनसे कोई बात ही नहीं करता था।
जी-आई के सभी वर्कर्स दबी ज़ुबान में जाने क्या क्या बातें करने लगे थे।
उस वक्त दोपहर के साढ़े तीन बज रहे थे जब अचानक ही उसकी नज़र दूर से पैदल ही चले आ रहे विशाल पर पड़ी।
विशाल जी-आई के प्लांट की तरफ ही चला आ रहा था।
अशोक ने जब उसे इस तरफ ही आते देखा तो उसके माथे पर अचानक ही शिकन उभर आई।
इतना तो उसे भी पता था कि वो पैराडाइज स्टील्स एण्ड पॉवर लिमिटेड कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी था किंतु हेड ऑफिस से खुद ही पैदल चल कर आना उसे पहले दिन ही आश्चर्य में डाल दिया था।
इस वक्त भी उसके मन में कुछ पलों के लिए यही ख़याल उभरा किन्तु फिर वो ये सोच कर हल्के से मुस्कुरा उठा कि विशाल कदाचित उसका हाल चाल पूछने के लिए खुद चल कर आ रहा है।
इस ख़याल ने उसे रोमांचित सा कर दिया।
खुद पर थोड़ा प्राउड भी फील हुआ।
मन ही मन उसने अपनी वाइफ प्रिया को ये सोच कर धन्यवाद दिया कि अगर साक्षी से उसने दोस्ती न की होती तो आज वो अपनी सबसे बड़ी समस्या से मुक्त हो के न बैठा होता।
थोड़ी ही देर में विशाल अग्निहोत्री उसके ऑफिस में दाख़िल हुआ तो वो अपनी कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया।
हालाकि अपनी कुर्सी से उठ कर खड़ा होने में वो थोड़ा हिचकिचाया था।
कदाचित ये सोच कर कि अब तो उसका अधिकारी उसकी जान पहचान वाला है और उसकी बीवी की दोस्त का हसबैंड है।
"कैसे हैं मिस्टर खत्री?" विशाल ने हल्की मुस्कान होठों पर सजा कर उससे पूछा।
विशाल का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि कम उमर का होने के बावजूद वो एक अलग ही शख्सियत फील करवा देता था।
हालाकि उसमें सादगी भी थी लेकिन आंखों में आँखें डाल कर पूरे आत्मविश्वास के साथ बेबाकी से बात करना उसे एक अलग ही तरह का इंसान बना देता था।
ज़ाहिर है कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी था तो इतना रौब तो उसमें होना ही था।
अशोक खत्री चाह कर भी उसके सामने खुद को सामान्य न रख सका।
उसकी धड़कनें तीव्र हो चलीं।
"फ़...फाइन स....सर।" फिर वो थोड़ा झिझकते हुए बोला।
"आई होप, अब आप बेहतर फील कर रहे होंगे।" विशाल ने उसी हल्की मुस्कान के साथ कहा।
"जी बिल्कुल स...सर।" अशोक उसे सर कहने में बार बार झिझक रहा था।
"वेल, कैसा चल रहा है काम?" विशाल ने जैसे मुद्दे पर आते हुए पूछा──"क्या आपने ज़िंक की कम लागत के लिए कुछ किया?"
"क...क्या म...मतलब???" अशोक खत्री बुरी तरह चकरा गया और साथ ही बौखला भी गया।
उसे ख़्वाब में भी उम्मीद नहीं थी कि इतना कुछ होने के बाद भी विशाल यहां पर ज़िंक के मामले में उससे पूछताछ करेगा।
वो तो अब इस मामले में पूरी तरह से बेफिक्र ही हो चुका था।
विशाल उसके अंदर की हालत से ज़रा भी बेख़बर नहीं था।
होता भी कैसे?
वो तो आया ही इसी लिए था ताकि इस मामले में उसे फिर से गहन चिंता और परेशानी में डाल दे।
"कमाल है मिस्टर खत्री।" विशाल ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा──"मैंने तो आपसे शुद्ध हिन्दी में ही पूछा था। फिर भी आप कह रहे हैं──क्या मतलब?"
अशोक खत्री को ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही उसके घुटने मुड़ जाएंगे और वो धड़ाम से वहीं गिर जाएगा।
कहां वो इस मामले में पूरी तरह से बेफ़िक्र हो के बैठा था और कहां एक ही पल में वही समस्या फिर से उसके सिर पर आ गिरी थी।
उसका जी चाहा कि विशाल से कहे कि ये आप क्या कह रहे हैं? आप तो अब हमारे रिश्तेदार जैसे हो गए हैं? फिर भी ज़िंक का मामला ले कर उसके पास आ गए और उसे ऐसी समस्या में डुबाए दे रहे हैं जिसकी उसने कल्पना ही नहीं की थी?
किंतु,
वो चाह कर भी ऐसा न कह सका।
उसे याद आया कि विशाल ने उससे कहा था कि कंपनी में हर किसी के लिए एक ही नियम कानून होता है। कंपनी के बाहर बेशक कोई कैसा भी बर्ताव करे।
"ज...जी कोशिश ज़ारी है सर।" फिर उसने काफी हद तक अपने आपको सम्हाल कर कहा──"आपको तो पहले ही सारी बातें बता दी थी मैंने। इसके बावजूद कोशिश कर रहा हूं कि ज़िंक का खर्चा इतना न आए।"
"बहुत बढ़िया।" विशाल ने कहा──"अब तो आपसे मुझे पहले से भी ज़्यादा बेहतर की उम्मीद हो गई है। ख़ैर, आइए देखते हैं अंदर कैसा चल रहा है?"
विशाल की ये बात सुन कर अशोक की टांगें ये सोच कर कांपने लगीं कि अंदर जा कर आज फिर से वो ब्लैकबोर्ड में लिखी कोटिंग की जानकारी देखेगा।
ये सोच कर अशोक खत्री का अपने बाल नोच लेने का जी चाहा कि आज भी दुर्भाग्य से वो ब्लैकबोर्ड में लिखी जानकारी को मिटवाया नहीं।
पहली बार उसे एहसास हुआ कि उसे इतना ज़्यादा बेफ़िक्र नहीं होना चाहिए था।
उसे ये हर्गिज़ नहीं भूलना चाहिए था कि कंपनी के अंदर कोई किसी का माई बाप या दोस्त बंधु नहीं होता।
अशोक का जी चाहा कि धरती फटे और वो उसमें समा जाए या फिर कोई ऐसा चमत्कार हो जाए कि विशाल अंदर जाने का अपना इरादा ही मुल्तवी कर दे।
मगर किसी के चाहने से भला कहां कुछ हुआ करता है?
अगले ही पल जब विशाल अंदर की तरफ चल पड़ा तो मज़बूरन उसे भी उसके पीछे भारी क़दमों से चल देना पड़ा।
उसके बाद वही हुआ जिसकी उसे उम्मीद थी और जिसका उसे डर था।
विशाल ने अंदर जाते ही सबसे पहले एक सरसरी नज़र सभी वर्कर्स पर डाली उसके बाद ब्लैकबोर्ड की तरफ घूम गया।
उसके यूं अचानक आ जाने से अंदर काम कर रहे वर्कर्स एकदम से अलर्ट हो गए थे।
आख़िर पता तो उन्हें भी था कि विशाल अग्निहोत्री कोई मामूली इंसान नहीं था बल्कि कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी था।
"ये क्या मिस्टर खत्री?" ब्लैकबोर्ड पर नज़रें जमाए विशाल ने कहा──"जहां तक मुझे याद है पिछली बार जब मैं यहां आया था तब इस ब्लैकबोर्ड में कोटिंग की जो इन्फोर्मेशन दर्ज़ थी वो आज के मुकाबले काफी डिफ़रेंट थी। आज भी उन्हीं पाइप्स का जी-आई हो रहा है जो उस दिन हो रहे थे। इट मीन्स, मॉल वही है बट ब्लैकबोर्ड में लिखी इस इन्फोर्मेशन के अनुसार उस दिन की अपेक्षा आज ज़्यादा कोटिंग नज़र आ रही है? इस मॉल में एक पाइप पर आई थिंक चार सौ बीस या चालीस ग्राम के अराउंड ज़िंक लगता है जबकि इस ब्लैकबोर्ड में लिखी जानकारी के अनुसार एक पाइप में सात सौ से ले कर आठ सौ ग्राम तक कोटिंग आई हुई है। इसमें सिर्फ एक ही ब्रैकेट में कोटिंग छह सौ ग्राम दिख रही है बाकी सभी सात सौ और आठ सौ तक जा रही है। पिछली बार जब मैं आया था तो शायद साढ़े पांच सौ के आसपास लिखी हुई थी इसमें। आपने कहा कि कोशिश ज़ारी है तो अब आप ही बताइए कि ये कैसी कोशिश है? आज की कोटिंग देखने के बाद तो यही ज़ाहिर होता है मिस्टर खत्री कि आप ज़िंक की लागत कम करने की कोई कोशिश ही नहीं कर रहे हैं। इससे बेहतर तो पिछली बार की कोटिंग थी।"
अशोक खत्री को समझ ही न आया कि क्या कहे?
एक बहुत बड़े अपराधी की भांति सिर को झुकाए खड़ा हो गया था वो।
इस समय वो बहुत ज़्यादा असहाय सा महसूस करने लगा था।
अपने वर्कर्स के सामने विशाल द्वारा ऐसा कहे जाने पर वो अपमानित भी महसूस कर रहा था।
लेकिन,
कुछ भी कहने की जैसे उसमें हिम्मत ही नहीं थी।
होती भी कैसे?
इतना तो वो भी समझ रहा था कि हर बात से बेफ़िक्र हो जाने की ग़लती तो उसी ने की थी।
वो ये सोच बैठा था कि अब इस मामले में विशाल उससे कुछ कहेगा ही नहीं।
"यूं चुप रहने से या सिर झुका लेने से कैसे काम चलेगा मिस्टर खत्री?" विशाल उसकी दशा पर खुद भी बुरा महसूस करने लगा था लेकिन प्रत्यक्ष में सपाट लहजे में बोला──"मुझे बड़े अफ़सोस के साथ ये कहना पड़ेगा कि अगर आप ज़िंक की लागत में कोई कमी नहीं कर पाए तो कंपनी में आपको इतनी ज़्यादा सैलरी, प्लस रहने के लिए इतना बेहतर फ़्लैट देने का क्या फ़ायदा? आई एम वेरी वेरी सॉरी मिस्टर खत्री बट ऐसे में आपको यकीनन इस नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है।"
विशाल की बात सुन कर अशोक को ज़बरदस्त झटका लगा।
उसने सिर उठा कर अजीब भाव से विशाल की तरफ देखा।
विशाल के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे।
"वेल, आप क्योंकि मेरे क़रीबी भी हैं इस लिए मैं अपनी तरफ से आपको एक आख़िरी मौका ज़रूर दूंगा।" विशाल कहते हुए अशोक के ऑफिस की तरफ धीरे धीरे चल पड़ा। उसके पीछे अशोक भी चल पड़ा था। उधर विशाल ने आगे कहा──"मैं आपको सिर्फ पंद्रह दिनों का वक्त दे सकता हूं। अगर इन पंद्रह दिनों में आप ज़िंक के खर्चे को बेहतर अनुपात पर ले आए तो आप इस कंपनी में पूरे सम्मान के साथ बने रहेंगे। प्लीज़, इस बार मुझे निराश मत कीजिएगा।"
विशाल अग्निहोत्री इतना कह कर चला गया लेकिन अशोक खत्री के सिर पर जैसे एक बार फिर से मुसीबतों का पहाड़ रख गया।
वो सोचने पर मज़बूर हो गया कि विशाल उसके प्रति ये जानते हुए भी इतना ज़्यादा कठोर कैसे हो सकता था कि वो उसकी पत्नी साक्षी की दोस्त प्रिया का हसबैंड है?
बहरहाल, उसके बाद का सारा समय यही सब सोचते विचारते गुज़रा और फिर वो रिपोर्ट वगैरह बना कर कार से अपने फ्लैट की तरफ चल पड़ा।
साढ़े तीन बजे तक वो हर बात से बेफ़िक्र था और बड़ा खुश था।
लेकिन,
उसके बाद ऐसा लगा जैसे उसकी बेफ़िक्री और उसकी खुशी पर ग्रहण लग गया हो।
जिस बात की उसने कल्पना नहीं की थी वही उसके साथ हो गई थी।
एक बार फिर से वो गहन चिंता और परेशानी में डूब गया था।
[][][][][]
"क्या हुआ?" रात डिनर के बाद जब प्रिया कमरे में बेड पर अपने पति के बगल से बैठी तो उसने अशोक से पूछा──"जब से आए हैं तब से आप कुछ अपसेट से दिख रहे हैं? कुछ हुआ है क्या?"
"न...नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।" अशोक ने बात को टालना चाहा──"तुम आराम से सो जाओ।"
"अरे! बात कैसे नहीं है?" प्रिया ने उसकी तरफ खिसक कर कहा──"हर रोज़ तो आपका चेहरा खुशी से दमकता हुआ नज़र आता था जबकि आज ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। देखिए, मुझे मूर्ख मत समझिए और ना ही मुझसे कुछ छुपाइए। जो भी बात है क्लियरली बता दीजिए।"
अशोक को भी लगा कि प्रिया को सारी बात बता देना ही उचित होगा।
संभव है उसकी परेशानी अथवा समस्या को जान कर वो अपनी दोस्त साक्षी से बात करे और उससे कहे कि वो अपने हसबैंड विशाल को इस मामले में समझाए।
अशोक ने एक गहरी सांस ली और फिर वो सब कुछ बताता चला गया।
प्रिया को भी ये जान कर झटका लगा कि विशाल उसके हसबैंड के साथ ऐसा कैसे कर सकता है?
"आप चिंता मत कीजिए।" फिर उसने अशोक की तरफ देखते हुए कहा──"मैं इस बारे में अपनी दोस्त साक्षी से बात करूंगी। मुझे पूरा यकीन है कि जब मेरे द्वारा साक्षी को ये सब पता चलेगा तो वो अपने हसबैंड विशाल को अच्छी खासी खरी खोटी सुनाएगी। मुझे यकीन है कि साक्षी की खरी खोटी सुन कर विशाल आपके ऊपर से इस प्रॉब्लम को हटा लेगा।"
"ईश्वर करे ऐसा ही हो।" अशोक ने गहरी सांस ली──"मुझे भी तुम्हारी दोस्त साक्षी पर भरोसा है।"
"एक मिनट।" प्रिया ने बेड के एक तरफ रखे अपने मोबाइल को उठा कर कहा──"मैं अभी साक्षी को फ़ोन लगाती हूं और उसे ये सब बताती हूं। देखना, साक्षी सब कुछ ठीक कर देगी।"
"ज़्यादा समय तो नहीं हो गया?" अशोक ने कहा──"मुझे लगता है कि रात के इस वक्त जबकि तुम्हारी दोस्त अपने हसबैंड के साथ सो गई होगी तो उन्हें डिस्टर्ब करना उचित नहीं होगा।"
"अरे! अभी सवा दस ही तो हुए हैं।" प्रिया ने कहा──"और वैसे भी मैं चाहे जिस टाइम अपनी दोस्त साक्षी को फ़ोन लगाऊं वो बुरा मानने वाली नहीं है।"
"ठीक है फिर।" अशोक ने धड़कते दिल से कहा──"जैसा तुम्हें ठीक लगे करो।"
प्रिया ने अगले ही पल साक्षी को कॉल लगाया और मोबाइल को दाहिने कान पर लगा लिया।
बेल जाने की आवाज़ उसे स्पष्ट सुनाई दे रही थी।
कुछ समय बाद जब बेल पूरी हो गई तो कॉल कट हो गई।
प्रिया ने मोबाइल को कान से हटा लिया।
"दोनों सो गए होंगे।" अशोक ने जैसे अपनी संभावना व्यक्त की──"मेरा कहना यही है कि इस वक्त उन्हें डिस्टर्ब करना सही नहीं है।"
"उसके हसबैंड ने आपको और मुझे चिंता में डाल दिया है और खुद अपनी वाइफ के साथ चैन की नींद सो रहा है?" प्रिया ने नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा──"मैं भी तब तक साक्षी को कॉल लगाऊंगी जब तक कि वो उठा नहीं लेती। मैं भी उसे चैन से सोने नहीं दूंगी।"
अशोक इस बार कुछ बोल न सका।
अपनी पत्नी प्रिया की बातों से कदाचित वो भी सहमत था।
बहरहाल, दूसरी बार जब प्रिया ने कॉल किया तो देर से ही सही लेकिन साक्षी ने कॉल उठा लिया।
प्रिया अभी कुछ कहने ही वाली थी कि दूसरी तरफ से उसे अपने कान में कुछ ऐसा सुनाई दिया जिसके चलते वो एकदम चुप सी हो गई।
उसकी धड़कनें पलक झपकते ही तेज़ गति से चलने लगीं।
दिलो दिमाग़ में अभीब सा एहसास भरता चला गया।
"तुझे इसी वक्त कॉल करना था यार?" उधर से साक्षी अपनी उखड़ी हुई सांसों के साथ बोली──"पूरा रंग में भंग डाल दिया।"
"त...तू इस वक्त क...क्या कर???" प्रिया ने अपनी तेज़ चलती धड़कनों को नियंत्रित करने का प्रयास करते हुए किंतु अटकते हुए पूछना ही चाहा था कि उधर से साक्षी ने बीच में ही उसकी बात काट कर कहा──"वही कर रही थी जो एक शादी शुदा औरत रात के वक्त अपने कमरे में अपने हसबैंड के साथ करती है। साफ शब्दों में कहूं तो सेक्स कर रही थी और तूने कॉल कर के खलल डाल दिया है। ख़ैर, बता इस वक्त किस लिए कॉल किया है मुझे? सब ठीक तो है ना?"
साक्षी के मुख से स्पष्ट भाषा में सेक्स करने की बात सुन कर प्रिया को बड़ा ही अजीब महसूस हुआ।
वो सोचने पर मज़बूर हो गई कि उसकी दोस्त साक्षी कितनी बेशर्मी से ये बात कह दी है।
ये सोच कर उसके रोंगटे खड़े हो गए कि साक्षी ने यकीनन अपने हसबैंड के सामने ही उससे ऐसा कहा है।
जाने क्या सोचा होगा विशाल ने उसके बारे में?
"अब कुछ बोलेगी भी या अचानक से मौन व्रत धारण कर लिया है तूने?" उसे कुछ न बोलता देख उधर से साक्षी ने कुछ ऐसे लहजे में कहा जैसे वो चिढ़ गई हो।
ज़ाहिर था दोनों पति पत्नी जिस काम में मगन थे उस पर खलल पड़ जाने से मूड तो ख़राब हो ही जाना था।
"अ...अच्छा मैं तुझसे सुबह बात करूंगी।" प्रिया ने जल्दी से कहा──"त...तू अपना क....काम कर, गुड नाइट।"
प्रिया ने उधर से साक्षी की कोई बात सुने बिना ही कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।
आंखें बंद कर के उसने दो तीन गहरी गहरी सांसें ली।
मनो मस्तिष्क में अभी भी यही ख़याल घूम रहा था कि साक्षी इस वक्त अपने पति के साथ सेक्स का आनंद ले रही थी और उसने उसके आनंद में खलल डाल दिया था।
अचानक ही उसके मन में ख़याल उभरा कि अशोक के साथ संभोग का आनंद लिए हुए उसे काफी समय गुज़र चुका है।
उमर ज़्यादा हो जाने की वजह से अशोक अपनी तरफ से बहुत कम ही पहल करता था।
प्रिया का अगर कभी मन भी करता था तो वो ये सोच कर खुद को रोक लेती थी कि जाने उसका पति उसके बारे में क्या सोचेगा?
या फिर खुद अपने बारे में भी कि अपनी जवान बीवी को वो संभोग सुख से वंचित किए रहता है।
"क्या हुआ?" प्रिया अभी ये सब सोच ही रही थी कि तभी अशोक बोल पड़ा──"तुमने अचानक से फोन क्यों कट कर दिया?"
प्रिया को समझ न आया कि कैसे वो अपने पति को ये बताए कि उसकी दोस्त साक्षी इस वक्त अपने हसबैंड के साथ संभोग का आनंद ले रही थी और वो नहीं चाहती थी कि उसके द्वारा बात करने से उसका आनंद उससे छिन जाए।
"वो बस ऐसे ही।" फिर उसने थोड़ा झिझकते हुए कहा──"आपने सही कहा था कि इस वक्त उसे डिस्टर्ब करना उचित नहीं होगा। ख़ैर आप फ़िक्र मत कीजिए, कल सुबह साक्षी से मैं इस बारे में बात कर लूंगी। चलिए अब अपने अंदर से चिंता को निकाल दीजिए और आराम से सो जाइए।"
अशोक कोई बच्चा नहीं था।
वो अच्छी तरह समझ गया था कि उसकी पत्नी ने कॉल क्यों कट कर दी थी।
ये सोच कर उसे बुरा लगा कि वो अपनी जवान बीवी को वो सुख दे पाने में कितना बेबस है जिस सुख को पाने के लिए हर जवान और शादी शुदा औरत हसरत किए रहती है।
माना कि प्रिया उसको कभी इस मामले में दोष नहीं देती थी अथवा उससे कोई शिकायत नहीं करती थी लेकिन बावजूद इसके उसका तो फर्ज़ था कि उसे अपनी बीवी की खुशियों का और उसकी ज़रूरतों का ख़याल रहे।
अपनी बेबसी और अपनी लाचारी पर इस समय उसे भारी अफ़सोस हुआ और ये सोच कर दुख भी हुआ कि काश! अपनी बीवी की तरह वो भी थोड़ा जवान होता।
पहली बार उसे एहसास हुआ कि अपने से इतनी कम उमर की लड़की से शादी कर के उसने एक बड़ी भूल तो की ही थी किंतु इसके साथ ही उसने प्रिया का जीवन भी बर्बाद कर दिया था।
अजीब इत्तेफ़ाक था।
देर रात तक ना अशोक को इन सब ख़यालों के चलते नींद आई और ना ही प्रिया को।
जाने कब दोनों को नींद ने अपनी आगोश में लिया जिसका उन्हें पता ही नहीं चला।
To be continued...
साक्षी के sex करने को लेकर प्रिया और अशोक दोनों के अपने age gap ka ध्यान अचानक ho गया.....Update ~ 17
अशोक खत्री अब बिल्कुल स्वस्थ्य हो चुका था और अपने निश्चित समय पर कंपनी पहुंच जाता था।
वो खुद महसूस कर रहा था कि अब सब कुछ बहुत ही बढ़िया चलने लगा है।
जी-आई प्लांट में भी बाकी तो सब ठीक ही था लेकिन ज़िंक की लागत में अब भी वैसी कमी नहीं आ रही थी जितने कि वो अपेक्षा कर रहा था।
इसी सिलसिले में पंद्रह दिन पहले नौजवान अधिकारी यानि विशाल ने उसे थोड़ा प्रेशर दिया था, वैसे एक तरह से ये कहा जाए तो ग़लत न होगा कि उसने उसे परेशानी में डाल दिया था।
मगर,
अब जैसे वो इस मामले में बेफ़िक्र हो चुका था।
होता भी क्यों नहीं, नौजवान अधिकारी यानि विशाल अग्निहोत्री उसकी बीवी की दोस्त साक्षी का हसबैंड जो था।
एक्सीडेंट की घटना ने उसके साथ एक नया रिश्ता जो बना दिया था।
उसे यकीन हो चुका था कि विशाल अब ज़िंक वाले मामले में उसे किसी भी तरह से परेशान नहीं करेगा।
अशोक खत्री पिछले एक हफ़्ते से इस सबके चलते बड़ा खुश था और बेफ़िक्र हो कर अपना काम कर रहा था।
पाईप में कितना ज़िंक खर्च हो रह है इससे अब जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं रह गया था।
उसके इस बर्ताव से वॉचमैन वगैरह थोड़े हैरान थे।
आमतौर पर वो पाइप में कम कोटिंग के लिए उन पर दबाव डालता रहता था लेकिन अब वो इस मामले में उनसे कोई बात ही नहीं करता था।
जी-आई के सभी वर्कर्स दबी ज़ुबान में जाने क्या क्या बातें करने लगे थे।
उस वक्त दोपहर के साढ़े तीन बज रहे थे जब अचानक ही उसकी नज़र दूर से पैदल ही चले आ रहे विशाल पर पड़ी।
विशाल जी-आई के प्लांट की तरफ ही चला आ रहा था।
अशोक ने जब उसे इस तरफ ही आते देखा तो उसके माथे पर अचानक ही शिकन उभर आई।
इतना तो उसे भी पता था कि वो पैराडाइज स्टील्स एण्ड पॉवर लिमिटेड कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी था किंतु हेड ऑफिस से खुद ही पैदल चल कर आना उसे पहले दिन ही आश्चर्य में डाल दिया था।
इस वक्त भी उसके मन में कुछ पलों के लिए यही ख़याल उभरा किन्तु फिर वो ये सोच कर हल्के से मुस्कुरा उठा कि विशाल कदाचित उसका हाल चाल पूछने के लिए खुद चल कर आ रहा है।
इस ख़याल ने उसे रोमांचित सा कर दिया।
खुद पर थोड़ा प्राउड भी फील हुआ।
मन ही मन उसने अपनी वाइफ प्रिया को ये सोच कर धन्यवाद दिया कि अगर साक्षी से उसने दोस्ती न की होती तो आज वो अपनी सबसे बड़ी समस्या से मुक्त हो के न बैठा होता।
थोड़ी ही देर में विशाल अग्निहोत्री उसके ऑफिस में दाख़िल हुआ तो वो अपनी कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया।
हालाकि अपनी कुर्सी से उठ कर खड़ा होने में वो थोड़ा हिचकिचाया था।
कदाचित ये सोच कर कि अब तो उसका अधिकारी उसकी जान पहचान वाला है और उसकी बीवी की दोस्त का हसबैंड है।
"कैसे हैं मिस्टर खत्री?" विशाल ने हल्की मुस्कान होठों पर सजा कर उससे पूछा।
विशाल का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि कम उमर का होने के बावजूद वो एक अलग ही शख्सियत फील करवा देता था।
हालाकि उसमें सादगी भी थी लेकिन आंखों में आँखें डाल कर पूरे आत्मविश्वास के साथ बेबाकी से बात करना उसे एक अलग ही तरह का इंसान बना देता था।
ज़ाहिर है कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी था तो इतना रौब तो उसमें होना ही था।
अशोक खत्री चाह कर भी उसके सामने खुद को सामान्य न रख सका।
उसकी धड़कनें तीव्र हो चलीं।
"फ़...फाइन स....सर।" फिर वो थोड़ा झिझकते हुए बोला।
"आई होप, अब आप बेहतर फील कर रहे होंगे।" विशाल ने उसी हल्की मुस्कान के साथ कहा।
"जी बिल्कुल स...सर।" अशोक उसे सर कहने में बार बार झिझक रहा था।
"वेल, कैसा चल रहा है काम?" विशाल ने जैसे मुद्दे पर आते हुए पूछा──"क्या आपने ज़िंक की कम लागत के लिए कुछ किया?"
"क...क्या म...मतलब???" अशोक खत्री बुरी तरह चकरा गया और साथ ही बौखला भी गया।
उसे ख़्वाब में भी उम्मीद नहीं थी कि इतना कुछ होने के बाद भी विशाल यहां पर ज़िंक के मामले में उससे पूछताछ करेगा।
वो तो अब इस मामले में पूरी तरह से बेफिक्र ही हो चुका था।
विशाल उसके अंदर की हालत से ज़रा भी बेख़बर नहीं था।
होता भी कैसे?
वो तो आया ही इसी लिए था ताकि इस मामले में उसे फिर से गहन चिंता और परेशानी में डाल दे।
"कमाल है मिस्टर खत्री।" विशाल ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा──"मैंने तो आपसे शुद्ध हिन्दी में ही पूछा था। फिर भी आप कह रहे हैं──क्या मतलब?"
अशोक खत्री को ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही उसके घुटने मुड़ जाएंगे और वो धड़ाम से वहीं गिर जाएगा।
कहां वो इस मामले में पूरी तरह से बेफ़िक्र हो के बैठा था और कहां एक ही पल में वही समस्या फिर से उसके सिर पर आ गिरी थी।
उसका जी चाहा कि विशाल से कहे कि ये आप क्या कह रहे हैं? आप तो अब हमारे रिश्तेदार जैसे हो गए हैं? फिर भी ज़िंक का मामला ले कर उसके पास आ गए और उसे ऐसी समस्या में डुबाए दे रहे हैं जिसकी उसने कल्पना ही नहीं की थी?
किंतु,
वो चाह कर भी ऐसा न कह सका।
उसे याद आया कि विशाल ने उससे कहा था कि कंपनी में हर किसी के लिए एक ही नियम कानून होता है। कंपनी के बाहर बेशक कोई कैसा भी बर्ताव करे।
"ज...जी कोशिश ज़ारी है सर।" फिर उसने काफी हद तक अपने आपको सम्हाल कर कहा──"आपको तो पहले ही सारी बातें बता दी थी मैंने। इसके बावजूद कोशिश कर रहा हूं कि ज़िंक का खर्चा इतना न आए।"
"बहुत बढ़िया।" विशाल ने कहा──"अब तो आपसे मुझे पहले से भी ज़्यादा बेहतर की उम्मीद हो गई है। ख़ैर, आइए देखते हैं अंदर कैसा चल रहा है?"
विशाल की ये बात सुन कर अशोक की टांगें ये सोच कर कांपने लगीं कि अंदर जा कर आज फिर से वो ब्लैकबोर्ड में लिखी कोटिंग की जानकारी देखेगा।
ये सोच कर अशोक खत्री का अपने बाल नोच लेने का जी चाहा कि आज भी दुर्भाग्य से वो ब्लैकबोर्ड में लिखी जानकारी को मिटवाया नहीं।
पहली बार उसे एहसास हुआ कि उसे इतना ज़्यादा बेफ़िक्र नहीं होना चाहिए था।
उसे ये हर्गिज़ नहीं भूलना चाहिए था कि कंपनी के अंदर कोई किसी का माई बाप या दोस्त बंधु नहीं होता।
अशोक का जी चाहा कि धरती फटे और वो उसमें समा जाए या फिर कोई ऐसा चमत्कार हो जाए कि विशाल अंदर जाने का अपना इरादा ही मुल्तवी कर दे।
मगर किसी के चाहने से भला कहां कुछ हुआ करता है?
अगले ही पल जब विशाल अंदर की तरफ चल पड़ा तो मज़बूरन उसे भी उसके पीछे भारी क़दमों से चल देना पड़ा।
उसके बाद वही हुआ जिसकी उसे उम्मीद थी और जिसका उसे डर था।
विशाल ने अंदर जाते ही सबसे पहले एक सरसरी नज़र सभी वर्कर्स पर डाली उसके बाद ब्लैकबोर्ड की तरफ घूम गया।
उसके यूं अचानक आ जाने से अंदर काम कर रहे वर्कर्स एकदम से अलर्ट हो गए थे।
आख़िर पता तो उन्हें भी था कि विशाल अग्निहोत्री कोई मामूली इंसान नहीं था बल्कि कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी था।
"ये क्या मिस्टर खत्री?" ब्लैकबोर्ड पर नज़रें जमाए विशाल ने कहा──"जहां तक मुझे याद है पिछली बार जब मैं यहां आया था तब इस ब्लैकबोर्ड में कोटिंग की जो इन्फोर्मेशन दर्ज़ थी वो आज के मुकाबले काफी डिफ़रेंट थी। आज भी उन्हीं पाइप्स का जी-आई हो रहा है जो उस दिन हो रहे थे। इट मीन्स, मॉल वही है बट ब्लैकबोर्ड में लिखी इस इन्फोर्मेशन के अनुसार उस दिन की अपेक्षा आज ज़्यादा कोटिंग नज़र आ रही है? इस मॉल में एक पाइप पर आई थिंक चार सौ बीस या चालीस ग्राम के अराउंड ज़िंक लगता है जबकि इस ब्लैकबोर्ड में लिखी जानकारी के अनुसार एक पाइप में सात सौ से ले कर आठ सौ ग्राम तक कोटिंग आई हुई है। इसमें सिर्फ एक ही ब्रैकेट में कोटिंग छह सौ ग्राम दिख रही है बाकी सभी सात सौ और आठ सौ तक जा रही है। पिछली बार जब मैं आया था तो शायद साढ़े पांच सौ के आसपास लिखी हुई थी इसमें। आपने कहा कि कोशिश ज़ारी है तो अब आप ही बताइए कि ये कैसी कोशिश है? आज की कोटिंग देखने के बाद तो यही ज़ाहिर होता है मिस्टर खत्री कि आप ज़िंक की लागत कम करने की कोई कोशिश ही नहीं कर रहे हैं। इससे बेहतर तो पिछली बार की कोटिंग थी।"
अशोक खत्री को समझ ही न आया कि क्या कहे?
एक बहुत बड़े अपराधी की भांति सिर को झुकाए खड़ा हो गया था वो।
इस समय वो बहुत ज़्यादा असहाय सा महसूस करने लगा था।
अपने वर्कर्स के सामने विशाल द्वारा ऐसा कहे जाने पर वो अपमानित भी महसूस कर रहा था।
लेकिन,
कुछ भी कहने की जैसे उसमें हिम्मत ही नहीं थी।
होती भी कैसे?
इतना तो वो भी समझ रहा था कि हर बात से बेफ़िक्र हो जाने की ग़लती तो उसी ने की थी।
वो ये सोच बैठा था कि अब इस मामले में विशाल उससे कुछ कहेगा ही नहीं।
"यूं चुप रहने से या सिर झुका लेने से कैसे काम चलेगा मिस्टर खत्री?" विशाल उसकी दशा पर खुद भी बुरा महसूस करने लगा था लेकिन प्रत्यक्ष में सपाट लहजे में बोला──"मुझे बड़े अफ़सोस के साथ ये कहना पड़ेगा कि अगर आप ज़िंक की लागत में कोई कमी नहीं कर पाए तो कंपनी में आपको इतनी ज़्यादा सैलरी, प्लस रहने के लिए इतना बेहतर फ़्लैट देने का क्या फ़ायदा? आई एम वेरी वेरी सॉरी मिस्टर खत्री बट ऐसे में आपको यकीनन इस नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है।"
विशाल की बात सुन कर अशोक को ज़बरदस्त झटका लगा।
उसने सिर उठा कर अजीब भाव से विशाल की तरफ देखा।
विशाल के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे।
"वेल, आप क्योंकि मेरे क़रीबी भी हैं इस लिए मैं अपनी तरफ से आपको एक आख़िरी मौका ज़रूर दूंगा।" विशाल कहते हुए अशोक के ऑफिस की तरफ धीरे धीरे चल पड़ा। उसके पीछे अशोक भी चल पड़ा था। उधर विशाल ने आगे कहा──"मैं आपको सिर्फ पंद्रह दिनों का वक्त दे सकता हूं। अगर इन पंद्रह दिनों में आप ज़िंक के खर्चे को बेहतर अनुपात पर ले आए तो आप इस कंपनी में पूरे सम्मान के साथ बने रहेंगे। प्लीज़, इस बार मुझे निराश मत कीजिएगा।"
विशाल अग्निहोत्री इतना कह कर चला गया लेकिन अशोक खत्री के सिर पर जैसे एक बार फिर से मुसीबतों का पहाड़ रख गया।
वो सोचने पर मज़बूर हो गया कि विशाल उसके प्रति ये जानते हुए भी इतना ज़्यादा कठोर कैसे हो सकता था कि वो उसकी पत्नी साक्षी की दोस्त प्रिया का हसबैंड है?
बहरहाल, उसके बाद का सारा समय यही सब सोचते विचारते गुज़रा और फिर वो रिपोर्ट वगैरह बना कर कार से अपने फ्लैट की तरफ चल पड़ा।
साढ़े तीन बजे तक वो हर बात से बेफ़िक्र था और बड़ा खुश था।
लेकिन,
उसके बाद ऐसा लगा जैसे उसकी बेफ़िक्री और उसकी खुशी पर ग्रहण लग गया हो।
जिस बात की उसने कल्पना नहीं की थी वही उसके साथ हो गई थी।
एक बार फिर से वो गहन चिंता और परेशानी में डूब गया था।
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"क्या हुआ?" रात डिनर के बाद जब प्रिया कमरे में बेड पर अपने पति के बगल से बैठी तो उसने अशोक से पूछा──"जब से आए हैं तब से आप कुछ अपसेट से दिख रहे हैं? कुछ हुआ है क्या?"
"न...नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।" अशोक ने बात को टालना चाहा──"तुम आराम से सो जाओ।"
"अरे! बात कैसे नहीं है?" प्रिया ने उसकी तरफ खिसक कर कहा──"हर रोज़ तो आपका चेहरा खुशी से दमकता हुआ नज़र आता था जबकि आज ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। देखिए, मुझे मूर्ख मत समझिए और ना ही मुझसे कुछ छुपाइए। जो भी बात है क्लियरली बता दीजिए।"
अशोक को भी लगा कि प्रिया को सारी बात बता देना ही उचित होगा।
संभव है उसकी परेशानी अथवा समस्या को जान कर वो अपनी दोस्त साक्षी से बात करे और उससे कहे कि वो अपने हसबैंड विशाल को इस मामले में समझाए।
अशोक ने एक गहरी सांस ली और फिर वो सब कुछ बताता चला गया।
प्रिया को भी ये जान कर झटका लगा कि विशाल उसके हसबैंड के साथ ऐसा कैसे कर सकता है?
"आप चिंता मत कीजिए।" फिर उसने अशोक की तरफ देखते हुए कहा──"मैं इस बारे में अपनी दोस्त साक्षी से बात करूंगी। मुझे पूरा यकीन है कि जब मेरे द्वारा साक्षी को ये सब पता चलेगा तो वो अपने हसबैंड विशाल को अच्छी खासी खरी खोटी सुनाएगी। मुझे यकीन है कि साक्षी की खरी खोटी सुन कर विशाल आपके ऊपर से इस प्रॉब्लम को हटा लेगा।"
"ईश्वर करे ऐसा ही हो।" अशोक ने गहरी सांस ली──"मुझे भी तुम्हारी दोस्त साक्षी पर भरोसा है।"
"एक मिनट।" प्रिया ने बेड के एक तरफ रखे अपने मोबाइल को उठा कर कहा──"मैं अभी साक्षी को फ़ोन लगाती हूं और उसे ये सब बताती हूं। देखना, साक्षी सब कुछ ठीक कर देगी।"
"ज़्यादा समय तो नहीं हो गया?" अशोक ने कहा──"मुझे लगता है कि रात के इस वक्त जबकि तुम्हारी दोस्त अपने हसबैंड के साथ सो गई होगी तो उन्हें डिस्टर्ब करना उचित नहीं होगा।"
"अरे! अभी सवा दस ही तो हुए हैं।" प्रिया ने कहा──"और वैसे भी मैं चाहे जिस टाइम अपनी दोस्त साक्षी को फ़ोन लगाऊं वो बुरा मानने वाली नहीं है।"
"ठीक है फिर।" अशोक ने धड़कते दिल से कहा──"जैसा तुम्हें ठीक लगे करो।"
प्रिया ने अगले ही पल साक्षी को कॉल लगाया और मोबाइल को दाहिने कान पर लगा लिया।
बेल जाने की आवाज़ उसे स्पष्ट सुनाई दे रही थी।
कुछ समय बाद जब बेल पूरी हो गई तो कॉल कट हो गई।
प्रिया ने मोबाइल को कान से हटा लिया।
"दोनों सो गए होंगे।" अशोक ने जैसे अपनी संभावना व्यक्त की──"मेरा कहना यही है कि इस वक्त उन्हें डिस्टर्ब करना सही नहीं है।"
"उसके हसबैंड ने आपको और मुझे चिंता में डाल दिया है और खुद अपनी वाइफ के साथ चैन की नींद सो रहा है?" प्रिया ने नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा──"मैं भी तब तक साक्षी को कॉल लगाऊंगी जब तक कि वो उठा नहीं लेती। मैं भी उसे चैन से सोने नहीं दूंगी।"
अशोक इस बार कुछ बोल न सका।
अपनी पत्नी प्रिया की बातों से कदाचित वो भी सहमत था।
बहरहाल, दूसरी बार जब प्रिया ने कॉल किया तो देर से ही सही लेकिन साक्षी ने कॉल उठा लिया।
प्रिया अभी कुछ कहने ही वाली थी कि दूसरी तरफ से उसे अपने कान में कुछ ऐसा सुनाई दिया जिसके चलते वो एकदम चुप सी हो गई।
उसकी धड़कनें पलक झपकते ही तेज़ गति से चलने लगीं।
दिलो दिमाग़ में अभीब सा एहसास भरता चला गया।
"तुझे इसी वक्त कॉल करना था यार?" उधर से साक्षी अपनी उखड़ी हुई सांसों के साथ बोली──"पूरा रंग में भंग डाल दिया।"
"त...तू इस वक्त क...क्या कर???" प्रिया ने अपनी तेज़ चलती धड़कनों को नियंत्रित करने का प्रयास करते हुए किंतु अटकते हुए पूछना ही चाहा था कि उधर से साक्षी ने बीच में ही उसकी बात काट कर कहा──"वही कर रही थी जो एक शादी शुदा औरत रात के वक्त अपने कमरे में अपने हसबैंड के साथ करती है। साफ शब्दों में कहूं तो सेक्स कर रही थी और तूने कॉल कर के खलल डाल दिया है। ख़ैर, बता इस वक्त किस लिए कॉल किया है मुझे? सब ठीक तो है ना?"
साक्षी के मुख से स्पष्ट भाषा में सेक्स करने की बात सुन कर प्रिया को बड़ा ही अजीब महसूस हुआ।
वो सोचने पर मज़बूर हो गई कि उसकी दोस्त साक्षी कितनी बेशर्मी से ये बात कह दी है।
ये सोच कर उसके रोंगटे खड़े हो गए कि साक्षी ने यकीनन अपने हसबैंड के सामने ही उससे ऐसा कहा है।
जाने क्या सोचा होगा विशाल ने उसके बारे में?
"अब कुछ बोलेगी भी या अचानक से मौन व्रत धारण कर लिया है तूने?" उसे कुछ न बोलता देख उधर से साक्षी ने कुछ ऐसे लहजे में कहा जैसे वो चिढ़ गई हो।
ज़ाहिर था दोनों पति पत्नी जिस काम में मगन थे उस पर खलल पड़ जाने से मूड तो ख़राब हो ही जाना था।
"अ...अच्छा मैं तुझसे सुबह बात करूंगी।" प्रिया ने जल्दी से कहा──"त...तू अपना क....काम कर, गुड नाइट।"
प्रिया ने उधर से साक्षी की कोई बात सुने बिना ही कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।
आंखें बंद कर के उसने दो तीन गहरी गहरी सांसें ली।
मनो मस्तिष्क में अभी भी यही ख़याल घूम रहा था कि साक्षी इस वक्त अपने पति के साथ सेक्स का आनंद ले रही थी और उसने उसके आनंद में खलल डाल दिया था।
अचानक ही उसके मन में ख़याल उभरा कि अशोक के साथ संभोग का आनंद लिए हुए उसे काफी समय गुज़र चुका है।
उमर ज़्यादा हो जाने की वजह से अशोक अपनी तरफ से बहुत कम ही पहल करता था।
प्रिया का अगर कभी मन भी करता था तो वो ये सोच कर खुद को रोक लेती थी कि जाने उसका पति उसके बारे में क्या सोचेगा?
या फिर खुद अपने बारे में भी कि अपनी जवान बीवी को वो संभोग सुख से वंचित किए रहता है।
"क्या हुआ?" प्रिया अभी ये सब सोच ही रही थी कि तभी अशोक बोल पड़ा──"तुमने अचानक से फोन क्यों कट कर दिया?"
प्रिया को समझ न आया कि कैसे वो अपने पति को ये बताए कि उसकी दोस्त साक्षी इस वक्त अपने हसबैंड के साथ संभोग का आनंद ले रही थी और वो नहीं चाहती थी कि उसके द्वारा बात करने से उसका आनंद उससे छिन जाए।
"वो बस ऐसे ही।" फिर उसने थोड़ा झिझकते हुए कहा──"आपने सही कहा था कि इस वक्त उसे डिस्टर्ब करना उचित नहीं होगा। ख़ैर आप फ़िक्र मत कीजिए, कल सुबह साक्षी से मैं इस बारे में बात कर लूंगी। चलिए अब अपने अंदर से चिंता को निकाल दीजिए और आराम से सो जाइए।"
अशोक कोई बच्चा नहीं था।
वो अच्छी तरह समझ गया था कि उसकी पत्नी ने कॉल क्यों कट कर दी थी।
ये सोच कर उसे बुरा लगा कि वो अपनी जवान बीवी को वो सुख दे पाने में कितना बेबस है जिस सुख को पाने के लिए हर जवान और शादी शुदा औरत हसरत किए रहती है।
माना कि प्रिया उसको कभी इस मामले में दोष नहीं देती थी अथवा उससे कोई शिकायत नहीं करती थी लेकिन बावजूद इसके उसका तो फर्ज़ था कि उसे अपनी बीवी की खुशियों का और उसकी ज़रूरतों का ख़याल रहे।
अपनी बेबसी और अपनी लाचारी पर इस समय उसे भारी अफ़सोस हुआ और ये सोच कर दुख भी हुआ कि काश! अपनी बीवी की तरह वो भी थोड़ा जवान होता।
पहली बार उसे एहसास हुआ कि अपने से इतनी कम उमर की लड़की से शादी कर के उसने एक बड़ी भूल तो की ही थी किंतु इसके साथ ही उसने प्रिया का जीवन भी बर्बाद कर दिया था।
अजीब इत्तेफ़ाक था।
देर रात तक ना अशोक को इन सब ख़यालों के चलते नींद आई और ना ही प्रिया को।
जाने कब दोनों को नींद ने अपनी आगोश में लिया जिसका उन्हें पता ही नहीं चला।
To be continued...
Nice and superb update....Update ~ 17
अशोक खत्री अब बिल्कुल स्वस्थ्य हो चुका था और अपने निश्चित समय पर कंपनी पहुंच जाता था।
वो खुद महसूस कर रहा था कि अब सब कुछ बहुत ही बढ़िया चलने लगा है।
जी-आई प्लांट में भी बाकी तो सब ठीक ही था लेकिन ज़िंक की लागत में अब भी वैसी कमी नहीं आ रही थी जितने कि वो अपेक्षा कर रहा था।
इसी सिलसिले में पंद्रह दिन पहले नौजवान अधिकारी यानि विशाल ने उसे थोड़ा प्रेशर दिया था, वैसे एक तरह से ये कहा जाए तो ग़लत न होगा कि उसने उसे परेशानी में डाल दिया था।
मगर,
अब जैसे वो इस मामले में बेफ़िक्र हो चुका था।
होता भी क्यों नहीं, नौजवान अधिकारी यानि विशाल अग्निहोत्री उसकी बीवी की दोस्त साक्षी का हसबैंड जो था।
एक्सीडेंट की घटना ने उसके साथ एक नया रिश्ता जो बना दिया था।
उसे यकीन हो चुका था कि विशाल अब ज़िंक वाले मामले में उसे किसी भी तरह से परेशान नहीं करेगा।
अशोक खत्री पिछले एक हफ़्ते से इस सबके चलते बड़ा खुश था और बेफ़िक्र हो कर अपना काम कर रहा था।
पाईप में कितना ज़िंक खर्च हो रह है इससे अब जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं रह गया था।
उसके इस बर्ताव से वॉचमैन वगैरह थोड़े हैरान थे।
आमतौर पर वो पाइप में कम कोटिंग के लिए उन पर दबाव डालता रहता था लेकिन अब वो इस मामले में उनसे कोई बात ही नहीं करता था।
जी-आई के सभी वर्कर्स दबी ज़ुबान में जाने क्या क्या बातें करने लगे थे।
उस वक्त दोपहर के साढ़े तीन बज रहे थे जब अचानक ही उसकी नज़र दूर से पैदल ही चले आ रहे विशाल पर पड़ी।
विशाल जी-आई के प्लांट की तरफ ही चला आ रहा था।
अशोक ने जब उसे इस तरफ ही आते देखा तो उसके माथे पर अचानक ही शिकन उभर आई।
इतना तो उसे भी पता था कि वो पैराडाइज स्टील्स एण्ड पॉवर लिमिटेड कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी था किंतु हेड ऑफिस से खुद ही पैदल चल कर आना उसे पहले दिन ही आश्चर्य में डाल दिया था।
इस वक्त भी उसके मन में कुछ पलों के लिए यही ख़याल उभरा किन्तु फिर वो ये सोच कर हल्के से मुस्कुरा उठा कि विशाल कदाचित उसका हाल चाल पूछने के लिए खुद चल कर आ रहा है।
इस ख़याल ने उसे रोमांचित सा कर दिया।
खुद पर थोड़ा प्राउड भी फील हुआ।
मन ही मन उसने अपनी वाइफ प्रिया को ये सोच कर धन्यवाद दिया कि अगर साक्षी से उसने दोस्ती न की होती तो आज वो अपनी सबसे बड़ी समस्या से मुक्त हो के न बैठा होता।
थोड़ी ही देर में विशाल अग्निहोत्री उसके ऑफिस में दाख़िल हुआ तो वो अपनी कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया।
हालाकि अपनी कुर्सी से उठ कर खड़ा होने में वो थोड़ा हिचकिचाया था।
कदाचित ये सोच कर कि अब तो उसका अधिकारी उसकी जान पहचान वाला है और उसकी बीवी की दोस्त का हसबैंड है।
"कैसे हैं मिस्टर खत्री?" विशाल ने हल्की मुस्कान होठों पर सजा कर उससे पूछा।
विशाल का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि कम उमर का होने के बावजूद वो एक अलग ही शख्सियत फील करवा देता था।
हालाकि उसमें सादगी भी थी लेकिन आंखों में आँखें डाल कर पूरे आत्मविश्वास के साथ बेबाकी से बात करना उसे एक अलग ही तरह का इंसान बना देता था।
ज़ाहिर है कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी था तो इतना रौब तो उसमें होना ही था।
अशोक खत्री चाह कर भी उसके सामने खुद को सामान्य न रख सका।
उसकी धड़कनें तीव्र हो चलीं।
"फ़...फाइन स....सर।" फिर वो थोड़ा झिझकते हुए बोला।
"आई होप, अब आप बेहतर फील कर रहे होंगे।" विशाल ने उसी हल्की मुस्कान के साथ कहा।
"जी बिल्कुल स...सर।" अशोक उसे सर कहने में बार बार झिझक रहा था।
"वेल, कैसा चल रहा है काम?" विशाल ने जैसे मुद्दे पर आते हुए पूछा──"क्या आपने ज़िंक की कम लागत के लिए कुछ किया?"
"क...क्या म...मतलब???" अशोक खत्री बुरी तरह चकरा गया और साथ ही बौखला भी गया।
उसे ख़्वाब में भी उम्मीद नहीं थी कि इतना कुछ होने के बाद भी विशाल यहां पर ज़िंक के मामले में उससे पूछताछ करेगा।
वो तो अब इस मामले में पूरी तरह से बेफिक्र ही हो चुका था।
विशाल उसके अंदर की हालत से ज़रा भी बेख़बर नहीं था।
होता भी कैसे?
वो तो आया ही इसी लिए था ताकि इस मामले में उसे फिर से गहन चिंता और परेशानी में डाल दे।
"कमाल है मिस्टर खत्री।" विशाल ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा──"मैंने तो आपसे शुद्ध हिन्दी में ही पूछा था। फिर भी आप कह रहे हैं──क्या मतलब?"
अशोक खत्री को ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही उसके घुटने मुड़ जाएंगे और वो धड़ाम से वहीं गिर जाएगा।
कहां वो इस मामले में पूरी तरह से बेफ़िक्र हो के बैठा था और कहां एक ही पल में वही समस्या फिर से उसके सिर पर आ गिरी थी।
उसका जी चाहा कि विशाल से कहे कि ये आप क्या कह रहे हैं? आप तो अब हमारे रिश्तेदार जैसे हो गए हैं? फिर भी ज़िंक का मामला ले कर उसके पास आ गए और उसे ऐसी समस्या में डुबाए दे रहे हैं जिसकी उसने कल्पना ही नहीं की थी?
किंतु,
वो चाह कर भी ऐसा न कह सका।
उसे याद आया कि विशाल ने उससे कहा था कि कंपनी में हर किसी के लिए एक ही नियम कानून होता है। कंपनी के बाहर बेशक कोई कैसा भी बर्ताव करे।
"ज...जी कोशिश ज़ारी है सर।" फिर उसने काफी हद तक अपने आपको सम्हाल कर कहा──"आपको तो पहले ही सारी बातें बता दी थी मैंने। इसके बावजूद कोशिश कर रहा हूं कि ज़िंक का खर्चा इतना न आए।"
"बहुत बढ़िया।" विशाल ने कहा──"अब तो आपसे मुझे पहले से भी ज़्यादा बेहतर की उम्मीद हो गई है। ख़ैर, आइए देखते हैं अंदर कैसा चल रहा है?"
विशाल की ये बात सुन कर अशोक की टांगें ये सोच कर कांपने लगीं कि अंदर जा कर आज फिर से वो ब्लैकबोर्ड में लिखी कोटिंग की जानकारी देखेगा।
ये सोच कर अशोक खत्री का अपने बाल नोच लेने का जी चाहा कि आज भी दुर्भाग्य से वो ब्लैकबोर्ड में लिखी जानकारी को मिटवाया नहीं।
पहली बार उसे एहसास हुआ कि उसे इतना ज़्यादा बेफ़िक्र नहीं होना चाहिए था।
उसे ये हर्गिज़ नहीं भूलना चाहिए था कि कंपनी के अंदर कोई किसी का माई बाप या दोस्त बंधु नहीं होता।
अशोक का जी चाहा कि धरती फटे और वो उसमें समा जाए या फिर कोई ऐसा चमत्कार हो जाए कि विशाल अंदर जाने का अपना इरादा ही मुल्तवी कर दे।
मगर किसी के चाहने से भला कहां कुछ हुआ करता है?
अगले ही पल जब विशाल अंदर की तरफ चल पड़ा तो मज़बूरन उसे भी उसके पीछे भारी क़दमों से चल देना पड़ा।
उसके बाद वही हुआ जिसकी उसे उम्मीद थी और जिसका उसे डर था।
विशाल ने अंदर जाते ही सबसे पहले एक सरसरी नज़र सभी वर्कर्स पर डाली उसके बाद ब्लैकबोर्ड की तरफ घूम गया।
उसके यूं अचानक आ जाने से अंदर काम कर रहे वर्कर्स एकदम से अलर्ट हो गए थे।
आख़िर पता तो उन्हें भी था कि विशाल अग्निहोत्री कोई मामूली इंसान नहीं था बल्कि कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी था।
"ये क्या मिस्टर खत्री?" ब्लैकबोर्ड पर नज़रें जमाए विशाल ने कहा──"जहां तक मुझे याद है पिछली बार जब मैं यहां आया था तब इस ब्लैकबोर्ड में कोटिंग की जो इन्फोर्मेशन दर्ज़ थी वो आज के मुकाबले काफी डिफ़रेंट थी। आज भी उन्हीं पाइप्स का जी-आई हो रहा है जो उस दिन हो रहे थे। इट मीन्स, मॉल वही है बट ब्लैकबोर्ड में लिखी इस इन्फोर्मेशन के अनुसार उस दिन की अपेक्षा आज ज़्यादा कोटिंग नज़र आ रही है? इस मॉल में एक पाइप पर आई थिंक चार सौ बीस या चालीस ग्राम के अराउंड ज़िंक लगता है जबकि इस ब्लैकबोर्ड में लिखी जानकारी के अनुसार एक पाइप में सात सौ से ले कर आठ सौ ग्राम तक कोटिंग आई हुई है। इसमें सिर्फ एक ही ब्रैकेट में कोटिंग छह सौ ग्राम दिख रही है बाकी सभी सात सौ और आठ सौ तक जा रही है। पिछली बार जब मैं आया था तो शायद साढ़े पांच सौ के आसपास लिखी हुई थी इसमें। आपने कहा कि कोशिश ज़ारी है तो अब आप ही बताइए कि ये कैसी कोशिश है? आज की कोटिंग देखने के बाद तो यही ज़ाहिर होता है मिस्टर खत्री कि आप ज़िंक की लागत कम करने की कोई कोशिश ही नहीं कर रहे हैं। इससे बेहतर तो पिछली बार की कोटिंग थी।"
अशोक खत्री को समझ ही न आया कि क्या कहे?
एक बहुत बड़े अपराधी की भांति सिर को झुकाए खड़ा हो गया था वो।
इस समय वो बहुत ज़्यादा असहाय सा महसूस करने लगा था।
अपने वर्कर्स के सामने विशाल द्वारा ऐसा कहे जाने पर वो अपमानित भी महसूस कर रहा था।
लेकिन,
कुछ भी कहने की जैसे उसमें हिम्मत ही नहीं थी।
होती भी कैसे?
इतना तो वो भी समझ रहा था कि हर बात से बेफ़िक्र हो जाने की ग़लती तो उसी ने की थी।
वो ये सोच बैठा था कि अब इस मामले में विशाल उससे कुछ कहेगा ही नहीं।
"यूं चुप रहने से या सिर झुका लेने से कैसे काम चलेगा मिस्टर खत्री?" विशाल उसकी दशा पर खुद भी बुरा महसूस करने लगा था लेकिन प्रत्यक्ष में सपाट लहजे में बोला──"मुझे बड़े अफ़सोस के साथ ये कहना पड़ेगा कि अगर आप ज़िंक की लागत में कोई कमी नहीं कर पाए तो कंपनी में आपको इतनी ज़्यादा सैलरी, प्लस रहने के लिए इतना बेहतर फ़्लैट देने का क्या फ़ायदा? आई एम वेरी वेरी सॉरी मिस्टर खत्री बट ऐसे में आपको यकीनन इस नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है।"
विशाल की बात सुन कर अशोक को ज़बरदस्त झटका लगा।
उसने सिर उठा कर अजीब भाव से विशाल की तरफ देखा।
विशाल के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे।
"वेल, आप क्योंकि मेरे क़रीबी भी हैं इस लिए मैं अपनी तरफ से आपको एक आख़िरी मौका ज़रूर दूंगा।" विशाल कहते हुए अशोक के ऑफिस की तरफ धीरे धीरे चल पड़ा। उसके पीछे अशोक भी चल पड़ा था। उधर विशाल ने आगे कहा──"मैं आपको सिर्फ पंद्रह दिनों का वक्त दे सकता हूं। अगर इन पंद्रह दिनों में आप ज़िंक के खर्चे को बेहतर अनुपात पर ले आए तो आप इस कंपनी में पूरे सम्मान के साथ बने रहेंगे। प्लीज़, इस बार मुझे निराश मत कीजिएगा।"
विशाल अग्निहोत्री इतना कह कर चला गया लेकिन अशोक खत्री के सिर पर जैसे एक बार फिर से मुसीबतों का पहाड़ रख गया।
वो सोचने पर मज़बूर हो गया कि विशाल उसके प्रति ये जानते हुए भी इतना ज़्यादा कठोर कैसे हो सकता था कि वो उसकी पत्नी साक्षी की दोस्त प्रिया का हसबैंड है?
बहरहाल, उसके बाद का सारा समय यही सब सोचते विचारते गुज़रा और फिर वो रिपोर्ट वगैरह बना कर कार से अपने फ्लैट की तरफ चल पड़ा।
साढ़े तीन बजे तक वो हर बात से बेफ़िक्र था और बड़ा खुश था।
लेकिन,
उसके बाद ऐसा लगा जैसे उसकी बेफ़िक्री और उसकी खुशी पर ग्रहण लग गया हो।
जिस बात की उसने कल्पना नहीं की थी वही उसके साथ हो गई थी।
एक बार फिर से वो गहन चिंता और परेशानी में डूब गया था।
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"क्या हुआ?" रात डिनर के बाद जब प्रिया कमरे में बेड पर अपने पति के बगल से बैठी तो उसने अशोक से पूछा──"जब से आए हैं तब से आप कुछ अपसेट से दिख रहे हैं? कुछ हुआ है क्या?"
"न...नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।" अशोक ने बात को टालना चाहा──"तुम आराम से सो जाओ।"
"अरे! बात कैसे नहीं है?" प्रिया ने उसकी तरफ खिसक कर कहा──"हर रोज़ तो आपका चेहरा खुशी से दमकता हुआ नज़र आता था जबकि आज ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। देखिए, मुझे मूर्ख मत समझिए और ना ही मुझसे कुछ छुपाइए। जो भी बात है क्लियरली बता दीजिए।"
अशोक को भी लगा कि प्रिया को सारी बात बता देना ही उचित होगा।
संभव है उसकी परेशानी अथवा समस्या को जान कर वो अपनी दोस्त साक्षी से बात करे और उससे कहे कि वो अपने हसबैंड विशाल को इस मामले में समझाए।
अशोक ने एक गहरी सांस ली और फिर वो सब कुछ बताता चला गया।
प्रिया को भी ये जान कर झटका लगा कि विशाल उसके हसबैंड के साथ ऐसा कैसे कर सकता है?
"आप चिंता मत कीजिए।" फिर उसने अशोक की तरफ देखते हुए कहा──"मैं इस बारे में अपनी दोस्त साक्षी से बात करूंगी। मुझे पूरा यकीन है कि जब मेरे द्वारा साक्षी को ये सब पता चलेगा तो वो अपने हसबैंड विशाल को अच्छी खासी खरी खोटी सुनाएगी। मुझे यकीन है कि साक्षी की खरी खोटी सुन कर विशाल आपके ऊपर से इस प्रॉब्लम को हटा लेगा।"
"ईश्वर करे ऐसा ही हो।" अशोक ने गहरी सांस ली──"मुझे भी तुम्हारी दोस्त साक्षी पर भरोसा है।"
"एक मिनट।" प्रिया ने बेड के एक तरफ रखे अपने मोबाइल को उठा कर कहा──"मैं अभी साक्षी को फ़ोन लगाती हूं और उसे ये सब बताती हूं। देखना, साक्षी सब कुछ ठीक कर देगी।"
"ज़्यादा समय तो नहीं हो गया?" अशोक ने कहा──"मुझे लगता है कि रात के इस वक्त जबकि तुम्हारी दोस्त अपने हसबैंड के साथ सो गई होगी तो उन्हें डिस्टर्ब करना उचित नहीं होगा।"
"अरे! अभी सवा दस ही तो हुए हैं।" प्रिया ने कहा──"और वैसे भी मैं चाहे जिस टाइम अपनी दोस्त साक्षी को फ़ोन लगाऊं वो बुरा मानने वाली नहीं है।"
"ठीक है फिर।" अशोक ने धड़कते दिल से कहा──"जैसा तुम्हें ठीक लगे करो।"
प्रिया ने अगले ही पल साक्षी को कॉल लगाया और मोबाइल को दाहिने कान पर लगा लिया।
बेल जाने की आवाज़ उसे स्पष्ट सुनाई दे रही थी।
कुछ समय बाद जब बेल पूरी हो गई तो कॉल कट हो गई।
प्रिया ने मोबाइल को कान से हटा लिया।
"दोनों सो गए होंगे।" अशोक ने जैसे अपनी संभावना व्यक्त की──"मेरा कहना यही है कि इस वक्त उन्हें डिस्टर्ब करना सही नहीं है।"
"उसके हसबैंड ने आपको और मुझे चिंता में डाल दिया है और खुद अपनी वाइफ के साथ चैन की नींद सो रहा है?" प्रिया ने नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा──"मैं भी तब तक साक्षी को कॉल लगाऊंगी जब तक कि वो उठा नहीं लेती। मैं भी उसे चैन से सोने नहीं दूंगी।"
अशोक इस बार कुछ बोल न सका।
अपनी पत्नी प्रिया की बातों से कदाचित वो भी सहमत था।
बहरहाल, दूसरी बार जब प्रिया ने कॉल किया तो देर से ही सही लेकिन साक्षी ने कॉल उठा लिया।
प्रिया अभी कुछ कहने ही वाली थी कि दूसरी तरफ से उसे अपने कान में कुछ ऐसा सुनाई दिया जिसके चलते वो एकदम चुप सी हो गई।
उसकी धड़कनें पलक झपकते ही तेज़ गति से चलने लगीं।
दिलो दिमाग़ में अभीब सा एहसास भरता चला गया।
"तुझे इसी वक्त कॉल करना था यार?" उधर से साक्षी अपनी उखड़ी हुई सांसों के साथ बोली──"पूरा रंग में भंग डाल दिया।"
"त...तू इस वक्त क...क्या कर???" प्रिया ने अपनी तेज़ चलती धड़कनों को नियंत्रित करने का प्रयास करते हुए किंतु अटकते हुए पूछना ही चाहा था कि उधर से साक्षी ने बीच में ही उसकी बात काट कर कहा──"वही कर रही थी जो एक शादी शुदा औरत रात के वक्त अपने कमरे में अपने हसबैंड के साथ करती है। साफ शब्दों में कहूं तो सेक्स कर रही थी और तूने कॉल कर के खलल डाल दिया है। ख़ैर, बता इस वक्त किस लिए कॉल किया है मुझे? सब ठीक तो है ना?"
साक्षी के मुख से स्पष्ट भाषा में सेक्स करने की बात सुन कर प्रिया को बड़ा ही अजीब महसूस हुआ।
वो सोचने पर मज़बूर हो गई कि उसकी दोस्त साक्षी कितनी बेशर्मी से ये बात कह दी है।
ये सोच कर उसके रोंगटे खड़े हो गए कि साक्षी ने यकीनन अपने हसबैंड के सामने ही उससे ऐसा कहा है।
जाने क्या सोचा होगा विशाल ने उसके बारे में?
"अब कुछ बोलेगी भी या अचानक से मौन व्रत धारण कर लिया है तूने?" उसे कुछ न बोलता देख उधर से साक्षी ने कुछ ऐसे लहजे में कहा जैसे वो चिढ़ गई हो।
ज़ाहिर था दोनों पति पत्नी जिस काम में मगन थे उस पर खलल पड़ जाने से मूड तो ख़राब हो ही जाना था।
"अ...अच्छा मैं तुझसे सुबह बात करूंगी।" प्रिया ने जल्दी से कहा──"त...तू अपना क....काम कर, गुड नाइट।"
प्रिया ने उधर से साक्षी की कोई बात सुने बिना ही कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।
आंखें बंद कर के उसने दो तीन गहरी गहरी सांसें ली।
मनो मस्तिष्क में अभी भी यही ख़याल घूम रहा था कि साक्षी इस वक्त अपने पति के साथ सेक्स का आनंद ले रही थी और उसने उसके आनंद में खलल डाल दिया था।
अचानक ही उसके मन में ख़याल उभरा कि अशोक के साथ संभोग का आनंद लिए हुए उसे काफी समय गुज़र चुका है।
उमर ज़्यादा हो जाने की वजह से अशोक अपनी तरफ से बहुत कम ही पहल करता था।
प्रिया का अगर कभी मन भी करता था तो वो ये सोच कर खुद को रोक लेती थी कि जाने उसका पति उसके बारे में क्या सोचेगा?
या फिर खुद अपने बारे में भी कि अपनी जवान बीवी को वो संभोग सुख से वंचित किए रहता है।
"क्या हुआ?" प्रिया अभी ये सब सोच ही रही थी कि तभी अशोक बोल पड़ा──"तुमने अचानक से फोन क्यों कट कर दिया?"
प्रिया को समझ न आया कि कैसे वो अपने पति को ये बताए कि उसकी दोस्त साक्षी इस वक्त अपने हसबैंड के साथ संभोग का आनंद ले रही थी और वो नहीं चाहती थी कि उसके द्वारा बात करने से उसका आनंद उससे छिन जाए।
"वो बस ऐसे ही।" फिर उसने थोड़ा झिझकते हुए कहा──"आपने सही कहा था कि इस वक्त उसे डिस्टर्ब करना उचित नहीं होगा। ख़ैर आप फ़िक्र मत कीजिए, कल सुबह साक्षी से मैं इस बारे में बात कर लूंगी। चलिए अब अपने अंदर से चिंता को निकाल दीजिए और आराम से सो जाइए।"
अशोक कोई बच्चा नहीं था।
वो अच्छी तरह समझ गया था कि उसकी पत्नी ने कॉल क्यों कट कर दी थी।
ये सोच कर उसे बुरा लगा कि वो अपनी जवान बीवी को वो सुख दे पाने में कितना बेबस है जिस सुख को पाने के लिए हर जवान और शादी शुदा औरत हसरत किए रहती है।
माना कि प्रिया उसको कभी इस मामले में दोष नहीं देती थी अथवा उससे कोई शिकायत नहीं करती थी लेकिन बावजूद इसके उसका तो फर्ज़ था कि उसे अपनी बीवी की खुशियों का और उसकी ज़रूरतों का ख़याल रहे।
अपनी बेबसी और अपनी लाचारी पर इस समय उसे भारी अफ़सोस हुआ और ये सोच कर दुख भी हुआ कि काश! अपनी बीवी की तरह वो भी थोड़ा जवान होता।
पहली बार उसे एहसास हुआ कि अपने से इतनी कम उमर की लड़की से शादी कर के उसने एक बड़ी भूल तो की ही थी किंतु इसके साथ ही उसने प्रिया का जीवन भी बर्बाद कर दिया था।
अजीब इत्तेफ़ाक था।
देर रात तक ना अशोक को इन सब ख़यालों के चलते नींद आई और ना ही प्रिया को।
जाने कब दोनों को नींद ने अपनी आगोश में लिया जिसका उन्हें पता ही नहीं चला।
To be continued...
Nice update....Update ~ 17
अशोक खत्री अब बिल्कुल स्वस्थ्य हो चुका था और अपने निश्चित समय पर कंपनी पहुंच जाता था।
वो खुद महसूस कर रहा था कि अब सब कुछ बहुत ही बढ़िया चलने लगा है।
जी-आई प्लांट में भी बाकी तो सब ठीक ही था लेकिन ज़िंक की लागत में अब भी वैसी कमी नहीं आ रही थी जितने कि वो अपेक्षा कर रहा था।
इसी सिलसिले में पंद्रह दिन पहले नौजवान अधिकारी यानि विशाल ने उसे थोड़ा प्रेशर दिया था, वैसे एक तरह से ये कहा जाए तो ग़लत न होगा कि उसने उसे परेशानी में डाल दिया था।
मगर,
अब जैसे वो इस मामले में बेफ़िक्र हो चुका था।
होता भी क्यों नहीं, नौजवान अधिकारी यानि विशाल अग्निहोत्री उसकी बीवी की दोस्त साक्षी का हसबैंड जो था।
एक्सीडेंट की घटना ने उसके साथ एक नया रिश्ता जो बना दिया था।
उसे यकीन हो चुका था कि विशाल अब ज़िंक वाले मामले में उसे किसी भी तरह से परेशान नहीं करेगा।
अशोक खत्री पिछले एक हफ़्ते से इस सबके चलते बड़ा खुश था और बेफ़िक्र हो कर अपना काम कर रहा था।
पाईप में कितना ज़िंक खर्च हो रह है इससे अब जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं रह गया था।
उसके इस बर्ताव से वॉचमैन वगैरह थोड़े हैरान थे।
आमतौर पर वो पाइप में कम कोटिंग के लिए उन पर दबाव डालता रहता था लेकिन अब वो इस मामले में उनसे कोई बात ही नहीं करता था।
जी-आई के सभी वर्कर्स दबी ज़ुबान में जाने क्या क्या बातें करने लगे थे।
उस वक्त दोपहर के साढ़े तीन बज रहे थे जब अचानक ही उसकी नज़र दूर से पैदल ही चले आ रहे विशाल पर पड़ी।
विशाल जी-आई के प्लांट की तरफ ही चला आ रहा था।
अशोक ने जब उसे इस तरफ ही आते देखा तो उसके माथे पर अचानक ही शिकन उभर आई।
इतना तो उसे भी पता था कि वो पैराडाइज स्टील्स एण्ड पॉवर लिमिटेड कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी था किंतु हेड ऑफिस से खुद ही पैदल चल कर आना उसे पहले दिन ही आश्चर्य में डाल दिया था।
इस वक्त भी उसके मन में कुछ पलों के लिए यही ख़याल उभरा किन्तु फिर वो ये सोच कर हल्के से मुस्कुरा उठा कि विशाल कदाचित उसका हाल चाल पूछने के लिए खुद चल कर आ रहा है।
इस ख़याल ने उसे रोमांचित सा कर दिया।
खुद पर थोड़ा प्राउड भी फील हुआ।
मन ही मन उसने अपनी वाइफ प्रिया को ये सोच कर धन्यवाद दिया कि अगर साक्षी से उसने दोस्ती न की होती तो आज वो अपनी सबसे बड़ी समस्या से मुक्त हो के न बैठा होता।
थोड़ी ही देर में विशाल अग्निहोत्री उसके ऑफिस में दाख़िल हुआ तो वो अपनी कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया।
हालाकि अपनी कुर्सी से उठ कर खड़ा होने में वो थोड़ा हिचकिचाया था।
कदाचित ये सोच कर कि अब तो उसका अधिकारी उसकी जान पहचान वाला है और उसकी बीवी की दोस्त का हसबैंड है।
"कैसे हैं मिस्टर खत्री?" विशाल ने हल्की मुस्कान होठों पर सजा कर उससे पूछा।
विशाल का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि कम उमर का होने के बावजूद वो एक अलग ही शख्सियत फील करवा देता था।
हालाकि उसमें सादगी भी थी लेकिन आंखों में आँखें डाल कर पूरे आत्मविश्वास के साथ बेबाकी से बात करना उसे एक अलग ही तरह का इंसान बना देता था।
ज़ाहिर है कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी था तो इतना रौब तो उसमें होना ही था।
अशोक खत्री चाह कर भी उसके सामने खुद को सामान्य न रख सका।
उसकी धड़कनें तीव्र हो चलीं।
"फ़...फाइन स....सर।" फिर वो थोड़ा झिझकते हुए बोला।
"आई होप, अब आप बेहतर फील कर रहे होंगे।" विशाल ने उसी हल्की मुस्कान के साथ कहा।
"जी बिल्कुल स...सर।" अशोक उसे सर कहने में बार बार झिझक रहा था।
"वेल, कैसा चल रहा है काम?" विशाल ने जैसे मुद्दे पर आते हुए पूछा──"क्या आपने ज़िंक की कम लागत के लिए कुछ किया?"
"क...क्या म...मतलब???" अशोक खत्री बुरी तरह चकरा गया और साथ ही बौखला भी गया।
उसे ख़्वाब में भी उम्मीद नहीं थी कि इतना कुछ होने के बाद भी विशाल यहां पर ज़िंक के मामले में उससे पूछताछ करेगा।
वो तो अब इस मामले में पूरी तरह से बेफिक्र ही हो चुका था।
विशाल उसके अंदर की हालत से ज़रा भी बेख़बर नहीं था।
होता भी कैसे?
वो तो आया ही इसी लिए था ताकि इस मामले में उसे फिर से गहन चिंता और परेशानी में डाल दे।
"कमाल है मिस्टर खत्री।" विशाल ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा──"मैंने तो आपसे शुद्ध हिन्दी में ही पूछा था। फिर भी आप कह रहे हैं──क्या मतलब?"
अशोक खत्री को ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही उसके घुटने मुड़ जाएंगे और वो धड़ाम से वहीं गिर जाएगा।
कहां वो इस मामले में पूरी तरह से बेफ़िक्र हो के बैठा था और कहां एक ही पल में वही समस्या फिर से उसके सिर पर आ गिरी थी।
उसका जी चाहा कि विशाल से कहे कि ये आप क्या कह रहे हैं? आप तो अब हमारे रिश्तेदार जैसे हो गए हैं? फिर भी ज़िंक का मामला ले कर उसके पास आ गए और उसे ऐसी समस्या में डुबाए दे रहे हैं जिसकी उसने कल्पना ही नहीं की थी?
किंतु,
वो चाह कर भी ऐसा न कह सका।
उसे याद आया कि विशाल ने उससे कहा था कि कंपनी में हर किसी के लिए एक ही नियम कानून होता है। कंपनी के बाहर बेशक कोई कैसा भी बर्ताव करे।
"ज...जी कोशिश ज़ारी है सर।" फिर उसने काफी हद तक अपने आपको सम्हाल कर कहा──"आपको तो पहले ही सारी बातें बता दी थी मैंने। इसके बावजूद कोशिश कर रहा हूं कि ज़िंक का खर्चा इतना न आए।"
"बहुत बढ़िया।" विशाल ने कहा──"अब तो आपसे मुझे पहले से भी ज़्यादा बेहतर की उम्मीद हो गई है। ख़ैर, आइए देखते हैं अंदर कैसा चल रहा है?"
विशाल की ये बात सुन कर अशोक की टांगें ये सोच कर कांपने लगीं कि अंदर जा कर आज फिर से वो ब्लैकबोर्ड में लिखी कोटिंग की जानकारी देखेगा।
ये सोच कर अशोक खत्री का अपने बाल नोच लेने का जी चाहा कि आज भी दुर्भाग्य से वो ब्लैकबोर्ड में लिखी जानकारी को मिटवाया नहीं।
पहली बार उसे एहसास हुआ कि उसे इतना ज़्यादा बेफ़िक्र नहीं होना चाहिए था।
उसे ये हर्गिज़ नहीं भूलना चाहिए था कि कंपनी के अंदर कोई किसी का माई बाप या दोस्त बंधु नहीं होता।
अशोक का जी चाहा कि धरती फटे और वो उसमें समा जाए या फिर कोई ऐसा चमत्कार हो जाए कि विशाल अंदर जाने का अपना इरादा ही मुल्तवी कर दे।
मगर किसी के चाहने से भला कहां कुछ हुआ करता है?
अगले ही पल जब विशाल अंदर की तरफ चल पड़ा तो मज़बूरन उसे भी उसके पीछे भारी क़दमों से चल देना पड़ा।
उसके बाद वही हुआ जिसकी उसे उम्मीद थी और जिसका उसे डर था।
विशाल ने अंदर जाते ही सबसे पहले एक सरसरी नज़र सभी वर्कर्स पर डाली उसके बाद ब्लैकबोर्ड की तरफ घूम गया।
उसके यूं अचानक आ जाने से अंदर काम कर रहे वर्कर्स एकदम से अलर्ट हो गए थे।
आख़िर पता तो उन्हें भी था कि विशाल अग्निहोत्री कोई मामूली इंसान नहीं था बल्कि कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी था।
"ये क्या मिस्टर खत्री?" ब्लैकबोर्ड पर नज़रें जमाए विशाल ने कहा──"जहां तक मुझे याद है पिछली बार जब मैं यहां आया था तब इस ब्लैकबोर्ड में कोटिंग की जो इन्फोर्मेशन दर्ज़ थी वो आज के मुकाबले काफी डिफ़रेंट थी। आज भी उन्हीं पाइप्स का जी-आई हो रहा है जो उस दिन हो रहे थे। इट मीन्स, मॉल वही है बट ब्लैकबोर्ड में लिखी इस इन्फोर्मेशन के अनुसार उस दिन की अपेक्षा आज ज़्यादा कोटिंग नज़र आ रही है? इस मॉल में एक पाइप पर आई थिंक चार सौ बीस या चालीस ग्राम के अराउंड ज़िंक लगता है जबकि इस ब्लैकबोर्ड में लिखी जानकारी के अनुसार एक पाइप में सात सौ से ले कर आठ सौ ग्राम तक कोटिंग आई हुई है। इसमें सिर्फ एक ही ब्रैकेट में कोटिंग छह सौ ग्राम दिख रही है बाकी सभी सात सौ और आठ सौ तक जा रही है। पिछली बार जब मैं आया था तो शायद साढ़े पांच सौ के आसपास लिखी हुई थी इसमें। आपने कहा कि कोशिश ज़ारी है तो अब आप ही बताइए कि ये कैसी कोशिश है? आज की कोटिंग देखने के बाद तो यही ज़ाहिर होता है मिस्टर खत्री कि आप ज़िंक की लागत कम करने की कोई कोशिश ही नहीं कर रहे हैं। इससे बेहतर तो पिछली बार की कोटिंग थी।"
अशोक खत्री को समझ ही न आया कि क्या कहे?
एक बहुत बड़े अपराधी की भांति सिर को झुकाए खड़ा हो गया था वो।
इस समय वो बहुत ज़्यादा असहाय सा महसूस करने लगा था।
अपने वर्कर्स के सामने विशाल द्वारा ऐसा कहे जाने पर वो अपमानित भी महसूस कर रहा था।
लेकिन,
कुछ भी कहने की जैसे उसमें हिम्मत ही नहीं थी।
होती भी कैसे?
इतना तो वो भी समझ रहा था कि हर बात से बेफ़िक्र हो जाने की ग़लती तो उसी ने की थी।
वो ये सोच बैठा था कि अब इस मामले में विशाल उससे कुछ कहेगा ही नहीं।
"यूं चुप रहने से या सिर झुका लेने से कैसे काम चलेगा मिस्टर खत्री?" विशाल उसकी दशा पर खुद भी बुरा महसूस करने लगा था लेकिन प्रत्यक्ष में सपाट लहजे में बोला──"मुझे बड़े अफ़सोस के साथ ये कहना पड़ेगा कि अगर आप ज़िंक की लागत में कोई कमी नहीं कर पाए तो कंपनी में आपको इतनी ज़्यादा सैलरी, प्लस रहने के लिए इतना बेहतर फ़्लैट देने का क्या फ़ायदा? आई एम वेरी वेरी सॉरी मिस्टर खत्री बट ऐसे में आपको यकीनन इस नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है।"
विशाल की बात सुन कर अशोक को ज़बरदस्त झटका लगा।
उसने सिर उठा कर अजीब भाव से विशाल की तरफ देखा।
विशाल के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे।
"वेल, आप क्योंकि मेरे क़रीबी भी हैं इस लिए मैं अपनी तरफ से आपको एक आख़िरी मौका ज़रूर दूंगा।" विशाल कहते हुए अशोक के ऑफिस की तरफ धीरे धीरे चल पड़ा। उसके पीछे अशोक भी चल पड़ा था। उधर विशाल ने आगे कहा──"मैं आपको सिर्फ पंद्रह दिनों का वक्त दे सकता हूं। अगर इन पंद्रह दिनों में आप ज़िंक के खर्चे को बेहतर अनुपात पर ले आए तो आप इस कंपनी में पूरे सम्मान के साथ बने रहेंगे। प्लीज़, इस बार मुझे निराश मत कीजिएगा।"
विशाल अग्निहोत्री इतना कह कर चला गया लेकिन अशोक खत्री के सिर पर जैसे एक बार फिर से मुसीबतों का पहाड़ रख गया।
वो सोचने पर मज़बूर हो गया कि विशाल उसके प्रति ये जानते हुए भी इतना ज़्यादा कठोर कैसे हो सकता था कि वो उसकी पत्नी साक्षी की दोस्त प्रिया का हसबैंड है?
बहरहाल, उसके बाद का सारा समय यही सब सोचते विचारते गुज़रा और फिर वो रिपोर्ट वगैरह बना कर कार से अपने फ्लैट की तरफ चल पड़ा।
साढ़े तीन बजे तक वो हर बात से बेफ़िक्र था और बड़ा खुश था।
लेकिन,
उसके बाद ऐसा लगा जैसे उसकी बेफ़िक्री और उसकी खुशी पर ग्रहण लग गया हो।
जिस बात की उसने कल्पना नहीं की थी वही उसके साथ हो गई थी।
एक बार फिर से वो गहन चिंता और परेशानी में डूब गया था।
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"क्या हुआ?" रात डिनर के बाद जब प्रिया कमरे में बेड पर अपने पति के बगल से बैठी तो उसने अशोक से पूछा──"जब से आए हैं तब से आप कुछ अपसेट से दिख रहे हैं? कुछ हुआ है क्या?"
"न...नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।" अशोक ने बात को टालना चाहा──"तुम आराम से सो जाओ।"
"अरे! बात कैसे नहीं है?" प्रिया ने उसकी तरफ खिसक कर कहा──"हर रोज़ तो आपका चेहरा खुशी से दमकता हुआ नज़र आता था जबकि आज ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। देखिए, मुझे मूर्ख मत समझिए और ना ही मुझसे कुछ छुपाइए। जो भी बात है क्लियरली बता दीजिए।"
अशोक को भी लगा कि प्रिया को सारी बात बता देना ही उचित होगा।
संभव है उसकी परेशानी अथवा समस्या को जान कर वो अपनी दोस्त साक्षी से बात करे और उससे कहे कि वो अपने हसबैंड विशाल को इस मामले में समझाए।
अशोक ने एक गहरी सांस ली और फिर वो सब कुछ बताता चला गया।
प्रिया को भी ये जान कर झटका लगा कि विशाल उसके हसबैंड के साथ ऐसा कैसे कर सकता है?
"आप चिंता मत कीजिए।" फिर उसने अशोक की तरफ देखते हुए कहा──"मैं इस बारे में अपनी दोस्त साक्षी से बात करूंगी। मुझे पूरा यकीन है कि जब मेरे द्वारा साक्षी को ये सब पता चलेगा तो वो अपने हसबैंड विशाल को अच्छी खासी खरी खोटी सुनाएगी। मुझे यकीन है कि साक्षी की खरी खोटी सुन कर विशाल आपके ऊपर से इस प्रॉब्लम को हटा लेगा।"
"ईश्वर करे ऐसा ही हो।" अशोक ने गहरी सांस ली──"मुझे भी तुम्हारी दोस्त साक्षी पर भरोसा है।"
"एक मिनट।" प्रिया ने बेड के एक तरफ रखे अपने मोबाइल को उठा कर कहा──"मैं अभी साक्षी को फ़ोन लगाती हूं और उसे ये सब बताती हूं। देखना, साक्षी सब कुछ ठीक कर देगी।"
"ज़्यादा समय तो नहीं हो गया?" अशोक ने कहा──"मुझे लगता है कि रात के इस वक्त जबकि तुम्हारी दोस्त अपने हसबैंड के साथ सो गई होगी तो उन्हें डिस्टर्ब करना उचित नहीं होगा।"
"अरे! अभी सवा दस ही तो हुए हैं।" प्रिया ने कहा──"और वैसे भी मैं चाहे जिस टाइम अपनी दोस्त साक्षी को फ़ोन लगाऊं वो बुरा मानने वाली नहीं है।"
"ठीक है फिर।" अशोक ने धड़कते दिल से कहा──"जैसा तुम्हें ठीक लगे करो।"
प्रिया ने अगले ही पल साक्षी को कॉल लगाया और मोबाइल को दाहिने कान पर लगा लिया।
बेल जाने की आवाज़ उसे स्पष्ट सुनाई दे रही थी।
कुछ समय बाद जब बेल पूरी हो गई तो कॉल कट हो गई।
प्रिया ने मोबाइल को कान से हटा लिया।
"दोनों सो गए होंगे।" अशोक ने जैसे अपनी संभावना व्यक्त की──"मेरा कहना यही है कि इस वक्त उन्हें डिस्टर्ब करना सही नहीं है।"
"उसके हसबैंड ने आपको और मुझे चिंता में डाल दिया है और खुद अपनी वाइफ के साथ चैन की नींद सो रहा है?" प्रिया ने नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा──"मैं भी तब तक साक्षी को कॉल लगाऊंगी जब तक कि वो उठा नहीं लेती। मैं भी उसे चैन से सोने नहीं दूंगी।"
अशोक इस बार कुछ बोल न सका।
अपनी पत्नी प्रिया की बातों से कदाचित वो भी सहमत था।
बहरहाल, दूसरी बार जब प्रिया ने कॉल किया तो देर से ही सही लेकिन साक्षी ने कॉल उठा लिया।
प्रिया अभी कुछ कहने ही वाली थी कि दूसरी तरफ से उसे अपने कान में कुछ ऐसा सुनाई दिया जिसके चलते वो एकदम चुप सी हो गई।
उसकी धड़कनें पलक झपकते ही तेज़ गति से चलने लगीं।
दिलो दिमाग़ में अभीब सा एहसास भरता चला गया।
"तुझे इसी वक्त कॉल करना था यार?" उधर से साक्षी अपनी उखड़ी हुई सांसों के साथ बोली──"पूरा रंग में भंग डाल दिया।"
"त...तू इस वक्त क...क्या कर???" प्रिया ने अपनी तेज़ चलती धड़कनों को नियंत्रित करने का प्रयास करते हुए किंतु अटकते हुए पूछना ही चाहा था कि उधर से साक्षी ने बीच में ही उसकी बात काट कर कहा──"वही कर रही थी जो एक शादी शुदा औरत रात के वक्त अपने कमरे में अपने हसबैंड के साथ करती है। साफ शब्दों में कहूं तो सेक्स कर रही थी और तूने कॉल कर के खलल डाल दिया है। ख़ैर, बता इस वक्त किस लिए कॉल किया है मुझे? सब ठीक तो है ना?"
साक्षी के मुख से स्पष्ट भाषा में सेक्स करने की बात सुन कर प्रिया को बड़ा ही अजीब महसूस हुआ।
वो सोचने पर मज़बूर हो गई कि उसकी दोस्त साक्षी कितनी बेशर्मी से ये बात कह दी है।
ये सोच कर उसके रोंगटे खड़े हो गए कि साक्षी ने यकीनन अपने हसबैंड के सामने ही उससे ऐसा कहा है।
जाने क्या सोचा होगा विशाल ने उसके बारे में?
"अब कुछ बोलेगी भी या अचानक से मौन व्रत धारण कर लिया है तूने?" उसे कुछ न बोलता देख उधर से साक्षी ने कुछ ऐसे लहजे में कहा जैसे वो चिढ़ गई हो।
ज़ाहिर था दोनों पति पत्नी जिस काम में मगन थे उस पर खलल पड़ जाने से मूड तो ख़राब हो ही जाना था।
"अ...अच्छा मैं तुझसे सुबह बात करूंगी।" प्रिया ने जल्दी से कहा──"त...तू अपना क....काम कर, गुड नाइट।"
प्रिया ने उधर से साक्षी की कोई बात सुने बिना ही कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।
आंखें बंद कर के उसने दो तीन गहरी गहरी सांसें ली।
मनो मस्तिष्क में अभी भी यही ख़याल घूम रहा था कि साक्षी इस वक्त अपने पति के साथ सेक्स का आनंद ले रही थी और उसने उसके आनंद में खलल डाल दिया था।
अचानक ही उसके मन में ख़याल उभरा कि अशोक के साथ संभोग का आनंद लिए हुए उसे काफी समय गुज़र चुका है।
उमर ज़्यादा हो जाने की वजह से अशोक अपनी तरफ से बहुत कम ही पहल करता था।
प्रिया का अगर कभी मन भी करता था तो वो ये सोच कर खुद को रोक लेती थी कि जाने उसका पति उसके बारे में क्या सोचेगा?
या फिर खुद अपने बारे में भी कि अपनी जवान बीवी को वो संभोग सुख से वंचित किए रहता है।
"क्या हुआ?" प्रिया अभी ये सब सोच ही रही थी कि तभी अशोक बोल पड़ा──"तुमने अचानक से फोन क्यों कट कर दिया?"
प्रिया को समझ न आया कि कैसे वो अपने पति को ये बताए कि उसकी दोस्त साक्षी इस वक्त अपने हसबैंड के साथ संभोग का आनंद ले रही थी और वो नहीं चाहती थी कि उसके द्वारा बात करने से उसका आनंद उससे छिन जाए।
"वो बस ऐसे ही।" फिर उसने थोड़ा झिझकते हुए कहा──"आपने सही कहा था कि इस वक्त उसे डिस्टर्ब करना उचित नहीं होगा। ख़ैर आप फ़िक्र मत कीजिए, कल सुबह साक्षी से मैं इस बारे में बात कर लूंगी। चलिए अब अपने अंदर से चिंता को निकाल दीजिए और आराम से सो जाइए।"
अशोक कोई बच्चा नहीं था।
वो अच्छी तरह समझ गया था कि उसकी पत्नी ने कॉल क्यों कट कर दी थी।
ये सोच कर उसे बुरा लगा कि वो अपनी जवान बीवी को वो सुख दे पाने में कितना बेबस है जिस सुख को पाने के लिए हर जवान और शादी शुदा औरत हसरत किए रहती है।
माना कि प्रिया उसको कभी इस मामले में दोष नहीं देती थी अथवा उससे कोई शिकायत नहीं करती थी लेकिन बावजूद इसके उसका तो फर्ज़ था कि उसे अपनी बीवी की खुशियों का और उसकी ज़रूरतों का ख़याल रहे।
अपनी बेबसी और अपनी लाचारी पर इस समय उसे भारी अफ़सोस हुआ और ये सोच कर दुख भी हुआ कि काश! अपनी बीवी की तरह वो भी थोड़ा जवान होता।
पहली बार उसे एहसास हुआ कि अपने से इतनी कम उमर की लड़की से शादी कर के उसने एक बड़ी भूल तो की ही थी किंतु इसके साथ ही उसने प्रिया का जीवन भी बर्बाद कर दिया था।
अजीब इत्तेफ़ाक था।
देर रात तक ना अशोक को इन सब ख़यालों के चलते नींद आई और ना ही प्रिया को।
जाने कब दोनों को नींद ने अपनी आगोश में लिया जिसका उन्हें पता ही नहीं चला।
To be continued...
Bahut hi shandar update he TheBlackBlood Shubham BhaiUpdate ~ 14
अरमान आज कल दिन में टैक्सी चला रहा था। हालाकि उसका कोई नियम नहीं था। टैक्सी दिन में चलाना है या रात में ये उसके मूड पर निर्भर था। कभी कभी तो वो दो दो तीन तीन दिनों तक घर में ही पड़ा रहता था। जब टैक्सी मालिक किसी को उसके पास भेजता तब जा कर वो सोचता कि चलो पेट का खर्चा निकालने के लिए कुछ काम कर लिया जाए।
बहरहाल, आज सुबह जब वो सो कर उठा तो सुबह से ही उसका कहीं जाने का मूड नहीं था। एक बार उसने सोचा भी कि अकेला घर में वो कब तक खाली पड़ा रहेगा लेकिन फिर अगले ही पल उसका मूड बदल गया।
उसने निश्चय कर लिया कि आज कहीं नहीं जाएगा और फिर से वो अस्त व्यस्त से नज़र आ रहे पुराने से बेड पर सो गया।
यही उसका रवैया था और यही उसका रूटीन था।
उसे अपनी शख्सियत का लेश मात्र भी ख़याल नहीं था और ना ही कभी वो ये सोचता था कि ऐसा कब तक चलेगा?
पिछले साढ़े सात सालों में उसके अंदर सिर्फ एक ही बदलाव दिख रहा था और वो ये था कि प्रिया के प्रति उसके ख़यालात कुछ बदल से गए थे।
पहले जहां वो सिर्फ प्रिया की यादों के सहारे खुद को बहुत ही मामूली सा बनाए किसी तरह जी रहा था वहीं अब उसके अंदर एक अजीब सी ज़िद पैदा हो गई थी।
पहले उसने प्रिया को हासिल करने का कभी सोचा तक नहीं था लेकिन डेढ़ महीना पहले जब उसने इतने सालों बाद प्रिया को किसी जिन्न की तरह अचानक से अपने सामने प्रगट हो गया देखा और जब प्रिया ने अपनी बातों से उसके ज़ख्मों को कुरेद सा दिया तो जाने क्यों प्रिया के प्रति उसके जज़्बात बदल गए।
उसके अंदर एक ज़िद बैठ गई कि अब वो प्रिया को हर कीमत पर हासिल कर के रहेगा।
इतना ही नहीं उसे इस बात का एहसास भी कराएगा कि किसी के द्वारा ठुकरा दिए जाने पर एक इंसान कैसे अकेला घुट घुट के जीता है?
उस वक्त दिन के क़रीब ग्यारह बजे थे जब अचानक ही उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके घर का दरवाज़ा खटखटाया है।
वो नींद में था इस लिए थोड़ा हिला तो ज़रूर लेकिन उठा नहीं।
कुछ पलों बाद दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ फिर से उसे अपने कानों में सुनाई दी।
इस बार उसकी चेतना मानों अज्ञात लोक से वापस आई और उसकी आंख खुल गई।
तभी दरवाज़ा फिर से खटखटाया गया।
अब उसे स्पष्ट समझ आ गया कि बाहर कोई आया है।
अतः बेमन से वो बेड से नीचे उतरा।
जिस्म पर सिर्फ एक कच्छा था।
उसने आनन फानन में बेड के नीचे पड़ी एक टी शर्ट को पहना और नीचे लूंगी लपेट कर बाहर की तरफ बढ़ चला।
अभी वो दरवाज़े के पास पहुंचा ही था कि दरवाज़ा फिर से खटखटाया गया।
अब तक वो पूरी तरह नींद की खुमारी से बाहर आ चुका था इस लिए उसे ये समझते देर न लगी कि दरवाज़ा कौन खटखटा रहा है।
उसके अनुसार ऐसा एक ही व्यक्ति था जो टैक्सी मालिक द्वारा काम पर जाने के लिए उसे बुलाने भेजा जाता था।
अरमान ने थोड़ा खिन्न भाव से दरवाज़ा खोला और इससे पहले कि खुन्नस में उसके मुख से कोई अपशब्द निकलता उसकी नज़र बाहर खड़ी प्रिया और साक्षी पर पड़ी।
उन दोनों को देखते ही उसने फ़ौरन अपने होठ भींच लिए।
उधर उसकी अस्त व्यस्त हालत देख साक्षी पर तो ज़्यादा कोई फ़र्क नहीं पड़ा लेकिन प्रिया हैरानी से उसे देखने लगी।
एक तो अभी वो नींद से जागा था इस लिए उसका अस्त व्यस्त रहना स्वाभाविक ही था किंतु वो थोड़ा अजीब दिखता भी था।
बिल्कुल फ़क़ीरों जैसा।
चेहरे पर बढ़ी हुई बड़ी बड़ी दाढ़ी मूंछें।
सिर पर लम्बे किन्तु उलझे हुए बाल।
विशाल और साक्षी लाखों बार उससे कह चुके थे कि थोड़ा तो वो अपना ख़याल रखा करे लेकिन उस पर उनकी बातों का कोई असर ही नहीं होता था।
उसके बारे में कौन क्या सोचता है इस बात से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था।
"तुम हमेशा ऐसी हालत में ही क्यों दिखते हो हमें?" प्रिया तो उसे देख हैरान थी इस लिए साक्षी ने ही कमान सम्हालते हुए उससे कहा──"कॉलेज के दिनों में कितने हैंडसम दिखते थे तुम और आज देखो, कितनी अजीब सी हालत बना ली है तुमने।"
"जब हैंडसम दिखता था तब कौन सा किसी ने अपना लिया था मुझे?" अरमान ने प्रिया पर एक नज़र डालने के बाद फीकी सी मुस्कान सजा कर कहा──"टूट कर जिसकी इबादत की उसने भी मेरे हैंडसम होने का कोई मान नहीं रखा।"
अरमान की बातें यकीनन प्रिया से ही संबंधित थीं।
साक्षी अच्छी तरह जानती थी ये बात।
उसने कुछ कहा नहीं बस कनखियों से प्रिया की तरफ देखा।
प्रिया के चेहरे पर बेहद ही संजीदा भाव नुमायां हो उठे।
चेहरे पर थोड़ी पीड़ा और थोड़े पश्चाताप के भी भाव नज़र आए।
अरमान की बात सुनते ही उसकी नज़रें झुक गईं।
"ख़ैर, आज सुबह सुबह दिन के समय मेरे घर के बाहर दो दो खूबसूरत चांद कैसे प्रगट हो गए?" अरमान ने विषय को बदल कर साक्षी से पूछा।
"तुमने मुझे भी खूबसूरत चांद कहा?" साक्षी ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा──"ओह! थैंक यू सो मच अरमान लेकिन अफ़सोस मैं किसी और की अमानत हूं।"
"तुम अच्छी तरह जानती हो कि इस दुनिया में मुझे सिर्फ एक ही शख़्स की आरज़ू है।" अरमान ने कहा──"उसके बदले ऊपर वाला तीनों लोकों का साम्राज्य भी मुझे देने आए तो मैं उस साम्राज्य को ठोकर मार दूंगा।"
"काश! इतनी शिद्दत से कोई मुझसे भी मोहब्बत करता।" साक्षी ने मुस्कुराते हुए जैसे आह भरी। फिर उसने प्रिया से मुखातिब हो कर कहा──"अरमान अगर इतनी मोहब्बत मुझसे करता तो क़सम से कहती हूं इसी वक्त अपने निठल्ले हसबैंड को तलाक़ दे कर अरमान से शादी कर लेती और एक तू है जो ऐसे इंसान से भाग रही है जो तुझे इतना प्यार करता है। हे भगवान! आख़िर ये किस मिट्टी की बनी हुई है?"
"तू न ज़्यादा बकवास न कर।" प्रिया ने धीमे से उसे डांटा──"तू अच्छी तरह जानती है कि मैं अपने मन में ऐसा करने का सोच भी नहीं सकती।"
"हां तू तो इस कलियुग की सबसे बड़ी पतिव्रता नारी है।" साक्षी ने बुरा सा मुंह बनाया──"अब ये बता कि यहीं पर खड़े खड़े तू अरमान को शुक्रिया कहेगी या घर के अंदर जा कर उसे बोलेगी?"
"तुम दोनों क्या खुसुर फुसुर कर रही हो?" अरमान ने दोनों को बारी बारी से देखते हुए पूछा──"अगर मुझसे कोई काम है तो बोलो वरना बेकार में मेरा समय बर्बाद मत करो। मुझे अभी सोने का सबसे बड़ा काम करना है।"
"अरे! हां वो बात ये है अरमान कि प्रिया तुमसे कुछ कहना चाहती है।" साक्षी ने झट से ये कहा तो प्रिया एकदम से चौंक कर उसकी तरफ देखने लगी।
"अच्छा, ऐसी बात है क्या?" अरमान ने प्रिया की तरफ देखा──"फिर तो मैं सबसे पहले अपने दोनों कानों को साफ कर लेता हूं। वो क्या है ना कि काफी लंबे समय से मैंने इनकी सफाई नहीं की है। प्रिया मुझसे जो कहना चाहती है वो अगर मेरे कान ठीक से सुन नहीं पाएंगे तो इससे प्रिया के द्वारा कहे गए शब्दों की तौहीन हो जाएगी। रुको, मैं अभी अपने कानों को साफ कर के आता हूं।"
अरमान जब पलट कर सचमुच अंदर की तरफ जाने लगा तो साक्षी के साथ साथ प्रिया भी बुरी तरह चौंक पड़ी।
प्रिया तो उसकी बातें सुन कर ही संजीदा हो गई थी।
अरमान के सच्चे प्रेम को उसने अच्छी तरह महसूस किया था।
अरमान का सामना करने में अब उसे ये सोच कर डर लगने लगा था कि अगर वो जज़्बातों में बह गई तो गज़ब हो जाएगा।
अरमान की हालत देख कर ही उसे ये एहसास सताने लगता था कि उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वही है।
"अरे! रुको अरमान रुको।" प्रिया की हालत को समझते हुए साक्षी ने ही कमान सम्हाली और फ़ौरन ही अरमान को रोका──"तुम भी ना, ग़ज़ब ही इंसान हो।"
अरमान वापस पलटा।
उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए थे जैसे उसे अपने कान साफ करने जाने से रोक कर साक्षी ने उस पर बहुत बड़ा अत्याचार कर दिया है।
साक्षी ये तो जानती थी कि अरमान ये सब अपने प्लान के तहत ही कर रहा है लेकिन वो ये भी जानती थी कि प्रिया के प्रति उसकी चाहत बिल्कुल भी झूठी नहीं है।
"अब यूं मुंह बना के मत खड़े रहो तुम।" फिर उसने अरमान को घूरते हुए कहा──"चलो अंदर। प्रिया तुमसे यहां थोड़े ना अपनी बात कहेगी।"
"ओह! ऐसा है क्या?" अरमान ने मूर्खों की तरह अपनी पलकें झपकाई──"ठीक है फिर, चलो आओ अंदर।"
साक्षी और प्रिया आगे पीछे अंदर दाख़िल हो गईं तो अरमान ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
"तुम्हारा सच में कुछ नहीं हो सकता।" अंदर की हालत देखते ही साक्षी ने अरमान से कहा──"पता नहीं कैसे इंसान हो तुम जो यहां ऐसी ख़राब हालत में रह लेते हो।"
"जिसे किसी बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता उसके लिए रहने वाली जगह कैसी है ये मायने नहीं रखता।" अरमान ने कहा──"मैं तो इस दीन दुनिया से विरक्त एक फ़कीर आदमी हूं। मुझे किसी भी चीज़ की चाहत नहीं है। काश! ये चाहत भी मिट जाती जो मेरे दिल में प्रिया को बेपनाह मोहब्बत करने के रूप में मौजूद है।"
उसकी ये बात सुन कर प्रिया एक बार फिर से अंदर तक कांप गई।
उसके दिल में मचलते जज़्बात शांत होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
वो अपने आपको सम्हाले रखने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी।
उसका जी चाह रहा था कि कितना जल्दी वो अरमान से दूर चली जाए।
उसे महसूस होने लगा था कि अगर थोड़ी देर और उसने अरमान की ये अजीब और दर्द भरी बातें सुनी तो वो टूट जाएगी।
इतना ही नहीं उसका दिल कहीं उसे अरमान के सीने से लिपट जाने के लिए पूरी ताक़त से उसकी तरफ ढकेल ना दे।
उसकी आंखों में बार बार आंसू तैरने लगते थे।
"अच्छा अब ये बातें छोड़ो।" साक्षी को भी बड़ा अजीब महसूस होने लगा था इस लिए उसने विषय बदलने की गरज से पूछा──"और ये बताओ कि फ्रेश हुए या सचमुच हमारे आने पर ही सो कर जागे हो?"
"हां, जागा तो अभी ही हूं।" अरमान ने सामान्य भाव से कहा──"असल में नींद तो सुबह एक बार खुली थी लेकिन आज कहीं जाने का मन नहीं किया तो फिर से सो गया।"
"ओह!" साक्षी ने कहा──"वैसे आते समय मैं प्रिया से कह भी रही थी कि अगर तुम दिन में टैक्सी चलाने जाते होगे तो शायद ही घर में तुमसे मुलाक़ात हो पाएगी। फिर ये सोच कर चले आए कि एक बार घर जा कर देख ही लेते हैं। शुक्र है तुम घर पर ही थे। ख़ैर, जाओ पहले तुम फ्रेश हो लो। तब तक हम दोनों बैठे हैं और हां आज हमारे लिए कुछ लाने की जहमत मत उठाना।"
अरमान ने सिर हिलाया और घर के पीछे की तरफ खुलने वाले दरवाज़े को खोल बाहर निकल गया।
असल में अरमान का घर बहुत पुराना था।
आज के समय के अनुसार घर के अंदर टॉयलेट अथवा बाथरूम वाली सुविधा नहीं थी बल्कि घर के पीछे जो थोड़ी सी जगह थी वहीं किनारे पर टॉयलेट बना हुआ था।
नहाने के लिए उसी से जुड़ा हुआ एक बाथरूम था।
पानी के लिए एक हैंडपंप था जो पुराने समय का था लेकिन उसमें से पानी आज भी पर्याप्त मात्रा में निकलता था।
बहरहाल, अरमान क़रीब आधे घंटे में फ्रेश हो कर तथा नहा धो कर आया।
नहा कर आने की वजह से वो ऊपर से बेलिबास ही था।
प्रिया और साक्षी के सामने ऐसे रूप में आने पर भी उसे शर्म नहीं आई।
वैसे शर्म लगने जैसी बात उस पर लागू भी नहीं होती थी क्योंकि उसे किसी बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता था।
साक्षी ने तो उसे इस रूप में पहले भी देखा था जब उसका हसबैंड विशाल उसे जबरन अपने घर ले जाता और उसे फ्रेश होने को कहता।
मगर प्रिया उसे इस रूप में पहली बार देख रही थी।
साढ़े सात साल पहले भी उसने अरमान को इस तरह ऊपर से बेलिबास नहीं देखा था।
प्रिया झिझकते हुए बार बार उसे चोर नज़रों से देखने लगती।
अरमान बाहर से भले ही फ़क़ीरों की तरह दिखता था लेकिन कुदरती तौर पर वो आज भी अंदर से अच्छा खासा दिखता था।
चौड़ी छाती पर घने घुंघराले बाल जो उसके पेट और नाभी के आस पास वाले क्षेत्र को घेरे हुए नीचे तरफ फैलते चले गए थे।
मजबूत कंधे और बलिष्ठ भुजाएं उसके मर्द होने का सबूत दे रहीं थी।
गले से ऊपर की तरफ चेहरे में बढ़ी हुई दाढ़ी मूंछें और सिर पर उलझे हुए बाल।
प्रिया बार बार चोर नज़रों से उसके जिस्म का अवलोकन करने लगती थी।
एकाएक वो चौंक पड़ी।
उसकी चोर नजरें अरमान के बाएं सीने पर एकदम दिल के पास जम सी गईं।
घुंघराले बालों की वजह से शायद पहले उसे दिखा नहीं था या फिर उसने ध्यान से देखा नहीं था लेकिन जब दुबारा उसकी नज़रें उसके सीने की तरफ गईं तो सहसा उसे ऐसा लगा जैसे उसके दिल वाले हिस्से पर कुछ लिखा हुआ है।
प्रिया ने अपनी झिझक को परे रख कर इस बार बड़े ध्यान से देखा।
अगले ही पल वो ये देख कर स्तब्ध सी रह गई कि अरमान ने अपने बाएं सीने पर उसका नाम गुदवा रखा है।
अंग्रेजी के अक्षरों में गुदा हुआ था──Priya।
ये देख प्रिया के अंदर एकदम से भूचाल सा आ गया।
एक बार पुनः वो ये सोच कर आहत सी हो गई कि उसके जैसी बेवफ़ा लड़की का नाम अरमान ने अपने सीने पर लिख रखा है।
ये उसके प्रेम का सबूत भी था और उसकी चाहत की पराकाष्ठा भी।
प्रिया को लगा उसे चक्कर आ जाएगा।
बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला।
उसके दिल की धड़कनें किसी हथौड़े की मानिंद उसकी कनपटियों पर बरसने लगीं थी।
उसका हृदय हाहाकार सा कर उठा था।
सहसा उसे अपने अंदर से एक आवाज़ सुनाई दी──"ऐसे इंसान को ठुकराने के बाद आख़िर ऐसी कौन सी खुशी और ऐसा कौन सा ऐशो आराम हासिल किया है तूने प्रिया?"
"अरे! तुझे क्या हुआ?" साक्षी की नज़र अचानक प्रिया पर पड़ी तो वो उसकी दशा देख चौंक पड़ी थी।
"क...कुछ नहीं" प्रिया उसके यूं अचानक पूछ लेने पर बुरी तरह बौखला गई। बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और फिर कहा──"म...मैं ठीक हूं।"
साक्षी ने उसे बड़े ध्यान से देखा।
प्रिया उसके यूं देखने पर बेचैन सी हो गई।
उसके चेहरे पर परेशानी और घबराहट के चलते पसीना उभर आया।
वो साक्षी से नज़रें न मिला सकी।
इधर साक्षी उसकी हालत से ज़रा भी बेख़बर नहीं थी।
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि इस वक्त प्रिया किस हालत से गुज़र रही है।
दूसरी तरफ अरमान कुछ ही दूरी पर कपड़े पहन रहा था।
उसने नहाने के बाद अपने बदन पर ना तो तेल वगैरह लगाया था और ना ही बालों पर कंघी की थी।
अपने जिस्म पर उन्हीं कपड़ों को पहन लिया जो उसने नहाने से पहले पहन रखे थे।
साक्षी उसकी इस आदत से परिचित भी थी और नाखुश भी लेकिन प्रिया को ये बहुत अजीब लगा और पीड़ा देने वाला भी।
उसके लिए सबसे बड़े दुख की बात ये थी कि वो खुद अरमान के लिए कुछ कर नहीं सकती थी।
हालाकि उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने के लिए उसका दिल उसे ज़ोर दिए जा रहा था मगर वो अपने जज़्बातों को दबाए हुए थी।
"लो साक्षी।" अरमान दोनों के सामने आ कर बोला──"तुम्हारे कहे अनुसार मैं फ्रेश हो गया। अब बताओ, तुम्हारी दोस्त क्या कहना चाहती है मुझसे?"
अरमान की ये बात सुन साक्षी के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई।
उधर प्रिया की धड़कनें बढ़ गईं।
उसे अरमान को शुक्रिया कहना मानों दुनिया का सबसे मुश्किल काम महसूस होने लगा।
शर्म, झिझक, परेशानी, घबराहट और बेचैनी ने जैसे उसे चारो तरफ से घेर लिया।
अरमान के सामने उसकी ऐसी हालत पहले कभी न हुई थी।
उल्टा वो ही अरमान पर हावी रहती थी और अरमान उससे अपनी बात कहने के लिए झिझकता था मगर आज वक्त और हालात दोनों ही अलग और विपरीत थे।
"बोलो प्रिया।" उसे असमंजस में पड़ा देख साक्षी ने कहा──"तुम अरमान से जो कहने यहां आई हो कह दो। फिर हमें चलना भी है। अरमान को भी काम पर जाना होगा।"
साक्षी की बात सुन कर प्रिया बेहद बेचैन नज़र आने लगी।
झिझक और घबराहट में इज़ाफा हो गया।
बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और पहले साक्षी की तरफ देखा फिर चेहरा ऊपर कर के अरमान को।
अरमान अपलक उसी को देखे जा रहा था।
उसकी अपनी धड़कनें भी ये सोच कर बढ़ चलीं थी कि जाने क्या कहने वाली है प्रिया उससे?
सहसा वो मन ही मन ये दुआ करने लगा कि प्रिया उससे वही कहे जो वो चाहता है।
"क्या हुआ कहो ना।" प्रिया को बेचैन भाव से अपलक अरमान को देखते देख साक्षी ने जैसे उस पर ज़ोर डाला।
"अ...अरमान म...मैं तुमसे।" प्रिया ने अपनी धाड़ धाड़ बजती धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए किंतु अटकते हुए स्वर में कहना शुरू किया। उधर अरमान की धड़कनें उसकी आवाज़ सुन मानों थम सी गईं। तभी प्रिया ने हिम्मत जुटाते हुए जैसे अपनी बात पूरी की──"म...मैं तुमसे ये कहना चाहती हूं कि तुमने मेरे प...पति की जान बचा कर मुझ पर जो उ...उपकार किया है उसके लिए तुम्हारा ब...बहुत बहुत श...शुक्रिया। म...मैं जीवन भर तुम्हारा ये उपकार नहीं भू...भूलूंगी।"
इतना कह कर प्रिया ने अपनी आंखें बंद कर ली और राहत की लंबी लंबी सांसें लेने लगी।
उसे ऐसा लगा जैसे इतना कह कर उसने बहुत बड़ी जंग फतह कर ली है।
उधर अरमान ने उसकी ये बात सुनते ही एक गहरी सांस ली।
पलक झपकते ही उसके अरमानों पर जैसे पानी फिर गया था।
कहां अचानक से इतने सालों बाद उसका मन मयूर एक खुशी का एहसास करने वाला था किन्तु अगले ही पल उसे मिलने वाली खुशी पर मानों गृहण लग गया था।
वो निराश भाव से अपलक उस प्रिया को देखे जा रहा था जो अपनी आंखें बंद किए अभी भी राहत की सांसें लेने में खोई थी।
अरमान ने पुनः एक गहरी सांस ली।
जाने क्या सोच कर उसके होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई।
इधर साक्षी की नज़रें अरमान पर ही टिकी हुईं थी।
वो भी समझ रही थी कि अरमान ने प्रिया से क्या सुनने की उम्मीद कर रखी थी।
उसे अरमान के लिए इस वक्त बहुत बुरा महसूस हो रहा था लेकिन कर भी क्या सकती थी वो।
"कमाल है।"
तभी अरमान की आवाज़ से उसके साथ साथ प्रिया का भी ध्यान उसकी तरफ गया तो उसने आंखें खोल कर तथा धड़कते दिल से अरमान की तरफ देखा।
उधर अरमान ने आगे कहा──"तो तुम इसे मेरा उपकार समझती हो? अरे! मुझे तो पता भी नहीं था कि जो आदमी एक्सीडेंट होने की वजह से लहू लुहान था और मौत के मुंह में फंसा हुआ था वो तुम्हारा पति है। मैंने तो इंसानियत के तौर पर उसकी जान बचाने के लिए बस अपना कर्म किया था। वैसे उस समय अगर मुझे ये पता भी होता तब भी मैं तुम्हारे पति की जान बचाने के लिए यही करता। मेरे अंदर लेश मात्र भी ये ख़याल न आता कि जो व्यक्ति मेरी मोहब्बत का पति है उसे बचाने का कोई प्रयास ना करूं अथवा अगर वो बच जाने वाला हो तो उसे जान बूझ के मार दूं। मेरा दिल तुम्हारी तरह पत्थर का नहीं है जो किसी पर दया भी न कर सके।"
उसकी बात सुन कर प्रिया की आंखें ये सोच कर भर आईं कि उसने उसी के सामने ऐसा कह कर मानो उसकी हक़ीक़त बता दी है।
"आश्चर्य की बात है।" उधर अरमान उसे अपलक देखते हुए पुनः बोला──"महज शुक्रिया कहने के लिए तुम इतना झिझक रही थी? इसका तो यही मतलब हुआ कि तुम आज भी मुझे कोई महत्व नहीं देती वरना तुम्हारे लिए जितना बड़ा काम मैंने किया है तुम्हारी जगह कोई और होता तो उसके लिए खुशी खुशी मेरे क़दमों में लोट कर लाखों बार मुझे शुक्रिया कहता। ख़ैर कोई बात नहीं। वैसे भी मुझे तुम्हारे शुक्रिया की ज़रूरत नहीं है और ना ही मुझे किसी के द्वारा शुक्रिया कहलवाने की हसरत है।"
"ऐसा मत कहो प्लीज़।" प्रिया का सब्र जैसे जवाब दे गया। उसकी रुलाई फूट गई। बुरी तरह सिसकते हुए बोली──"और कितना मेरी ग़लती के लिए मुझे जलील करोगे? मुझे एहसास हो चुका है कि मैंने तुम्हारे साथ बिल्कुल भी अच्छा नहीं किया था। आज तुम्हारी जो हालत है उसकी ज़िम्मेदार मैं ही हूं। मेरा यकीन करो अरमान, मैं अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हूं। मेरे बस में ही नहीं है वरना तुम्हारे लिए बहुत कुछ कर जाती। प्लीज़ माफ़ कर दो मुझे और...और मेरी वजह से खुद को यूं बरबाद मत करो। किसी अच्छी लड़की से शादी कर के अपना घर बसा लो।"
"इस दुनिया में ऐसी कोई दूसरी लड़की जन्मी ही नहीं है डियर।" अरमान ने फीकी मुस्कान के साथ कहा──"जिसे मैं मोहब्बत की नज़र से देख सकूं और जिसके साथ अपना घर बसाने का सोचूं। मेरा घर बसेगा तो सिर्फ तुम्हारे साथ वरना मरते दम तक यूं ही तुम्हारी यादों के सहारे जीता रहूंगा।"
"नहीं...नहीं प्लीज़।" प्रिया आहत भाव से मानो चीख पड़ी──"ऐसी ज़िद मत करो जो कभी पूरी ही नहीं हो सकती। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं किसी और की पत्नी हूं। मैं अपने पति को छोड़ कर तुम्हारे पास वापस नहीं आ सकती। और....और वैसे भी तुम एक ऐसी औरत के साथ घर बसाने की ज़िद क्यों किए बैठे हो जिसने तुम्हें और तुम्हारी सच्ची मोहब्बत को ठोकर मार दी हो? तुम्हें तो ऐसी औरत से सिर्फ और सिर्फ नफ़रत करनी चाहिए।"
"सच्ची मोहब्बत करने वाला दिल चाह कर भी अपनी दिलरुबा से नफ़रत नहीं कर सकता प्रिया।" अरमान ने अधीरता से कहा──"वो तो बस मोहब्बत ही करता है। हर हाल में, हर कीमत पर।"
प्रिया की आंखें पुनः छलक पड़ीं।
इस वक्त उसका चेहरा अथाह पीड़ा से भरा हुआ था।
उसके आंसू गिर कर फर्श में फ़ना हो रहे थे।
इधर साक्षी दोनों के मध्य चल रही बातों को मूक दर्शक की तरह देख और सुन रही थी।
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि दोनों में से किसे क्या बोले?
"मत करो ना ऐसा।" प्रिया आहत सी हो कर बोल पड़ी──"क्यों मुझे धर्म संकट में डालने पर तुले हुए हो? क्यों मुझे इतना सता रहे हो? क्या यही है तुम्हारी मोहब्बत? क्या मोहब्बत करने वाले ऐसे ही अपने साथी को सताते हैं और दुखी करते हैं?"
"लो, कर लो बात।" अरमान अजीब भाव से हंस पड़ा, फिर बोला──"अब तुम मुझे बताओगी कि कैसे होते हैं मोहब्बत करने वाले? ये तो वही बात हो गई कि नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने चली। छोड़ो प्रिया, मोहब्बत जैसे लफ़्ज़ तुम्हारी ज़ुबान में अच्छे नहीं लगते। वैसे भी, तुम पर तो सिर्फ एक ही बात शूट करती है और वो है अपनी ख़्वाहिश को पूरा करने के लिए अपने ही चाहने वाले को बेदर्दी से ठुकरा कर चले जाना।"
"अरमान प्लीज़।" सहसा साक्षी ने बीच में हस्ताक्षेप किया।
उसे ये डर सताने लगा था कि अरमान की कड़वी बातें सुन कर प्रिया कहीं इस क़दर न आहत हो जाए कि वो कोई ग़लत क़दम उठा ले। इस लिए अरमान से बोली──"ये तुम ठीक नहीं कर रहे हो। माना कि प्रिया ने सिर्फ अपने बारे में सोचा था और उसने तुम्हारे प्रेम को ठुकरा दिया था लेकिन उसके लिए तुम बार बार उसे उसकी ग़लती का एहसास करा कर यूं दुखी नहीं कर सकते।"
"ओह! सॉरी।" अरमान तपाक से बोल पड़ा──"आई एम वेरी वेरी सॉरी। तुमने बिल्कुल सही कहा। मुझे प्रिया को यूं दुखी करने का कोई अधिकार नहीं है।" कहने के साथ ही वो एकदम प्रिया की तरफ मुड़ा, फिर उससे बोला──"मैं तुमसे हाथ जोड़ कर अपनी इस ग़लती के लिए माफ़ी मांगता हूं प्रिया। मुझे आभास ही नहीं हो पाया था कि जज़्बातों में मैं किस क़दर बहता चला गया हूं। वो क्या है ना वर्षों से दिल में जाने कैसा कैसा गुबार दबा हुआ पड़ा था जो बेध्यानी में बाहर आ गया। प्लीज, इसके लिए माफ़ कर दो मुझे।"
"बस करो।" प्रिया की एक बार फिर रुलाई फूट गई──"मुझमें अब और कुछ भी सुनने की हिम्मत नहीं है। मेरी तुमसे एक ही विनती है कि अपने आपको यूं बर्बाद मत करो। मेरा ख़याल अपने ज़हन से निकाल कर किसी के साथ अपना घर बसा लो।"
"यार साक्षी।" अरमान साक्षी से मुखातिब हुआ──"अपनी इस दोस्त को भी तो समझाओ कि एक ही बात बार बार न बोले। मैं बता चुका हूं कि इस दुनिया में ऐसी कोई दूसरी लड़की जन्मी ही नहीं है जिसके साथ मुझे प्रेम हो सके और मैं उसके साथ अपना घर बसाने का सोचूं। मेरा घर सिर्फ और सिर्फ इसके साथ ही बसेगा वरना नहीं। अगर तुम्हारी दोस्त को मेरा घर बसाने की इतनी ही चिंता है तो कहो इससे कि अपने हसबैंड को तलाक़ दे कर मुझसे शादी करे।"
"मैं किसी को क्या बोलूं अरमान?" साक्षी जैसे खुद ही धर्म संकट में फंस गई थी──"तुम ही उसकी विवशता को समझो। एक औरत के लिए इतना आसान नहीं होता बिना किसी वजह के अपने पति को तलाक़ दे कर किसी और से शादी कर लेना।"
"तो फिर इससे कहो कि जैसे अब तक मैं इसकी यादों के सहारे जीता आया हूं।" अरमान ने कहा──"उसी तरह बाकी का जीवन भी गुज़ार लूंगा। मेरा दिल उसी को अपना बनाएगा जिसे वो प्यार करता है। बाकी किसी की चाहत नहीं है उसे।"
To be continued...
Update ~ 15
प्रिया का मन बहुत आहत था।
उसके दिल का कोना कोना दुख और तकलीफ़ से सराबोर था।
समूचा बदन ऐसे टूट रहा था जैसे उसके जिस्म की एक एक हड्डी टूट गई हों।
उसका कुछ भी करने का दिल नहीं कर रहा था।
बस यही जी चाहता था कि किसी हमदर्द के कंधे पर सिर रख के जी भर के रोए मगर हाय री किस्मत, ऐसा कोई हमदर्द उसके क़रीब क्या बल्कि उसके आस पास भी कहीं मौजूद नहीं था।
उसका पति अशोक तो था लेकिन प्रिया को भली भांति एहसास था कि जिन बातों के चलते उसे ये दुख तकलीफ़ थी उन बातों को जानने के बाद उसका पति उसकी तक़लीफें दूर करने की बजाय उसे और भी ज़्यादा तक़लीफ में डाल देगा।
अरमान के यहां से आने के बाद से ही उसकी हालत ख़राब थी।
अब तक वो किसी तरह खुद को सम्हाले रखने में कामयाब थी लेकिन अब अपनी हालत को सम्हालने में पूरी तरह नाकाम थी।
उसे डर सताने लगा था कि उसकी ये हालत देख कर उसका पति अथवा उसकी सौतेली बेटी उससे ऐसे सवाल ना करने लग जाएं जिनका जवाब देना उसके लिए भारी पड़ जाए।
सारा दिन वो अपने पति और अपनी सौतेली बेटी से खुद को छुपाती रही।
अगर किसी ज़रूरी काम के चलते दोनों से उसका सामना होता तो वो बड़ी चतुराई से अपने चेहरे के भावों को छुपा लेती।
हालाकि उसकी इस कामयाबी में उसके पति अशोक और उसकी बेटी अंकिता के उस पर ग़ौर ना करने का भी हाथ था।
शाम होते होते उसकी हालत ऐसी हो गई थी जैसे वो वर्षों की बीमार हो।
किस्मत अच्छी थी कि शाम को उसकी मेड मीरा आ गई थी जिसके चलते रात का डिनर तैयार करने से वो बच गई थी।
मीरा के सामने भी वो ज़्यादा नहीं गई।
वो जानती थी कि मीरा कुछ ही पलों में उसकी हालत को ताड़ जाएगी और उससे उसकी ऐसी हालत के बारे में पूछने लगेगी।
ये भी संभव था कि भूलवश वो उसकी हालत के बारे में उसके पति को जा कर बता दे जिससे और भी मुसीबत हो जाए।
बहरहाल, मीरा के जाने के बाद उसने खुद को सम्हाल कर किसी तरह दोनों बाप बेटी को डिनर कराया और खुद भी थोड़ा बहुत खाया।
उसके बाद जूठे बर्तन समेट कर किचेन में रखे।
इस थोड़े से काम से फारिग़ होने के बाद वो अपने कमरे में जा कर बेड पर अशोक के बगल से थोड़ी दूरी बना कर लेट गई।
अशोक अब पहले से थोड़ा बेहतर था लेकिन सिर और माथे पर अभी भी पट्टियां लगी हुईं थी और दवा चल रही थी।
बेड पर एक तरफ लेटी हुई प्रिया ये सोच कर घबरा रही थी कि उसका पति कहीं उससे कोई ऐसी बात न करने लगे जिससे उसे भी उसकी तरफ मुड़ कर बातें करना पड़े।
हालाकि जिस बात का उसे डर था वही हुआ।
"क्या बात है बेबी।" अशोक ने थोड़ा सा उसकी तरफ खिसक कर उससे पूछा──"आज मुझसे बिना कुछ बोले ही चुपचाप लेट गई तुम? अरे! भई तुम्हें तो पता ही है कि सोने से पहले मुझे तुम्हारे शहद जैसे होठों की एक पप्पी चाहिए होती है।"
"प्लीज़ अशोक।" प्रिया ने बेमन से कहा──"आज नहीं, मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। प्लीज़ इसके लिए बुरा मत मानिएगा।"
"अरे! बुरा क्यों मानूंगा बेबी?" अशोक ने बड़े स्नेह से कहा──"लेकिन अचानक तुम्हारी तबीयत को क्या हुआ? ज़रा देखूं तो, बुखार वगैरह तो नहीं है तुम्हें।"
कहने के साथ ही अशोक ने हाथ बढ़ा कर अपने विपरीत घूम कर लेटी हुई प्रिया का माथा छुआ।
उसके छूते ही प्रिया के बदन में झुरझुरी सी हुई।
उसकी धड़कनें तो पहले ही बढ़ चुकीं थी।
"हम्म्म, तुम्हारा माथा तो सच में हल्का गर्म है बेबी।" अशोक ने उसके माथे से अपना हाथ हटा कर कहा──"इससे पहले कि तुम्हें सच में ही बुखार आ जाए मैं अभी डॉक्टर शर्मा को फोन करता हूं। अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ है। मेरे आग्रह पर वो ज़रूर तुम्हारा चेकअप करने यहां चले आएंगे।"
"आप बेकार ही फ़िक्र कर रहे हैं।" प्रिया ने अपने पति को परेशान न करने के उद्देश्य से कहा──"मैं ठीक हूं, बस थोड़ा बदन दर्द कर रहा है। इसी वजह से अच्छा फील नहीं हो रहा है।"
"अरे! तो क्या ये कम चिंता की बात है?" अशोक ने झट से कहा──"समय रहते डॉक्टर शर्मा तुम्हारा चेकअप कर लेंगे तो ज़्यादा ठीक रहेगा। रुको, मैं अभी उन्हें फ़ोन करता हूं।"
प्रिया ने एक दो बार और मना किया लेकिन अशोक न माना।
प्रिया जानती थी कि अशोक उसके प्रति इस तरह की कोई लापरवाही नहीं कर सकता था।
वैसे भी वो उसे बहुत चाहता था जिसके चलते वो उसे किसी भी तरह की तकलीफ़ में नहीं देख सकता था।
ख़ैर, अशोक के फ़ोन करने के ठीक बीस मिनट बाद डॉक्टर शर्मा फ्लैट में आ धमका।
अशोक ने खुद जा कर दरवाज़ा खोला।
डॉक्टर शर्मा ने प्रिया का चेकअप किया।
उसने अशोक को बताया कि बदन में हल्का ताप है जोकि ज्वर के ही लक्षण हैं।
उसने दवा के रूप में कुछ टैबलेट्स अशोक को पकड़ाई और उसे बताया कि कौन सी दवा कब और कैसे खानी है।
तत्पश्चात वो अपना बैग ले कर चला गया।
"देखा, मैं कहता था न कि समय रहते डॉक्टर शर्मा के द्वारा तुम्हारा चेकअप करा लेना ठीक रहेगा?" डॉक्टर को दरवाज़े तक भेज कर वापस आने के बाद अशोक ने बेड पर प्रिया के बगल से लेटते हुए कहा──"उसने स्पष्ट बताया कि तुम्हें हल्का बुखार है और तुम मना कर रही थी उसको फ़ोन करने से।"
प्रिया अब क्या कहती?
अशोक के कहने पर उसे डॉक्टर शर्मा द्वारा दी गई दवा खानी पड़ी।
उसके बाद अशोक ने खुद ही उसे आराम करने को कहा और खुद भी दूसरी तरफ को मुंह कर के लेट गया।
प्रिया देर रात तक जागती रही।
उसे नींद ही नहीं आ रही थी।
दिलो दिमाग़ में अरमान और उसकी बातें चलती रहीं थी।
देर रात ही उसकी आंख लगी।
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सुबह हुई लेकिन थोड़ा असामान्य तरीके से।
प्रिया बेड पर रात में चद्दर ओढ़े लेटी थी लेकिन सुबह उसके ऊपर रजाई पड़ी हुई थी।
उसे तेज़ बुखार था।
बदन जूड़ी के मरीज़ की मानिंद थरथर कांप रहा था।
रजाई के अंदर ढंकी होने के बाद भी प्रिया बुरी तरह कांप रही थी।
उसकी ये हालत देख अशोक बहुत ज़्यादा चिंतित था।
उसने पहले ही डॉक्टर शर्मा को फोन कर दिया था।
अंकिता भी अपनी सौतेली मां की ये हालत देख कर घबराई हुई सी नज़र आ रही थी।
मीरा नाम की मेड भी प्रिया के लिए थोड़ा चिंतित थी।
वो घर के काम तो कर रही थी लेकिन उसका ध्यान प्रिया पर ही था।
उसे प्रिया से लगाव सा हो गया था।
आख़िर प्रिया को वो दीदी जो कहती थी।
डॉक्टर शर्मा थोड़ी ही देर में आ गया और फ़ौरन ही प्रिया का चेकअप किया।
उसने चिंता ज़ाहिर करते हुए अशोक से कहा कि प्रिया को फ़ौरन हॉस्पिटल में भर्ती करना होगा।
डॉक्टर शर्मा की ये बात सुन अशोक एकदम से चिंतित हो उठा।
अंकिता और भी ज़्यादा घबरा गई।
डॉक्टर शर्मा ने कहा कि वो अपनी कार से अपने क्लीनिक ही जा रहा था तो इस वक्त वो प्रिया को अपनी कार द्वारा हॉस्पिटल ले जा सकता है।
अशोक को इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं हुआ।
उसने फ़ौरन ही इसके लिए हां किया और प्रिया को हॉस्पिटल ले जाने के लिए मीरा को आवाज़ दी।
मीरा पलक झपकते ही हाज़िर हुई।
उसने अशोक और डॉक्टर की बातें सुन ली थीं इस लिए उसने फ़ौरन ही प्रिया को हॉस्पिटल ले जाने के लिए तैयार करना शुरू कर दिया।
इस बीच डॉक्टर शर्मा ने एक टैबलेट प्रिया को खिला दी थी।
कुछ ही समय में प्रिया पास के ही एक हॉस्पिटल में भर्ती हो गई।
उसके साथ अशोक तो नहीं जा सका था किंतु मीरा और अंकिता साथ थीं।
अशोक को इस बात का बेहद दुख हुआ कि वो प्रिया की इस हालत पर खुद उसके साथ नहीं जा सका था।
डॉक्टर ने उन्हें अभी ज़्यादा चलने फिरने से मना किया हुआ था।
फ्लैट में अशोक को जाने क्या सूझा कि उसने मोबाइल द्वारा अपनी पत्नी की दोस्त साक्षी को कॉल कर के बता दिया कि प्रिया की तबीयत बहुत ख़राब है और अभी थोड़ी देर पहले ही उसे हॉस्पिटल ले जाया गया है।
साक्षी को जब ये पता चला तो वो भी चिंता में पड़ गई।
उसने फ़ोन पर ही अशोक से पूछा कि प्रिया को किस हॉस्पिटल में ले जाया गया है?
अशोक ने उसे बताया।
साक्षी ने कहा कि वो चिंता न करें।
उसके रहते प्रिया को कुछ नहीं होगा।
अशोक को आश्वस्त करने के बाद साक्षी ने ही कॉल कट कर दी थी।
अशोक को थोड़ा राहत मिल गई थी।
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"मुझे जिस बात का डर सता रहा था आख़िर वही हुआ।" अपने फ्लैट पर कमरे में फटाफट तैयार हो रही साक्षी ने अपने पति विशाल से कहा──"प्रिया की तबीयत अचानक बहुत ख़राब हो गई है और उसे अभी थोड़ी देर पहले ही हॉस्पिटल ले जाया गया है। ये सब तुम्हारे दोस्त अरमान की वजह से हुआ है। क्या ज़रूरत थी उसे प्रिया को इतना ज़्यादा आहत कर देने की?"
"मैं अब क्या कहूं यार?" विशाल ने कहा──"वो किसी की सुनता कहां है? पहले थोड़ा बहुत सुन भी लेता था लेकिन आज कल भाई साहब अलग ही तरह की सनक में सवार हैं। ख़ैर, तुम जल्दी तैयार हो जाओ। मैं तुम्हें हॉस्पिटल के बाहर छोड़ कर ऑफिस चला जाऊंगा।"
"क्या तुम हॉस्पिटल के अंदर नहीं जाओगे?" साक्षी ने कहा──"तुम भी उसे एक नज़र अपनी आंखों से देख लेना।"
"क्या होगा मेरे देख लेने से?" विशाल ने कहा──"तुम रहोगी न वहां पर। मुझे फ़ोन पर बता देना उसकी कंडीशन के बारे में। अगर मामला ज़्यादा सीरियस हुआ तो फिर दूसरे हिसाब से देखेंगे।"
"अरमान मिले तो उसे भी बता देना।" साक्षी ने तनिक तीखे भाव से कहा──"उसे भी तो पता चले कि उसकी मेहरबानी का क्या असर हुआ है प्रिया पर।"
"अगर कहीं मिल जाएगा तो बता ही दूंगा।" विशाल ने कहा──"बाकी तुम्हें भी पता है कि उसे खोजना भूसे के ढेर में सुई खोजने जैसा है। एक छोटा सा कीपैड मोबाइल तक तो रखना पसंद नहीं है उसको जिससे फ़ौरन उससे बात कर ली जा सके। पता नहीं किस मिट्टी का बना है?"
थोड़ी ही देर में दोनों मियां बीवी फ्लैट से निकल कर नीचे आए और फिर कार में बैठ कर चल पड़े।
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अशोक खत्री बहुत ज़्यादा चिंतित था।
अपनी पत्नी प्रिया की अचानक इस तरह तबीयत बिगड़ जाने से वो ये सोच कर थोड़ा दुखी भी हो गया था कि ऐसे वक्त में वो अपनी पत्नी के साथ हॉस्पिटल नहीं जा सका था।
वो बार बार ऊपर वाले को याद कर के सब कुछ ठीक हो जाने की प्रार्थना कर रहा था।
इतना तो उसे भी पता था कि प्रिया को उसकी हालत की चिंता थी जिसके चलते वो थोड़ा बुझी बुझी सी थी लेकिन अब जबकि वो पहले से बेहतर हो चला था तो अब भला क्यों प्रिया उसके लिए इतना चिंतित थी कि उसकी यूं अचानक से तबीयत ही बिगड़ गई?
अशोक एक तरफ जहां ये सब सोच कर चिंतित और परेशान था वहीं दूसरी तरफ थोड़ा सोच विचार में भी पड़ गया था।
बहरहाल, उसका बाकी का समय चिंता और परेशानी में ही गुज़रा।
अपनी बेचैनी और व्याकुलता को दूर करने के लिए वो बीच बीच में अपनी बेटी अंकिता को फ़ोन लगा कर प्रिया की तबीयत के बारे में पूछ लेता था।
प्रिया क़रीब ढाई घंटे बाद वापस अपने फ्लैट पर पहुंची।
उसके साथ उसकी बेटी अंकिता और मेड मीरा तो थी ही लेकिन साथ में साक्षी भी आई थी।
फ्लैट पर आते ही अशोक ने खुद जा कर प्रिया का हाल चाल और उसकी तबीयत के बारे में पूछा।
आश्वस्त और संतुष्ट होने के बाद ही उसे राहत मिली।
उसे इस बात की भी खुशी थी कि इस परिस्थिति में प्रिया की दोस्त साक्षी कितना ख़याल रख रही थी प्रिया का।
इसके पहले उसने और उसके पति विशाल ने उसे मौत के मुंह से बचा कर लाने का इतना बड़ा काम किया था।
अशोक, साक्षी और विशाल दोनों का एक तरह से ऋणी हो गया था।
दोनों के प्रति उसके दिल में ख़ास जगह बन गई थी।
उसे ऐसा महसूस होने लगा था जैसे वो दोनों अब उसी की फैमिली का हिस्सा हैं।
प्रिया अब पहले से काफी बेहतर थी।
वो बार बार साक्षी को थैंक्स कह रही थी।
प्रिया के कहने पर मीरा किचन में जा कर साक्षी के लिए चाय बनाने चली गई थी और अंकिता अपने कमरे में पढ़ाई करने।
कमरे में अब सिर्फ प्रिया और साक्षी ही रह गए थे।
"देख मैं तुझसे विनती करती हूं।" साक्षी की तरफ देखते हुए प्रिया ने अधीरता से कहा──"तू इस बारे में अरमान से कुछ मत कहना।"
"बिल्कुल नहीं, इस बारे में मैं तेरी कोई बात नहीं सुनूंगी।" साक्षी ने दो टूक लहजे में कहा──"तू उसी की वजह से आज इस हालत में पहुंची है। माना कि तुझसे ग़लती हुई थी लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि अब वो तुझे जैसे चाहे चोट पहुंचाता रहे। नहीं प्रिया, मैं कल ही उसके घर जाऊंगी और उसको खरी खोटी सुनाऊंगी।"
"प्लीज़ यार, मान जा न।" प्रिया ने जैसे याचना की──"प्लीज़ उसको कुछ मत कहना। मेरी इस हालत का वो कहीं से भी ज़िम्मेदार नहीं है बल्कि मैं खुद ही हूं। मैं उसे लेश मात्र भी किसी बात के लिए दोष नहीं दे सकती और ना ही वो दोषी है। मुझे एहसास है कि उसने इन साढ़े सात सालों में कितने दुख दर्द सहे होंगे। कैसे घुट घुट के जिया होगा। मेरी वजह से उसने इतने कष्ट सहे हैं तो अब मुझे भी तो थोड़ा बहुत कष्ट भोगना ही पड़ेगा। आख़िर गुनहगार तो मैं ही हूं।"
"तू ये सब अपने ज़हन से निकाल दे।" साक्षी ने कहा──"वो तो निकालेगा नहीं, चाहे कोई उसको कितना ही समझा ले। इतने सालों बाद भी उसके सिर पर एक ही भूत सवार है लेकिन तू उसकी तरफ अब ध्यान मत दे।"
"अब तो ये असंभव सा लगने लगा है साक्षी।" प्रिया ने गहरी सांस ली──"जब तक उससे मिली न थी और जब तक उसे देखा नहीं था तब तक तो जैसे मैं भूली ही थी उसको लेकिन उस दिन जब उसे देखा और उसे उल्टा सीधा बोला तो जैसे फिर सब कुछ बदलता ही चला गया। अब तो ये एहसास होता है जैसे एक ही पल में पूरी कायनात बदल गई है। एक ही पल में जैसे सारे एहसास बदल गए हैं। साढ़े सात सालों के बीच कभी भी मुझे अपने उस गुनाह का ख़याल नहीं आया था लेकिन जब उस दिन उसको उल्टा सीधा बोलने के बाद मैं यहां घर आई और अपनी कही बातों का मुझे बोध हुआ तो जाने क्यों मुझे बड़ा अजीब लगा और साथ ही दुख भी हुआ। ये सोच कर ज़्यादा ही बुरा लगा कि एक तो मैंने खुद उसे ज़ख्म दिया और अब ऊपर से इतने सालों बाद जब उससे मिली तो उसको नीचा दिखाते हुए उसे उल्टा सीधा भी बोला और एक वो था कि उसने एक बार भी पलट कर मुझे जवाब नहीं दिया। बल्कि होठों पर फीकी सी मुस्कान सजाए मुझे यूं देखे जा रहा था जैसे मेरे रूप में उसे कोई देवी नज़र आ रही थी और वो अभी एकदम से मेरे क़दमों में झुक कर माथा टेकने लगेगा। क़सम से साक्षी, जब मैंने उल्टी सीधी कहीं हुई अपनी उन बातों पर ग़ौर किया और उसकी उस दशा पर ग़ौर किया तो मुझे अपने आप पर बड़ी ही शर्म आई। अपनी ओछी मानसिकता पर लानत भेजने का दिल किया। अगले कुछ ही पलों में मेरे अंदर उसके प्रति अथाह पीड़ा उभर आई थी। मुझे एहसास होने लगा था कि मैंने उसके साथ कितना ग़लत किया था। सिर्फ अपनी ही खुशी के बारे में सोचा था और उसके सच्चे प्रेम को ठोकर मार दी थी। एक मैं थी कि उसे ठोकर मार कर खुशी खुशी चली गई और किसी और के साथ अपना घर बसा लिया और एक वो था कि उसने मेरी दी हुई पीड़ा को सीने से लगा कर इतने साल सिर्फ मेरी यादों के सहारे गुज़ार दिए। ना उसे अपने जीवन से मोह रहा था और ना ही उसके अंदर कुछ बनने अथवा कुछ करने की हसरत रही थी। तू कहती है कि मैं सब कुछ भुला दूं? नहीं साक्षी, अब तो ये मुझसे हो ही नहीं सकेगा। महीना भर पहले अगर तूने ये बात कही होती तो निश्चित ही मुझसे ये हो जाता लेकिन अब.....अब तो नामुमकिन है यार।"
"तो फिर अब क्या करेगी तू?" साक्षी उसकी हालत को समझते हुए बोली──"मेरा मतलब है कि ऐसा कब तक चलेगा? तुझे कोई न कोई फ़ैसला तो लेना ही पड़ेगा ना?"
"मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।" प्रिया ने जैसे हताश हो कर कहा──"सच कहूं तो बहुत बड़े धर्म संकट में फंस गई हूं मैं। ना अपने घर परिवार को छोड़ सकती हूं और ना ही उसको इस दशा में देखने का साहस है। मेरे लिए सबसे बड़ी समस्या अब ये बन गई है कि वो मेरी कोई बात ही नहीं सुन रहा और एक ही ज़िद किए बैठा है कि वो सिर्फ मेरे साथ ही अपना घर बसाएगा।"
"अच्छा एक बात बता।" साक्षी ने कहा──"और हां सच्चे दिल से बताना कि क्या उसकी ये ज़िद अथवा उसकी ये ख़्वाहिश नाजायज़ है?"
"न...नहीं।" प्रिया का स्वर लड़खड़ा गया──"नहीं है, इंसान वही तो ख़्वाहिश करता है जो उसे पसंद होती है या जिसकी उसे सबसे ज़्यादा चाहत होती है।"
"तो अगर वो अपनी चाहत अथवा अपनी ख़्वाहिश को पूरा करना चाहता है तो क्या ये ग़लत है?" साक्षी ने कहा──"सोचने वाली बात है प्रिया, जिसने सिर्फ तेरी ख़्वाहिश और सिर्फ तेरी ही आरज़ू के चलते अपना ये हाल बना लिया क्या उसकी किस्मत आगे भी ऐसी ही बदतर हालत वाली होनी चाहिए? क्या उसके दुख दर्द अथवा उसके त्याग का कभी कोई मतलब नहीं निकलेगा?"
"काश! मेरे इख़्तियार में होता तो पलक झपकते उसकी हर पीड़ा दूर कर देती। उसकी हर ख़्वाहिश पूरी कर देती।" प्रिया ने ठंडी आह भरी──"काश! मेरे इख़्तियार में होता कि उसे अपने सीने से लगा कर वर्षों से तड़पते उसके दिल को सुकून दे देती। काश! मेरे इख़्तियार में होता कि उसकी हमसफ़र बन कर उसका घर अपने हाथों से आबाद कर देती।"
"तेरे इख़्तियार में ये सब है प्रिया।" साक्षी ने उसके हाथ को थाम कर समझाने वाले अंदाज़ में कहा──"तू चाहे तो उसके लिए ये सब कर सकती है। तुझे वो तब से प्रेम करता आ रहा है जब तू किसी की पत्नी नहीं थी बल्कि सिर्फ उसी की थी। ये तो तूने उसको ठुकरा कर किसी और को चुन लिया था वरना सच कहूं तो तुझ पर आज भी सबसे पहला हक़ उसी का है। मुझे तो अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि ऊपर वाले ने तेरे साथ ऐसा किया ही इस लिए था कि आख़िर में जब तेरी मुलाक़ात पुनः अरमान से हो तो तुझे अपनी ग़लती का एहसास तो हो ही किंतु साथ ही तुझे उसकी सच्ची चाहत का भी एहसास हो सके और फिर तू खुशी से वापस उसकी बनने के लिए उसके पास लौट जाए।"
प्रिया कुछ बोल न सकी जबकि कुछ पल रुकने के बाद साक्षी ने आगे कहा──"ज़रा सोच प्रिया कि नियति ने तेरे जीवन में किस तरह का चक्कर चलाया? तुझे किसी रईस व्यक्ति से सिर्फ इस लिए शादी करनी थी क्योंकि तुझे ऐशो आराम वाली लाईफ चाहिए थी। तुझे वो लाइफ तो मिली लेकिन नियति ने तेरी किस्मत में पति के रूप में एक ऐसे व्यक्ति को चुना जो उमर में तुझसे बहुत बड़ा था और पहले से ही एक चौदह साल की बेटी का बाप था। बिना कोई बच्चा पैदा किए तू मां तो बन गई लेकिन सौतेली बेटी के मुख से अपने लिए कभी मां सुनने का तुझे सौभाग्य नहीं मिला। इतना ही नहीं, नियति का एक चक्कर ये भी चला कि अशोक जी के द्वारा तू इन साढ़े सात सालों में कभी खुद के बच्चे की मां नहीं बन सकी। भले ही तुझे खुद के बच्चे की चाहत न रही हो और अंकिता को ही तूने अपनी सगी बेटी माना हो लेकिन ज़रा अपने दिल में झांक कर बता कि क्या तेरा दिल इतने से खुश है? क्या एक पल के लिए भी कभी ये ख़याल तेरे मन में नहीं उभरा कि तेरी अपनी भी कोई औलाद होती?"
प्रिया एकदम ख़ामोश थी।
ऐसा लगा जैसे कुछ कहने के लिए उसके पास कोई शब्द ही नहीं था।
चेहरे पर गंभीरता के साथ साथ संजीदगी भी नुमायां हो रही थी।
"इन सारी बातों पर अगर गहराई से विचार किया जाए तो नियति का खेल स्पष्ट रूप से समझ में आता है।" साक्षी उसे ख़ामोश देख पुनः बोली──"नियति ने तेरी ख़्वाहिश को पूरा कर के तुझे ऐशो आराम तो बक्शा लेकिन उस असल खुशी से महरूम रखा जिसके मिलने से किसी औरत को वास्तविक खुशी मिलती है अथवा जिससे उसकी आत्मा तक तृप्त हो जाती है। मतलब साफ है प्रिया, इतने सालों बाद नियति ने तुझे अरमान से मिलाया है तो इसके पीछे यकीनन सिर्फ यही एक वजह हो सकती है कि तुझे अपनी ग़लती का एहसास हो और फिर तू अरमान की हालत को देख कर वही करे जो या तो तुझे करना चाहिए या फिर जो अरमान के हित में हो।"
"तेरे कहने का तो यही मतलब हुआ कि मैं अपने पति को तलाक़ दे कर वापस अरमान के पास पहुंच जाऊं।" प्रिया की धड़कनें धाड़ धाड़ कर के बज रहीं थी──"और उसकी दुनिया आबाद कर के उसे वैसा ही प्यार और स्नेह करूं जैसा वो मुझसे करता है?"
"बिल्कुल।" साक्षी ने कहा──"मानती हूं कि ये इतना आसान नहीं है। अपने बसे बसाए संसार को छोड़ कर अचानक दूसरे के साथ फिर से एक संसार बसाना आसान नहीं है लेकिन तुझे वही करना चाहिए जो इस समय वक्त और हालात चीख चीख कर तुझसे कह रहे हैं।"
"मैं कैसे अशोक जैसे नेक इंसान को तलाक़ दे दूं साक्षी?" प्रिया का गला भर आया──"कैसे उस इंसान को छोड़ दूं जिसका कहीं कोई कसूर ही नहीं है? कैसे उस इंसान को छोड़ कर उसे एकदम से दुखों में डाल दूं जिसने मेरी हर इच्छा को पूरा किया हो और हमेशा सिर्फ मेरी ही खुशी चाही हो? कैसे उस लड़की से दूर हो जाऊं जिसे मैंने सौतेली हो कर भी सगी मां की तरह पाला और उसे प्यार दिया है? जब वो दोनों मुझसे इस तरह छोड़ कर चले जाने पर सवाल करेंगे तो कैसे उनके जवाब दे सकूंगी मैं?"
"इसी लिए तो मैंने तुझसे कहा था कि तू अपनी ये प्रॉब्लम अशोक जी को बता दे।" साक्षी ने कहा──"सब कुछ बता कर उन्हें समझा कि तू इस समय कितने बड़े धर्म संकट में है और तेरी वजह से कैसे कोई खुद को बर्बाद किए हुए है। मुझे पूरा यकीन है कि अशोक जी को जब ये सारी बातें पता चलेंगी तो वो तेरी हालत और तेरी स्थिति को समझेंगे। तुझे खुद से दूर करने पर यकीनन उन्हें तकलीफ़ होगी लेकिन वो ये भी समझेंगे कि उनकी तकलीफ़ अरमान की तकलीफ़ से बहुत छोटी है। बस, उसके बाद वो खुद तुझसे कहेंगे कि तू अरमान के जीवन में वापस लौट जा और उस दिलजले का जीवन संवार कर उसके दामन में खुशियां भर दे।"
प्रिया के मनो मस्तिष्क में आंधियां सी चलने लगीं थी।
चेहरे पर जाने कैसे कैसे ख़यालों के चलते अलग अलग तरह के भाव गर्दिश करते नज़र आ रहे थे।
थोड़ी देर बाद साक्षी अशोक से दो पल मिल कर चली गई।
इधर प्रिया का ज़हन विचार मंथन किए जा रहा था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर वो क्या फ़ैसला करे?
To be continued...