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Bahut hi umda update he TheBlackBlood Shubham Bhai
Ye sakshi ki ghadi bas priya ko talaq dilane par atki huyi he
Agar priya ne isase jald hi apna pichcha nahi chhudwaya to ye gadbad kar degi
Keep rocking Bro
Abe yaar.....ye sala arman to bahu hi kutti cheej nikla
Saale ne puri fielding laga rakhi he priya aur uske husband ki..........
Keep rocking Bro
Bahut hi gazab ki update he TheBlackBlood Shubham Bhai
Priya par to ab musibato ka pahad tut pada he, ashok ka accident ho gaya........
May be possible ki isme arman ka koi hath ho.........
Arman priya ko wapis paane ki liye kuch bhi kar sakta he.........
Keep rocking bro
Thanks broBahut hi behtareen update he TheBlackBlood Shubham Bhai
Aakhirkar Ashok ki jaan bach gayi.............
Lekin ashok ko hospital lekar aane wala aur use blood dene wala arman he.......
Is accident me kahi na kahi arman ka bhi hath ho sakta he, aisa mujhe lagta he.......
Vishal vahi officer he jisne ashok ki le rakhi he..........vo bhi arman ke kehne par
Keep rocking bro
"चल अब रखती हूं मैं।" साक्षी ने कहा──"कल तैयार रहना। मैं सुबह दस बजे के बाद किसी भी वक्त तेरे पास पहुंच जाऊंगी।"
प्रिया ने ठीक है कहा तो उधर से साक्षी ने कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।
प्रिया काफी देर तक इन्हीं सब बातों के बारे में सोचती रही।
फिर वो पुनः सब्जियां काटने में लग गई।
Bahut hi shaandar update diya hai TheBlackBlood bhai....Update ~ 14
अरमान आज कल दिन में टैक्सी चला रहा था। हालाकि उसका कोई नियम नहीं था। टैक्सी दिन में चलाना है या रात में ये उसके मूड पर निर्भर था। कभी कभी तो वो दो दो तीन तीन दिनों तक घर में ही पड़ा रहता था। जब टैक्सी मालिक किसी को उसके पास भेजता तब जा कर वो सोचता कि चलो पेट का खर्चा निकालने के लिए कुछ काम कर लिया जाए।
बहरहाल, आज सुबह जब वो सो कर उठा तो सुबह से ही उसका कहीं जाने का मूड नहीं था। एक बार उसने सोचा भी कि अकेला घर में वो कब तक खाली पड़ा रहेगा लेकिन फिर अगले ही पल उसका मूड बदल गया।
उसने निश्चय कर लिया कि आज कहीं नहीं जाएगा और फिर से वो अस्त व्यस्त से नज़र आ रहे पुराने से बेड पर सो गया।
यही उसका रवैया था और यही उसका रूटीन था।
उसे अपनी शख्सियत का लेश मात्र भी ख़याल नहीं था और ना ही कभी वो ये सोचता था कि ऐसा कब तक चलेगा?
पिछले साढ़े सात सालों में उसके अंदर सिर्फ एक ही बदलाव दिख रहा था और वो ये था कि प्रिया के प्रति उसके ख़यालात कुछ बदल से गए थे।
पहले जहां वो सिर्फ प्रिया की यादों के सहारे खुद को बहुत ही मामूली सा बनाए किसी तरह जी रहा था वहीं अब उसके अंदर एक अजीब सी ज़िद पैदा हो गई थी।
पहले उसने प्रिया को हासिल करने का कभी सोचा तक नहीं था लेकिन डेढ़ महीना पहले जब उसने इतने सालों बाद प्रिया को किसी जिन्न की तरह अचानक से अपने सामने प्रगट हो गया देखा और जब प्रिया ने अपनी बातों से उसके ज़ख्मों को कुरेद सा दिया तो जाने क्यों प्रिया के प्रति उसके जज़्बात बदल गए।
उसके अंदर एक ज़िद बैठ गई कि अब वो प्रिया को हर कीमत पर हासिल कर के रहेगा।
इतना ही नहीं उसे इस बात का एहसास भी कराएगा कि किसी के द्वारा ठुकरा दिए जाने पर एक इंसान कैसे अकेला घुट घुट के जीता है?
उस वक्त दिन के क़रीब ग्यारह बजे थे जब अचानक ही उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके घर का दरवाज़ा खटखटाया है।
वो नींद में था इस लिए थोड़ा हिला तो ज़रूर लेकिन उठा नहीं।
कुछ पलों बाद दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ फिर से उसे अपने कानों में सुनाई दी।
इस बार उसकी चेतना मानों अज्ञात लोक से वापस आई और उसकी आंख खुल गई।
तभी दरवाज़ा फिर से खटखटाया गया।
अब उसे स्पष्ट समझ आ गया कि बाहर कोई आया है।
अतः बेमन से वो बेड से नीचे उतरा।
जिस्म पर सिर्फ एक कच्छा था।
उसने आनन फानन में बेड के नीचे पड़ी एक टी शर्ट को पहना और नीचे लूंगी लपेट कर बाहर की तरफ बढ़ चला।
अभी वो दरवाज़े के पास पहुंचा ही था कि दरवाज़ा फिर से खटखटाया गया।
अब तक वो पूरी तरह नींद की खुमारी से बाहर आ चुका था इस लिए उसे ये समझते देर न लगी कि दरवाज़ा कौन खटखटा रहा है।
उसके अनुसार ऐसा एक ही व्यक्ति था जो टैक्सी मालिक द्वारा काम पर जाने के लिए उसे बुलाने भेजा जाता था।
अरमान ने थोड़ा खिन्न भाव से दरवाज़ा खोला और इससे पहले कि खुन्नस में उसके मुख से कोई अपशब्द निकलता उसकी नज़र बाहर खड़ी प्रिया और साक्षी पर पड़ी।
उन दोनों को देखते ही उसने फ़ौरन अपने होठ भींच लिए।
उधर उसकी अस्त व्यस्त हालत देख साक्षी पर तो ज़्यादा कोई फ़र्क नहीं पड़ा लेकिन प्रिया हैरानी से उसे देखने लगी।
एक तो अभी वो नींद से जागा था इस लिए उसका अस्त व्यस्त रहना स्वाभाविक ही था किंतु वो थोड़ा अजीब दिखता भी था।
बिल्कुल फ़क़ीरों जैसा।
चेहरे पर बढ़ी हुई बड़ी बड़ी दाढ़ी मूंछें।
सिर पर लम्बे किन्तु उलझे हुए बाल।
विशाल और साक्षी लाखों बार उससे कह चुके थे कि थोड़ा तो वो अपना ख़याल रखा करे लेकिन उस पर उनकी बातों का कोई असर ही नहीं होता था।
उसके बारे में कौन क्या सोचता है इस बात से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था।
"तुम हमेशा ऐसी हालत में ही क्यों दिखते हो हमें?" प्रिया तो उसे देख हैरान थी इस लिए साक्षी ने ही कमान सम्हालते हुए उससे कहा──"कॉलेज के दिनों में कितने हैंडसम दिखते थे तुम और आज देखो, कितनी अजीब सी हालत बना ली है तुमने।"
"जब हैंडसम दिखता था तब कौन सा किसी ने अपना लिया था मुझे?" अरमान ने प्रिया पर एक नज़र डालने के बाद फीकी सी मुस्कान सजा कर कहा──"टूट कर जिसकी इबादत की उसने भी मेरे हैंडसम होने का कोई मान नहीं रखा।"
अरमान की बातें यकीनन प्रिया से ही संबंधित थीं।
साक्षी अच्छी तरह जानती थी ये बात।
उसने कुछ कहा नहीं बस कनखियों से प्रिया की तरफ देखा।
प्रिया के चेहरे पर बेहद ही संजीदा भाव नुमायां हो उठे।
चेहरे पर थोड़ी पीड़ा और थोड़े पश्चाताप के भी भाव नज़र आए।
अरमान की बात सुनते ही उसकी नज़रें झुक गईं।
"ख़ैर, आज सुबह सुबह दिन के समय मेरे घर के बाहर दो दो खूबसूरत चांद कैसे प्रगट हो गए?" अरमान ने विषय को बदल कर साक्षी से पूछा।
"तुमने मुझे भी खूबसूरत चांद कहा?" साक्षी ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा──"ओह! थैंक यू सो मच अरमान लेकिन अफ़सोस मैं किसी और की अमानत हूं।"
"तुम अच्छी तरह जानती हो कि इस दुनिया में मुझे सिर्फ एक ही शख़्स की आरज़ू है।" अरमान ने कहा──"उसके बदले ऊपर वाला तीनों लोकों का साम्राज्य भी मुझे देने आए तो मैं उस साम्राज्य को ठोकर मार दूंगा।"
"काश! इतनी शिद्दत से कोई मुझसे भी मोहब्बत करता।" साक्षी ने मुस्कुराते हुए जैसे आह भरी। फिर उसने प्रिया से मुखातिब हो कर कहा──"अरमान अगर इतनी मोहब्बत मुझसे करता तो क़सम से कहती हूं इसी वक्त अपने निठल्ले हसबैंड को तलाक़ दे कर अरमान से शादी कर लेती और एक तू है जो ऐसे इंसान से भाग रही है जो तुझे इतना प्यार करता है। हे भगवान! आख़िर ये किस मिट्टी की बनी हुई है?"
"तू न ज़्यादा बकवास न कर।" प्रिया ने धीमे से उसे डांटा──"तू अच्छी तरह जानती है कि मैं अपने मन में ऐसा करने का सोच भी नहीं सकती।"
"हां तू तो इस कलियुग की सबसे बड़ी पतिव्रता नारी है।" साक्षी ने बुरा सा मुंह बनाया──"अब ये बता कि यहीं पर खड़े खड़े तू अरमान को शुक्रिया कहेगी या घर के अंदर जा कर उसे बोलेगी?"
"तुम दोनों क्या खुसुर फुसुर कर रही हो?" अरमान ने दोनों को बारी बारी से देखते हुए पूछा──"अगर मुझसे कोई काम है तो बोलो वरना बेकार में मेरा समय बर्बाद मत करो। मुझे अभी सोने का सबसे बड़ा काम करना है।"
"अरे! हां वो बात ये है अरमान कि प्रिया तुमसे कुछ कहना चाहती है।" साक्षी ने झट से ये कहा तो प्रिया एकदम से चौंक कर उसकी तरफ देखने लगी।
"अच्छा, ऐसी बात है क्या?" अरमान ने प्रिया की तरफ देखा──"फिर तो मैं सबसे पहले अपने दोनों कानों को साफ कर लेता हूं। वो क्या है ना कि काफी लंबे समय से मैंने इनकी सफाई नहीं की है। प्रिया मुझसे जो कहना चाहती है वो अगर मेरे कान ठीक से सुन नहीं पाएंगे तो इससे प्रिया के द्वारा कहे गए शब्दों की तौहीन हो जाएगी। रुको, मैं अभी अपने कानों को साफ कर के आता हूं।"
अरमान जब पलट कर सचमुच अंदर की तरफ जाने लगा तो साक्षी के साथ साथ प्रिया भी बुरी तरह चौंक पड़ी।
प्रिया तो उसकी बातें सुन कर ही संजीदा हो गई थी।
अरमान के सच्चे प्रेम को उसने अच्छी तरह महसूस किया था।
अरमान का सामना करने में अब उसे ये सोच कर डर लगने लगा था कि अगर वो जज़्बातों में बह गई तो गज़ब हो जाएगा।
अरमान की हालत देख कर ही उसे ये एहसास सताने लगता था कि उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वही है।
"अरे! रुको अरमान रुको।" प्रिया की हालत को समझते हुए साक्षी ने ही कमान सम्हाली और फ़ौरन ही अरमान को रोका──"तुम भी ना, ग़ज़ब ही इंसान हो।"
अरमान वापस पलटा।
उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए थे जैसे उसे अपने कान साफ करने जाने से रोक कर साक्षी ने उस पर बहुत बड़ा अत्याचार कर दिया है।
साक्षी ये तो जानती थी कि अरमान ये सब अपने प्लान के तहत ही कर रहा है लेकिन वो ये भी जानती थी कि प्रिया के प्रति उसकी चाहत बिल्कुल भी झूठी नहीं है।
"अब यूं मुंह बना के मत खड़े रहो तुम।" फिर उसने अरमान को घूरते हुए कहा──"चलो अंदर। प्रिया तुमसे यहां थोड़े ना अपनी बात कहेगी।"
"ओह! ऐसा है क्या?" अरमान ने मूर्खों की तरह अपनी पलकें झपकाई──"ठीक है फिर, चलो आओ अंदर।"
साक्षी और प्रिया आगे पीछे अंदर दाख़िल हो गईं तो अरमान ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
"तुम्हारा सच में कुछ नहीं हो सकता।" अंदर की हालत देखते ही साक्षी ने अरमान से कहा──"पता नहीं कैसे इंसान हो तुम जो यहां ऐसी ख़राब हालत में रह लेते हो।"
"जिसे किसी बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता उसके लिए रहने वाली जगह कैसी है ये मायने नहीं रखता।" अरमान ने कहा──"मैं तो इस दीन दुनिया से विरक्त एक फ़कीर आदमी हूं। मुझे किसी भी चीज़ की चाहत नहीं है। काश! ये चाहत भी मिट जाती जो मेरे दिल में प्रिया को बेपनाह मोहब्बत करने के रूप में मौजूद है।"
उसकी ये बात सुन कर प्रिया एक बार फिर से अंदर तक कांप गई।
उसके दिल में मचलते जज़्बात शांत होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
वो अपने आपको सम्हाले रखने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी।
उसका जी चाह रहा था कि कितना जल्दी वो अरमान से दूर चली जाए।
उसे महसूस होने लगा था कि अगर थोड़ी देर और उसने अरमान की ये अजीब और दर्द भरी बातें सुनी तो वो टूट जाएगी।
इतना ही नहीं उसका दिल कहीं उसे अरमान के सीने से लिपट जाने के लिए पूरी ताक़त से उसकी तरफ ढकेल ना दे।
उसकी आंखों में बार बार आंसू तैरने लगते थे।
"अच्छा अब ये बातें छोड़ो।" साक्षी को भी बड़ा अजीब महसूस होने लगा था इस लिए उसने विषय बदलने की गरज से पूछा──"और ये बताओ कि फ्रेश हुए या सचमुच हमारे आने पर ही सो कर जागे हो?"
"हां, जागा तो अभी ही हूं।" अरमान ने सामान्य भाव से कहा──"असल में नींद तो सुबह एक बार खुली थी लेकिन आज कहीं जाने का मन नहीं किया तो फिर से सो गया।"
"ओह!" साक्षी ने कहा──"वैसे आते समय मैं प्रिया से कह भी रही थी कि अगर तुम दिन में टैक्सी चलाने जाते होगे तो शायद ही घर में तुमसे मुलाक़ात हो पाएगी। फिर ये सोच कर चले आए कि एक बार घर जा कर देख ही लेते हैं। शुक्र है तुम घर पर ही थे। ख़ैर, जाओ पहले तुम फ्रेश हो लो। तब तक हम दोनों बैठे हैं और हां आज हमारे लिए कुछ लाने की जहमत मत उठाना।"
अरमान ने सिर हिलाया और घर के पीछे की तरफ खुलने वाले दरवाज़े को खोल बाहर निकल गया।
असल में अरमान का घर बहुत पुराना था।
आज के समय के अनुसार घर के अंदर टॉयलेट अथवा बाथरूम वाली सुविधा नहीं थी बल्कि घर के पीछे जो थोड़ी सी जगह थी वहीं किनारे पर टॉयलेट बना हुआ था।
नहाने के लिए उसी से जुड़ा हुआ एक बाथरूम था।
पानी के लिए एक हैंडपंप था जो पुराने समय का था लेकिन उसमें से पानी आज भी पर्याप्त मात्रा में निकलता था।
बहरहाल, अरमान क़रीब आधे घंटे में फ्रेश हो कर तथा नहा धो कर आया।
नहा कर आने की वजह से वो ऊपर से बेलिबास ही था।
प्रिया और साक्षी के सामने ऐसे रूप में आने पर भी उसे शर्म नहीं आई।
वैसे शर्म लगने जैसी बात उस पर लागू भी नहीं होती थी क्योंकि उसे किसी बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता था।
साक्षी ने तो उसे इस रूप में पहले भी देखा था जब उसका हसबैंड विशाल उसे जबरन अपने घर ले जाता और उसे फ्रेश होने को कहता।
मगर प्रिया उसे इस रूप में पहली बार देख रही थी।
साढ़े सात साल पहले भी उसने अरमान को इस तरह ऊपर से बेलिबास नहीं देखा था।
प्रिया झिझकते हुए बार बार उसे चोर नज़रों से देखने लगती।
अरमान बाहर से भले ही फ़क़ीरों की तरह दिखता था लेकिन कुदरती तौर पर वो आज भी अंदर से अच्छा खासा दिखता था।
चौड़ी छाती पर घने घुंघराले बाल जो उसके पेट और नाभी के आस पास वाले क्षेत्र को घेरे हुए नीचे तरफ फैलते चले गए थे।
मजबूत कंधे और बलिष्ठ भुजाएं उसके मर्द होने का सबूत दे रहीं थी।
गले से ऊपर की तरफ चेहरे में बढ़ी हुई दाढ़ी मूंछें और सिर पर उलझे हुए बाल।
प्रिया बार बार चोर नज़रों से उसके जिस्म का अवलोकन करने लगती थी।
एकाएक वो चौंक पड़ी।
उसकी चोर नजरें अरमान के बाएं सीने पर एकदम दिल के पास जम सी गईं।
घुंघराले बालों की वजह से शायद पहले उसे दिखा नहीं था या फिर उसने ध्यान से देखा नहीं था लेकिन जब दुबारा उसकी नज़रें उसके सीने की तरफ गईं तो सहसा उसे ऐसा लगा जैसे उसके दिल वाले हिस्से पर कुछ लिखा हुआ है।
प्रिया ने अपनी झिझक को परे रख कर इस बार बड़े ध्यान से देखा।
अगले ही पल वो ये देख कर स्तब्ध सी रह गई कि अरमान ने अपने बाएं सीने पर उसका नाम गुदवा रखा है।
अंग्रेजी के अक्षरों में गुदा हुआ था──Priya।
ये देख प्रिया के अंदर एकदम से भूचाल सा आ गया।
एक बार पुनः वो ये सोच कर आहत सी हो गई कि उसके जैसी बेवफ़ा लड़की का नाम अरमान ने अपने सीने पर लिख रखा है।
ये उसके प्रेम का सबूत भी था और उसकी चाहत की पराकाष्ठा भी।
प्रिया को लगा उसे चक्कर आ जाएगा।
बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला।
उसके दिल की धड़कनें किसी हथौड़े की मानिंद उसकी कनपटियों पर बरसने लगीं थी।
उसका हृदय हाहाकार सा कर उठा था।
सहसा उसे अपने अंदर से एक आवाज़ सुनाई दी──"ऐसे इंसान को ठुकराने के बाद आख़िर ऐसी कौन सी खुशी और ऐसा कौन सा ऐशो आराम हासिल किया है तूने प्रिया?"
"अरे! तुझे क्या हुआ?" साक्षी की नज़र अचानक प्रिया पर पड़ी तो वो उसकी दशा देख चौंक पड़ी थी।
"क...कुछ नहीं" प्रिया उसके यूं अचानक पूछ लेने पर बुरी तरह बौखला गई। बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और फिर कहा──"म...मैं ठीक हूं।"
साक्षी ने उसे बड़े ध्यान से देखा।
प्रिया उसके यूं देखने पर बेचैन सी हो गई।
उसके चेहरे पर परेशानी और घबराहट के चलते पसीना उभर आया।
वो साक्षी से नज़रें न मिला सकी।
इधर साक्षी उसकी हालत से ज़रा भी बेख़बर नहीं थी।
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि इस वक्त प्रिया किस हालत से गुज़र रही है।
दूसरी तरफ अरमान कुछ ही दूरी पर कपड़े पहन रहा था।
उसने नहाने के बाद अपने बदन पर ना तो तेल वगैरह लगाया था और ना ही बालों पर कंघी की थी।
अपने जिस्म पर उन्हीं कपड़ों को पहन लिया जो उसने नहाने से पहले पहन रखे थे।
साक्षी उसकी इस आदत से परिचित भी थी और नाखुश भी लेकिन प्रिया को ये बहुत अजीब लगा और पीड़ा देने वाला भी।
उसके लिए सबसे बड़े दुख की बात ये थी कि वो खुद अरमान के लिए कुछ कर नहीं सकती थी।
हालाकि उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने के लिए उसका दिल उसे ज़ोर दिए जा रहा था मगर वो अपने जज़्बातों को दबाए हुए थी।
"लो साक्षी।" अरमान दोनों के सामने आ कर बोला──"तुम्हारे कहे अनुसार मैं फ्रेश हो गया। अब बताओ, तुम्हारी दोस्त क्या कहना चाहती है मुझसे?"
अरमान की ये बात सुन साक्षी के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई।
उधर प्रिया की धड़कनें बढ़ गईं।
उसे अरमान को शुक्रिया कहना मानों दुनिया का सबसे मुश्किल काम महसूस होने लगा।
शर्म, झिझक, परेशानी, घबराहट और बेचैनी ने जैसे उसे चारो तरफ से घेर लिया।
अरमान के सामने उसकी ऐसी हालत पहले कभी न हुई थी।
उल्टा वो ही अरमान पर हावी रहती थी और अरमान उससे अपनी बात कहने के लिए झिझकता था मगर आज वक्त और हालात दोनों ही अलग और विपरीत थे।
"बोलो प्रिया।" उसे असमंजस में पड़ा देख साक्षी ने कहा──"तुम अरमान से जो कहने यहां आई हो कह दो। फिर हमें चलना भी है। अरमान को भी काम पर जाना होगा।"
साक्षी की बात सुन कर प्रिया बेहद बेचैन नज़र आने लगी।
झिझक और घबराहट में इज़ाफा हो गया।
बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और पहले साक्षी की तरफ देखा फिर चेहरा ऊपर कर के अरमान को।
अरमान अपलक उसी को देखे जा रहा था।
उसकी अपनी धड़कनें भी ये सोच कर बढ़ चलीं थी कि जाने क्या कहने वाली है प्रिया उससे?
सहसा वो मन ही मन ये दुआ करने लगा कि प्रिया उससे वही कहे जो वो चाहता है।
"क्या हुआ कहो ना।" प्रिया को बेचैन भाव से अपलक अरमान को देखते देख साक्षी ने जैसे उस पर ज़ोर डाला।
"अ...अरमान म...मैं तुमसे।" प्रिया ने अपनी धाड़ धाड़ बजती धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए किंतु अटकते हुए स्वर में कहना शुरू किया। उधर अरमान की धड़कनें उसकी आवाज़ सुन मानों थम सी गईं। तभी प्रिया ने हिम्मत जुटाते हुए जैसे अपनी बात पूरी की──"म...मैं तुमसे ये कहना चाहती हूं कि तुमने मेरे प...पति की जान बचा कर मुझ पर जो उ...उपकार किया है उसके लिए तुम्हारा ब...बहुत बहुत श...शुक्रिया। म...मैं जीवन भर तुम्हारा ये उपकार नहीं भू...भूलूंगी।"
इतना कह कर प्रिया ने अपनी आंखें बंद कर ली और राहत की लंबी लंबी सांसें लेने लगी।
उसे ऐसा लगा जैसे इतना कह कर उसने बहुत बड़ी जंग फतह कर ली है।
उधर अरमान ने उसकी ये बात सुनते ही एक गहरी सांस ली।
पलक झपकते ही उसके अरमानों पर जैसे पानी फिर गया था।
कहां अचानक से इतने सालों बाद उसका मन मयूर एक खुशी का एहसास करने वाला था किन्तु अगले ही पल उसे मिलने वाली खुशी पर मानों गृहण लग गया था।
वो निराश भाव से अपलक उस प्रिया को देखे जा रहा था जो अपनी आंखें बंद किए अभी भी राहत की सांसें लेने में खोई थी।
अरमान ने पुनः एक गहरी सांस ली।
जाने क्या सोच कर उसके होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई।
इधर साक्षी की नज़रें अरमान पर ही टिकी हुईं थी।
वो भी समझ रही थी कि अरमान ने प्रिया से क्या सुनने की उम्मीद कर रखी थी।
उसे अरमान के लिए इस वक्त बहुत बुरा महसूस हो रहा था लेकिन कर भी क्या सकती थी वो।
"कमाल है।"
तभी अरमान की आवाज़ से उसके साथ साथ प्रिया का भी ध्यान उसकी तरफ गया तो उसने आंखें खोल कर तथा धड़कते दिल से अरमान की तरफ देखा।
उधर अरमान ने आगे कहा──"तो तुम इसे मेरा उपकार समझती हो? अरे! मुझे तो पता भी नहीं था कि जो आदमी एक्सीडेंट होने की वजह से लहू लुहान था और मौत के मुंह में फंसा हुआ था वो तुम्हारा पति है। मैंने तो इंसानियत के तौर पर उसकी जान बचाने के लिए बस अपना कर्म किया था। वैसे उस समय अगर मुझे ये पता भी होता तब भी मैं तुम्हारे पति की जान बचाने के लिए यही करता। मेरे अंदर लेश मात्र भी ये ख़याल न आता कि जो व्यक्ति मेरी मोहब्बत का पति है उसे बचाने का कोई प्रयास ना करूं अथवा अगर वो बच जाने वाला हो तो उसे जान बूझ के मार दूं। मेरा दिल तुम्हारी तरह पत्थर का नहीं है जो किसी पर दया भी न कर सके।"
उसकी बात सुन कर प्रिया की आंखें ये सोच कर भर आईं कि उसने उसी के सामने ऐसा कह कर मानो उसकी हक़ीक़त बता दी है।
"आश्चर्य की बात है।" उधर अरमान उसे अपलक देखते हुए पुनः बोला──"महज शुक्रिया कहने के लिए तुम इतना झिझक रही थी? इसका तो यही मतलब हुआ कि तुम आज भी मुझे कोई महत्व नहीं देती वरना तुम्हारे लिए जितना बड़ा काम मैंने किया है तुम्हारी जगह कोई और होता तो उसके लिए खुशी खुशी मेरे क़दमों में लोट कर लाखों बार मुझे शुक्रिया कहता। ख़ैर कोई बात नहीं। वैसे भी मुझे तुम्हारे शुक्रिया की ज़रूरत नहीं है और ना ही मुझे किसी के द्वारा शुक्रिया कहलवाने की हसरत है।"
"ऐसा मत कहो प्लीज़।" प्रिया का सब्र जैसे जवाब दे गया। उसकी रुलाई फूट गई। बुरी तरह सिसकते हुए बोली──"और कितना मेरी ग़लती के लिए मुझे जलील करोगे? मुझे एहसास हो चुका है कि मैंने तुम्हारे साथ बिल्कुल भी अच्छा नहीं किया था। आज तुम्हारी जो हालत है उसकी ज़िम्मेदार मैं ही हूं। मेरा यकीन करो अरमान, मैं अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हूं। मेरे बस में ही नहीं है वरना तुम्हारे लिए बहुत कुछ कर जाती। प्लीज़ माफ़ कर दो मुझे और...और मेरी वजह से खुद को यूं बरबाद मत करो। किसी अच्छी लड़की से शादी कर के अपना घर बसा लो।"
"इस दुनिया में ऐसी कोई दूसरी लड़की जन्मी ही नहीं है डियर।" अरमान ने फीकी मुस्कान के साथ कहा──"जिसे मैं मोहब्बत की नज़र से देख सकूं और जिसके साथ अपना घर बसाने का सोचूं। मेरा घर बसेगा तो सिर्फ तुम्हारे साथ वरना मरते दम तक यूं ही तुम्हारी यादों के सहारे जीता रहूंगा।"
"नहीं...नहीं प्लीज़।" प्रिया आहत भाव से मानो चीख पड़ी──"ऐसी ज़िद मत करो जो कभी पूरी ही नहीं हो सकती। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं किसी और की पत्नी हूं। मैं अपने पति को छोड़ कर तुम्हारे पास वापस नहीं आ सकती। और....और वैसे भी तुम एक ऐसी औरत के साथ घर बसाने की ज़िद क्यों किए बैठे हो जिसने तुम्हें और तुम्हारी सच्ची मोहब्बत को ठोकर मार दी हो? तुम्हें तो ऐसी औरत से सिर्फ और सिर्फ नफ़रत करनी चाहिए।"
"सच्ची मोहब्बत करने वाला दिल चाह कर भी अपनी दिलरुबा से नफ़रत नहीं कर सकता प्रिया।" अरमान ने अधीरता से कहा──"वो तो बस मोहब्बत ही करता है। हर हाल में, हर कीमत पर।"
प्रिया की आंखें पुनः छलक पड़ीं।
इस वक्त उसका चेहरा अथाह पीड़ा से भरा हुआ था।
उसके आंसू गिर कर फर्श में फ़ना हो रहे थे।
इधर साक्षी दोनों के मध्य चल रही बातों को मूक दर्शक की तरह देख और सुन रही थी।
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि दोनों में से किसे क्या बोले?
"मत करो ना ऐसा।" प्रिया आहत सी हो कर बोल पड़ी──"क्यों मुझे धर्म संकट में डालने पर तुले हुए हो? क्यों मुझे इतना सता रहे हो? क्या यही है तुम्हारी मोहब्बत? क्या मोहब्बत करने वाले ऐसे ही अपने साथी को सताते हैं और दुखी करते हैं?"
"लो, कर लो बात।" अरमान अजीब भाव से हंस पड़ा, फिर बोला──"अब तुम मुझे बताओगी कि कैसे होते हैं मोहब्बत करने वाले? ये तो वही बात हो गई कि नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने चली। छोड़ो प्रिया, मोहब्बत जैसे लफ़्ज़ तुम्हारी ज़ुबान में अच्छे नहीं लगते। वैसे भी, तुम पर तो सिर्फ एक ही बात शूट करती है और वो है अपनी ख़्वाहिश को पूरा करने के लिए अपने ही चाहने वाले को बेदर्दी से ठुकरा कर चले जाना।"
"अरमान प्लीज़।" सहसा साक्षी ने बीच में हस्ताक्षेप किया।
उसे ये डर सताने लगा था कि अरमान की कड़वी बातें सुन कर प्रिया कहीं इस क़दर न आहत हो जाए कि वो कोई ग़लत क़दम उठा ले। इस लिए अरमान से बोली──"ये तुम ठीक नहीं कर रहे हो। माना कि प्रिया ने सिर्फ अपने बारे में सोचा था और उसने तुम्हारे प्रेम को ठुकरा दिया था लेकिन उसके लिए तुम बार बार उसे उसकी ग़लती का एहसास करा कर यूं दुखी नहीं कर सकते।"
"ओह! सॉरी।" अरमान तपाक से बोल पड़ा──"आई एम वेरी वेरी सॉरी। तुमने बिल्कुल सही कहा। मुझे प्रिया को यूं दुखी करने का कोई अधिकार नहीं है।" कहने के साथ ही वो एकदम प्रिया की तरफ मुड़ा, फिर उससे बोला──"मैं तुमसे हाथ जोड़ कर अपनी इस ग़लती के लिए माफ़ी मांगता हूं प्रिया। मुझे आभास ही नहीं हो पाया था कि जज़्बातों में मैं किस क़दर बहता चला गया हूं। वो क्या है ना वर्षों से दिल में जाने कैसा कैसा गुबार दबा हुआ पड़ा था जो बेध्यानी में बाहर आ गया। प्लीज, इसके लिए माफ़ कर दो मुझे।"
"बस करो।" प्रिया की एक बार फिर रुलाई फूट गई──"मुझमें अब और कुछ भी सुनने की हिम्मत नहीं है। मेरी तुमसे एक ही विनती है कि अपने आपको यूं बर्बाद मत करो। मेरा ख़याल अपने ज़हन से निकाल कर किसी के साथ अपना घर बसा लो।"
"यार साक्षी।" अरमान साक्षी से मुखातिब हुआ──"अपनी इस दोस्त को भी तो समझाओ कि एक ही बात बार बार न बोले। मैं बता चुका हूं कि इस दुनिया में ऐसी कोई दूसरी लड़की जन्मी ही नहीं है जिसके साथ मुझे प्रेम हो सके और मैं उसके साथ अपना घर बसाने का सोचूं। मेरा घर सिर्फ और सिर्फ इसके साथ ही बसेगा वरना नहीं। अगर तुम्हारी दोस्त को मेरा घर बसाने की इतनी ही चिंता है तो कहो इससे कि अपने हसबैंड को तलाक़ दे कर मुझसे शादी करे।"
"मैं किसी को क्या बोलूं अरमान?" साक्षी जैसे खुद ही धर्म संकट में फंस गई थी──"तुम ही उसकी विवशता को समझो। एक औरत के लिए इतना आसान नहीं होता बिना किसी वजह के अपने पति को तलाक़ दे कर किसी और से शादी कर लेना।"
"तो फिर इससे कहो कि जैसे अब तक मैं इसकी यादों के सहारे जीता आया हूं।" अरमान ने कहा──"उसी तरह बाकी का जीवन भी गुज़ार लूंगा। मेरा दिल उसी को अपना बनाएगा जिसे वो प्यार करता है। बाकी किसी की चाहत नहीं है उसे।"
To be continued...
Update ~ 14
अरमान आज कल दिन में टैक्सी चला रहा था। हालाकि उसका कोई नियम नहीं था। टैक्सी दिन में चलाना है या रात में ये उसके मूड पर निर्भर था। कभी कभी तो वो दो दो तीन तीन दिनों तक घर में ही पड़ा रहता था। जब टैक्सी मालिक किसी को उसके पास भेजता तब जा कर वो सोचता कि चलो पेट का खर्चा निकालने के लिए कुछ काम कर लिया जाए।
बहरहाल, आज सुबह जब वो सो कर उठा तो सुबह से ही उसका कहीं जाने का मूड नहीं था। एक बार उसने सोचा भी कि अकेला घर में वो कब तक खाली पड़ा रहेगा लेकिन फिर अगले ही पल उसका मूड बदल गया।
उसने निश्चय कर लिया कि आज कहीं नहीं जाएगा और फिर से वो अस्त व्यस्त से नज़र आ रहे पुराने से बेड पर सो गया।
यही उसका रवैया था और यही उसका रूटीन था।
उसे अपनी शख्सियत का लेश मात्र भी ख़याल नहीं था और ना ही कभी वो ये सोचता था कि ऐसा कब तक चलेगा?
पिछले साढ़े सात सालों में उसके अंदर सिर्फ एक ही बदलाव दिख रहा था और वो ये था कि प्रिया के प्रति उसके ख़यालात कुछ बदल से गए थे।
पहले जहां वो सिर्फ प्रिया की यादों के सहारे खुद को बहुत ही मामूली सा बनाए किसी तरह जी रहा था वहीं अब उसके अंदर एक अजीब सी ज़िद पैदा हो गई थी।
पहले उसने प्रिया को हासिल करने का कभी सोचा तक नहीं था लेकिन डेढ़ महीना पहले जब उसने इतने सालों बाद प्रिया को किसी जिन्न की तरह अचानक से अपने सामने प्रगट हो गया देखा और जब प्रिया ने अपनी बातों से उसके ज़ख्मों को कुरेद सा दिया तो जाने क्यों प्रिया के प्रति उसके जज़्बात बदल गए।
उसके अंदर एक ज़िद बैठ गई कि अब वो प्रिया को हर कीमत पर हासिल कर के रहेगा।
इतना ही नहीं उसे इस बात का एहसास भी कराएगा कि किसी के द्वारा ठुकरा दिए जाने पर एक इंसान कैसे अकेला घुट घुट के जीता है?
उस वक्त दिन के क़रीब ग्यारह बजे थे जब अचानक ही उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके घर का दरवाज़ा खटखटाया है।
वो नींद में था इस लिए थोड़ा हिला तो ज़रूर लेकिन उठा नहीं।
कुछ पलों बाद दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ फिर से उसे अपने कानों में सुनाई दी।
इस बार उसकी चेतना मानों अज्ञात लोक से वापस आई और उसकी आंख खुल गई।
तभी दरवाज़ा फिर से खटखटाया गया।
अब उसे स्पष्ट समझ आ गया कि बाहर कोई आया है।
अतः बेमन से वो बेड से नीचे उतरा।
जिस्म पर सिर्फ एक कच्छा था।
उसने आनन फानन में बेड के नीचे पड़ी एक टी शर्ट को पहना और नीचे लूंगी लपेट कर बाहर की तरफ बढ़ चला।
अभी वो दरवाज़े के पास पहुंचा ही था कि दरवाज़ा फिर से खटखटाया गया।
अब तक वो पूरी तरह नींद की खुमारी से बाहर आ चुका था इस लिए उसे ये समझते देर न लगी कि दरवाज़ा कौन खटखटा रहा है।
उसके अनुसार ऐसा एक ही व्यक्ति था जो टैक्सी मालिक द्वारा काम पर जाने के लिए उसे बुलाने भेजा जाता था।
अरमान ने थोड़ा खिन्न भाव से दरवाज़ा खोला और इससे पहले कि खुन्नस में उसके मुख से कोई अपशब्द निकलता उसकी नज़र बाहर खड़ी प्रिया और साक्षी पर पड़ी।
उन दोनों को देखते ही उसने फ़ौरन अपने होठ भींच लिए।
उधर उसकी अस्त व्यस्त हालत देख साक्षी पर तो ज़्यादा कोई फ़र्क नहीं पड़ा लेकिन प्रिया हैरानी से उसे देखने लगी।
एक तो अभी वो नींद से जागा था इस लिए उसका अस्त व्यस्त रहना स्वाभाविक ही था किंतु वो थोड़ा अजीब दिखता भी था।
बिल्कुल फ़क़ीरों जैसा।
चेहरे पर बढ़ी हुई बड़ी बड़ी दाढ़ी मूंछें।
सिर पर लम्बे किन्तु उलझे हुए बाल।
विशाल और साक्षी लाखों बार उससे कह चुके थे कि थोड़ा तो वो अपना ख़याल रखा करे लेकिन उस पर उनकी बातों का कोई असर ही नहीं होता था।
उसके बारे में कौन क्या सोचता है इस बात से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था।
"तुम हमेशा ऐसी हालत में ही क्यों दिखते हो हमें?" प्रिया तो उसे देख हैरान थी इस लिए साक्षी ने ही कमान सम्हालते हुए उससे कहा──"कॉलेज के दिनों में कितने हैंडसम दिखते थे तुम और आज देखो, कितनी अजीब सी हालत बना ली है तुमने।"
"जब हैंडसम दिखता था तब कौन सा किसी ने अपना लिया था मुझे?" अरमान ने प्रिया पर एक नज़र डालने के बाद फीकी सी मुस्कान सजा कर कहा──"टूट कर जिसकी इबादत की उसने भी मेरे हैंडसम होने का कोई मान नहीं रखा।"
अरमान की बातें यकीनन प्रिया से ही संबंधित थीं।
साक्षी अच्छी तरह जानती थी ये बात।
उसने कुछ कहा नहीं बस कनखियों से प्रिया की तरफ देखा।
प्रिया के चेहरे पर बेहद ही संजीदा भाव नुमायां हो उठे।
चेहरे पर थोड़ी पीड़ा और थोड़े पश्चाताप के भी भाव नज़र आए।
अरमान की बात सुनते ही उसकी नज़रें झुक गईं।
"ख़ैर, आज सुबह सुबह दिन के समय मेरे घर के बाहर दो दो खूबसूरत चांद कैसे प्रगट हो गए?" अरमान ने विषय को बदल कर साक्षी से पूछा।
"तुमने मुझे भी खूबसूरत चांद कहा?" साक्षी ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा──"ओह! थैंक यू सो मच अरमान लेकिन अफ़सोस मैं किसी और की अमानत हूं।"
"तुम अच्छी तरह जानती हो कि इस दुनिया में मुझे सिर्फ एक ही शख़्स की आरज़ू है।" अरमान ने कहा──"उसके बदले ऊपर वाला तीनों लोकों का साम्राज्य भी मुझे देने आए तो मैं उस साम्राज्य को ठोकर मार दूंगा।"
"काश! इतनी शिद्दत से कोई मुझसे भी मोहब्बत करता।" साक्षी ने मुस्कुराते हुए जैसे आह भरी। फिर उसने प्रिया से मुखातिब हो कर कहा──"अरमान अगर इतनी मोहब्बत मुझसे करता तो क़सम से कहती हूं इसी वक्त अपने निठल्ले हसबैंड को तलाक़ दे कर अरमान से शादी कर लेती और एक तू है जो ऐसे इंसान से भाग रही है जो तुझे इतना प्यार करता है। हे भगवान! आख़िर ये किस मिट्टी की बनी हुई है?"
"तू न ज़्यादा बकवास न कर।" प्रिया ने धीमे से उसे डांटा──"तू अच्छी तरह जानती है कि मैं अपने मन में ऐसा करने का सोच भी नहीं सकती।"
"हां तू तो इस कलियुग की सबसे बड़ी पतिव्रता नारी है।" साक्षी ने बुरा सा मुंह बनाया──"अब ये बता कि यहीं पर खड़े खड़े तू अरमान को शुक्रिया कहेगी या घर के अंदर जा कर उसे बोलेगी?"
"तुम दोनों क्या खुसुर फुसुर कर रही हो?" अरमान ने दोनों को बारी बारी से देखते हुए पूछा──"अगर मुझसे कोई काम है तो बोलो वरना बेकार में मेरा समय बर्बाद मत करो। मुझे अभी सोने का सबसे बड़ा काम करना है।"
"अरे! हां वो बात ये है अरमान कि प्रिया तुमसे कुछ कहना चाहती है।" साक्षी ने झट से ये कहा तो प्रिया एकदम से चौंक कर उसकी तरफ देखने लगी।
"अच्छा, ऐसी बात है क्या?" अरमान ने प्रिया की तरफ देखा──"फिर तो मैं सबसे पहले अपने दोनों कानों को साफ कर लेता हूं। वो क्या है ना कि काफी लंबे समय से मैंने इनकी सफाई नहीं की है। प्रिया मुझसे जो कहना चाहती है वो अगर मेरे कान ठीक से सुन नहीं पाएंगे तो इससे प्रिया के द्वारा कहे गए शब्दों की तौहीन हो जाएगी। रुको, मैं अभी अपने कानों को साफ कर के आता हूं।"
अरमान जब पलट कर सचमुच अंदर की तरफ जाने लगा तो साक्षी के साथ साथ प्रिया भी बुरी तरह चौंक पड़ी।
प्रिया तो उसकी बातें सुन कर ही संजीदा हो गई थी।
अरमान के सच्चे प्रेम को उसने अच्छी तरह महसूस किया था।
अरमान का सामना करने में अब उसे ये सोच कर डर लगने लगा था कि अगर वो जज़्बातों में बह गई तो गज़ब हो जाएगा।
अरमान की हालत देख कर ही उसे ये एहसास सताने लगता था कि उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वही है।
"अरे! रुको अरमान रुको।" प्रिया की हालत को समझते हुए साक्षी ने ही कमान सम्हाली और फ़ौरन ही अरमान को रोका──"तुम भी ना, ग़ज़ब ही इंसान हो।"
अरमान वापस पलटा।
उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए थे जैसे उसे अपने कान साफ करने जाने से रोक कर साक्षी ने उस पर बहुत बड़ा अत्याचार कर दिया है।
साक्षी ये तो जानती थी कि अरमान ये सब अपने प्लान के तहत ही कर रहा है लेकिन वो ये भी जानती थी कि प्रिया के प्रति उसकी चाहत बिल्कुल भी झूठी नहीं है।
"अब यूं मुंह बना के मत खड़े रहो तुम।" फिर उसने अरमान को घूरते हुए कहा──"चलो अंदर। प्रिया तुमसे यहां थोड़े ना अपनी बात कहेगी।"
"ओह! ऐसा है क्या?" अरमान ने मूर्खों की तरह अपनी पलकें झपकाई──"ठीक है फिर, चलो आओ अंदर।"
साक्षी और प्रिया आगे पीछे अंदर दाख़िल हो गईं तो अरमान ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
"तुम्हारा सच में कुछ नहीं हो सकता।" अंदर की हालत देखते ही साक्षी ने अरमान से कहा──"पता नहीं कैसे इंसान हो तुम जो यहां ऐसी ख़राब हालत में रह लेते हो।"
"जिसे किसी बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता उसके लिए रहने वाली जगह कैसी है ये मायने नहीं रखता।" अरमान ने कहा──"मैं तो इस दीन दुनिया से विरक्त एक फ़कीर आदमी हूं। मुझे किसी भी चीज़ की चाहत नहीं है। काश! ये चाहत भी मिट जाती जो मेरे दिल में प्रिया को बेपनाह मोहब्बत करने के रूप में मौजूद है।"
उसकी ये बात सुन कर प्रिया एक बार फिर से अंदर तक कांप गई।
उसके दिल में मचलते जज़्बात शांत होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
वो अपने आपको सम्हाले रखने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी।
उसका जी चाह रहा था कि कितना जल्दी वो अरमान से दूर चली जाए।
उसे महसूस होने लगा था कि अगर थोड़ी देर और उसने अरमान की ये अजीब और दर्द भरी बातें सुनी तो वो टूट जाएगी।
इतना ही नहीं उसका दिल कहीं उसे अरमान के सीने से लिपट जाने के लिए पूरी ताक़त से उसकी तरफ ढकेल ना दे।
उसकी आंखों में बार बार आंसू तैरने लगते थे।
"अच्छा अब ये बातें छोड़ो।" साक्षी को भी बड़ा अजीब महसूस होने लगा था इस लिए उसने विषय बदलने की गरज से पूछा──"और ये बताओ कि फ्रेश हुए या सचमुच हमारे आने पर ही सो कर जागे हो?"
"हां, जागा तो अभी ही हूं।" अरमान ने सामान्य भाव से कहा──"असल में नींद तो सुबह एक बार खुली थी लेकिन आज कहीं जाने का मन नहीं किया तो फिर से सो गया।"
"ओह!" साक्षी ने कहा──"वैसे आते समय मैं प्रिया से कह भी रही थी कि अगर तुम दिन में टैक्सी चलाने जाते होगे तो शायद ही घर में तुमसे मुलाक़ात हो पाएगी। फिर ये सोच कर चले आए कि एक बार घर जा कर देख ही लेते हैं। शुक्र है तुम घर पर ही थे। ख़ैर, जाओ पहले तुम फ्रेश हो लो। तब तक हम दोनों बैठे हैं और हां आज हमारे लिए कुछ लाने की जहमत मत उठाना।"
अरमान ने सिर हिलाया और घर के पीछे की तरफ खुलने वाले दरवाज़े को खोल बाहर निकल गया।
असल में अरमान का घर बहुत पुराना था।
आज के समय के अनुसार घर के अंदर टॉयलेट अथवा बाथरूम वाली सुविधा नहीं थी बल्कि घर के पीछे जो थोड़ी सी जगह थी वहीं किनारे पर टॉयलेट बना हुआ था।
नहाने के लिए उसी से जुड़ा हुआ एक बाथरूम था।
पानी के लिए एक हैंडपंप था जो पुराने समय का था लेकिन उसमें से पानी आज भी पर्याप्त मात्रा में निकलता था।
बहरहाल, अरमान क़रीब आधे घंटे में फ्रेश हो कर तथा नहा धो कर आया।
नहा कर आने की वजह से वो ऊपर से बेलिबास ही था।
प्रिया और साक्षी के सामने ऐसे रूप में आने पर भी उसे शर्म नहीं आई।
वैसे शर्म लगने जैसी बात उस पर लागू भी नहीं होती थी क्योंकि उसे किसी बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता था।
साक्षी ने तो उसे इस रूप में पहले भी देखा था जब उसका हसबैंड विशाल उसे जबरन अपने घर ले जाता और उसे फ्रेश होने को कहता।
मगर प्रिया उसे इस रूप में पहली बार देख रही थी।
साढ़े सात साल पहले भी उसने अरमान को इस तरह ऊपर से बेलिबास नहीं देखा था।
प्रिया झिझकते हुए बार बार उसे चोर नज़रों से देखने लगती।
अरमान बाहर से भले ही फ़क़ीरों की तरह दिखता था लेकिन कुदरती तौर पर वो आज भी अंदर से अच्छा खासा दिखता था।
चौड़ी छाती पर घने घुंघराले बाल जो उसके पेट और नाभी के आस पास वाले क्षेत्र को घेरे हुए नीचे तरफ फैलते चले गए थे।
मजबूत कंधे और बलिष्ठ भुजाएं उसके मर्द होने का सबूत दे रहीं थी।
गले से ऊपर की तरफ चेहरे में बढ़ी हुई दाढ़ी मूंछें और सिर पर उलझे हुए बाल।
प्रिया बार बार चोर नज़रों से उसके जिस्म का अवलोकन करने लगती थी।
एकाएक वो चौंक पड़ी।
उसकी चोर नजरें अरमान के बाएं सीने पर एकदम दिल के पास जम सी गईं।
घुंघराले बालों की वजह से शायद पहले उसे दिखा नहीं था या फिर उसने ध्यान से देखा नहीं था लेकिन जब दुबारा उसकी नज़रें उसके सीने की तरफ गईं तो सहसा उसे ऐसा लगा जैसे उसके दिल वाले हिस्से पर कुछ लिखा हुआ है।
प्रिया ने अपनी झिझक को परे रख कर इस बार बड़े ध्यान से देखा।
अगले ही पल वो ये देख कर स्तब्ध सी रह गई कि अरमान ने अपने बाएं सीने पर उसका नाम गुदवा रखा है।
अंग्रेजी के अक्षरों में गुदा हुआ था──Priya।
ये देख प्रिया के अंदर एकदम से भूचाल सा आ गया।
एक बार पुनः वो ये सोच कर आहत सी हो गई कि उसके जैसी बेवफ़ा लड़की का नाम अरमान ने अपने सीने पर लिख रखा है।
ये उसके प्रेम का सबूत भी था और उसकी चाहत की पराकाष्ठा भी।
प्रिया को लगा उसे चक्कर आ जाएगा।
बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला।
उसके दिल की धड़कनें किसी हथौड़े की मानिंद उसकी कनपटियों पर बरसने लगीं थी।
उसका हृदय हाहाकार सा कर उठा था।
सहसा उसे अपने अंदर से एक आवाज़ सुनाई दी──"ऐसे इंसान को ठुकराने के बाद आख़िर ऐसी कौन सी खुशी और ऐसा कौन सा ऐशो आराम हासिल किया है तूने प्रिया?"
"अरे! तुझे क्या हुआ?" साक्षी की नज़र अचानक प्रिया पर पड़ी तो वो उसकी दशा देख चौंक पड़ी थी।
"क...कुछ नहीं" प्रिया उसके यूं अचानक पूछ लेने पर बुरी तरह बौखला गई। बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और फिर कहा──"म...मैं ठीक हूं।"
साक्षी ने उसे बड़े ध्यान से देखा।
प्रिया उसके यूं देखने पर बेचैन सी हो गई।
उसके चेहरे पर परेशानी और घबराहट के चलते पसीना उभर आया।
वो साक्षी से नज़रें न मिला सकी।
इधर साक्षी उसकी हालत से ज़रा भी बेख़बर नहीं थी।
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि इस वक्त प्रिया किस हालत से गुज़र रही है।
दूसरी तरफ अरमान कुछ ही दूरी पर कपड़े पहन रहा था।
उसने नहाने के बाद अपने बदन पर ना तो तेल वगैरह लगाया था और ना ही बालों पर कंघी की थी।
अपने जिस्म पर उन्हीं कपड़ों को पहन लिया जो उसने नहाने से पहले पहन रखे थे।
साक्षी उसकी इस आदत से परिचित भी थी और नाखुश भी लेकिन प्रिया को ये बहुत अजीब लगा और पीड़ा देने वाला भी।
उसके लिए सबसे बड़े दुख की बात ये थी कि वो खुद अरमान के लिए कुछ कर नहीं सकती थी।
हालाकि उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने के लिए उसका दिल उसे ज़ोर दिए जा रहा था मगर वो अपने जज़्बातों को दबाए हुए थी।
"लो साक्षी।" अरमान दोनों के सामने आ कर बोला──"तुम्हारे कहे अनुसार मैं फ्रेश हो गया। अब बताओ, तुम्हारी दोस्त क्या कहना चाहती है मुझसे?"
अरमान की ये बात सुन साक्षी के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई।
उधर प्रिया की धड़कनें बढ़ गईं।
उसे अरमान को शुक्रिया कहना मानों दुनिया का सबसे मुश्किल काम महसूस होने लगा।
शर्म, झिझक, परेशानी, घबराहट और बेचैनी ने जैसे उसे चारो तरफ से घेर लिया।
अरमान के सामने उसकी ऐसी हालत पहले कभी न हुई थी।
उल्टा वो ही अरमान पर हावी रहती थी और अरमान उससे अपनी बात कहने के लिए झिझकता था मगर आज वक्त और हालात दोनों ही अलग और विपरीत थे।
"बोलो प्रिया।" उसे असमंजस में पड़ा देख साक्षी ने कहा──"तुम अरमान से जो कहने यहां आई हो कह दो। फिर हमें चलना भी है। अरमान को भी काम पर जाना होगा।"
साक्षी की बात सुन कर प्रिया बेहद बेचैन नज़र आने लगी।
झिझक और घबराहट में इज़ाफा हो गया।
बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और पहले साक्षी की तरफ देखा फिर चेहरा ऊपर कर के अरमान को।
अरमान अपलक उसी को देखे जा रहा था।
उसकी अपनी धड़कनें भी ये सोच कर बढ़ चलीं थी कि जाने क्या कहने वाली है प्रिया उससे?
सहसा वो मन ही मन ये दुआ करने लगा कि प्रिया उससे वही कहे जो वो चाहता है।
"क्या हुआ कहो ना।" प्रिया को बेचैन भाव से अपलक अरमान को देखते देख साक्षी ने जैसे उस पर ज़ोर डाला।
"अ...अरमान म...मैं तुमसे।" प्रिया ने अपनी धाड़ धाड़ बजती धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए किंतु अटकते हुए स्वर में कहना शुरू किया। उधर अरमान की धड़कनें उसकी आवाज़ सुन मानों थम सी गईं। तभी प्रिया ने हिम्मत जुटाते हुए जैसे अपनी बात पूरी की──"म...मैं तुमसे ये कहना चाहती हूं कि तुमने मेरे प...पति की जान बचा कर मुझ पर जो उ...उपकार किया है उसके लिए तुम्हारा ब...बहुत बहुत श...शुक्रिया। म...मैं जीवन भर तुम्हारा ये उपकार नहीं भू...भूलूंगी।"
इतना कह कर प्रिया ने अपनी आंखें बंद कर ली और राहत की लंबी लंबी सांसें लेने लगी।
उसे ऐसा लगा जैसे इतना कह कर उसने बहुत बड़ी जंग फतह कर ली है।
उधर अरमान ने उसकी ये बात सुनते ही एक गहरी सांस ली।
पलक झपकते ही उसके अरमानों पर जैसे पानी फिर गया था।
कहां अचानक से इतने सालों बाद उसका मन मयूर एक खुशी का एहसास करने वाला था किन्तु अगले ही पल उसे मिलने वाली खुशी पर मानों गृहण लग गया था।
वो निराश भाव से अपलक उस प्रिया को देखे जा रहा था जो अपनी आंखें बंद किए अभी भी राहत की सांसें लेने में खोई थी।
अरमान ने पुनः एक गहरी सांस ली।
जाने क्या सोच कर उसके होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई।
इधर साक्षी की नज़रें अरमान पर ही टिकी हुईं थी।
वो भी समझ रही थी कि अरमान ने प्रिया से क्या सुनने की उम्मीद कर रखी थी।
उसे अरमान के लिए इस वक्त बहुत बुरा महसूस हो रहा था लेकिन कर भी क्या सकती थी वो।
"कमाल है।"
तभी अरमान की आवाज़ से उसके साथ साथ प्रिया का भी ध्यान उसकी तरफ गया तो उसने आंखें खोल कर तथा धड़कते दिल से अरमान की तरफ देखा।
उधर अरमान ने आगे कहा──"तो तुम इसे मेरा उपकार समझती हो? अरे! मुझे तो पता भी नहीं था कि जो आदमी एक्सीडेंट होने की वजह से लहू लुहान था और मौत के मुंह में फंसा हुआ था वो तुम्हारा पति है। मैंने तो इंसानियत के तौर पर उसकी जान बचाने के लिए बस अपना कर्म किया था। वैसे उस समय अगर मुझे ये पता भी होता तब भी मैं तुम्हारे पति की जान बचाने के लिए यही करता। मेरे अंदर लेश मात्र भी ये ख़याल न आता कि जो व्यक्ति मेरी मोहब्बत का पति है उसे बचाने का कोई प्रयास ना करूं अथवा अगर वो बच जाने वाला हो तो उसे जान बूझ के मार दूं। मेरा दिल तुम्हारी तरह पत्थर का नहीं है जो किसी पर दया भी न कर सके।"
उसकी बात सुन कर प्रिया की आंखें ये सोच कर भर आईं कि उसने उसी के सामने ऐसा कह कर मानो उसकी हक़ीक़त बता दी है।
"आश्चर्य की बात है।" उधर अरमान उसे अपलक देखते हुए पुनः बोला──"महज शुक्रिया कहने के लिए तुम इतना झिझक रही थी? इसका तो यही मतलब हुआ कि तुम आज भी मुझे कोई महत्व नहीं देती वरना तुम्हारे लिए जितना बड़ा काम मैंने किया है तुम्हारी जगह कोई और होता तो उसके लिए खुशी खुशी मेरे क़दमों में लोट कर लाखों बार मुझे शुक्रिया कहता। ख़ैर कोई बात नहीं। वैसे भी मुझे तुम्हारे शुक्रिया की ज़रूरत नहीं है और ना ही मुझे किसी के द्वारा शुक्रिया कहलवाने की हसरत है।"
"ऐसा मत कहो प्लीज़।" प्रिया का सब्र जैसे जवाब दे गया। उसकी रुलाई फूट गई। बुरी तरह सिसकते हुए बोली──"और कितना मेरी ग़लती के लिए मुझे जलील करोगे? मुझे एहसास हो चुका है कि मैंने तुम्हारे साथ बिल्कुल भी अच्छा नहीं किया था। आज तुम्हारी जो हालत है उसकी ज़िम्मेदार मैं ही हूं। मेरा यकीन करो अरमान, मैं अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हूं। मेरे बस में ही नहीं है वरना तुम्हारे लिए बहुत कुछ कर जाती। प्लीज़ माफ़ कर दो मुझे और...और मेरी वजह से खुद को यूं बरबाद मत करो। किसी अच्छी लड़की से शादी कर के अपना घर बसा लो।"
"इस दुनिया में ऐसी कोई दूसरी लड़की जन्मी ही नहीं है डियर।" अरमान ने फीकी मुस्कान के साथ कहा──"जिसे मैं मोहब्बत की नज़र से देख सकूं और जिसके साथ अपना घर बसाने का सोचूं। मेरा घर बसेगा तो सिर्फ तुम्हारे साथ वरना मरते दम तक यूं ही तुम्हारी यादों के सहारे जीता रहूंगा।"
"नहीं...नहीं प्लीज़।" प्रिया आहत भाव से मानो चीख पड़ी──"ऐसी ज़िद मत करो जो कभी पूरी ही नहीं हो सकती। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं किसी और की पत्नी हूं। मैं अपने पति को छोड़ कर तुम्हारे पास वापस नहीं आ सकती। और....और वैसे भी तुम एक ऐसी औरत के साथ घर बसाने की ज़िद क्यों किए बैठे हो जिसने तुम्हें और तुम्हारी सच्ची मोहब्बत को ठोकर मार दी हो? तुम्हें तो ऐसी औरत से सिर्फ और सिर्फ नफ़रत करनी चाहिए।"
"सच्ची मोहब्बत करने वाला दिल चाह कर भी अपनी दिलरुबा से नफ़रत नहीं कर सकता प्रिया।" अरमान ने अधीरता से कहा──"वो तो बस मोहब्बत ही करता है। हर हाल में, हर कीमत पर।"
प्रिया की आंखें पुनः छलक पड़ीं।
इस वक्त उसका चेहरा अथाह पीड़ा से भरा हुआ था।
उसके आंसू गिर कर फर्श में फ़ना हो रहे थे।
इधर साक्षी दोनों के मध्य चल रही बातों को मूक दर्शक की तरह देख और सुन रही थी।
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि दोनों में से किसे क्या बोले?
"मत करो ना ऐसा।" प्रिया आहत सी हो कर बोल पड़ी──"क्यों मुझे धर्म संकट में डालने पर तुले हुए हो? क्यों मुझे इतना सता रहे हो? क्या यही है तुम्हारी मोहब्बत? क्या मोहब्बत करने वाले ऐसे ही अपने साथी को सताते हैं और दुखी करते हैं?"
"लो, कर लो बात।" अरमान अजीब भाव से हंस पड़ा, फिर बोला──"अब तुम मुझे बताओगी कि कैसे होते हैं मोहब्बत करने वाले? ये तो वही बात हो गई कि नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने चली। छोड़ो प्रिया, मोहब्बत जैसे लफ़्ज़ तुम्हारी ज़ुबान में अच्छे नहीं लगते। वैसे भी, तुम पर तो सिर्फ एक ही बात शूट करती है और वो है अपनी ख़्वाहिश को पूरा करने के लिए अपने ही चाहने वाले को बेदर्दी से ठुकरा कर चले जाना।"
"अरमान प्लीज़।" सहसा साक्षी ने बीच में हस्ताक्षेप किया।
उसे ये डर सताने लगा था कि अरमान की कड़वी बातें सुन कर प्रिया कहीं इस क़दर न आहत हो जाए कि वो कोई ग़लत क़दम उठा ले। इस लिए अरमान से बोली──"ये तुम ठीक नहीं कर रहे हो। माना कि प्रिया ने सिर्फ अपने बारे में सोचा था और उसने तुम्हारे प्रेम को ठुकरा दिया था लेकिन उसके लिए तुम बार बार उसे उसकी ग़लती का एहसास करा कर यूं दुखी नहीं कर सकते।"
"ओह! सॉरी।" अरमान तपाक से बोल पड़ा──"आई एम वेरी वेरी सॉरी। तुमने बिल्कुल सही कहा। मुझे प्रिया को यूं दुखी करने का कोई अधिकार नहीं है।" कहने के साथ ही वो एकदम प्रिया की तरफ मुड़ा, फिर उससे बोला──"मैं तुमसे हाथ जोड़ कर अपनी इस ग़लती के लिए माफ़ी मांगता हूं प्रिया। मुझे आभास ही नहीं हो पाया था कि जज़्बातों में मैं किस क़दर बहता चला गया हूं। वो क्या है ना वर्षों से दिल में जाने कैसा कैसा गुबार दबा हुआ पड़ा था जो बेध्यानी में बाहर आ गया। प्लीज, इसके लिए माफ़ कर दो मुझे।"
"बस करो।" प्रिया की एक बार फिर रुलाई फूट गई──"मुझमें अब और कुछ भी सुनने की हिम्मत नहीं है। मेरी तुमसे एक ही विनती है कि अपने आपको यूं बर्बाद मत करो। मेरा ख़याल अपने ज़हन से निकाल कर किसी के साथ अपना घर बसा लो।"
"यार साक्षी।" अरमान साक्षी से मुखातिब हुआ──"अपनी इस दोस्त को भी तो समझाओ कि एक ही बात बार बार न बोले। मैं बता चुका हूं कि इस दुनिया में ऐसी कोई दूसरी लड़की जन्मी ही नहीं है जिसके साथ मुझे प्रेम हो सके और मैं उसके साथ अपना घर बसाने का सोचूं। मेरा घर सिर्फ और सिर्फ इसके साथ ही बसेगा वरना नहीं। अगर तुम्हारी दोस्त को मेरा घर बसाने की इतनी ही चिंता है तो कहो इससे कि अपने हसबैंड को तलाक़ दे कर मुझसे शादी करे।"
"मैं किसी को क्या बोलूं अरमान?" साक्षी जैसे खुद ही धर्म संकट में फंस गई थी──"तुम ही उसकी विवशता को समझो। एक औरत के लिए इतना आसान नहीं होता बिना किसी वजह के अपने पति को तलाक़ दे कर किसी और से शादी कर लेना।"
"तो फिर इससे कहो कि जैसे अब तक मैं इसकी यादों के सहारे जीता आया हूं।" अरमान ने कहा──"उसी तरह बाकी का जीवन भी गुज़ार लूंगा। मेरा दिल उसी को अपना बनाएगा जिसे वो प्यार करता है। बाकी किसी की चाहत नहीं है उसे।"
To be continued...
Single line review: Ek ne Aashiqui ki to dusre ne Dillagi kiUpdate ~ 14
अरमान आज कल दिन में टैक्सी चला रहा था। हालाकि उसका कोई नियम नहीं था। टैक्सी दिन में चलाना है या रात में ये उसके मूड पर निर्भर था। कभी कभी तो वो दो दो तीन तीन दिनों तक घर में ही पड़ा रहता था। जब टैक्सी मालिक किसी को उसके पास भेजता तब जा कर वो सोचता कि चलो पेट का खर्चा निकालने के लिए कुछ काम कर लिया जाए।
बहरहाल, आज सुबह जब वो सो कर उठा तो सुबह से ही उसका कहीं जाने का मूड नहीं था। एक बार उसने सोचा भी कि अकेला घर में वो कब तक खाली पड़ा रहेगा लेकिन फिर अगले ही पल उसका मूड बदल गया।
उसने निश्चय कर लिया कि आज कहीं नहीं जाएगा और फिर से वो अस्त व्यस्त से नज़र आ रहे पुराने से बेड पर सो गया।
यही उसका रवैया था और यही उसका रूटीन था।
उसे अपनी शख्सियत का लेश मात्र भी ख़याल नहीं था और ना ही कभी वो ये सोचता था कि ऐसा कब तक चलेगा?
पिछले साढ़े सात सालों में उसके अंदर सिर्फ एक ही बदलाव दिख रहा था और वो ये था कि प्रिया के प्रति उसके ख़यालात कुछ बदल से गए थे।
पहले जहां वो सिर्फ प्रिया की यादों के सहारे खुद को बहुत ही मामूली सा बनाए किसी तरह जी रहा था वहीं अब उसके अंदर एक अजीब सी ज़िद पैदा हो गई थी।
पहले उसने प्रिया को हासिल करने का कभी सोचा तक नहीं था लेकिन डेढ़ महीना पहले जब उसने इतने सालों बाद प्रिया को किसी जिन्न की तरह अचानक से अपने सामने प्रगट हो गया देखा और जब प्रिया ने अपनी बातों से उसके ज़ख्मों को कुरेद सा दिया तो जाने क्यों प्रिया के प्रति उसके जज़्बात बदल गए।
उसके अंदर एक ज़िद बैठ गई कि अब वो प्रिया को हर कीमत पर हासिल कर के रहेगा।
इतना ही नहीं उसे इस बात का एहसास भी कराएगा कि किसी के द्वारा ठुकरा दिए जाने पर एक इंसान कैसे अकेला घुट घुट के जीता है?
उस वक्त दिन के क़रीब ग्यारह बजे थे जब अचानक ही उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके घर का दरवाज़ा खटखटाया है।
वो नींद में था इस लिए थोड़ा हिला तो ज़रूर लेकिन उठा नहीं।
कुछ पलों बाद दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ फिर से उसे अपने कानों में सुनाई दी।
इस बार उसकी चेतना मानों अज्ञात लोक से वापस आई और उसकी आंख खुल गई।
तभी दरवाज़ा फिर से खटखटाया गया।
अब उसे स्पष्ट समझ आ गया कि बाहर कोई आया है।
अतः बेमन से वो बेड से नीचे उतरा।
जिस्म पर सिर्फ एक कच्छा था।
उसने आनन फानन में बेड के नीचे पड़ी एक टी शर्ट को पहना और नीचे लूंगी लपेट कर बाहर की तरफ बढ़ चला।
अभी वो दरवाज़े के पास पहुंचा ही था कि दरवाज़ा फिर से खटखटाया गया।
अब तक वो पूरी तरह नींद की खुमारी से बाहर आ चुका था इस लिए उसे ये समझते देर न लगी कि दरवाज़ा कौन खटखटा रहा है।
उसके अनुसार ऐसा एक ही व्यक्ति था जो टैक्सी मालिक द्वारा काम पर जाने के लिए उसे बुलाने भेजा जाता था।
अरमान ने थोड़ा खिन्न भाव से दरवाज़ा खोला और इससे पहले कि खुन्नस में उसके मुख से कोई अपशब्द निकलता उसकी नज़र बाहर खड़ी प्रिया और साक्षी पर पड़ी।
उन दोनों को देखते ही उसने फ़ौरन अपने होठ भींच लिए।
उधर उसकी अस्त व्यस्त हालत देख साक्षी पर तो ज़्यादा कोई फ़र्क नहीं पड़ा लेकिन प्रिया हैरानी से उसे देखने लगी।
एक तो अभी वो नींद से जागा था इस लिए उसका अस्त व्यस्त रहना स्वाभाविक ही था किंतु वो थोड़ा अजीब दिखता भी था।
बिल्कुल फ़क़ीरों जैसा।
चेहरे पर बढ़ी हुई बड़ी बड़ी दाढ़ी मूंछें।
सिर पर लम्बे किन्तु उलझे हुए बाल।
विशाल और साक्षी लाखों बार उससे कह चुके थे कि थोड़ा तो वो अपना ख़याल रखा करे लेकिन उस पर उनकी बातों का कोई असर ही नहीं होता था।
उसके बारे में कौन क्या सोचता है इस बात से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था।
"तुम हमेशा ऐसी हालत में ही क्यों दिखते हो हमें?" प्रिया तो उसे देख हैरान थी इस लिए साक्षी ने ही कमान सम्हालते हुए उससे कहा──"कॉलेज के दिनों में कितने हैंडसम दिखते थे तुम और आज देखो, कितनी अजीब सी हालत बना ली है तुमने।"
"जब हैंडसम दिखता था तब कौन सा किसी ने अपना लिया था मुझे?" अरमान ने प्रिया पर एक नज़र डालने के बाद फीकी सी मुस्कान सजा कर कहा──"टूट कर जिसकी इबादत की उसने भी मेरे हैंडसम होने का कोई मान नहीं रखा।"
अरमान की बातें यकीनन प्रिया से ही संबंधित थीं।
साक्षी अच्छी तरह जानती थी ये बात।
उसने कुछ कहा नहीं बस कनखियों से प्रिया की तरफ देखा।
प्रिया के चेहरे पर बेहद ही संजीदा भाव नुमायां हो उठे।
चेहरे पर थोड़ी पीड़ा और थोड़े पश्चाताप के भी भाव नज़र आए।
अरमान की बात सुनते ही उसकी नज़रें झुक गईं।
"ख़ैर, आज सुबह सुबह दिन के समय मेरे घर के बाहर दो दो खूबसूरत चांद कैसे प्रगट हो गए?" अरमान ने विषय को बदल कर साक्षी से पूछा।
"तुमने मुझे भी खूबसूरत चांद कहा?" साक्षी ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा──"ओह! थैंक यू सो मच अरमान लेकिन अफ़सोस मैं किसी और की अमानत हूं।"
"तुम अच्छी तरह जानती हो कि इस दुनिया में मुझे सिर्फ एक ही शख़्स की आरज़ू है।" अरमान ने कहा──"उसके बदले ऊपर वाला तीनों लोकों का साम्राज्य भी मुझे देने आए तो मैं उस साम्राज्य को ठोकर मार दूंगा।"
"काश! इतनी शिद्दत से कोई मुझसे भी मोहब्बत करता।" साक्षी ने मुस्कुराते हुए जैसे आह भरी। फिर उसने प्रिया से मुखातिब हो कर कहा──"अरमान अगर इतनी मोहब्बत मुझसे करता तो क़सम से कहती हूं इसी वक्त अपने निठल्ले हसबैंड को तलाक़ दे कर अरमान से शादी कर लेती और एक तू है जो ऐसे इंसान से भाग रही है जो तुझे इतना प्यार करता है। हे भगवान! आख़िर ये किस मिट्टी की बनी हुई है?"
"तू न ज़्यादा बकवास न कर।" प्रिया ने धीमे से उसे डांटा──"तू अच्छी तरह जानती है कि मैं अपने मन में ऐसा करने का सोच भी नहीं सकती।"
"हां तू तो इस कलियुग की सबसे बड़ी पतिव्रता नारी है।" साक्षी ने बुरा सा मुंह बनाया──"अब ये बता कि यहीं पर खड़े खड़े तू अरमान को शुक्रिया कहेगी या घर के अंदर जा कर उसे बोलेगी?"
"तुम दोनों क्या खुसुर फुसुर कर रही हो?" अरमान ने दोनों को बारी बारी से देखते हुए पूछा──"अगर मुझसे कोई काम है तो बोलो वरना बेकार में मेरा समय बर्बाद मत करो। मुझे अभी सोने का सबसे बड़ा काम करना है।"
"अरे! हां वो बात ये है अरमान कि प्रिया तुमसे कुछ कहना चाहती है।" साक्षी ने झट से ये कहा तो प्रिया एकदम से चौंक कर उसकी तरफ देखने लगी।
"अच्छा, ऐसी बात है क्या?" अरमान ने प्रिया की तरफ देखा──"फिर तो मैं सबसे पहले अपने दोनों कानों को साफ कर लेता हूं। वो क्या है ना कि काफी लंबे समय से मैंने इनकी सफाई नहीं की है। प्रिया मुझसे जो कहना चाहती है वो अगर मेरे कान ठीक से सुन नहीं पाएंगे तो इससे प्रिया के द्वारा कहे गए शब्दों की तौहीन हो जाएगी। रुको, मैं अभी अपने कानों को साफ कर के आता हूं।"
अरमान जब पलट कर सचमुच अंदर की तरफ जाने लगा तो साक्षी के साथ साथ प्रिया भी बुरी तरह चौंक पड़ी।
प्रिया तो उसकी बातें सुन कर ही संजीदा हो गई थी।
अरमान के सच्चे प्रेम को उसने अच्छी तरह महसूस किया था।
अरमान का सामना करने में अब उसे ये सोच कर डर लगने लगा था कि अगर वो जज़्बातों में बह गई तो गज़ब हो जाएगा।
अरमान की हालत देख कर ही उसे ये एहसास सताने लगता था कि उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वही है।
"अरे! रुको अरमान रुको।" प्रिया की हालत को समझते हुए साक्षी ने ही कमान सम्हाली और फ़ौरन ही अरमान को रोका──"तुम भी ना, ग़ज़ब ही इंसान हो।"
अरमान वापस पलटा।
उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए थे जैसे उसे अपने कान साफ करने जाने से रोक कर साक्षी ने उस पर बहुत बड़ा अत्याचार कर दिया है।
साक्षी ये तो जानती थी कि अरमान ये सब अपने प्लान के तहत ही कर रहा है लेकिन वो ये भी जानती थी कि प्रिया के प्रति उसकी चाहत बिल्कुल भी झूठी नहीं है।
"अब यूं मुंह बना के मत खड़े रहो तुम।" फिर उसने अरमान को घूरते हुए कहा──"चलो अंदर। प्रिया तुमसे यहां थोड़े ना अपनी बात कहेगी।"
"ओह! ऐसा है क्या?" अरमान ने मूर्खों की तरह अपनी पलकें झपकाई──"ठीक है फिर, चलो आओ अंदर।"
साक्षी और प्रिया आगे पीछे अंदर दाख़िल हो गईं तो अरमान ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
"तुम्हारा सच में कुछ नहीं हो सकता।" अंदर की हालत देखते ही साक्षी ने अरमान से कहा──"पता नहीं कैसे इंसान हो तुम जो यहां ऐसी ख़राब हालत में रह लेते हो।"
"जिसे किसी बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता उसके लिए रहने वाली जगह कैसी है ये मायने नहीं रखता।" अरमान ने कहा──"मैं तो इस दीन दुनिया से विरक्त एक फ़कीर आदमी हूं। मुझे किसी भी चीज़ की चाहत नहीं है। काश! ये चाहत भी मिट जाती जो मेरे दिल में प्रिया को बेपनाह मोहब्बत करने के रूप में मौजूद है।"
उसकी ये बात सुन कर प्रिया एक बार फिर से अंदर तक कांप गई।
उसके दिल में मचलते जज़्बात शांत होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
वो अपने आपको सम्हाले रखने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी।
उसका जी चाह रहा था कि कितना जल्दी वो अरमान से दूर चली जाए।
उसे महसूस होने लगा था कि अगर थोड़ी देर और उसने अरमान की ये अजीब और दर्द भरी बातें सुनी तो वो टूट जाएगी।
इतना ही नहीं उसका दिल कहीं उसे अरमान के सीने से लिपट जाने के लिए पूरी ताक़त से उसकी तरफ ढकेल ना दे।
उसकी आंखों में बार बार आंसू तैरने लगते थे।
"अच्छा अब ये बातें छोड़ो।" साक्षी को भी बड़ा अजीब महसूस होने लगा था इस लिए उसने विषय बदलने की गरज से पूछा──"और ये बताओ कि फ्रेश हुए या सचमुच हमारे आने पर ही सो कर जागे हो?"
"हां, जागा तो अभी ही हूं।" अरमान ने सामान्य भाव से कहा──"असल में नींद तो सुबह एक बार खुली थी लेकिन आज कहीं जाने का मन नहीं किया तो फिर से सो गया।"
"ओह!" साक्षी ने कहा──"वैसे आते समय मैं प्रिया से कह भी रही थी कि अगर तुम दिन में टैक्सी चलाने जाते होगे तो शायद ही घर में तुमसे मुलाक़ात हो पाएगी। फिर ये सोच कर चले आए कि एक बार घर जा कर देख ही लेते हैं। शुक्र है तुम घर पर ही थे। ख़ैर, जाओ पहले तुम फ्रेश हो लो। तब तक हम दोनों बैठे हैं और हां आज हमारे लिए कुछ लाने की जहमत मत उठाना।"
अरमान ने सिर हिलाया और घर के पीछे की तरफ खुलने वाले दरवाज़े को खोल बाहर निकल गया।
असल में अरमान का घर बहुत पुराना था।
आज के समय के अनुसार घर के अंदर टॉयलेट अथवा बाथरूम वाली सुविधा नहीं थी बल्कि घर के पीछे जो थोड़ी सी जगह थी वहीं किनारे पर टॉयलेट बना हुआ था।
नहाने के लिए उसी से जुड़ा हुआ एक बाथरूम था।
पानी के लिए एक हैंडपंप था जो पुराने समय का था लेकिन उसमें से पानी आज भी पर्याप्त मात्रा में निकलता था।
बहरहाल, अरमान क़रीब आधे घंटे में फ्रेश हो कर तथा नहा धो कर आया।
नहा कर आने की वजह से वो ऊपर से बेलिबास ही था।
प्रिया और साक्षी के सामने ऐसे रूप में आने पर भी उसे शर्म नहीं आई।
वैसे शर्म लगने जैसी बात उस पर लागू भी नहीं होती थी क्योंकि उसे किसी बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता था।
साक्षी ने तो उसे इस रूप में पहले भी देखा था जब उसका हसबैंड विशाल उसे जबरन अपने घर ले जाता और उसे फ्रेश होने को कहता।
मगर प्रिया उसे इस रूप में पहली बार देख रही थी।
साढ़े सात साल पहले भी उसने अरमान को इस तरह ऊपर से बेलिबास नहीं देखा था।
प्रिया झिझकते हुए बार बार उसे चोर नज़रों से देखने लगती।
अरमान बाहर से भले ही फ़क़ीरों की तरह दिखता था लेकिन कुदरती तौर पर वो आज भी अंदर से अच्छा खासा दिखता था।
चौड़ी छाती पर घने घुंघराले बाल जो उसके पेट और नाभी के आस पास वाले क्षेत्र को घेरे हुए नीचे तरफ फैलते चले गए थे।
मजबूत कंधे और बलिष्ठ भुजाएं उसके मर्द होने का सबूत दे रहीं थी।
गले से ऊपर की तरफ चेहरे में बढ़ी हुई दाढ़ी मूंछें और सिर पर उलझे हुए बाल।
प्रिया बार बार चोर नज़रों से उसके जिस्म का अवलोकन करने लगती थी।
एकाएक वो चौंक पड़ी।
उसकी चोर नजरें अरमान के बाएं सीने पर एकदम दिल के पास जम सी गईं।
घुंघराले बालों की वजह से शायद पहले उसे दिखा नहीं था या फिर उसने ध्यान से देखा नहीं था लेकिन जब दुबारा उसकी नज़रें उसके सीने की तरफ गईं तो सहसा उसे ऐसा लगा जैसे उसके दिल वाले हिस्से पर कुछ लिखा हुआ है।
प्रिया ने अपनी झिझक को परे रख कर इस बार बड़े ध्यान से देखा।
अगले ही पल वो ये देख कर स्तब्ध सी रह गई कि अरमान ने अपने बाएं सीने पर उसका नाम गुदवा रखा है।
अंग्रेजी के अक्षरों में गुदा हुआ था──Priya।
ये देख प्रिया के अंदर एकदम से भूचाल सा आ गया।
एक बार पुनः वो ये सोच कर आहत सी हो गई कि उसके जैसी बेवफ़ा लड़की का नाम अरमान ने अपने सीने पर लिख रखा है।
ये उसके प्रेम का सबूत भी था और उसकी चाहत की पराकाष्ठा भी।
प्रिया को लगा उसे चक्कर आ जाएगा।
बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला।
उसके दिल की धड़कनें किसी हथौड़े की मानिंद उसकी कनपटियों पर बरसने लगीं थी।
उसका हृदय हाहाकार सा कर उठा था।
सहसा उसे अपने अंदर से एक आवाज़ सुनाई दी──"ऐसे इंसान को ठुकराने के बाद आख़िर ऐसी कौन सी खुशी और ऐसा कौन सा ऐशो आराम हासिल किया है तूने प्रिया?"
"अरे! तुझे क्या हुआ?" साक्षी की नज़र अचानक प्रिया पर पड़ी तो वो उसकी दशा देख चौंक पड़ी थी।
"क...कुछ नहीं" प्रिया उसके यूं अचानक पूछ लेने पर बुरी तरह बौखला गई। बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और फिर कहा──"म...मैं ठीक हूं।"
साक्षी ने उसे बड़े ध्यान से देखा।
प्रिया उसके यूं देखने पर बेचैन सी हो गई।
उसके चेहरे पर परेशानी और घबराहट के चलते पसीना उभर आया।
वो साक्षी से नज़रें न मिला सकी।
इधर साक्षी उसकी हालत से ज़रा भी बेख़बर नहीं थी।
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि इस वक्त प्रिया किस हालत से गुज़र रही है।
दूसरी तरफ अरमान कुछ ही दूरी पर कपड़े पहन रहा था।
उसने नहाने के बाद अपने बदन पर ना तो तेल वगैरह लगाया था और ना ही बालों पर कंघी की थी।
अपने जिस्म पर उन्हीं कपड़ों को पहन लिया जो उसने नहाने से पहले पहन रखे थे।
साक्षी उसकी इस आदत से परिचित भी थी और नाखुश भी लेकिन प्रिया को ये बहुत अजीब लगा और पीड़ा देने वाला भी।
उसके लिए सबसे बड़े दुख की बात ये थी कि वो खुद अरमान के लिए कुछ कर नहीं सकती थी।
हालाकि उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने के लिए उसका दिल उसे ज़ोर दिए जा रहा था मगर वो अपने जज़्बातों को दबाए हुए थी।
"लो साक्षी।" अरमान दोनों के सामने आ कर बोला──"तुम्हारे कहे अनुसार मैं फ्रेश हो गया। अब बताओ, तुम्हारी दोस्त क्या कहना चाहती है मुझसे?"
अरमान की ये बात सुन साक्षी के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई।
उधर प्रिया की धड़कनें बढ़ गईं।
उसे अरमान को शुक्रिया कहना मानों दुनिया का सबसे मुश्किल काम महसूस होने लगा।
शर्म, झिझक, परेशानी, घबराहट और बेचैनी ने जैसे उसे चारो तरफ से घेर लिया।
अरमान के सामने उसकी ऐसी हालत पहले कभी न हुई थी।
उल्टा वो ही अरमान पर हावी रहती थी और अरमान उससे अपनी बात कहने के लिए झिझकता था मगर आज वक्त और हालात दोनों ही अलग और विपरीत थे।
"बोलो प्रिया।" उसे असमंजस में पड़ा देख साक्षी ने कहा──"तुम अरमान से जो कहने यहां आई हो कह दो। फिर हमें चलना भी है। अरमान को भी काम पर जाना होगा।"
साक्षी की बात सुन कर प्रिया बेहद बेचैन नज़र आने लगी।
झिझक और घबराहट में इज़ाफा हो गया।
बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और पहले साक्षी की तरफ देखा फिर चेहरा ऊपर कर के अरमान को।
अरमान अपलक उसी को देखे जा रहा था।
उसकी अपनी धड़कनें भी ये सोच कर बढ़ चलीं थी कि जाने क्या कहने वाली है प्रिया उससे?
सहसा वो मन ही मन ये दुआ करने लगा कि प्रिया उससे वही कहे जो वो चाहता है।
"क्या हुआ कहो ना।" प्रिया को बेचैन भाव से अपलक अरमान को देखते देख साक्षी ने जैसे उस पर ज़ोर डाला।
"अ...अरमान म...मैं तुमसे।" प्रिया ने अपनी धाड़ धाड़ बजती धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए किंतु अटकते हुए स्वर में कहना शुरू किया। उधर अरमान की धड़कनें उसकी आवाज़ सुन मानों थम सी गईं। तभी प्रिया ने हिम्मत जुटाते हुए जैसे अपनी बात पूरी की──"म...मैं तुमसे ये कहना चाहती हूं कि तुमने मेरे प...पति की जान बचा कर मुझ पर जो उ...उपकार किया है उसके लिए तुम्हारा ब...बहुत बहुत श...शुक्रिया। म...मैं जीवन भर तुम्हारा ये उपकार नहीं भू...भूलूंगी।"
इतना कह कर प्रिया ने अपनी आंखें बंद कर ली और राहत की लंबी लंबी सांसें लेने लगी।
उसे ऐसा लगा जैसे इतना कह कर उसने बहुत बड़ी जंग फतह कर ली है।
उधर अरमान ने उसकी ये बात सुनते ही एक गहरी सांस ली।
पलक झपकते ही उसके अरमानों पर जैसे पानी फिर गया था।
कहां अचानक से इतने सालों बाद उसका मन मयूर एक खुशी का एहसास करने वाला था किन्तु अगले ही पल उसे मिलने वाली खुशी पर मानों गृहण लग गया था।
वो निराश भाव से अपलक उस प्रिया को देखे जा रहा था जो अपनी आंखें बंद किए अभी भी राहत की सांसें लेने में खोई थी।
अरमान ने पुनः एक गहरी सांस ली।
जाने क्या सोच कर उसके होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई।
इधर साक्षी की नज़रें अरमान पर ही टिकी हुईं थी।
वो भी समझ रही थी कि अरमान ने प्रिया से क्या सुनने की उम्मीद कर रखी थी।
उसे अरमान के लिए इस वक्त बहुत बुरा महसूस हो रहा था लेकिन कर भी क्या सकती थी वो।
"कमाल है।"
तभी अरमान की आवाज़ से उसके साथ साथ प्रिया का भी ध्यान उसकी तरफ गया तो उसने आंखें खोल कर तथा धड़कते दिल से अरमान की तरफ देखा।
उधर अरमान ने आगे कहा──"तो तुम इसे मेरा उपकार समझती हो? अरे! मुझे तो पता भी नहीं था कि जो आदमी एक्सीडेंट होने की वजह से लहू लुहान था और मौत के मुंह में फंसा हुआ था वो तुम्हारा पति है। मैंने तो इंसानियत के तौर पर उसकी जान बचाने के लिए बस अपना कर्म किया था। वैसे उस समय अगर मुझे ये पता भी होता तब भी मैं तुम्हारे पति की जान बचाने के लिए यही करता। मेरे अंदर लेश मात्र भी ये ख़याल न आता कि जो व्यक्ति मेरी मोहब्बत का पति है उसे बचाने का कोई प्रयास ना करूं अथवा अगर वो बच जाने वाला हो तो उसे जान बूझ के मार दूं। मेरा दिल तुम्हारी तरह पत्थर का नहीं है जो किसी पर दया भी न कर सके।"
उसकी बात सुन कर प्रिया की आंखें ये सोच कर भर आईं कि उसने उसी के सामने ऐसा कह कर मानो उसकी हक़ीक़त बता दी है।
"आश्चर्य की बात है।" उधर अरमान उसे अपलक देखते हुए पुनः बोला──"महज शुक्रिया कहने के लिए तुम इतना झिझक रही थी? इसका तो यही मतलब हुआ कि तुम आज भी मुझे कोई महत्व नहीं देती वरना तुम्हारे लिए जितना बड़ा काम मैंने किया है तुम्हारी जगह कोई और होता तो उसके लिए खुशी खुशी मेरे क़दमों में लोट कर लाखों बार मुझे शुक्रिया कहता। ख़ैर कोई बात नहीं। वैसे भी मुझे तुम्हारे शुक्रिया की ज़रूरत नहीं है और ना ही मुझे किसी के द्वारा शुक्रिया कहलवाने की हसरत है।"
"ऐसा मत कहो प्लीज़।" प्रिया का सब्र जैसे जवाब दे गया। उसकी रुलाई फूट गई। बुरी तरह सिसकते हुए बोली──"और कितना मेरी ग़लती के लिए मुझे जलील करोगे? मुझे एहसास हो चुका है कि मैंने तुम्हारे साथ बिल्कुल भी अच्छा नहीं किया था। आज तुम्हारी जो हालत है उसकी ज़िम्मेदार मैं ही हूं। मेरा यकीन करो अरमान, मैं अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हूं। मेरे बस में ही नहीं है वरना तुम्हारे लिए बहुत कुछ कर जाती। प्लीज़ माफ़ कर दो मुझे और...और मेरी वजह से खुद को यूं बरबाद मत करो। किसी अच्छी लड़की से शादी कर के अपना घर बसा लो।"
"इस दुनिया में ऐसी कोई दूसरी लड़की जन्मी ही नहीं है डियर।" अरमान ने फीकी मुस्कान के साथ कहा──"जिसे मैं मोहब्बत की नज़र से देख सकूं और जिसके साथ अपना घर बसाने का सोचूं। मेरा घर बसेगा तो सिर्फ तुम्हारे साथ वरना मरते दम तक यूं ही तुम्हारी यादों के सहारे जीता रहूंगा।"
"नहीं...नहीं प्लीज़।" प्रिया आहत भाव से मानो चीख पड़ी──"ऐसी ज़िद मत करो जो कभी पूरी ही नहीं हो सकती। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं किसी और की पत्नी हूं। मैं अपने पति को छोड़ कर तुम्हारे पास वापस नहीं आ सकती। और....और वैसे भी तुम एक ऐसी औरत के साथ घर बसाने की ज़िद क्यों किए बैठे हो जिसने तुम्हें और तुम्हारी सच्ची मोहब्बत को ठोकर मार दी हो? तुम्हें तो ऐसी औरत से सिर्फ और सिर्फ नफ़रत करनी चाहिए।"
"सच्ची मोहब्बत करने वाला दिल चाह कर भी अपनी दिलरुबा से नफ़रत नहीं कर सकता प्रिया।" अरमान ने अधीरता से कहा──"वो तो बस मोहब्बत ही करता है। हर हाल में, हर कीमत पर।"
प्रिया की आंखें पुनः छलक पड़ीं।
इस वक्त उसका चेहरा अथाह पीड़ा से भरा हुआ था।
उसके आंसू गिर कर फर्श में फ़ना हो रहे थे।
इधर साक्षी दोनों के मध्य चल रही बातों को मूक दर्शक की तरह देख और सुन रही थी।
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि दोनों में से किसे क्या बोले?
"मत करो ना ऐसा।" प्रिया आहत सी हो कर बोल पड़ी──"क्यों मुझे धर्म संकट में डालने पर तुले हुए हो? क्यों मुझे इतना सता रहे हो? क्या यही है तुम्हारी मोहब्बत? क्या मोहब्बत करने वाले ऐसे ही अपने साथी को सताते हैं और दुखी करते हैं?"
"लो, कर लो बात।" अरमान अजीब भाव से हंस पड़ा, फिर बोला──"अब तुम मुझे बताओगी कि कैसे होते हैं मोहब्बत करने वाले? ये तो वही बात हो गई कि नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने चली। छोड़ो प्रिया, मोहब्बत जैसे लफ़्ज़ तुम्हारी ज़ुबान में अच्छे नहीं लगते। वैसे भी, तुम पर तो सिर्फ एक ही बात शूट करती है और वो है अपनी ख़्वाहिश को पूरा करने के लिए अपने ही चाहने वाले को बेदर्दी से ठुकरा कर चले जाना।"
"अरमान प्लीज़।" सहसा साक्षी ने बीच में हस्ताक्षेप किया।
उसे ये डर सताने लगा था कि अरमान की कड़वी बातें सुन कर प्रिया कहीं इस क़दर न आहत हो जाए कि वो कोई ग़लत क़दम उठा ले। इस लिए अरमान से बोली──"ये तुम ठीक नहीं कर रहे हो। माना कि प्रिया ने सिर्फ अपने बारे में सोचा था और उसने तुम्हारे प्रेम को ठुकरा दिया था लेकिन उसके लिए तुम बार बार उसे उसकी ग़लती का एहसास करा कर यूं दुखी नहीं कर सकते।"
"ओह! सॉरी।" अरमान तपाक से बोल पड़ा──"आई एम वेरी वेरी सॉरी। तुमने बिल्कुल सही कहा। मुझे प्रिया को यूं दुखी करने का कोई अधिकार नहीं है।" कहने के साथ ही वो एकदम प्रिया की तरफ मुड़ा, फिर उससे बोला──"मैं तुमसे हाथ जोड़ कर अपनी इस ग़लती के लिए माफ़ी मांगता हूं प्रिया। मुझे आभास ही नहीं हो पाया था कि जज़्बातों में मैं किस क़दर बहता चला गया हूं। वो क्या है ना वर्षों से दिल में जाने कैसा कैसा गुबार दबा हुआ पड़ा था जो बेध्यानी में बाहर आ गया। प्लीज, इसके लिए माफ़ कर दो मुझे।"
"बस करो।" प्रिया की एक बार फिर रुलाई फूट गई──"मुझमें अब और कुछ भी सुनने की हिम्मत नहीं है। मेरी तुमसे एक ही विनती है कि अपने आपको यूं बर्बाद मत करो। मेरा ख़याल अपने ज़हन से निकाल कर किसी के साथ अपना घर बसा लो।"
"यार साक्षी।" अरमान साक्षी से मुखातिब हुआ──"अपनी इस दोस्त को भी तो समझाओ कि एक ही बात बार बार न बोले। मैं बता चुका हूं कि इस दुनिया में ऐसी कोई दूसरी लड़की जन्मी ही नहीं है जिसके साथ मुझे प्रेम हो सके और मैं उसके साथ अपना घर बसाने का सोचूं। मेरा घर सिर्फ और सिर्फ इसके साथ ही बसेगा वरना नहीं। अगर तुम्हारी दोस्त को मेरा घर बसाने की इतनी ही चिंता है तो कहो इससे कि अपने हसबैंड को तलाक़ दे कर मुझसे शादी करे।"
"मैं किसी को क्या बोलूं अरमान?" साक्षी जैसे खुद ही धर्म संकट में फंस गई थी──"तुम ही उसकी विवशता को समझो। एक औरत के लिए इतना आसान नहीं होता बिना किसी वजह के अपने पति को तलाक़ दे कर किसी और से शादी कर लेना।"
"तो फिर इससे कहो कि जैसे अब तक मैं इसकी यादों के सहारे जीता आया हूं।" अरमान ने कहा──"उसी तरह बाकी का जीवन भी गुज़ार लूंगा। मेरा दिल उसी को अपना बनाएगा जिसे वो प्यार करता है। बाकी किसी की चाहत नहीं है उसे।"
To be continued...
Nice update.....Update ~ 14
अरमान आज कल दिन में टैक्सी चला रहा था। हालाकि उसका कोई नियम नहीं था। टैक्सी दिन में चलाना है या रात में ये उसके मूड पर निर्भर था। कभी कभी तो वो दो दो तीन तीन दिनों तक घर में ही पड़ा रहता था। जब टैक्सी मालिक किसी को उसके पास भेजता तब जा कर वो सोचता कि चलो पेट का खर्चा निकालने के लिए कुछ काम कर लिया जाए।
बहरहाल, आज सुबह जब वो सो कर उठा तो सुबह से ही उसका कहीं जाने का मूड नहीं था। एक बार उसने सोचा भी कि अकेला घर में वो कब तक खाली पड़ा रहेगा लेकिन फिर अगले ही पल उसका मूड बदल गया।
उसने निश्चय कर लिया कि आज कहीं नहीं जाएगा और फिर से वो अस्त व्यस्त से नज़र आ रहे पुराने से बेड पर सो गया।
यही उसका रवैया था और यही उसका रूटीन था।
उसे अपनी शख्सियत का लेश मात्र भी ख़याल नहीं था और ना ही कभी वो ये सोचता था कि ऐसा कब तक चलेगा?
पिछले साढ़े सात सालों में उसके अंदर सिर्फ एक ही बदलाव दिख रहा था और वो ये था कि प्रिया के प्रति उसके ख़यालात कुछ बदल से गए थे।
पहले जहां वो सिर्फ प्रिया की यादों के सहारे खुद को बहुत ही मामूली सा बनाए किसी तरह जी रहा था वहीं अब उसके अंदर एक अजीब सी ज़िद पैदा हो गई थी।
पहले उसने प्रिया को हासिल करने का कभी सोचा तक नहीं था लेकिन डेढ़ महीना पहले जब उसने इतने सालों बाद प्रिया को किसी जिन्न की तरह अचानक से अपने सामने प्रगट हो गया देखा और जब प्रिया ने अपनी बातों से उसके ज़ख्मों को कुरेद सा दिया तो जाने क्यों प्रिया के प्रति उसके जज़्बात बदल गए।
उसके अंदर एक ज़िद बैठ गई कि अब वो प्रिया को हर कीमत पर हासिल कर के रहेगा।
इतना ही नहीं उसे इस बात का एहसास भी कराएगा कि किसी के द्वारा ठुकरा दिए जाने पर एक इंसान कैसे अकेला घुट घुट के जीता है?
उस वक्त दिन के क़रीब ग्यारह बजे थे जब अचानक ही उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके घर का दरवाज़ा खटखटाया है।
वो नींद में था इस लिए थोड़ा हिला तो ज़रूर लेकिन उठा नहीं।
कुछ पलों बाद दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ फिर से उसे अपने कानों में सुनाई दी।
इस बार उसकी चेतना मानों अज्ञात लोक से वापस आई और उसकी आंख खुल गई।
तभी दरवाज़ा फिर से खटखटाया गया।
अब उसे स्पष्ट समझ आ गया कि बाहर कोई आया है।
अतः बेमन से वो बेड से नीचे उतरा।
जिस्म पर सिर्फ एक कच्छा था।
उसने आनन फानन में बेड के नीचे पड़ी एक टी शर्ट को पहना और नीचे लूंगी लपेट कर बाहर की तरफ बढ़ चला।
अभी वो दरवाज़े के पास पहुंचा ही था कि दरवाज़ा फिर से खटखटाया गया।
अब तक वो पूरी तरह नींद की खुमारी से बाहर आ चुका था इस लिए उसे ये समझते देर न लगी कि दरवाज़ा कौन खटखटा रहा है।
उसके अनुसार ऐसा एक ही व्यक्ति था जो टैक्सी मालिक द्वारा काम पर जाने के लिए उसे बुलाने भेजा जाता था।
अरमान ने थोड़ा खिन्न भाव से दरवाज़ा खोला और इससे पहले कि खुन्नस में उसके मुख से कोई अपशब्द निकलता उसकी नज़र बाहर खड़ी प्रिया और साक्षी पर पड़ी।
उन दोनों को देखते ही उसने फ़ौरन अपने होठ भींच लिए।
उधर उसकी अस्त व्यस्त हालत देख साक्षी पर तो ज़्यादा कोई फ़र्क नहीं पड़ा लेकिन प्रिया हैरानी से उसे देखने लगी।
एक तो अभी वो नींद से जागा था इस लिए उसका अस्त व्यस्त रहना स्वाभाविक ही था किंतु वो थोड़ा अजीब दिखता भी था।
बिल्कुल फ़क़ीरों जैसा।
चेहरे पर बढ़ी हुई बड़ी बड़ी दाढ़ी मूंछें।
सिर पर लम्बे किन्तु उलझे हुए बाल।
विशाल और साक्षी लाखों बार उससे कह चुके थे कि थोड़ा तो वो अपना ख़याल रखा करे लेकिन उस पर उनकी बातों का कोई असर ही नहीं होता था।
उसके बारे में कौन क्या सोचता है इस बात से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था।
"तुम हमेशा ऐसी हालत में ही क्यों दिखते हो हमें?" प्रिया तो उसे देख हैरान थी इस लिए साक्षी ने ही कमान सम्हालते हुए उससे कहा──"कॉलेज के दिनों में कितने हैंडसम दिखते थे तुम और आज देखो, कितनी अजीब सी हालत बना ली है तुमने।"
"जब हैंडसम दिखता था तब कौन सा किसी ने अपना लिया था मुझे?" अरमान ने प्रिया पर एक नज़र डालने के बाद फीकी सी मुस्कान सजा कर कहा──"टूट कर जिसकी इबादत की उसने भी मेरे हैंडसम होने का कोई मान नहीं रखा।"
अरमान की बातें यकीनन प्रिया से ही संबंधित थीं।
साक्षी अच्छी तरह जानती थी ये बात।
उसने कुछ कहा नहीं बस कनखियों से प्रिया की तरफ देखा।
प्रिया के चेहरे पर बेहद ही संजीदा भाव नुमायां हो उठे।
चेहरे पर थोड़ी पीड़ा और थोड़े पश्चाताप के भी भाव नज़र आए।
अरमान की बात सुनते ही उसकी नज़रें झुक गईं।
"ख़ैर, आज सुबह सुबह दिन के समय मेरे घर के बाहर दो दो खूबसूरत चांद कैसे प्रगट हो गए?" अरमान ने विषय को बदल कर साक्षी से पूछा।
"तुमने मुझे भी खूबसूरत चांद कहा?" साक्षी ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा──"ओह! थैंक यू सो मच अरमान लेकिन अफ़सोस मैं किसी और की अमानत हूं।"
"तुम अच्छी तरह जानती हो कि इस दुनिया में मुझे सिर्फ एक ही शख़्स की आरज़ू है।" अरमान ने कहा──"उसके बदले ऊपर वाला तीनों लोकों का साम्राज्य भी मुझे देने आए तो मैं उस साम्राज्य को ठोकर मार दूंगा।"
"काश! इतनी शिद्दत से कोई मुझसे भी मोहब्बत करता।" साक्षी ने मुस्कुराते हुए जैसे आह भरी। फिर उसने प्रिया से मुखातिब हो कर कहा──"अरमान अगर इतनी मोहब्बत मुझसे करता तो क़सम से कहती हूं इसी वक्त अपने निठल्ले हसबैंड को तलाक़ दे कर अरमान से शादी कर लेती और एक तू है जो ऐसे इंसान से भाग रही है जो तुझे इतना प्यार करता है। हे भगवान! आख़िर ये किस मिट्टी की बनी हुई है?"
"तू न ज़्यादा बकवास न कर।" प्रिया ने धीमे से उसे डांटा──"तू अच्छी तरह जानती है कि मैं अपने मन में ऐसा करने का सोच भी नहीं सकती।"
"हां तू तो इस कलियुग की सबसे बड़ी पतिव्रता नारी है।" साक्षी ने बुरा सा मुंह बनाया──"अब ये बता कि यहीं पर खड़े खड़े तू अरमान को शुक्रिया कहेगी या घर के अंदर जा कर उसे बोलेगी?"
"तुम दोनों क्या खुसुर फुसुर कर रही हो?" अरमान ने दोनों को बारी बारी से देखते हुए पूछा──"अगर मुझसे कोई काम है तो बोलो वरना बेकार में मेरा समय बर्बाद मत करो। मुझे अभी सोने का सबसे बड़ा काम करना है।"
"अरे! हां वो बात ये है अरमान कि प्रिया तुमसे कुछ कहना चाहती है।" साक्षी ने झट से ये कहा तो प्रिया एकदम से चौंक कर उसकी तरफ देखने लगी।
"अच्छा, ऐसी बात है क्या?" अरमान ने प्रिया की तरफ देखा──"फिर तो मैं सबसे पहले अपने दोनों कानों को साफ कर लेता हूं। वो क्या है ना कि काफी लंबे समय से मैंने इनकी सफाई नहीं की है। प्रिया मुझसे जो कहना चाहती है वो अगर मेरे कान ठीक से सुन नहीं पाएंगे तो इससे प्रिया के द्वारा कहे गए शब्दों की तौहीन हो जाएगी। रुको, मैं अभी अपने कानों को साफ कर के आता हूं।"
अरमान जब पलट कर सचमुच अंदर की तरफ जाने लगा तो साक्षी के साथ साथ प्रिया भी बुरी तरह चौंक पड़ी।
प्रिया तो उसकी बातें सुन कर ही संजीदा हो गई थी।
अरमान के सच्चे प्रेम को उसने अच्छी तरह महसूस किया था।
अरमान का सामना करने में अब उसे ये सोच कर डर लगने लगा था कि अगर वो जज़्बातों में बह गई तो गज़ब हो जाएगा।
अरमान की हालत देख कर ही उसे ये एहसास सताने लगता था कि उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वही है।
"अरे! रुको अरमान रुको।" प्रिया की हालत को समझते हुए साक्षी ने ही कमान सम्हाली और फ़ौरन ही अरमान को रोका──"तुम भी ना, ग़ज़ब ही इंसान हो।"
अरमान वापस पलटा।
उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए थे जैसे उसे अपने कान साफ करने जाने से रोक कर साक्षी ने उस पर बहुत बड़ा अत्याचार कर दिया है।
साक्षी ये तो जानती थी कि अरमान ये सब अपने प्लान के तहत ही कर रहा है लेकिन वो ये भी जानती थी कि प्रिया के प्रति उसकी चाहत बिल्कुल भी झूठी नहीं है।
"अब यूं मुंह बना के मत खड़े रहो तुम।" फिर उसने अरमान को घूरते हुए कहा──"चलो अंदर। प्रिया तुमसे यहां थोड़े ना अपनी बात कहेगी।"
"ओह! ऐसा है क्या?" अरमान ने मूर्खों की तरह अपनी पलकें झपकाई──"ठीक है फिर, चलो आओ अंदर।"
साक्षी और प्रिया आगे पीछे अंदर दाख़िल हो गईं तो अरमान ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
"तुम्हारा सच में कुछ नहीं हो सकता।" अंदर की हालत देखते ही साक्षी ने अरमान से कहा──"पता नहीं कैसे इंसान हो तुम जो यहां ऐसी ख़राब हालत में रह लेते हो।"
"जिसे किसी बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता उसके लिए रहने वाली जगह कैसी है ये मायने नहीं रखता।" अरमान ने कहा──"मैं तो इस दीन दुनिया से विरक्त एक फ़कीर आदमी हूं। मुझे किसी भी चीज़ की चाहत नहीं है। काश! ये चाहत भी मिट जाती जो मेरे दिल में प्रिया को बेपनाह मोहब्बत करने के रूप में मौजूद है।"
उसकी ये बात सुन कर प्रिया एक बार फिर से अंदर तक कांप गई।
उसके दिल में मचलते जज़्बात शांत होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
वो अपने आपको सम्हाले रखने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी।
उसका जी चाह रहा था कि कितना जल्दी वो अरमान से दूर चली जाए।
उसे महसूस होने लगा था कि अगर थोड़ी देर और उसने अरमान की ये अजीब और दर्द भरी बातें सुनी तो वो टूट जाएगी।
इतना ही नहीं उसका दिल कहीं उसे अरमान के सीने से लिपट जाने के लिए पूरी ताक़त से उसकी तरफ ढकेल ना दे।
उसकी आंखों में बार बार आंसू तैरने लगते थे।
"अच्छा अब ये बातें छोड़ो।" साक्षी को भी बड़ा अजीब महसूस होने लगा था इस लिए उसने विषय बदलने की गरज से पूछा──"और ये बताओ कि फ्रेश हुए या सचमुच हमारे आने पर ही सो कर जागे हो?"
"हां, जागा तो अभी ही हूं।" अरमान ने सामान्य भाव से कहा──"असल में नींद तो सुबह एक बार खुली थी लेकिन आज कहीं जाने का मन नहीं किया तो फिर से सो गया।"
"ओह!" साक्षी ने कहा──"वैसे आते समय मैं प्रिया से कह भी रही थी कि अगर तुम दिन में टैक्सी चलाने जाते होगे तो शायद ही घर में तुमसे मुलाक़ात हो पाएगी। फिर ये सोच कर चले आए कि एक बार घर जा कर देख ही लेते हैं। शुक्र है तुम घर पर ही थे। ख़ैर, जाओ पहले तुम फ्रेश हो लो। तब तक हम दोनों बैठे हैं और हां आज हमारे लिए कुछ लाने की जहमत मत उठाना।"
अरमान ने सिर हिलाया और घर के पीछे की तरफ खुलने वाले दरवाज़े को खोल बाहर निकल गया।
असल में अरमान का घर बहुत पुराना था।
आज के समय के अनुसार घर के अंदर टॉयलेट अथवा बाथरूम वाली सुविधा नहीं थी बल्कि घर के पीछे जो थोड़ी सी जगह थी वहीं किनारे पर टॉयलेट बना हुआ था।
नहाने के लिए उसी से जुड़ा हुआ एक बाथरूम था।
पानी के लिए एक हैंडपंप था जो पुराने समय का था लेकिन उसमें से पानी आज भी पर्याप्त मात्रा में निकलता था।
बहरहाल, अरमान क़रीब आधे घंटे में फ्रेश हो कर तथा नहा धो कर आया।
नहा कर आने की वजह से वो ऊपर से बेलिबास ही था।
प्रिया और साक्षी के सामने ऐसे रूप में आने पर भी उसे शर्म नहीं आई।
वैसे शर्म लगने जैसी बात उस पर लागू भी नहीं होती थी क्योंकि उसे किसी बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता था।
साक्षी ने तो उसे इस रूप में पहले भी देखा था जब उसका हसबैंड विशाल उसे जबरन अपने घर ले जाता और उसे फ्रेश होने को कहता।
मगर प्रिया उसे इस रूप में पहली बार देख रही थी।
साढ़े सात साल पहले भी उसने अरमान को इस तरह ऊपर से बेलिबास नहीं देखा था।
प्रिया झिझकते हुए बार बार उसे चोर नज़रों से देखने लगती।
अरमान बाहर से भले ही फ़क़ीरों की तरह दिखता था लेकिन कुदरती तौर पर वो आज भी अंदर से अच्छा खासा दिखता था।
चौड़ी छाती पर घने घुंघराले बाल जो उसके पेट और नाभी के आस पास वाले क्षेत्र को घेरे हुए नीचे तरफ फैलते चले गए थे।
मजबूत कंधे और बलिष्ठ भुजाएं उसके मर्द होने का सबूत दे रहीं थी।
गले से ऊपर की तरफ चेहरे में बढ़ी हुई दाढ़ी मूंछें और सिर पर उलझे हुए बाल।
प्रिया बार बार चोर नज़रों से उसके जिस्म का अवलोकन करने लगती थी।
एकाएक वो चौंक पड़ी।
उसकी चोर नजरें अरमान के बाएं सीने पर एकदम दिल के पास जम सी गईं।
घुंघराले बालों की वजह से शायद पहले उसे दिखा नहीं था या फिर उसने ध्यान से देखा नहीं था लेकिन जब दुबारा उसकी नज़रें उसके सीने की तरफ गईं तो सहसा उसे ऐसा लगा जैसे उसके दिल वाले हिस्से पर कुछ लिखा हुआ है।
प्रिया ने अपनी झिझक को परे रख कर इस बार बड़े ध्यान से देखा।
अगले ही पल वो ये देख कर स्तब्ध सी रह गई कि अरमान ने अपने बाएं सीने पर उसका नाम गुदवा रखा है।
अंग्रेजी के अक्षरों में गुदा हुआ था──Priya।
ये देख प्रिया के अंदर एकदम से भूचाल सा आ गया।
एक बार पुनः वो ये सोच कर आहत सी हो गई कि उसके जैसी बेवफ़ा लड़की का नाम अरमान ने अपने सीने पर लिख रखा है।
ये उसके प्रेम का सबूत भी था और उसकी चाहत की पराकाष्ठा भी।
प्रिया को लगा उसे चक्कर आ जाएगा।
बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला।
उसके दिल की धड़कनें किसी हथौड़े की मानिंद उसकी कनपटियों पर बरसने लगीं थी।
उसका हृदय हाहाकार सा कर उठा था।
सहसा उसे अपने अंदर से एक आवाज़ सुनाई दी──"ऐसे इंसान को ठुकराने के बाद आख़िर ऐसी कौन सी खुशी और ऐसा कौन सा ऐशो आराम हासिल किया है तूने प्रिया?"
"अरे! तुझे क्या हुआ?" साक्षी की नज़र अचानक प्रिया पर पड़ी तो वो उसकी दशा देख चौंक पड़ी थी।
"क...कुछ नहीं" प्रिया उसके यूं अचानक पूछ लेने पर बुरी तरह बौखला गई। बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और फिर कहा──"म...मैं ठीक हूं।"
साक्षी ने उसे बड़े ध्यान से देखा।
प्रिया उसके यूं देखने पर बेचैन सी हो गई।
उसके चेहरे पर परेशानी और घबराहट के चलते पसीना उभर आया।
वो साक्षी से नज़रें न मिला सकी।
इधर साक्षी उसकी हालत से ज़रा भी बेख़बर नहीं थी।
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि इस वक्त प्रिया किस हालत से गुज़र रही है।
दूसरी तरफ अरमान कुछ ही दूरी पर कपड़े पहन रहा था।
उसने नहाने के बाद अपने बदन पर ना तो तेल वगैरह लगाया था और ना ही बालों पर कंघी की थी।
अपने जिस्म पर उन्हीं कपड़ों को पहन लिया जो उसने नहाने से पहले पहन रखे थे।
साक्षी उसकी इस आदत से परिचित भी थी और नाखुश भी लेकिन प्रिया को ये बहुत अजीब लगा और पीड़ा देने वाला भी।
उसके लिए सबसे बड़े दुख की बात ये थी कि वो खुद अरमान के लिए कुछ कर नहीं सकती थी।
हालाकि उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने के लिए उसका दिल उसे ज़ोर दिए जा रहा था मगर वो अपने जज़्बातों को दबाए हुए थी।
"लो साक्षी।" अरमान दोनों के सामने आ कर बोला──"तुम्हारे कहे अनुसार मैं फ्रेश हो गया। अब बताओ, तुम्हारी दोस्त क्या कहना चाहती है मुझसे?"
अरमान की ये बात सुन साक्षी के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई।
उधर प्रिया की धड़कनें बढ़ गईं।
उसे अरमान को शुक्रिया कहना मानों दुनिया का सबसे मुश्किल काम महसूस होने लगा।
शर्म, झिझक, परेशानी, घबराहट और बेचैनी ने जैसे उसे चारो तरफ से घेर लिया।
अरमान के सामने उसकी ऐसी हालत पहले कभी न हुई थी।
उल्टा वो ही अरमान पर हावी रहती थी और अरमान उससे अपनी बात कहने के लिए झिझकता था मगर आज वक्त और हालात दोनों ही अलग और विपरीत थे।
"बोलो प्रिया।" उसे असमंजस में पड़ा देख साक्षी ने कहा──"तुम अरमान से जो कहने यहां आई हो कह दो। फिर हमें चलना भी है। अरमान को भी काम पर जाना होगा।"
साक्षी की बात सुन कर प्रिया बेहद बेचैन नज़र आने लगी।
झिझक और घबराहट में इज़ाफा हो गया।
बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और पहले साक्षी की तरफ देखा फिर चेहरा ऊपर कर के अरमान को।
अरमान अपलक उसी को देखे जा रहा था।
उसकी अपनी धड़कनें भी ये सोच कर बढ़ चलीं थी कि जाने क्या कहने वाली है प्रिया उससे?
सहसा वो मन ही मन ये दुआ करने लगा कि प्रिया उससे वही कहे जो वो चाहता है।
"क्या हुआ कहो ना।" प्रिया को बेचैन भाव से अपलक अरमान को देखते देख साक्षी ने जैसे उस पर ज़ोर डाला।
"अ...अरमान म...मैं तुमसे।" प्रिया ने अपनी धाड़ धाड़ बजती धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए किंतु अटकते हुए स्वर में कहना शुरू किया। उधर अरमान की धड़कनें उसकी आवाज़ सुन मानों थम सी गईं। तभी प्रिया ने हिम्मत जुटाते हुए जैसे अपनी बात पूरी की──"म...मैं तुमसे ये कहना चाहती हूं कि तुमने मेरे प...पति की जान बचा कर मुझ पर जो उ...उपकार किया है उसके लिए तुम्हारा ब...बहुत बहुत श...शुक्रिया। म...मैं जीवन भर तुम्हारा ये उपकार नहीं भू...भूलूंगी।"
इतना कह कर प्रिया ने अपनी आंखें बंद कर ली और राहत की लंबी लंबी सांसें लेने लगी।
उसे ऐसा लगा जैसे इतना कह कर उसने बहुत बड़ी जंग फतह कर ली है।
उधर अरमान ने उसकी ये बात सुनते ही एक गहरी सांस ली।
पलक झपकते ही उसके अरमानों पर जैसे पानी फिर गया था।
कहां अचानक से इतने सालों बाद उसका मन मयूर एक खुशी का एहसास करने वाला था किन्तु अगले ही पल उसे मिलने वाली खुशी पर मानों गृहण लग गया था।
वो निराश भाव से अपलक उस प्रिया को देखे जा रहा था जो अपनी आंखें बंद किए अभी भी राहत की सांसें लेने में खोई थी।
अरमान ने पुनः एक गहरी सांस ली।
जाने क्या सोच कर उसके होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई।
इधर साक्षी की नज़रें अरमान पर ही टिकी हुईं थी।
वो भी समझ रही थी कि अरमान ने प्रिया से क्या सुनने की उम्मीद कर रखी थी।
उसे अरमान के लिए इस वक्त बहुत बुरा महसूस हो रहा था लेकिन कर भी क्या सकती थी वो।
"कमाल है।"
तभी अरमान की आवाज़ से उसके साथ साथ प्रिया का भी ध्यान उसकी तरफ गया तो उसने आंखें खोल कर तथा धड़कते दिल से अरमान की तरफ देखा।
उधर अरमान ने आगे कहा──"तो तुम इसे मेरा उपकार समझती हो? अरे! मुझे तो पता भी नहीं था कि जो आदमी एक्सीडेंट होने की वजह से लहू लुहान था और मौत के मुंह में फंसा हुआ था वो तुम्हारा पति है। मैंने तो इंसानियत के तौर पर उसकी जान बचाने के लिए बस अपना कर्म किया था। वैसे उस समय अगर मुझे ये पता भी होता तब भी मैं तुम्हारे पति की जान बचाने के लिए यही करता। मेरे अंदर लेश मात्र भी ये ख़याल न आता कि जो व्यक्ति मेरी मोहब्बत का पति है उसे बचाने का कोई प्रयास ना करूं अथवा अगर वो बच जाने वाला हो तो उसे जान बूझ के मार दूं। मेरा दिल तुम्हारी तरह पत्थर का नहीं है जो किसी पर दया भी न कर सके।"
उसकी बात सुन कर प्रिया की आंखें ये सोच कर भर आईं कि उसने उसी के सामने ऐसा कह कर मानो उसकी हक़ीक़त बता दी है।
"आश्चर्य की बात है।" उधर अरमान उसे अपलक देखते हुए पुनः बोला──"महज शुक्रिया कहने के लिए तुम इतना झिझक रही थी? इसका तो यही मतलब हुआ कि तुम आज भी मुझे कोई महत्व नहीं देती वरना तुम्हारे लिए जितना बड़ा काम मैंने किया है तुम्हारी जगह कोई और होता तो उसके लिए खुशी खुशी मेरे क़दमों में लोट कर लाखों बार मुझे शुक्रिया कहता। ख़ैर कोई बात नहीं। वैसे भी मुझे तुम्हारे शुक्रिया की ज़रूरत नहीं है और ना ही मुझे किसी के द्वारा शुक्रिया कहलवाने की हसरत है।"
"ऐसा मत कहो प्लीज़।" प्रिया का सब्र जैसे जवाब दे गया। उसकी रुलाई फूट गई। बुरी तरह सिसकते हुए बोली──"और कितना मेरी ग़लती के लिए मुझे जलील करोगे? मुझे एहसास हो चुका है कि मैंने तुम्हारे साथ बिल्कुल भी अच्छा नहीं किया था। आज तुम्हारी जो हालत है उसकी ज़िम्मेदार मैं ही हूं। मेरा यकीन करो अरमान, मैं अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हूं। मेरे बस में ही नहीं है वरना तुम्हारे लिए बहुत कुछ कर जाती। प्लीज़ माफ़ कर दो मुझे और...और मेरी वजह से खुद को यूं बरबाद मत करो। किसी अच्छी लड़की से शादी कर के अपना घर बसा लो।"
"इस दुनिया में ऐसी कोई दूसरी लड़की जन्मी ही नहीं है डियर।" अरमान ने फीकी मुस्कान के साथ कहा──"जिसे मैं मोहब्बत की नज़र से देख सकूं और जिसके साथ अपना घर बसाने का सोचूं। मेरा घर बसेगा तो सिर्फ तुम्हारे साथ वरना मरते दम तक यूं ही तुम्हारी यादों के सहारे जीता रहूंगा।"
"नहीं...नहीं प्लीज़।" प्रिया आहत भाव से मानो चीख पड़ी──"ऐसी ज़िद मत करो जो कभी पूरी ही नहीं हो सकती। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं किसी और की पत्नी हूं। मैं अपने पति को छोड़ कर तुम्हारे पास वापस नहीं आ सकती। और....और वैसे भी तुम एक ऐसी औरत के साथ घर बसाने की ज़िद क्यों किए बैठे हो जिसने तुम्हें और तुम्हारी सच्ची मोहब्बत को ठोकर मार दी हो? तुम्हें तो ऐसी औरत से सिर्फ और सिर्फ नफ़रत करनी चाहिए।"
"सच्ची मोहब्बत करने वाला दिल चाह कर भी अपनी दिलरुबा से नफ़रत नहीं कर सकता प्रिया।" अरमान ने अधीरता से कहा──"वो तो बस मोहब्बत ही करता है। हर हाल में, हर कीमत पर।"
प्रिया की आंखें पुनः छलक पड़ीं।
इस वक्त उसका चेहरा अथाह पीड़ा से भरा हुआ था।
उसके आंसू गिर कर फर्श में फ़ना हो रहे थे।
इधर साक्षी दोनों के मध्य चल रही बातों को मूक दर्शक की तरह देख और सुन रही थी।
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि दोनों में से किसे क्या बोले?
"मत करो ना ऐसा।" प्रिया आहत सी हो कर बोल पड़ी──"क्यों मुझे धर्म संकट में डालने पर तुले हुए हो? क्यों मुझे इतना सता रहे हो? क्या यही है तुम्हारी मोहब्बत? क्या मोहब्बत करने वाले ऐसे ही अपने साथी को सताते हैं और दुखी करते हैं?"
"लो, कर लो बात।" अरमान अजीब भाव से हंस पड़ा, फिर बोला──"अब तुम मुझे बताओगी कि कैसे होते हैं मोहब्बत करने वाले? ये तो वही बात हो गई कि नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने चली। छोड़ो प्रिया, मोहब्बत जैसे लफ़्ज़ तुम्हारी ज़ुबान में अच्छे नहीं लगते। वैसे भी, तुम पर तो सिर्फ एक ही बात शूट करती है और वो है अपनी ख़्वाहिश को पूरा करने के लिए अपने ही चाहने वाले को बेदर्दी से ठुकरा कर चले जाना।"
"अरमान प्लीज़।" सहसा साक्षी ने बीच में हस्ताक्षेप किया।
उसे ये डर सताने लगा था कि अरमान की कड़वी बातें सुन कर प्रिया कहीं इस क़दर न आहत हो जाए कि वो कोई ग़लत क़दम उठा ले। इस लिए अरमान से बोली──"ये तुम ठीक नहीं कर रहे हो। माना कि प्रिया ने सिर्फ अपने बारे में सोचा था और उसने तुम्हारे प्रेम को ठुकरा दिया था लेकिन उसके लिए तुम बार बार उसे उसकी ग़लती का एहसास करा कर यूं दुखी नहीं कर सकते।"
"ओह! सॉरी।" अरमान तपाक से बोल पड़ा──"आई एम वेरी वेरी सॉरी। तुमने बिल्कुल सही कहा। मुझे प्रिया को यूं दुखी करने का कोई अधिकार नहीं है।" कहने के साथ ही वो एकदम प्रिया की तरफ मुड़ा, फिर उससे बोला──"मैं तुमसे हाथ जोड़ कर अपनी इस ग़लती के लिए माफ़ी मांगता हूं प्रिया। मुझे आभास ही नहीं हो पाया था कि जज़्बातों में मैं किस क़दर बहता चला गया हूं। वो क्या है ना वर्षों से दिल में जाने कैसा कैसा गुबार दबा हुआ पड़ा था जो बेध्यानी में बाहर आ गया। प्लीज, इसके लिए माफ़ कर दो मुझे।"
"बस करो।" प्रिया की एक बार फिर रुलाई फूट गई──"मुझमें अब और कुछ भी सुनने की हिम्मत नहीं है। मेरी तुमसे एक ही विनती है कि अपने आपको यूं बर्बाद मत करो। मेरा ख़याल अपने ज़हन से निकाल कर किसी के साथ अपना घर बसा लो।"
"यार साक्षी।" अरमान साक्षी से मुखातिब हुआ──"अपनी इस दोस्त को भी तो समझाओ कि एक ही बात बार बार न बोले। मैं बता चुका हूं कि इस दुनिया में ऐसी कोई दूसरी लड़की जन्मी ही नहीं है जिसके साथ मुझे प्रेम हो सके और मैं उसके साथ अपना घर बसाने का सोचूं। मेरा घर सिर्फ और सिर्फ इसके साथ ही बसेगा वरना नहीं। अगर तुम्हारी दोस्त को मेरा घर बसाने की इतनी ही चिंता है तो कहो इससे कि अपने हसबैंड को तलाक़ दे कर मुझसे शादी करे।"
"मैं किसी को क्या बोलूं अरमान?" साक्षी जैसे खुद ही धर्म संकट में फंस गई थी──"तुम ही उसकी विवशता को समझो। एक औरत के लिए इतना आसान नहीं होता बिना किसी वजह के अपने पति को तलाक़ दे कर किसी और से शादी कर लेना।"
"तो फिर इससे कहो कि जैसे अब तक मैं इसकी यादों के सहारे जीता आया हूं।" अरमान ने कहा──"उसी तरह बाकी का जीवन भी गुज़ार लूंगा। मेरा दिल उसी को अपना बनाएगा जिसे वो प्यार करता है। बाकी किसी की चाहत नहीं है उसे।"
To be continued...
Nice update....Update ~ 14
अरमान आज कल दिन में टैक्सी चला रहा था। हालाकि उसका कोई नियम नहीं था। टैक्सी दिन में चलाना है या रात में ये उसके मूड पर निर्भर था। कभी कभी तो वो दो दो तीन तीन दिनों तक घर में ही पड़ा रहता था। जब टैक्सी मालिक किसी को उसके पास भेजता तब जा कर वो सोचता कि चलो पेट का खर्चा निकालने के लिए कुछ काम कर लिया जाए।
बहरहाल, आज सुबह जब वो सो कर उठा तो सुबह से ही उसका कहीं जाने का मूड नहीं था। एक बार उसने सोचा भी कि अकेला घर में वो कब तक खाली पड़ा रहेगा लेकिन फिर अगले ही पल उसका मूड बदल गया।
उसने निश्चय कर लिया कि आज कहीं नहीं जाएगा और फिर से वो अस्त व्यस्त से नज़र आ रहे पुराने से बेड पर सो गया।
यही उसका रवैया था और यही उसका रूटीन था।
उसे अपनी शख्सियत का लेश मात्र भी ख़याल नहीं था और ना ही कभी वो ये सोचता था कि ऐसा कब तक चलेगा?
पिछले साढ़े सात सालों में उसके अंदर सिर्फ एक ही बदलाव दिख रहा था और वो ये था कि प्रिया के प्रति उसके ख़यालात कुछ बदल से गए थे।
पहले जहां वो सिर्फ प्रिया की यादों के सहारे खुद को बहुत ही मामूली सा बनाए किसी तरह जी रहा था वहीं अब उसके अंदर एक अजीब सी ज़िद पैदा हो गई थी।
पहले उसने प्रिया को हासिल करने का कभी सोचा तक नहीं था लेकिन डेढ़ महीना पहले जब उसने इतने सालों बाद प्रिया को किसी जिन्न की तरह अचानक से अपने सामने प्रगट हो गया देखा और जब प्रिया ने अपनी बातों से उसके ज़ख्मों को कुरेद सा दिया तो जाने क्यों प्रिया के प्रति उसके जज़्बात बदल गए।
उसके अंदर एक ज़िद बैठ गई कि अब वो प्रिया को हर कीमत पर हासिल कर के रहेगा।
इतना ही नहीं उसे इस बात का एहसास भी कराएगा कि किसी के द्वारा ठुकरा दिए जाने पर एक इंसान कैसे अकेला घुट घुट के जीता है?
उस वक्त दिन के क़रीब ग्यारह बजे थे जब अचानक ही उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके घर का दरवाज़ा खटखटाया है।
वो नींद में था इस लिए थोड़ा हिला तो ज़रूर लेकिन उठा नहीं।
कुछ पलों बाद दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ फिर से उसे अपने कानों में सुनाई दी।
इस बार उसकी चेतना मानों अज्ञात लोक से वापस आई और उसकी आंख खुल गई।
तभी दरवाज़ा फिर से खटखटाया गया।
अब उसे स्पष्ट समझ आ गया कि बाहर कोई आया है।
अतः बेमन से वो बेड से नीचे उतरा।
जिस्म पर सिर्फ एक कच्छा था।
उसने आनन फानन में बेड के नीचे पड़ी एक टी शर्ट को पहना और नीचे लूंगी लपेट कर बाहर की तरफ बढ़ चला।
अभी वो दरवाज़े के पास पहुंचा ही था कि दरवाज़ा फिर से खटखटाया गया।
अब तक वो पूरी तरह नींद की खुमारी से बाहर आ चुका था इस लिए उसे ये समझते देर न लगी कि दरवाज़ा कौन खटखटा रहा है।
उसके अनुसार ऐसा एक ही व्यक्ति था जो टैक्सी मालिक द्वारा काम पर जाने के लिए उसे बुलाने भेजा जाता था।
अरमान ने थोड़ा खिन्न भाव से दरवाज़ा खोला और इससे पहले कि खुन्नस में उसके मुख से कोई अपशब्द निकलता उसकी नज़र बाहर खड़ी प्रिया और साक्षी पर पड़ी।
उन दोनों को देखते ही उसने फ़ौरन अपने होठ भींच लिए।
उधर उसकी अस्त व्यस्त हालत देख साक्षी पर तो ज़्यादा कोई फ़र्क नहीं पड़ा लेकिन प्रिया हैरानी से उसे देखने लगी।
एक तो अभी वो नींद से जागा था इस लिए उसका अस्त व्यस्त रहना स्वाभाविक ही था किंतु वो थोड़ा अजीब दिखता भी था।
बिल्कुल फ़क़ीरों जैसा।
चेहरे पर बढ़ी हुई बड़ी बड़ी दाढ़ी मूंछें।
सिर पर लम्बे किन्तु उलझे हुए बाल।
विशाल और साक्षी लाखों बार उससे कह चुके थे कि थोड़ा तो वो अपना ख़याल रखा करे लेकिन उस पर उनकी बातों का कोई असर ही नहीं होता था।
उसके बारे में कौन क्या सोचता है इस बात से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था।
"तुम हमेशा ऐसी हालत में ही क्यों दिखते हो हमें?" प्रिया तो उसे देख हैरान थी इस लिए साक्षी ने ही कमान सम्हालते हुए उससे कहा──"कॉलेज के दिनों में कितने हैंडसम दिखते थे तुम और आज देखो, कितनी अजीब सी हालत बना ली है तुमने।"
"जब हैंडसम दिखता था तब कौन सा किसी ने अपना लिया था मुझे?" अरमान ने प्रिया पर एक नज़र डालने के बाद फीकी सी मुस्कान सजा कर कहा──"टूट कर जिसकी इबादत की उसने भी मेरे हैंडसम होने का कोई मान नहीं रखा।"
अरमान की बातें यकीनन प्रिया से ही संबंधित थीं।
साक्षी अच्छी तरह जानती थी ये बात।
उसने कुछ कहा नहीं बस कनखियों से प्रिया की तरफ देखा।
प्रिया के चेहरे पर बेहद ही संजीदा भाव नुमायां हो उठे।
चेहरे पर थोड़ी पीड़ा और थोड़े पश्चाताप के भी भाव नज़र आए।
अरमान की बात सुनते ही उसकी नज़रें झुक गईं।
"ख़ैर, आज सुबह सुबह दिन के समय मेरे घर के बाहर दो दो खूबसूरत चांद कैसे प्रगट हो गए?" अरमान ने विषय को बदल कर साक्षी से पूछा।
"तुमने मुझे भी खूबसूरत चांद कहा?" साक्षी ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा──"ओह! थैंक यू सो मच अरमान लेकिन अफ़सोस मैं किसी और की अमानत हूं।"
"तुम अच्छी तरह जानती हो कि इस दुनिया में मुझे सिर्फ एक ही शख़्स की आरज़ू है।" अरमान ने कहा──"उसके बदले ऊपर वाला तीनों लोकों का साम्राज्य भी मुझे देने आए तो मैं उस साम्राज्य को ठोकर मार दूंगा।"
"काश! इतनी शिद्दत से कोई मुझसे भी मोहब्बत करता।" साक्षी ने मुस्कुराते हुए जैसे आह भरी। फिर उसने प्रिया से मुखातिब हो कर कहा──"अरमान अगर इतनी मोहब्बत मुझसे करता तो क़सम से कहती हूं इसी वक्त अपने निठल्ले हसबैंड को तलाक़ दे कर अरमान से शादी कर लेती और एक तू है जो ऐसे इंसान से भाग रही है जो तुझे इतना प्यार करता है। हे भगवान! आख़िर ये किस मिट्टी की बनी हुई है?"
"तू न ज़्यादा बकवास न कर।" प्रिया ने धीमे से उसे डांटा──"तू अच्छी तरह जानती है कि मैं अपने मन में ऐसा करने का सोच भी नहीं सकती।"
"हां तू तो इस कलियुग की सबसे बड़ी पतिव्रता नारी है।" साक्षी ने बुरा सा मुंह बनाया──"अब ये बता कि यहीं पर खड़े खड़े तू अरमान को शुक्रिया कहेगी या घर के अंदर जा कर उसे बोलेगी?"
"तुम दोनों क्या खुसुर फुसुर कर रही हो?" अरमान ने दोनों को बारी बारी से देखते हुए पूछा──"अगर मुझसे कोई काम है तो बोलो वरना बेकार में मेरा समय बर्बाद मत करो। मुझे अभी सोने का सबसे बड़ा काम करना है।"
"अरे! हां वो बात ये है अरमान कि प्रिया तुमसे कुछ कहना चाहती है।" साक्षी ने झट से ये कहा तो प्रिया एकदम से चौंक कर उसकी तरफ देखने लगी।
"अच्छा, ऐसी बात है क्या?" अरमान ने प्रिया की तरफ देखा──"फिर तो मैं सबसे पहले अपने दोनों कानों को साफ कर लेता हूं। वो क्या है ना कि काफी लंबे समय से मैंने इनकी सफाई नहीं की है। प्रिया मुझसे जो कहना चाहती है वो अगर मेरे कान ठीक से सुन नहीं पाएंगे तो इससे प्रिया के द्वारा कहे गए शब्दों की तौहीन हो जाएगी। रुको, मैं अभी अपने कानों को साफ कर के आता हूं।"
अरमान जब पलट कर सचमुच अंदर की तरफ जाने लगा तो साक्षी के साथ साथ प्रिया भी बुरी तरह चौंक पड़ी।
प्रिया तो उसकी बातें सुन कर ही संजीदा हो गई थी।
अरमान के सच्चे प्रेम को उसने अच्छी तरह महसूस किया था।
अरमान का सामना करने में अब उसे ये सोच कर डर लगने लगा था कि अगर वो जज़्बातों में बह गई तो गज़ब हो जाएगा।
अरमान की हालत देख कर ही उसे ये एहसास सताने लगता था कि उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वही है।
"अरे! रुको अरमान रुको।" प्रिया की हालत को समझते हुए साक्षी ने ही कमान सम्हाली और फ़ौरन ही अरमान को रोका──"तुम भी ना, ग़ज़ब ही इंसान हो।"
अरमान वापस पलटा।
उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए थे जैसे उसे अपने कान साफ करने जाने से रोक कर साक्षी ने उस पर बहुत बड़ा अत्याचार कर दिया है।
साक्षी ये तो जानती थी कि अरमान ये सब अपने प्लान के तहत ही कर रहा है लेकिन वो ये भी जानती थी कि प्रिया के प्रति उसकी चाहत बिल्कुल भी झूठी नहीं है।
"अब यूं मुंह बना के मत खड़े रहो तुम।" फिर उसने अरमान को घूरते हुए कहा──"चलो अंदर। प्रिया तुमसे यहां थोड़े ना अपनी बात कहेगी।"
"ओह! ऐसा है क्या?" अरमान ने मूर्खों की तरह अपनी पलकें झपकाई──"ठीक है फिर, चलो आओ अंदर।"
साक्षी और प्रिया आगे पीछे अंदर दाख़िल हो गईं तो अरमान ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
"तुम्हारा सच में कुछ नहीं हो सकता।" अंदर की हालत देखते ही साक्षी ने अरमान से कहा──"पता नहीं कैसे इंसान हो तुम जो यहां ऐसी ख़राब हालत में रह लेते हो।"
"जिसे किसी बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता उसके लिए रहने वाली जगह कैसी है ये मायने नहीं रखता।" अरमान ने कहा──"मैं तो इस दीन दुनिया से विरक्त एक फ़कीर आदमी हूं। मुझे किसी भी चीज़ की चाहत नहीं है। काश! ये चाहत भी मिट जाती जो मेरे दिल में प्रिया को बेपनाह मोहब्बत करने के रूप में मौजूद है।"
उसकी ये बात सुन कर प्रिया एक बार फिर से अंदर तक कांप गई।
उसके दिल में मचलते जज़्बात शांत होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
वो अपने आपको सम्हाले रखने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी।
उसका जी चाह रहा था कि कितना जल्दी वो अरमान से दूर चली जाए।
उसे महसूस होने लगा था कि अगर थोड़ी देर और उसने अरमान की ये अजीब और दर्द भरी बातें सुनी तो वो टूट जाएगी।
इतना ही नहीं उसका दिल कहीं उसे अरमान के सीने से लिपट जाने के लिए पूरी ताक़त से उसकी तरफ ढकेल ना दे।
उसकी आंखों में बार बार आंसू तैरने लगते थे।
"अच्छा अब ये बातें छोड़ो।" साक्षी को भी बड़ा अजीब महसूस होने लगा था इस लिए उसने विषय बदलने की गरज से पूछा──"और ये बताओ कि फ्रेश हुए या सचमुच हमारे आने पर ही सो कर जागे हो?"
"हां, जागा तो अभी ही हूं।" अरमान ने सामान्य भाव से कहा──"असल में नींद तो सुबह एक बार खुली थी लेकिन आज कहीं जाने का मन नहीं किया तो फिर से सो गया।"
"ओह!" साक्षी ने कहा──"वैसे आते समय मैं प्रिया से कह भी रही थी कि अगर तुम दिन में टैक्सी चलाने जाते होगे तो शायद ही घर में तुमसे मुलाक़ात हो पाएगी। फिर ये सोच कर चले आए कि एक बार घर जा कर देख ही लेते हैं। शुक्र है तुम घर पर ही थे। ख़ैर, जाओ पहले तुम फ्रेश हो लो। तब तक हम दोनों बैठे हैं और हां आज हमारे लिए कुछ लाने की जहमत मत उठाना।"
अरमान ने सिर हिलाया और घर के पीछे की तरफ खुलने वाले दरवाज़े को खोल बाहर निकल गया।
असल में अरमान का घर बहुत पुराना था।
आज के समय के अनुसार घर के अंदर टॉयलेट अथवा बाथरूम वाली सुविधा नहीं थी बल्कि घर के पीछे जो थोड़ी सी जगह थी वहीं किनारे पर टॉयलेट बना हुआ था।
नहाने के लिए उसी से जुड़ा हुआ एक बाथरूम था।
पानी के लिए एक हैंडपंप था जो पुराने समय का था लेकिन उसमें से पानी आज भी पर्याप्त मात्रा में निकलता था।
बहरहाल, अरमान क़रीब आधे घंटे में फ्रेश हो कर तथा नहा धो कर आया।
नहा कर आने की वजह से वो ऊपर से बेलिबास ही था।
प्रिया और साक्षी के सामने ऐसे रूप में आने पर भी उसे शर्म नहीं आई।
वैसे शर्म लगने जैसी बात उस पर लागू भी नहीं होती थी क्योंकि उसे किसी बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता था।
साक्षी ने तो उसे इस रूप में पहले भी देखा था जब उसका हसबैंड विशाल उसे जबरन अपने घर ले जाता और उसे फ्रेश होने को कहता।
मगर प्रिया उसे इस रूप में पहली बार देख रही थी।
साढ़े सात साल पहले भी उसने अरमान को इस तरह ऊपर से बेलिबास नहीं देखा था।
प्रिया झिझकते हुए बार बार उसे चोर नज़रों से देखने लगती।
अरमान बाहर से भले ही फ़क़ीरों की तरह दिखता था लेकिन कुदरती तौर पर वो आज भी अंदर से अच्छा खासा दिखता था।
चौड़ी छाती पर घने घुंघराले बाल जो उसके पेट और नाभी के आस पास वाले क्षेत्र को घेरे हुए नीचे तरफ फैलते चले गए थे।
मजबूत कंधे और बलिष्ठ भुजाएं उसके मर्द होने का सबूत दे रहीं थी।
गले से ऊपर की तरफ चेहरे में बढ़ी हुई दाढ़ी मूंछें और सिर पर उलझे हुए बाल।
प्रिया बार बार चोर नज़रों से उसके जिस्म का अवलोकन करने लगती थी।
एकाएक वो चौंक पड़ी।
उसकी चोर नजरें अरमान के बाएं सीने पर एकदम दिल के पास जम सी गईं।
घुंघराले बालों की वजह से शायद पहले उसे दिखा नहीं था या फिर उसने ध्यान से देखा नहीं था लेकिन जब दुबारा उसकी नज़रें उसके सीने की तरफ गईं तो सहसा उसे ऐसा लगा जैसे उसके दिल वाले हिस्से पर कुछ लिखा हुआ है।
प्रिया ने अपनी झिझक को परे रख कर इस बार बड़े ध्यान से देखा।
अगले ही पल वो ये देख कर स्तब्ध सी रह गई कि अरमान ने अपने बाएं सीने पर उसका नाम गुदवा रखा है।
अंग्रेजी के अक्षरों में गुदा हुआ था──Priya।
ये देख प्रिया के अंदर एकदम से भूचाल सा आ गया।
एक बार पुनः वो ये सोच कर आहत सी हो गई कि उसके जैसी बेवफ़ा लड़की का नाम अरमान ने अपने सीने पर लिख रखा है।
ये उसके प्रेम का सबूत भी था और उसकी चाहत की पराकाष्ठा भी।
प्रिया को लगा उसे चक्कर आ जाएगा।
बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला।
उसके दिल की धड़कनें किसी हथौड़े की मानिंद उसकी कनपटियों पर बरसने लगीं थी।
उसका हृदय हाहाकार सा कर उठा था।
सहसा उसे अपने अंदर से एक आवाज़ सुनाई दी──"ऐसे इंसान को ठुकराने के बाद आख़िर ऐसी कौन सी खुशी और ऐसा कौन सा ऐशो आराम हासिल किया है तूने प्रिया?"
"अरे! तुझे क्या हुआ?" साक्षी की नज़र अचानक प्रिया पर पड़ी तो वो उसकी दशा देख चौंक पड़ी थी।
"क...कुछ नहीं" प्रिया उसके यूं अचानक पूछ लेने पर बुरी तरह बौखला गई। बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और फिर कहा──"म...मैं ठीक हूं।"
साक्षी ने उसे बड़े ध्यान से देखा।
प्रिया उसके यूं देखने पर बेचैन सी हो गई।
उसके चेहरे पर परेशानी और घबराहट के चलते पसीना उभर आया।
वो साक्षी से नज़रें न मिला सकी।
इधर साक्षी उसकी हालत से ज़रा भी बेख़बर नहीं थी।
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि इस वक्त प्रिया किस हालत से गुज़र रही है।
दूसरी तरफ अरमान कुछ ही दूरी पर कपड़े पहन रहा था।
उसने नहाने के बाद अपने बदन पर ना तो तेल वगैरह लगाया था और ना ही बालों पर कंघी की थी।
अपने जिस्म पर उन्हीं कपड़ों को पहन लिया जो उसने नहाने से पहले पहन रखे थे।
साक्षी उसकी इस आदत से परिचित भी थी और नाखुश भी लेकिन प्रिया को ये बहुत अजीब लगा और पीड़ा देने वाला भी।
उसके लिए सबसे बड़े दुख की बात ये थी कि वो खुद अरमान के लिए कुछ कर नहीं सकती थी।
हालाकि उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने के लिए उसका दिल उसे ज़ोर दिए जा रहा था मगर वो अपने जज़्बातों को दबाए हुए थी।
"लो साक्षी।" अरमान दोनों के सामने आ कर बोला──"तुम्हारे कहे अनुसार मैं फ्रेश हो गया। अब बताओ, तुम्हारी दोस्त क्या कहना चाहती है मुझसे?"
अरमान की ये बात सुन साक्षी के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई।
उधर प्रिया की धड़कनें बढ़ गईं।
उसे अरमान को शुक्रिया कहना मानों दुनिया का सबसे मुश्किल काम महसूस होने लगा।
शर्म, झिझक, परेशानी, घबराहट और बेचैनी ने जैसे उसे चारो तरफ से घेर लिया।
अरमान के सामने उसकी ऐसी हालत पहले कभी न हुई थी।
उल्टा वो ही अरमान पर हावी रहती थी और अरमान उससे अपनी बात कहने के लिए झिझकता था मगर आज वक्त और हालात दोनों ही अलग और विपरीत थे।
"बोलो प्रिया।" उसे असमंजस में पड़ा देख साक्षी ने कहा──"तुम अरमान से जो कहने यहां आई हो कह दो। फिर हमें चलना भी है। अरमान को भी काम पर जाना होगा।"
साक्षी की बात सुन कर प्रिया बेहद बेचैन नज़र आने लगी।
झिझक और घबराहट में इज़ाफा हो गया।
बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और पहले साक्षी की तरफ देखा फिर चेहरा ऊपर कर के अरमान को।
अरमान अपलक उसी को देखे जा रहा था।
उसकी अपनी धड़कनें भी ये सोच कर बढ़ चलीं थी कि जाने क्या कहने वाली है प्रिया उससे?
सहसा वो मन ही मन ये दुआ करने लगा कि प्रिया उससे वही कहे जो वो चाहता है।
"क्या हुआ कहो ना।" प्रिया को बेचैन भाव से अपलक अरमान को देखते देख साक्षी ने जैसे उस पर ज़ोर डाला।
"अ...अरमान म...मैं तुमसे।" प्रिया ने अपनी धाड़ धाड़ बजती धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए किंतु अटकते हुए स्वर में कहना शुरू किया। उधर अरमान की धड़कनें उसकी आवाज़ सुन मानों थम सी गईं। तभी प्रिया ने हिम्मत जुटाते हुए जैसे अपनी बात पूरी की──"म...मैं तुमसे ये कहना चाहती हूं कि तुमने मेरे प...पति की जान बचा कर मुझ पर जो उ...उपकार किया है उसके लिए तुम्हारा ब...बहुत बहुत श...शुक्रिया। म...मैं जीवन भर तुम्हारा ये उपकार नहीं भू...भूलूंगी।"
इतना कह कर प्रिया ने अपनी आंखें बंद कर ली और राहत की लंबी लंबी सांसें लेने लगी।
उसे ऐसा लगा जैसे इतना कह कर उसने बहुत बड़ी जंग फतह कर ली है।
उधर अरमान ने उसकी ये बात सुनते ही एक गहरी सांस ली।
पलक झपकते ही उसके अरमानों पर जैसे पानी फिर गया था।
कहां अचानक से इतने सालों बाद उसका मन मयूर एक खुशी का एहसास करने वाला था किन्तु अगले ही पल उसे मिलने वाली खुशी पर मानों गृहण लग गया था।
वो निराश भाव से अपलक उस प्रिया को देखे जा रहा था जो अपनी आंखें बंद किए अभी भी राहत की सांसें लेने में खोई थी।
अरमान ने पुनः एक गहरी सांस ली।
जाने क्या सोच कर उसके होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई।
इधर साक्षी की नज़रें अरमान पर ही टिकी हुईं थी।
वो भी समझ रही थी कि अरमान ने प्रिया से क्या सुनने की उम्मीद कर रखी थी।
उसे अरमान के लिए इस वक्त बहुत बुरा महसूस हो रहा था लेकिन कर भी क्या सकती थी वो।
"कमाल है।"
तभी अरमान की आवाज़ से उसके साथ साथ प्रिया का भी ध्यान उसकी तरफ गया तो उसने आंखें खोल कर तथा धड़कते दिल से अरमान की तरफ देखा।
उधर अरमान ने आगे कहा──"तो तुम इसे मेरा उपकार समझती हो? अरे! मुझे तो पता भी नहीं था कि जो आदमी एक्सीडेंट होने की वजह से लहू लुहान था और मौत के मुंह में फंसा हुआ था वो तुम्हारा पति है। मैंने तो इंसानियत के तौर पर उसकी जान बचाने के लिए बस अपना कर्म किया था। वैसे उस समय अगर मुझे ये पता भी होता तब भी मैं तुम्हारे पति की जान बचाने के लिए यही करता। मेरे अंदर लेश मात्र भी ये ख़याल न आता कि जो व्यक्ति मेरी मोहब्बत का पति है उसे बचाने का कोई प्रयास ना करूं अथवा अगर वो बच जाने वाला हो तो उसे जान बूझ के मार दूं। मेरा दिल तुम्हारी तरह पत्थर का नहीं है जो किसी पर दया भी न कर सके।"
उसकी बात सुन कर प्रिया की आंखें ये सोच कर भर आईं कि उसने उसी के सामने ऐसा कह कर मानो उसकी हक़ीक़त बता दी है।
"आश्चर्य की बात है।" उधर अरमान उसे अपलक देखते हुए पुनः बोला──"महज शुक्रिया कहने के लिए तुम इतना झिझक रही थी? इसका तो यही मतलब हुआ कि तुम आज भी मुझे कोई महत्व नहीं देती वरना तुम्हारे लिए जितना बड़ा काम मैंने किया है तुम्हारी जगह कोई और होता तो उसके लिए खुशी खुशी मेरे क़दमों में लोट कर लाखों बार मुझे शुक्रिया कहता। ख़ैर कोई बात नहीं। वैसे भी मुझे तुम्हारे शुक्रिया की ज़रूरत नहीं है और ना ही मुझे किसी के द्वारा शुक्रिया कहलवाने की हसरत है।"
"ऐसा मत कहो प्लीज़।" प्रिया का सब्र जैसे जवाब दे गया। उसकी रुलाई फूट गई। बुरी तरह सिसकते हुए बोली──"और कितना मेरी ग़लती के लिए मुझे जलील करोगे? मुझे एहसास हो चुका है कि मैंने तुम्हारे साथ बिल्कुल भी अच्छा नहीं किया था। आज तुम्हारी जो हालत है उसकी ज़िम्मेदार मैं ही हूं। मेरा यकीन करो अरमान, मैं अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हूं। मेरे बस में ही नहीं है वरना तुम्हारे लिए बहुत कुछ कर जाती। प्लीज़ माफ़ कर दो मुझे और...और मेरी वजह से खुद को यूं बरबाद मत करो। किसी अच्छी लड़की से शादी कर के अपना घर बसा लो।"
"इस दुनिया में ऐसी कोई दूसरी लड़की जन्मी ही नहीं है डियर।" अरमान ने फीकी मुस्कान के साथ कहा──"जिसे मैं मोहब्बत की नज़र से देख सकूं और जिसके साथ अपना घर बसाने का सोचूं। मेरा घर बसेगा तो सिर्फ तुम्हारे साथ वरना मरते दम तक यूं ही तुम्हारी यादों के सहारे जीता रहूंगा।"
"नहीं...नहीं प्लीज़।" प्रिया आहत भाव से मानो चीख पड़ी──"ऐसी ज़िद मत करो जो कभी पूरी ही नहीं हो सकती। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं किसी और की पत्नी हूं। मैं अपने पति को छोड़ कर तुम्हारे पास वापस नहीं आ सकती। और....और वैसे भी तुम एक ऐसी औरत के साथ घर बसाने की ज़िद क्यों किए बैठे हो जिसने तुम्हें और तुम्हारी सच्ची मोहब्बत को ठोकर मार दी हो? तुम्हें तो ऐसी औरत से सिर्फ और सिर्फ नफ़रत करनी चाहिए।"
"सच्ची मोहब्बत करने वाला दिल चाह कर भी अपनी दिलरुबा से नफ़रत नहीं कर सकता प्रिया।" अरमान ने अधीरता से कहा──"वो तो बस मोहब्बत ही करता है। हर हाल में, हर कीमत पर।"
प्रिया की आंखें पुनः छलक पड़ीं।
इस वक्त उसका चेहरा अथाह पीड़ा से भरा हुआ था।
उसके आंसू गिर कर फर्श में फ़ना हो रहे थे।
इधर साक्षी दोनों के मध्य चल रही बातों को मूक दर्शक की तरह देख और सुन रही थी।
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि दोनों में से किसे क्या बोले?
"मत करो ना ऐसा।" प्रिया आहत सी हो कर बोल पड़ी──"क्यों मुझे धर्म संकट में डालने पर तुले हुए हो? क्यों मुझे इतना सता रहे हो? क्या यही है तुम्हारी मोहब्बत? क्या मोहब्बत करने वाले ऐसे ही अपने साथी को सताते हैं और दुखी करते हैं?"
"लो, कर लो बात।" अरमान अजीब भाव से हंस पड़ा, फिर बोला──"अब तुम मुझे बताओगी कि कैसे होते हैं मोहब्बत करने वाले? ये तो वही बात हो गई कि नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने चली। छोड़ो प्रिया, मोहब्बत जैसे लफ़्ज़ तुम्हारी ज़ुबान में अच्छे नहीं लगते। वैसे भी, तुम पर तो सिर्फ एक ही बात शूट करती है और वो है अपनी ख़्वाहिश को पूरा करने के लिए अपने ही चाहने वाले को बेदर्दी से ठुकरा कर चले जाना।"
"अरमान प्लीज़।" सहसा साक्षी ने बीच में हस्ताक्षेप किया।
उसे ये डर सताने लगा था कि अरमान की कड़वी बातें सुन कर प्रिया कहीं इस क़दर न आहत हो जाए कि वो कोई ग़लत क़दम उठा ले। इस लिए अरमान से बोली──"ये तुम ठीक नहीं कर रहे हो। माना कि प्रिया ने सिर्फ अपने बारे में सोचा था और उसने तुम्हारे प्रेम को ठुकरा दिया था लेकिन उसके लिए तुम बार बार उसे उसकी ग़लती का एहसास करा कर यूं दुखी नहीं कर सकते।"
"ओह! सॉरी।" अरमान तपाक से बोल पड़ा──"आई एम वेरी वेरी सॉरी। तुमने बिल्कुल सही कहा। मुझे प्रिया को यूं दुखी करने का कोई अधिकार नहीं है।" कहने के साथ ही वो एकदम प्रिया की तरफ मुड़ा, फिर उससे बोला──"मैं तुमसे हाथ जोड़ कर अपनी इस ग़लती के लिए माफ़ी मांगता हूं प्रिया। मुझे आभास ही नहीं हो पाया था कि जज़्बातों में मैं किस क़दर बहता चला गया हूं। वो क्या है ना वर्षों से दिल में जाने कैसा कैसा गुबार दबा हुआ पड़ा था जो बेध्यानी में बाहर आ गया। प्लीज, इसके लिए माफ़ कर दो मुझे।"
"बस करो।" प्रिया की एक बार फिर रुलाई फूट गई──"मुझमें अब और कुछ भी सुनने की हिम्मत नहीं है। मेरी तुमसे एक ही विनती है कि अपने आपको यूं बर्बाद मत करो। मेरा ख़याल अपने ज़हन से निकाल कर किसी के साथ अपना घर बसा लो।"
"यार साक्षी।" अरमान साक्षी से मुखातिब हुआ──"अपनी इस दोस्त को भी तो समझाओ कि एक ही बात बार बार न बोले। मैं बता चुका हूं कि इस दुनिया में ऐसी कोई दूसरी लड़की जन्मी ही नहीं है जिसके साथ मुझे प्रेम हो सके और मैं उसके साथ अपना घर बसाने का सोचूं। मेरा घर सिर्फ और सिर्फ इसके साथ ही बसेगा वरना नहीं। अगर तुम्हारी दोस्त को मेरा घर बसाने की इतनी ही चिंता है तो कहो इससे कि अपने हसबैंड को तलाक़ दे कर मुझसे शादी करे।"
"मैं किसी को क्या बोलूं अरमान?" साक्षी जैसे खुद ही धर्म संकट में फंस गई थी──"तुम ही उसकी विवशता को समझो। एक औरत के लिए इतना आसान नहीं होता बिना किसी वजह के अपने पति को तलाक़ दे कर किसी और से शादी कर लेना।"
"तो फिर इससे कहो कि जैसे अब तक मैं इसकी यादों के सहारे जीता आया हूं।" अरमान ने कहा──"उसी तरह बाकी का जीवन भी गुज़ार लूंगा। मेरा दिल उसी को अपना बनाएगा जिसे वो प्यार करता है। बाकी किसी की चाहत नहीं है उसे।"
To be continued...
ThanksBahut hi shaandar update diya hai TheBlackBlood bhai....
Nice and lovely update....