- 81,229
- 119,094
- 354
Wo plan hi hai...aage pata chal jayegaऐसा क्यों लगता है कि अरमान की कोई प्लान कामयाबी की और बढ़ रहा हैं.... priya की वापसी शायद उसके प्लान को सुनिश्चित कर रहा है....

Wo plan hi hai...aage pata chal jayegaऐसा क्यों लगता है कि अरमान की कोई प्लान कामयाबी की और बढ़ रहा हैं.... priya की वापसी शायद उसके प्लान को सुनिश्चित कर रहा है....

Thanksदिमाग का सही इस्तेमाल दिल से होने वाले काम को भी अंजाम दे देता है.....
बहुत सही खेल रहा है अरमान प्रिया के साथ......
बस थोड़ा धैर्य और संयम से काम लेना होगा....
बहुत ही सुंदर लिखा है आपने![]()
Arman ka dost...अब ये युवक kon था जिसने अशोक की बिना लंड के ही le le
ThanksNice update....
Priya ke charo taraf halaat banaye hi is liye ja rahe taaki uske paas koi dusra option na raheKya हालत हो गयी हैं priya की...aur समय समय पर साक्षी भी उसे उलझती रहती हैं...अब देखना है कि प्रिया ये सब अशोक को बताती है कि नहीं....
प्रिया के मनो मस्तिष्क में आंधियां सी चलने लगीं थी।
चेहरे पर जाने कैसे कैसे ख़यालों के चलते अलग अलग तरह के भाव गर्दिश करते नज़र आ रहे थे।
थोड़ी देर बाद साक्षी अशोक से दो पल मिल कर चली गई।
इधर प्रिया का ज़हन विचार मंथन किए जा रहा था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर वो क्या फ़ैसला करे?
Story ka naam Beraham Ishq he
Isse jyada na kam ki apeksha hum nahi karenge.
Par ha sanyog bhi yoga yog se he bante he, ab ye yogayog prakritik ho ya sawdhani se bune hue jaal ho ye to koi nahi keh sakta
Arman ne kaha ke Ashok nashe me thaAb safai pehle Ashok dega fir uspe Arman ki kahi baat kitni sach he ye batayegi
Kahani ka saar yahi he ke pyaar matt karna aur karna to bhi itna na karna ke pyar ke ilawa tumhare paas kuchh bache na !
Arman ke liye rasta mushkil h
Armaan ke liye raasta mushkil hota jaa raha hai uske apne sathi bhi ab Priya ke liye hamdardi lekar Beth Gaye hai. Arman ko bhi sochna chahiye ki aap aaj se 8 saal pehlay ki baat ko Ghar kar ke beth gaye ho arey woh age hi jam hoti hai insaan ko itna sab cheezo ka pata nahi hota hai.
intezaar rahega....
कहते है कि कभी कभी एक छोटी सी गलती पूरी मेहनत पे पानी फेर देती है, ये accident ऐसा ही है, अपने पति को इस हालत में देख पक्का प्रिया के मन में अरमान के लिए जो कुछ भावनाएं उठी थीं वो कम हो जाएंगी, अगर प्रिया एक सही लड़की हुई तो
जो ना मिले तो सोना, जो मिल जाए तो मिट्टी।
देखते है प्रिया को कब तक ये बात समझ आएगी कि अरमान बस use कर रहा
intezaar rahega....
Bahut hi gazab ki update he TheBlackBlood Shubham Bhai
Priya par to ab musibato ka pahad tut pada he, ashok ka accident ho gaya........
May be possible ki isme arman ka koi hath ho.........
Arman priya ko wapis paane ki liye kuch bhi kar sakta he.........
Keep rocking bro
Awsome update
ऐसा क्यों लगता है कि अरमान की कोई प्लान कामयाबी की और बढ़ रहा हैं.... priya की वापसी शायद उसके प्लान को सुनिश्चित कर रहा है....
Kya हालत हो गयी हैं priya की...aur समय समय पर साक्षी भी उसे उलझती रहती हैं...अब देखना है कि प्रिया ये सब अशोक को बताती है कि नहीं....
Next update posted guys...Besabari se intezaar rahega next update la TheBlackBlood bhai....

Nice and superb update....Update ~ 16
विशाल अग्निहोत्री सुबह ऑफ़िस जाने के लिए तैयार हो कर निकल ही रहा था कि तभी दरवाज़े की घंटी बजी।
उसने जब दरवाज़ा खोला तो बाहर अरमान को देख कर चौंक पड़ा।
"थैंक गॉड, तेरे दर्शन हो गए।" फिर उसने कहा──"यार क्यों इतना टॉर्चर करता है हमें? कम से कम एक छोटा सा की-पैड मोबाइल ही रख ले ताकि तुझसे बात करने में अथवा तुझसे कॉन्टैक्ट करने में हमें आसानी रहे।"
"मेरे बिना कौन सा तेरे सिर पर आसमान टूट पड़ता है बे?"
अरमान ने कहते हुए उसे एक तरफ धकेला और अंदर दाख़िल हो कर ड्राइंग रूम की तरफ बढ़ चला।
दरवाज़ा बंद कर के विशाल भी उसके पीछे पीछे आ गया।
साक्षी बच्चों को स्कूल छोड़ने के लिए नीचे गई हुई थी।
अरमान धम्म से एक सोफे पर जा कर बैठ गया और फिर जेब से एक सिगरेट निकाल कर सुलगा ली।
उसके सामने वाले सोफे पर विशाल भी बैठ गया था।
उसके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए थे।
"अच्छा सुन, प्रिया के हसबैंड को अब मैं कंपनी में किसी बात के लिए परेशान नहीं कर सकता।" फिर उसने अरमान की तरफ देखते हुए कहा──"तू भी समझता है कि उसकी वाइफ प्रिया और साक्षी कॉलेज के समय से दोस्त हैं और अशोक खत्री इस सच को जान चुका है। ऐसे में अगर मैं उसे परेशान करूंगा तो मामला बिगड़ जाएगा।"
"तुझे मामले के बिगड़ जाने की ज़्यादा फ़िक्र है या मेरी?" अरमान ने उसकी तरफ घूरते हुए कहा──"दूसरी बात, क्या तुझे ये बताने की ज़रूरत है कि पर्सनल लाइफ़ और प्रोफ़ेशनल लाइफ़ में क्या फ़र्क होता है?"
"तो तू ये चाहता है कि मैं कंपनी के अंदर उसके साथ पूरी तरह प्रोफ़ेशनल बिहेव ही करूं?" विशाल ने कहा──"और कंपनी के बाहर जैसा चाहे बिहेव करूं?"
"बिल्कुल।" अरमान ने कहा──"मुझे पता है कि उस बुढ़ऊ ने इन संबंधों के उजागर हो जाने से ये सोच कर चैन की सांस ली होगी कि अब तू कंपनी में उसे परेशान नहीं करेगा। मैं चाहता हूं कि उस साले को ऐसा कोई चैन मिले ही नहीं बल्कि वो पहले से कहीं ज़्यादा परेशान नज़र आने लगे।"
"इससे होगा क्या?"
"बहुत कुछ होगा मेरी जान।" अरमान ने अजीब भाव से कहा──"अपने हसबैंड को ज़रूरत से ज़्यादा परेशान देख प्रिया भी परेशान होगी। जब उसे अपने हसबैंड की परेशानी का सच पता चलेगा तो वो साक्षी को बताएगी और यकीनन वो उससे यही कहेगी कि वो तुझसे इस बारे में बात करे। यानि वो साक्षी से कहेगी कि वो तुझे समझाए कि तू उसके हसबैंड को परेशान न करे। तुझे इस मामले में साक्षी से यही कहना है कि तू प्रोफ़ेशनल लाइफ़ के बीच पर्सनल लाइफ़ को ला कर कंपनी के काम को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। बहरहाल, कंपनी ना तेरे फॉदर की है और ना ही प्रिया के हसबैंड के फॉदर की।"
"समझ गया।" विशाल ने कहा──"तू ये चाहता है कि इस तरह से साक्षी और प्रिया के बीच अनबन हो जाए? ज़ाहिर सी बात है कि जब प्रिया के कहने पर साक्षी उसके हसबैंड के लिए कुछ कर ही नहीं सकेगी तो प्रिया यही समझेगी कि साक्षी के दोस्त होने का क्या फ़ायदा जब वो उसके हसबैंड के हित में कुछ कर ही नहीं सकती? इससे होगा ये कि प्रिया अपनी दोस्त साक्षी से नाराज़ हो जाएगी।"
"वाह! कितना होशियार हो गया है तू?" अरमान ने कहा──"साक्षी जैसी बीवी मिलने का यही कमाल है।"
"बकवास न कर।" विशाल ने उसे घूरा──"और ये बता कि तू प्रिया और साक्षी के बीच अनबन क्यों करवा देना चाहता है? आख़िर इससे होगा क्या?"
"उंह, खामखां तेरी तारीफ़ की मैंने।" अरमान ने बुरा सा मुंह बना लिया──"अबे बैल बुद्धि ही है क्या? अरे! बड़ी सिंपल सी बात है, जब दोनों सहेलियों के बीच अनबन हो जाएगी और किसी तरह का बोलचाल ही नहीं रहेगा तो इससे वो अपने बुढ़ऊ हसबैंड के साथ फिर से पहले की तरह अकेली हो जाएगी। ऐसे में अगर फिर से उनके ऊपर कोई मुसीबत आई तो फिर किसका सहारा लेगी वो?"
"तो ये बोल न कि तू उन्हें बेसहारा कर देना चाहता है अब।" विशाल ने कहा──"लेकिन सवाल अब भी वही है कि इससे होगा क्या? क्या इस तरह से प्रिया अपने हसबैंड को तलाक़ दे कर तेरे पास वापस आ जाएगी?"
"मैंने कब कहा कि ऐसा कर के मैं उसे वापस अपने पास बुलाने की सोच रहा हूं?" अरमान ने सिगरेट का लम्बा कश लगाते हुए कहा──"मेरे ऐसा करने का मतलब सिर्फ ये है कि बेसहारा होने के बाद जब उन दोनों के ऊपर कोई मुसीबत आए तो वो खुद ही उसका सामना करें। दूसरी तरफ प्रिया के ज़हन में ये ख़याल उभरे कि उसके कुकर्मों की सज़ा किस किस तरीके से उसे मिलनी शुरू हो गई है। उसको दुख और तकलीफ़ का एहसास कराना ही फिलहाल मेरा मक़सद है।"
"क्या इतनी तकलीफ़ सहना उसके लिए काफी नहीं है?" विशाल ने पूछा।
"तू इस छोटे से हादसे को उसके लिए तकलीफ़ समझता है?" अरमान ने उसे घूरा──"अबे, ये तो कुछ भी नहीं है। ये तो अभी शुरुआत है। दुख और तकलीफ़ क्या होती है इसका एहसास करना तो अभी बाकी है। घुट घुट के जीना क्या होता है इसका आभास करना तो अभी बाकी है। किसी की सच्ची चाहत को ठोकर मार कर चले जाने से कौन सी खुशी मिलती है इसका एहसास करना तो अभी बाकी है माय डियर।"
"पागल हो गया है तू।" विशाल आवेश में बोल पड़ा──"एक तरफ तो तू ये कहता है कि प्रिया को आज भी टूट कर प्यार करता है और दूसरी तरफ उसे इतनी तकलीफ़ भी देना चाहता है? ये कैसी मोहब्बत है भाई? सच्चा प्रेम करने वाले तो अपने महबूब को दुख तकलीफ़ देने का सोच भी नहीं सकते।"
"मैं भी कहां सोच रहा हूं डियर?" अरमान ने सपाट लहजे में कहा──"ये दुख तकलीफ़ तो उसकी नियति में लिखे हुए हैं। तुझे तो पता है कि ऊपर वाले की मर्ज़ी के बिना इस संसार में कोई पत्ता तक नहीं हिलता। प्रिया के साथ जो कुछ भी हो रहा है और जो कुछ भी आगे होगा वो सब उस ऊपर वाले की ही मर्ज़ी से तो होगा। इसमें मेरा कहीं कोई दख़ल नहीं है। यकीन मान, उसे तकलीफ़ में देख कर मेरे अपने दिल को भी तकलीफ़ होगी।"
"तेरी ये बातें सुन कर तो अब मुझे कुछ और ही लगने लगा है।" विशाल ने उसे घूरते हुए कहा──"मुझे लग रहा है कि तू ऊपर वाले की मर्ज़ी का नाम ले कर प्रिया के साथ ये खेल जान बूझ कर खेल रहा है। जान बूझ कर उसे तक़लीफ देना चाहता है।"
"अब तुझे जो सोचना है सोच।" अरमान ने लापरवाही से अपने कंधे उचकाए──"मैं तेरी समझदानी का कुछ नहीं कर सकता।"
[][][][][]
"दो चार दिनों की छुट्टी और बढ़वा लीजिए ना।" अशोक को तैयार होते देख प्रिया ने अधीरता से कहा──"अभी आप पूरी तरह से ठीक नहीं हुए हैं।"
"अरे! तुम खामखां इतनी फ़िक्र कर रही हो बेबी।" अशोक ने मुस्कुरा कर कहा──"मैं अब बिल्कुल ठीक हो गया हूं, यकीन करो।"
प्रिया उदास नज़रों से देखने लगी अशोक की तरफ।
असल में वो अपने पति के लिए सच में फिक्रमंद थी।
पिछले दो दिनों से अशोक वापस अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए बोल रहा था और प्रिया उसे जाने नहीं दे रही थी।
अशोक अच्छी तरह जानता था कि प्रिया उसके लिए फिक्रमंद है मगर वो ये भी जानता था कि अगर वो ऐसे ही फ्लैट पर पड़ा रहा तो उसकी नौकरी के साथ साथ उसकी आर्थिक स्थिति पर भी फ़र्क पड़ेगा।
"मुझे पता है कि तुम्हें मेरी बहुत फ़िक्र है बेबी।" अशोक ने उसके कंधों पर हाथ रख कर प्यार से समझाया──"लेकिन मेरा यकीन करो मैं अब पूरी तरह ठीक हूं। वैसे भी, नौकरी नहीं करूंगा तो काम कैसे चलेगा? तुम तो जानती हो कि सब कुछ नौकरी से ही संभव है। घर वालों से मैं कोई हेल्प लेना नहीं चाहता। ख़ैर अंकिता की पढ़ाई का खर्चा, घर का खर्चा और...और मेड का भी खर्चा। अब अगर मैं ऐसे ही पड़ा रहा तो सोचो ये सब कैसे हो सकेगा?"
प्रिया भी ये बात समझती थी और शायद यही वजह थी कि अब वो अपने पति को रुकने के लिए ज़्यादा दबाव नहीं डाल सकती थी।
"ठीक है।" फिर उसने उसी उदासी के साथ कहा──"लेकिन कंपनी कैसे जाएंगे? आपकी कार तो मोटर गैराज में पड़ी है।"
"कोई बात नहीं।" अशोक ने कहा──"दो चार दिनों में सेलरी आ जाएगी तो कार को गैराज से उठा लाऊंगा। तब तक ऑटो या टैक्सी से चला जाया करूंगा।"
अपने पति के मुख से ऑटो या टैक्सी से जाने की बात सुन प्रिया को बहुत बुरा लगा।
आज से पहले ऐसे हालात कभी नहीं आए थे।
प्रिया को समझ न आया कि ऐसी नाज़ुक स्थिति को कैसे अपने परिवार से दूर करे?
बहरहाल, थोड़ी ही देर में अशोक नाश्ता वगैरह कर के अपनी बेटी के साथ फ्लैट से निकल गया।
दोनों के जाने के बाद फ्लैट में अजीब सा सन्नाटा छा गया।
[][][][][]
"दीदी, आपका फ़ोन बज रहा था।" प्रिया बाथरूम से बाहर निकली तो मीरा ने उसी समय कमरे में आ कर उसे बताया──"जब आप नहा रहीं थी तब दो तीन बार बजा था आपका फ़ोन।"
मीरा की बात सुन प्रिया एकदम से फिक्रमंद सी हो गई।
उसने लपक कर बेड के एक तरफ रखे मोबाइल को उठाया।
स्क्रीन जला कर देखा तो उसमें साक्षी के तीन मिस कॉल पड़े थे।
ये देख प्रिया ने थोड़ा चैन की सांस ली।
वो ये सोच के घबरा गई थी कि कहीं उसके पति के साथ फिर से तो कुछ नहीं हो गया?
मोबाइल को वापस बेड पर रख कर उसने कपड़े पहनने शुरू कर दिए।
ड्रेसिंग टेबल के पास बैठ कर जब उसने खुद को आइने में देखा तो उसकी नज़रें अपने प्रतिबिंब पर जम सी गईं।
खुद को देखते हुए उसके मन में ख़याल उभरा कि इन कुछ दिनों में कैसे उसका चेहरा बेनूर सा हो गया है।
दो महीना पहले तक उसका चेहरा ताज़े खिले गुलाब की मानिंद खिला हुआ रहता था किंतु अब जैसे उस चेहरे में चांद की मानिंद ग्रहण लगा हुआ नज़र आ रहा था।
प्रिया ने एक गहरी सांस ली।
फिर अपने अंदर के जज़्बातों को किसी तरह दबा कर खुद को थोड़ा बहुत तैयार किया और आइने के सामने से हट गई।
अभी वो कमरे के बाहर जाने ही लगी थी कि सहसा उसे ठिठक जाना पड़ा।
अनायास ही उसकी नज़र बेड पर पड़े अपने मोबाइल पर पड़ गई थी।
उसने आगे बढ़ कर मोबाइल उठाया और साक्षी को कॉल लगा दिया।
"यार प्रिया कॉल क्यों नहीं उठा रही थी तू?" प्रिया के कान में साक्षी की आवाज़ उभरी──"पता है जाने कैसे कैसे ख़याल मेरे मन में उभरने लगे थे?"
"मैं बाथरूम में थी।" प्रिया ने सामान्य भाव से कहा──"इसी लिए तेरा कॉल नहीं उठा सकी थी। ख़ैर, किसी ज़रूरी काम से कॉल किया था क्या तूने?"
"वैसे तो इतना ज़रूरी भी नहीं था।" उधर से साक्षी ने कहा──"लेकिन एक असामान्य बात हुई थी इस लिए सोचा तुझे भी बता दूं। इसी लिए कॉल कर रही थी तुझे।"
"अ...असामान्य बात?" प्रिया ने आशंकित भाव से पूछा──"कैसी असामान्य बात?"
"अभी एक घंटा पहले।" उधर से साक्षी ने बताया──"मैंने तेरे पति अशोक को अरमान की टैक्सी में बैठे देखा था। यही बताने के लिए तुझे कॉल कर रही थी।"
"क...क्या???" प्रिया बुरी तरह उछल पड़ी।
"हां प्रिया।" उधर से साक्षी ने कहा──"वो अरमान की ही टैक्सी थी और....और ड्राइविंग सीट पर मैंने अरमान को बैठे साफ साफ देखा था। उसकी पिछली सीट पर तेरे हसबैंड अशोक जी भी बैठे हुए थे।"
साक्षी की बात सुन कर प्रिया की धड़कनें रुक सी गईं।
कानों में सांय सांय होने लगा।
ऐसा लगा जैसे पलक झपकते ही वो पत्थर में तब्दील हो गई हो।
शायद उसकी इस हालत का आभास उधर साक्षी को भी हो गया था इस लिए उसने उसे ज़ोर से पुकारा तब जा कर उसे होश आया।
प्रिया ने खुद को बड़ी मुश्किल से सम्हाला।
"ये...ये कैसे हो स...सकता है?" फिर उसने अटकते हुए कहा──"ज़...ज़रूर तुझे भ्रम हुआ होगा साक्षी। भला वो मेरे हसबैंड को अपनी टैक्सी में कैसे ले जा सकता है?"
"अरे! क्यों नहीं ले जा सकता भला?" साक्षी ने तपाक से कहा──"आख़िर टैक्सी ड्राइवर है वो। सवारी को इधर से उधर ले जाना ही तो उसका पेशा है। पहले मुझे भी लगा था कि ऐसा कैसे हो सकता है लेकिन जब मैंने अपनी आँखें फाड़ कर देखा तो पता चला कि वो अरमान ही है और उसकी टैक्सी की पिछली सीट में तेरे हसबैंड अशोक जी।"
"प...पर सुबह के वक्त तुझे ये कैसे दिख गया?" प्रिया बुरी तरह स्तब्ध थी।
"यार, बात असल में ये है कि कल शाम को मैं अपनी एक सहेली के बेटे के बर्थडे पर गई थी।" उधर से साक्षी ने कहा──"मेरे हसबैंड भी मेरे साथ गए हुए थे। बर्थडे सेलिब्रेशन होने के बाद जब मैं विशाल के साथ वापस आने लगी तो मेरी वो सहेली मुझसे रात में अपने यहां ही रुकने का आग्रह करने लगी। इसके लिए उसने विशाल से भी रिक्वेस्ट की। विशाल को भी उसकी रिक्वेस्ट माननी पड़ी। ख़ैर विशाल तो आ गए थे लेकिन मैं अर्चना के यहां ही रुक गई थी। मैंने उससे साफ कह दिया था कि सुबह मुझे अपने बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेजना होता है इस लिए मैं सुबह जल्दी ही अपने घर लौट जाऊंगी। फिर सुबह सुबह ही जब मैं उसके घर से चलने को तैयार हुई तो वो बोली कि ऐसे मत जा। फ्रेश होने के बाद चाय नाश्ता कर के जा। ज़बरदस्ती मेरे फ़ोन से विशाल को कॉल कर के बता भी दिया कि मैं उसके यहां से चाय नाश्ता कर के ही आ पाऊंगी अतः वो खुद ही बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेज दें। मुझे उस पर गुस्सा तो आया लेकिन क्या कर सकती थी? ख़ैर उसके यहां से मैं चाय नाश्ता कर के ही वापस अपने घर आ रही थी। वो खुद अपनी कार में मुझे छोड़ने आ रही थी। एक घंटा पहले तेरे फ्लैट के सामने वाले रास्ते से ही हम जा रहे थे कि अचानक मेरी नज़र टैक्सी पर बैठे अरमान और तेरे हसबैंड अशोक जी पर पड़ गई। मैं ये सोच कर चौंक गई कि तेरे हसबैंड अरमान की टैक्सी में कैसे हो सकते हैं?"
"क्या अरमान ने भी तुझे देखा था?"
"मुझे नहीं लगता कि उसने मुझे देखा होगा।" साक्षी ने कहा──"लेकिन यार, पक्के तौर पर नहीं कह सकती।"
प्रिया को समझ न आया कि क्या कहे?
उसकी धड़कनें रुक रुक के चल रहीं थी।
मन में कई तरह के ख़यालों का बवंडर सा चल पड़ा था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये कैसा विचित्र संजोग हो रहा है उसके साथ।
"क्या सोचने लगी प्रिया?" उसे ख़ामोश जान उधर से साक्षी ने जैसे उसे पुकारते हुए पूछा──"क्या लगता है तुझे? मेरा मतलब है कि क्या अरमान ने तेरे हसबैंड से कुछ कहा होगा या कोई बातचीत की होगी? माना कि तेरे हसबैंड उससे परिचित नहीं हैं लेकिन अरमान तो उन्हें अच्छी तरह जानता ही है?"
"म...मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा साक्षी।" प्रिया ने बेचैनी से गहरी सांस ले कर कहा──"पता नहीं ऊपर वाला ये कैसे दिन दिखा रहा है मुझे। ऐसे विचित्र संजोग अथवा ऐसी घटनाएं क्यों होने दे रहा है वो? आख़िर चाहता क्या है वो?"
"इस सबको देखने के बाद मुझे तो अब बस एक ही बात समझ आ रही है प्रिया।" साक्षी ने कहा──"और वो ये कि ऊपर वाला खुद ये चाहता है कि तेरा बार बार अरमान से सामना हो और उसकी हालत का तुझे एहसास हो।"
"मुझे उसकी हालत का एहसास हो चुका है साक्षी।" प्रिया ने जैसे हताश हो कर कहा──"अब और कितना एहसास करवाना चाहता है ऊपर वाला?"
"ऐसा तू समझ रही है प्रिया कि तुझे अरमान की हालत का एहसास हो चुका है और ये भी कि तेरी वजह से ही आज उसकी ये हालत है।" साक्षी मानो एक ही सांस में कहती चली जा रही थी──"जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं। अगर सच में तुझे उसकी हालत का एहसास होता और तू ये समझती कि तेरी वजह से ही आज उसकी ये हालत है तो तू उसकी बेहतरी के लिए अथवा उसका जीवन संवारने के लिए वही करती जो वो चाहता है।"
"ये तू कैसी बातें कर रही है?" प्रिया की धड़कनें एकाएक धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं──"तू भी अच्छी तरह जानती है कि मैं ऐसा नहीं कर सकती। अपने हंसते खेलते संसार को एक झटके में तूफ़ान के हवाले कर के उसकी दुनिया को आबाद नहीं कर सकती।"
"यही तो फ़र्क है डियर तुझमें और अरमान में।" उधर से साक्षी ने कहा──"उसने तेरी चाहत के सिवा कभी किसी और चीज़ की चाहत नहीं की। कदाचित ये सोच कर कि इससे उसकी सच्ची चाहत की तौहीन होगी। उसने सिर्फ तेरी चाहत की और तेरी यादों के सहारे अपनी मुकम्मल ज़िंदगी गुज़ार देने का फ़ैसला किया। जबकि तू हमेशा सिर्फ अपने बारे में ही सोचती रही। आज भी वही कर रही है। अपने उस संसार के बारे में सोच रही हो जो असल में तेरा कभी अपना बन ही नहीं सका। कहने के लिए हसबैंड तो मिला मगर हसबैंड के द्वारा तू खुद के बच्चे की मां नहीं बन सकी। हसबैंड के साथ एक बेटी भी मिली लेकिन दुर्भाग्य कि उसने भी तुझे कभी मां नहीं कहा। तू अपने उस परिवार की ऐसी सदस्य बन के रह रही है जिसे आया कहा जाता है। मेरी ये बातें यकीनन तेरे दिल पर नश्तर सा चलाने लगीं होंगी लेकिन सच्चाई यही है प्रिया। खुद सोच कि क्या ऐसा नहीं है? क्या तू एक आया की तरह अपने हसबैंड और बेटी की देख भाल नहीं कर रही है?"
साक्षी ने ग़लत नहीं कहा था।
यकीनन उसकी बातें नश्तर की तरह प्रिया के दिल को ही क्या बल्कि उसकी आत्मा तक को चीरती हुई चली गईं थी।
उसके अंदर क्रोध और आक्रोश का बवंडर तो उठा लेकिन फिर उसने उसे पूरी ताक़त लगा कर दबा दिया।
उसका जी चाहा कि साक्षी पर ज़ोर से चीखे और उसे बताए कि जैसा वो सोच रही है वैसा नहीं है मगर इस ख़याल को भी उसने अपने मन से निकाल दिया।
"मैं मानती हूं प्रिया कि आया जैसी हैसियत से ही सही लेकिन तेरा इस संसार में अपने हसबैंड और सौतेली बेटी के साथ रहना कहीं से भी ग़लत नहीं है।" साक्षी ने थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद कहा──"लेकिन अपनी हक़ीक़त जानने के बाद और ख़ास कर ये जानने के बाद कि तेरी वजह से कोई अपनी मुकम्मल ज़िंदगी बर्बाद किए हुए है तो कैसे तू अपने इस संसार में चैन और सुकून से जी सकती है? क्या तेरी अंतर्रात्मा पल पल तुझे ये नहीं कहेगी कि जिसकी तूने दुनिया बर्बाद की है उसे अब भी क्यों बेसहारा छोड़ रखा है तूने? क्या तेरी अंतर्रात्मा तुझसे ये नहीं कहेगी कि जो आज भी सिर्फ और सिर्फ तुझे ही टूट टूट कर चाहता है और तेरी ही आरज़ू में घुट घुट के जी रहा है उसके साथ ना इंसाफी कैसे कर सकती है तू? क्या वो तुझसे ये नहीं कहेगी कि अपनी झूठी दुनिया को बचाए रखने के लिए तू एक ऐसे व्यक्ति की दुनिया को गर्क करती जा रही है जो सिर्फ तेरी ही चाहत में जी रहा है?"
"ब..बस कर।" प्रिया एकदम चीख ही पड़ी──"इतनी कठोरता से कैसे तू मुझे ये सब कह सकती है? क्या तुझे मेरी हालत का और मेरी मज़बूरी का ज़रा भी एहसास नहीं है?"
"बिल्कुल है प्रिया।" साक्षी ने कहा──"मुझे अच्छी तरह एहसास है कि तुझ पर क्या गुज़र रही है।"
"फिर भी ये सब बोले जा रही है?" प्रिया ने जैसे शिकायत की।
"बोल इस लिए रही हूं क्योंकि मुझे ये भी एहसास हो चुका है कि तू अगर अपनी ज़िद पर ही अड़ी रही तो कभी चैन और सुकून से जी नहीं पाएगी।" साक्षी ने कहा──"तू अपने हसबैंड और सौतेली बेटी अंकिता के साथ रहेगी तो ज़रूर लेकिन तेरे मन से ये ख़याल अब जा ही नहीं सकता कि तेरी वजह से एक शख़्स आज भी घुट घुट के जी रहा है। तू लाख कोशिश करेगी उसे अपने दिलो दिमाग़ से निकालने की लेकिन निकाल नहीं पाएगी। ऐसे में जब तू खुद ही खुश नहीं रहेगी तो अपने हसबैंड और अंकिता का ख़याल कैसे रख पाएगी? इसी लिए ऐसी बातें कर के तुझे एहसास करवा रही हूं कि अब तेरे लिए क्या बेहतर है और तुझे क्या करना चाहिए। मानती हूं कि अशोक जी को सारी बात बताने के बाद जब तू उनसे तलाक़ की बात कहेगी तो उन्हें बेहद दुख होगा लेकिन मुझे यकीन है कि वो भी तेरी मज़बूरी समझेंगे और तुझे वापस अरमान के पास जाने को कहेंगे। अरमान के बारे में जब उन्हें पता चलेगा तो यकीनन उन्हें भी एहसास होगा कि तेरी ज़रूरत सबसे ज़्यादा उन्हें नहीं बल्कि अरमान को है। प्रिया, अगर तू सच्चे दिल से चाहती है कि अरमान की दुनिया आबाद हो और हर किसी की तरह वो भी हंसी खुशी ज़िंदगी जीने लगे तो तुझे ये करना ही होगा। मैं तेरी दोस्त हूं, तुझे ग़लत सलाह नहीं दे सकती और ये तू भी जानती है।"
सच तो ये था कि प्रिया के अंदर विचारों की आंधियां चलने लगीं थी।
वो एक ऐसे भंवर में खुद को फंसा हुआ महसूस कर रही ही जहां से निकल पाना उसे बेहद ही मुश्किल लग रहा था।
"अच्छा, अब रखती हूं।" प्रिया जब कुछ देर तक कुछ न बोली तो उधर से साक्षी ने कहा──"एक सच्ची दोस्त होने के नाते मैंने तुझे हर तरह से इस बारे में समझाया है। अब तुझे क्या करना है ये तू जान। आज के बाद मैं इस बारे में तुझसे कोई बात नहीं करूंगी, बाय।"
कॉल डिस्कनेक्ट हुई तो प्रिया को अपने कानों में सांय सांय सा महसूस होने लगा।
अभी वो उस भंवर में फंसी ही हुई थी कि तभी मीरा कमरे में दाख़िल हुई।
उसने बताया कि लंच रेडी कर दिया है उसने और अब वो जा रही है।
प्रिया ने ख़ामोशी से उसे जाने की इजाज़त दी और बेड पर धम्म से इस तरह बैठ गई जैसे बहुत ज़्यादा थक गई हो।
To be continued...
Bahut hi shaandar update diya hai TheBlackBlood bhai....Update ~ 16
विशाल अग्निहोत्री सुबह ऑफ़िस जाने के लिए तैयार हो कर निकल ही रहा था कि तभी दरवाज़े की घंटी बजी।
उसने जब दरवाज़ा खोला तो बाहर अरमान को देख कर चौंक पड़ा।
"थैंक गॉड, तेरे दर्शन हो गए।" फिर उसने कहा──"यार क्यों इतना टॉर्चर करता है हमें? कम से कम एक छोटा सा की-पैड मोबाइल ही रख ले ताकि तुझसे बात करने में अथवा तुझसे कॉन्टैक्ट करने में हमें आसानी रहे।"
"मेरे बिना कौन सा तेरे सिर पर आसमान टूट पड़ता है बे?"
अरमान ने कहते हुए उसे एक तरफ धकेला और अंदर दाख़िल हो कर ड्राइंग रूम की तरफ बढ़ चला।
दरवाज़ा बंद कर के विशाल भी उसके पीछे पीछे आ गया।
साक्षी बच्चों को स्कूल छोड़ने के लिए नीचे गई हुई थी।
अरमान धम्म से एक सोफे पर जा कर बैठ गया और फिर जेब से एक सिगरेट निकाल कर सुलगा ली।
उसके सामने वाले सोफे पर विशाल भी बैठ गया था।
उसके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए थे।
"अच्छा सुन, प्रिया के हसबैंड को अब मैं कंपनी में किसी बात के लिए परेशान नहीं कर सकता।" फिर उसने अरमान की तरफ देखते हुए कहा──"तू भी समझता है कि उसकी वाइफ प्रिया और साक्षी कॉलेज के समय से दोस्त हैं और अशोक खत्री इस सच को जान चुका है। ऐसे में अगर मैं उसे परेशान करूंगा तो मामला बिगड़ जाएगा।"
"तुझे मामले के बिगड़ जाने की ज़्यादा फ़िक्र है या मेरी?" अरमान ने उसकी तरफ घूरते हुए कहा──"दूसरी बात, क्या तुझे ये बताने की ज़रूरत है कि पर्सनल लाइफ़ और प्रोफ़ेशनल लाइफ़ में क्या फ़र्क होता है?"
"तो तू ये चाहता है कि मैं कंपनी के अंदर उसके साथ पूरी तरह प्रोफ़ेशनल बिहेव ही करूं?" विशाल ने कहा──"और कंपनी के बाहर जैसा चाहे बिहेव करूं?"
"बिल्कुल।" अरमान ने कहा──"मुझे पता है कि उस बुढ़ऊ ने इन संबंधों के उजागर हो जाने से ये सोच कर चैन की सांस ली होगी कि अब तू कंपनी में उसे परेशान नहीं करेगा। मैं चाहता हूं कि उस साले को ऐसा कोई चैन मिले ही नहीं बल्कि वो पहले से कहीं ज़्यादा परेशान नज़र आने लगे।"
"इससे होगा क्या?"
"बहुत कुछ होगा मेरी जान।" अरमान ने अजीब भाव से कहा──"अपने हसबैंड को ज़रूरत से ज़्यादा परेशान देख प्रिया भी परेशान होगी। जब उसे अपने हसबैंड की परेशानी का सच पता चलेगा तो वो साक्षी को बताएगी और यकीनन वो उससे यही कहेगी कि वो तुझसे इस बारे में बात करे। यानि वो साक्षी से कहेगी कि वो तुझे समझाए कि तू उसके हसबैंड को परेशान न करे। तुझे इस मामले में साक्षी से यही कहना है कि तू प्रोफ़ेशनल लाइफ़ के बीच पर्सनल लाइफ़ को ला कर कंपनी के काम को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। बहरहाल, कंपनी ना तेरे फॉदर की है और ना ही प्रिया के हसबैंड के फॉदर की।"
"समझ गया।" विशाल ने कहा──"तू ये चाहता है कि इस तरह से साक्षी और प्रिया के बीच अनबन हो जाए? ज़ाहिर सी बात है कि जब प्रिया के कहने पर साक्षी उसके हसबैंड के लिए कुछ कर ही नहीं सकेगी तो प्रिया यही समझेगी कि साक्षी के दोस्त होने का क्या फ़ायदा जब वो उसके हसबैंड के हित में कुछ कर ही नहीं सकती? इससे होगा ये कि प्रिया अपनी दोस्त साक्षी से नाराज़ हो जाएगी।"
"वाह! कितना होशियार हो गया है तू?" अरमान ने कहा──"साक्षी जैसी बीवी मिलने का यही कमाल है।"
"बकवास न कर।" विशाल ने उसे घूरा──"और ये बता कि तू प्रिया और साक्षी के बीच अनबन क्यों करवा देना चाहता है? आख़िर इससे होगा क्या?"
"उंह, खामखां तेरी तारीफ़ की मैंने।" अरमान ने बुरा सा मुंह बना लिया──"अबे बैल बुद्धि ही है क्या? अरे! बड़ी सिंपल सी बात है, जब दोनों सहेलियों के बीच अनबन हो जाएगी और किसी तरह का बोलचाल ही नहीं रहेगा तो इससे वो अपने बुढ़ऊ हसबैंड के साथ फिर से पहले की तरह अकेली हो जाएगी। ऐसे में अगर फिर से उनके ऊपर कोई मुसीबत आई तो फिर किसका सहारा लेगी वो?"
"तो ये बोल न कि तू उन्हें बेसहारा कर देना चाहता है अब।" विशाल ने कहा──"लेकिन सवाल अब भी वही है कि इससे होगा क्या? क्या इस तरह से प्रिया अपने हसबैंड को तलाक़ दे कर तेरे पास वापस आ जाएगी?"
"मैंने कब कहा कि ऐसा कर के मैं उसे वापस अपने पास बुलाने की सोच रहा हूं?" अरमान ने सिगरेट का लम्बा कश लगाते हुए कहा──"मेरे ऐसा करने का मतलब सिर्फ ये है कि बेसहारा होने के बाद जब उन दोनों के ऊपर कोई मुसीबत आए तो वो खुद ही उसका सामना करें। दूसरी तरफ प्रिया के ज़हन में ये ख़याल उभरे कि उसके कुकर्मों की सज़ा किस किस तरीके से उसे मिलनी शुरू हो गई है। उसको दुख और तकलीफ़ का एहसास कराना ही फिलहाल मेरा मक़सद है।"
"क्या इतनी तकलीफ़ सहना उसके लिए काफी नहीं है?" विशाल ने पूछा।
"तू इस छोटे से हादसे को उसके लिए तकलीफ़ समझता है?" अरमान ने उसे घूरा──"अबे, ये तो कुछ भी नहीं है। ये तो अभी शुरुआत है। दुख और तकलीफ़ क्या होती है इसका एहसास करना तो अभी बाकी है। घुट घुट के जीना क्या होता है इसका आभास करना तो अभी बाकी है। किसी की सच्ची चाहत को ठोकर मार कर चले जाने से कौन सी खुशी मिलती है इसका एहसास करना तो अभी बाकी है माय डियर।"
"पागल हो गया है तू।" विशाल आवेश में बोल पड़ा──"एक तरफ तो तू ये कहता है कि प्रिया को आज भी टूट कर प्यार करता है और दूसरी तरफ उसे इतनी तकलीफ़ भी देना चाहता है? ये कैसी मोहब्बत है भाई? सच्चा प्रेम करने वाले तो अपने महबूब को दुख तकलीफ़ देने का सोच भी नहीं सकते।"
"मैं भी कहां सोच रहा हूं डियर?" अरमान ने सपाट लहजे में कहा──"ये दुख तकलीफ़ तो उसकी नियति में लिखे हुए हैं। तुझे तो पता है कि ऊपर वाले की मर्ज़ी के बिना इस संसार में कोई पत्ता तक नहीं हिलता। प्रिया के साथ जो कुछ भी हो रहा है और जो कुछ भी आगे होगा वो सब उस ऊपर वाले की ही मर्ज़ी से तो होगा। इसमें मेरा कहीं कोई दख़ल नहीं है। यकीन मान, उसे तकलीफ़ में देख कर मेरे अपने दिल को भी तकलीफ़ होगी।"
"तेरी ये बातें सुन कर तो अब मुझे कुछ और ही लगने लगा है।" विशाल ने उसे घूरते हुए कहा──"मुझे लग रहा है कि तू ऊपर वाले की मर्ज़ी का नाम ले कर प्रिया के साथ ये खेल जान बूझ कर खेल रहा है। जान बूझ कर उसे तक़लीफ देना चाहता है।"
"अब तुझे जो सोचना है सोच।" अरमान ने लापरवाही से अपने कंधे उचकाए──"मैं तेरी समझदानी का कुछ नहीं कर सकता।"
[][][][][]
"दो चार दिनों की छुट्टी और बढ़वा लीजिए ना।" अशोक को तैयार होते देख प्रिया ने अधीरता से कहा──"अभी आप पूरी तरह से ठीक नहीं हुए हैं।"
"अरे! तुम खामखां इतनी फ़िक्र कर रही हो बेबी।" अशोक ने मुस्कुरा कर कहा──"मैं अब बिल्कुल ठीक हो गया हूं, यकीन करो।"
प्रिया उदास नज़रों से देखने लगी अशोक की तरफ।
असल में वो अपने पति के लिए सच में फिक्रमंद थी।
पिछले दो दिनों से अशोक वापस अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए बोल रहा था और प्रिया उसे जाने नहीं दे रही थी।
अशोक अच्छी तरह जानता था कि प्रिया उसके लिए फिक्रमंद है मगर वो ये भी जानता था कि अगर वो ऐसे ही फ्लैट पर पड़ा रहा तो उसकी नौकरी के साथ साथ उसकी आर्थिक स्थिति पर भी फ़र्क पड़ेगा।
"मुझे पता है कि तुम्हें मेरी बहुत फ़िक्र है बेबी।" अशोक ने उसके कंधों पर हाथ रख कर प्यार से समझाया──"लेकिन मेरा यकीन करो मैं अब पूरी तरह ठीक हूं। वैसे भी, नौकरी नहीं करूंगा तो काम कैसे चलेगा? तुम तो जानती हो कि सब कुछ नौकरी से ही संभव है। घर वालों से मैं कोई हेल्प लेना नहीं चाहता। ख़ैर अंकिता की पढ़ाई का खर्चा, घर का खर्चा और...और मेड का भी खर्चा। अब अगर मैं ऐसे ही पड़ा रहा तो सोचो ये सब कैसे हो सकेगा?"
प्रिया भी ये बात समझती थी और शायद यही वजह थी कि अब वो अपने पति को रुकने के लिए ज़्यादा दबाव नहीं डाल सकती थी।
"ठीक है।" फिर उसने उसी उदासी के साथ कहा──"लेकिन कंपनी कैसे जाएंगे? आपकी कार तो मोटर गैराज में पड़ी है।"
"कोई बात नहीं।" अशोक ने कहा──"दो चार दिनों में सेलरी आ जाएगी तो कार को गैराज से उठा लाऊंगा। तब तक ऑटो या टैक्सी से चला जाया करूंगा।"
अपने पति के मुख से ऑटो या टैक्सी से जाने की बात सुन प्रिया को बहुत बुरा लगा।
आज से पहले ऐसे हालात कभी नहीं आए थे।
प्रिया को समझ न आया कि ऐसी नाज़ुक स्थिति को कैसे अपने परिवार से दूर करे?
बहरहाल, थोड़ी ही देर में अशोक नाश्ता वगैरह कर के अपनी बेटी के साथ फ्लैट से निकल गया।
दोनों के जाने के बाद फ्लैट में अजीब सा सन्नाटा छा गया।
[][][][][]
"दीदी, आपका फ़ोन बज रहा था।" प्रिया बाथरूम से बाहर निकली तो मीरा ने उसी समय कमरे में आ कर उसे बताया──"जब आप नहा रहीं थी तब दो तीन बार बजा था आपका फ़ोन।"
मीरा की बात सुन प्रिया एकदम से फिक्रमंद सी हो गई।
उसने लपक कर बेड के एक तरफ रखे मोबाइल को उठाया।
स्क्रीन जला कर देखा तो उसमें साक्षी के तीन मिस कॉल पड़े थे।
ये देख प्रिया ने थोड़ा चैन की सांस ली।
वो ये सोच के घबरा गई थी कि कहीं उसके पति के साथ फिर से तो कुछ नहीं हो गया?
मोबाइल को वापस बेड पर रख कर उसने कपड़े पहनने शुरू कर दिए।
ड्रेसिंग टेबल के पास बैठ कर जब उसने खुद को आइने में देखा तो उसकी नज़रें अपने प्रतिबिंब पर जम सी गईं।
खुद को देखते हुए उसके मन में ख़याल उभरा कि इन कुछ दिनों में कैसे उसका चेहरा बेनूर सा हो गया है।
दो महीना पहले तक उसका चेहरा ताज़े खिले गुलाब की मानिंद खिला हुआ रहता था किंतु अब जैसे उस चेहरे में चांद की मानिंद ग्रहण लगा हुआ नज़र आ रहा था।
प्रिया ने एक गहरी सांस ली।
फिर अपने अंदर के जज़्बातों को किसी तरह दबा कर खुद को थोड़ा बहुत तैयार किया और आइने के सामने से हट गई।
अभी वो कमरे के बाहर जाने ही लगी थी कि सहसा उसे ठिठक जाना पड़ा।
अनायास ही उसकी नज़र बेड पर पड़े अपने मोबाइल पर पड़ गई थी।
उसने आगे बढ़ कर मोबाइल उठाया और साक्षी को कॉल लगा दिया।
"यार प्रिया कॉल क्यों नहीं उठा रही थी तू?" प्रिया के कान में साक्षी की आवाज़ उभरी──"पता है जाने कैसे कैसे ख़याल मेरे मन में उभरने लगे थे?"
"मैं बाथरूम में थी।" प्रिया ने सामान्य भाव से कहा──"इसी लिए तेरा कॉल नहीं उठा सकी थी। ख़ैर, किसी ज़रूरी काम से कॉल किया था क्या तूने?"
"वैसे तो इतना ज़रूरी भी नहीं था।" उधर से साक्षी ने कहा──"लेकिन एक असामान्य बात हुई थी इस लिए सोचा तुझे भी बता दूं। इसी लिए कॉल कर रही थी तुझे।"
"अ...असामान्य बात?" प्रिया ने आशंकित भाव से पूछा──"कैसी असामान्य बात?"
"अभी एक घंटा पहले।" उधर से साक्षी ने बताया──"मैंने तेरे पति अशोक को अरमान की टैक्सी में बैठे देखा था। यही बताने के लिए तुझे कॉल कर रही थी।"
"क...क्या???" प्रिया बुरी तरह उछल पड़ी।
"हां प्रिया।" उधर से साक्षी ने कहा──"वो अरमान की ही टैक्सी थी और....और ड्राइविंग सीट पर मैंने अरमान को बैठे साफ साफ देखा था। उसकी पिछली सीट पर तेरे हसबैंड अशोक जी भी बैठे हुए थे।"
साक्षी की बात सुन कर प्रिया की धड़कनें रुक सी गईं।
कानों में सांय सांय होने लगा।
ऐसा लगा जैसे पलक झपकते ही वो पत्थर में तब्दील हो गई हो।
शायद उसकी इस हालत का आभास उधर साक्षी को भी हो गया था इस लिए उसने उसे ज़ोर से पुकारा तब जा कर उसे होश आया।
प्रिया ने खुद को बड़ी मुश्किल से सम्हाला।
"ये...ये कैसे हो स...सकता है?" फिर उसने अटकते हुए कहा──"ज़...ज़रूर तुझे भ्रम हुआ होगा साक्षी। भला वो मेरे हसबैंड को अपनी टैक्सी में कैसे ले जा सकता है?"
"अरे! क्यों नहीं ले जा सकता भला?" साक्षी ने तपाक से कहा──"आख़िर टैक्सी ड्राइवर है वो। सवारी को इधर से उधर ले जाना ही तो उसका पेशा है। पहले मुझे भी लगा था कि ऐसा कैसे हो सकता है लेकिन जब मैंने अपनी आँखें फाड़ कर देखा तो पता चला कि वो अरमान ही है और उसकी टैक्सी की पिछली सीट में तेरे हसबैंड अशोक जी।"
"प...पर सुबह के वक्त तुझे ये कैसे दिख गया?" प्रिया बुरी तरह स्तब्ध थी।
"यार, बात असल में ये है कि कल शाम को मैं अपनी एक सहेली के बेटे के बर्थडे पर गई थी।" उधर से साक्षी ने कहा──"मेरे हसबैंड भी मेरे साथ गए हुए थे। बर्थडे सेलिब्रेशन होने के बाद जब मैं विशाल के साथ वापस आने लगी तो मेरी वो सहेली मुझसे रात में अपने यहां ही रुकने का आग्रह करने लगी। इसके लिए उसने विशाल से भी रिक्वेस्ट की। विशाल को भी उसकी रिक्वेस्ट माननी पड़ी। ख़ैर विशाल तो आ गए थे लेकिन मैं अर्चना के यहां ही रुक गई थी। मैंने उससे साफ कह दिया था कि सुबह मुझे अपने बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेजना होता है इस लिए मैं सुबह जल्दी ही अपने घर लौट जाऊंगी। फिर सुबह सुबह ही जब मैं उसके घर से चलने को तैयार हुई तो वो बोली कि ऐसे मत जा। फ्रेश होने के बाद चाय नाश्ता कर के जा। ज़बरदस्ती मेरे फ़ोन से विशाल को कॉल कर के बता भी दिया कि मैं उसके यहां से चाय नाश्ता कर के ही आ पाऊंगी अतः वो खुद ही बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेज दें। मुझे उस पर गुस्सा तो आया लेकिन क्या कर सकती थी? ख़ैर उसके यहां से मैं चाय नाश्ता कर के ही वापस अपने घर आ रही थी। वो खुद अपनी कार में मुझे छोड़ने आ रही थी। एक घंटा पहले तेरे फ्लैट के सामने वाले रास्ते से ही हम जा रहे थे कि अचानक मेरी नज़र टैक्सी पर बैठे अरमान और तेरे हसबैंड अशोक जी पर पड़ गई। मैं ये सोच कर चौंक गई कि तेरे हसबैंड अरमान की टैक्सी में कैसे हो सकते हैं?"
"क्या अरमान ने भी तुझे देखा था?"
"मुझे नहीं लगता कि उसने मुझे देखा होगा।" साक्षी ने कहा──"लेकिन यार, पक्के तौर पर नहीं कह सकती।"
प्रिया को समझ न आया कि क्या कहे?
उसकी धड़कनें रुक रुक के चल रहीं थी।
मन में कई तरह के ख़यालों का बवंडर सा चल पड़ा था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये कैसा विचित्र संजोग हो रहा है उसके साथ।
"क्या सोचने लगी प्रिया?" उसे ख़ामोश जान उधर से साक्षी ने जैसे उसे पुकारते हुए पूछा──"क्या लगता है तुझे? मेरा मतलब है कि क्या अरमान ने तेरे हसबैंड से कुछ कहा होगा या कोई बातचीत की होगी? माना कि तेरे हसबैंड उससे परिचित नहीं हैं लेकिन अरमान तो उन्हें अच्छी तरह जानता ही है?"
"म...मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा साक्षी।" प्रिया ने बेचैनी से गहरी सांस ले कर कहा──"पता नहीं ऊपर वाला ये कैसे दिन दिखा रहा है मुझे। ऐसे विचित्र संजोग अथवा ऐसी घटनाएं क्यों होने दे रहा है वो? आख़िर चाहता क्या है वो?"
"इस सबको देखने के बाद मुझे तो अब बस एक ही बात समझ आ रही है प्रिया।" साक्षी ने कहा──"और वो ये कि ऊपर वाला खुद ये चाहता है कि तेरा बार बार अरमान से सामना हो और उसकी हालत का तुझे एहसास हो।"
"मुझे उसकी हालत का एहसास हो चुका है साक्षी।" प्रिया ने जैसे हताश हो कर कहा──"अब और कितना एहसास करवाना चाहता है ऊपर वाला?"
"ऐसा तू समझ रही है प्रिया कि तुझे अरमान की हालत का एहसास हो चुका है और ये भी कि तेरी वजह से ही आज उसकी ये हालत है।" साक्षी मानो एक ही सांस में कहती चली जा रही थी──"जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं। अगर सच में तुझे उसकी हालत का एहसास होता और तू ये समझती कि तेरी वजह से ही आज उसकी ये हालत है तो तू उसकी बेहतरी के लिए अथवा उसका जीवन संवारने के लिए वही करती जो वो चाहता है।"
"ये तू कैसी बातें कर रही है?" प्रिया की धड़कनें एकाएक धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं──"तू भी अच्छी तरह जानती है कि मैं ऐसा नहीं कर सकती। अपने हंसते खेलते संसार को एक झटके में तूफ़ान के हवाले कर के उसकी दुनिया को आबाद नहीं कर सकती।"
"यही तो फ़र्क है डियर तुझमें और अरमान में।" उधर से साक्षी ने कहा──"उसने तेरी चाहत के सिवा कभी किसी और चीज़ की चाहत नहीं की। कदाचित ये सोच कर कि इससे उसकी सच्ची चाहत की तौहीन होगी। उसने सिर्फ तेरी चाहत की और तेरी यादों के सहारे अपनी मुकम्मल ज़िंदगी गुज़ार देने का फ़ैसला किया। जबकि तू हमेशा सिर्फ अपने बारे में ही सोचती रही। आज भी वही कर रही है। अपने उस संसार के बारे में सोच रही हो जो असल में तेरा कभी अपना बन ही नहीं सका। कहने के लिए हसबैंड तो मिला मगर हसबैंड के द्वारा तू खुद के बच्चे की मां नहीं बन सकी। हसबैंड के साथ एक बेटी भी मिली लेकिन दुर्भाग्य कि उसने भी तुझे कभी मां नहीं कहा। तू अपने उस परिवार की ऐसी सदस्य बन के रह रही है जिसे आया कहा जाता है। मेरी ये बातें यकीनन तेरे दिल पर नश्तर सा चलाने लगीं होंगी लेकिन सच्चाई यही है प्रिया। खुद सोच कि क्या ऐसा नहीं है? क्या तू एक आया की तरह अपने हसबैंड और बेटी की देख भाल नहीं कर रही है?"
साक्षी ने ग़लत नहीं कहा था।
यकीनन उसकी बातें नश्तर की तरह प्रिया के दिल को ही क्या बल्कि उसकी आत्मा तक को चीरती हुई चली गईं थी।
उसके अंदर क्रोध और आक्रोश का बवंडर तो उठा लेकिन फिर उसने उसे पूरी ताक़त लगा कर दबा दिया।
उसका जी चाहा कि साक्षी पर ज़ोर से चीखे और उसे बताए कि जैसा वो सोच रही है वैसा नहीं है मगर इस ख़याल को भी उसने अपने मन से निकाल दिया।
"मैं मानती हूं प्रिया कि आया जैसी हैसियत से ही सही लेकिन तेरा इस संसार में अपने हसबैंड और सौतेली बेटी के साथ रहना कहीं से भी ग़लत नहीं है।" साक्षी ने थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद कहा──"लेकिन अपनी हक़ीक़त जानने के बाद और ख़ास कर ये जानने के बाद कि तेरी वजह से कोई अपनी मुकम्मल ज़िंदगी बर्बाद किए हुए है तो कैसे तू अपने इस संसार में चैन और सुकून से जी सकती है? क्या तेरी अंतर्रात्मा पल पल तुझे ये नहीं कहेगी कि जिसकी तूने दुनिया बर्बाद की है उसे अब भी क्यों बेसहारा छोड़ रखा है तूने? क्या तेरी अंतर्रात्मा तुझसे ये नहीं कहेगी कि जो आज भी सिर्फ और सिर्फ तुझे ही टूट टूट कर चाहता है और तेरी ही आरज़ू में घुट घुट के जी रहा है उसके साथ ना इंसाफी कैसे कर सकती है तू? क्या वो तुझसे ये नहीं कहेगी कि अपनी झूठी दुनिया को बचाए रखने के लिए तू एक ऐसे व्यक्ति की दुनिया को गर्क करती जा रही है जो सिर्फ तेरी ही चाहत में जी रहा है?"
"ब..बस कर।" प्रिया एकदम चीख ही पड़ी──"इतनी कठोरता से कैसे तू मुझे ये सब कह सकती है? क्या तुझे मेरी हालत का और मेरी मज़बूरी का ज़रा भी एहसास नहीं है?"
"बिल्कुल है प्रिया।" साक्षी ने कहा──"मुझे अच्छी तरह एहसास है कि तुझ पर क्या गुज़र रही है।"
"फिर भी ये सब बोले जा रही है?" प्रिया ने जैसे शिकायत की।
"बोल इस लिए रही हूं क्योंकि मुझे ये भी एहसास हो चुका है कि तू अगर अपनी ज़िद पर ही अड़ी रही तो कभी चैन और सुकून से जी नहीं पाएगी।" साक्षी ने कहा──"तू अपने हसबैंड और सौतेली बेटी अंकिता के साथ रहेगी तो ज़रूर लेकिन तेरे मन से ये ख़याल अब जा ही नहीं सकता कि तेरी वजह से एक शख़्स आज भी घुट घुट के जी रहा है। तू लाख कोशिश करेगी उसे अपने दिलो दिमाग़ से निकालने की लेकिन निकाल नहीं पाएगी। ऐसे में जब तू खुद ही खुश नहीं रहेगी तो अपने हसबैंड और अंकिता का ख़याल कैसे रख पाएगी? इसी लिए ऐसी बातें कर के तुझे एहसास करवा रही हूं कि अब तेरे लिए क्या बेहतर है और तुझे क्या करना चाहिए। मानती हूं कि अशोक जी को सारी बात बताने के बाद जब तू उनसे तलाक़ की बात कहेगी तो उन्हें बेहद दुख होगा लेकिन मुझे यकीन है कि वो भी तेरी मज़बूरी समझेंगे और तुझे वापस अरमान के पास जाने को कहेंगे। अरमान के बारे में जब उन्हें पता चलेगा तो यकीनन उन्हें भी एहसास होगा कि तेरी ज़रूरत सबसे ज़्यादा उन्हें नहीं बल्कि अरमान को है। प्रिया, अगर तू सच्चे दिल से चाहती है कि अरमान की दुनिया आबाद हो और हर किसी की तरह वो भी हंसी खुशी ज़िंदगी जीने लगे तो तुझे ये करना ही होगा। मैं तेरी दोस्त हूं, तुझे ग़लत सलाह नहीं दे सकती और ये तू भी जानती है।"
सच तो ये था कि प्रिया के अंदर विचारों की आंधियां चलने लगीं थी।
वो एक ऐसे भंवर में खुद को फंसा हुआ महसूस कर रही ही जहां से निकल पाना उसे बेहद ही मुश्किल लग रहा था।
"अच्छा, अब रखती हूं।" प्रिया जब कुछ देर तक कुछ न बोली तो उधर से साक्षी ने कहा──"एक सच्ची दोस्त होने के नाते मैंने तुझे हर तरह से इस बारे में समझाया है। अब तुझे क्या करना है ये तू जान। आज के बाद मैं इस बारे में तुझसे कोई बात नहीं करूंगी, बाय।"
कॉल डिस्कनेक्ट हुई तो प्रिया को अपने कानों में सांय सांय सा महसूस होने लगा।
अभी वो उस भंवर में फंसी ही हुई थी कि तभी मीरा कमरे में दाख़िल हुई।
उसने बताया कि लंच रेडी कर दिया है उसने और अब वो जा रही है।
प्रिया ने ख़ामोशी से उसे जाने की इजाज़त दी और बेड पर धम्म से इस तरह बैठ गई जैसे बहुत ज़्यादा थक गई हो।
To be continued...
Nice update....Update ~ 16
विशाल अग्निहोत्री सुबह ऑफ़िस जाने के लिए तैयार हो कर निकल ही रहा था कि तभी दरवाज़े की घंटी बजी।
उसने जब दरवाज़ा खोला तो बाहर अरमान को देख कर चौंक पड़ा।
"थैंक गॉड, तेरे दर्शन हो गए।" फिर उसने कहा──"यार क्यों इतना टॉर्चर करता है हमें? कम से कम एक छोटा सा की-पैड मोबाइल ही रख ले ताकि तुझसे बात करने में अथवा तुझसे कॉन्टैक्ट करने में हमें आसानी रहे।"
"मेरे बिना कौन सा तेरे सिर पर आसमान टूट पड़ता है बे?"
अरमान ने कहते हुए उसे एक तरफ धकेला और अंदर दाख़िल हो कर ड्राइंग रूम की तरफ बढ़ चला।
दरवाज़ा बंद कर के विशाल भी उसके पीछे पीछे आ गया।
साक्षी बच्चों को स्कूल छोड़ने के लिए नीचे गई हुई थी।
अरमान धम्म से एक सोफे पर जा कर बैठ गया और फिर जेब से एक सिगरेट निकाल कर सुलगा ली।
उसके सामने वाले सोफे पर विशाल भी बैठ गया था।
उसके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए थे।
"अच्छा सुन, प्रिया के हसबैंड को अब मैं कंपनी में किसी बात के लिए परेशान नहीं कर सकता।" फिर उसने अरमान की तरफ देखते हुए कहा──"तू भी समझता है कि उसकी वाइफ प्रिया और साक्षी कॉलेज के समय से दोस्त हैं और अशोक खत्री इस सच को जान चुका है। ऐसे में अगर मैं उसे परेशान करूंगा तो मामला बिगड़ जाएगा।"
"तुझे मामले के बिगड़ जाने की ज़्यादा फ़िक्र है या मेरी?" अरमान ने उसकी तरफ घूरते हुए कहा──"दूसरी बात, क्या तुझे ये बताने की ज़रूरत है कि पर्सनल लाइफ़ और प्रोफ़ेशनल लाइफ़ में क्या फ़र्क होता है?"
"तो तू ये चाहता है कि मैं कंपनी के अंदर उसके साथ पूरी तरह प्रोफ़ेशनल बिहेव ही करूं?" विशाल ने कहा──"और कंपनी के बाहर जैसा चाहे बिहेव करूं?"
"बिल्कुल।" अरमान ने कहा──"मुझे पता है कि उस बुढ़ऊ ने इन संबंधों के उजागर हो जाने से ये सोच कर चैन की सांस ली होगी कि अब तू कंपनी में उसे परेशान नहीं करेगा। मैं चाहता हूं कि उस साले को ऐसा कोई चैन मिले ही नहीं बल्कि वो पहले से कहीं ज़्यादा परेशान नज़र आने लगे।"
"इससे होगा क्या?"
"बहुत कुछ होगा मेरी जान।" अरमान ने अजीब भाव से कहा──"अपने हसबैंड को ज़रूरत से ज़्यादा परेशान देख प्रिया भी परेशान होगी। जब उसे अपने हसबैंड की परेशानी का सच पता चलेगा तो वो साक्षी को बताएगी और यकीनन वो उससे यही कहेगी कि वो तुझसे इस बारे में बात करे। यानि वो साक्षी से कहेगी कि वो तुझे समझाए कि तू उसके हसबैंड को परेशान न करे। तुझे इस मामले में साक्षी से यही कहना है कि तू प्रोफ़ेशनल लाइफ़ के बीच पर्सनल लाइफ़ को ला कर कंपनी के काम को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। बहरहाल, कंपनी ना तेरे फॉदर की है और ना ही प्रिया के हसबैंड के फॉदर की।"
"समझ गया।" विशाल ने कहा──"तू ये चाहता है कि इस तरह से साक्षी और प्रिया के बीच अनबन हो जाए? ज़ाहिर सी बात है कि जब प्रिया के कहने पर साक्षी उसके हसबैंड के लिए कुछ कर ही नहीं सकेगी तो प्रिया यही समझेगी कि साक्षी के दोस्त होने का क्या फ़ायदा जब वो उसके हसबैंड के हित में कुछ कर ही नहीं सकती? इससे होगा ये कि प्रिया अपनी दोस्त साक्षी से नाराज़ हो जाएगी।"
"वाह! कितना होशियार हो गया है तू?" अरमान ने कहा──"साक्षी जैसी बीवी मिलने का यही कमाल है।"
"बकवास न कर।" विशाल ने उसे घूरा──"और ये बता कि तू प्रिया और साक्षी के बीच अनबन क्यों करवा देना चाहता है? आख़िर इससे होगा क्या?"
"उंह, खामखां तेरी तारीफ़ की मैंने।" अरमान ने बुरा सा मुंह बना लिया──"अबे बैल बुद्धि ही है क्या? अरे! बड़ी सिंपल सी बात है, जब दोनों सहेलियों के बीच अनबन हो जाएगी और किसी तरह का बोलचाल ही नहीं रहेगा तो इससे वो अपने बुढ़ऊ हसबैंड के साथ फिर से पहले की तरह अकेली हो जाएगी। ऐसे में अगर फिर से उनके ऊपर कोई मुसीबत आई तो फिर किसका सहारा लेगी वो?"
"तो ये बोल न कि तू उन्हें बेसहारा कर देना चाहता है अब।" विशाल ने कहा──"लेकिन सवाल अब भी वही है कि इससे होगा क्या? क्या इस तरह से प्रिया अपने हसबैंड को तलाक़ दे कर तेरे पास वापस आ जाएगी?"
"मैंने कब कहा कि ऐसा कर के मैं उसे वापस अपने पास बुलाने की सोच रहा हूं?" अरमान ने सिगरेट का लम्बा कश लगाते हुए कहा──"मेरे ऐसा करने का मतलब सिर्फ ये है कि बेसहारा होने के बाद जब उन दोनों के ऊपर कोई मुसीबत आए तो वो खुद ही उसका सामना करें। दूसरी तरफ प्रिया के ज़हन में ये ख़याल उभरे कि उसके कुकर्मों की सज़ा किस किस तरीके से उसे मिलनी शुरू हो गई है। उसको दुख और तकलीफ़ का एहसास कराना ही फिलहाल मेरा मक़सद है।"
"क्या इतनी तकलीफ़ सहना उसके लिए काफी नहीं है?" विशाल ने पूछा।
"तू इस छोटे से हादसे को उसके लिए तकलीफ़ समझता है?" अरमान ने उसे घूरा──"अबे, ये तो कुछ भी नहीं है। ये तो अभी शुरुआत है। दुख और तकलीफ़ क्या होती है इसका एहसास करना तो अभी बाकी है। घुट घुट के जीना क्या होता है इसका आभास करना तो अभी बाकी है। किसी की सच्ची चाहत को ठोकर मार कर चले जाने से कौन सी खुशी मिलती है इसका एहसास करना तो अभी बाकी है माय डियर।"
"पागल हो गया है तू।" विशाल आवेश में बोल पड़ा──"एक तरफ तो तू ये कहता है कि प्रिया को आज भी टूट कर प्यार करता है और दूसरी तरफ उसे इतनी तकलीफ़ भी देना चाहता है? ये कैसी मोहब्बत है भाई? सच्चा प्रेम करने वाले तो अपने महबूब को दुख तकलीफ़ देने का सोच भी नहीं सकते।"
"मैं भी कहां सोच रहा हूं डियर?" अरमान ने सपाट लहजे में कहा──"ये दुख तकलीफ़ तो उसकी नियति में लिखे हुए हैं। तुझे तो पता है कि ऊपर वाले की मर्ज़ी के बिना इस संसार में कोई पत्ता तक नहीं हिलता। प्रिया के साथ जो कुछ भी हो रहा है और जो कुछ भी आगे होगा वो सब उस ऊपर वाले की ही मर्ज़ी से तो होगा। इसमें मेरा कहीं कोई दख़ल नहीं है। यकीन मान, उसे तकलीफ़ में देख कर मेरे अपने दिल को भी तकलीफ़ होगी।"
"तेरी ये बातें सुन कर तो अब मुझे कुछ और ही लगने लगा है।" विशाल ने उसे घूरते हुए कहा──"मुझे लग रहा है कि तू ऊपर वाले की मर्ज़ी का नाम ले कर प्रिया के साथ ये खेल जान बूझ कर खेल रहा है। जान बूझ कर उसे तक़लीफ देना चाहता है।"
"अब तुझे जो सोचना है सोच।" अरमान ने लापरवाही से अपने कंधे उचकाए──"मैं तेरी समझदानी का कुछ नहीं कर सकता।"
[][][][][]
"दो चार दिनों की छुट्टी और बढ़वा लीजिए ना।" अशोक को तैयार होते देख प्रिया ने अधीरता से कहा──"अभी आप पूरी तरह से ठीक नहीं हुए हैं।"
"अरे! तुम खामखां इतनी फ़िक्र कर रही हो बेबी।" अशोक ने मुस्कुरा कर कहा──"मैं अब बिल्कुल ठीक हो गया हूं, यकीन करो।"
प्रिया उदास नज़रों से देखने लगी अशोक की तरफ।
असल में वो अपने पति के लिए सच में फिक्रमंद थी।
पिछले दो दिनों से अशोक वापस अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए बोल रहा था और प्रिया उसे जाने नहीं दे रही थी।
अशोक अच्छी तरह जानता था कि प्रिया उसके लिए फिक्रमंद है मगर वो ये भी जानता था कि अगर वो ऐसे ही फ्लैट पर पड़ा रहा तो उसकी नौकरी के साथ साथ उसकी आर्थिक स्थिति पर भी फ़र्क पड़ेगा।
"मुझे पता है कि तुम्हें मेरी बहुत फ़िक्र है बेबी।" अशोक ने उसके कंधों पर हाथ रख कर प्यार से समझाया──"लेकिन मेरा यकीन करो मैं अब पूरी तरह ठीक हूं। वैसे भी, नौकरी नहीं करूंगा तो काम कैसे चलेगा? तुम तो जानती हो कि सब कुछ नौकरी से ही संभव है। घर वालों से मैं कोई हेल्प लेना नहीं चाहता। ख़ैर अंकिता की पढ़ाई का खर्चा, घर का खर्चा और...और मेड का भी खर्चा। अब अगर मैं ऐसे ही पड़ा रहा तो सोचो ये सब कैसे हो सकेगा?"
प्रिया भी ये बात समझती थी और शायद यही वजह थी कि अब वो अपने पति को रुकने के लिए ज़्यादा दबाव नहीं डाल सकती थी।
"ठीक है।" फिर उसने उसी उदासी के साथ कहा──"लेकिन कंपनी कैसे जाएंगे? आपकी कार तो मोटर गैराज में पड़ी है।"
"कोई बात नहीं।" अशोक ने कहा──"दो चार दिनों में सेलरी आ जाएगी तो कार को गैराज से उठा लाऊंगा। तब तक ऑटो या टैक्सी से चला जाया करूंगा।"
अपने पति के मुख से ऑटो या टैक्सी से जाने की बात सुन प्रिया को बहुत बुरा लगा।
आज से पहले ऐसे हालात कभी नहीं आए थे।
प्रिया को समझ न आया कि ऐसी नाज़ुक स्थिति को कैसे अपने परिवार से दूर करे?
बहरहाल, थोड़ी ही देर में अशोक नाश्ता वगैरह कर के अपनी बेटी के साथ फ्लैट से निकल गया।
दोनों के जाने के बाद फ्लैट में अजीब सा सन्नाटा छा गया।
[][][][][]
"दीदी, आपका फ़ोन बज रहा था।" प्रिया बाथरूम से बाहर निकली तो मीरा ने उसी समय कमरे में आ कर उसे बताया──"जब आप नहा रहीं थी तब दो तीन बार बजा था आपका फ़ोन।"
मीरा की बात सुन प्रिया एकदम से फिक्रमंद सी हो गई।
उसने लपक कर बेड के एक तरफ रखे मोबाइल को उठाया।
स्क्रीन जला कर देखा तो उसमें साक्षी के तीन मिस कॉल पड़े थे।
ये देख प्रिया ने थोड़ा चैन की सांस ली।
वो ये सोच के घबरा गई थी कि कहीं उसके पति के साथ फिर से तो कुछ नहीं हो गया?
मोबाइल को वापस बेड पर रख कर उसने कपड़े पहनने शुरू कर दिए।
ड्रेसिंग टेबल के पास बैठ कर जब उसने खुद को आइने में देखा तो उसकी नज़रें अपने प्रतिबिंब पर जम सी गईं।
खुद को देखते हुए उसके मन में ख़याल उभरा कि इन कुछ दिनों में कैसे उसका चेहरा बेनूर सा हो गया है।
दो महीना पहले तक उसका चेहरा ताज़े खिले गुलाब की मानिंद खिला हुआ रहता था किंतु अब जैसे उस चेहरे में चांद की मानिंद ग्रहण लगा हुआ नज़र आ रहा था।
प्रिया ने एक गहरी सांस ली।
फिर अपने अंदर के जज़्बातों को किसी तरह दबा कर खुद को थोड़ा बहुत तैयार किया और आइने के सामने से हट गई।
अभी वो कमरे के बाहर जाने ही लगी थी कि सहसा उसे ठिठक जाना पड़ा।
अनायास ही उसकी नज़र बेड पर पड़े अपने मोबाइल पर पड़ गई थी।
उसने आगे बढ़ कर मोबाइल उठाया और साक्षी को कॉल लगा दिया।
"यार प्रिया कॉल क्यों नहीं उठा रही थी तू?" प्रिया के कान में साक्षी की आवाज़ उभरी──"पता है जाने कैसे कैसे ख़याल मेरे मन में उभरने लगे थे?"
"मैं बाथरूम में थी।" प्रिया ने सामान्य भाव से कहा──"इसी लिए तेरा कॉल नहीं उठा सकी थी। ख़ैर, किसी ज़रूरी काम से कॉल किया था क्या तूने?"
"वैसे तो इतना ज़रूरी भी नहीं था।" उधर से साक्षी ने कहा──"लेकिन एक असामान्य बात हुई थी इस लिए सोचा तुझे भी बता दूं। इसी लिए कॉल कर रही थी तुझे।"
"अ...असामान्य बात?" प्रिया ने आशंकित भाव से पूछा──"कैसी असामान्य बात?"
"अभी एक घंटा पहले।" उधर से साक्षी ने बताया──"मैंने तेरे पति अशोक को अरमान की टैक्सी में बैठे देखा था। यही बताने के लिए तुझे कॉल कर रही थी।"
"क...क्या???" प्रिया बुरी तरह उछल पड़ी।
"हां प्रिया।" उधर से साक्षी ने कहा──"वो अरमान की ही टैक्सी थी और....और ड्राइविंग सीट पर मैंने अरमान को बैठे साफ साफ देखा था। उसकी पिछली सीट पर तेरे हसबैंड अशोक जी भी बैठे हुए थे।"
साक्षी की बात सुन कर प्रिया की धड़कनें रुक सी गईं।
कानों में सांय सांय होने लगा।
ऐसा लगा जैसे पलक झपकते ही वो पत्थर में तब्दील हो गई हो।
शायद उसकी इस हालत का आभास उधर साक्षी को भी हो गया था इस लिए उसने उसे ज़ोर से पुकारा तब जा कर उसे होश आया।
प्रिया ने खुद को बड़ी मुश्किल से सम्हाला।
"ये...ये कैसे हो स...सकता है?" फिर उसने अटकते हुए कहा──"ज़...ज़रूर तुझे भ्रम हुआ होगा साक्षी। भला वो मेरे हसबैंड को अपनी टैक्सी में कैसे ले जा सकता है?"
"अरे! क्यों नहीं ले जा सकता भला?" साक्षी ने तपाक से कहा──"आख़िर टैक्सी ड्राइवर है वो। सवारी को इधर से उधर ले जाना ही तो उसका पेशा है। पहले मुझे भी लगा था कि ऐसा कैसे हो सकता है लेकिन जब मैंने अपनी आँखें फाड़ कर देखा तो पता चला कि वो अरमान ही है और उसकी टैक्सी की पिछली सीट में तेरे हसबैंड अशोक जी।"
"प...पर सुबह के वक्त तुझे ये कैसे दिख गया?" प्रिया बुरी तरह स्तब्ध थी।
"यार, बात असल में ये है कि कल शाम को मैं अपनी एक सहेली के बेटे के बर्थडे पर गई थी।" उधर से साक्षी ने कहा──"मेरे हसबैंड भी मेरे साथ गए हुए थे। बर्थडे सेलिब्रेशन होने के बाद जब मैं विशाल के साथ वापस आने लगी तो मेरी वो सहेली मुझसे रात में अपने यहां ही रुकने का आग्रह करने लगी। इसके लिए उसने विशाल से भी रिक्वेस्ट की। विशाल को भी उसकी रिक्वेस्ट माननी पड़ी। ख़ैर विशाल तो आ गए थे लेकिन मैं अर्चना के यहां ही रुक गई थी। मैंने उससे साफ कह दिया था कि सुबह मुझे अपने बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेजना होता है इस लिए मैं सुबह जल्दी ही अपने घर लौट जाऊंगी। फिर सुबह सुबह ही जब मैं उसके घर से चलने को तैयार हुई तो वो बोली कि ऐसे मत जा। फ्रेश होने के बाद चाय नाश्ता कर के जा। ज़बरदस्ती मेरे फ़ोन से विशाल को कॉल कर के बता भी दिया कि मैं उसके यहां से चाय नाश्ता कर के ही आ पाऊंगी अतः वो खुद ही बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेज दें। मुझे उस पर गुस्सा तो आया लेकिन क्या कर सकती थी? ख़ैर उसके यहां से मैं चाय नाश्ता कर के ही वापस अपने घर आ रही थी। वो खुद अपनी कार में मुझे छोड़ने आ रही थी। एक घंटा पहले तेरे फ्लैट के सामने वाले रास्ते से ही हम जा रहे थे कि अचानक मेरी नज़र टैक्सी पर बैठे अरमान और तेरे हसबैंड अशोक जी पर पड़ गई। मैं ये सोच कर चौंक गई कि तेरे हसबैंड अरमान की टैक्सी में कैसे हो सकते हैं?"
"क्या अरमान ने भी तुझे देखा था?"
"मुझे नहीं लगता कि उसने मुझे देखा होगा।" साक्षी ने कहा──"लेकिन यार, पक्के तौर पर नहीं कह सकती।"
प्रिया को समझ न आया कि क्या कहे?
उसकी धड़कनें रुक रुक के चल रहीं थी।
मन में कई तरह के ख़यालों का बवंडर सा चल पड़ा था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये कैसा विचित्र संजोग हो रहा है उसके साथ।
"क्या सोचने लगी प्रिया?" उसे ख़ामोश जान उधर से साक्षी ने जैसे उसे पुकारते हुए पूछा──"क्या लगता है तुझे? मेरा मतलब है कि क्या अरमान ने तेरे हसबैंड से कुछ कहा होगा या कोई बातचीत की होगी? माना कि तेरे हसबैंड उससे परिचित नहीं हैं लेकिन अरमान तो उन्हें अच्छी तरह जानता ही है?"
"म...मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा साक्षी।" प्रिया ने बेचैनी से गहरी सांस ले कर कहा──"पता नहीं ऊपर वाला ये कैसे दिन दिखा रहा है मुझे। ऐसे विचित्र संजोग अथवा ऐसी घटनाएं क्यों होने दे रहा है वो? आख़िर चाहता क्या है वो?"
"इस सबको देखने के बाद मुझे तो अब बस एक ही बात समझ आ रही है प्रिया।" साक्षी ने कहा──"और वो ये कि ऊपर वाला खुद ये चाहता है कि तेरा बार बार अरमान से सामना हो और उसकी हालत का तुझे एहसास हो।"
"मुझे उसकी हालत का एहसास हो चुका है साक्षी।" प्रिया ने जैसे हताश हो कर कहा──"अब और कितना एहसास करवाना चाहता है ऊपर वाला?"
"ऐसा तू समझ रही है प्रिया कि तुझे अरमान की हालत का एहसास हो चुका है और ये भी कि तेरी वजह से ही आज उसकी ये हालत है।" साक्षी मानो एक ही सांस में कहती चली जा रही थी──"जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं। अगर सच में तुझे उसकी हालत का एहसास होता और तू ये समझती कि तेरी वजह से ही आज उसकी ये हालत है तो तू उसकी बेहतरी के लिए अथवा उसका जीवन संवारने के लिए वही करती जो वो चाहता है।"
"ये तू कैसी बातें कर रही है?" प्रिया की धड़कनें एकाएक धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं──"तू भी अच्छी तरह जानती है कि मैं ऐसा नहीं कर सकती। अपने हंसते खेलते संसार को एक झटके में तूफ़ान के हवाले कर के उसकी दुनिया को आबाद नहीं कर सकती।"
"यही तो फ़र्क है डियर तुझमें और अरमान में।" उधर से साक्षी ने कहा──"उसने तेरी चाहत के सिवा कभी किसी और चीज़ की चाहत नहीं की। कदाचित ये सोच कर कि इससे उसकी सच्ची चाहत की तौहीन होगी। उसने सिर्फ तेरी चाहत की और तेरी यादों के सहारे अपनी मुकम्मल ज़िंदगी गुज़ार देने का फ़ैसला किया। जबकि तू हमेशा सिर्फ अपने बारे में ही सोचती रही। आज भी वही कर रही है। अपने उस संसार के बारे में सोच रही हो जो असल में तेरा कभी अपना बन ही नहीं सका। कहने के लिए हसबैंड तो मिला मगर हसबैंड के द्वारा तू खुद के बच्चे की मां नहीं बन सकी। हसबैंड के साथ एक बेटी भी मिली लेकिन दुर्भाग्य कि उसने भी तुझे कभी मां नहीं कहा। तू अपने उस परिवार की ऐसी सदस्य बन के रह रही है जिसे आया कहा जाता है। मेरी ये बातें यकीनन तेरे दिल पर नश्तर सा चलाने लगीं होंगी लेकिन सच्चाई यही है प्रिया। खुद सोच कि क्या ऐसा नहीं है? क्या तू एक आया की तरह अपने हसबैंड और बेटी की देख भाल नहीं कर रही है?"
साक्षी ने ग़लत नहीं कहा था।
यकीनन उसकी बातें नश्तर की तरह प्रिया के दिल को ही क्या बल्कि उसकी आत्मा तक को चीरती हुई चली गईं थी।
उसके अंदर क्रोध और आक्रोश का बवंडर तो उठा लेकिन फिर उसने उसे पूरी ताक़त लगा कर दबा दिया।
उसका जी चाहा कि साक्षी पर ज़ोर से चीखे और उसे बताए कि जैसा वो सोच रही है वैसा नहीं है मगर इस ख़याल को भी उसने अपने मन से निकाल दिया।
"मैं मानती हूं प्रिया कि आया जैसी हैसियत से ही सही लेकिन तेरा इस संसार में अपने हसबैंड और सौतेली बेटी के साथ रहना कहीं से भी ग़लत नहीं है।" साक्षी ने थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद कहा──"लेकिन अपनी हक़ीक़त जानने के बाद और ख़ास कर ये जानने के बाद कि तेरी वजह से कोई अपनी मुकम्मल ज़िंदगी बर्बाद किए हुए है तो कैसे तू अपने इस संसार में चैन और सुकून से जी सकती है? क्या तेरी अंतर्रात्मा पल पल तुझे ये नहीं कहेगी कि जिसकी तूने दुनिया बर्बाद की है उसे अब भी क्यों बेसहारा छोड़ रखा है तूने? क्या तेरी अंतर्रात्मा तुझसे ये नहीं कहेगी कि जो आज भी सिर्फ और सिर्फ तुझे ही टूट टूट कर चाहता है और तेरी ही आरज़ू में घुट घुट के जी रहा है उसके साथ ना इंसाफी कैसे कर सकती है तू? क्या वो तुझसे ये नहीं कहेगी कि अपनी झूठी दुनिया को बचाए रखने के लिए तू एक ऐसे व्यक्ति की दुनिया को गर्क करती जा रही है जो सिर्फ तेरी ही चाहत में जी रहा है?"
"ब..बस कर।" प्रिया एकदम चीख ही पड़ी──"इतनी कठोरता से कैसे तू मुझे ये सब कह सकती है? क्या तुझे मेरी हालत का और मेरी मज़बूरी का ज़रा भी एहसास नहीं है?"
"बिल्कुल है प्रिया।" साक्षी ने कहा──"मुझे अच्छी तरह एहसास है कि तुझ पर क्या गुज़र रही है।"
"फिर भी ये सब बोले जा रही है?" प्रिया ने जैसे शिकायत की।
"बोल इस लिए रही हूं क्योंकि मुझे ये भी एहसास हो चुका है कि तू अगर अपनी ज़िद पर ही अड़ी रही तो कभी चैन और सुकून से जी नहीं पाएगी।" साक्षी ने कहा──"तू अपने हसबैंड और सौतेली बेटी अंकिता के साथ रहेगी तो ज़रूर लेकिन तेरे मन से ये ख़याल अब जा ही नहीं सकता कि तेरी वजह से एक शख़्स आज भी घुट घुट के जी रहा है। तू लाख कोशिश करेगी उसे अपने दिलो दिमाग़ से निकालने की लेकिन निकाल नहीं पाएगी। ऐसे में जब तू खुद ही खुश नहीं रहेगी तो अपने हसबैंड और अंकिता का ख़याल कैसे रख पाएगी? इसी लिए ऐसी बातें कर के तुझे एहसास करवा रही हूं कि अब तेरे लिए क्या बेहतर है और तुझे क्या करना चाहिए। मानती हूं कि अशोक जी को सारी बात बताने के बाद जब तू उनसे तलाक़ की बात कहेगी तो उन्हें बेहद दुख होगा लेकिन मुझे यकीन है कि वो भी तेरी मज़बूरी समझेंगे और तुझे वापस अरमान के पास जाने को कहेंगे। अरमान के बारे में जब उन्हें पता चलेगा तो यकीनन उन्हें भी एहसास होगा कि तेरी ज़रूरत सबसे ज़्यादा उन्हें नहीं बल्कि अरमान को है। प्रिया, अगर तू सच्चे दिल से चाहती है कि अरमान की दुनिया आबाद हो और हर किसी की तरह वो भी हंसी खुशी ज़िंदगी जीने लगे तो तुझे ये करना ही होगा। मैं तेरी दोस्त हूं, तुझे ग़लत सलाह नहीं दे सकती और ये तू भी जानती है।"
सच तो ये था कि प्रिया के अंदर विचारों की आंधियां चलने लगीं थी।
वो एक ऐसे भंवर में खुद को फंसा हुआ महसूस कर रही ही जहां से निकल पाना उसे बेहद ही मुश्किल लग रहा था।
"अच्छा, अब रखती हूं।" प्रिया जब कुछ देर तक कुछ न बोली तो उधर से साक्षी ने कहा──"एक सच्ची दोस्त होने के नाते मैंने तुझे हर तरह से इस बारे में समझाया है। अब तुझे क्या करना है ये तू जान। आज के बाद मैं इस बारे में तुझसे कोई बात नहीं करूंगी, बाय।"
कॉल डिस्कनेक्ट हुई तो प्रिया को अपने कानों में सांय सांय सा महसूस होने लगा।
अभी वो उस भंवर में फंसी ही हुई थी कि तभी मीरा कमरे में दाख़िल हुई।
उसने बताया कि लंच रेडी कर दिया है उसने और अब वो जा रही है।
प्रिया ने ख़ामोशी से उसे जाने की इजाज़त दी और बेड पर धम्म से इस तरह बैठ गई जैसे बहुत ज़्यादा थक गई हो।
To be continued...