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Incest किताब ने कराया मां बेटे का मिलन (Complete)

Monster Dick

the black cock™
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दालान में पूरा अंधेरा था, धीरे धीरे मैं उन्हें तेज तेज चोदने लगा और मेरे धक्कों ने पूरा रफ्तार पकड़ लिया, खटिया चर्रर्रर्रर चर्रर्रर्रर करने लगी, न चाहते हुए भी दोनों के मुंह से कामुक सिसकारियां निकलने ही लगी, मैंने दोनों हाँथ नीचे ले जाकर अपनी अम्मा के विशाल नितम्बों को थामकर हल्का सा ऊपर उठाया और कस कस के पूरा लंड उनकी रसीली बूर में पेलने लगा ।

वो तेज तेज सिसकते हुए अब नीचे से शर्मो हया त्यागकर अपनी चौड़ी गाँड़ हल्का हल्का ऊपर को उछाल उछाल कर अपने सगे बेटे से चुदवाने लगी। परम आनंद में दोनों माँ बेटे डूब गए, तेज तेज धक्के मारने के साथ साथ मैं उनके गालों और होंठों को चूमने लगा, वो मदहोशी में मेरा साथ देने लगी, मैं उनकी तेज धक्कों के साथ हिलती हुई चूचीयों को कस कस के दबाने लगा और वो परम उत्तेजना में और भी सिसकने लगी।

रात के घनघोर अंधेरे में मेरा लंड अपनी ही सगी माँ की बूर में घपाघप अंदर बाहर हो रहा था, कुछ ही देर में जब बूर बहुत ज्यादा पनिया गयी तो रजाई के अंदर चुदायी की फच्च फच्च आवाज़ें गूंजने लगी, उनकी नंगी जाँघों से मेरी नंगी जांघे थप्प थप्प टकराकर जो आवाज पैदा कर रही थी उससे हम दोनों और उत्तेजित हो जा रहे थे, वासना का ये कामुक खेल आज अंधेरे में मैं और अम्मा खेलेंगे ये कभी सोचा न था ।

इतना मजा आएगा आज की रात ये कभी सोचा न था, करीब पंद्रह मिनिट की लगातार चुदायी के बाद अम्मा ने बस धीरे से मेरे कान में बड़ी मुश्किल से भरी आवाज में कहा "रुकना मत….और तेज तेज कर" मैं ये सुनकर और गचा गच उनकी बूर चोदने लगा वो तेजी से आहें भरते हुए कराहने लगी, लगातार कामुक सिसकारियां लेते हुए वो छटपटाने लगी कभी मुझसे कस के लिपट जाती कभी मेरी पीठ पर चिकोटी काट लेती तो कभी मेरी नंगी पीठ पर अपने नाखून गड़ा देती, एकएक उनका बदन थरथराया और मैंने साफ महसूस किया कि उनकी बूर के अंदर मानो कोई विस्फोट सा हुआ हो, और उस विस्फोट के साथ वो कस के मुझसे लिपटते हुए तेजी से कराहकर "आआआआआहहहह अरविंद" कहते हुए झड़ने लगी, उनकी बूर में इतनी तेज तेज संकुचन होने लगा कि मुझसे भी बर्दाश्त नही हुआ और मैं भी "ओह अम्मा" कहते हुए झड़ने लगा, एक तेज वीर्य की गाढ़ी धार मेरे लंड से निकलकर उनके गर्भाशय पर गिरने लगी, उतेजना इतनी थी कि करीब दो मिनट तक मेरा लंड सपंदन करके वीर्य मां की बूर में उगलता रहा।

यही हाल अम्मा की बूर का भी था, करीब इतनी ही देर तक उनकी बूर भी संकुचित होकर झड़ती रही, वो मुझे कस के अपनी आगोश में भरकर काफी देर तक झड़ते हुए चूमती रही, इतना सुख शायद उन्हें पहले कभी नही मिला था, उन्होंने धीरे से मेरे कान में कहा- "आज मैंने पा लिया अपने बेटे को, ये कितना सुखद है"

मैं- फिर भी आपने आने में एक हफ्ता लगा दिया अम्मा, मैं कब से आपका इंतजार कर रहा था रोज़, मैं यही सुख आपको देना चाहता था, मैंने भी आज अपनी अम्मा को पा लिया है और ये सब हुआ है उस पुरानी किताब की वजह से।

वो ये सुनकर हल्का सा मुस्कुरा पड़ी और बोली-नही अरविंद, देर इसलिए हुई क्योंकि मेरी माहवारी आ रखी थी, इसलिए मैंने तुझे इंतज़ार करवाया, इतंज़ार का फल मीठा होता है न।

मैं- हाँ अम्मा सच बहुत मीठा होता है

अम्मा- क्या वो किताब तूने फाड़ दी है।

मैं- नही अम्मा, फाड़ा नही है।

वो फिर मुस्कुराई और बोली- उसे फाड़ना मत, उसी ने हमे मिलाया है।

मैंने उन्हें "हाँ बिल्कुल" बोलते हुए कई बार चूमा, और बगल में लेटते हुए उन्हें अपने ऊपर चढ़ा लिया इस उलट पलट में मेरा लंड पक्क से उनकी बूर से निकल गया तो अम्मा ने साये से अपनी बूर और मेरे लंड को अच्छे से पोछा और एक बार फिर हम एक दूसरे के आगोश में समाते चले गए।

उस रात मैंने अम्मा को तीन बार चोदा और फिर वो सुबह भोर में दालान से निकल गयी, रात में वो अब रोज़ मेरे पास नज़र बचा के आती और हम जी भरकर चुदायी करते, इतना ही नही दिन में भी हम छुप छुप कर चुदायी करते, उस किताब की वजह से मेरी माँ अब सच में मेरी हो चुकी थी, आखिर मेरा जिस्म उनके जिस्म का ही तो एक टुकड़ा था, अब कोई ग्लानि नही थी बस था तो सिर्फ प्यार ही प्यार।


“THE END”​
 

Premkumar65

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एक बार मस्तराम की किताब मेरे एक दोस्त ने चुपके से क्या पढ़ा दी पढ़ाई में तो अब मन लगता ही नही था, जब देखो तब मन अश्लील साहित्य, गंदी कहानियां, अश्लील चुटकुले एवं कविताएं खोजता रहता था, इंटरनेट का चलन उस वक्त था नही, किसी तरह डर डर के जुगाड़ करके ये सब चीज़ें खरीदकर, मांगकर इकट्ठी करते, पढ़ते और वासना की दुनिया में डूब जाते।

मैं घर से दूर बनारस में रहकर पढ़ाई कर रहा था, अरविंद नाम है मेरा, जब घर से यहां आया था तो ऐसा नही था, बस दोस्तो की संगत का असर था, पर अब तो जैसे इनसब चीजों की आदत पड़ गयी थी, कुछ दिन तक कुछ नया न मिले तो मन बेचैन होने लगता था, आजतक हकीकत में स्त्री की योनि सिर्फ एक दो बार दोस्तों द्वारा छुप छुप कर लाये गए ब्लू फिल्म में ही देखी थी, मन बहुत करता था हकीकत में योनि छूने और भोगने के, पर रिस्क लेने की हिम्मत अभी तक नही आई थी, इतना जरूर था कि मस्तराम की किताबें पढ़कर नीयत घर की औरतों के प्रति बदल गयी थी, कभी कभी सोचता तो बहुत उत्तेजित हो जाता पर अगले ही पल ग्लानि से भर भी जाता था। पर मन नही मानता था वो तो कभी कभी ग्लानि से ऊपर उठकर सोचने लगता था कि घर में ही मिल जाए तो कितना मजा आ जाए, पर ये असंभव चीज़ थी, इसलिए बस ये सिर्फ कल्पना में ही थी और हाथ का ही सहारा था।

साल में दो बार मैं घर जाता था, एक गर्मियों की छुट्टी में दूसरा शर्दियों मे छुट्टी लेकर, घर में सिर्फ माँ और दादा दादी थे, पिताजी दुबई में रहते थे साल में एक बार बस एक महीने के लिए आते थे, माँ खेती बारी, घर को और दादा दादी को संभालती थी, अपने नाम "अर्चना" की तरह वो प्यारी तो थी ही साथ ही साथ सबका ख्याल रखने वाली भी थी, खेतों में काम करके भी उनके गोरे रंग पे ज्यादा कोई फर्क नही पड़ा था, वो बहुत ज्यादा सुंदर तो नही थी पर किसी से कम भी नही थी, शरीर भरा हुआ था, लगभग सारा दिन काम करने से अनावश्यक चर्बी शरीर पर नही थी, उनके शरीर को कभी वासना की नज़र से न देखने पर उनका सही फिगर तो नही बता सकता पर अंदाज़े से कहा जाए तो 34-32-36 तो था ही।

इस बार सर्दियों में जब घर आया तो आदत के अनुसार अब अश्लील साहित्य पढ़ने का मन हुआ, जल्दबाजी में खरीदकर लाना भूल गया, जो पड़ी थी वो सब पढ़ी हुई थी, अब यहां गांव में मिले कहाँ, किसके पास जाऊं, कहाँ मिलेगी? डरते डरते एक दो पुरानी बुक स्टाल पर पूछा तो उन्होंने मुझे अजीब नज़रों से देखा फिर मेरी हिम्मत ही नही हुई, गांव की दुकानें थी यही कहीं आते जाते किसी दुकानदार ने अगर गाँव के किसी आदमी से जिक्र कर दिया तो शर्मिंदा होना पड़ेगा, इसलिए कुछ दिन मन मारकर बिता दिए पर मन बहुत बेचैन हो उठा था।
all men go through this phase in teenage.
 

Premkumar65

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दिया अभी जल ही रहा था, वो मुझसे नज़रें मिला कर लजा गईं, उन्होंने जल्दी से एक हाँथ से दिया बुझा दिया, और मेरी बनियान को पकड़कर उतारने लगी तो मैंने झट से ही उसे उतार फेंका और रजाई ओढ़कर हम दोनों अमरबेल की तरह एक दूसरे से लिपट गए, उनकी मोटी मोटी चूचीयाँ और तने हुए निप्पल अपने नंगे बदन पर महसूस कर मैं मदहोश होता जा रहा था, कितनी नरम और गुदाज थी उनकी चूचीयाँ, मैंने कुछ देर उन्हे चूमा और जब चढ्ढी के अंदर से ही अपने खड़े लंड से उनकी नंगी बूर पर हल्का हल्का धक्के मारे तो वो और लजा गयी, अब दालान में बिल्कुल अंधेरा था, मैंने धीरे से उनका हाँथ पकड़ा और अपनी चढ्ढी के अंदर ले गया वो समझ गयी, उन्होंने शर्माते हुए खुद ही मेरे लोहे के समान कठोर हो चुके 8 इंच के लंड को जैसे ही पकड़ा उनके मुँह से हल्का सा सिसकी के साथ निकला "इतना बड़ा", मैंने बोला- सिर्फ मेरी अम्मा के लिए।

वो मुझसे कस के लिपट गयी और फिर मेरे कान में बोली- कभी किसी को पता न लगे, तेरे बाबू को पता लगा तो अनर्थ हो जाएगा।

मैं- आपको मेरे ऊपर विश्वास है न अम्मा।

माँ- बहुत, अपने से भी ज्यादा

मैंने उनके होंठों को चूम लिया और उन्होंने मेरा साथ दिया, मेरे कठोर लंड को सहलाते हुए वो सिसकने लगी और मेरी चढ्ढी को पकड़कर हल्का सा नीचे करते हुए उसे उतारने का इशारा किया, मैंने झट से चढ्ढी उतार फेंकी और अब मैं रजाई के अंदर बिल्कुल नंगा था। उन्होंने सिसकते हुए अपनी दोनों टांगें हल्का सा मोड़कर फैला दिया, जैसे ही मेरा दहाड़ता हुआ लंड उनकी दहकती हुई बूर से टकराया वो बड़ी मादकता से सिसक उठी, मेरा लंड उनकी बूर पर जहां तहां टकराने लगा और दोनों की ही सिसकी निकल जा रही थी, मैंने अपने लंड को उनकी रसीली बूर की फांकों के बीच रगड़ना शुरू कर दिया, मुझसे रहा नही जा रहा था और उनसे भी नही, बार बार लंड भग्नासे से टकराने से वो बहुत उत्तेजित हो चुकी थी, मैंने एक हाँथ से अपने लंड को पकड़ा, उनकी चमड़ी खोली और जैसे ही उनकी रिसती हुई बूर के छेद पर रखा उन्होंने मेरे कान में धीरे से बोला-धीरे धीरे अरविंद…...बहुत बड़ा है ये।

मैं- बाबू से भी

उन्होंने लजाकर मेरी पीठ पर चिकोटी काटते हुए बोला- हाँ…..बेशर्म

मैंने उन्हें चूम लिया और बूर की छेद पर रखकर हल्का सा दबाया तो लंड फिसलकर ऊपर को सरक गया, मारे उत्तेजना के मैं थरथरा सा रहा था वही हाल माँ का भी था, लेकिन मेरे अनाड़ी पन की वजह से मां को बहुत दर्द हुआ पर मां आवाज को दबा गई, मां भी जल्दी से जल्दी वो मेरा लंड अपनी बूर की गहराई में लेना चाह रही थी और मैं भी उनकी बूर में जड़ तक लंड उतारना चाह रहा था पर आज ये जीवन में पहली बार था मेरे लिए, मारे उत्तेजना के मैं कांप सा रहा था, अपनी ही माँ को चोदना ये सोचकर ही चरम उत्तेजना होती थी तो आज की रात तो मैं ये साक्षात कर रहा था, एक दो बार लंड ऊपर की ओर सरक जाने के बाद अम्मा ने अपने दोनों पैर मेरी कमर पर लपेट लिय और एक हाँथ नीचे ले जाकर मेरे तड़पते कठोर लंड को पकड़कर एक बार अच्छे से सहलाया और फिर अपनी बूर की छेद पर रखकर उसको सही रास्ता दिखाते हुए दूसरे हाँथ से मेरी गाँड़ को हल्का सा दबाकर लंड घुसाने का इशारा किया तो मैंने एक तेज धक्का मारा, लन्ड इस बार गच्च से आधा बूर में चला गया, जिस से मां को बहुत ज्यादा दर्द हुआ और वो कराहते हुए बोली-आहह मोरी मैया मर गई मां,बेटा मैंने बोला था ना "धीरे धीरे" अब लंड बूर में घुस चुका था, उन्होंने हाँथ वहां से हटाकर सिसकते हुए मुझे आगोश में भर लिया, मैं कुछ देर ऐसे ही आधा लंड बूर में घुसाए उनपर चढ़ा रहा, आज पहली बार पता लग रहा था कि वाकई में हर मर्द को बूर चोदने की हसरत क्यों तड़पाती रहती है, क्यों इस बूर के लिए वो मरता है, क्या जन्नत का अहसास कराती है ये बूर, कितनी नरम थी अम्मा की बूर अंदर से और बिल्कुल किसी भट्टी की तरह उत्तेजना में धधक रही थी, कुछ पल तो मैं कहीं खो सा गया, अम्मा मेरी पीठ को सहलाती रही, फिर मैंने एक तेज धक्का और मारा और इस बार मेरा लंड पूरा जड़ तक अम्मा की बूर में समा गया, वो एक तीखे दर्द से कराह उठी, मुझे खुद अहसाह हो रहा था कि मेरा लंड उनकी बूर की कुछ अनछुई मांसपेशियों को चीरता हुआ उनके गर्भाशय से जा टकराया था, वो मुझसे बुरी तरह लिपटी हुई थी, और तेज तेज आंखे बंद किये कराह रही थी, अब रुकना कौन चाह रहा था, मैंने रजाई अच्छे से ओढ़ी और उन्होंने कराहते हुए अपने को मेरे नीचे अच्छे से व्यवस्थित किया और फिर मैंने धीरे धीरे लंड को अंदर बाहर करते हुए अपनी सगी माँ को चोदना शुरू कर दिया, वो मस्ती में सिसकते कराहते हुए मुझसे लिपटती चली गयी, इतना मजा आएगा ये कभी कल्पना भी नही की थी, जितना कुछ कभी सोचा था उससे कहीं ज्यादा मजा आ रहा था।
Wow very very erotic story. Looks very real.
 

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दालान में पूरा अंधेरा था, धीरे धीरे मैं उन्हें तेज तेज चोदने लगा और मेरे धक्कों ने पूरा रफ्तार पकड़ लिया, खटिया चर्रर्रर्रर चर्रर्रर्रर करने लगी, न चाहते हुए भी दोनों के मुंह से कामुक सिसकारियां निकलने ही लगी, मैंने दोनों हाँथ नीचे ले जाकर अपनी अम्मा के विशाल नितम्बों को थामकर हल्का सा ऊपर उठाया और कस कस के पूरा लंड उनकी रसीली बूर में पेलने लगा ।

वो तेज तेज सिसकते हुए अब नीचे से शर्मो हया त्यागकर अपनी चौड़ी गाँड़ हल्का हल्का ऊपर को उछाल उछाल कर अपने सगे बेटे से चुदवाने लगी। परम आनंद में दोनों माँ बेटे डूब गए, तेज तेज धक्के मारने के साथ साथ मैं उनके गालों और होंठों को चूमने लगा, वो मदहोशी में मेरा साथ देने लगी, मैं उनकी तेज धक्कों के साथ हिलती हुई चूचीयों को कस कस के दबाने लगा और वो परम उत्तेजना में और भी सिसकने लगी।

रात के घनघोर अंधेरे में मेरा लंड अपनी ही सगी माँ की बूर में घपाघप अंदर बाहर हो रहा था, कुछ ही देर में जब बूर बहुत ज्यादा पनिया गयी तो रजाई के अंदर चुदायी की फच्च फच्च आवाज़ें गूंजने लगी, उनकी नंगी जाँघों से मेरी नंगी जांघे थप्प थप्प टकराकर जो आवाज पैदा कर रही थी उससे हम दोनों और उत्तेजित हो जा रहे थे, वासना का ये कामुक खेल आज अंधेरे में मैं और अम्मा खेलेंगे ये कभी सोचा न था ।

इतना मजा आएगा आज की रात ये कभी सोचा न था, करीब पंद्रह मिनिट की लगातार चुदायी के बाद अम्मा ने बस धीरे से मेरे कान में बड़ी मुश्किल से भरी आवाज में कहा "रुकना मत….और तेज तेज कर" मैं ये सुनकर और गचा गच उनकी बूर चोदने लगा वो तेजी से आहें भरते हुए कराहने लगी, लगातार कामुक सिसकारियां लेते हुए वो छटपटाने लगी कभी मुझसे कस के लिपट जाती कभी मेरी पीठ पर चिकोटी काट लेती तो कभी मेरी नंगी पीठ पर अपने नाखून गड़ा देती, एकएक उनका बदन थरथराया और मैंने साफ महसूस किया कि उनकी बूर के अंदर मानो कोई विस्फोट सा हुआ हो, और उस विस्फोट के साथ वो कस के मुझसे लिपटते हुए तेजी से कराहकर "आआआआआहहहह अरविंद" कहते हुए झड़ने लगी, उनकी बूर में इतनी तेज तेज संकुचन होने लगा कि मुझसे भी बर्दाश्त नही हुआ और मैं भी "ओह अम्मा" कहते हुए झड़ने लगा, एक तेज वीर्य की गाढ़ी धार मेरे लंड से निकलकर उनके गर्भाशय पर गिरने लगी, उतेजना इतनी थी कि करीब दो मिनट तक मेरा लंड सपंदन करके वीर्य मां की बूर में उगलता रहा।

यही हाल अम्मा की बूर का भी था, करीब इतनी ही देर तक उनकी बूर भी संकुचित होकर झड़ती रही, वो मुझे कस के अपनी आगोश में भरकर काफी देर तक झड़ते हुए चूमती रही, इतना सुख शायद उन्हें पहले कभी नही मिला था, उन्होंने धीरे से मेरे कान में कहा- "आज मैंने पा लिया अपने बेटे को, ये कितना सुखद है"

मैं- फिर भी आपने आने में एक हफ्ता लगा दिया अम्मा, मैं कब से आपका इंतजार कर रहा था रोज़, मैं यही सुख आपको देना चाहता था, मैंने भी आज अपनी अम्मा को पा लिया है और ये सब हुआ है उस पुरानी किताब की वजह से।

वो ये सुनकर हल्का सा मुस्कुरा पड़ी और बोली-नही अरविंद, देर इसलिए हुई क्योंकि मेरी माहवारी आ रखी थी, इसलिए मैंने तुझे इंतज़ार करवाया, इतंज़ार का फल मीठा होता है न।

मैं- हाँ अम्मा सच बहुत मीठा होता है

अम्मा- क्या वो किताब तूने फाड़ दी है।

मैं- नही अम्मा, फाड़ा नही है।

वो फिर मुस्कुराई और बोली- उसे फाड़ना मत, उसी ने हमे मिलाया है।

मैंने उन्हें "हाँ बिल्कुल" बोलते हुए कई बार चूमा, और बगल में लेटते हुए उन्हें अपने ऊपर चढ़ा लिया इस उलट पलट में मेरा लंड पक्क से उनकी बूर से निकल गया तो अम्मा ने साये से अपनी बूर और मेरे लंड को अच्छे से पोछा और एक बार फिर हम एक दूसरे के आगोश में समाते चले गए।

उस रात मैंने अम्मा को तीन बार चोदा और फिर वो सुबह भोर में दालान से निकल गयी, रात में वो अब रोज़ मेरे पास नज़र बचा के आती और हम जी भरकर चुदायी करते, इतना ही नही दिन में भी हम छुप छुप कर चुदायी करते, उस किताब की वजह से मेरी माँ अब सच में मेरी हो चुकी थी, आखिर मेरा जिस्म उनके जिस्म का ही तो एक टुकड़ा था, अब कोई ग्लानि नही थी बस था तो सिर्फ प्यार ही प्यार।
Very very hot story . Mazaa aa gaya.
 
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