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दालान में पूरा अंधेरा था, धीरे धीरे मैं उन्हें तेज तेज चोदने लगा और मेरे धक्कों ने पूरा रफ्तार पकड़ लिया, खटिया चर्रर्रर्रर चर्रर्रर्रर करने लगी, न चाहते हुए भी दोनों के मुंह से कामुक सिसकारियां निकलने ही लगी, मैंने दोनों हाँथ नीचे ले जाकर अपनी अम्मा के विशाल नितम्बों को थामकर हल्का सा ऊपर उठाया और कस कस के पूरा लंड उनकी रसीली बूर में पेलने लगा ।
वो तेज तेज सिसकते हुए अब नीचे से शर्मो हया त्यागकर अपनी चौड़ी गाँड़ हल्का हल्का ऊपर को उछाल उछाल कर अपने सगे बेटे से चुदवाने लगी। परम आनंद में दोनों माँ बेटे डूब गए, तेज तेज धक्के मारने के साथ साथ मैं उनके गालों और होंठों को चूमने लगा, वो मदहोशी में मेरा साथ देने लगी, मैं उनकी तेज धक्कों के साथ हिलती हुई चूचीयों को कस कस के दबाने लगा और वो परम उत्तेजना में और भी सिसकने लगी।
रात के घनघोर अंधेरे में मेरा लंड अपनी ही सगी माँ की बूर में घपाघप अंदर बाहर हो रहा था, कुछ ही देर में जब बूर बहुत ज्यादा पनिया गयी तो रजाई के अंदर चुदायी की फच्च फच्च आवाज़ें गूंजने लगी, उनकी नंगी जाँघों से मेरी नंगी जांघे थप्प थप्प टकराकर जो आवाज पैदा कर रही थी उससे हम दोनों और उत्तेजित हो जा रहे थे, वासना का ये कामुक खेल आज अंधेरे में मैं और अम्मा खेलेंगे ये कभी सोचा न था ।
इतना मजा आएगा आज की रात ये कभी सोचा न था, करीब पंद्रह मिनिट की लगातार चुदायी के बाद अम्मा ने बस धीरे से मेरे कान में बड़ी मुश्किल से भरी आवाज में कहा "रुकना मत….और तेज तेज कर" मैं ये सुनकर और गचा गच उनकी बूर चोदने लगा वो तेजी से आहें भरते हुए कराहने लगी, लगातार कामुक सिसकारियां लेते हुए वो छटपटाने लगी कभी मुझसे कस के लिपट जाती कभी मेरी पीठ पर चिकोटी काट लेती तो कभी मेरी नंगी पीठ पर अपने नाखून गड़ा देती, एकएक उनका बदन थरथराया और मैंने साफ महसूस किया कि उनकी बूर के अंदर मानो कोई विस्फोट सा हुआ हो, और उस विस्फोट के साथ वो कस के मुझसे लिपटते हुए तेजी से कराहकर "आआआआआहहहह अरविंद" कहते हुए झड़ने लगी, उनकी बूर में इतनी तेज तेज संकुचन होने लगा कि मुझसे भी बर्दाश्त नही हुआ और मैं भी "ओह अम्मा" कहते हुए झड़ने लगा, एक तेज वीर्य की गाढ़ी धार मेरे लंड से निकलकर उनके गर्भाशय पर गिरने लगी, उतेजना इतनी थी कि करीब दो मिनट तक मेरा लंड सपंदन करके वीर्य मां की बूर में उगलता रहा।
यही हाल अम्मा की बूर का भी था, करीब इतनी ही देर तक उनकी बूर भी संकुचित होकर झड़ती रही, वो मुझे कस के अपनी आगोश में भरकर काफी देर तक झड़ते हुए चूमती रही, इतना सुख शायद उन्हें पहले कभी नही मिला था, उन्होंने धीरे से मेरे कान में कहा- "आज मैंने पा लिया अपने बेटे को, ये कितना सुखद है"
मैं- फिर भी आपने आने में एक हफ्ता लगा दिया अम्मा, मैं कब से आपका इंतजार कर रहा था रोज़, मैं यही सुख आपको देना चाहता था, मैंने भी आज अपनी अम्मा को पा लिया है और ये सब हुआ है उस पुरानी किताब की वजह से।
वो ये सुनकर हल्का सा मुस्कुरा पड़ी और बोली-नही अरविंद, देर इसलिए हुई क्योंकि मेरी माहवारी आ रखी थी, इसलिए मैंने तुझे इंतज़ार करवाया, इतंज़ार का फल मीठा होता है न।
मैं- हाँ अम्मा सच बहुत मीठा होता है
अम्मा- क्या वो किताब तूने फाड़ दी है।
मैं- नही अम्मा, फाड़ा नही है।
वो फिर मुस्कुराई और बोली- उसे फाड़ना मत, उसी ने हमे मिलाया है।
मैंने उन्हें "हाँ बिल्कुल" बोलते हुए कई बार चूमा, और बगल में लेटते हुए उन्हें अपने ऊपर चढ़ा लिया इस उलट पलट में मेरा लंड पक्क से उनकी बूर से निकल गया तो अम्मा ने साये से अपनी बूर और मेरे लंड को अच्छे से पोछा और एक बार फिर हम एक दूसरे के आगोश में समाते चले गए।
उस रात मैंने अम्मा को तीन बार चोदा और फिर वो सुबह भोर में दालान से निकल गयी, रात में वो अब रोज़ मेरे पास नज़र बचा के आती और हम जी भरकर चुदायी करते, इतना ही नही दिन में भी हम छुप छुप कर चुदायी करते, उस किताब की वजह से मेरी माँ अब सच में मेरी हो चुकी थी, आखिर मेरा जिस्म उनके जिस्म का ही तो एक टुकड़ा था, अब कोई ग्लानि नही थी बस था तो सिर्फ प्यार ही प्यार।
वो तेज तेज सिसकते हुए अब नीचे से शर्मो हया त्यागकर अपनी चौड़ी गाँड़ हल्का हल्का ऊपर को उछाल उछाल कर अपने सगे बेटे से चुदवाने लगी। परम आनंद में दोनों माँ बेटे डूब गए, तेज तेज धक्के मारने के साथ साथ मैं उनके गालों और होंठों को चूमने लगा, वो मदहोशी में मेरा साथ देने लगी, मैं उनकी तेज धक्कों के साथ हिलती हुई चूचीयों को कस कस के दबाने लगा और वो परम उत्तेजना में और भी सिसकने लगी।
रात के घनघोर अंधेरे में मेरा लंड अपनी ही सगी माँ की बूर में घपाघप अंदर बाहर हो रहा था, कुछ ही देर में जब बूर बहुत ज्यादा पनिया गयी तो रजाई के अंदर चुदायी की फच्च फच्च आवाज़ें गूंजने लगी, उनकी नंगी जाँघों से मेरी नंगी जांघे थप्प थप्प टकराकर जो आवाज पैदा कर रही थी उससे हम दोनों और उत्तेजित हो जा रहे थे, वासना का ये कामुक खेल आज अंधेरे में मैं और अम्मा खेलेंगे ये कभी सोचा न था ।
इतना मजा आएगा आज की रात ये कभी सोचा न था, करीब पंद्रह मिनिट की लगातार चुदायी के बाद अम्मा ने बस धीरे से मेरे कान में बड़ी मुश्किल से भरी आवाज में कहा "रुकना मत….और तेज तेज कर" मैं ये सुनकर और गचा गच उनकी बूर चोदने लगा वो तेजी से आहें भरते हुए कराहने लगी, लगातार कामुक सिसकारियां लेते हुए वो छटपटाने लगी कभी मुझसे कस के लिपट जाती कभी मेरी पीठ पर चिकोटी काट लेती तो कभी मेरी नंगी पीठ पर अपने नाखून गड़ा देती, एकएक उनका बदन थरथराया और मैंने साफ महसूस किया कि उनकी बूर के अंदर मानो कोई विस्फोट सा हुआ हो, और उस विस्फोट के साथ वो कस के मुझसे लिपटते हुए तेजी से कराहकर "आआआआआहहहह अरविंद" कहते हुए झड़ने लगी, उनकी बूर में इतनी तेज तेज संकुचन होने लगा कि मुझसे भी बर्दाश्त नही हुआ और मैं भी "ओह अम्मा" कहते हुए झड़ने लगा, एक तेज वीर्य की गाढ़ी धार मेरे लंड से निकलकर उनके गर्भाशय पर गिरने लगी, उतेजना इतनी थी कि करीब दो मिनट तक मेरा लंड सपंदन करके वीर्य मां की बूर में उगलता रहा।
यही हाल अम्मा की बूर का भी था, करीब इतनी ही देर तक उनकी बूर भी संकुचित होकर झड़ती रही, वो मुझे कस के अपनी आगोश में भरकर काफी देर तक झड़ते हुए चूमती रही, इतना सुख शायद उन्हें पहले कभी नही मिला था, उन्होंने धीरे से मेरे कान में कहा- "आज मैंने पा लिया अपने बेटे को, ये कितना सुखद है"
मैं- फिर भी आपने आने में एक हफ्ता लगा दिया अम्मा, मैं कब से आपका इंतजार कर रहा था रोज़, मैं यही सुख आपको देना चाहता था, मैंने भी आज अपनी अम्मा को पा लिया है और ये सब हुआ है उस पुरानी किताब की वजह से।
वो ये सुनकर हल्का सा मुस्कुरा पड़ी और बोली-नही अरविंद, देर इसलिए हुई क्योंकि मेरी माहवारी आ रखी थी, इसलिए मैंने तुझे इंतज़ार करवाया, इतंज़ार का फल मीठा होता है न।
मैं- हाँ अम्मा सच बहुत मीठा होता है
अम्मा- क्या वो किताब तूने फाड़ दी है।
मैं- नही अम्मा, फाड़ा नही है।
वो फिर मुस्कुराई और बोली- उसे फाड़ना मत, उसी ने हमे मिलाया है।
मैंने उन्हें "हाँ बिल्कुल" बोलते हुए कई बार चूमा, और बगल में लेटते हुए उन्हें अपने ऊपर चढ़ा लिया इस उलट पलट में मेरा लंड पक्क से उनकी बूर से निकल गया तो अम्मा ने साये से अपनी बूर और मेरे लंड को अच्छे से पोछा और एक बार फिर हम एक दूसरे के आगोश में समाते चले गए।
उस रात मैंने अम्मा को तीन बार चोदा और फिर वो सुबह भोर में दालान से निकल गयी, रात में वो अब रोज़ मेरे पास नज़र बचा के आती और हम जी भरकर चुदायी करते, इतना ही नही दिन में भी हम छुप छुप कर चुदायी करते, उस किताब की वजह से मेरी माँ अब सच में मेरी हो चुकी थी, आखिर मेरा जिस्म उनके जिस्म का ही तो एक टुकड़ा था, अब कोई ग्लानि नही थी बस था तो सिर्फ प्यार ही प्यार।
“THE END”