मेरे इस तरह आग्रह करने पर वो मेरी आँखों में देखने लगी, उनकी आंखों में भी वासना साफ दिख रही थी, मैंने हिम्मत करके दुबारा उनके हाँथ को पकड़ा और अपने खड़े, तने हुए मोटे लंड पर जैसे ही रखा तो इस बार उन्होंने मेरे सीने में अपना सर छुपाते हुए मेरे लंड को पकड़ लिया, थोड़ा उसे सहलाया, थोड़ा मुठियाया मेरी मस्ती में आंखें बंद हो गयी, विश्वास नही हो रहा था कि आज मेरी सगी माँ मेरी अम्मा मेरा लंड छू रही हैं वो मुझे ही देख रही थी, दोनों की सांसें धौकनी की तरह चलने लगी, कुछ देर ही सहलाने के बाद वो बोली- अब जा, कोई आ जायेगा। मैंने उनकी आज्ञा मानते उन्हें छोड़ दिया और थोड़ा पीछे हटा तो मेरा लंड पैंट में बुरी तरह तना हुआ था जिसको देखकर अम्मा की हल्की सी हंसी छूट गयी और मैं जैसे ही दुबारा उनके करीब जाने लगा तो वो फिर बोली- जा न, अब क्या है?
मैं- एक बार
अम्मा- एक बार क्या?
मैंने अम्मा की बूर की तरफ इशारा करके कहा- एक बार छूने दो न अम्मा
अम्मा- अभी नही….अभी जा यहां से
मैं फिर पीछे हटा और उनकी आज्ञा मानते हुए बाहर निकल गया। मन मे हजारों लड्डू फूटने लगे, बस अब मुझे इंतज़ार था उनका, पर मुझे कब तक इंतजार करना पड़ेगा ये मुझे नही पता था, ऐसे ही दो दिन बीत गए, अम्मा मुझसे दूर ही रहती, बचती रहती, देख कर मुस्कुराती तो थी पर बचती भी थी, पर क्यों ये मैं नही समझ पा रहा था, अम्मा ये जानती थी कि मैंने वो किताब फाड़ी नही है और मैंने उसे पूरा पढ़ लिया है, उसके अंदर तीसरी कहानी माँ बेटे पर आधारित थी ये बात अम्मा अच्छे से जानती थी।
सर्दियों के दिन थे, मैं उसी दालान में जिसमे भूसा रखा था सोता था, अंधेरी रात थी, सात दिन बीत चुके थे, मेरी उम्मीद कम हो रही थी, मुझे ऐसा लग रहा था कि माँ वो नही चाहती जैसा मैं सोच रहा था। कभी कभी मन मायूस भी हो जा रहा था, पर मैं भी उस दिन के बाद माँ को सिर्फ देखने के अलावा आगे नही बढ़ा, वो सबके सामने मेरे से बिल्कुल पहले जैसा ही बर्ताव करती, मैं उम्मीद खोता जा रहा था कि एक रात मैं दालान में बेधड़क सो रहा था, सर्दी जोरों पर थी, रात में कोहरा भी हो जा रहा था, चांदनी रात थी मैं दालान में भूसे के बगल में खटिया पर रजाई ओढ़े बनियान और चढ्ढी पहने ऊपर से तौलिया लपेटे सो रहा था।
अचानक दालान का दरवाजा हल्के से खटखटाने की आवाज से मेरी नींद खुली, शायद दरवाजा दो तीन बार पहले से खटखटाया जा रहा था, मैं रजाई से निकला और दरवाजे पर जाकर अंदर से बोला- कौन?
अम्मा ने धीरे से कहा- मैं…..दरवाजा खोल
मैंने झट से दरवाजा खोला तो सामने अम्मा शॉल ओढ़े खड़ी थी वो झट से अंदर आ गयी और दालान का दरवाजा अंदर से बंद करके मेरी ओर मुड़ी और अंधेरे में मेरी आँखों में देखने लगी, मुझे विश्वास ही नही हो रहा था कि मेरा जैकपोट लग चुका है, मैन जल्दी से दिया जलाने की कोशिश की तो अम्मा ने धीरे से कहा- दिया मत जला बाहर रोशनी जाएगी खिड़की से।
मैं दिया जलाना छोड़कर उनकी तरफ पलटा तो वो मुझे अपना शॉल उढ़ाते हुए मुझसे लिपट गयी, मुझे काटो तो खून नही, मैंने उन्हें और उन्होंने मुझे बाहों में भर लिया, ऐसा मजा मिलेगा मैन कभी सपने में भी नही सोचा था, दोनों की साँसे धौकनी की तरह तेज तेज चलने लगी, अम्मा के गुदाज बदन को अपनी बाहों में महसूस कर मेरी उत्तेजना चरम पर पहुंच गई, उनकी भी धड़कने तेजी से बढ़ गयी थी, जैसे भी मैंने उन्हें चूमने के लिए उनके चेहरे को अपनी हथेली में थामा, वो धीरे से बोली- कभी किसी को पता न चले अरविंद?