अखिलेश कुमार दिल्ली की एक ताप विद्युत् संयन्त्र लगाने वाली संस्था में इंजीनियर। अभी हाल ही में उसने कम्पनी में काम करना शुरू किया था। लोक रीति कुछ मालूम नहीं थी। इसी पास के इलाके में उसकी कम्पनी एक नया संयंत्र लगाने जा रही थी, और उसी काम के सिलसिले में वो इस गाँव से होकर अक्सर गुजरता था। यह गाँव एक सीमान्त गाँव था, और उसके बाद एक बंजर भूमि शुरू हो जाती थी। ताप विद्युत् संयन्त्र वहीँ लगने वाला था। इसलिए जल-पान और चाय पानी के लिए वह इस गाँव में अक्सर रुकता था, और इसी कारण से इस गाँव के कुछ लोगों से उसकी जान पहचान भी हो गई थी। पिछले छः महीनों में यह आठवीं बार उसका दौरा था। सामान्य दिनों की भांति ही जब वो आज इधर आया, तो एक जीप में सवार कुछ लोगो ने जब उससे पूछा कि ‘अखिलेश कुमार आप ही हैं?’ तो उसने ‘हाँ’ कहते हुए नहीं सोचा था कि उन लोगो के मन में क्या चल रहा है; उसने सोचा भी नहीं होगा कि उसके साथ ऐसा भी कुछ हो सकता है, और यह कि आज ही उसका ‘जबरिया ब्याह’ भी हो जाएगा।
ब्याह के बाद वधुएँ डोली में बैठ कर अपने ससुराल जाती हैं, लेकिन गायत्री वहीं कोहबर (वह कमरा, या स्थान जहाँ शादी विवाह जैसे प्रयोजन होते हैं) में ही बैठी रही। जबरिया ब्याह में क्या डोली? क्या विदाई? वहीं कोहबर में ही उसका ब्याह हुआ, और वहीं पर लगता है, कि किरिया करम भी हो जायेगा। वैसे भी चन्दन, हल्दी, धूप, आटे, चावल और गेंदे की महक से उसको कुछ कुछ अंत्येष्टि जैसा ही महसूस हो रहा था। कुछ देर में अखिलेश कुमार को वहाँ पर लाया गया।
भौजी ने वर को कहा,
“बबुआ, जो हो गया, सो हो गया। यह सब बीती बातें हैं... आप तो बस आगे की सुध लीजिए। आपके दुःख को हम समझती हैं। लेकिन इन सब में हमारी बउनी का कोनो कसूर नाहीं। आप इसको स्वीकार कर लीजिए । आपने इसकी मांग में सिन्दूर डाला है; इसको मंगलसूत्र पहनाया है। अब ये आपकी अर्द्धांगिनी है। अब इसको स्त्री जात की मान मरजादा देना आपके हाथ में ही है। जो आप आज्ञा देंगे, ये वैसा ही करेगी।”
कहते हुए भौजी ने अखिलेश को प्रणाम किया, और उसको गायत्री के पास ही बैठा दिया और बाहर जाते हुए, दरवाज़ा बंद कर दिया। अपहरण के दुःख, मार-पिटाई के अपमान, और जान से हाथ धोने की धमकियों से आहत अखिलेश का गुस्सा पहले से ही सातवें आसमान पर था। और अब ये देवी जी उसको भविष्य की सीख दे रही थीं ! ऐसी जुर्रत इन हरामजादों की! दबंगों के सामने तो उसकी क्या चलनी थी? लेकिन एक अबला असहाय लड़की पर गुस्सा निकालना आसान था।
अखिलेश के लिए उस पीली साड़ी में लिपटी, गठरी बनी हुई लड़की का कोई महत्व नहीं था। उसके लिए उसका कोई अस्तित्व नहीं था। उसके होने या न होने से उसको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उसका ध्यान तो अपने भविष्य की तरफ था। उसके जीवन में पल भर में ही प्रलय आ गई थी। क्या कुछ सोच रखा था! इतनी अच्छी नौकरी लगी थी। सोचा था कि कुछ समय में किसी सुन्दर सी, पढ़ी-लिखी, शहरी कन्या से शादी करेगा। और यहाँ ये धुर गंवार देहाती, न जाने कैसे उसके गले मढ़ दी गई! गायत्री डरी सहमी, सर झुकाए बैठी हुई थी। अखिलेश के लिए उसके निकट बैठना गंवारा न रहा। वो तमतमा कर उठा, दो कदम चला, हठात रुका और फिर मुड़ कर अपने भीतर के सारे गुस्से को अपने पैर में एकाग्र कर के गायत्री के ऊपर चला दिया।
गठरी बनी लड़की को कोई पूर्वानुमान भी नहीं था कि उसके साथ क्या होने वाला है। क्रोध भरी मार उसकी पसलियों पर आ कर पड़ी। अखिलेश का पाद-प्रहार इतना बलशाली था कि गायत्री भहरा कर पीठ के बल गिर गई। उस आघात से वो इतना हदंग गई कि उसकी चीख तक भी नहीं निकल सकी। ‘काटो खून नहीं’ वाली कहावत चरितार्थ हो गई।
वैसे, अिखलेश भी कोई पाषाण का बना हुआ नहीं था। आज तक उसने किसी भी स्त्री पर क्रोध नहीं किया था, न ही उनसे ऊँचे स्वर में कभी बात भी करी! किसी लड़की को मारना तो बहुत दूर की बात है। उस लड़की की ऐसी दयनीय दशा देख कर वो भी घबरा गया । लेकिन फिर उसने लड़की को जैसे-तैसे सम्हल कर हुए, उठते हुए देखा। वो भूमि पर पड़ी रहती तो संभव था कि अखिलेश को पुनः क्रोध न आता, लेकिन गायत्री को ऐसे उठता हुआ देखा कर न जाने क्यों, उसके क्रोध का पारा वापस अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया। उसने आव न देखा न ताव, और तमतमाते हुए पहले से ही सहमी हुई गायत्री के चेहरे पर दो तीन झापड़ रसीद दिए। इस बार गायत्री की आँखों से मूक अश्रुओं की धारा निकल पड़ी।
वो खुद में ही सिमट कर वैसे ही चुपचाप हो कर सुबकने लगी। अखिलेश उससे दूर हो कर किसी कोने में बैठ गया और भविष्य के बारे में सोचने लगा। क्रोध से उसका रक्त-चाप काफ़ी बढ़ गया। अभी तो उसकी बारे में किसी को फ़िक्र भी नहीं होगी, लेकिन एक दो दिन ने ही उसकी ढुँढ़ाई शुरू हो जाएगी। वो भी ठीक है। लेकिन ऐसी शर्मनाक बात वो सभी को बताएगा भी कैसे? इसी उधेड़बुन में रात बीत गई।
सवेरा होने पर उसने दरवाज़ा खुला हुआ पाया। घर के पास, इधर उधर जाने के लिए तो वो स्वतंत्र था, लेकिन गाँव को छोड़ कर जाना असंभव प्रतीत हो रहा था। दिन तो खैर, जैसे तैसे निकल गया। किसी ने उसको परेशान नहीं किया, और न ही किसी ने उससे बात करने की कोशिश भी करी। लेकिन रात आते ही फिर उसने खुद को उस लड़की के साथ उस कमरे में बंद पाया। इस बात से वो पुनः क्रोधित हो गया। उसने गायत्री की गर्दन दबोच ली और एक राक्षस की भाँति डकारा,
“क्यों रे रंडी। तेरे माँ बाप ने तुझे मेरे पास चुदने भेज दिया है? इतनी गर्मी है तुझमें कि इसको निकालने के लिए किसी भी राह चलते मर्द को उठा कर ले आएगी? और टाँगें खोल कर उसके सामने पसर जाएगी? हम्म? अगर यह तेरे दिमाग में है तो सुन ले रंडी, मैं कुतिया चोद दूँगा…. . लेकिन तुझे.. तुझे तो सिर्फ़ मेरी मार मिलेगी। सिर्फ मार!”
कह कर उसने कुहनी से गायत्री को मार लगाई। मार-पीट तो संभवतः गायत्री बर्दाश्त भी कर लेती, लेकिन ऐसी गिरी हुई, नश्तर सी चुभती बात सुनना उसको पूरी तरह नागवार था। उसने नहीं कहा था किसी को कि उसकी शादी कर दे। न तो उसने खुद के पैदा होने के लिए किसी से विनती करी थी। ऐसी बुरी किस्मत कि जिन्होंने पैदा किया, उन्होंने ही उसको अपने सर का बोझ मान लिया और उसको जैसे तैसे विदा करने के लिए ऐसा नीच काम कर डाला। तो इसमें उसका क्या दोष? ऊपर से उसके लिए ऐसी ओछी बात? मैं तो गंवार हूँ, लेकिन ये तो पढ़े लिखे हैं! ये ऐसी गन्दी बात कैसे कर सकते हैं! पिट कर वो वापस एक कोने में मूक रूदन करती रही। नींद तो आई ही नहीं।
अगली रात फिर वही क्रम। अगली रात क्या, फिर तो यह हर रात की बात हो गई। अखिलेश न कुछ कहता न बोलता, बस कमरे में एकाँत पाते ही गायत्री को लितयाने, थप्पड़ लगाने, घूंसे मारने लगता। वो बेचारी तो वैसे ही दुःख की मारी थी। लेकिन पति की मार शरीर पर और उसकी घिनौनी गालियां उसको आत्मा पर चोट मारतीं! जीवन पहले ही दुःखमय था, लेकिन अब लगता है कि मृत्यु बेहतर है। मन ही मन वो अपने जीवन से मुक्त होने की कामना करने लगी ।