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Non-Erotic आज रहब यही आँगन [Completed]

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Nevil singh

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अखिलेश कुमार दिल्ली की एक ताप विद्युत् संयन्त्र लगाने वाली संस्था में इंजीनियर। अभी हाल ही में उसने कम्पनी में काम करना शुरू किया था। लोक रीति कुछ मालूम नहीं थी। इसी पास के इलाके में उसकी कम्पनी एक नया संयंत्र लगाने जा रही थी, और उसी काम के सिलसिले में वो इस गाँव से होकर अक्सर गुजरता था। यह गाँव एक सीमान्त गाँव था, और उसके बाद एक बंजर भूमि शुरू हो जाती थी। ताप विद्युत् संयन्त्र वहीँ लगने वाला था। इसलिए जल-पान और चाय पानी के लिए वह इस गाँव में अक्सर रुकता था, और इसी कारण से इस गाँव के कुछ लोगों से उसकी जान पहचान भी हो गई थी। पिछले छः महीनों में यह आठवीं बार उसका दौरा था। सामान्य दिनों की भांति ही जब वो आज इधर आया, तो एक जीप में सवार कुछ लोगो ने जब उससे पूछा कि ‘अखिलेश कुमार आप ही हैं?’ तो उसने ‘हाँ’ कहते हुए नहीं सोचा था कि उन लोगो के मन में क्या चल रहा है; उसने सोचा भी नहीं होगा कि उसके साथ ऐसा भी कुछ हो सकता है, और यह कि आज ही उसका ‘जबरिया ब्याह’ भी हो जाएगा।

ब्याह के बाद वधुएँ डोली में बैठ कर अपने ससुराल जाती हैं, लेकिन गायत्री वहीं कोहबर (वह कमरा, या स्थान जहाँ शादी विवाह जैसे प्रयोजन होते हैं) में ही बैठी रही। जबरिया ब्याह में क्या डोली? क्या विदाई? वहीं कोहबर में ही उसका ब्याह हुआ, और वहीं पर लगता है, कि किरिया करम भी हो जायेगा। वैसे भी चन्दन, हल्दी, धूप, आटे, चावल और गेंदे की महक से उसको कुछ कुछ अंत्येष्टि जैसा ही महसूस हो रहा था। कुछ देर में अखिलेश कुमार को वहाँ पर लाया गया।

भौजी ने वर को कहा,

“बबुआ, जो हो गया, सो हो गया। यह सब बीती बातें हैं... आप तो बस आगे की सुध लीजिए। आपके दुःख को हम समझती हैं। लेकिन इन सब में हमारी बउनी का कोनो कसूर नाहीं। आप इसको स्वीकार कर लीजिए । आपने इसकी मांग में सिन्दूर डाला है; इसको मंगलसूत्र पहनाया है। अब ये आपकी अर्द्धांगिनी है। अब इसको स्त्री जात की मान मरजादा देना आपके हाथ में ही है। जो आप आज्ञा देंगे, ये वैसा ही करेगी।”

कहते हुए भौजी ने अखिलेश को प्रणाम किया, और उसको गायत्री के पास ही बैठा दिया और बाहर जाते हुए, दरवाज़ा बंद कर दिया। अपहरण के दुःख, मार-पिटाई के अपमान, और जान से हाथ धोने की धमकियों से आहत अखिलेश का गुस्सा पहले से ही सातवें आसमान पर था। और अब ये देवी जी उसको भविष्य की सीख दे रही थीं ! ऐसी जुर्रत इन हरामजादों की! दबंगों के सामने तो उसकी क्या चलनी थी? लेकिन एक अबला असहाय लड़की पर गुस्सा निकालना आसान था।

अखिलेश के लिए उस पीली साड़ी में लिपटी, गठरी बनी हुई लड़की का कोई महत्व नहीं था। उसके लिए उसका कोई अस्तित्व नहीं था। उसके होने या न होने से उसको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उसका ध्यान तो अपने भविष्य की तरफ था। उसके जीवन में पल भर में ही प्रलय आ गई थी। क्या कुछ सोच रखा था! इतनी अच्छी नौकरी लगी थी। सोचा था कि कुछ समय में किसी सुन्दर सी, पढ़ी-लिखी, शहरी कन्या से शादी करेगा। और यहाँ ये धुर गंवार देहाती, न जाने कैसे उसके गले मढ़ दी गई! गायत्री डरी सहमी, सर झुकाए बैठी हुई थी। अखिलेश के लिए उसके निकट बैठना गंवारा न रहा। वो तमतमा कर उठा, दो कदम चला, हठात रुका और फिर मुड़ कर अपने भीतर के सारे गुस्से को अपने पैर में एकाग्र कर के गायत्री के ऊपर चला दिया।

गठरी बनी लड़की को कोई पूर्वानुमान भी नहीं था कि उसके साथ क्या होने वाला है। क्रोध भरी मार उसकी पसलियों पर आ कर पड़ी। अखिलेश का पाद-प्रहार इतना बलशाली था कि गायत्री भहरा कर पीठ के बल गिर गई। उस आघात से वो इतना हदंग गई कि उसकी चीख तक भी नहीं निकल सकी। ‘काटो खून नहीं’ वाली कहावत चरितार्थ हो गई।

वैसे, अिखलेश भी कोई पाषाण का बना हुआ नहीं था। आज तक उसने किसी भी स्त्री पर क्रोध नहीं किया था, न ही उनसे ऊँचे स्वर में कभी बात भी करी! किसी लड़की को मारना तो बहुत दूर की बात है। उस लड़की की ऐसी दयनीय दशा देख कर वो भी घबरा गया । लेकिन फिर उसने लड़की को जैसे-तैसे सम्हल कर हुए, उठते हुए देखा। वो भूमि पर पड़ी रहती तो संभव था कि अखिलेश को पुनः क्रोध न आता, लेकिन गायत्री को ऐसे उठता हुआ देखा कर न जाने क्यों, उसके क्रोध का पारा वापस अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया। उसने आव न देखा न ताव, और तमतमाते हुए पहले से ही सहमी हुई गायत्री के चेहरे पर दो तीन झापड़ रसीद दिए। इस बार गायत्री की आँखों से मूक अश्रुओं की धारा निकल पड़ी।

वो खुद में ही सिमट कर वैसे ही चुपचाप हो कर सुबकने लगी। अखिलेश उससे दूर हो कर किसी कोने में बैठ गया और भविष्य के बारे में सोचने लगा। क्रोध से उसका रक्त-चाप काफ़ी बढ़ गया। अभी तो उसकी बारे में किसी को फ़िक्र भी नहीं होगी, लेकिन एक दो दिन ने ही उसकी ढुँढ़ाई शुरू हो जाएगी। वो भी ठीक है। लेकिन ऐसी शर्मनाक बात वो सभी को बताएगा भी कैसे? इसी उधेड़बुन में रात बीत गई।

सवेरा होने पर उसने दरवाज़ा खुला हुआ पाया। घर के पास, इधर उधर जाने के लिए तो वो स्वतंत्र था, लेकिन गाँव को छोड़ कर जाना असंभव प्रतीत हो रहा था। दिन तो खैर, जैसे तैसे निकल गया। किसी ने उसको परेशान नहीं किया, और न ही किसी ने उससे बात करने की कोशिश भी करी। लेकिन रात आते ही फिर उसने खुद को उस लड़की के साथ उस कमरे में बंद पाया। इस बात से वो पुनः क्रोधित हो गया। उसने गायत्री की गर्दन दबोच ली और एक राक्षस की भाँति डकारा,

“क्यों रे रंडी। तेरे माँ बाप ने तुझे मेरे पास चुदने भेज दिया है? इतनी गर्मी है तुझमें कि इसको निकालने के लिए किसी भी राह चलते मर्द को उठा कर ले आएगी? और टाँगें खोल कर उसके सामने पसर जाएगी? हम्म? अगर यह तेरे दिमाग में है तो सुन ले रंडी, मैं कुतिया चोद दूँगा…. . लेकिन तुझे.. तुझे तो सिर्फ़ मेरी मार मिलेगी। सिर्फ मार!”

कह कर उसने कुहनी से गायत्री को मार लगाई। मार-पीट तो संभवतः गायत्री बर्दाश्त भी कर लेती, लेकिन ऐसी गिरी हुई, नश्तर सी चुभती बात सुनना उसको पूरी तरह नागवार था। उसने नहीं कहा था किसी को कि उसकी शादी कर दे। न तो उसने खुद के पैदा होने के लिए किसी से विनती करी थी। ऐसी बुरी किस्मत कि जिन्होंने पैदा किया, उन्होंने ही उसको अपने सर का बोझ मान लिया और उसको जैसे तैसे विदा करने के लिए ऐसा नीच काम कर डाला। तो इसमें उसका क्या दोष? ऊपर से उसके लिए ऐसी ओछी बात? मैं तो गंवार हूँ, लेकिन ये तो पढ़े लिखे हैं! ये ऐसी गन्दी बात कैसे कर सकते हैं! पिट कर वो वापस एक कोने में मूक रूदन करती रही। नींद तो आई ही नहीं।

अगली रात फिर वही क्रम। अगली रात क्या, फिर तो यह हर रात की बात हो गई। अखिलेश न कुछ कहता न बोलता, बस कमरे में एकाँत पाते ही गायत्री को लितयाने, थप्पड़ लगाने, घूंसे मारने लगता। वो बेचारी तो वैसे ही दुःख की मारी थी। लेकिन पति की मार शरीर पर और उसकी घिनौनी गालियां उसको आत्मा पर चोट मारतीं! जीवन पहले ही दुःखमय था, लेकिन अब लगता है कि मृत्यु बेहतर है। मन ही मन वो अपने जीवन से मुक्त होने की कामना करने लगी ।
benazeer
 

Nevil singh

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पूरे दो सप्ताह तक वर वधू वहीं रहे। पूरे चौदह दिवस। इन दिनों में दामाद की जितनी भी खातिरदारी, जितनी तवज्जो और जो मान-सम्मान किया जा सकता है, उन लोगो ने अखिलेश का किया। हर रात भौजी गायत्री को सजा कर - उसकी आँखों में, काजल डाल कर, गले में मंगलसूत्र पहना कर, नई साड़ी पहना कर कमरे में भेजती। और हर सुबह उसका बारीकी से निरीक्षण करती। और, हर सुबह गायत्री के चेहरे का रंग उड़ा हुआ सा रहता। उसके माथे पर सिन्दूर की चटक मानो पूरे सर पर फैली रहती, आँखों का काजल अश्रुधारा में मिल कर गालों को काला किए रहता, और साड़ी में निर्मम सिलवटें पड़ी रहती।

भौजी ने आरम्भ में समझा कि नव विवाहित वर-वधू जैसे रमण करते हैं, वही हो रहा होगा। लेकिन बाद में जब उन्होंने गौर किया तो गायत्री का चेहरा किसी खंडहर समान वीरान, सूनसान दिखाई देता। उसको नव विवाहिता होने की न तो कोई प्रसन्नता दिखाई देती, और न ही सम्भोग समागम करने की किसी प्रकार की लज्जा ही दिखती। भौजी को शंका हुई। उन्होंने एक रात कमरे के दरवाज़े पर कान लगा कर सुना। उनकी शंका सही साबित हुई। उन्होंने अम्मा और बाउजी को यह बात बताई । लेकिन उन दोनों ने तो जैसे अपने दोनों हाथ झाड़ कर खुद को एक किनारे कर लिया,

“बिटिया, हम लोग तो बस जनम दिए हैं। अपना अपना भाग्य तो सब ऊपर से ही लिखवा कर धरती पर आते हैं। अब गायत्री के करम में अइसा ही बदा है, तो हम का करें? इस समाज मे बिन ब्याही बेटी कैसे रह सकती है? बताओ न पतोहू!”

भौजी का ह्रदय हुआ की उसी समय उन दोनों पर बरस पड़ें! ऐसी फूल सी बेटी और उसके संग ऐसा कुकर्म! हाँ, कुकर्म! न केवल उन दोनों ने वो कुकर्म किया, बल्कि उनके पति ने भी! उस फूल सी पच्ची का क्या दोष? यह सब बातें भौजी बोल देतीं, लेकिन सदा शांत रहने वाली भौजी आज अपनी मर्यादा छोड़ नहीं सकीं । बस, भीतर ही भीतर सुलगती, कुढती रहीं।

‘हा नारी का भाग ! तुलसीदास जी ठीकै कह गए। नारी सचमुच नरक का द्वार है। इसीलिए वो ऐसे ऐसे पुरुषों को जनम देती है। ऐसे ही पुरुष नारी का मान-हरण करते हैं... प्रकृति का सर्वनाश करते हैं..’

खैर, बारहवें दिवस अखिलेश ने दृढ़तापूर्वक कहा,

“मेरा दिल्ली जाना अत्यंत आवश्यक है। वैसे भी मेरी खोज के लिए कंपनी ने पुलिस में इत्तला कर ही दी होगी। देर सवेर इस गाँव में भी दबिश होगी ही होगी। आप लोग बच नहीं पाओगे। इसलिए उचित यही है कि सम्मान पूर्वक मुझे जाने दो। जो हुआ सो हुआ। मैं किसी से कोई बैर नहीं करना चाहता। इसलिए मैं पुलिस से किसी भी तरह की शिकायत भी नहीं करूँगा। लेकिन बस इतना ही। इससे अधिक रियायत नहीं मिलेगी आपको। आपने जो अपराध किया है, उसका दंड तो मिलेगा ही। भगवान तो सब देखते हैं।”

गायत्री के बाउजी अखिलेश की यह बात सुन कर उसके सम्मुख लगभग दंडवत ही लेट गए,

“बबुआ, पाप तो हुआ है हमसे। इसकी माफ़ी किस मुँह से माँगू। तुम पढ़े लिखे हो। समझदार हो। जो दंड देना है, दे लेना। हमको सब स्वीकार है। लेकिन हमारी बिटिया का मान रख लो। इसको अपने साथ ले जाओ। एक लौंडी बन कर तुम्हारी सेवा करेगी। जो दोगे खा लेगी, जो दोगे पहन लेगी। बस, इसको साथ ले जाओ। और अपनी कृपा छाया में रखना।”

विदाई के लिए जो भी सर सामान लदाया था, वो सब अखिलेश ने घृणा पूर्वक उतरवा दिया। ससुराल का एक फूटा हुआ धेला तक भी उसने नहीं लिया। उसके लिए एक सूट बड़े शौक से सिलवाया गया था, लेकिन उसने वो भी स्वीकारने से मना कर दिया। विदाई के समय, वो अपनी जीन्स पहन कर ही गया । गॉंव से उसके साथ बस गायत्री ही गई।

बाउजी की धुकधुकी बंधी हुई थी, ‘न जाने बिटिया का क्या होगा। हे परभू, ये कैसा अधम कर दिया हमने।’


लेकिन तीर तो धनुष को कब का छोड़ चुका! विवाह एक सामाजिक सरोकार है, परन्तु फिर भी लड़की का ही दाना पानी उसके अपने ही घर से उठ जाता है। वो दूसरे के घर जाती है, उसका घर अपना मान कर सम्हालती है, एक कुटुंब बनाती है। ऐसे ही एक एक कुटुंब कर के ही तो समाज बनता है। फिर भी, समाज में लड़की की दशा निम्न से निम्नतर ही ठहरी। जहाँ दहेज़ एक सामाजिककुरीति है, वहींजबरिया भी कुरीति है। ऐसी कुरीतियाँ लड़की की पहले से ही दयनीय दशा को और भी अधिक दयनीय बनाती जा रही हैं।

बाउजी गायत्री के जीवन के लिए अब पूरी तरह से अखिलेश की ही दया माया पर निर्भर थे। उनकी बिटिया अब इस बबुआ की ब्याहता है। अब वो ही उसके दाना पानी का जुगाड़ करेंगे, और सर पर छाया भी देंगे। एक बार उनके मन में आया कि चल कर, बाहर से ही सही, बिटिया का ‘घर’ तो देख लें। लेकिन दामाद के चेहरे पर स्पष्ट घृणा और क्रोध का भाव देख कर उनकी न तो हिम्मत ही हुई, और न ही उन्होंने अपने बेटे को हिम्मत करने दी। पता तो खैर लिखा ही हुआ है। मामला एक बार ठंडा हो जाय, तो एक बार देख लेंगे सोच कर मन को मना लिया।
lovely
 

Nevil singh

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रास्ते में अखिलेश का मन हुआ कि इस छोकरी को ट्रैन से धकेल दे और किसी को कानो कान खबर भी नहीं होगी। लेकिन हत्या जैसा घिनौना कुकृत्य वो कर नहीं सकता था। न जाने कैसे पिछले कुछ दिनों की अप्रत्याशित घटनाओं से उसके अंदर का राक्षस बाहर निकल आया था। इस लड़की से वो आँख से आँख नहीं मिला सकता था। इतनी लज्जा तो थी उसके अंदर।

लेकिन आँखों से आँख मिलाना तो दूर, उसको तो पता भी नहीं मालूम कि यह लड़की कैसी दिखती है। और इसका नाम क्या बताया था ? ‘जाह्नवी’? नहीं! ये बहुत मुश्किल नाम है …. ये गंवार ऐसा नाम नहीं रख सकते.. कोई तीन अक्षर का नाम था। अब ध्यान ही नहीं आ रहा था। लेकिन इसको पूछे भी तो कैसे? छोड़ो! बाद में देखते हैं। कम से कम उस कैद-खाने से तो छूट मिली।

ट्रैन सवेरे ही दिल्ली पहुँच गई, और वहाँ से दोनों अखिलेश के घर गए। पूरी यात्रा के दौरान गायत्री ने कुछ भी खाया नहीं था। वैसे भी उसने शादी के बाद से कुछ ख़ास खाया पिया नहीं था, सिवाय लात मार और गालियों के। कुछ दिनों पहले ही उसके गालों पर यौवन की लालिमा थी, होंठों पर मुस्कान थी, और ह्रदय में एक अबोध प्रेम! इस ब्याह ने यह सब उससे छीन लिया था। अब वो बुत मात्र रह गई थी। लेकिन उसने एक बात तो महसूस करी और वह यह कि उसका पति यात्रा पर्यन्त बहुत शांत था।

उन्होंने उसके लिए खाना भी ख़रीदा था.. वो अलग बात है कि उन्होंने उससे कुछ कहा नहीं। और बिना पति की आज्ञा पाए वो कैसे खा ले?

घर? वो घर देख कर उसकी आँखे आश्चर्य से फटी की फटी रह गईं। घर ऐसे होते हैं? उसने तो बस गाँव देहात के घर देखे थे; लेकिन यह तो.. ! और एक जन के लिए दो कमरे? अलग से रसोई ! दो दो शौचालय.. और यह एक खुला हुआ बड़ा सा कमरा ! वो भौंचक सी, घूँघट की ओट से यह विचित्र नज़ारा देख रही थी। उसके पति ने अभी भी उससे कोई बात नहीं करी; और तैयार होने शौचालय में चले गए। अखिलेश को यह ध्यान नहीं था कि जो बातें उसके लिए साधारण थीं, वही बातें इस लड़की के लिए आश्चर्य हैं। उसको गुसलखाने का प्रयोग नहीं पता, रसोई का प्रयोग नहीं पता, गैस सिलिंडर का प्रयोग नहीं पता, इत्यादि इत्यादि। वैसे उसको कोई आवश्यकता भी नहीं थी। क्योंकि उसने एक काम करने वाली बाई लगा रखी थी और ऑफ़िस को जाते जाते उसने बाई को कहला भेजा कि आज घर की साफ़ सफाई होनी है, और खाना भी पकाना है।

लेकिन अपने दम्भ और क्रोध में उसने लड़की से कुछ भी नहीं कहा। खैर, वो सोच में डूबा हुआ ही अपने ऑफ़िस पहुँचा।

“किधर थे बेटा, अखिलेश!” उसके बॉस ने पूछा, “मैंने कितनी कोशिश करि तुमसे कॉन्टैक्ट करने की! पुलिस में रिपोर्ट भी लिखवाई लोकल ऑफिस से! तुम कहाँ रह गए थे?”

“सर.. बहुत लम्बी कहानी है.. थोड़ा बैठ कर बात कर सकते हैं? किसी प्राइवेट जगह पर?”

“हाँ, हाँ, बिलकुल!”

एक मीटिंग रूम में बैठ कर अखिलेश ने अपने बॉस के सर पर बम फोड़ा, “सर, मेरी शादी हो गई है..”

“क्या! अरे कांग्रेचुलेशन्स! अरे भई ! ऐसे.. छुपा छुपा कर! अचानक?”

“सर वो बात नहीं है.. आप पूरी बात तो सुन लीजिये,” कह कर अखिलेश देर तक सारी बात विस्तार पूर्वक बताने लगा। बात जैसे जैसे आग बढती जाती, उसके बॉस के माथे पर बल की रेखाएं और गहरी होती जा रही थीं।

“तो अब तुम क्या करना चाहते हो ?”

“पता नहीं सर! मेरी तो लाइफ ही खराब हो गई।” उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे। इतने दिनों का संचित सुख और अवसाद अब आँसू बन कर उसके मन से बाहर निकल रहा था।

“सोच रहा हूँ, कि पुलिस में शिकायत कर देता हूँ.. किडनैपिंग का केस, और जबरिया शादी करने का केस तो कर ही सकते हैं!”

“हम्म..... और उससे क्या होगा?”

“जेल में सड़ेंगे साले।” उसका गुस्सा निकल पड़ा, “उनको पता तो चले कि अपराध करने का दंड मिलता है।”

“दंड तो मिल ही गया है उनको... तुम.. क्या नाम बताया तुमने लड़की का?”

“जी.. नहीं बताया..”

“एक्साक्ट्ली तुमको मालूम भी नहीं उसका नाम। तुमने उनके सर से बोझ हटाया नहीं बल्कि और बढ़ा दिया है।”

“सर, आप ये क्या कह रहे हैं?!”

“बेटा, एक बात बताओ.. तुमने उस बच्ची को मारा पीटा तो नहीं?”

“जी ?” अखिलेश अचानक ही असहज महसूस करने लगा।

“देखो बेटा, तुम्हारे साथ नाइंसाफी तो हुई है.. इसमें कोई डाउट नहीं है। लेकिन उस बच्ची के साथ ही कौन सी इंसाफी हो गई? जिस आदमी को उसने न कभी देखा, न कभी सुना, उसके सर मढ़ दी गई। और अब वो इस अथाह संसार में बिलकुल अकेली, सिर्फ तुम्हारे सहारे है। अब यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम इसको नाइंसाफी नाइंसाफी बोल कर अपने लिए और लोगों की सिम्पथी बटोरोगे, या फिर इस घटना को एक अपरचुिनटी के जैसे लोगे और एक साथ दो लोगों की ज़िन्दगी सँवार लोगे -
एक अपनी, और एक उस बच्ची की ! समझ रहे हो न?”

अखिलेश चुपचाप अपने बॉस की बातें और नसीहतें सुनता रहा। बहुत गहरी बात थी। लेकिन उसको अब समझ आ रही थी कि वो क्या कहना चाहते थे। जब उसने कुछ नहीं बोला तो बॉस ने कहा,

“तुम दो तीन सप्ताह की छुट्टी ले लो। और भी ले सकते हो। उस बच्ची के साथ समय बिताओ। तुमको इस महीने की पूरी सैलरी मिलेगी, और साथ ही बोनस भी। जब मन करे, एक पार्टी भी करते हैं। लोगो की शादियाँ रोज़ रोज़ नहीं हुआ करतीं! तुम्हारे मम्मी पापा से मैं बात कर लूँगा। उनको समझाऊँगा। दिलासा दूँगा। लेकिन, मेरे ख़याल से उस बच्ची को तुम्हारी बहुत जरूरत है। आल द बेस्ट बच्चे! भगवान् तुम दोनों को सुखी रखें। अब जाओ ! घर जाओ..”
super
 

Nevil singh

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“अरे! भैया, आप आ गए ! ये क्या बात हुई ! मैं तो सोने की बालियाँ लूंगी नाग में! हाँ! कैसी सुन्दर सी भाभी लाए हैं! एकदम फूल सी.. एकदम परी! और कितनी गुणी! आज का सारा खाना उन्होंने ही पकाया है। बहुत कम बोलती हैं, लेकिन कितना मीठा बोलती हैं! मेरा तो जानेका मन ही नहीं हो रहा है.. लेकिन मैं कबाब में हड्डी नहीं बनूंगी! आप लोग बात कीजिए, खाना खाइए, मैं आती हूँ शाम को। कुछ मंगाना है बाज़ार से तो फोन कर लीजिएगा!”

कामवाली बाई बिना किसी रोक टोक दनादन बोलती चली जा रही थी । उसकी हर बात अखिलेश के ह्रदय को बींधती जा रही थी !

‘मैं सचमुच कितना स्वार्थी हूँ! सिर्फ अपने बारे में ही सोचता रहा। और मैं कितना बड़ा नीच भी हूँ जो एक लड़की पर हाथ उठाया, उसको गन्दी गन्दी गालियाँ दीं.. उस लड़की को, जो मेरी शरण में आई थी, जिसकी सुरक्षा करना, ख़याल रखना, मेरा धार्मिक उत्तरदायित्व है। हे प्रभु, मुझे क्षमा करें! अब ऐसी गलती नहीं होगी। मेरे पाप का जो दंड आप देना चाहें, मुझे मंज़ूर है। लेकिन इस लड़की को खुश रखे! बहुत दुखिया है बेचारी!”

अखिलेश की आँखों से आँसू झरने लगे। गायत्री सर झुकाए खड़ी थी, और अंगूठे से फर्श को कुरेद रही थी। अचानक ही उसने अखिलेश का हाथ और सर अपने पॉंव पर महसूस किया। अपने पति को ऐसा कलंकित काम करते देख कर वो घबरा गई और बोली,

“अरे! आप यह क्या कर रहे हैं!”

अखिलेश को लगा कि जैसे घुंघरुओं की मीठी झंकार बज गई हो.. ऐसी रसीली और खनकदार आवाज़!

“माफ़ कर दो मुझे! मैं तुम्हारा अपराधी हूँ! मैं पापी हूँ।”

“नहीं नहीं! आप मेरे पैर मत पकिड़ए। आपने कुछ भी गलत नहीं किया,! अम्मा और बाउजी ने ही जबरदस्ती कर दी। मेरे
पैर पकड़ कर आप मुझे और दंड न दीजिए। मैं आपकी दासी बन कर एक कोने में रह लूंगी।”

“नहीं! दासी नहीं! पत्नी दासी नहीं होती। पत्नी अर्द्धांगिनी होती है। मेरा सब कुछ अब से तुम्हारा है। तुम इस घर की स्वामिनी हो।”

“जी?” क्या कह रहे हैं, ये?

“हाँ! तुमको जैसा ठीक लगे, वैसे यह घर चलाओ..”

“लेकिन..”

“लेकिन वेकिन कुछ नहीं.. ये पति के रूप में मेरा तुमको पहला और अंतिम आदेश है। बस !”

गायत्री भाव विभोर हो गई। उसको समझ नहीं आया कि क्या कहे! गाला रूँध गया।

“अपना नाम बताओगी ?”

“जी, गायत्री!”

“और मैं अखिलेश हूँ।” उसने हाथ आगे बढ़ाया, “नाईस टू मीट यू!”

“जी?” गायत्री का हाथ भी उसका बढ़ा हुआ हाथ मिलाने के लिए स्वतः ही बढ़ गया।

“तुमसे मिल कर अच्छा लगा मुझे!”

गायत्री मुस्कुराई। अखिलेश की इस एक बात से उसके ह्रदय का सारा बोझ जैसे उतर गया।

“उम्मीद है कि तुम मेरे साथ साथ बूढ़ी होना पसंद करोगी!”

उसके गले से एक मीठी हंसी छूट गई, ‘कैसी मजािकया बात करते हैं ये!’

“आप खाना खा लीजिए।”

“आपके साथ !”

“मैं आपके खाने के बाद...”

“आपके साथ !”

“जी!”

“और एक बात.. मेरे सामने भी आप घूंघट काढ़ के रहेंगी?”

“जी?”

“मुझे आपको देखना है।“

“मैं तो आपकी ही हूँ...”

“तो फिर?”

“मेरा घूंघट तो खुद मैं भी नहीं हटा सकती। ये काम सिर्फ आप कर सकते हैं।”

अखिलेश ने बढ़ कर गायत्री का घूंघट हटा दिया। ऐसी रूपवती लड़की को देख कर उसको चक्कर आते आते बचा।

‘कैसी किस्मत!’

“खाना खा लें? आपने तो कल से कुछ खाया भी नहीं।”

‘मतलब उन्होंने ध्यान दिया है’ गायत्री ने सोचा।

“आप बैठिए, मैं परोस देती हूँ।”

******************************************************************

खाने के बाद कमरे में जा कर देखा तो ऐसी सुन्दर व्यवस्था देख कर वो अचंभित रह गया ! उसे उम्मीद ही नहीं थी कि उसके पास जितने सामान थे, उससे घर को इतना सुन्दर सजाया जा सकता है।

“मेरी छुट्टी है, दो तीन हफ़्ते की!” अखिलेश ने अपनी शर्ट के बटन खोलते हुए कहा, “हनीमून के लिए ! हनीमून जानती हो किसको कहते हैं?”

“जी नहीं!”

“इधर आओ ।“

गायत्री छोटे छोटे डग भरती अखिलेश के पास आ गई। अखिलेश ने गायत्री को अपने आलिंगन में भर कर उसका गाल चूम लिया। फिर होंठ। फिर गर्दन। फिर धीरे धीरे उसकी ब्लाउज के बटन खोलते हुए उसने कहा,

“अभी जो हम करने वाले हैं, उसको कहते हैं!”

जो कोमल भावनाएँ गायत्री ने कभी जवान होते हुए अपने मन में जन्मी थीं, वही भावनाएँ उसके मन में पुनः जागृत होने लगीं। पुरुष का स्पर्श कैसा होता है, उसकी तो वह बस कल्पना ही कर सकती थी, लेकिन उसके पति का स्पर्श इतना प्रेम भरा,इतना कोमल, इतना आश्वस्त करने वाला लगा, कि उसने तुरंत ही के सम्मुख आत्म-समर्पण कर दिया। जब उसने अपने पति का चेहरा अपने स्तनों के बीच पहली बार महसूस किया, तो उसने मन ही मन सोचा, ‘अब सब ठीक होय जाई..’

(समाप्त)
Excellent
 

mashish

BHARAT
8,032
25,933
218
“अरे! भैया, आप आ गए ! ये क्या बात हुई ! मैं तो सोने की बालियाँ लूंगी नाग में! हाँ! कैसी सुन्दर सी भाभी लाए हैं! एकदम फूल सी.. एकदम परी! और कितनी गुणी! आज का सारा खाना उन्होंने ही पकाया है। बहुत कम बोलती हैं, लेकिन कितना मीठा बोलती हैं! मेरा तो जानेका मन ही नहीं हो रहा है.. लेकिन मैं कबाब में हड्डी नहीं बनूंगी! आप लोग बात कीजिए, खाना खाइए, मैं आती हूँ शाम को। कुछ मंगाना है बाज़ार से तो फोन कर लीजिएगा!”

कामवाली बाई बिना किसी रोक टोक दनादन बोलती चली जा रही थी । उसकी हर बात अखिलेश के ह्रदय को बींधती जा रही थी !

‘मैं सचमुच कितना स्वार्थी हूँ! सिर्फ अपने बारे में ही सोचता रहा। और मैं कितना बड़ा नीच भी हूँ जो एक लड़की पर हाथ उठाया, उसको गन्दी गन्दी गालियाँ दीं.. उस लड़की को, जो मेरी शरण में आई थी, जिसकी सुरक्षा करना, ख़याल रखना, मेरा धार्मिक उत्तरदायित्व है। हे प्रभु, मुझे क्षमा करें! अब ऐसी गलती नहीं होगी। मेरे पाप का जो दंड आप देना चाहें, मुझे मंज़ूर है। लेकिन इस लड़की को खुश रखे! बहुत दुखिया है बेचारी!”

अखिलेश की आँखों से आँसू झरने लगे। गायत्री सर झुकाए खड़ी थी, और अंगूठे से फर्श को कुरेद रही थी। अचानक ही उसने अखिलेश का हाथ और सर अपने पॉंव पर महसूस किया। अपने पति को ऐसा कलंकित काम करते देख कर वो घबरा गई और बोली,

“अरे! आप यह क्या कर रहे हैं!”

अखिलेश को लगा कि जैसे घुंघरुओं की मीठी झंकार बज गई हो.. ऐसी रसीली और खनकदार आवाज़!

“माफ़ कर दो मुझे! मैं तुम्हारा अपराधी हूँ! मैं पापी हूँ।”

“नहीं नहीं! आप मेरे पैर मत पकिड़ए। आपने कुछ भी गलत नहीं किया,! अम्मा और बाउजी ने ही जबरदस्ती कर दी। मेरे
पैर पकड़ कर आप मुझे और दंड न दीजिए। मैं आपकी दासी बन कर एक कोने में रह लूंगी।”

“नहीं! दासी नहीं! पत्नी दासी नहीं होती। पत्नी अर्द्धांगिनी होती है। मेरा सब कुछ अब से तुम्हारा है। तुम इस घर की स्वामिनी हो।”

“जी?” क्या कह रहे हैं, ये?

“हाँ! तुमको जैसा ठीक लगे, वैसे यह घर चलाओ..”

“लेकिन..”

“लेकिन वेकिन कुछ नहीं.. ये पति के रूप में मेरा तुमको पहला और अंतिम आदेश है। बस !”

गायत्री भाव विभोर हो गई। उसको समझ नहीं आया कि क्या कहे! गाला रूँध गया।

“अपना नाम बताओगी ?”

“जी, गायत्री!”

“और मैं अखिलेश हूँ।” उसने हाथ आगे बढ़ाया, “नाईस टू मीट यू!”

“जी?” गायत्री का हाथ भी उसका बढ़ा हुआ हाथ मिलाने के लिए स्वतः ही बढ़ गया।

“तुमसे मिल कर अच्छा लगा मुझे!”

गायत्री मुस्कुराई। अखिलेश की इस एक बात से उसके ह्रदय का सारा बोझ जैसे उतर गया।

“उम्मीद है कि तुम मेरे साथ साथ बूढ़ी होना पसंद करोगी!”

उसके गले से एक मीठी हंसी छूट गई, ‘कैसी मजािकया बात करते हैं ये!’

“आप खाना खा लीजिए।”

“आपके साथ !”

“मैं आपके खाने के बाद...”

“आपके साथ !”

“जी!”

“और एक बात.. मेरे सामने भी आप घूंघट काढ़ के रहेंगी?”

“जी?”

“मुझे आपको देखना है।“

“मैं तो आपकी ही हूँ...”

“तो फिर?”

“मेरा घूंघट तो खुद मैं भी नहीं हटा सकती। ये काम सिर्फ आप कर सकते हैं।”

अखिलेश ने बढ़ कर गायत्री का घूंघट हटा दिया। ऐसी रूपवती लड़की को देख कर उसको चक्कर आते आते बचा।

‘कैसी किस्मत!’

“खाना खा लें? आपने तो कल से कुछ खाया भी नहीं।”

‘मतलब उन्होंने ध्यान दिया है’ गायत्री ने सोचा।

“आप बैठिए, मैं परोस देती हूँ।”

******************************************************************

खाने के बाद कमरे में जा कर देखा तो ऐसी सुन्दर व्यवस्था देख कर वो अचंभित रह गया ! उसे उम्मीद ही नहीं थी कि उसके पास जितने सामान थे, उससे घर को इतना सुन्दर सजाया जा सकता है।

“मेरी छुट्टी है, दो तीन हफ़्ते की!” अखिलेश ने अपनी शर्ट के बटन खोलते हुए कहा, “हनीमून के लिए ! हनीमून जानती हो किसको कहते हैं?”

“जी नहीं!”

“इधर आओ ।“

गायत्री छोटे छोटे डग भरती अखिलेश के पास आ गई। अखिलेश ने गायत्री को अपने आलिंगन में भर कर उसका गाल चूम लिया। फिर होंठ। फिर गर्दन। फिर धीरे धीरे उसकी ब्लाउज के बटन खोलते हुए उसने कहा,

“अभी जो हम करने वाले हैं, उसको कहते हैं!”

जो कोमल भावनाएँ गायत्री ने कभी जवान होते हुए अपने मन में जन्मी थीं, वही भावनाएँ उसके मन में पुनः जागृत होने लगीं। पुरुष का स्पर्श कैसा होता है, उसकी तो वह बस कल्पना ही कर सकती थी, लेकिन उसके पति का स्पर्श इतना प्रेम भरा,इतना कोमल, इतना आश्वस्त करने वाला लगा, कि उसने तुरंत ही के सम्मुख आत्म-समर्पण कर दिया। जब उसने अपने पति का चेहरा अपने स्तनों के बीच पहली बार महसूस किया, तो उसने मन ही मन सोचा, ‘अब सब ठीक होय जाई..’

(समाप्त)
what a lovely story
 

avsji

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what a lovely story
बहुत बहुत शुक्रिया भाई! इसको मेरी पत्नी, अंजलि ने लिखा था। अंजलि ने बहुत बढ़िया लिखा है (लिखने में मैंने मदद करी थी वैसे)
अपने एक काम के सिलसिले में वो मिथिला region में गई थी, और उसने अपने पर्सनल ऑब्ज़र्वेशन पर यह कहानी लिखी थी।
उसने वहाँ जो देखा था, वो बहुत ही दुःख भरा था। इसलिए इस कहानी का अंत सुख भरा लिखा।
 

naqsh8521

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जबरदस्त कहानी है l लिखने का ढंग भी बहुत छू जता है l
 

Aakash.

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Hello Everyone :hello:
We are Happy to present to you The annual story contest of Xforum "The Ultimate Story Contest" (USC)..

Jaisa ki aap sabko maalum hai abhi pichle hafte he humne USC ki announcement ki hai or abhi kuch time Pehle Rules and Queries thread bhi open kiya hai or Chit chat thread toh pehle se he Hind section mein khulla hai.

Iske baare Mein thoda aapko btaadun ye ek short story contest hai jisme aap kissi bhi prefix ki short story post kar shaktey ho jo minimum 700 words and maximum 7000 words takk ho shakti hai. Isliye main aapko invitation deta hun ki aap Iss contest Mein apne khayaalon ko shabdon kaa Rupp dekar isme apni stories daalein jisko pura Xforum dekhega ye ek bahot acha kadam hoga aapke or aapki stories k liye kyunki USC Ki stories ko pure Xforum k readers read kartey hain.. Or jo readers likhna nahi caahtey woh bhi Iss contest Mein participate kar shaktey hain "Best Readers Award" k liye aapko bus karna ye hoga ki contest Mein posted stories ko read karke unke Uppar apne views dene honge.

Winning Writer's ko well deserved Awards milenge, uske aalwa aapko apna thread apne section mein sticky karne kaa mouka bhi milega Taaki aapka thread top par rahe uss dauraan. Isliye aapsab k liye ye ek behtareen mouka hai Xforum k sabhi readers k Uppar apni chaap chhodne ka or apni reach badhaane kaa.

Entry thread 7th February ko open hoga matlab aap 7 February se story daalna suru kar shaktey hain or woh thread 21st February takk open rahega Iss dauraan aap apni story daal shaktey hain. Isliye aap abhi se apni Kahaani likhna suru kardein toh aapke liye better rahega.

Koi bhi issue ho toh aap kissi bhi staff member ko Message kar shaktey hain..

Rules Check karne k liye Iss thread kaa use karein :- Rules And Queries Thread.

Contest k regarding Chit chat karne k liye Iss thread kaa use karein :- Chit Chat Thread.

Regards :Xforum Staff.

 
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aalu

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OH, I would say this a beautiful love story, apart from the social message, well I am a live audience of one such marriage, so I too understand what happens after that, the couple couldn't balance with each other, the husband used to beat her wife, but any how you now, we don't see many divorces in around bihar and similar regions, so they kept on living together, but such marriages are never beneficial for the society....

All your stories are awesome, you create a different atmosphere around your charachters.
Love you bro....
 

avsji

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जबरदस्त कहानी है l लिखने का ढंग भी बहुत छू जता है l
Dhanyavaad bhai! Aapke comment ka notification nahi aaya, isliye bahut der me dekha.
 
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