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Thank you so much....Can u write in Hinglish as it's gonna ease for me to read
Btwn congratulations for thread
Hope u will hve wonderful experience and entertain us
Thank you so much....Can u write in Hinglish as it's gonna ease for me to read
Btwn congratulations for thread
Hope u will hve wonderful experience and entertain us
Congratulations
Mere liye New genre hain isse jaroor padhuga
Forty light years away… and yet it begins right here.
Congratulations on starting your sci-fi journey with “A Forty Light Years Away.”
May your imagination travel farther than light,
and your story find its own universe![]()
Many Many Congratulations DesiPriyaRai ji
Aakhir kaar aapki story read karne ko milegi ab
.
Besabri se intjaar rahega UPDATE ka
Umeed karta hoo best story hogi bilkul aapki tarah![]()
Congratulations on your new story
काफी बेहतरीन शुरुवात हुई है कहानी की
जिस लड़के के बारे में बताया जा रहा है
ऐसा लगता है जैसे ये लड़का किसी तरह के Sleeping Chamber में सो रहा था , जो शायद 34 सालों से सो रहा हो किसी तरह के Space Ship में
.
ऐसा इसीलिए बोल रहा हूँ , क्योंकि इस वक्त ये लड़का Unit 2 की डिटेल देख रहा है जिसमें JACK नाम का मारा हुआ बंदा है जो 34 साल से है उसमें
.
खेर शायद काफी सालों की नींद से जागने के बाद उस लड़के को इतनी ज्यादा कमजोरी का एहसास हो रहा हो
अब देखते है आगे का सोच क्या हो सकता है
.
Very Well Priya ji
Keep it up
Ye update ek cold sci-fi reboot jaisa feel hota hai — alarm, blinking lights aur liquid-filled chamber ke beech protagonist ka forceful revival. Perfluorocarbon se bhare lungs, jalti hui pehli saans aur body ka collapse scene ko pure biotech horror me convert kar deta hai.
Liquid drain hote hi gravity ka shock, floor par girta hua body, uncontrollable coughing — sab kuch visually aur physically intense feel hota hai. Time ka sense khatam hai, sirf machines ki hum aur ek zinda rehne ki fight.
Phir aata hai sabse important moment— dusre pods ka reveal.
Unit-2 ka dead red light aur andar latakta hua aadmi atmosphere ko aur cold bana deta hai. Status screen ka line —
“TERMINATED | YEAR 34” — story ka game hi change kar deta hai. Yahin clear ho jata hai ki protagonist sirf jaga nahi hai, balki future me akela chhoot gaya hai.
Priya tumne emotion ko shout nahi kiya, balki silence se dikhaya hai — ek zinda aadmi aur ek glass ke paar mari hui zindagi.
Overall is update me hame— Strong sci-fi concept, Heavy atmosphere & visuals, Timeline mystery ka solid setup, Short, dark aur deeply unsettling — exactly jaise achha sci-fi hona chahiye vahi dekhne ko milla hai..
Aur aakhir mein bas itna hi kahunga—agar font ko bold rakha jaye aur size 18 set kiya jaye, to reading experience kaafi zyada better ho sakta hai.
Nice n fantastic
Wow
Amazing writnig, but कहीं कहीं लगा कि AI की हेल्प से लिखा है।
बाकी एकदम से नियो के अपने पॉड से रिलीज होने वाला सीन आंखों के सामने चल गया।
Good start प्रिय![]()
ये अपडेट तो सीधे दिमाग में चैंबर फिट कर देता है। अलार्म बजते ही ऐसा लगा जैसे मेरे कान में भी बीप चालू हो गई हो। परफ़्लुओरो-क्या-नाम-था-वोवाला लिक्विड पढ़ते-पढ़ते ही साँस अपने आप shallow हो गई। घुटन।
और जिस तरह गिरता है, खाँसता है, फर्श से चिपक जाता है—पूरी “newborn but trauma ke saath” vibe।
सीन ऐसा है कि बंदा बोले:
“भाई उठ तो गया हूँ, पर ज़िंदगी से नहीं”
अब यूनिट-2…
रेड लाइट। कोई ब्लिंक नहीं।
और फिर स्क्रीन: STATUS: TERMINATED
बस यहीं पे कहानी ने कहा— “ले, संभाल ले अपने जज़्बात।”
“वर्ष 34” वाली लाइन तो अलग ही ज़हर है। एकदम casually डाल दी, जैसे सिस्टम बोल रहा हो:
“हाँ, ये तो कब का मर चुका है, तुझे अभी पता चला।”
और आख़िरी लाइन—
“वो मर गया था… जब मैं सो रहा था।”
भाई ये लाइन नहीं है, ये emotional damage है। कोई bgm नहीं, कोई ड्रामा नहीं—सीधा खालीपन।
सच्ची बात:
ये अपडेट पढ़के लगा तुम sci-fi नहीं लिख रही,
तुम trauma को future में रखकर लिख रही हो।
अगला अपडेट जल्दी डाल, वरना मैं खुद यूनिट-3 में जाकर सो जाऊँगा।
DesiPriyaRai
पढ़कर सांसें भारी हो गई..!!
हाँ यह सच है की कहानियाँ अक्सर विजुअल होती हैं, पढ़ते ही दृष्टिपटल के सामने द्रश्य खड़े हो जाते है पर आपने जो लिखा है वह सेंसरी राइटिंग का एक बेहतरीन नमूना है..
आम तौर पर लिख देते है की "वो नींद से जागा" बस.. किस्सा खतम..!!! लेकिन यहाँ? आपने उस जागने की क्रिया को एक यातना में बदल दिया.. वो तांबे जैसा स्वाद और फेफड़ों में भारीपन.. इतनी बारीक डीटेल्स पढ़कर मेरे गले में भी कुछ अटकने सा लगा..!! कैरेक्टर केवल जागा ही नहीं बल्कि उसका हिंसक पुनर्जन्म हो गया.. लिक्विड से हवा में आना, वो खाँसना... रोंगटे खड़े हो गए..!!
मेरी पसंदीदा लाइन थी "एक ही पल में गुरुत्व वापस आ गया" हम गुरुत्वाकर्षण को भौतिक मूलभूत बल समझते हैं, पर यहाँ उसे एक दुश्मन की तरह पेश किया गया.. जैसे ही पानी हटा, अपनी ही हड्डियों का बोझ उसे कुचलने लगा.. बहुत ही इंटेलेक्चुअल और साइंटिफिक सोच है कि स्पेस या स्टैसिस के बाद अपनी ही बॉडी कितनी पराई हो सकती है.. सीसे जैसी उंगलियों वाला रूपक भी एकदम सटीक था..
अंत आते-आते जो माहौल बदलता है, वो काबिले-तारीफ़ है.. मशीनें तो शोर कर रही हैं, लेकिन असली डर उस सन्नाटे में है जो यूनिट २ के अंदर है.. और वो छोटा सा टेक्स्ट FAILURE TIMESTAMP: YEAR 34... उफ्फ..!! आपने यह नहीं बताया कि वे सोए कब थे, या फिर कुल कितना वक्त बीता है.. क्या वो ३४ साल से वहाँ मरा पड़ा था? और नायक ३४ साल तक एक लाश के बगल में सो रहा था? यदि ऐसा है तो बड़ा ही डरावना खयाल है..
अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा..
Congratulations dear priya for your first story![]()
Congratulations for starting a new story
Nice keep going dekhte chamber ke bahar aane ke baad kya hota hai
New update posted. Read it, feel it and review itबोहोत खुब, कहानी का हिस्सा बहुत ही प्रभावशाली है। आपने जिस तरह से 'क्रायो-स्लीप' या 'हाइबरनेशन' से जागने के अनुभव को लिखा है, वह पाठक को डराता भी है और कहानी में पूरी तरह डुबो भी देता है।
इस अपडेट की सबसे बड़ी खूबी इसका Physical Realism है। जागने की प्रक्रिया को आपने केवल "आँख खुलना" नहीं बताया, बल्कि उसे एक दर्दनाक और भारी अनुभव बनाया है:
* स्वाद और स्पर्श: "मुँह में तांबे जैसा स्वाद" और "फेफड़ों में परफ़्लुओरोकार्बन का भारीपन"—ये बारीकियाँ विज्ञान-फिक्शन के शौकीनों को बहुत पसंद आती हैं।
"हर साँस सुइयाँ निगलने जैसी" और "हड्डियों का वजन असहनीय होना" पाठक को उस शारीरिक पीड़ा का अहसास कराता है जो पात्र झेल रहा है।
शुरुआत से ही एक बेचैनी का माहौल बना हुआ है।
मशीनों की गूंज और गीले फर्श पर रेंगना पात्र की लाचारी को बखूबी दर्शाता है।
यूनिट-2 का दृश्य और उस पर लिखा "STATUS: TERMINATED" कहानी में अचानक से हाई-स्टेक्स पैदा कर देता है।
सबसे बड़ा धमाका अंत में होता है— "YEAR 34"।
सवाल, क्या वे 34 साल से सो रहे थे? मिशन क्या था? क्या बाकी लोग भी मर चुके हैं?
रेंगने और यूनिट-2 तक पहुँचने के बीच के संघर्ष को थोड़ा और खींच सकते थे ताकि उस 'अकेलेपन' का डर और गहरा हो सके। हालांकि, वर्तमान गति भी काफी चुस्त है।
जैक के लिए पात्र की छटपटाहट अच्छी है। अगर अगले भाग में इनके बीच के किसी छोटे से पुराने पल (Flashback) का जिक्र हो, तो जैक की मौत का वजन और बढ़ जाएगा।
यह एक पावरफुल ओपनिंग/अपडेट है। आपकी भाषा में जो "नयापन" है, वह एक सर्वाइवल या स्पेस थ्रिलर के लिए एकदम सटीक है।
बढिया अपडेट![]()
मैं काफी देर तक वहीं पड़ा रहा। मेरी टूटी-फूटी साँसों के साथ प्लेटिंग पर जमी अवशेष की पतली परत थोड़ी ऊपर उठी और फिर वापस बैठ गई। मेरी त्वचा अजीब तरह से कसी हुई लग रही थी, सिकुड़ी हुई नहीं। परफ़्लुओरोकार्बन की छोड़ी हुई एक चिपचिपी परत उस पर जमी हुई थी।
मुझे हिलना ही होगा, मैंने खुद से कहा।
करवट लेने तक में जान निकल रही थी। दिमाग से अंगों तक संदेश पहुँचने में वक्त लग रहा था। जब मैं आखिरकार करवट लेकर लेटा, तो मेरे जोड़ जैसे चीख उठे, अकड़े हुए और जिद्दी। मेरा शरीर अपनी ही हरकतों का साथ नहीं दे रहा था। एहसास गलत था। जैसे अंदर का हर हिस्सा बहुत लंबे समय तक इस्तेमाल ही न हुआ हो।
यहाँ से बाकि के पॉड्स दिख रहे थे।
मैं घिसटते हुए उनकी तरफ बढ़ा, मेरी हथेलियां ठंडे फर्श पर फिसल रही थीं। नीचे से देखने पर पूरा हॉल और बड़ा लग रहा था। वहां एक कतार में पॉड्स खड़े थे लंबे, गोल और बिल्कुल एक जैसे। ठंडे और बेजान।
जिस पॉड से मैं निकला था, उसे पहचानना मुश्किल नहीं था।
उसके काँच पर धारियाँ बनी थीं, जहाँ से तरल बहकर निकला था। अंदर की सतह पर हल्का तरल चिपका हुआ था। भीतर चैंबर खाली था, बस कुछ लटकती लाइनों और केबल्स के अलावा, जो पंप बंद होने के साथ हल्के से हिल रही थीं। पॉड के स्टेटस पैनल पर लिखा हुवा था।
UNIT 1
Name: NATHAN HALE
STATUS: AWAKE
मैं उस नाम को देखता रहा।
यह किसी पहचान जैसा नहीं लगा। यह जानकारी जैसा लगा। कुछ ऐसा जो कही बहोत अंदर दबी हुवी हो।
"नेथन," मैंने फुसफुसाकर कहा।
"हेल।"
शब्द गले में अटक कर रह गए। वे मेरे करीब तो थे, पर मेरे अपने नहीं लग रहे थे।
मैंने नज़रे घुमाकर दूसरी तरफ देखा।
दो पॉड्स ठीक मेरे सामने थे, उनके काँच अंदर भरे तरल से धुंधला था। उनमें इंसानी साये तैर रहे थे, सीधी खड़ी, पारदर्शी तरल में लटकी हुई। हाथ-पैर ढीले, शरीर हार्नेस और रेस्ट्रेंट्स से थामे हुए। ट्यूब्स उनकी छाती और गर्दन में लगी थीं, धीमे, अंदर-बाहर करती हुई। पॉड्स मे हरे रंग की लाइट्स हल्के से धड़क रही थीं।
ये हरकतें धीमी और नियमित थीं। शरीर नहीं, सिस्टम चला रहे थे।
नीचे स्टेटस स्क्रीन चमक रही थीं।
UNIT 3
Name: CLAIRE MORGAN
STATUS: IN STASIS
हार्नेस के नीचे उसकी छाती लगभग न के बराबर उठ रही थी। पॉड के किनारे लगी ट्यूबिंग स्थिर लय में धड़क रही थी।
UNIT 4
Name: LIAM CARTER
STATUS: IN STASIS
उसका सिर एक तरफ झुका हुआ था, आंखें बंद और चेहरा बिल्कुल भावशून्य। सिस्टम ने शरीर को सही स्थिति में रखा हुआ था।
मैंने कहीं और नहीं देखा। अभी हिम्मत नहीं थी।
मैं सहारा लेकर खड़ा हुआ और उन पॉड्स से मुँह फेर लिया।
दूसरे सिरे पर लॉकर लगे थे, उनकी इंडिकेटर लाइट्स मंद थीं, लेकिन सक्रिय। मैं उस लॉकर की तरफ बढ़ा जो मेरे पॉड के सामने था। संतुलन डगमगा रहा था। हर कदम सोच-समझकर रखना पड़ रहा था। जैसे ही मैं करीब पहुँचा, लॉकर की सेंसर लाइट जल उठी।
लॉकर का दरवाजा आसानी से नहीं खुला। वह अटक-अटक कर।
अंदर एक स्पेस सूट था, प्लास्टिक में वैक्यूम-सील किया हुआ।
मैंने उसे फाड़ा, तो बासी गैस और पुराने कपड़े की एक तीखी, बेजान गंध नाक से टकराई।
कपड़े पहनने में उम्मीद से ज़्यादा समय लग गया। कपड़ा त्वचा से चिपक-चिपक कर खिंच रहा था। जब सूट पूरी तरह सील हुआ, तो मेरी बाँहें मेहनत से काँप रही थीं। यह सूट कम और कोई भारी बोझ ज़्यादा लग रहा था।
लॉकर के चमकदार धातु वाले दरवाज़े में मुझे अपनी परछाई दिखी।
मैं उस आदमी को पहचान नहीं पाया।
चेहरा पीला पड़ चुका था, आंखें अंदर धंसी हुई थीं। वह शरीर मेरा नहीं लग रहा था. अधूरा सा, जैसे उसे समय से पहले ही बाहर निकाल लिया गया हो।
मैंने नज़रें हटा लीं।
मेरे पीछे से एक हल्की मशीन की आवाज़ आई।
मैं मुड़ा, तो दीवार से एक पतला मशीनी हाथ बाहर निकला, उसकी हरकतें सटीक थीं। उसकी पकड़ में एक सील किया हुआ पानी के पाउच जैसा था।
मैं ठिठक गया।
ऊपर कहीं से एक आवाज़ आई, बेजान।
“पोस्ट-क्रायो हाइड्रेशन। इसे तुरंत पिएं।”
बाँह ने पाउच मेरी तरफ बढ़ाया और वहीं थमी रही।
मशीनी हाथ ने पाउच मेरी तरफ बढ़ा दिया। मैंने कांपते हाथों से उसे लिया और सील तोड़ दी। पानी ठंडा और थोड़ा खारा था, जैसे उसमें दवाइयां घुली हों। मैंने धीरे-धीरे उसे पिया। गला थोड़ा गीला हुआ, आधे रास्ते में पेट सिकुड़ा, एक सुस्त लहर उठी, जो धीरे-धीरे शांत हो गई।
“और,” मैंने धीमे से कहा। गला जकड़ गया जब दोबारा कोशिश की।
“पानी।”
कोई जवाब नहीं आया।
वह मशीनी हाथ वापस दीवार में समा चुका था, जैसे वहां कुछ था ही नहीं।
मेरे पीछे वे पॉड्स अपना काम कर रहे थे। पंपों की गूँज, चमकती लाइटें, वे उन ज़िन्दगियों को सहेज रहे थे जिन्हें अपनी मौजूदगी का होश तक नहीं था।
मशीनों की धीमी, नियमित गूंज चलती रही जैसे हमेशा चलती आई हो।
मानो कुछ भी न बदला हो। मानो मेरा वहां होना कोई मायने ही न रखता हो।
Congrats nayi story k liye ye lo badka dilअलार्म की आवाज़ ने मुझे झकझोर दिया।
तेज़, लगातार बीप की आवाज़ चैंबर के अंदर गूंज रही थी। मुड़ी हुई काँच की चैंबर पर हरी और लाल लाइटें ब्लिंक कर रही थीं।
सबसे पहले जो मुझे महसूस हुआ, वो था मुँह में तांबे जैसा स्वाद।
ये कोई धीरे-धीरे जागना नहीं था। जबरदस्ती था। अचानक। मेरे फेफड़े परफ़्लुओरोकार्बन के भारीपन से तड़प उठे। वो तरल गाढ़ा, ठंडा और बोझिल था। मेरी नाक और गले को भर चुका था, उन हिस्सों तक दबाव डाल रहा था जो साँस लेना भूल चुके थे।
मैंने चिल्लाने की कोशिश की। आवाज़ सीने से बाहर ही नहीं निकली। वो मेरे अंदर ही दबकर एक सुस्त कंपन बनकर रह गई।
मेरी आँखें झट से खुल गईं।
दुनिया एंबर लाइट की धुंधली परछाइयों में बंटी हुई थी, मोटे ऐक्रेलिक के आर-पार टेढ़ी-मेढ़ी। मैं एक खड़े सिलेंडर के अंदर लटका हुआ था। नंगा, भूत जैसा। मेरे चारों तरफ एक अपारदर्शी, ऑक्सीजन मिला हुआ गाढ़ा तरल था। मेरी गर्दन और जांघ की नस से ट्यूबें जुड़ी थीं, जैसे नाल, जो उस शरीर को चला रही थीं जिसे अब हवा याद नहीं थी।
दबाव बदला।
मेरे नीचे एक ड्रेनेज वाल्व खुला। तरल का स्तर गिरने लगा। पहले धीरे, फिर तेज़।
एक ही पल में गुरुत्व वापस आ गया।
ऐसा लगा जैसे अंदर से कुचला जा रहा हूँ। जैसे ही तरल मेरी छाती से नीचे गया, अपनी ही हड्डियों का वजन असहनीय हो गया। मेरे पैर जवाब दे गए। मैं चैंबर के फर्श पर गिर पड़ा। मेरी त्वचा गीली थी, काँप रही थी, और असली हवा, रीसायकल की हुई, साफ मेरे फेफड़ों में जलती हुई घुस गई।
मेरा शरीर गीली, फटती हुई खाँसियों से ऐंठने लगा। साफ़ तरल मेरे मुँह और नाक से बहकर मैट-ग्रे प्लेटिंग पर फैल गया। हर साँस सुइयाँ निगलने जैसी लग रही थी। दिल, जागने के लिए दिए गए रसायनों के असर से, पसलियों के अंदर बेढंगे ताल में ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
मैं काफी देर तक फर्श पर ही पड़ा रहा।
उस वक्त समय का कोई मतलब नहीं था। बस गीली हाँफती साँसें थीं और वातावरण साफ़ करने वाली मशीनों की लगातार गूंज। मैट-ग्रे प्लेटिंग मेरे गाल के नीचे ठंडी थी, जैसे मेरी त्वचा की आखिरी गर्मी भी खींच रही हो।
मैंने हाथ हिलाने की कोशिश की। उँगलियाँ ऐसी लग रही थीं जैसे किसी और की बाँह से जुड़ा हुआ सीसा।
मैंने खुद को कोहनियों के सहारे उठाया। इस हरकत से पेट में धीरे-धीरे मिचली की लहर उठी। पेट खाली था, फिर भी उलटने की कोशिश कर रहा था।
मैंने दूसरे पॉड्स की तरफ देखा।
वे आधे गोल आकार में लगे थे, जैसे पहिये की तीलियाँ। फर्श से देखने पर वे डेक में गड़े हुए विशाल दाँतों जैसे लग रहे थे।
मेरी बाईं तरफ वाला पॉड, यूनिट-2 अब भी तरल से भरा हुआ था।
उसकी एंबर लाइट ब्लिंक नहीं कर रही थी। वो स्थिर, मरी हुई लाल थी।
अंदर एक आदमी की परछाई बिना हिले लटकी हुई थी। उसकी गर्दन की ट्यूब्स पंप की लय के साथ नहीं हिल रही थीं। वो राल में फँसे किसी कीड़े जैसा लग रहा था।
मैंने उसे आवाज़ देने की कोशिश की। आवाज़ सीने में बन गई, लेकिन नाम वहाँ नहीं था।
मैं खुद को डेक पर घसीटने लगा। घुटने छिल रहे थे, त्वचा जल रही थी। खड़े होने की ताकत नहीं थी, तो रेंगता रहा। दूरी बस छह फीट थी। लेकिन वो समुद्र पार करना जैसा लग रहा था।
मैं यूनिट 2 के नीचे पहुँचा। मेरा गीला हाथ काँच पर एक फैला हुआ निशान छोड़ गया।
टैंक के नीचे स्टेटस डिस्प्ले चमक रहा था।
UNIT 2
NAME: JACK
STATUS: TERMINATED
CAUSE: THERMAL REGULATION COLLAPSE
FAILURE TIMESTAMP: YEAR 34
वर्ष 34।
मेरा पेट सिकुड़ गया। उल्टी रोकने के लिए मुझे धीरे-धीरे साँस लेनी पड़ी।
मैंने अपना माथा काँच से टिका दिया। वो ठंडा था।
वो मर गया था…जब मैं सो रहा था।
Ye signature ka link ko exforum se xforum wala link lagaoThank you so much
Thank you for valuable feedback. Aage se update ke length proper dene ka try krungiजबरदस्त डिस्क्रिप्शन है पोस्ट हाइबरनेशन का।
लेकिन अपडेट बहुत ही छोटा है, कुछ बड़ा लिखने से लोगों का इंटरेस्ट ज्यादा बढ़ेगा पढ़ने का।
प्लॉट बहुत हद तक समझ रहा हूं। लेकिन जितना लिखा है वो बहुत ही कम है।