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Sci-FI A Forty Light Years Away

vakharia

Supreme
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अलार्म की आवाज़ ने मुझे झकझोर दिया।

तेज़, लगातार बीप की आवाज़ चैंबर के अंदर गूंज रही थी। मुड़ी हुई काँच की चैंबर पर हरी और लाल लाइटें ब्लिंक कर रही थीं।

सबसे पहले जो मुझे महसूस हुआ, वो था मुँह में तांबे जैसा स्वाद।

ये कोई धीरे-धीरे जागना नहीं था। जबरदस्ती था। अचानक। मेरे फेफड़े परफ़्लुओरोकार्बन के भारीपन से तड़प उठे। वो तरल गाढ़ा, ठंडा और बोझिल था। मेरी नाक और गले को भर चुका था, उन हिस्सों तक दबाव डाल रहा था जो साँस लेना भूल चुके थे।

मैंने चिल्लाने की कोशिश की। आवाज़ सीने से बाहर ही नहीं निकली। वो मेरे अंदर ही दबकर एक सुस्त कंपन बनकर रह गई।

मेरी आँखें झट से खुल गईं।

दुनिया एंबर लाइट की धुंधली परछाइयों में बंटी हुई थी, मोटे ऐक्रेलिक के आर-पार टेढ़ी-मेढ़ी। मैं एक खड़े सिलेंडर के अंदर लटका हुआ था। नंगा, भूत जैसा। मेरे चारों तरफ एक अपारदर्शी, ऑक्सीजन मिला हुआ गाढ़ा तरल था। मेरी गर्दन और जांघ की नस से ट्यूबें जुड़ी थीं, जैसे नाल, जो उस शरीर को चला रही थीं जिसे अब हवा याद नहीं थी।

दबाव बदला।

मेरे नीचे एक ड्रेनेज वाल्व खुला। तरल का स्तर गिरने लगा। पहले धीरे, फिर तेज़।

एक ही पल में गुरुत्व वापस आ गया।

ऐसा लगा जैसे अंदर से कुचला जा रहा हूँ। जैसे ही तरल मेरी छाती से नीचे गया, अपनी ही हड्डियों का वजन असहनीय हो गया। मेरे पैर जवाब दे गए। मैं चैंबर के फर्श पर गिर पड़ा। मेरी त्वचा गीली थी, काँप रही थी, और असली हवा, रीसायकल की हुई, साफ मेरे फेफड़ों में जलती हुई घुस गई।

मेरा शरीर गीली, फटती हुई खाँसियों से ऐंठने लगा। साफ़ तरल मेरे मुँह और नाक से बहकर मैट-ग्रे प्लेटिंग पर फैल गया। हर साँस सुइयाँ निगलने जैसी लग रही थी। दिल, जागने के लिए दिए गए रसायनों के असर से, पसलियों के अंदर बेढंगे ताल में ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

मैं काफी देर तक फर्श पर ही पड़ा रहा।

उस वक्त समय का कोई मतलब नहीं था। बस गीली हाँफती साँसें थीं और वातावरण साफ़ करने वाली मशीनों की लगातार गूंज। मैट-ग्रे प्लेटिंग मेरे गाल के नीचे ठंडी थी, जैसे मेरी त्वचा की आखिरी गर्मी भी खींच रही हो।

मैंने हाथ हिलाने की कोशिश की। उँगलियाँ ऐसी लग रही थीं जैसे किसी और की बाँह से जुड़ा हुआ सीसा।

मैंने खुद को कोहनियों के सहारे उठाया। इस हरकत से पेट में धीरे-धीरे मिचली की लहर उठी। पेट खाली था, फिर भी उलटने की कोशिश कर रहा था।

मैंने दूसरे पॉड्स की तरफ देखा।

वे आधे गोल आकार में लगे थे, जैसे पहिये की तीलियाँ। फर्श से देखने पर वे डेक में गड़े हुए विशाल दाँतों जैसे लग रहे थे।

मेरी बाईं तरफ वाला पॉड, यूनिट-2 अब भी तरल से भरा हुआ था।
उसकी एंबर लाइट ब्लिंक नहीं कर रही थी। वो स्थिर, मरी हुई लाल थी।

अंदर एक आदमी की परछाई बिना हिले लटकी हुई थी। उसकी गर्दन की ट्यूब्स पंप की लय के साथ नहीं हिल रही थीं। वो राल में फँसे किसी कीड़े जैसा लग रहा था।

मैंने उसे आवाज़ देने की कोशिश की। आवाज़ सीने में बन गई, लेकिन नाम वहाँ नहीं था।

मैं खुद को डेक पर घसीटने लगा। घुटने छिल रहे थे, त्वचा जल रही थी। खड़े होने की ताकत नहीं थी, तो रेंगता रहा। दूरी बस छह फीट थी। लेकिन वो समुद्र पार करना जैसा लग रहा था।

मैं यूनिट 2 के नीचे पहुँचा। मेरा गीला हाथ काँच पर एक फैला हुआ निशान छोड़ गया।

टैंक के नीचे स्टेटस डिस्प्ले चमक रहा था।

UNIT 2
NAME: JACK
STATUS: TERMINATED
CAUSE: THERMAL REGULATION COLLAPSE
FAILURE TIMESTAMP: YEAR 34

वर्ष 34।


मेरा पेट सिकुड़ गया। उल्टी रोकने के लिए मुझे धीरे-धीरे साँस लेनी पड़ी।

मैंने अपना माथा काँच से टिका दिया। वो ठंडा था।

वो मर गया था…जब मैं सो रहा था।

ds

DesiPriyaRai
पढ़कर सांसें भारी हो गई..!!

हाँ यह सच है की कहानियाँ अक्सर विजुअल होती हैं, पढ़ते ही दृष्टिपटल के सामने द्रश्य खड़े हो जाते है पर आपने जो लिखा है वह सेंसरी राइटिंग का एक बेहतरीन नमूना है..

आम तौर पर लिख देते है की "वो नींद से जागा" बस.. किस्सा खतम..!!! लेकिन यहाँ? आपने उस जागने की क्रिया को एक यातना में बदल दिया.. वो तांबे जैसा स्वाद और फेफड़ों में भारीपन.. इतनी बारीक डीटेल्स पढ़कर मेरे गले में भी कुछ अटकने सा लगा..!! कैरेक्टर केवल जागा ही नहीं बल्कि उसका हिंसक पुनर्जन्म हो गया.. लिक्विड से हवा में आना, वो खाँसना... रोंगटे खड़े हो गए..!!

मेरी पसंदीदा लाइन थी "एक ही पल में गुरुत्व वापस आ गया" हम गुरुत्वाकर्षण को भौतिक मूलभूत बल समझते हैं, पर यहाँ उसे एक दुश्मन की तरह पेश किया गया.. जैसे ही पानी हटा, अपनी ही हड्डियों का बोझ उसे कुचलने लगा.. बहुत ही इंटेलेक्चुअल और साइंटिफिक सोच है कि स्पेस या स्टैसिस के बाद अपनी ही बॉडी कितनी पराई हो सकती है.. सीसे जैसी उंगलियों वाला रूपक भी एकदम सटीक था..

अंत आते-आते जो माहौल बदलता है, वो काबिले-तारीफ़ है.. मशीनें तो शोर कर रही हैं, लेकिन असली डर उस सन्नाटे में है जो यूनिट २ के अंदर है.. और वो छोटा सा टेक्स्ट FAILURE TIMESTAMP: YEAR 34... उफ्फ..!! आपने यह नहीं बताया कि वे सोए कब थे, या फिर कुल कितना वक्त बीता है.. क्या वो ३४ साल से वहाँ मरा पड़ा था? और नायक ३४ साल तक एक लाश के बगल में सो रहा था? यदि ऐसा है तो बड़ा ही डरावना खयाल है..

अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा..
 

DesiPriyaRai

Royal
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Thank you for valuable feedback
ds

DesiPriyaRai
पढ़कर सांसें भारी हो गई..!!

हाँ यह सच है की कहानियाँ अक्सर विजुअल होती हैं, पढ़ते ही दृष्टिपटल के सामने द्रश्य खड़े हो जाते है पर आपने जो लिखा है वह सेंसरी राइटिंग का एक बेहतरीन नमूना है..

आम तौर पर लिख देते है की "वो नींद से जागा" बस.. किस्सा खतम..!!! लेकिन यहाँ? आपने उस जागने की क्रिया को एक यातना में बदल दिया.. वो तांबे जैसा स्वाद और फेफड़ों में भारीपन.. इतनी बारीक डीटेल्स पढ़कर मेरे गले में भी कुछ अटकने सा लगा..!! कैरेक्टर केवल जागा ही नहीं बल्कि उसका हिंसक पुनर्जन्म हो गया.. लिक्विड से हवा में आना, वो खाँसना... रोंगटे खड़े हो गए..!!

मेरी पसंदीदा लाइन थी "एक ही पल में गुरुत्व वापस आ गया" हम गुरुत्वाकर्षण को भौतिक मूलभूत बल समझते हैं, पर यहाँ उसे एक दुश्मन की तरह पेश किया गया.. जैसे ही पानी हटा, अपनी ही हड्डियों का बोझ उसे कुचलने लगा.. बहुत ही इंटेलेक्चुअल और साइंटिफिक सोच है कि स्पेस या स्टैसिस के बाद अपनी ही बॉडी कितनी पराई हो सकती है.. सीसे जैसी उंगलियों वाला रूपक भी एकदम सटीक था..

अंत आते-आते जो माहौल बदलता है, वो काबिले-तारीफ़ है.. मशीनें तो शोर कर रही हैं, लेकिन असली डर उस सन्नाटे में है जो यूनिट २ के अंदर है.. और वो छोटा सा टेक्स्ट FAILURE TIMESTAMP: YEAR 34... उफ्फ..!! आपने यह नहीं बताया कि वे सोए कब थे, या फिर कुल कितना वक्त बीता है.. क्या वो ३४ साल से वहाँ मरा पड़ा था? और नायक ३४ साल तक एक लाश के बगल में सो रहा था? यदि ऐसा है तो बड़ा ही डरावना खयाल है..

अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा..
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
Staff member
Moderator
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79,956
304
Hello friends,

I’m excited to begin a new story. A journey to 40 light years away. Come dive in with me for an unforgettable adventure.

Updates may take some time, as I’ve chosen a challenging and unconventional subject for this story. I know I’m still new to writing, but I’m learning, growing, and doing my best to entertain you. Thank you for your patience and support.
Congratulations dear priya for your first story :congrats:
 
  • Love
Reactions: DesiPriyaRai

Aakash.

ɪ'ᴍ ᴜꜱᴇᴅ ᴛᴏ ʙᴇ ꜱᴡᴇᴇᴛ ᴀꜱ ꜰᴜᴄᴋ, ɴᴏᴡ ɪᴛ'ꜱ ꜰᴜᴄᴋ & ꜰᴜᴄᴋ
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I’m excited to begin a new story. A journey to 40 light years away. Come dive in with me for an unforgettable adventure.

Updates may take some time, as I’ve chosen a challenging and unconventional subject for this story. I know I’m still new to writing, but I’m learning, growing, and doing my best to entertain you. Thank you for your patience and support.
Congratulations for starting a new story :congrats:
 
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Aakash.

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सबसे पहले जो मुझे महसूस हुआ, वो था मुँह में तांबे जैसा स्वाद।

ये कोई धीरे-धीरे जागना नहीं था। जबरदस्ती था। अचानक। मेरे फेफड़े परफ़्लुओरोकार्बन के भारीपन से तड़प उठे। वो तरल गाढ़ा, ठंडा और बोझिल था। मेरी नाक और गले को भर चुका था, उन हिस्सों तक दबाव डाल रहा था जो साँस लेना भूल चुके थे।

मैंने चिल्लाने की कोशिश की। आवाज़ सीने से बाहर ही नहीं निकली। वो मेरे अंदर ही दबकर एक सुस्त कंपन बनकर रह गई।

मेरी आँखें झट से खुल गईं।

दुनिया एंबर लाइट की धुंधली परछाइयों में बंटी हुई थी, मोटे ऐक्रेलिक के आर-पार टेढ़ी-मेढ़ी। मैं एक खड़े सिलेंडर के अंदर लटका हुआ था। नंगा, भूत जैसा। मेरे चारों तरफ एक अपारदर्शी, ऑक्सीजन मिला हुआ गाढ़ा तरल था। मेरी गर्दन और जांघ की नस से ट्यूबें जुड़ी थीं, जैसे नाल, जो उस शरीर को चला रही थीं जिसे अब हवा याद नहीं थी।

दबाव बदला।

मेरे नीचे एक ड्रेनेज वाल्व खुला। तरल का स्तर गिरने लगा। पहले धीरे, फिर तेज़।

एक ही पल में गुरुत्व वापस आ गया।

ऐसा लगा जैसे अंदर से कुचला जा रहा हूँ। जैसे ही तरल मेरी छाती से नीचे गया, अपनी ही हड्डियों का वजन असहनीय हो गया। मेरे पैर जवाब दे गए। मैं चैंबर के फर्श पर गिर पड़ा। मेरी त्वचा गीली थी, काँप रही थी, और असली हवा, रीसायकल की हुई, साफ मेरे फेफड़ों में जलती हुई घुस गई।

मेरा शरीर गीली, फटती हुई खाँसियों से ऐंठने लगा। साफ़ तरल मेरे मुँह और नाक से बहकर मैट-ग्रे प्लेटिंग पर फैल गया। हर साँस सुइयाँ निगलने जैसी लग रही थी। दिल, जागने के लिए दिए गए रसायनों के असर से, पसलियों के अंदर बेढंगे ताल में ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

मैं काफी देर तक फर्श पर ही पड़ा रहा।

उस वक्त समय का कोई मतलब नहीं था। बस गीली हाँफती साँसें थीं और वातावरण साफ़ करने वाली मशीनों की लगातार गूंज। मैट-ग्रे प्लेटिंग मेरे गाल के नीचे ठंडी थी, जैसे मेरी त्वचा की आखिरी गर्मी भी खींच रही हो।

मैंने हाथ हिलाने की कोशिश की। उँगलियाँ ऐसी लग रही थीं जैसे किसी और की बाँह से जुड़ा हुआ सीसा।

मैंने खुद को कोहनियों के सहारे उठाया। इस हरकत से पेट में धीरे-धीरे मिचली की लहर उठी। पेट खाली था, फिर भी उलटने की कोशिश कर रहा था।

मैंने दूसरे पॉड्स की तरफ देखा।

वे आधे गोल आकार में लगे थे, जैसे पहिये की तीलियाँ। फर्श से देखने पर वे डेक में गड़े हुए विशाल दाँतों जैसे लग रहे थे।

मेरी बाईं तरफ वाला पॉड, यूनिट-2 अब भी तरल से भरा हुआ था।
उसकी एंबर लाइट ब्लिंक नहीं कर रही थी। वो स्थिर, मरी हुई लाल थी।

अंदर एक आदमी की परछाई बिना हिले लटकी हुई थी। उसकी गर्दन की ट्यूब्स पंप की लय के साथ नहीं हिल रही थीं। वो राल में फँसे किसी कीड़े जैसा लग रहा था।

मैंने उसे आवाज़ देने की कोशिश की। आवाज़ सीने में बन गई, लेकिन नाम वहाँ नहीं था।

मैं खुद को डेक पर घसीटने लगा। घुटने छिल रहे थे, त्वचा जल रही थी। खड़े होने की ताकत नहीं थी, तो रेंगता रहा। दूरी बस छह फीट थी। लेकिन वो समुद्र पार करना जैसा लग रहा था।

मैं यूनिट 2 के नीचे पहुँचा। मेरा गीला हाथ काँच पर एक फैला हुआ निशान छोड़ गया।

टैंक के नीचे स्टेटस डिस्प्ले चमक रहा था।

UNIT 2
NAME: JACK
STATUS: TERMINATED
CAUSE: THERMAL REGULATION COLLAPSE
FAILURE TIMESTAMP: YEAR 34

वर्ष 34।


मेरा पेट सिकुड़ गया। उल्टी रोकने के लिए मुझे धीरे-धीरे साँस लेनी पड़ी।

मैंने अपना माथा काँच से टिका दिया। वो ठंडा था।

वो मर गया था…जब मैं सो रहा था।
Nice keep going dekhte chamber ke bahar aane ke baad kya hota hai :applause:
 
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Raj_sharma

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तेज़, लगातार बीप की आवाज़ चैंबर के अंदर गूंज रही थी। मुड़ी हुई काँच की चैंबर पर हरी और लाल लाइटें ब्लिंक कर रही थीं।

सबसे पहले जो मुझे महसूस हुआ, वो था मुँह में तांबे जैसा स्वाद।

ये कोई धीरे-धीरे जागना नहीं था। जबरदस्ती था। अचानक। मेरे फेफड़े परफ़्लुओरोकार्बन के भारीपन से तड़प उठे। वो तरल गाढ़ा, ठंडा और बोझिल था। मेरी नाक और गले को भर चुका था, उन हिस्सों तक दबाव डाल रहा था जो साँस लेना भूल चुके थे।

मैंने चिल्लाने की कोशिश की। आवाज़ सीने से बाहर ही नहीं निकली। वो मेरे अंदर ही दबकर एक सुस्त कंपन बनकर रह गई।

मेरी आँखें झट से खुल गईं।

दुनिया एंबर लाइट की धुंधली परछाइयों में बंटी हुई थी, मोटे ऐक्रेलिक के आर-पार टेढ़ी-मेढ़ी। मैं एक खड़े सिलेंडर के अंदर लटका हुआ था। नंगा, भूत जैसा। मेरे चारों तरफ एक अपारदर्शी, ऑक्सीजन मिला हुआ गाढ़ा तरल था। मेरी गर्दन और जांघ की नस से ट्यूबें जुड़ी थीं, जैसे नाल, जो उस शरीर को चला रही थीं जिसे अब हवा याद नहीं थी।

दबाव बदला।

मेरे नीचे एक ड्रेनेज वाल्व खुला। तरल का स्तर गिरने लगा। पहले धीरे, फिर तेज़।

एक ही पल में गुरुत्व वापस आ गया।

ऐसा लगा जैसे अंदर से कुचला जा रहा हूँ। जैसे ही तरल मेरी छाती से नीचे गया, अपनी ही हड्डियों का वजन असहनीय हो गया। मेरे पैर जवाब दे गए। मैं चैंबर के फर्श पर गिर पड़ा। मेरी त्वचा गीली थी, काँप रही थी, और असली हवा, रीसायकल की हुई, साफ मेरे फेफड़ों में जलती हुई घुस गई।

मेरा शरीर गीली, फटती हुई खाँसियों से ऐंठने लगा। साफ़ तरल मेरे मुँह और नाक से बहकर मैट-ग्रे प्लेटिंग पर फैल गया। हर साँस सुइयाँ निगलने जैसी लग रही थी। दिल, जागने के लिए दिए गए रसायनों के असर से, पसलियों के अंदर बेढंगे ताल में ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

मैं काफी देर तक फर्श पर ही पड़ा रहा।

उस वक्त समय का कोई मतलब नहीं था। बस गीली हाँफती साँसें थीं और वातावरण साफ़ करने वाली मशीनों की लगातार गूंज। मैट-ग्रे प्लेटिंग मेरे गाल के नीचे ठंडी थी, जैसे मेरी त्वचा की आखिरी गर्मी भी खींच रही हो।

मैंने हाथ हिलाने की कोशिश की। उँगलियाँ ऐसी लग रही थीं जैसे किसी और की बाँह से जुड़ा हुआ सीसा।

मैंने खुद को कोहनियों के सहारे उठाया। इस हरकत से पेट में धीरे-धीरे मिचली की लहर उठी। पेट खाली था, फिर भी उलटने की कोशिश कर रहा था।

मैंने दूसरे पॉड्स की तरफ देखा।

वे आधे गोल आकार में लगे थे, जैसे पहिये की तीलियाँ। फर्श से देखने पर वे डेक में गड़े हुए विशाल दाँतों जैसे लग रहे थे।

मेरी बाईं तरफ वाला पॉड, यूनिट-2 अब भी तरल से भरा हुआ था।
उसकी एंबर लाइट ब्लिंक नहीं कर रही थी। वो स्थिर, मरी हुई लाल थी।

अंदर एक आदमी की परछाई बिना हिले लटकी हुई थी। उसकी गर्दन की ट्यूब्स पंप की लय के साथ नहीं हिल रही थीं। वो राल में फँसे किसी कीड़े जैसा लग रहा था।

मैंने उसे आवाज़ देने की कोशिश की। आवाज़ सीने में बन गई, लेकिन नाम वहाँ नहीं था।

मैं खुद को डेक पर घसीटने लगा। घुटने छिल रहे थे, त्वचा जल रही थी। खड़े होने की ताकत नहीं थी, तो रेंगता रहा। दूरी बस छह फीट थी। लेकिन वो समुद्र पार करना जैसा लग रहा था।

मैं यूनिट 2 के नीचे पहुँचा। मेरा गीला हाथ काँच पर एक फैला हुआ निशान छोड़ गया।

टैंक के नीचे स्टेटस डिस्प्ले चमक रहा था।

UNIT 2
NAME: JACK
STATUS: TERMINATED
CAUSE: THERMAL REGULATION COLLAPSE
FAILURE TIMESTAMP: YEAR 34

वर्ष 34।


मेरा पेट सिकुड़ गया। उल्टी रोकने के लिए मुझे धीरे-धीरे साँस लेनी पड़ी।

मैंने अपना माथा काँच से टिका दिया। वो ठंडा था।

वो मर गया था…जब मैं सो रहा था।

बोहोत खुब, कहानी का हिस्सा बहुत ही प्रभावशाली है। आपने जिस तरह से 'क्रायो-स्लीप' या 'हाइबरनेशन' से जागने के अनुभव को लिखा है, वह पाठक को डराता भी है और कहानी में पूरी तरह डुबो भी देता है।:claps:
इस अपडेट की सबसे बड़ी खूबी इसका Physical Realism है। जागने की प्रक्रिया को आपने केवल "आँख खुलना" नहीं बताया, बल्कि उसे एक दर्दनाक और भारी अनुभव बनाया है:
* स्वाद और स्पर्श: "मुँह में तांबे जैसा स्वाद" और "फेफड़ों में परफ़्लुओरोकार्बन का भारीपन"—ये बारीकियाँ विज्ञान-फिक्शन के शौकीनों को बहुत पसंद आती हैं।
"हर साँस सुइयाँ निगलने जैसी" और "हड्डियों का वजन असहनीय होना" पाठक को उस शारीरिक पीड़ा का अहसास कराता है जो पात्र झेल रहा है।
शुरुआत से ही एक बेचैनी का माहौल बना हुआ है।
मशीनों की गूंज और गीले फर्श पर रेंगना पात्र की लाचारी को बखूबी दर्शाता है।
यूनिट-2 का दृश्य और उस पर लिखा "STATUS: TERMINATED" कहानी में अचानक से हाई-स्टेक्स पैदा कर देता है।
सबसे बड़ा धमाका अंत में होता है— "YEAR 34"।

सवाल, क्या वे 34 साल से सो रहे थे? मिशन क्या था? क्या बाकी लोग भी मर चुके हैं?
रेंगने और यूनिट-2 तक पहुँचने के बीच के संघर्ष को थोड़ा और खींच सकते थे ताकि उस 'अकेलेपन' का डर और गहरा हो सके। हालांकि, वर्तमान गति भी काफी चुस्त है।

जैक के लिए पात्र की छटपटाहट अच्छी है। अगर अगले भाग में इनके बीच के किसी छोटे से पुराने पल (Flashback) का जिक्र हो, तो जैक की मौत का वजन और बढ़ जाएगा।:shhhh:

यह एक पावरफुल ओपनिंग/अपडेट है। आपकी भाषा में जो "नयापन" है, वह एक सर्वाइवल या स्पेस थ्रिलर के लिए एकदम सटीक है।👍
बढिया अपडेट 👌🏻
 
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Raj_sharma

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