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Thriller कातिल रात

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Always welcome bro

Ye story bhi aapki baki stories ki bahut achi h suspense and thrill se bhari .
Dete. Romesh wahi h kya jo pichili story mei tha .
dono story aapas mei link h bhi h kya ya us story ka prequel h ye

Ye update kaafi mazedaar aur suspense-filled tha.
Soumya–Ragini–Romesh ki nok-jhok ne mood light rakha,
lekin Devika ka track story ko ekdum dark thriller mode me le gaya.

Devika ka Kumar se blackmail hona,
Kumar ki car chura lena,
Romesh ki pistol lekar bhaag jana,
aur car me khoon milna—
ye saari cheezein dikhati hain ki wo koi bada game khel rahi hai.

Romesh bhi dheere-dheere uske trap me fas raha hai,
shayad kisi purane dushman ki chaal ho.

Overall update grippy, fast-paced aur interesting tha.
Next update me toh blast pakka hai.

Nice update

:congrats: start new story

Awesome update and lovely story

तितली…या … भँवरा … और मधु?

dono update lajawab ..................... the sarkar .............. :happy:

Agli KADI ka intazar rahega ........... sarkar Mahoday ...

यार तुम्हे तो वाचक के स्थान पर लेखक होना चाहिए, देव प्रिय आगे से लोला और पीछे से डंडा डालके गपा गप करता रहेगा।

Haan! Pahle ye chhichhori harkate kar lo kyoki ye zyada zaruri hai, hat lauda :buttkick:

Dear detective zara explain karoge ki tumhe kaise pata chala ki dono laundiyo ne devpriya ke sath mil kar ye jaal buna hai....matlab kuch bhi :roll:

Aur fir jab ye pata chal hi Gaya to ACP Sharma ki rahnumaai lene kyo chal diye be, saboot ke sath seena chauda kar ke seedhe thane pahuch Jana tha aur devpriya ki aankho me aankhen daal kar unki saari kartoot expose kar deni chahiye thi...kya yaar sahi bol rela tha apan ki ye detective kahlane ke laayak hi nahi hai. Ekdam noob harkate hain iski :D

Ohh really....I mean itna talent hai tumme???? Aur koi talent ho ya na ho lekin joke mast maara hai:lotpot:


Anyway....Kumar Gaurav gayab hai...uske bare me ab kya hi bole apan, matlab ki according to romesh jab ye sara kiya dhara un do laundiyo aur devpriya ka hi hai to zaahir hai Kumar Gaurav ke gayab hone ke pichhe bhi unhi ka hath hoga.... :D

ACP ki maujoodgi me in jaal bunne walo se puchha jaye ki ye sab in logo ne kyo kiya, and one more thing...jab ye khulasa ho hi gaya hai to saumya ko ab kisse aur kis baat khatra??? :roll:

Overall mast funny type update tha ye, keep it up :thumbup:

Kamal ki bat hai mujhe laga nahi tha is khel me SAUMYA hogi lekin abhi ki bat lagane laga hai SAUMYA such me bade khatre me hai lekin sawal abhi bhi whe aaraha hai kya such me Devika or uske sath Wale Ladki (bhai name bhool gya uska) kya in dono ka koi plan hai ya koi bhi shamil hai is khel me

Bhut shandaar update..... कुछ तो खिचड़ी से भी ज्यादा उलझा हुआ पक रहा हैं....


जो अभी रोमेश बाबु की समझ से परे है.....

Nice update.....

Bhut hi badhiya update Bhai
Abhi tak dekhkar to lag raha hai somya sachme kisi badhe khatre me hai
Dhekte hai romesh babu aage kya karte hai

Raj_sharma bhai next update kab tak aayega?

1 और नया पंगा fas गया रोमेश बाबु की जान को....


और 1 शायद gaurav के रूप में फैक्ट्री में इंतजार कर रहा है

Shaandar update

Gazab ki update he Raj_sharma Bhai,

Bhagwan singh sahi keh raha he, us ladki ka murder romesh ki pistol se hua hoga..........

Ab ye kumar ki bhi lanka lag gayi lagti he.........

Romesh ko ab sabse pehle khud ko bachana he..........

Keep rocking Bro

लगता है रोमेश बाबू ने उस लड़की के साथ मुँह काला किया है... रात भर मज़े किए और फिर रात की बात सुबह भूल गया. चलो ठीक है वो अपने हिसाब से.. "No Strings Attached" वाला बंदा है. दम भर खाना है और डकार भी नहीं लेना है. 😂😅

Btw, very nice writing... Good Update.. Loved it!

रिव्यू की शुरुआत की जाए

कहानी में पुराने हथकंडे खुलते जा रहे हैं, क्या हुआ, किस वजह से, क्या हो रहा धीरे-धीरे सामने आता जा रहा है।

मैंने आख़िरी रिव्यू में कहा था कि जो लाश मिली है, उनसे रोमीश का कनेक्शन कुछ न कुछ ज़रूर होगा, वरना मर्डर के इल्ज़ाम रोमीश पर इतना आसानी से नहीं जाता।

अब वह लड़की जिसकी लाश मिली, वह रोमीश की परिचित तो नहीं लगती है। उसके ही जिस भी डायरी सामने आई, वह भी लग तो फ़ेक रही है। सोचने में कहीं न कहीं कुछ तो मिसिंग लग रहा है कि किसने वह फ़ेक सबूत प्लांट किया।

जिस तरह अभी भगवान सिंह के सुर बदले लग रहे हैं, मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि दुश्मन खेमे की पहुँच आला अधिकारी तक है। क्योंकि पहले देवप्रिय, अब भगवान सिंह ये लोग किसी के दबाव में रोमीश को धरना चाहते हैं।

कुछ हद तक मेरा मानना है कि कुछ लोग रोमीश की पुलिस के ऊपर तक की पहुँच से जलते हैं। क्योंकि जो काम पुलिस का है, उसमें रोमीश नाम का प्राइवेट डिटेक्टिव आता है और केस सॉल्व कर देता है, जिससे स्वाभाविक है कि उच्च अधिकारी में पुलिस डिपार्टमेंट पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

मेरा एक कंसर्न है जिस तरह अपडेट के बीच में सीन टाइटल दिया गया है, उदाहरण: कुमार गौरव की लाश वह सस्पेंस खत्म कर देता है।

वैसे दिमाग में बात आई है कि जिस महिला की वजह से पूरा कांड हुआ, उसका तो ज़िक्र आया नहीं है। अशोक बंसल की आधी उम्र की लवर क्या सच में मर गई या वह अभी अंडरग्राउंड में ज़िंदा है। वैसे वह महिला 27–28 की होनी चाहिए। मुझे क्या लगता है, यह महिला हमें आगे देखने को मिलेगी, क्योंकि लेखक महोदय बड़ी चालाकी से उस महिला का विस्तार कम शब्दों में निपटा गए, तो इसलिए शक जायज़ है।

अब मुझे माजरा यह समझ नहीं आ रहा है कि रोमीश के ऊपर अगर कुमार की हत्या का इल्ज़ाम लगवाना है, तो वह कैसे लगेगा। क्योंकि रोमीश के अनुसार उसे कुमार ने अभी फ़ोन किया है, वह भी उस समय पुलिस स्टेशन में था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु समय बताया जाएगा और सीसीटीवी की मदद से रोमीश साबित कर देगा कि मैं तो पुलिस स्टेशन में था उस समय। साथ ही रोमीश की पिस्टल पुलिस कस्टडी में है। अगर कुमार की हत्या रोमीश की पिस्टल से की जाती है, तो डिपार्टमेंट पर सवाल उठेगा कि तुम्हारी कस्टडी से पिस्टल कैसे गायब हुई।

कुल मिलाकर बहुत कुछ हो रहा है।
अगले अपडेट का इंतज़ार

Raj_sharma

Update posted friends :chandu:
 

Iron Man

Try and fail. But never give up trying
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#14

बवाना की उस फैक्ट्री में पहुँचने में हमें आधा घन्टा लगा। हमसे पहले ही लोकल थाने का एक हवालदार और दो तीन सिपाही वहां पहुंचे हुए थे।

"तुम्हारे पास सूचना तो पक्की है न, कही दूसरे थाने के स्टाफ के सामने किरकिरी करवा दो" भगवान सिंह ने गाड़ी से उतरते हुए मेरी तरफ देखकर बोला।

"जनाब मेरे पास जो फोन आया, उसके बारे में आपको बताना उचित समझा, अब यहां क्या होगा, वो तो अंदर जाकर ही पता लगेगा" मैंने गाड़ी से उतरकर गाड़ी को लॉक करते हुए बोला।

"ठीक है! आओ देखते है" ये बोलकर भगवान सिंह उस हवलदार की तरफ बढ़ गया। उसने उससे कुछ पल बात की और फिर मुझे इशारा करके अंदर की ओर चल पड़ा। अंदर फैक्ट्री में तीन चार लोग काम कर रहे थे।

"इस फैक्ट्री का मालिक कौन है" भगवान सिंह ने उन लोगों से पूछा।

"जी गौरव बाबू है हमारे मालिक" एक मजदूर ने बोला।

"उन्हें बुलाओ, उनसे बोलो उनसे मिलने पुलिस आई है" भगवान सिंह ने फिर से बोला।

"मालिक तो परसो आये थे शाम के समय, उसके बाद से तो हमने उनको नही देखा साहब" उसी मज़दूर ने जवाब दिया।

"बेसमेंट में जाने का रास्ता किधर से है" इस बार मैंने अधीर स्वर में पूछा। भगवान सिंह ने अजीब सी नजरो से मुझे घूरा।

"साहब इधर से है" मजदूर ने उस बिल्डिंग के पीछे के हिस्से की ओर इशारा करते हुए बोला।

उसका इशारा पाते ही भगवान सिंह उधर की तरफ तेज कदमो से चल पड़ा। हम बाकी लोग भी अब उसके हमकदम बन चुके थे।

कुछ ही देर में हम लोग सीढिया उतरकर नीचे बेसमेंट में पहुँच चुके थे, लेकिन वहां पर एक दरवाजा लगा हुआ था, और उस पर लगा हुआ ताला हमारा मुंह चिढा रहा था।

"उन मजदूरों में से किसी को बुला कर लाओ, और इस ताले को खुलवाओ" भगवान सिंह ने अपने साथ आये हुए कॉन्स्टेबल को बोला।

कॉन्स्टेबल आदेश पाते ही दौड़कर सीढियो से पलभर में ओझल हो गया।

कोई दस मिनिट के बाद एक चौकीदार टाइप आदमी के साथ आते हुए नजर आया। उस चौकीदार ने आते ही उस ताले पर चाबी लगाई और ताला खोला।

अंदर घुप्प अंधेरा था। चौकीदार ने आगे बढ़कर लाइट जलाई। लाइट जलाते ही एक कोने में एक आदमी औंधे मुंह पड़े हुए नजर आया। हम सभी लोग लगभग दौडतें हुए उस आदमी के पास पहुंचे।

भगवान सिंह ने उस आदमी को पलट कर सीधा किया, वो आदमी अपनी पथराई हुई आंखों से छत की ओर देखते हुए पलट गया।

"यही कुमार गौरव है" मेरे मुंह से बरबस ही निकला।

"ये मर चुका है" उस तहखाने में भगवान सिंह की ये आवाज मेरे कानों में हथौड़े जैसी पड़ी थी। लेकिन भगवान सिंह लगातार मेरी ओर ही देखे जा रहा था।

भगवान सिंह की बेरुखी

"ये तो मर चुका है, फिर इसने तुम्हे फोन कैसे किया" भगवान सिंह की शक की सुई मेरी ओर घूम चुकी थी।

"लेकिन जिसने मुझें फोन किया था, उसने अपना नाम मुझे गौरव ही बताया था, यहां का पता भी बताया था" मैंने भगवान सिंह को बोला।

"लेकिन इसकी शक्ल बता रही है कि ये कम से कम 12 घँटे पहले मरा है" इस बार लोकल थाने के हवलदार ने बोला।

"बताओ रोमेश बाबू, बारह घँटे पहले मरा हुआ आदमी तुम्हे फोन कैसे कर सकता है" भगवान सिंह इस बार कुटिलता से मुस्कराया था।

"मेरे पास उस फ़ोन की कॉल रिकार्डिग है, आप उसे सुनकर फैसला कीजिये कि ये फोन किसने किया है" मैने तभी अपने फोन की कॉल रिकॉर्डिंग स्टार्ट कर दी।

वहां अब मेरी और उस आदमी की जो खुद को गौरव बता रहा था, की आवाज गूंज रही थी।

रिकॉर्डिंग खत्म होते ही मैने भगवान सिंह की तरफ देखा।

"कॉल तो किसी से भी करवाई जा सकती है" हवलदार ने अपना ज्ञान झाड़ा।

"ऐसे ही, खामख्वाह, जिस बन्दे को मैं महज दो दिन पहले से जानता हूँ, उसे मैं क्यो मारूंगा, मेरी कौन सी भैंस खोल ली, इसने दो दिनों में जो मैं इतनी जल्दी प्लानिंग करके मार भी डालूंगा" उस हवलदार की बात पर मेरा पारा चढ़ चुका था।

"देखिए रोमेश साहब! हमे हर संभावना पर गौर करना पड़ता है" इस बार मुझे भड़कता देखकर भगवान सिंह थोड़े से नम्र स्वर में बोला।

"फिर इस बात पर भी गौर कीजिए कि अगर मैने इसे मारा होता तो मैं ही पुलिस को लेकर यहां क्यो आता" मेरे स्वर में अभी झल्लाहट थी।

"आप एक जासूस है, आपकी प्लांनिग सभी से जुदा हो सकती है" भगवान सिंह फिर से किसी अड़ियल टट्टू की तरह से बोला।

"आप जानबूझकर मुझे टारगेट करना चाहते है जनाब, क्यो कि मैने आपके एक साथी को इस केस से हटवा दिया, क्यो कि वो खुद मेरे खिलाफ साजिश रच रहा था, आप मुझे अपनी पुलिस की पॉवर दिखाना चाहते है कि हाकिम लोग किसी के साथ कुछ भी सलूक कर सकते है"

मै अब सुनाने में कोई कसर नही छोड़ रहा था, क्यो कि मैने सोच लिया था की अब जो होगा देखा जाएगा, कानून के दायरे से बाहर जाकर मेरे साथ कुछ करने से पहले ये लोग सात बार सोचेगे।

"आपको गलतफहमी है रोमेश बाबू! हम तो अपनी ड्यूटी कर रहे है" भगवान सिंह ने एक बार फिर से अपने स्वर में नरमी लाते हुए बोला।

"यही ड्यूटी है आपकी, की मै कोई भी तथ्य आपके सामने रखूं, आप कूदकर इस नतीजे पर पहुँच जाओ की मैंने ही वो काम किया होगा, आप उसकी सच्चाई की तह तक जाने की कोशिश भी नही करेगे, अगर मेरे बारे में आपको इतना ही यकीन है कि मेरा ही सब किया धरा है, मैं ही अपराधी हूँ, तो मुझे अरेस्ट करके जेल में डालिये न, कोर्ट अपने आप बता देगी की मैं अपराधी हूँ या नही" मेरा गुस्सा कम होने का नाम नही ले रहा था।

"रोमेश बाबू आप बेकार में बात को लंबा खींच रहे है, पुलिस का काम होता है कि जब तक असली अपराधी न मिल जाये तब तक हर आदमी को अपने शक के दायरे में रखने का, आप तो जासूस हो, आपको तो इस बात के बारे में बताने की जरूरत ही नही है" भगवान सिंह ने मुझे समझाते हुए बोला।

"आपको भी ये ज्ञान होगा कि शक के दायरे में आये हुए लोगो के बारे में खामोशी के साथ पुलिस अपनी जांच करती है, और अगर जांच में वो दोषी पाया जाता है, तब उसे अरेस्ट करके उसे उसके कर्मो के बारे में बताया जाता है, और अगर जांच में कोई निर्दोष होता है तो, उसे इस बात का इल्म भी नही होने दिया जाता कि उसे भी अपराधी समझा जा रहा था" मेरी बात सुनकर इस बार भगवान सिंह ने भी सहमति में अपना सिर हिलाया।

"चलिये! इस बारे में थाने में बैठकर आराम से बात करेगें, मैं जरा बाकी के काम निबटालू" ये बोलकर भगवान सिंह अपने साहब माहेश्वरी जी को पूरी बात बताने लगा।

उनको रिपोर्ट करनें के बाद उसने फोरेंसिक वालो को और एम्बुलेंस को फोन किया।

मै जानता था कि इस पूरी प्रक्रिया में अभी पांच छह घँटे लगने वाले थे। लेकिन मेरी मजबूरी थी कि मैं वहां से जा भी नही सकता था।

गौरव की शक्ल देखकर लग रहा था कि उसे गला घोंटकर मारा गया था। उसके शरीर पर कहीं भी उसे कोई यातना देने के निशान नजर नही आ रहे थे।

दो दिन पहले ही मेरे सामने देविका ने बोला था कि अगर जरूरत पड़ी तो वो गौरव की जान भी ले सकती थी। कल से ही मेघना और देविका से मेरा कोई सम्पर्क नही हुआ था, और कल ही गौरव का कत्ल भी हुआ।

इस वक़्त तो गौरव के क़ातिल के रूप में मुझे देविका के अलावा कोई नजर नही आ रहा था।

लेकिन अब मैं कुछ भी इन अहमक पुलिसियो के साथ सांझा करने वाला नही था। अब इस मामले की जड़ तक मैने खुद ही पहुँचने का फैसला कर लिया था।

अभी मुझें उस लड़की की जन्म कुंडली भी निकालनी थी, जो मेरी माशूका होने का दम भर रही थी, बताओ इस नाचीज़ को किसी की इजहारे मोहब्बत का पता लगा भी तो उसके मर जाने के बाद। :dazed:

अजीब सी जिंदगी थी मेरी, जो हर महीने दो चार मुर्दों में उलझ कर रह जाती है।

तभी भगवान सिंह ने मेरे नजदीक आकर मेरी सोच को भंग किया।

"तुम्हारी नजर में इस बन्दे का क़ातिल कौन हो सकता है" भगवान सिंह इस बार किंचित गंभीर स्वर में बोला।

"किसी क़ातिल को ढूंढने और उसका पता बताने की फीस मेरी लाखों में होती है जनाब, पहले इसकी पोस्टमार्टम और फोरेंसिक रिपोर्ट आने दो, मुझे इसकी मौत का सही समय जानना है, उसके बाद ही किसी की तरफ मेरे शक की सुई घूमेगी" मैंने भगवान सिंह को गोलमोल जवाब दिया।

" रोमेश बाबू अभी पुलिस के इतने बुरे दिन नही आये की किसी क़ातिल का पता करने के लिये किसी प्राइवेट जासूस को लाखों रु की फीस देनी पड़े" भगवान सिंह ने चिड़े हुए स्वर में मेरी बात का जवाब दिया। मै उसकी बात को सुनकर मुस्करा दिया था।

"आप बेफिक्र रहिये! आपसे मैं एक रूपया फीस चार्ज नही करूँगा, और क़ातिल को ढूंढने का सेहरा भी आपके ही सिर सजेगा, लेकिन मुझे क़ातिल समझने की बजाय मेरा साथ दो इस केस में, फिर मैं आपको अपना जलवा दिखाता हूँ" मैने भगवान सिंह को शीशे में उतारा।

"सच बोल रहे हो" भगवान सिंह ने अजीब सी नजरो से मुझें घूरा।

"सोलह आने सच बोल रहा हूँ, वो देवप्रिय जैसा खडूस पना मेरे साथ करना बंद करो, और देखो फिर मैं कैसे आपकी वर्दी में और सितारे जड़वाता हूँ" मै भगवान सिंह को शीशे में उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था।

"भाई! सितारे जड़वाने की बजाय, कहीं मेरी वर्दी न उतरवा देना, देवप्रिय बता रहा था कि एक नंबर के खुरापाती आदमी हो तुम"

भगवान सिंह की इस बात पर मैं जोरो से हँसना चाह रहा था, लेकिन हँसने का वो समय और स्थान दोनों ही गलत थे।

---------अगला सीन--‐-------

हम अंधेरा घिरने के बाद ही थाने पहुंच पाए थे। मेरी और भगवान सिंह के बीच मे मांडवाली हो चुकी थी, इसलिए अब उसके व्यवहार में जमीन आसमान का अंतर आ चुका था।

"सबसे पहले उस मकतूल लड़की के घर का पता दो, जिसने डायरी में मेरी आशिकी के किस्से बयान किये हुए है" मैंने कुर्सी पर बैठते ही भगवान सिंह को बोला।

"उस लड़की के घर का पता बताना तो गलत होगा, क्यो कि उस डायरी के मुताबिक तो सवालो के घेरे में तुम भी हो, मैं कल उस लड़की के घर से उसकी हैंड राइटिंग के नमूने लेकर उस डायरी को हैंड राइटिंग एक्सपर्ट के पास उसकी ओपनियन के लिये भेजूंगा, अगर उस में डायरी की लिखाई अलग पाई गई तो मैं भी मान लूँगा की कोई तुम्हे फ़साने की कोशिश कर रहा है" भगवान सिंह ने मेरी ओर देखते हुए बोला।

भगवान सिंह कानूनी और अपनी ड्यूटी के मद्देनजर बिल्कुल सही बोल रहा था, इसलिए मुझे भी उसकी बात से एहतराम होने से कोई गुरेज नही था।

तभी एक कांस्टेबल ने अंदर आकर एक लिफाफा भगवान सिंह के सामने रखा।

"लो रोमेश बाबू तुम्हारी पिस्टल की फोररेंसिक रिपोर्ट आ गई" ये बोलकर भगवान सिंह लिफाफे से रिपोर्ट निकाल कर पढ़ने लगा।

जैसे जैसे वो रिपोर्ट पढ़ता जा रहा था। वैसे ही उसके चेहरे के भाव बदलते जा रहे थे।

"रोमेश बाबू! तुम तो बारह के भाव नप गये हो, मुझे तुम्हे अभी अरेस्ट करना पड़ेगा"

भगवान सिंह अचानक से अपनी कुर्सी से खड़ा हुआ और तेज कदमो से कमरे से बाहर की ओर चला गया, जितनी तेजी से वो बाहर गया था, उतनी ही तेजी से वो दो कॉन्स्टेबल के साथ अंदर आया था।

वे दोनो कॉन्स्टेबल मेरे कंधों पर हाथ रख कर मेरी दोनो तरफ खड़े हो गए।

"मैं अरेस्ट हूँ क्या, लेकिन किस जुर्म में ये तो बताओ" मैंने प्रतिकार स्वरूप बोला।

"उस लड़की के खून के जुर्म में तुम्हे अरेस्ट किया है, गोली तुम्हारे ही पिस्टल से चली है और पिस्टल पर उंगलियों के निशान भी तुम्हारे ही पाए गए है" भगवान सिंह ने मेरी ओर देखकर बदले हुए स्वर में कहा।
कमरे का वातावरण अचानक ही बदल गया था।
तभी भगवान सिंह ने रिपोर्ट को मेरे सामने रख दिया।

"ध्यान से पढ़ लो, फिर मत बोलना की मै कोई पक्षपात कर रहा हूँ, चाहो तो शर्मा जी को भी फोन कर सकते हो, इस स्थिति में शायद वे भी तुम्हारी कोई मदद नही कर सके।“


जारी रहेगा______✍️
Shaandar update
 

Dhakad boy

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#13

सौम्या बंसल के संपर्क में मैं तब आया था, जब मैं अशोक बंसल हत्या कांड की जांच कर रहा था।

अशोक बंसल दिल्ली शहर की एक नामचीन और अरबपति हस्ती थे। उन्होंने अपने जीवन मे एकमात्र गलती की थी कि अपनी पचपन साल की उम्र में अपनी से आधी उम्र की अपनी सेक्रेटरी के रुपजाल में फंस गए, और उससे शादी कर बैठे, ये उनके जीवन की ऐसी गलती थी, जिसने सिर्फ छह महीने में ही अशोक बंसल के प्राण लील लिए थे।

अशोक बंसल की लाश उन्ही के ड्राइंगरूम में मिली थी, उनकी काफी निर्मम तरीके से हत्या की गई थी। उन्ही अशोक बंसल के एक मात्र सुपुत्र राजीव बंसल उस हत्या कांड में मुख्य अभियुक्त साबित हुए थे, और उसी राजीव बंसल की पत्नी थी सौम्या बंसल।

जब मैं केस की जांच के दौरान सौम्या से मिला तो इस बेपनाह सुंदरी के जीवन मे कितना बड़ा अंधेरा था, वो सौम्या से मिलने के बाद ही पता लग सका।

सौम्या बहुत छोटी उम्र में ही अपने पापा के एक दोस्त और अपने खुद के चाचा की काम वासना का शिकार हो गई थी।

छोटी उम्र में शारीरिक संबंध बन जाने के कारण सौम्या को एक अजीबो गरीब बीमारी हो गई, जिसे हम लोग निम्फोमानियाक नाम की एक सेक्स बीमारी के नाम से जानतें है, ये ऐसी भयावह बीमारी है कि जब इंसान में सेक्स की तलब उठती है तो न वो अपना देखती है और न पराया, उसे बस अपनी कामवासना को शांत करने से मतलब होता है।

मुझे अपनी इस बीमारी के बारे में सौम्या ने खुद नही बताया था, बल्कि इस बारे में मुझें केस की जांच के दौरान ही मेघना से पता चला था। सौम्या की इसी बीमारी के चलते सौम्या का पति राजीव बंसल कई मौकों पर अपमानित हो चुका था, और सौम्या से छुटकारा पाना चाह्ता था।

अपनी सौतेली माँ सोनिया की हत्या के बाद राजीव ने सौम्या को भी मार डालने का षडयंत्र रचा था, लेकिन वो आपके इस सेवक की वजह से अपने इरादो में कामयाब नही हो सका था, और उसे मैंने रंगे हाथो सौम्या की जान लेने की कोशिश करते हुए पकड़ लिया था।

राजीव ने ये साजिश सौम्या को रास्ते से हटाकर मेघना के साथ शादी करने के इरादे से रची थी।

यही वजह थी कि रागिनी ने इस पॉइंट को इंगित किया था कि अरमान सिर्फ राजीव के ही अधूरे नही रहे थे, बल्कि अरमान मेघना के भी पूरे नही हुए थे।

बाद में मेघना ने भी सौम्या को मार डालने की साजिश रची थी, लेकिन इस बार भी मैने ही सौम्या को एक बार फिर से मेघना की साजिश से बचाया और मेघना को जेल भिजवाया था।

लेकिन लगता है कि मेघना ने अभी तक अपनी हार नही मानी थी। वो एक बार फिर से अपने इरादो को अंजाम देने के लिये जेल से बाहर आ गई थी, वो भी देविका के साथ।

मेघना और देविका का एक साथ जमानत पाना ही ये इशारा करता था कि जाल काफी उच्चस्तर पर रचा गया है। लेकिन मेरे मन मे जो ख्याल बार बार कौंध रहा था, वो था कि जेल में बन्द राजीव बंसल की इसमे क्या भूमिका हो सकती थी।

बिना राजीव की मिली भगत के तो अकेली मेघना कुछ भी नही कर सकती थी। वो कौन था जो जेल में बन्द इन दोनों के बीच मे कूरियर का काम कर रहा था। कोई तो था। अब इस कोई को ही सबसे पहले मुझे ढूंढना था।

मुझे कुमार गौरव को भी ढूंढना था, वो यू अचानक से कहाँ गायब हो गया था।

सौम्या रागिनी के साथ ऊपर अपने कमरे में जा चुकी थी और मैं अब अपने घर की ओर रवाना हो चुका था।

मुझें जो सबसे पहला काम करना था, वो था, पिछले दो सालों में जेल में राजीव बंसल से किन लोगो ने मुलाकात की है, उसका पता लगाना उन मुलाकात करने वालो लोगो की लिस्ट में से ही कोई एक चेहरा उभर कर आ सकता था, जिसकी मुझे तलाश है।

बहरहाल फिलहाल तो मैं घर पहुंचते ही सोना चाहता था, क्यो कि पिछले दो दिनों से मेरी नींद उड़ी हुई थी।

अगले दिन मैं अभी तैयार हुआ ही था कि थाने से भगवान सिंह का काल आ गया था। उसने मुझे बड़े ही नम्र स्वर में थाने आने के लिए बोला था।

मैं उसके बुलावे पर बीस मिनट में ही उनके सामने हाजिर हो चुका था।

" रोमेश साहब! जिस लड़की की लाश हमे परसो मिली है, क्या आप उसे जानते है" भगवान सिंह ने मेरे बैठते ही अपना सवाल कर दिया था।

"जी नही! मैंने तो उस लड़की को उस दिन जिंदगी में पहली बार ही देखा था, वो भी मुर्दा" मैंने बोला।

"लेकिन उस लड़की के घर के सामान में एक डायरी मिली है, जिसमे आपके बारे में काफी कुछ लिखा गया है, उसमे उसने लिखा है कि तुम और वो लड़की पिछले तीन साल से रिलेशनशिप में थे, उसके बाद तुम अचानक ही उसकी जिंदगी से गायब हो गए, उसके फोन में आपका फोन नंबर भी आपके ही नाम से सेव किया हुआ मिला है" भगवान सिंह एक के बाद एक बम मेरे सिर पर फोड़े जा रहा था।

"मैं एक बार उस लड़की के जीवित अवस्था मे लिये गए कोई फोटोग्राफ देख सकता हूँ" मैं अब कुछ भी बोलने से पहले उस लड़की को सही से देख लेना चाहता था।

"जी बिल्कुल देख सकते है" ये बोलकर भगवान सिंह ने अपनी दराज से एक फ़ाइल निकाली।

उस फ़ाइल में रोजनामचे की कॉपी के साथ ही उस लड़की की विभिन्न कोण से खींची गई उसकी लाश की तस्वीरे लगी हुई थी, उन तस्वीरो के नीचे ही उसकी जीवित अवस्था की दो तस्वीर लगी हुई थी।

मैंने गौर से उन तस्वीरों को देखा, बहुत ध्यान करने के बाद भी मुझें ध्यान नही आ रहा था कि मैंने इस लड़की को कहां देखा है।

मैंने तस्वीर पर नजर डालकर इनकार में अपनी गर्दन को हिलाया और उस फ़ाइल पर एक ओर सरसरी नजर डालकर भगवान सिंह की तरफ बढ़ा दी।

"मैं इस लड़की से अपनी जिंदगी में कभी नही मिला, और जो उस डायरी में आप लिखा हुआ बता रहे है कि मैं अचानक इस लड़की की जिंदगी से गायब हो गया, ये तो सरासर झूठ है, क्यो कि पिछले पांच सालो से तो मैं अपने इसी रोहिणी वाले घर मे रह रहा हूँ" मैने भगवान सिंह की डायरी वाली बात का भी जवाब दिया।

"लेकिन कोई लड़की अपनी डायरी में झूठ क्यो लिखेगी" भगवान सिंह ने मेरी ओर देखते हुए बोलो।

"आपको यकीन है कि ये डायरी इसी लड़की के हाथ की लिखी हुई है, क्या आप इसकी जाँच कर चुके है" मैने भगवान सिंह से ही प्रश्न किया।

"नही! अभी तो हम सिर्फ इस मिली हुई डायरी के आधार पर आपसे पूछताछ कर रहें है" भगवान सिंह ने बोला।

"जिस लडक़ी से मैं अपनी जिंदगी में कभी मिला नही, जिस लड़की ने अपने जिंदा रहते कभी मुझे देखा नही, ऐसी लड़की के केस में हो सकता है कि ये डायरी किसी ने प्लांट कर दी हो" मैने अपनी शंका जताई।

"फिर तो मुझे पक्का यकीन है कि आपकी पिस्टल की फोरेंसिक रिपोर्ट इस लड़की के जिस्म में पाई जाने वाली गोली की फोरेंसिक रिपोर्ट एक ही मिले, आप अपने बचाव की पूरी तैयारी कर लीजिये रोमेश बाबू, क्यो कि शाम को रिपोर्ट आने तक का ही वक़्त है आपके पास" भगवान सिंह ने मुझे चेतावनी नुमा लहजें में बोला।

"अभी मुझे जाने की इजाजत है या नही, शाम की शाम को देखी जाएगी" मैने भगवान सिंह को बोला।

"जी बिल्कुल इजाजत है, लेकिन एक नेक सलाह है आपके लिए, शाम को अपने साथ एक वकील जरूर लेते आइए, आपको जरूरत पड़ सकती है" भगवान सिंह भी अब देवप्रिय वाली जुबान ही बोल रहा था।

"बेफिक्र रहिये जनाब! अपने लायक वकालत तो मैं खुद भी करना जानता हूँ" ये बोलकर मैं कुर्सी से उठा और तेज कदमो से कमरे से बाहर आ गया।

कुमार गौरव की लाश

थाने से निकलते ही मेरे मोबाइल पर एक अनजान नंबर चमकने लगा था। मैंने उस फोन को गाड़ी में बैठने से पहले ही रिसीव किया। उधर से कोई घबराई हुई आवाज में बोल रहा था।

" रोमेश भाई बोल रहे हो" आवाज बहुत ही धीमी थी।

" रोमेश ही बोल रहा हूँ, तुम कौन हो" मैने उस आवाज को पहचानने की कोशिश की।

" रोमेश! मैं गौरव बोल रहा हूँ" उधर से बोलने वाला गौरव था।

"कहाँ गायब हो भाई, यहां तुम्हारी मम्मी तुम्हे ढूंढ ढूंढ कर परेशान है" मैंने उस बोला।

"मेरे पास ज्यादा लंबी बात करने का समय नही है रोमेश, इन लोगो ने मुझे मेरी ही फैक्ट्री के बेसमेंट में कैद कर रखा है, मुझे बचा लो रोमेश" उधर से गौरव बहुत ही धीमी आवाज में बोल रहा था।

"अपनी फैक्ट्री का पता बताओ, मैं वहां अभी पहुँचता हूँ" मैंने उसे दिलासा दिया। उसने मुझें अपना पता बताया।

"किन लोगों ने तुम्हे अपना कैदी बना कर रखा हुआ है, बताओ मुझे, मैं उन्हें भी पकड़वाने का इंतजाम करता हूँ" मैने गौरव से पूछा।

लेकिन तभी उधर से कोई चीज़ मुझें फर्श पर गिरने की आवाज आई और फिर उसके बाद फोन कट गया।

मैंने तुरन्त फोन को फिर से मिलाया, लेकिन इस बार फोन नेटवर्क एरिया से बाहर बता रहा था। मैं एक पल को वही रुका का रुका रह गया।

इस वक़्त मुझें ये समझ नही आ रहा था कि मैं वहां अकेला जाऊं या पुलिस को अपने साथ लेकर जाऊं। मैने किसी नए झेमेले में फंसने से बचने के लिये पुलिस को ही अपने साथ ले जाना उचित समझा।

मैं वही से उल्टे पाँव भगवान सिंह के कमरे की ओर मुड़ गया। मुझें अपने कमरे के दरवाजे पर देखते ही भगवान सिंह के होठो पर मुस्कान आ गई।

"काफी बेचैन लग रहे हों, इतनी जल्दी लौट आये जासूस साहब, रिपोर्ट आने से पहले तो मैं आपको छुउंगा भी नही" भगवान सिंह मेरी बात सुनने की बजाए सिर्फ अपनी अपनी कहे जा रहा था।

"आप पहले मेरी बात सुनेंगे" मैंने थोड़े तीखे स्वर में बोला तो वो बुरा सा मुंह बनाकर मेरी ओर देखने लगा।

"बोलो क्या बोलना चाहते हो" भगवान सिंह मेरी और देखते हुए बोला।

"मेरे फोन पर अभी एक अज्ञात नंबर से फोन आया है, वो खुद को गौरव बता रहा है, वो बोल रहा है कि उसे उसकी ही फैक्ट्री के बेसमेंट में किसी ने बंधक बनाकर रखा हुआ है" मैने ये बोलकर अपने फोन की कॉल लिस्ट में वो नंबर और काल डिटेल दिखाई।

"ये कैसे मान ले की वो गौरव ही था" भगवान सिंह ने एक बेमतलब सा सवाल पूछा।

"ये तो अब उसकी फैक्ट्री में ही जाकर पता चलेगा" मैने सीधी बात बोली।

"कहाँ है उसकी फैक्ट्री" भगवान सिंह ने लगता है अभी तक गौरव सिंह की गुमशुदगी की रिपोर्ट पढ़ी तक नही थी।

"उसकी फैक्ट्री बवाना में है, पता है मेरे पास" मैने भगवान सिंह को बोला।

"वो इलाक़ा दूसरे थाने के अंतर्गत आता है, मुझे वहां के थाने को भी सूचित करना होगा और वही से सिपाही बुलाने होंगे, तुम यही रुको, मैं साहब से इजाजत लेकर आता हूँ" ये बोलकर भगवान सिंह तेज कदमो से कमरे से बाहर निकल गया।

उसके बाहर जाते ही मैने रागिनी को फोन मिलाकर उसे सारी स्थिति के बारे में बताया।

तभी भगवान सिंह मुझे उतनी ही तेजी से वापिस आता हुआ नजर आया। मैने तुरंत फोन काट दिया।

"चलो मैने अपनी रवानगी दर्ज कर दी है" ये बोलकर भगवान सिंह वापिस मुड़ा और मैं भी उतनी ही तेजी के साथ उसके पीछे लपका। तभी उसके साथ एक कांस्टेबल और चलने लगा।

भगवान सिंह अपनी मोटरसाइकिल की तरफ बढ़ने लगा तो मैने उन्हें अपनी ही गाड़ी में चलने के लिये बोला।

जिसे भगवान सिंह ने थोड़ी सी हिचकिचाहट के बाद वे दोनों मेरी गाड़ी में सवार हो गए।


जारी रहेगा_____✍️
Bhut hi badhiya update Bhai
Ye dayri rakhne me bhi lagta hai megna aur Devika ka hi hath hai
Aur 1 aur problem gaurav sahab ki factory me unka intezar kar rahi hai
 

Dhakad boy

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#14

बवाना की उस फैक्ट्री में पहुँचने में हमें आधा घन्टा लगा। हमसे पहले ही लोकल थाने का एक हवालदार और दो तीन सिपाही वहां पहुंचे हुए थे।

"तुम्हारे पास सूचना तो पक्की है न, कही दूसरे थाने के स्टाफ के सामने किरकिरी करवा दो" भगवान सिंह ने गाड़ी से उतरते हुए मेरी तरफ देखकर बोला।

"जनाब मेरे पास जो फोन आया, उसके बारे में आपको बताना उचित समझा, अब यहां क्या होगा, वो तो अंदर जाकर ही पता लगेगा" मैंने गाड़ी से उतरकर गाड़ी को लॉक करते हुए बोला।

"ठीक है! आओ देखते है" ये बोलकर भगवान सिंह उस हवलदार की तरफ बढ़ गया। उसने उससे कुछ पल बात की और फिर मुझे इशारा करके अंदर की ओर चल पड़ा। अंदर फैक्ट्री में तीन चार लोग काम कर रहे थे।

"इस फैक्ट्री का मालिक कौन है" भगवान सिंह ने उन लोगों से पूछा।

"जी गौरव बाबू है हमारे मालिक" एक मजदूर ने बोला।

"उन्हें बुलाओ, उनसे बोलो उनसे मिलने पुलिस आई है" भगवान सिंह ने फिर से बोला।

"मालिक तो परसो आये थे शाम के समय, उसके बाद से तो हमने उनको नही देखा साहब" उसी मज़दूर ने जवाब दिया।

"बेसमेंट में जाने का रास्ता किधर से है" इस बार मैंने अधीर स्वर में पूछा। भगवान सिंह ने अजीब सी नजरो से मुझे घूरा।

"साहब इधर से है" मजदूर ने उस बिल्डिंग के पीछे के हिस्से की ओर इशारा करते हुए बोला।

उसका इशारा पाते ही भगवान सिंह उधर की तरफ तेज कदमो से चल पड़ा। हम बाकी लोग भी अब उसके हमकदम बन चुके थे।

कुछ ही देर में हम लोग सीढिया उतरकर नीचे बेसमेंट में पहुँच चुके थे, लेकिन वहां पर एक दरवाजा लगा हुआ था, और उस पर लगा हुआ ताला हमारा मुंह चिढा रहा था।

"उन मजदूरों में से किसी को बुला कर लाओ, और इस ताले को खुलवाओ" भगवान सिंह ने अपने साथ आये हुए कॉन्स्टेबल को बोला।

कॉन्स्टेबल आदेश पाते ही दौड़कर सीढियो से पलभर में ओझल हो गया।

कोई दस मिनिट के बाद एक चौकीदार टाइप आदमी के साथ आते हुए नजर आया। उस चौकीदार ने आते ही उस ताले पर चाबी लगाई और ताला खोला।

अंदर घुप्प अंधेरा था। चौकीदार ने आगे बढ़कर लाइट जलाई। लाइट जलाते ही एक कोने में एक आदमी औंधे मुंह पड़े हुए नजर आया। हम सभी लोग लगभग दौडतें हुए उस आदमी के पास पहुंचे।

भगवान सिंह ने उस आदमी को पलट कर सीधा किया, वो आदमी अपनी पथराई हुई आंखों से छत की ओर देखते हुए पलट गया।

"यही कुमार गौरव है" मेरे मुंह से बरबस ही निकला।

"ये मर चुका है" उस तहखाने में भगवान सिंह की ये आवाज मेरे कानों में हथौड़े जैसी पड़ी थी। लेकिन भगवान सिंह लगातार मेरी ओर ही देखे जा रहा था।

भगवान सिंह की बेरुखी

"ये तो मर चुका है, फिर इसने तुम्हे फोन कैसे किया" भगवान सिंह की शक की सुई मेरी ओर घूम चुकी थी।

"लेकिन जिसने मुझें फोन किया था, उसने अपना नाम मुझे गौरव ही बताया था, यहां का पता भी बताया था" मैंने भगवान सिंह को बोला।

"लेकिन इसकी शक्ल बता रही है कि ये कम से कम 12 घँटे पहले मरा है" इस बार लोकल थाने के हवलदार ने बोला।

"बताओ रोमेश बाबू, बारह घँटे पहले मरा हुआ आदमी तुम्हे फोन कैसे कर सकता है" भगवान सिंह इस बार कुटिलता से मुस्कराया था।

"मेरे पास उस फ़ोन की कॉल रिकार्डिग है, आप उसे सुनकर फैसला कीजिये कि ये फोन किसने किया है" मैने तभी अपने फोन की कॉल रिकॉर्डिंग स्टार्ट कर दी।

वहां अब मेरी और उस आदमी की जो खुद को गौरव बता रहा था, की आवाज गूंज रही थी।

रिकॉर्डिंग खत्म होते ही मैने भगवान सिंह की तरफ देखा।

"कॉल तो किसी से भी करवाई जा सकती है" हवलदार ने अपना ज्ञान झाड़ा।

"ऐसे ही, खामख्वाह, जिस बन्दे को मैं महज दो दिन पहले से जानता हूँ, उसे मैं क्यो मारूंगा, मेरी कौन सी भैंस खोल ली, इसने दो दिनों में जो मैं इतनी जल्दी प्लानिंग करके मार भी डालूंगा" उस हवलदार की बात पर मेरा पारा चढ़ चुका था।

"देखिए रोमेश साहब! हमे हर संभावना पर गौर करना पड़ता है" इस बार मुझे भड़कता देखकर भगवान सिंह थोड़े से नम्र स्वर में बोला।

"फिर इस बात पर भी गौर कीजिए कि अगर मैने इसे मारा होता तो मैं ही पुलिस को लेकर यहां क्यो आता" मेरे स्वर में अभी झल्लाहट थी।

"आप एक जासूस है, आपकी प्लांनिग सभी से जुदा हो सकती है" भगवान सिंह फिर से किसी अड़ियल टट्टू की तरह से बोला।

"आप जानबूझकर मुझे टारगेट करना चाहते है जनाब, क्यो कि मैने आपके एक साथी को इस केस से हटवा दिया, क्यो कि वो खुद मेरे खिलाफ साजिश रच रहा था, आप मुझे अपनी पुलिस की पॉवर दिखाना चाहते है कि हाकिम लोग किसी के साथ कुछ भी सलूक कर सकते है"

मै अब सुनाने में कोई कसर नही छोड़ रहा था, क्यो कि मैने सोच लिया था की अब जो होगा देखा जाएगा, कानून के दायरे से बाहर जाकर मेरे साथ कुछ करने से पहले ये लोग सात बार सोचेगे।

"आपको गलतफहमी है रोमेश बाबू! हम तो अपनी ड्यूटी कर रहे है" भगवान सिंह ने एक बार फिर से अपने स्वर में नरमी लाते हुए बोला।

"यही ड्यूटी है आपकी, की मै कोई भी तथ्य आपके सामने रखूं, आप कूदकर इस नतीजे पर पहुँच जाओ की मैंने ही वो काम किया होगा, आप उसकी सच्चाई की तह तक जाने की कोशिश भी नही करेगे, अगर मेरे बारे में आपको इतना ही यकीन है कि मेरा ही सब किया धरा है, मैं ही अपराधी हूँ, तो मुझे अरेस्ट करके जेल में डालिये न, कोर्ट अपने आप बता देगी की मैं अपराधी हूँ या नही" मेरा गुस्सा कम होने का नाम नही ले रहा था।

"रोमेश बाबू आप बेकार में बात को लंबा खींच रहे है, पुलिस का काम होता है कि जब तक असली अपराधी न मिल जाये तब तक हर आदमी को अपने शक के दायरे में रखने का, आप तो जासूस हो, आपको तो इस बात के बारे में बताने की जरूरत ही नही है" भगवान सिंह ने मुझे समझाते हुए बोला।

"आपको भी ये ज्ञान होगा कि शक के दायरे में आये हुए लोगो के बारे में खामोशी के साथ पुलिस अपनी जांच करती है, और अगर जांच में वो दोषी पाया जाता है, तब उसे अरेस्ट करके उसे उसके कर्मो के बारे में बताया जाता है, और अगर जांच में कोई निर्दोष होता है तो, उसे इस बात का इल्म भी नही होने दिया जाता कि उसे भी अपराधी समझा जा रहा था" मेरी बात सुनकर इस बार भगवान सिंह ने भी सहमति में अपना सिर हिलाया।

"चलिये! इस बारे में थाने में बैठकर आराम से बात करेगें, मैं जरा बाकी के काम निबटालू" ये बोलकर भगवान सिंह अपने साहब माहेश्वरी जी को पूरी बात बताने लगा।

उनको रिपोर्ट करनें के बाद उसने फोरेंसिक वालो को और एम्बुलेंस को फोन किया।

मै जानता था कि इस पूरी प्रक्रिया में अभी पांच छह घँटे लगने वाले थे। लेकिन मेरी मजबूरी थी कि मैं वहां से जा भी नही सकता था।

गौरव की शक्ल देखकर लग रहा था कि उसे गला घोंटकर मारा गया था। उसके शरीर पर कहीं भी उसे कोई यातना देने के निशान नजर नही आ रहे थे।

दो दिन पहले ही मेरे सामने देविका ने बोला था कि अगर जरूरत पड़ी तो वो गौरव की जान भी ले सकती थी। कल से ही मेघना और देविका से मेरा कोई सम्पर्क नही हुआ था, और कल ही गौरव का कत्ल भी हुआ।

इस वक़्त तो गौरव के क़ातिल के रूप में मुझे देविका के अलावा कोई नजर नही आ रहा था।

लेकिन अब मैं कुछ भी इन अहमक पुलिसियो के साथ सांझा करने वाला नही था। अब इस मामले की जड़ तक मैने खुद ही पहुँचने का फैसला कर लिया था।

अभी मुझें उस लड़की की जन्म कुंडली भी निकालनी थी, जो मेरी माशूका होने का दम भर रही थी, बताओ इस नाचीज़ को किसी की इजहारे मोहब्बत का पता लगा भी तो उसके मर जाने के बाद। :dazed:

अजीब सी जिंदगी थी मेरी, जो हर महीने दो चार मुर्दों में उलझ कर रह जाती है।

तभी भगवान सिंह ने मेरे नजदीक आकर मेरी सोच को भंग किया।

"तुम्हारी नजर में इस बन्दे का क़ातिल कौन हो सकता है" भगवान सिंह इस बार किंचित गंभीर स्वर में बोला।

"किसी क़ातिल को ढूंढने और उसका पता बताने की फीस मेरी लाखों में होती है जनाब, पहले इसकी पोस्टमार्टम और फोरेंसिक रिपोर्ट आने दो, मुझे इसकी मौत का सही समय जानना है, उसके बाद ही किसी की तरफ मेरे शक की सुई घूमेगी" मैंने भगवान सिंह को गोलमोल जवाब दिया।

" रोमेश बाबू अभी पुलिस के इतने बुरे दिन नही आये की किसी क़ातिल का पता करने के लिये किसी प्राइवेट जासूस को लाखों रु की फीस देनी पड़े" भगवान सिंह ने चिड़े हुए स्वर में मेरी बात का जवाब दिया। मै उसकी बात को सुनकर मुस्करा दिया था।

"आप बेफिक्र रहिये! आपसे मैं एक रूपया फीस चार्ज नही करूँगा, और क़ातिल को ढूंढने का सेहरा भी आपके ही सिर सजेगा, लेकिन मुझे क़ातिल समझने की बजाय मेरा साथ दो इस केस में, फिर मैं आपको अपना जलवा दिखाता हूँ" मैने भगवान सिंह को शीशे में उतारा।

"सच बोल रहे हो" भगवान सिंह ने अजीब सी नजरो से मुझें घूरा।

"सोलह आने सच बोल रहा हूँ, वो देवप्रिय जैसा खडूस पना मेरे साथ करना बंद करो, और देखो फिर मैं कैसे आपकी वर्दी में और सितारे जड़वाता हूँ" मै भगवान सिंह को शीशे में उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था।

"भाई! सितारे जड़वाने की बजाय, कहीं मेरी वर्दी न उतरवा देना, देवप्रिय बता रहा था कि एक नंबर के खुरापाती आदमी हो तुम"

भगवान सिंह की इस बात पर मैं जोरो से हँसना चाह रहा था, लेकिन हँसने का वो समय और स्थान दोनों ही गलत थे।

---------अगला सीन--‐-------

हम अंधेरा घिरने के बाद ही थाने पहुंच पाए थे। मेरी और भगवान सिंह के बीच मे मांडवाली हो चुकी थी, इसलिए अब उसके व्यवहार में जमीन आसमान का अंतर आ चुका था।

"सबसे पहले उस मकतूल लड़की के घर का पता दो, जिसने डायरी में मेरी आशिकी के किस्से बयान किये हुए है" मैंने कुर्सी पर बैठते ही भगवान सिंह को बोला।

"उस लड़की के घर का पता बताना तो गलत होगा, क्यो कि उस डायरी के मुताबिक तो सवालो के घेरे में तुम भी हो, मैं कल उस लड़की के घर से उसकी हैंड राइटिंग के नमूने लेकर उस डायरी को हैंड राइटिंग एक्सपर्ट के पास उसकी ओपनियन के लिये भेजूंगा, अगर उस में डायरी की लिखाई अलग पाई गई तो मैं भी मान लूँगा की कोई तुम्हे फ़साने की कोशिश कर रहा है" भगवान सिंह ने मेरी ओर देखते हुए बोला।

भगवान सिंह कानूनी और अपनी ड्यूटी के मद्देनजर बिल्कुल सही बोल रहा था, इसलिए मुझे भी उसकी बात से एहतराम होने से कोई गुरेज नही था।

तभी एक कांस्टेबल ने अंदर आकर एक लिफाफा भगवान सिंह के सामने रखा।

"लो रोमेश बाबू तुम्हारी पिस्टल की फोररेंसिक रिपोर्ट आ गई" ये बोलकर भगवान सिंह लिफाफे से रिपोर्ट निकाल कर पढ़ने लगा।

जैसे जैसे वो रिपोर्ट पढ़ता जा रहा था। वैसे ही उसके चेहरे के भाव बदलते जा रहे थे।

"रोमेश बाबू! तुम तो बारह के भाव नप गये हो, मुझे तुम्हे अभी अरेस्ट करना पड़ेगा"

भगवान सिंह अचानक से अपनी कुर्सी से खड़ा हुआ और तेज कदमो से कमरे से बाहर की ओर चला गया, जितनी तेजी से वो बाहर गया था, उतनी ही तेजी से वो दो कॉन्स्टेबल के साथ अंदर आया था।

वे दोनो कॉन्स्टेबल मेरे कंधों पर हाथ रख कर मेरी दोनो तरफ खड़े हो गए।

"मैं अरेस्ट हूँ क्या, लेकिन किस जुर्म में ये तो बताओ" मैंने प्रतिकार स्वरूप बोला।

"उस लड़की के खून के जुर्म में तुम्हे अरेस्ट किया है, गोली तुम्हारे ही पिस्टल से चली है और पिस्टल पर उंगलियों के निशान भी तुम्हारे ही पाए गए है" भगवान सिंह ने मेरी ओर देखकर बदले हुए स्वर में कहा।
कमरे का वातावरण अचानक ही बदल गया था।
तभी भगवान सिंह ने रिपोर्ट को मेरे सामने रख दिया।

"ध्यान से पढ़ लो, फिर मत बोलना की मै कोई पक्षपात कर रहा हूँ, चाहो तो शर्मा जी को भी फोन कर सकते हो, इस स्थिति में शायद वे भी तुम्हारी कोई मदद नही कर सके।“


जारी रहेगा______✍️
Bhut hi badhiya update Bhai
Romesh babu ke to is samay charo taraf se bhut buri tarike se Lage pade hai
Dhekte hai vo is jamele se kese niklate hai
 

parkas

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बवाना की उस फैक्ट्री में पहुँचने में हमें आधा घन्टा लगा। हमसे पहले ही लोकल थाने का एक हवालदार और दो तीन सिपाही वहां पहुंचे हुए थे।

"तुम्हारे पास सूचना तो पक्की है न, कही दूसरे थाने के स्टाफ के सामने किरकिरी करवा दो" भगवान सिंह ने गाड़ी से उतरते हुए मेरी तरफ देखकर बोला।

"जनाब मेरे पास जो फोन आया, उसके बारे में आपको बताना उचित समझा, अब यहां क्या होगा, वो तो अंदर जाकर ही पता लगेगा" मैंने गाड़ी से उतरकर गाड़ी को लॉक करते हुए बोला।

"ठीक है! आओ देखते है" ये बोलकर भगवान सिंह उस हवलदार की तरफ बढ़ गया। उसने उससे कुछ पल बात की और फिर मुझे इशारा करके अंदर की ओर चल पड़ा। अंदर फैक्ट्री में तीन चार लोग काम कर रहे थे।

"इस फैक्ट्री का मालिक कौन है" भगवान सिंह ने उन लोगों से पूछा।

"जी गौरव बाबू है हमारे मालिक" एक मजदूर ने बोला।

"उन्हें बुलाओ, उनसे बोलो उनसे मिलने पुलिस आई है" भगवान सिंह ने फिर से बोला।

"मालिक तो परसो आये थे शाम के समय, उसके बाद से तो हमने उनको नही देखा साहब" उसी मज़दूर ने जवाब दिया।

"बेसमेंट में जाने का रास्ता किधर से है" इस बार मैंने अधीर स्वर में पूछा। भगवान सिंह ने अजीब सी नजरो से मुझे घूरा।

"साहब इधर से है" मजदूर ने उस बिल्डिंग के पीछे के हिस्से की ओर इशारा करते हुए बोला।

उसका इशारा पाते ही भगवान सिंह उधर की तरफ तेज कदमो से चल पड़ा। हम बाकी लोग भी अब उसके हमकदम बन चुके थे।

कुछ ही देर में हम लोग सीढिया उतरकर नीचे बेसमेंट में पहुँच चुके थे, लेकिन वहां पर एक दरवाजा लगा हुआ था, और उस पर लगा हुआ ताला हमारा मुंह चिढा रहा था।

"उन मजदूरों में से किसी को बुला कर लाओ, और इस ताले को खुलवाओ" भगवान सिंह ने अपने साथ आये हुए कॉन्स्टेबल को बोला।

कॉन्स्टेबल आदेश पाते ही दौड़कर सीढियो से पलभर में ओझल हो गया।

कोई दस मिनिट के बाद एक चौकीदार टाइप आदमी के साथ आते हुए नजर आया। उस चौकीदार ने आते ही उस ताले पर चाबी लगाई और ताला खोला।

अंदर घुप्प अंधेरा था। चौकीदार ने आगे बढ़कर लाइट जलाई। लाइट जलाते ही एक कोने में एक आदमी औंधे मुंह पड़े हुए नजर आया। हम सभी लोग लगभग दौडतें हुए उस आदमी के पास पहुंचे।

भगवान सिंह ने उस आदमी को पलट कर सीधा किया, वो आदमी अपनी पथराई हुई आंखों से छत की ओर देखते हुए पलट गया।

"यही कुमार गौरव है" मेरे मुंह से बरबस ही निकला।

"ये मर चुका है" उस तहखाने में भगवान सिंह की ये आवाज मेरे कानों में हथौड़े जैसी पड़ी थी। लेकिन भगवान सिंह लगातार मेरी ओर ही देखे जा रहा था।

भगवान सिंह की बेरुखी

"ये तो मर चुका है, फिर इसने तुम्हे फोन कैसे किया" भगवान सिंह की शक की सुई मेरी ओर घूम चुकी थी।

"लेकिन जिसने मुझें फोन किया था, उसने अपना नाम मुझे गौरव ही बताया था, यहां का पता भी बताया था" मैंने भगवान सिंह को बोला।

"लेकिन इसकी शक्ल बता रही है कि ये कम से कम 12 घँटे पहले मरा है" इस बार लोकल थाने के हवलदार ने बोला।

"बताओ रोमेश बाबू, बारह घँटे पहले मरा हुआ आदमी तुम्हे फोन कैसे कर सकता है" भगवान सिंह इस बार कुटिलता से मुस्कराया था।

"मेरे पास उस फ़ोन की कॉल रिकार्डिग है, आप उसे सुनकर फैसला कीजिये कि ये फोन किसने किया है" मैने तभी अपने फोन की कॉल रिकॉर्डिंग स्टार्ट कर दी।

वहां अब मेरी और उस आदमी की जो खुद को गौरव बता रहा था, की आवाज गूंज रही थी।

रिकॉर्डिंग खत्म होते ही मैने भगवान सिंह की तरफ देखा।

"कॉल तो किसी से भी करवाई जा सकती है" हवलदार ने अपना ज्ञान झाड़ा।

"ऐसे ही, खामख्वाह, जिस बन्दे को मैं महज दो दिन पहले से जानता हूँ, उसे मैं क्यो मारूंगा, मेरी कौन सी भैंस खोल ली, इसने दो दिनों में जो मैं इतनी जल्दी प्लानिंग करके मार भी डालूंगा" उस हवलदार की बात पर मेरा पारा चढ़ चुका था।

"देखिए रोमेश साहब! हमे हर संभावना पर गौर करना पड़ता है" इस बार मुझे भड़कता देखकर भगवान सिंह थोड़े से नम्र स्वर में बोला।

"फिर इस बात पर भी गौर कीजिए कि अगर मैने इसे मारा होता तो मैं ही पुलिस को लेकर यहां क्यो आता" मेरे स्वर में अभी झल्लाहट थी।

"आप एक जासूस है, आपकी प्लांनिग सभी से जुदा हो सकती है" भगवान सिंह फिर से किसी अड़ियल टट्टू की तरह से बोला।

"आप जानबूझकर मुझे टारगेट करना चाहते है जनाब, क्यो कि मैने आपके एक साथी को इस केस से हटवा दिया, क्यो कि वो खुद मेरे खिलाफ साजिश रच रहा था, आप मुझे अपनी पुलिस की पॉवर दिखाना चाहते है कि हाकिम लोग किसी के साथ कुछ भी सलूक कर सकते है"

मै अब सुनाने में कोई कसर नही छोड़ रहा था, क्यो कि मैने सोच लिया था की अब जो होगा देखा जाएगा, कानून के दायरे से बाहर जाकर मेरे साथ कुछ करने से पहले ये लोग सात बार सोचेगे।

"आपको गलतफहमी है रोमेश बाबू! हम तो अपनी ड्यूटी कर रहे है" भगवान सिंह ने एक बार फिर से अपने स्वर में नरमी लाते हुए बोला।

"यही ड्यूटी है आपकी, की मै कोई भी तथ्य आपके सामने रखूं, आप कूदकर इस नतीजे पर पहुँच जाओ की मैंने ही वो काम किया होगा, आप उसकी सच्चाई की तह तक जाने की कोशिश भी नही करेगे, अगर मेरे बारे में आपको इतना ही यकीन है कि मेरा ही सब किया धरा है, मैं ही अपराधी हूँ, तो मुझे अरेस्ट करके जेल में डालिये न, कोर्ट अपने आप बता देगी की मैं अपराधी हूँ या नही" मेरा गुस्सा कम होने का नाम नही ले रहा था।

"रोमेश बाबू आप बेकार में बात को लंबा खींच रहे है, पुलिस का काम होता है कि जब तक असली अपराधी न मिल जाये तब तक हर आदमी को अपने शक के दायरे में रखने का, आप तो जासूस हो, आपको तो इस बात के बारे में बताने की जरूरत ही नही है" भगवान सिंह ने मुझे समझाते हुए बोला।

"आपको भी ये ज्ञान होगा कि शक के दायरे में आये हुए लोगो के बारे में खामोशी के साथ पुलिस अपनी जांच करती है, और अगर जांच में वो दोषी पाया जाता है, तब उसे अरेस्ट करके उसे उसके कर्मो के बारे में बताया जाता है, और अगर जांच में कोई निर्दोष होता है तो, उसे इस बात का इल्म भी नही होने दिया जाता कि उसे भी अपराधी समझा जा रहा था" मेरी बात सुनकर इस बार भगवान सिंह ने भी सहमति में अपना सिर हिलाया।

"चलिये! इस बारे में थाने में बैठकर आराम से बात करेगें, मैं जरा बाकी के काम निबटालू" ये बोलकर भगवान सिंह अपने साहब माहेश्वरी जी को पूरी बात बताने लगा।

उनको रिपोर्ट करनें के बाद उसने फोरेंसिक वालो को और एम्बुलेंस को फोन किया।

मै जानता था कि इस पूरी प्रक्रिया में अभी पांच छह घँटे लगने वाले थे। लेकिन मेरी मजबूरी थी कि मैं वहां से जा भी नही सकता था।

गौरव की शक्ल देखकर लग रहा था कि उसे गला घोंटकर मारा गया था। उसके शरीर पर कहीं भी उसे कोई यातना देने के निशान नजर नही आ रहे थे।

दो दिन पहले ही मेरे सामने देविका ने बोला था कि अगर जरूरत पड़ी तो वो गौरव की जान भी ले सकती थी। कल से ही मेघना और देविका से मेरा कोई सम्पर्क नही हुआ था, और कल ही गौरव का कत्ल भी हुआ।

इस वक़्त तो गौरव के क़ातिल के रूप में मुझे देविका के अलावा कोई नजर नही आ रहा था।

लेकिन अब मैं कुछ भी इन अहमक पुलिसियो के साथ सांझा करने वाला नही था। अब इस मामले की जड़ तक मैने खुद ही पहुँचने का फैसला कर लिया था।

अभी मुझें उस लड़की की जन्म कुंडली भी निकालनी थी, जो मेरी माशूका होने का दम भर रही थी, बताओ इस नाचीज़ को किसी की इजहारे मोहब्बत का पता लगा भी तो उसके मर जाने के बाद। :dazed:

अजीब सी जिंदगी थी मेरी, जो हर महीने दो चार मुर्दों में उलझ कर रह जाती है।

तभी भगवान सिंह ने मेरे नजदीक आकर मेरी सोच को भंग किया।

"तुम्हारी नजर में इस बन्दे का क़ातिल कौन हो सकता है" भगवान सिंह इस बार किंचित गंभीर स्वर में बोला।

"किसी क़ातिल को ढूंढने और उसका पता बताने की फीस मेरी लाखों में होती है जनाब, पहले इसकी पोस्टमार्टम और फोरेंसिक रिपोर्ट आने दो, मुझे इसकी मौत का सही समय जानना है, उसके बाद ही किसी की तरफ मेरे शक की सुई घूमेगी" मैंने भगवान सिंह को गोलमोल जवाब दिया।

" रोमेश बाबू अभी पुलिस के इतने बुरे दिन नही आये की किसी क़ातिल का पता करने के लिये किसी प्राइवेट जासूस को लाखों रु की फीस देनी पड़े" भगवान सिंह ने चिड़े हुए स्वर में मेरी बात का जवाब दिया। मै उसकी बात को सुनकर मुस्करा दिया था।

"आप बेफिक्र रहिये! आपसे मैं एक रूपया फीस चार्ज नही करूँगा, और क़ातिल को ढूंढने का सेहरा भी आपके ही सिर सजेगा, लेकिन मुझे क़ातिल समझने की बजाय मेरा साथ दो इस केस में, फिर मैं आपको अपना जलवा दिखाता हूँ" मैने भगवान सिंह को शीशे में उतारा।

"सच बोल रहे हो" भगवान सिंह ने अजीब सी नजरो से मुझें घूरा।

"सोलह आने सच बोल रहा हूँ, वो देवप्रिय जैसा खडूस पना मेरे साथ करना बंद करो, और देखो फिर मैं कैसे आपकी वर्दी में और सितारे जड़वाता हूँ" मै भगवान सिंह को शीशे में उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था।

"भाई! सितारे जड़वाने की बजाय, कहीं मेरी वर्दी न उतरवा देना, देवप्रिय बता रहा था कि एक नंबर के खुरापाती आदमी हो तुम"

भगवान सिंह की इस बात पर मैं जोरो से हँसना चाह रहा था, लेकिन हँसने का वो समय और स्थान दोनों ही गलत थे।

---------अगला सीन--‐-------

हम अंधेरा घिरने के बाद ही थाने पहुंच पाए थे। मेरी और भगवान सिंह के बीच मे मांडवाली हो चुकी थी, इसलिए अब उसके व्यवहार में जमीन आसमान का अंतर आ चुका था।

"सबसे पहले उस मकतूल लड़की के घर का पता दो, जिसने डायरी में मेरी आशिकी के किस्से बयान किये हुए है" मैंने कुर्सी पर बैठते ही भगवान सिंह को बोला।

"उस लड़की के घर का पता बताना तो गलत होगा, क्यो कि उस डायरी के मुताबिक तो सवालो के घेरे में तुम भी हो, मैं कल उस लड़की के घर से उसकी हैंड राइटिंग के नमूने लेकर उस डायरी को हैंड राइटिंग एक्सपर्ट के पास उसकी ओपनियन के लिये भेजूंगा, अगर उस में डायरी की लिखाई अलग पाई गई तो मैं भी मान लूँगा की कोई तुम्हे फ़साने की कोशिश कर रहा है" भगवान सिंह ने मेरी ओर देखते हुए बोला।

भगवान सिंह कानूनी और अपनी ड्यूटी के मद्देनजर बिल्कुल सही बोल रहा था, इसलिए मुझे भी उसकी बात से एहतराम होने से कोई गुरेज नही था।

तभी एक कांस्टेबल ने अंदर आकर एक लिफाफा भगवान सिंह के सामने रखा।

"लो रोमेश बाबू तुम्हारी पिस्टल की फोररेंसिक रिपोर्ट आ गई" ये बोलकर भगवान सिंह लिफाफे से रिपोर्ट निकाल कर पढ़ने लगा।

जैसे जैसे वो रिपोर्ट पढ़ता जा रहा था। वैसे ही उसके चेहरे के भाव बदलते जा रहे थे।

"रोमेश बाबू! तुम तो बारह के भाव नप गये हो, मुझे तुम्हे अभी अरेस्ट करना पड़ेगा"

भगवान सिंह अचानक से अपनी कुर्सी से खड़ा हुआ और तेज कदमो से कमरे से बाहर की ओर चला गया, जितनी तेजी से वो बाहर गया था, उतनी ही तेजी से वो दो कॉन्स्टेबल के साथ अंदर आया था।

वे दोनो कॉन्स्टेबल मेरे कंधों पर हाथ रख कर मेरी दोनो तरफ खड़े हो गए।

"मैं अरेस्ट हूँ क्या, लेकिन किस जुर्म में ये तो बताओ" मैंने प्रतिकार स्वरूप बोला।

"उस लड़की के खून के जुर्म में तुम्हे अरेस्ट किया है, गोली तुम्हारे ही पिस्टल से चली है और पिस्टल पर उंगलियों के निशान भी तुम्हारे ही पाए गए है" भगवान सिंह ने मेरी ओर देखकर बदले हुए स्वर में कहा।
कमरे का वातावरण अचानक ही बदल गया था।
तभी भगवान सिंह ने रिपोर्ट को मेरे सामने रख दिया।

"ध्यान से पढ़ लो, फिर मत बोलना की मै कोई पक्षपात कर रहा हूँ, चाहो तो शर्मा जी को भी फोन कर सकते हो, इस स्थिति में शायद वे भी तुम्हारी कोई मदद नही कर सके।“


जारी रहेगा______✍️
Bahut hi shaandar update diya hai Raj_sharma bhai....
Nice and lovely update....
 

Shetan

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#01

बारिश: (रात 8 बजे!)

इस बार दिल्ली की सर्दियों में बारिश अपना अलग ही स्यापा कर रही थी।
कहने वाले तो कहने लगे थे कि, दिल्ली भी बारिश के मामले में अब मुम्बई बनती जा रही है।

एक तो जनवरी के पहले सप्ताह की कड़ाके की सर्दी और उस पर ये बारिश का कहर।

मैं उसी सर्दी की मार से बचने के लिए इस वक़्त अपने फ्लैट में अपने बेड पर और अपनी ही रजाई में लिपट कर अपनी सर्दी को दूर भगाने का प्रयास कर रहा था।

अब आप भी सोच रहे होंगे की ये कौन अहमक इंसान है,जो बेवजह दिल्ली के मौसम का आँखों देख़ा हाल सुना रहा है। :D

वैसे तो अभी तक आपने अपने इस सेवक को पहचान ही लिया होगा , लेकिन फिर भी मैं आपको बता दूं कि मैं “रोमेश!” दिल्ली में एक छोटा मोटा जासूसी का धंधा करता हूँ…न न मैं कोई राॅ का एजेंट नही हूँ,मैं तो एक प्राइवेट डिटेक्टिव हूँ, जो सिर्फ कत्ल के केस में ही अपनी टांग घुसाता है। :yo:

जासूसी के बाकी धंधो मसलन, शक धोखा, पीछा, तलाक जैसे सड़क छाप धंधों से मैं दूर ही रहता हूँ।

बन्दे को बचपन से ही जासूसी उपन्यास पढ़ने का शौक इस कदर था, की जिस उम्र में मुझें स्कूल की किताबें पढ़नी चाहिए थी,उस उम्र में मैं दिन रात जासूसी किस्से कहानिया पढ़ा करता था।:dazed:

इसी वजह से अपुन का मन भी सिर्फ जासूसी में ही अपना मुकाम बनाने का करने लगा था।

वैसे तो आपका ये सेवक जासूसी में दिल्ली से लेकर मेरठ आगरा ,मुम्बई और राजस्थान तक अपने झंडे गाड़ चुका था ,और आज किसी परिचय का मोहताज नही था , लेकिन मेरी एक नकचढ़ी सेक्रेटरी है,जिसका नाम रागिनी है, वो बन्दे की इस काबलियत की जरा भी कदर नही करती है,:beee: उसकी नजर में अपन आज भी घर की मुर्गी दाल बराबर है, लेकिन उसकी महिमा का बखान मैं बाद में करूँगा, इस वक़्त आपके इस जिल्ले-इलाही के फ्लैट को कोई बुरी तरह से पीट रहा था।

दरवाजा इतनी बेतरतीबी से पीटा जा रहा था कि, मानो कोई दरवाजा तोड़कर अंदर घुसना चाहता हो, मैं हड़बड़ाकर अपनी रजाई में से निकला और दराज में से अपनी पिस्टल निकालकर अपने बरमूडा में फँसाई और तेज कदमो दरवाजे की ओर बढ़ा और दरवाजे के पास जाकर ठिठक गया।

"कौन है,क्यो दरवाजा तोड़ने पर आमादा हो "मैंने बन्द दरवाजे के पीछे से ही बोला।

"दरवाजा खोलो ! मैं बहुत बड़ी मुसिबत में हूँ" ये किसी लड़की की घबराई हुई आवाज थी।

अब एक तो लड़की और ऊपर से मुसीबतजदा, और ऊपर से गुहार भी उस इंसान से लगा रही थी,जो मुसीबतजदा लड़कियों का सबसे बड़ा खैरख्वाह था,:smarty: तो अब दरवाजा खोलना तो बनता था, सो मैंने दरवाजा खोला और फोरन से पेश्तर खोला।

दरवाजा खोलते ही मुझे यू लगा मानो कोई आंधी तूफान कमरे में घुस आया हो, वो लडकी डेढ़ सौ किलोमीटर की रफ्तार से कमरे में घुसी और सीधा मेरे बेड पर बैठ गई।

मै किंककर्तव्यमूढ़ सा बस उस
लड़की की ओर देखता रहा, उस मोहतरमा में एक बार भी मुझ से अंदर आने के लिए पूछना गवांरा नही समझा था।

"दरवाजा बंद करो न, ऐसे क्या देख रहे हो, कभी कोई लडकी नही देखी क्या" उस लड़की की आवाज जैसे ही मेरे कानो में पड़ी, मैंने हड़बड़ा कर दरवाजे को बन्द कर दिया।

दरवाजा बंद करते ही मेरी नजर उस लड़की पर पहली बार पूरी नजर पड़ी थी। लड़की उची लंबे कद
की बेइंतेहा खूबसूरत थी।

उसके कटीले नैन नक्श पर उसका मक्खन में सिंदूर मिला रंग तो कयामत ही ढा रहा था।

उसे ध्यान से देखते ही मेरे दिल की घण्टिया किसी मंदिर के घड़ियाल की तरह से बजने लगी थी।:love2:

पता नही साला ये अपनी उम्र का तकाजा था या अभी तक कुंवारा रहने का नतीजा था कि,आजकल अपुन को हर लड़की खूबसूरत लगती थी। :loveeyed2:

मुझे इस तरह से कुत्ते की तरह से अपनी तरफ घूरते हुए देखकर वो लड़की अब बेचैनी से अपना पहलू बदलने लगी थी।:D

"हो गया हो तो, अब इधर भी आ जाओ" उस लड़की को शायद ऐसी कुत्ती निग़ाहों का अच्छा खासा तजुर्बा था।

होता भी क्यो नही, जो जलवा उसकी खूबसूरती का था, उसके मद्देनजर तो जिसने भी डाली होगी मेरे जैसी कुत्ति नजर ही डाली होगी।

लेकिन आपके इस सेवक ने लड़की के बोलते ही अपनी इस छिछोरी हरकत पर ब्रेक लगाई,और चहलकदमी करता हुआ उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

एक तो साला सर्दी का मौसम, ऊपर से कड़कड़ाती बरसात, और अब ये कहर बरपाती मेरे ही बेड पर बैठी हुई मोहतरमा, मेरी जगह कोई और होता तो अभी तक इस खूबसूरत बला के साथ पूरी रात की योजना अपने ख्यालों में बना चुका होता, लेकिन अपनी नजर भले ही कितनी भी कुत्ती हो, दिल शीशे की तरह से साफ है।:declare:

"कौन हो तुम, और इतनी बरसात में मेरे पास क्यो आई हो" मै अब उसकी सुंदरता के खुमार से कुछ कुछ निकलते हुए बोला।

"मेरी जान खतरे में है,मुझे कोई मारना चाहता है" उस लड़की की आवाज में फिर से घबराहट का पुट आ चुका था।

"लेकिन आपको मेरे बारे में किसने बताया कि मैं मुसीबतजदा हसीनाओं की मदद आधी रात को भी सिर के बल चल कर करता हूँ" मैं अब अपनी जासूस वाली फोम में आता जा रहा था।

"मैं आपको नही जानती, मेरे पीछे तो कुछ लोग लगे हुए थे, मैं तो उनसे बचने के लिए आपके फ्लैट का दरवाजा पीटने लगी थी" उन मोहतरमा ने जो बोला था, वो मेरे लिए अनपेक्षित था ।

ऐसे कोई जबकि सर्दियो के दिनों में आठ बजते ही आधी रात का आलम लगने लगता है, क्यो किसी अंजान के घर मे ऐसे घुसेगा और न सिर्फ घुसेगा बल्कि आकर आराम से आकर बेड पर भी बैठ जाएगा।

"आप हो कौन, और कौन लोग है जो आपकीं जान लेना चाहते है" मैंने एक स्वभाविक सवाल किया।

"मेरा नाम अनामिका है, मै यही आपके इलाके के सेक्टर ग्यारह में रहती हूँ, मैं इधर किसी काम से आई थी, लेकिन जब मैं घर वापिस जा रही थी, तो मैंने देखा कि चार लोग मेरा पीछा कर रहे थे, मैं उन्हें देख कर घबरा गई और भागने लगी, तभी आपके फ्लैट पर नजर पड़ी, आपकी लाइट भी जली हुई थी, तो आपके फ्लैट का दरवाजा पीटने लगी" अनामिका ने बोला।

"उन लोगो को आपने पहले भी कभी अपने पीछे आते हुए देखा है, या आज ही देखा था" मै अब उससे सवाल जवाब करने के मूड में आ गया था।

"उन लोगो को तो मैंने आज ही देखा था, लेकिन मुझे कई दिनों से लग रहा है कि कोई मेरा पीछा कर रहा है" अनामिका ने रहस्यमय तरीके से बोला।

"ऐसा लगने का कोई कारण भी तो होना चाहिए, क्या आपको किसी से अपनी जान का खतरा है" मैंने उसके जवाब में से ही सवाल ढूंढा।

"खतरा तो मेरी जान को बहुत है, मुझे नही पता कि मौत किस पल मेरा शिकार कर ले" अनामिका की आवाज से ही ये बोलते हुए उसका डर झलक रहा था।

"कौन लेना चाहता है तुम्हारी जान" मैंने फिर से उसी सवाल को घुमा फिरा कर पूछा।

"धीरज!पूरा नाम उसका धीरज खत्री है" अनामिका ने मुझे उस बन्दे का नाम बताया।

"आप धीरज को कैसे जानती है" मेरा ये पूछना स्वभाविक था।

"किसी समय वो मेरा बॉयफ्रेंड था, लेकिन जल्दी ही मुझे ये एहसास ही गया कि मैंने गलत आदमी से प्यार कर लिया है, उसके बाद मैंने उससे अपने रिलेशन ख़त्म कर लिये, और दूसरी जगह शादी कर ली, उसके बाद से वो बन्दा मेरी जान का दुश्मन बना हुआ है" अनामिका ने पूरी बात बताई।

"देखिए मैं एक डिटेक्टिव हूँ… मेरा पाला हर रोज ऐसे लोगो से ही पड़ता है, आप मेरा ये कार्ड रख लीजिए, और कल मेरे आफिस आकर मुझे सभी कुछ डिटेल में बताइये, हो सकता है, इसके बाद आपका बॉयफ्रेंड फिर कभी आपको परेशान न करे" मैंने उसको विश्वास दिलवाने वाले शब्दो मे बोला।

"अगर आपने सच मे मेरा उस आदमी से पीछा छुड़ा दिया तो, आपको आपके वजन के बराबर नोट से तोल दूँगी" अनामिका ने उत्साहित स्वर में बोला।

"लेकिन मैडम इतना बता दीजिए कि वो नोट दस के होंगे या दो हजार के होंगे" मैंने उसकी बात का झोल पकड़ते हुए बोला।:D

मेरी बात सुनकर वो नाजनीन न केवल मुस्कराई बल्कि खिलखिलाकर हँस भी पड़ी।

"आप बहुत हाजिर जवाब हो रोमेश साहब" अनामिका ने मेरा नाम मेरे विजिटिंग कार्ड पर पढ़ते हुए बोला।

"चलिये अब मैं आपको आपके घर छोड़ देता हूँ, वैसे भी रात अब गहरी होती जा रही है" मैंने अनामिका की तरफ देख कर बोला।

"काफी शरीफ आदमी मालूम पड़ते हो रोमेश साहब, वरना मौसम तो आशिकाना है" उस जालिम ने एकाएक ऐसी बात बोलकर मेरे दिल के तारों को झंकृत कर दिया।

"इस मौसम की वजह से ही तो बोल रहा हूँ, आपके कपडे गीले हो चुके है, घर आपका पास में ही है, मैं अपको घर छोड़ देता हूँ, ताकि आप इन गीले कपड़ो से छुटकारा पा सको" मैंने अनामिका की बात को एक नया मोड़ दिया।

"लेकिन मैं अभी घर नही जाना चाहती हूँ, मेरे पति भी आज घर पर नही है, और मुझे ऐसे हालात में डर भी बहुत लगेगा"

अनामिका अब सीधे सीधे मेरे गले पड़ रही थी। जबकि मेरी छटी इंद्री मुझे बार बार सचेत कर रही थी।

मुझे न जाने क्यो ये लडकी खुद को जो बता रही थी,वो नही लग रही थी।

लेकिन इस बार उसने जो बहाना बनाया था, उसने मुझे कुछ बोलने लायक नही छोड़ा था।

"लेकिन देवी जी, ये बन्दा यहां अकेला रहता है, कल को किसी को पता चलेगा तो आपकी बदनामी नही होगी" मैने वो बात बोली, जो आजकल के जमाने मे अपनी अहमियत खो चुकी थी।

मेरी इस बात को अनामिका की हँसी ने सही भी साबित कर दिया था।

"किस जमाने मे जी रहे हो रोमेश बाबू, आजकल किसके पास इतनी फुर्सत है कि कोई मेरी रातों का हिसाब रखें कि मैं अपनी रात कहाँ किसके साथ बिताकर आ रही हूँ.. यार अब ये फालतू की बाते बन्द करो, और अगर एक कप कॉफी पिला सकते हो तो पिला दो" अनामिका मेरे गले पड़ने में कामयाब हो चुकी थी।

मैं मरता क्या न करता के अंदाज में अपने किचन की ओर चल दिया।

कॉफी की जरूरत तो मुझे भी थी। इसलिए मैंने कॉफी के लिये कोई आना कानी नही की।

मैंने अपने बरमूडा से अपनी पिस्टस्ल को निकाल कर दराज में डाला और कॉफी बनाने के वास्ते किचन की ओर चल दिया।

मै कोई दस मिनट के बाद काफी बनाकर जब बैडरूम में पहुंचा तो अनामिका वहां नही थी।

मैंने इधर उधर नजर दौड़ाई, लेकिन वो कहीं नजर नही आई। मैंने बाथरूम की तरफ देखा, उसका दरवाजा भी बाहर से ही लॉक था।

मैने दरवाजे पर नजर डाली, दरवाजा इस वक़्त हल्का सा खुला हुआ था। मुझे तत्काल इस बात का ध्यान हो आया कि दरवाजा मैंने अनामिका के घर मे घुसते ही बन्द कर दिया था।

अब दरवाजा खुला होने का मतलब था कि चिड़िया फुर्र हो चुकी थी।

मैंने दोनो कॉफी के कप टेबल पर रखे, और अपने बेड पर धम्म से बैठ गया।

मेरी समझ मे नही आ रहा था की मेरे फ्लैट में आने का उसका मकसद क्या था, और वो जिस तरह से एकाएक गायब हुई है, उसके पीछे उसका उद्देश्य क्या था।

अचानक ही मेरे दिमाग मे एक बिजली सी कौंधी और मै अपनी जगह से उछल कर खड़ा हो गया।

मैंने तत्काल कमरे में अपनी नजर घुमाई। घर की सभी चीजें अपने स्थान पर यथावत थी।

फिर मैंने दराजो को खंगालना शुरू किया। दराज में नजर पड़ते ही मेरे होश फाख्ता हो चुके थे।

आपके इस सेवक की पिस्टल दराज से गायब थी।


जारी रहेगा________✍️
पंडितजी यह ब्योमकेश बक्सी कब जागा. हमें पता नही थी. पर स्टार्ट बहोत बढ़िया किया है. शुरू मे ही पिस्टल लापता हो गई. आगे देखते है. अनामिका कहा मिलेगी.

एक बात और कहानी दिल्ली वाले के लहेजे से लिख रहे हो तो अपन और अपुन शब्द नही होते. मुम्बइया भाषा और दिल्ली वाली भाषा का अंतर अलग होता है. सॉरी बाल की खाल निकालने के लिए.
 
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Shetan

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#02

मनहूस सुबह:-
मैं एक घँटे के अंदर ही इस वक़्त लोकल थाने में पहुंच गया था।

जिस एस आई के पास मुझे ड्यूटी अफसर ने भेजा था, उसका नाम देवप्रिय था।

मैंने अपनी आप बीती सुनाई और अपने पिस्टल का लाइसेंस भी उसके सम्मुख प्रस्ततु किया।

"आप बोल रहे हो कि ऐसे बरसात के मौसम में कोई अनजान लडकी आपके फ्लैट पर आई, आपने उसे इंसानियत के नाते पनाह दी, और वो आपके पिस्टल को चुराकर भाग गई, मतलब आपको ही सेन्धी लगा कर चली गई" देवप्रिय ने मेरी ही बताई हुई बातो को दोहराया।

"जी" मैंने इस बार संक्षिप्त सा जवाब दिया।

"क्या जी ! पुलिस को इतना चूतिया समझा है क्या, जो आप कोई भी कहानी सुनाओगे और हम उस कहानी पर विश्वास कर लेंगे" देवप्रिय अप्रिय स्वर में बोला।

मैंने आहत नजरो से उस पुलिसिये को देखा।

"आपको क्या लगता है कि मैं आपको कोई झुठी कहानी क्यो सुनाऊंगा" मैने उल्टा देवप्रिय से ही सवाल किया।

"या तो तुम उस पिस्टल से कोई कांड करके आये हो, या फिर करने की फिराक में होंगे, पिस्टल चोरी की रपट लिखवाने इसलिए आये हो कि, कल को जब तुम्हारा किया हुआ कांड हमारी नजर में आ जाये, तो आप हमारी ही लिखी हुई रपट को हमारे ही सामने अपनी बेगुनाही का सबूत बनाकर पेश कर सको"

देवप्रिय जो भी बोल रहा था, एक पुलिसिया होने के नाते उसे वही बोलना चाहिए था।

लेकिन हमेशा किसी भी बात को एक ही नजरिए से नही देखा जाना चाहिए, ऐसा मेरा निजी विचार था, और अब अपने इस विचार से देवप्रिय को अवगत करवाना जरूरी हो गया था।

"देखिए एक पुलिस वाले की हैसियत से आपका सोचना बिल्कुल जायज है, लेकिन हमेशा तस्वीर का एक ही पहलू नही देखना चाहिए, पुलिस की तो ड्यूटी होती है कि वो हर एंगल को देखे"

मैंने ये सब देवप्रिय के चेहरे पर अपनी नजरे जमाकर बोला था।

इसी वजह से मेरी बातों से जो अप्रिय भाव उसके चेहरे पर आए थे, उन्हें में ताड़ पाया था।

"तो अब आप हमें हमारी ड्यूटी भी सिखाओगे" देवप्रिय अब अपना पुलिसिया रोब झाड़ने पर उतारू हो चुका था।

"अगर जरूरत पड़ी तो सीखा भी सकता हूँ, मुझे लगता है तुमसे तो बात करना ही समय की बर्बादी है, ये बताओ माहेश्वरी साहब अपने रूम में है, या नही" मै उसकी फिजूल की पुलिसिया गिरी से परेशान होकर बोला।

"तो अब साहब लोगो का नाम लेकर भी हमे डराओगे" देवप्रिय पता नही क्यो मुझ से पंगा लेने पर उतारू था।

"मैं डरा नही रहा हूँ, मैं उनसे पूछना चाहता हूँ, की जिन लोगो को पब्लिक डीलिंग करनी नही आती, ऐसे लोगों के पास किसी फरियादी को भेजते ही क्यो हो" मै अब उसको उसकी ही स्टाइल में जवाब दे रहा था।

"मैंने आपसे क्या गलत व्यवहार किया, मैंने अपना वही शक जाहिर किया है, जो मेरी जगह खुद माहेश्वरी साहब होते तो वो भी करते" देवप्रिय ने मेरी बात का जवाब उसी अंदाज में दिया।

"तो अपने शक के चलते आप मेरे पक्ष को नही सुनोगे, या सिर्फ अपने शक की बुनियाद पर ही मुझे फाँसी पर चढ़ा दोगे"

मेरी बात सुनकर देवप्रिय को सूझा ही नही की वो जवाब क्या दे। वो चुप्पी साधकर मेरी ओर देखता रहा।

"जनाब मैं एक प्राइवेट डिटेक्टिव हूँ, और थोड़े बहुत कानूनों की जानकारी मैं भी रखता हूँ" ये बोलकर अपना विज़िटिंग कार्ड मैंने उसके सामने उसकी टेबल पर रख दिया।

उसने मेरा विजिटिंग कार्ड उठाकर गौर से पढ़ा।

"अब तो मेरे शक की बुनियाद और ज्यादा मजबूत हो गई रोमेश बाबू, आप एक प्राइवेट डिटेक्टिव है और प्राइवेट डिटेक्टिव तो पैदाइशी खुरापाती होते है, अब सच बोल ही दो की क्या खुरापात कर चुके हों, या कौन सी खुरापात करने जा रहे हो "देवप्रिय एक कुटिल मुस्कान के साथ मुझ से रूबरू हुआ।

"मैं एक कानून का पालन करने वाला बाइज्ज्ज्त शहरी हूँ, जो हर साल बाकायदा सरकार को इनकम टैक्स भी देता है, आपको ये कुर्सी हम जैसे लोगो की मदद करने के लिए दी जाती है, न कि अपने ख्याली पुलाव पकाकर किसी शरीफ शहरी को परेशान करनें के लिए दी जाती है, खैर मैं भी आप जैसे अहमक इंसान से क्यो अपना मूॅढ मार रहा हूँ, मैं अब माहेश्वरी साहब से ही सीधा मिल लेता हूँ, और हाँ आपके किसी के साथ बर्ताव करने के तौर तरीकों की शिकायत भी बाकायदा लिखित मे करूँगा" ये बोलकर मैं तेज कदमो से
उसके कमरे से निकल गया।

वो बन्दा मेरे पीछे आवाज लगाता हुआ रह गया, लेकिन मैं अब उसकी कोई बात सुनने के मूड में नही था।

कुछ ही देर बाद .....
माहेश्वरी साहब ने मेरी बात सुनते ही देवप्रिय को अपने कमरे में तलब कर लिया था।

देवप्रिय कमरे में आकर सावधान की मुद्रा में अपने साहब के सामने खड़ा हो गया था।

"ये रोमेश साहब है, कानून के बहुत बड़े मददगार है, और महकमे में काफी लोग इनका सम्मान करते है, इनकी जो भी शिकायत है, उसे दर्ज करके उसकी एक कॉपी इनको दो" माहेश्वरी साहब ने सीधे सपाट लहजें में देवप्रिय को बोला।

"जी जनाब! मैं इनकी शिकायत दर्ज ही कर रहा था, लेकिन शिकायत ऐसी है कि उसके मद्दनेजर मेरा इनसे पूछताछ करना जरूरी हो गया था" देवप्रिय ने मरे हुए स्वर में कहा।

"जब इनकी खोई हुई पिस्टल से हुई कोई वारदात हमारे सामने आ जाये, तब आप अच्छे से अपने सामने बैठाकर इनसे पूछताछ कर लेना, उस समय मैं भी आपके साथ इनसे ढेर सारे सवाल करूँगा, लेकिन अभी सूत न कपास और जुलाहे से लठ्ठमलठ्ठा होने की क्या जरूरत है" माहेश्वरी साहब ने अपनी देशी भाषा मे देवप्रिय को समझाया।

"जी जनाब!मैं इनकी शिकायत दर्ज कर लेता हूँ" ये बोलकर देवप्रिय ने मुझे अपने साथ आने का इशारा किया।

मैं माहेश्वरी साहब का शुक्रिया अदा करते हुए देवप्रिय के पीछे प्रस्थान कर गया------!

थाने से कोई मुझे एक घँटे के बाद निजात मिली थी मैंने घड़ी में समय देखा, रात के ग्यारह बज चुके थे। मैं वापिस अपने फ्लैट पर लौट आया।

खुद को बिस्तर के हवाले करने के बाद भी अभी नींद आंखों से कोसो दूर थी।

एक बिना वजह की आफत मेरे गले बैठे बिठाए आकर पड़ी थी। बैठें बिठाए नहीं बल्कि लेटे लिटाये पड़ी थी। जब वो आफत की पुड़िया आई थी उस वक़्त मैं खुद को बिस्तर के हवाले कर चुका था।

उस लड़की के बारे में मैं कुछ भी नही जानता था। लेकिन उसकी खोज खबर निकालना तो जरूरी था।

मैने एक बार फिर से समय देखने के लिये अपनी दीवार घड़ी पर नजर डाली। साढ़े ग्यारह बज चुके थे।

मुझे पक्का यकीन था कि रागिनी अभी सोई नही होंगी। मैंने आज की पूरी घटना रागिनी को भी बताना उचित समझा।

मैंने तुरन्त रागिनी को फ़ोन मिला दिया। रागिनी ने फ़ोन को रिसीव किया तो उसकी अलसाई आवाज से पता लगा कि मोहतरमा को मैने नींद से जगा दिया था।

"क्या हुआ! अब रात को नींद नही आने की बीमारी भी हो गई क्या, जो शहर की सुंदर सुंदर लड़कियों को फोन करने लगे" रागिनी ने उठते ही तंज मारा।

"मेरी कॉलर लिस्ट में नाम भूतनी लिखा हुआ आ रहा हैं, सुंदर लड़कियो के नंबर तो मैं विश्व सुन्दरी के नाम सेव करता हूँ" मैंने रागिनी के नहले पर अपना दहला मारा।

"इस भूतनी से बच कर रहना, ये कभी कभी जिंदा इंसानों को भी हजम कर जाती है" रागिनी ने तपी हुई आवाज से बोला।

"चल अब मुझे हजम करने के सपने बाद में देखना और वो सुन जिसके लिये तुम्हे फोन किया है" मै अब बकलोली बन्द करके मतलब की बात पर आया।

"क्या हुआ" रागिनी भी अब किंचित गंभीर स्वर में बोली।

मैं रागिनी को आज जो भी मेरे साथ घटना घटी, बताता चला गया। पूरी बात सुनने के बाद भी रागिनी कुछ देर खामोश ही रही।

"गुरु या तो अब शादी करके अपने गले में घँटी बांध लो, नही तो इस शहर की लड़कियां तुम्हे फांसी के फंदे पर जरूर लटकवा देगी" रागिनी ने नसीहत भरे स्वर में बोला।

"लेकिन मैं तो एक लड़की की मदद ही कर रहा था, सबसे बड़ी बात वो खुद चलकर मेरे घर तक आई थी, मैं उसे बुलाकर नही लाया था, और जिस बदहवासी की हालत में थी, मेरी जगह कोई भी होता वो उसकी मदद करता" मैंने रागिनी के सामने अपनी सफाई दी।

"अब वो कर गई न तुम्हारी मदद ! अब ये नही पता कि वो मैडम कोई चोरनी थी, जो कुछ चुराने के इरादे से घर मे घुसी थी, और जब उसे कुछ नही मिला तो, भागतें चोर की लंगोटी सही, इसलिए वो तुम्हारी पिस्टल ले गई" रागिनी ने अपनी सोच बताई।

"तुम बहुत सतही तरीके से सोच रही हो रागिनी, ये भी तो हो सकता है, की कोई लड़कियों के बारे में मेरी कमजोरी को जानता हो, और उसी का फायदा उठाकर उस लड़की को मेरे घर भेजा गया हो, अब वो किस इरादे से आई थी, ये तो तभी पता लगेगा, जब कभी हम उसे पकड़ पायेगे" मैंने रागिनी को बोला।

"मैं आपकी बात समझ गई गुरुदेव, ये बन्दी कल सुबह 9 बजे आपके घर पर उपस्थित हो जाएगी, उसके बाद देखते है क्या होता है" रागिनी ने मेरी बात का मतलब समझते हुए बोला।

"ठीक है मेरी प्राण प्रिये विश्व सुंदरी, मुझे अपने गरीब खाने में आपके आगमन का इंतजार रहेगा" मैंने उसकी शान में चिरौरी भरे शब्दो का प्रयोग किया।😎

"क्यो अब आपकी लिस्ट में इस भूतनी का नाम विश्व सुंदरी दिखाई देने लगा है" उधर से रागिनी का खिलखिलाता स्वर सुनाई पड़ा।

"अब रात को अगर भूतनी का ख्याल करके सोऊंगा, तो पूरी रात सपनो में कोई भूतनी ही डेरा डालकर रहेगी, इसलिए विश्वसुन्दरी को याद किया है, ताकि सपनो में ऐश्वर्य राय आये, कैटरीना कैफ आये" मैंने हँसते हुए रागिनी को बोला।

"क्यो दिल्ली की लड़कियों ने अब घास डालना बन्द कर दिया है क्या, जो आजकल फिल्मी हसीनाओं के सपने देखने लगे हो" रागिनी ने मेरा पानी उतारने में पलभर की भी देरी नही की थी।

"सो जा भूतनी ! नही तो सुबह आने में ग्यारह बजाएगी" जब मुझे उसकी बात का कोई जवाब नही सूझा तो मैंने ये बोलकर फोन काटना ही सही समझा।

मुझे पता था कि बातो में मैं रागिनी से नही जीत सकता था। एक वही थी, जिसके सामने अपन की गिनती न तीन में थी न तेरह में। :dazed:

एक बार फिर से मुझे उस कमजर्फ हसीना का ख्याल हो आया था, जो बारिश में भीगी हुई मेरे घर मे घुस गई थी, और मुझे दो लाख की पिस्टल का चूना लगा कर चली गई थी।

मैं उसके बारे में ही सोचता हुआ नींद की आगोश में चला गया था।

जारी रहेगा______✍️
बहोत ही मनोरज़क अपडेट.
 

DEVIL MAXIMUM

"सर्वेभ्यः सर्वभावेभ्यः सर्वात्मना नमः।"
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#13

सौम्या बंसल के संपर्क में मैं तब आया था, जब मैं अशोक बंसल हत्या कांड की जांच कर रहा था।

अशोक बंसल दिल्ली शहर की एक नामचीन और अरबपति हस्ती थे। उन्होंने अपने जीवन मे एकमात्र गलती की थी कि अपनी पचपन साल की उम्र में अपनी से आधी उम्र की अपनी सेक्रेटरी के रुपजाल में फंस गए, और उससे शादी कर बैठे, ये उनके जीवन की ऐसी गलती थी, जिसने सिर्फ छह महीने में ही अशोक बंसल के प्राण लील लिए थे।

अशोक बंसल की लाश उन्ही के ड्राइंगरूम में मिली थी, उनकी काफी निर्मम तरीके से हत्या की गई थी। उन्ही अशोक बंसल के एक मात्र सुपुत्र राजीव बंसल उस हत्या कांड में मुख्य अभियुक्त साबित हुए थे, और उसी राजीव बंसल की पत्नी थी सौम्या बंसल।

जब मैं केस की जांच के दौरान सौम्या से मिला तो इस बेपनाह सुंदरी के जीवन मे कितना बड़ा अंधेरा था, वो सौम्या से मिलने के बाद ही पता लग सका।

सौम्या बहुत छोटी उम्र में ही अपने पापा के एक दोस्त और अपने खुद के चाचा की काम वासना का शिकार हो गई थी।

छोटी उम्र में शारीरिक संबंध बन जाने के कारण सौम्या को एक अजीबो गरीब बीमारी हो गई, जिसे हम लोग निम्फोमानियाक नाम की एक सेक्स बीमारी के नाम से जानतें है, ये ऐसी भयावह बीमारी है कि जब इंसान में सेक्स की तलब उठती है तो न वो अपना देखती है और न पराया, उसे बस अपनी कामवासना को शांत करने से मतलब होता है।

मुझे अपनी इस बीमारी के बारे में सौम्या ने खुद नही बताया था, बल्कि इस बारे में मुझें केस की जांच के दौरान ही मेघना से पता चला था। सौम्या की इसी बीमारी के चलते सौम्या का पति राजीव बंसल कई मौकों पर अपमानित हो चुका था, और सौम्या से छुटकारा पाना चाह्ता था।

अपनी सौतेली माँ सोनिया की हत्या के बाद राजीव ने सौम्या को भी मार डालने का षडयंत्र रचा था, लेकिन वो आपके इस सेवक की वजह से अपने इरादो में कामयाब नही हो सका था, और उसे मैंने रंगे हाथो सौम्या की जान लेने की कोशिश करते हुए पकड़ लिया था।

राजीव ने ये साजिश सौम्या को रास्ते से हटाकर मेघना के साथ शादी करने के इरादे से रची थी।

यही वजह थी कि रागिनी ने इस पॉइंट को इंगित किया था कि अरमान सिर्फ राजीव के ही अधूरे नही रहे थे, बल्कि अरमान मेघना के भी पूरे नही हुए थे।

बाद में मेघना ने भी सौम्या को मार डालने की साजिश रची थी, लेकिन इस बार भी मैने ही सौम्या को एक बार फिर से मेघना की साजिश से बचाया और मेघना को जेल भिजवाया था।

लेकिन लगता है कि मेघना ने अभी तक अपनी हार नही मानी थी। वो एक बार फिर से अपने इरादो को अंजाम देने के लिये जेल से बाहर आ गई थी, वो भी देविका के साथ।

मेघना और देविका का एक साथ जमानत पाना ही ये इशारा करता था कि जाल काफी उच्चस्तर पर रचा गया है। लेकिन मेरे मन मे जो ख्याल बार बार कौंध रहा था, वो था कि जेल में बन्द राजीव बंसल की इसमे क्या भूमिका हो सकती थी।

बिना राजीव की मिली भगत के तो अकेली मेघना कुछ भी नही कर सकती थी। वो कौन था जो जेल में बन्द इन दोनों के बीच मे कूरियर का काम कर रहा था। कोई तो था। अब इस कोई को ही सबसे पहले मुझे ढूंढना था।

मुझे कुमार गौरव को भी ढूंढना था, वो यू अचानक से कहाँ गायब हो गया था।

सौम्या रागिनी के साथ ऊपर अपने कमरे में जा चुकी थी और मैं अब अपने घर की ओर रवाना हो चुका था।

मुझें जो सबसे पहला काम करना था, वो था, पिछले दो सालों में जेल में राजीव बंसल से किन लोगो ने मुलाकात की है, उसका पता लगाना उन मुलाकात करने वालो लोगो की लिस्ट में से ही कोई एक चेहरा उभर कर आ सकता था, जिसकी मुझे तलाश है।

बहरहाल फिलहाल तो मैं घर पहुंचते ही सोना चाहता था, क्यो कि पिछले दो दिनों से मेरी नींद उड़ी हुई थी।

अगले दिन मैं अभी तैयार हुआ ही था कि थाने से भगवान सिंह का काल आ गया था। उसने मुझे बड़े ही नम्र स्वर में थाने आने के लिए बोला था।

मैं उसके बुलावे पर बीस मिनट में ही उनके सामने हाजिर हो चुका था।

" रोमेश साहब! जिस लड़की की लाश हमे परसो मिली है, क्या आप उसे जानते है" भगवान सिंह ने मेरे बैठते ही अपना सवाल कर दिया था।

"जी नही! मैंने तो उस लड़की को उस दिन जिंदगी में पहली बार ही देखा था, वो भी मुर्दा" मैंने बोला।

"लेकिन उस लड़की के घर के सामान में एक डायरी मिली है, जिसमे आपके बारे में काफी कुछ लिखा गया है, उसमे उसने लिखा है कि तुम और वो लड़की पिछले तीन साल से रिलेशनशिप में थे, उसके बाद तुम अचानक ही उसकी जिंदगी से गायब हो गए, उसके फोन में आपका फोन नंबर भी आपके ही नाम से सेव किया हुआ मिला है" भगवान सिंह एक के बाद एक बम मेरे सिर पर फोड़े जा रहा था।

"मैं एक बार उस लड़की के जीवित अवस्था मे लिये गए कोई फोटोग्राफ देख सकता हूँ" मैं अब कुछ भी बोलने से पहले उस लड़की को सही से देख लेना चाहता था।

"जी बिल्कुल देख सकते है" ये बोलकर भगवान सिंह ने अपनी दराज से एक फ़ाइल निकाली।

उस फ़ाइल में रोजनामचे की कॉपी के साथ ही उस लड़की की विभिन्न कोण से खींची गई उसकी लाश की तस्वीरे लगी हुई थी, उन तस्वीरो के नीचे ही उसकी जीवित अवस्था की दो तस्वीर लगी हुई थी।

मैंने गौर से उन तस्वीरों को देखा, बहुत ध्यान करने के बाद भी मुझें ध्यान नही आ रहा था कि मैंने इस लड़की को कहां देखा है।

मैंने तस्वीर पर नजर डालकर इनकार में अपनी गर्दन को हिलाया और उस फ़ाइल पर एक ओर सरसरी नजर डालकर भगवान सिंह की तरफ बढ़ा दी।

"मैं इस लड़की से अपनी जिंदगी में कभी नही मिला, और जो उस डायरी में आप लिखा हुआ बता रहे है कि मैं अचानक इस लड़की की जिंदगी से गायब हो गया, ये तो सरासर झूठ है, क्यो कि पिछले पांच सालो से तो मैं अपने इसी रोहिणी वाले घर मे रह रहा हूँ" मैने भगवान सिंह की डायरी वाली बात का भी जवाब दिया।

"लेकिन कोई लड़की अपनी डायरी में झूठ क्यो लिखेगी" भगवान सिंह ने मेरी ओर देखते हुए बोलो।

"आपको यकीन है कि ये डायरी इसी लड़की के हाथ की लिखी हुई है, क्या आप इसकी जाँच कर चुके है" मैने भगवान सिंह से ही प्रश्न किया।

"नही! अभी तो हम सिर्फ इस मिली हुई डायरी के आधार पर आपसे पूछताछ कर रहें है" भगवान सिंह ने बोला।

"जिस लडक़ी से मैं अपनी जिंदगी में कभी मिला नही, जिस लड़की ने अपने जिंदा रहते कभी मुझे देखा नही, ऐसी लड़की के केस में हो सकता है कि ये डायरी किसी ने प्लांट कर दी हो" मैने अपनी शंका जताई।

"फिर तो मुझे पक्का यकीन है कि आपकी पिस्टल की फोरेंसिक रिपोर्ट इस लड़की के जिस्म में पाई जाने वाली गोली की फोरेंसिक रिपोर्ट एक ही मिले, आप अपने बचाव की पूरी तैयारी कर लीजिये रोमेश बाबू, क्यो कि शाम को रिपोर्ट आने तक का ही वक़्त है आपके पास" भगवान सिंह ने मुझे चेतावनी नुमा लहजें में बोला।

"अभी मुझे जाने की इजाजत है या नही, शाम की शाम को देखी जाएगी" मैने भगवान सिंह को बोला।

"जी बिल्कुल इजाजत है, लेकिन एक नेक सलाह है आपके लिए, शाम को अपने साथ एक वकील जरूर लेते आइए, आपको जरूरत पड़ सकती है" भगवान सिंह भी अब देवप्रिय वाली जुबान ही बोल रहा था।

"बेफिक्र रहिये जनाब! अपने लायक वकालत तो मैं खुद भी करना जानता हूँ" ये बोलकर मैं कुर्सी से उठा और तेज कदमो से कमरे से बाहर आ गया।

कुमार गौरव की लाश

थाने से निकलते ही मेरे मोबाइल पर एक अनजान नंबर चमकने लगा था। मैंने उस फोन को गाड़ी में बैठने से पहले ही रिसीव किया। उधर से कोई घबराई हुई आवाज में बोल रहा था।

" रोमेश भाई बोल रहे हो" आवाज बहुत ही धीमी थी।

" रोमेश ही बोल रहा हूँ, तुम कौन हो" मैने उस आवाज को पहचानने की कोशिश की।

" रोमेश! मैं गौरव बोल रहा हूँ" उधर से बोलने वाला गौरव था।

"कहाँ गायब हो भाई, यहां तुम्हारी मम्मी तुम्हे ढूंढ ढूंढ कर परेशान है" मैंने उस बोला।

"मेरे पास ज्यादा लंबी बात करने का समय नही है रोमेश, इन लोगो ने मुझे मेरी ही फैक्ट्री के बेसमेंट में कैद कर रखा है, मुझे बचा लो रोमेश" उधर से गौरव बहुत ही धीमी आवाज में बोल रहा था।

"अपनी फैक्ट्री का पता बताओ, मैं वहां अभी पहुँचता हूँ" मैंने उसे दिलासा दिया। उसने मुझें अपना पता बताया।

"किन लोगों ने तुम्हे अपना कैदी बना कर रखा हुआ है, बताओ मुझे, मैं उन्हें भी पकड़वाने का इंतजाम करता हूँ" मैने गौरव से पूछा।

लेकिन तभी उधर से कोई चीज़ मुझें फर्श पर गिरने की आवाज आई और फिर उसके बाद फोन कट गया।

मैंने तुरन्त फोन को फिर से मिलाया, लेकिन इस बार फोन नेटवर्क एरिया से बाहर बता रहा था। मैं एक पल को वही रुका का रुका रह गया।

इस वक़्त मुझें ये समझ नही आ रहा था कि मैं वहां अकेला जाऊं या पुलिस को अपने साथ लेकर जाऊं। मैने किसी नए झेमेले में फंसने से बचने के लिये पुलिस को ही अपने साथ ले जाना उचित समझा।

मैं वही से उल्टे पाँव भगवान सिंह के कमरे की ओर मुड़ गया। मुझें अपने कमरे के दरवाजे पर देखते ही भगवान सिंह के होठो पर मुस्कान आ गई।

"काफी बेचैन लग रहे हों, इतनी जल्दी लौट आये जासूस साहब, रिपोर्ट आने से पहले तो मैं आपको छुउंगा भी नही" भगवान सिंह मेरी बात सुनने की बजाए सिर्फ अपनी अपनी कहे जा रहा था।

"आप पहले मेरी बात सुनेंगे" मैंने थोड़े तीखे स्वर में बोला तो वो बुरा सा मुंह बनाकर मेरी ओर देखने लगा।

"बोलो क्या बोलना चाहते हो" भगवान सिंह मेरी और देखते हुए बोला।

"मेरे फोन पर अभी एक अज्ञात नंबर से फोन आया है, वो खुद को गौरव बता रहा है, वो बोल रहा है कि उसे उसकी ही फैक्ट्री के बेसमेंट में किसी ने बंधक बनाकर रखा हुआ है" मैने ये बोलकर अपने फोन की कॉल लिस्ट में वो नंबर और काल डिटेल दिखाई।

"ये कैसे मान ले की वो गौरव ही था" भगवान सिंह ने एक बेमतलब सा सवाल पूछा।

"ये तो अब उसकी फैक्ट्री में ही जाकर पता चलेगा" मैने सीधी बात बोली।

"कहाँ है उसकी फैक्ट्री" भगवान सिंह ने लगता है अभी तक गौरव सिंह की गुमशुदगी की रिपोर्ट पढ़ी तक नही थी।

"उसकी फैक्ट्री बवाना में है, पता है मेरे पास" मैने भगवान सिंह को बोला।

"वो इलाक़ा दूसरे थाने के अंतर्गत आता है, मुझे वहां के थाने को भी सूचित करना होगा और वही से सिपाही बुलाने होंगे, तुम यही रुको, मैं साहब से इजाजत लेकर आता हूँ" ये बोलकर भगवान सिंह तेज कदमो से कमरे से बाहर निकल गया।

उसके बाहर जाते ही मैने रागिनी को फोन मिलाकर उसे सारी स्थिति के बारे में बताया।

तभी भगवान सिंह मुझे उतनी ही तेजी से वापिस आता हुआ नजर आया। मैने तुरंत फोन काट दिया।

"चलो मैने अपनी रवानगी दर्ज कर दी है" ये बोलकर भगवान सिंह वापिस मुड़ा और मैं भी उतनी ही तेजी के साथ उसके पीछे लपका। तभी उसके साथ एक कांस्टेबल और चलने लगा।

भगवान सिंह अपनी मोटरसाइकिल की तरफ बढ़ने लगा तो मैने उन्हें अपनी ही गाड़ी में चलने के लिये बोला।

जिसे भगवान सिंह ने थोड़ी सी हिचकिचाहट के बाद वे दोनों मेरी गाड़ी में सवार हो गए।


जारी रहेगा_____✍️
Saumya ki aapbiti batai de Romesh ne yaha tak samj aaya lekin ab ek bat samj nahi aaye
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Avhanak se Gaurav ka call wo bhi Romesh ko ?
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Bhagwan sing itna HICHKICHA Q rha hai Romesh ke sath Jane se uski Gadi me
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CHKKAR kya hai ye aakhir
UPDATE to din prati Din or jyada Suspense hota Jaa rha hai bhai
Badhiya
 
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