तीन
मई की चिलचिलाती दुपहर।
मैं पहाडगंज से नॉर्थ-कैंपस आया हूँ। कोई क्लास नहीं है लेकिन उस कमरे में क्या करता—जहाँ पाँच मज़दूर रहते हैं। रातभर ट्रांसपोर्ट का काम करते हैं और दिन में सोने आते हैं। मैं दिनभर कॉलेज रहता हूँ। कभी क्लासेज़ में, कभी लाइब्रेरी में, कभी कैंटीन में और कभी-कभी कॉलेज के बाहर रोड के सहारे बनी छोटी-छोटी बेंचनुमा दीवारों पर। सड़क-किनारे भटक रहा हूँ, तभी सामने ट्रैफ़िक के बीच पेन बेचती हुई माँ-बेटी को देखता हूँ।
दिमाग़ में कुछ मचलता है और फोन निकालकर किसी सोशल मीडिया हैंडल पर लिख रहा हूँ, “भटकते पाँव जब आराम माँगने लगते हैं, तो बस कहीं से ऑटो पकड़कर ‘हिं...’ (डीयू का कॉलेज) के बाहर किसी दरख़्त के नीचे लगी किनारी-पट्टी पर बैठ जाता हूँ। इस चौवालिस डिग्री-सेल्सियस की तपती धूप में भी वही एक जगह है, जहाँ आकर कुछ सुकून मिलता है।
ध्यान आता है कि बोतल का पानी ख़त्म होने को है। उठता हूँ और ख़ुद को रामजस के सामने वाले DTC बस-स्टैंड की तरफ़ बेतरतीबी से घसीटते हुए चलता हूँ। वहीं हाइवे के बीचों-बीच फटी साड़ी और टूटी चप्पलें पहने एक अम्मा खड़ी हैं, जिसके एक हाथ में दस-बीस पेन और दूसरे हाथ में उसकी आठ-नौ साल की बेटी का हाथ है।
बेटी की हालत धूप की वजह सें बीमारों से बदतर नजर आती है, लेकिन अम्मा का ध्यान सिर्फ़ रेड-लाइड पर रुकती शीशाबंद चमचमाती कारों पर है। जिनके रुकते ही दारुण स्वर में एक ही अपील, “बाबूजी! पेन ले लो।। दो दिन से कुछ नहीं खाया।” गाड़ियाँ बढ़ जाती हैं, अम्मा हट जाती है और अगली बार फिर यही सीन दोहराया जाता है।
फ़र्क़ बस अम्मा के पैरों और बेटी के चेहरे पर दिखता है। अम्मा के पैर दुगुनी तेजी से पेन बेचना चाहते हैं और बेटी का चेहरा मुरझाता चला जाता है। इन सबसे दूर मैं बस जड़वत होकर यह सब देख रहा हूँ, वह महिला इसे नोट करती है और ट्रैफ़िक से चिल्लाती है, “ओए! क्या देख रहा है। आगे जा ना।” शायद उसे लगता है कि ऐसा करके मैं उसकी हताशा, निराशा और घटती ऊर्जा का मज़ाक़ बना रहा हूँ, लेकिन वो नहीं जानती कि मैं उसमें ख़ुद के अंतर्मन की परछाई को निहार रहा हूँ।
जारी है..........