समय गुज़रता है...ना जल्दी, ना देर से, बस अपनी ही रफ़्तार से। यह जानते हुए भी लग रहा है कि पिछले तीन साल कितनी जल्दी गुज़र गए। कॉलेज का सफ़र रह-रहकर याद आ रहा है। उम्मीदों से शुरू हुआ सफ़र निराशा के बवंडर से होते हुए भावुकता तक पहुँचता है, उदास कर देता है। क्यों? पता नहीं।
ग्रेजुएट होने आए थे, होने भी वाले हैं। फिर यह मायूसी क्यों? वह भी ऐसी जो रंग-बिरंगी टिप्पणियों से ढकी सफ़ेद शर्ट पहनने से भी मिट नहीं रही है और ना ‘फेयरवेल’ के मनमोहक बुलावे देखकर। सच है भाई! समय रेत-सा नहीं फिसलता बल्कि सूरज-सा मन मोहते हुए उगता है, तपन देता हुआ चढ़ता है और फिर शांत होते-होते ऐसा डूबता है कि एक बिंदु पर व्यक्ति स्थिर होकर सोचने पर मजबूर हो ही जाता है।