malikarman
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Awesome updateChapter-5
शाम के 4 बज चुके थे। प्रमोद आए तो उन्हें नाश्ता दिया। वे रूम में बैठकर नाश्ता कर रहे थे। मम्मी जी नाश्ता करके पड़ोस वाली आंटी के यहाँ बैठी गप्पें मार रही थीं। तभी बाहर से किसी के बोलने की आवाज आई। वो प्रमोद को बुला रहा था। प्रमोद उनकी आवाज पहचान गए थे।
प्रमोद मुँह का निवाला जल्दी से अंदर करते हुए बोले- "हाँ अंकल, अंदर आइए ना, पटना से कब आए?"
इतना सुनते ही मेरी तो रूह कांप उठी। मैंने अनुमान लगा लिया कि शायद राजेंद्र अंकल आए हैं। तब तक अंकल अंदर आ गए। चूँकि मैं रूम में ही थी तो देख नहीं पाई, परंतु उनके पदचाप सुनकर मालूम पड़ गया था।
अंकल- "क्या बेटा? हर वक्त घर में ही घुसे रहते हो। मैं तो तुम्हारी शादी करके पछता रहा हूँ। मैं यहाँ आँगन तक आ गया हूँ और तुम हो कि अभी भी घर में ही हो।"
यह सुनकर हम दोनों की हँसी निकल पड़ी।
प्रमोद हँसते हुए बोले, "नहीं अंकल, अभी-अभी बाहर से आया हूँ। भूख लग गई थी तो नाश्ता कर रहा हूँ। आप बैठिए ना, मैं तुरंत आ रहा हूँ।"
अंकल- "हाँ हाँ बेटा, अब तो ऐसी ही 5 मिनट पर भूख लगेगी। चलो कोई बात नहीं, मैं बैठता हूँ।" अंकल भी हँसते हुए बोले और वहीं पड़ी कुर्सी खींचकर बैठ गए।
मेरी तो हँसी के मारे बुरी हालत हो रही थी। किसी तरह अपनी हँसी रोककर रखी थी।
अंकल कुछ देर बैठने के बाद पुनः पूछे- "साक्षी और भाभीजी (मम्मी) कहाँ गई हैं? दिखाई नहीं दे रही हैं।"
प्रमोद बोले- "अंकल, मम्मी अभी तुरंत ही आंटी के यहाँ गई हैं और साक्षी अपने कमरे में होगी, टीवी देख रही होगी।"
प्रमोद- "क्या जाएगी कम्पीटिशन की तैयारी करने! अभी से दिनभर टीवी से चिपकी रहती है।"
अंकल आश्चर्य और नाराजगी से मिश्रित आवाज में साक्षी को आवाज देकर बुलाने लगे। पर साक्षी शायद सो रही थी, जिस वजह से उसने कोई जवाब नहीं दिया।
तभी प्रमोद बोले, "रुकिए अंकल, मैं बुलवा देता हूँ," और प्रमोद हमें साक्षी को बुलाने कह दिए।
मैं तो डर और शर्म से पसीने पसीने होने लगी, पर क्या करती? मैंने साड़ी से अच्छी तरह शरीर को ढँक ली और लम्बी साँस खींचते हुए जाने के आगे बढ़ी। क्योंकि साक्षी के रूम तक जाने के लिए जिस तरफ से जाती उसी ओर अंकल बैठे थे।
मैं रूम से निकलते ही तेजी से जाने की सोच रही थी पर मेरे कदम बढ़ ही नहीं रही थी। ज्यों-ज्यों अंकल निकट आ रहे थे त्यों-त्यों मेरी जान लगभग जवाब दे रही थी। अंकल के निकट पहुँचते ही मेरी नजर खुद-ब-खुद उनकी तरफ घूम गई। चूँकि मैं घूँघट कर रखी थी जिस से उनके चेहरे नहीं देख पाई और ना ही वे देख पाए।
मैं तो सिर्फ उनके पेट तक के हिस्से को देख पाई। क्षण भर में ही मेरी नजर उनके पेट से होते हुए नीचे बढ़ गई और उनके लण्ड के उभारोँ तक जा पहुँची। मैं तो देख कर सन्न रह गई। अंकल एक सभ्य नेता की तरह कुरता-पाजामा पहने थे। लेकिन पाजामे मे उनका लण्ड लगभग पूरी तरह तनी हुई ठुमके लगा रही थी, जिसका उभार एकदम साफ-साफ दिख रही थी।
मैंने तुरंत नजर सीधी की और तेजी से आगे बढ़ गई। लगभग दौड़ते हुए साक्षी के कमरे तक जा पहुँची। कुछ क्षण यूँ ही रुकी रही फिर गेट खटखटाई। एक दो बार खटखटाने के बाद अंदर से साक्षी बोली, "आ रही हूँ।"
मैं गेट खुलने का इंतजार कर रही थी कि फिर से मेरी नजर नीचे बैठे अंकल की तरफ घूम गई। ओह गोड! ये क्या। अंकल अभी भी मेरी तरफ देख रहे थे और अब तो उनका एक हाथ लण्ड पर था। मैं जल्दी से नजर घुमा ली, कि तभी गेट खुली। मैं सट से अंदर घुस गई और बेड पर धम्म से बैठ के हांफने लगी।
साक्षी मेरी तरफ हैरानी से देख रही थी। उसकी आँखों में सवाल थे कि आखिर हुआ क्या है।
"क्या हुआ भाभी?" उसने जल्दी से मेरे पास आकर पूछा। उसकी आवाज में चिंता और उत्सुकता थी। मैंने गहरी साँस लेते हुए, अपने दिल की धड़कनों को काबू में किया और एक ही सुर में सारी बातें कह डालीं। साक्षी ने मेरी बातें सुनीं और तुरंत जोर से हँस पड़ी। मैं भी उसकी हँसी देखकर हल्के से मुस्कुरा दी।
तभी नीचे से अंकल की आवाज सुनाई दी, "साक्षी बेटा, जल्दी नीचे आओ, मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ।"
साक्षी ने लगभग चिल्लाते हुए जवाब दिया, "अंकल!, बस एक मिनट में आ रही हूँ।"
वह फिर मेरी तरफ मुड़ी और बोली, "चलो भाभी, अंकल से मिलते हैं।"
"नहीं-नहीं मैं यहीं रुकती हूँ, तुम जाओ", मैंने हड़बड़ाते हुए कहा।
"चलती हो या मैं यहीं अंकल को बुला लाऊँ?" उसने मजाकिया लेकिन धमकी भरे अंदाज में कहा।
उसकी बात सुनकर मैं घबरा गई और तुरंत हामी भर दी। मैं और साक्षी नीचे उतरे। साक्षी अंकल के पास जाकर बैठ गई, लेकिन मैं तो बिना रुके सीधे कमरे में चली गई। पीछे से साक्षी और अंकल की हँसी की आवाज आ रही थी। उनकी हँसी सुनकर मेरी भी हल्की मुस्कान आ गई।
प्रमोद तब तक नाश्ता खत्म कर चुके थे। बाहर जाने की तैयारी में वे हाथ-मुँह पोछ रहे थे। वह हमारी ओर देखकर मुस्कुराए, मानो बात का अंदाजा हो गया हो, और फिर निकल गए।
बाहर जाकर उन्होंने अंकल से कुछ कहा और जरूरी काम बताकर घर से चले गए।
अब अंकल और साक्षी पूरी तरह फ्री थे। दोनों आपस में बातें करने लगे। मैं उनकी बातें सुनने के लिए उत्सुक थी, लेकिन उनकी आवाज इतनी धीमी थी कि कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। मेरी बेचैनी बढ़ रही थी, लेकिन मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी।
कुछ समय, लगभग 10-15 मिनट के बाद, साक्षी मेरे कमरे में आई और बोली, "भाभी, बाहर चलो अंकल बुला रहे हैं।"
उसकी बात सुनते ही मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा, "किसलिए?" मैंने डर और हिचकिचाहट के साथ पूछा।
मेरी हालत देखकर साक्षी हँस पड़ी फिर बोली "चलो तो, मुझे थोड़े ही पता है किसलिए बुला रहे हैं। उन्होंने बुलाने को कहा, तो मैं आ गई।"
मैंने जिद की, "नहीं, पहले बताओ क्यों बुला रहे हैं, तभी जाऊँगी।"
साक्षी झुंझला गई, "तुम बेकार ही परेशान हो रही हो। कल वाली बात अंकल को नहीं पता। कोई और काम है, इसलिए बुला रहे हैं।"
कुछ देर तक मैं सोचती रही कि क्या करूँ। अंदर ही अंदर डर लग रहा था कि शायद कल की बात अंकल को पता चल गई हो। लेकिन साक्षी लगातार "प्लीज, प्लीज" करती रही। आखिरकार मैंने हार मान ली और चलने के लिए तैयार हो गई।
मैंने घूँघट सही किया और साक्षी के पीछे-पीछे चल पड़ी। पूरे रास्ते डर और अनिश्चितता से मेरा दिल धड़क रहा था। आखिरकार, हम अंकल के पास पहुँचे। मैंने उनके पैर छूकर प्रणाम किया और साक्षी के पीछे खड़ी हो गई। हम दोनों अंकल के दाएँ तरफ खड़ी थीं।
मेरा दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि मैं अपनी साँसों को भी सुन पा रही थी। तभी साक्षी ने सामने रखी कुर्सी पर बैठने का साहस दिखाया। अंकल के बाएँ और साक्षी के दाएँ तरफ एक और कुर्सी रखी थी, जो शायद पहले से मँगवाई गई थी। अब मुझे समझ आ गया था कि मुझे बीच में बैठाने की योजना थी। मैं अकेली खड़ी रही। शर्म और घबराहट से मेरा चेहरा तपने लगा।
तभी अंकल ने मजाकिया लहजे में कहा, "साक्षी, मैं तो अपनी बेटी से मिलने आया था, और तुम किसे ले आई हो?" साक्षी उनकी बात सुनकर हँस पड़ी लेकिन उसने कुछ जवाब नहीं दिया।
फिर अंकल ने कहा- "भारती बेटा, बुरा मत मानना, मैं तो मजाक कर रहा था। आओ, पहले बैठो, फिर बात करते हैं।"
यह कहते हुए अंकल अपनी जगह से उठे और मेरी बाजू पकड़कर मुझे कुर्सी तक ले गए।
मैं हक्की-बक्की रह गई। उनकी छुअन से मेरी रूह काँप गई। मैं चुपचाप कुर्सी पर बैठ गई।
अंकल ने कहा- "देखो बेटा, हम लोग एक ही घर के हैं। यहाँ पर्दा करने की जरूरत नहीं। पर्दा करना हो, तो दुनिया वालों के लिए करना। जैसे साक्षी मेरी लाडली बेटी है, वैसे ही तुम भी हो। अगर कभी मेरी जरूरत पड़े, तो बेहिचक कहना।"
उनकी बातों से मुझे थोड़ी राहत महसूस हुई। लेकिन अभी भी शर्म मुझे जकड़े हुए थी।
अंकल बोले, "अरे, मैं इतना कुछ बोल रहा हूँ, और तुम अब तक घूँघट किए बैठी हो, औरों के लिए बहू हो सकती हो, लेकिन हमारे लिए तो बेटी ही हो।"
इतना सुनकर साक्षी मेरी ओर आई और घूँघट हटाते हुए बोली, "क्या भाभी, अब तो शर्म छोड़ दो।" साक्षी फिर अपनी जगह पर जाकर बैठ गई।
मेरा चेहरा पसीने से तर-बतर हो गया था। अंकल ने अपनी जेब से रूमाल निकालकर मुझे दिया। "देखो, घूँघट रखने से कितना नुकसान होता है। इतनी खूबसूरत चेहरा पसीने से भीग गया। लो, इसे साफ कर लो।" उनकी बात पर मैं और ज्यादा शर्मिंदा हो गई। मैंने उनकी बात मानकर रूमाल लिया और चेहरा पोंछ लिया।
"गुड बेटा, अब थोड़ी हमारी बेटी जैसी लग रही हो," उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। उधर, साक्षी हमारी बातें सुनकर बस मुस्कुरा रही थी।
तभी मम्मीजी की आवाज आई, "क्या बातें हो रही हैं, देवर जी?" सबने पलटकर उनकी ओर देखा। मैं खड़ी हो गई।
अंकल ने कहा- "अरे, बेटी, तुम बैठो। साक्षी, कुर्सी ला दो।" मम्मीजी के बैठने के बाद सबने बातचीत शुरू की।
"भाभीजी, बहू आ गई तो आप गायब ही रहती हैं। अब तो बच्चों के साथ ही गप्पे लड़ाना पड़ेगा।" अंकल मम्मी को ताना देते हुए बोले।
तब तक साक्षी कुर्सी ला दी। मम्मी के बैठने के बाद मैं और साक्षी भी बैठ गई। मम्मी जी के साथ साथ हम सब भी अंकल की बातें सुन हँस पड़ी।
"भाभीजी, मैं अपनी बेटी को फुर्सत के अभाव में मुँह देखाई नहीं दे पाया। बस इसी कारण आते ही यहाँ आया हूँ, वर्ना आप तो ताने देते देते मेरी जान ले लेते।" अंकल मुस्कुरा कर अपनी सफाई देते हुए बोले।
अब मुझे पूरी तरह समझ में आ चुका था कि अंकल ने मुझे क्यों बुलाया था। माहौल अब हल्का और सहज हो चुका था।
मम्मी जी भी हँसते हुए बोलीं, "ही ही ही... आप अपनी बेटी को नहीं देंगे, ऐसा कभी हो सकता है क्या? अगर ऐसा सोचते भी, तो सच में आपकी जान ले लेती।" उनकी बात पर सब हँस पड़े।
सच कहूँ तो, मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि मेरे ससुराल में इतना अच्छा परिवार मिलेगा। मेरे ससुर जी और अंकल, दोनों ही भाई थे, लेकिन उनके चचेरे भाइयों में इतना प्यार और लगाव पहली बार देखने को मिला।
थोड़ी देर बाद, अंकल बाहर गए। वापस लौटे तो उनके हाथ में एक बड़ा-सा पैकेट था, जो शायद गेस्ट रूम में रखा हुआ था। उन्होंने पैकेट मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, "लो बेटा, मेरी तरफ से एक छोटी-सी भेंट। अगर पसंद न आए, तो बेझिझक बता देना, क्योंकि मैंने अपनी पसंद से लिया है।"
उनकी बात सुनकर मैं हल्का सा मुस्कुराई और शर्माते हुए पैकेट ले लिया। मैंने साक्षी की ओर देखा तो वह मुझे देखकर अब भी मुस्कुरा रही थी। उसकी मुस्कान से मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे वह सब कुछ पहले से जानती हो। मैंने नजरें चुराते हुए उसे इशारा किया कि अब चलें। साक्षी मेरी बात समझ गई।
वह खड़ी होते हुए बोली, "अंकल, आपलोग बात कीजिए, मैं चाय लाती हूँ। चलो भाभी..." उसके इतना कहते ही मैं जल्दी से खड़ी हुई और सीधे कमरे की ओर चल दी। साक्षी भी हँसते हुए मेरे पीछे आई।
जैसे ही हम कमरे में पहुँचे, साक्षी ने पीछे से मुझे गले लगा लिया और चहकते हुए बोली, "भाभी, प्लीज अभी पैकेट मत खोलना, जब मैं आ जाऊँ, तब खोलना। मैं भी देखूँगी, सो इसमें क्या है।"
उसकी बात सुनकर मेरी हँसी छूट गई। हँसते हुए मैंने कहा, "अच्छा ठीक है।"
साक्षी ने मेरे गालों पर एक हल्की-सी किस की और कमरे से बाहर चली गई। मैंने पैकेट को एक तरफ रखा और उसके लौटने तक इंतजार करने लगी। इस पूरे समय मेरे दिल में उत्सुकता थी कि आखिर इस पैकेट में ऐसा क्या हो सकता है।
पैकेट में क्या हो सकती है, यह सोचकर मैं खुद परेशान थी। पर मम्मी जी के सामने दिए थे तो कुछ राहत जरूर मिली कि कोई ऐसी-वैसी चीजें तो नहीं ही होगी। फिर भी मेरे अंदर एक अलग ही उत्सुकता थी जल्द से जल्द देखने की। पर ये साक्षी पता नहीं कहाँ मर गई थी। चाय बनाने गई या चूत मरवाने जो इतनी देर लगा रही है। किसी तरह मैं अपने मन को शांत कर रही थी।
तभी साक्षी धड़धड़ाती हुई अंदर आई और आते ही बोली, "भाभी अब जल्दी से खोल के दिखाओ।"
उसकी बातों पर मुझे थोड़ी शरारत सूझी.. होंठों पर कुटील मुस्कान लाते हुए पूछा, "क्या खोल के दिखाऊँ?
सुनते ही साक्षी आँख दिखाते हुए बोली, "कमीनी, अभी तो पैकेट खोलो और कुछ खोलने की इच्छा है तो अंकल को बुलाती हूँ, फिर खोलना।" कहते हुए साक्षी जाने के लिए मुड़ी कि मैं जल्दी से उसे पकड़ी।
"साक्षी की बच्ची, मार खाएगी अब तू। मैं तो यूँ ही मजाक कर रही थी और तुम तो सच मान गई, चल पैकेट खोलती हूँ।", उसे अपनी बाँहों में कसते हुए बोली।
साक्षी मेरी बातें सुन मुस्कुरा दी और वापस आने के लिए मुड़ गई। फिर हम दोनों बेड पर बैठ, बीच में पैकेट रख कर और उसकी सील हटाने लगी। सील हटते ही अंदर दो पैकेट थीं, साक्षी उसमें रखी एक पैकेट उठा ली, दूसरी पैकेट मैं उठा के, खाली पैकेट को साइड में कर दी।
"भाभी, पहले ये वाली खोलो।" साक्षी अपना पैकेट मुझे पकड़ाते हुए बोली।
मैं भी हंसती हुई पैकेट लेकर उसे खोलने लगी। मैं जानती थी अगर साक्षी को खोलने कहती तो वो कभी हाँ नहीं कहेगी। अब तक तो उसकी काफी चीजें मैं जान गई थी। ऐसी लड़की कभी घमंडी या खुदगर्ज नहीं होती। तभी तो मुझे साक्षी इतनी अच्छी लगने लगी थी।
पैकेट खुलते ही लाल रंग के कपड़े नजर आए। साक्षी जल्दी से उठा के देखने के लिए बेड पर रख खोलने लगी। पूरी तरह से खुलते ही हम दोनों की मुख से "Wowwwww!" निकल पड़ी।
यह बहुत ही खूबसूरत नेट वाली रेशम की लहंगा साड़ी थी। Red और Maroon कलर की थी, जिस पर तिरछी डाली की तरह गोल्ड कलर की डिजाइन बनी हुई थी। जिसके ऊपर stones से काम किया हुआ था, जो कि एक बिगुल की तरह लग रही थी। बॉर्डर पर काफी सुंदर Lace से काम किया हुआ था। कढ़ाई भी बहुत अच्छे से की हुई थी। ठीक से देखने पर भी कोई त्रुटि नहीं मिलती। मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं, इतने महँगे साड़ी को देख कर।
तभी साक्षी के हाथों में ब्लाउज देखा, जो कि देख के मंद-मंद मुस्कान दे रही थी। मैंने देखा तो एक बारगी शर्मा गई। ब्लाउज ऑफ-सोल्डर डिजाइन का था, जिस पर नाम मात्र की हल्की वर्क की हुई थी। बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। मैं तो ये सोचने लगी कि ऐसी ब्लाउज मैं गाँव में कैसे पहन सकती हूँ। मैं तो सोच के ही शर्मा गई।
तभी साक्षी हंसती हुई बोली "भाभी, इस ड्रेस में पूरी कयामत लगेगी। जो भी देखेगा, देखता ही रह जाएगा।"
"भाभी, जल्दी से एक बार पहन के दिखाओ ना। सच कहती हूँ, काफी सुंदर लगोगी।"
"नहीं, नहीं मुझे नहीं पहननी।"
"प्लीज भाभी, सिर्फ एक बार, फिर जल्दी से खोल देना," साक्षी गिड़गिड़ाते हुए मनाने लगी। साक्षी की इस प्यारी अदा को देख कर मुझे तो काफी हँसी आ रही थी।
फिर मैं हामी भरते हुए बोली, "अच्छा ठीक है, पर अभी दूसरी पैकेट बाकी है देखने के लिए। उसे भी देख लेते है, फिर पहन के दिखा दूँगी।"
"Thanks, भाभी", साक्षी कहते हुए जल्दी से साड़ी समेटने लगी। मैं भी साथ-साथ समेट कर उसी पैकेट में रख दी।
फिर दूसरी पैकेट खोलने के लिए बैठ गई। पहली पैकेट में तो इतनी अच्छी साड़ी मिली जो कि Latest डिजाइन और बहुत ही खूबसूरत के साथ-साथ काफी महँगी भी थी। अब इस पैकेट में कितनी अच्छी और कितनी महँगी होगी, मैं कितनी भी अनुमान लगाती तो वो विफल ही होती।
साक्षी और मैं दोनों काफी उत्सुक थे देखने के लिए। पैकेट खुलते ही मेरी तो आँखें चौंधिया गईं। साक्षी भी "Wowwww भाभी!" कहती हुई एक टक देख रही थी।
पैकेट चमचमाती गहने से भरी हुई थीं। साक्षी एक-एक कर गहने निकालने लगी। मैं तो सिर्फ निहारे ही जा रही थी। सारे गहने एक दम नई डिजाइन के थे। नेकलेस सेट तो देखने लायक था। गोल्ड मीनाकारी कलर की बहुत ही खूबसूरत हार थी, जिस पर बहुत ही फैन्सी वर्क की हुई थी। साथ में लटकी हुई छोटी-छोटी झुमकी और भी कयामत बना रही थीं। माँग टीका भी बहुत प्यारी था, जिस पर स्टोन और डायमंड जड़ी हुई थी। सोने की मध्यम सी मोटी मंगलसूत्र तो अद्भुत थी। एक पतली सी काफी सुन्दर सोने की कमरबंध, साथ ही कान के लिए 3 अलग-अलग डिजाइन की रिंग और हुप्स थीं। नाक की एक दम छोटी सी पिन, सभी उँगलियों के लिए अंगूठी, बहुत ही सुन्दर सी दो जोड़ी पायल तारीफ के काबिल थीं।
मैं तो हर एक चीज देख हैरान थी। ऐसा नहीं था कि मेरे पास ये सब नहीं थे, थे मगर इतनी सुंदर और महँगी नहीं थी।
मैं तो मंत्रमुग्ध हो एक टक देखे जा रही थी और ये सुनहले रंग की बहुत ही सुन्दर सी घड़ी देख तो मैं मचल सी गई। सच कहूँ तो मैं अब पूरी तरह से अंकल की दीवानी हो चुकी थी। कोई सगे भी इतनी महँगी गिफ्ट नहीं देता है।
मन तो कर रहा था कि अभी ये सारी गहने और कपड़े पहन के अंकल के बाँहों में जा गिरूँ। मगर इतनी जल्दी अगर कहती भी तो साक्षी जैसी लड़की कुछ और ही समझ लेती। भले ही अभी वो कुछ भी कह लेती, मगर वो तो मुझे एक चालू लड़की का नाम जरूर दे देती, जो सिर्फ दिखाने के लिए शरीफ बनती है। मन में ही अंकल के प्यार को कुछ दिनों के लिए दबा देने में ही भलाई थी।
अंत में एक चीज देख तो हम दोनों एक साथ चौंक पड़ी। फिर साक्षी हंसती हुई हाथ में उठा ली। ये एक दम नई मॉडल की लेटेस्ट स्मार्ट फोन थी। साक्षी जल्दी से फोन ऑन की; ऑन होते ही उसके चेहरे पर एक नाराजगी सी आ गई। उसने फोन मेरे हाथ में पकड़ा के बाहर निकल गई।
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