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Adultery Village Girl in City

malikarman

Nood AV not allowed
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Chapter-3
सुबह 5 बजे मेरी नींद खुली तो अपनी हालत देख खुद ही शर्मा गई। मैं पूरी तरह नंगी थी और प्रमोद के नंगे जिस्म से चिपकी हुई थी। मैं उठी, तो मेरी नजर बेडशीट पर पड़ी। बेडशीट पर खून और वीर्य के गहरे दाग थे। मैंने जल्दी से अपने कपड़े पहने और प्रमोद को नींद से जगाया। प्रमोद भी यह देखकर मुस्कुरा दिए।मैंने फौरन बेडशीट बदली और नई बेडशीट बिछा दी। तब तक प्रमोद ने भी अपने कपड़े पहन लिए और फिर से सो गए। नींद तो मुझे भी आ रही थी, लेकिन नई जगह होने के कारण देर तक सोने का मन नहीं हुआ क्योंकि पता नहीं घर के लोग क्या सोचते।कुछ देर बाद घर के सभी सदस्य जाग गए। मैंने नहा-धोकर खुद को फ्रेश किया और नाश्ता करने के बाद अपने कमरे में आ गई। सुबह 11 बजे तक प्रमोद सोते रहे। फिर वे उठे, फ्रेश हुए और अपने दोस्तों के साथ बाहर चले गए।उनके जाते ही मेरी ननद साक्षी अचानक आ धमकी। शायद सुबह प्रमोद घर पर थे, इसलिए वह नहीं आई थी। साक्षी हँसते हुए बोली, "भाभी, भैया को रात में सोने नहीं दिया क्या, जो इतनी देर तक सोते रहे?" उसकी बात सुनकर मुझे भी हँसी आ गई।साक्षी हमारे घर की लाडली थी। उसने हाल ही में 12वीं की परीक्षा दी थी और दिखने में काफी सुंदर थी। हमेशा हँसती-खिलखिलाती रहती थी। उसकी शारीरिक संरचना भी काफी आकर्षक थी।साक्षी अचानक बेड पर चढ़कर मुझे पीछे से बाँहों में भर ली और अपनी गाल मेरी गाल से सटाते हुए बोली, "भाभी, बताओ ना प्लीज, रात में क्या सब किया?"मैंने हँसते हुए जवाब दिया, "आप अपने भैया से पूछ लीजिए कि रात में क्या हुआ।""क्या भाभी...? भैया से कैसे पूछ सकती हूँ? बताओ ना प्लीज," वह जिद्द करने लगी।"नहीं पूछ सकती तो छोड़ दो। जब तुम्हारी शादी होगी, तब खुद जान जाओगी।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।साक्षी- "अरे, 1 मिनट भाभी। ये 'आप-आप' क्यों लगा रखी है? मैं अपनी भाभी से दोस्ती करने आई हूँ और आप हैं कि...?""ओके, साक्षी!""थैंक्यू, भाभी!" साक्षी ने खुश होकर कहा।फिर वह कमरे में इधर-उधर देखते हुए पूछी, "अच्छा, ये बताओ, मेरी बेडशीट कहाँ है जो कल बिछाई थी?""क्या? वो तुम्हारी बेडशीट थी?", मैंने चौंकते हुए पूछा।"हाँ, मेरी प्यारी 'भारती डार्लिंग'! जरा दिखाओ तो, क्या हालत कर दी है।" यह कहते हुए साक्षी मेरे गालों को चूम ली।"नहीं, अभी वो देखने लायक नहीं है। मैं साफ कर दूँगी, तब देखना।" मैंने जवाब दिया।"भाभी, अगर जल्दी साफ नहीं करोगी तो दाग और ज्यादा गहरे हो जाएँगे। मुझे दे दो, मैं साफ कर दूँगी, प्लीज निकालो।""ठीक है, लेकिन किसी को दिखाना मत, वरना सब हँसेंगे।" मैंने साक्षी को चेताया।"क्या, भाभी? दिखाएँगे नहीं तो लोग कैसे समझेंगे कि दुल्हन कितनी संस्कारी है।""पागल हो गई है क्या? हमें मरवाएगी! जाओ, हमें साफ नहीं करवाना।" मैंने मना करते हुए कहा।साक्षी ने जोर से हँसते हुए कहा- "ही ही ही... मजाक कर रही थी भाभी, वो सब दिखाने वाली चीज होती है क्या? अब दो, जल्दी से"।मैंने सूटकेस खोलकर बेडशीट निकाली ही थी कि साक्षी ने झपटकर उसे ले लिया और फुर्ती से पलंग पर फैला दी।बेडशीट देखकर वह चिल्ला पड़ी, "हाय! मेरी प्यारी भाभी की कितनी धुनाई हुई है पूरी रात! इस बेडशीट को देखकर तो मैं शादी के नाम से डरने लगूँगी।"उसकी बात सुन मैं शर्म से लाल हो गई और जल्दी से बेडशीट समेटने की कोशिश करने लगी। तभी साक्षी ने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए और मुझे पलंग पर धक्का देते हुए खुद मेरे ऊपर गिर पड़ी।
उसने अपना चेहरा मेरे चेहरे के पास लाते हुए कहा- "भाभी, रात में मजे ले रही थी, तब तो शर्म नहीं आई, अब क्यों शर्मा रही हो?""पागल, मरवाएगी क्या? अगर भैया को पता चला तो जानती हो क्या होगा?" मैंने उसे समझाने की कोशिश की।"कुछ नहीं होगा क्योंकि हम दोनों में से कोई भैया को कुछ बताएगा ही नहीं। वैसे भाभी, आपके होंठ काफी मस्त हैं, मन कर रहा है चिपका दूँ..."उसके कुछ और करने से पहले ही मैंने उसे धक्का देकर अपने से दूर कर दिया। साक्षी जोर से हँसने लगी और मैं भी मुस्कुरा दी।फिर साक्षी ने बेडशीट समेटी और अपने बैग में डालते हुए बोली, "भाभी, अपने दोस्त के यहाँ जा रही हूँ। वहीं इसे साफ कर दूँगी। चिंता मत करो, किसी को नहीं दिखाऊँगी। शाम तक वापस आ जाऊँगी।"
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "ठीक है, जल्दी आना, अकेले बोर हो जाऊँगी।" साक्षी ने मुझे बाय कहा और चली गई।उसके जाने के बाद दोपहर के 12 बज चुके थे। मुझे भी नींद आने लगी। मैं बेड पर पड़ी और गहरी नींद में सो गई।रात की थकावट के कारण मैं बेसुध होकर सो रही थी। अचानक, मैंने अपने होंठों पर कुछ गीला सा महसूस किया, लेकिन नींद इतनी गहरी थी कि मैं पूरी तरह जाग नहीं पाई। तभी मेरे होंठों में तेज दर्द हुआ, और मैं हड़बड़ाकर नींद से जाग गई।ओह, गॉड! एक लड़की मुझे अपनी बाँहों में जकड़े हुए मेरे होंठ चूस रही थी। मैं पूरी तरह चौंक गई और उसे पहचान नहीं पाई। किसी तरह उसे धक्का देकर अपने से अलग किया। जैसे ही वह अलग हुई, मैंने देखा कि वह साक्षी की दोस्त श्रेया थी। अलग होते ही साक्षी और श्रेया जोर-जोर से हँसने लगीं।मुझे गुस्सा भी आ रहा था, लेकिन साक्षी को देखकर मैंने खुद को शांत रखा।साक्षी ने हँसते हुए कहा- "भाभी, ये लो आपकी बेडशीट, पूरी तरह साफ हो गई है"।"ये मेरी दोस्त श्रेया है। इसके यहाँ बेडशीट साफ करवाने गई थी। काफी मेहनत करनी पड़ी हम दोनों को, तब जाकर यह दाग साफ हुआ", साक्षी ने मुस्कुराते हुए कहा।मैंने नाराज़गी भरे लहजे में पूछा- "ठीक है, बेडशीट साफ हो गई, मगर ये गंदी हरकत क्यों की तुम दोनों ने?" साक्षी पलंग पर चढ़ते हुए शरारत से बोली, "भाभी, इतनी मेहनत से बेडशीट साफ की है, तो क्या बिना कुछ लिए छोड़ देती? श्रेया ने तो अपना हिस्सा ले लिया। अब हमें भी जल्दी से अपना हिस्सा दे दो"।मैं कुछ बोलती, उससे पहले ही श्रेया ने कहा, "भाभीजी, आप सोते हुए इतनी प्यारी लग रही थीं कि मैं बर्दाश्त नहीं कर सकी और चिपक गई। वो तो साक्षी ने ही लेने की सोची थी, मगर मैंने रोक लिया। वर्ना साक्षी आपकी और बुरी हालत कर देती!"दोनों की चुहलबाजी सुनकर मेरा गुस्सा भी शांत हो गया। "तुम दोनों पागल हो गई हो, कम से कम मुझे जगा तो देती!" मैंने हँसते हुए जवाब दिया।मेरी बात सुनते ही साक्षी झट से मेरी तरफ लपकी। मैं कुछ समझ पाती या कुछ करने की सोचती, उससे पहले ही मैं पलंग पर गिर चुकी थी। साक्षी ने मेरे दोनों हाथ जकड़ लिए और मेरे ऊपर चढ़ गई।हम तीनों हँसने लगे, खासकर साक्षी की इस हरकत पर। उसकी मस्ती और चंचलता अब मुझे भी अच्छी लगने लगी थी। इसलिए मैं भी बिना किसी विरोध के, उसकी शरारतों का हिस्सा बनकर उसके नीचे पड़ी रही।साक्षी ने शरारत करते हुए मेरी चुचियों को दबाया और फिर मेरे गालों को चूमते हुए बोली, "भारती डार्लिंग, आप मना भी करतीं, तो मैं अपना हक ले ही लेती। मगर मान गईं, ये आपकी अच्छी बात है। वरना ऐसा हाल करती, जो भैया ने भी नहीं किया होगा!""चलो, बड़ी आई हालत खराब करने वाली। तुम्हारे भैया भी पहले इसी तरह बोलते थे, लेकिन थोड़ी तकलीफ के बाद सब ठीक हो गया था।" मैंने भी ताने भरे अंदाज में जवाब दिया।हम दोनों की बातें सुनकर श्रेया भी हँसते हुए पास आ गई और बोली, "भाभीजी, अब तो आपकी खैर नहीं। साक्षी वो सब करती है, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकतीं। आपकी ऐसी हालत करेगी कि आप तड़प-तड़पकर छोड़ने की भीख माँगेंगी।"तभी बाहर से मम्मीजी की आवाज सुनाई दी। आवाज सुनते ही साक्षी झट से उठ गई, और मैंने भी फुर्ती से अपने कपड़े ठीक कर लिए।मम्मीजी कमरे में आते हुए बोलीं, "साक्षी, तुम बस बातों में ही लगी रहती हो। बहू ने सुबह ही खाया था। अब कुछ नाश्ता बना दो और श्रेया को भी खिला दो, काफी दिनों बाद आई है।""ठीक है, मम्मी", साक्षी ने जवाब दिया।इतना कहकर मम्मीजी चली गईं। शायद उन्हें कहीं जाना था।"साक्षी, अब मैं चलती हूँ। मुझे लेट हो जाएगा," श्रेया हम दोनों की ओर देखते हुए बोली।"अरे, इतनी जल्दी क्यों? नाश्ता कर लो, फिर चले जाना", मैंने श्रेया से कहा।"नहीं, भाभीजी, अगली बार आऊँगी, तो खाना जरूर खाऊँगी। आज मम्मी को कुछ काम है, इसलिए जाना जरूरी है", श्रेया ने सफाई देते हुए जवाब दिया।मैंने साक्षी की तरफ देखा, और उसने भी श्रेया की बात पर सहमति जताई। फिर साक्षी श्रेया को छोड़ने बाहर चली गई।कुछ देर बाद, साक्षी के बैग से मोबाइल के कंपन की आवाज आने लगी। मैंने सोचा कि साक्षी को बुला दूँ, इसलिए गेट की ओर लपकी। लेकिन तब तक, साक्षी और श्रेया बाहर जा चुकी थीं। मैं बाहर नहीं जा सकती थी, इसलिए खिड़की से झाँककर देखा। दोनों सड़क किनारे खड़ी होकर बातें कर रही थीं। अब वहाँ से आवाज देना भी मुश्किल था।उधर, तब तक मोबाइल की रिंग कट चुकी थी। मैंने बैग से मोबाइल निकाला और स्क्रीन पर देखा कि किसका फोन था। कोई अनजान नंबर था। तभी फोन दोबारा बजने लगा। मैंने खिड़की से देखा, तो साक्षी और श्रेया अभी भी वहीं बातें कर रही थीं।मैंने सोचा कि फोन उठा लेती हूँ और कॉलर को बता दूँ कि साक्षी कुछ देर बाद बात कर सकती है। मैंने फोन रिसीव किया और धीरे से कान पर लगाया।"क्यों, साली, फोन क्यों नहीं उठा रही थी?" फोन पर एक मर्द की आवाज सुनकर मैं सन्न रह गई।आवाज सुनने तक तो ठीक था, लेकिन उसकी भाषा ने मुझे असहज कर दिया। कुछ पल के लिए मेरा गला सूख गया। मैंने हिम्मत जुटाई और जवाब दिया, "आप कौन बोल रहे हैं और किससे बात करनी है?"उधर से आवाज आई- "तुम साक्षी ही हो, ना?" और अब तो मेरा दिमाग पूरी तरह झकझोर गया।मैंने खिड़की से देखा, लेकिन साक्षी और श्रेया अब वहाँ नहीं थीं। शायद बातें करते हुए वे आगे निकल गई थीं। मैंने खुद को शांत करने की कोशिश की। मन में कई सवाल उठने लगे, लेकिन मैंने जल्द ही स्थिति संभालने का फैसला किया।फोन को कान से लगाते हुए मैंने जवाब दिया, "हाँ, मैं साक्षी ही हूँ, लेकिन मैं आपको पहचान नहीं पा रही हूँ, आप कौन हैं?""साली नाटक मत कर वर्ना तेरे घर आकर इतना चोदूँगा कि नानी याद आ जाएगी"मैं तो इतना सुन के पानी पानी हो गई। फिर भी हिम्मत कर बोली, "सच कह रही हूँ, आपकी आवाज चेँज है सो नहीं पहचान पा रही हूँ।" मैं उसका नाम जानने की कोशिश कर रही थी।“हाँ रात में कुछ ज्यादा ही शराब पी लिया था तो आवाज थोड़ी भारी हो गई”।अब मेरी तीर निशाने पर लग रही थी। मैंने थोड़ी रिक्वेस्ट करते हुए बोली, "हाँ तभी तो नहीं पहचान रही हूँ कि कौन बोल रहे हैं”।“साली लण्ड तो अँधेरे में भी पहचान लेती है और लपक के चुसने लगती है। आवाज क्यूँ नहीं पहचान रही है” ।मैं तो ऐसी बातें सुन के शर्म के मरी जा रही थी मगर कुछ कुछ मजे भी आने लगी थी। हल्की मुस्कान आ गई मेरे चेहरे पर।मैं- "प्लीज बता दीजिए ना!""बता दूँगा मगर मेरी एक शर्त है, वो माननी पड़ेगी तुम्हें” ।मैं-"कैसी शर्त?"कल शाम में मैं घर आ रहा हूँ तो तुम अपने दोस्त श्रेया के साथ मेरा लण्ड लेने के लिए तैयार रहेगी।"मेरी तो हलक सूख गई, ये साक्षी और श्रेया क्या- क्या गुल खिलाती है। मुझे तो गुस्सा भी आ रही थी और थोड़ी-थोड़ी मजे भी आ रही थी। मगर मैं नाम जानना चाहती थी ।मैं ज्यादा रिस्क नहीं लेना चाहती थी, "मैं तो तैयार हूँ मगर श्रेया से पूछ के कहूँगी।""तो ठीक है उस रण्डी से जल्दी पूछ के बताना।""अब तो नाम बता दीजिए।""साली बिना पहचाने चूत मरवाने के लिए हाँ कैसे कह दी। एक नम्बर की रण्डी हो गई है।” इस बात पर मुझे भी हँसी आ गई। क्यों नहीं आती आखिर वो सही ही तो कह रहे थे।हँसते हुए मैंने पुनः रिक्वेस्ट की नाम बताने की। फिर उन्होंने अपना नाम राजेंद्र बताया। नाम सुनते ही मैं तो बेहोश होते होते बची… मैं तो साक्षी को मन ही मन गाली देना शुरू कर दी थी। साली पूरे गाँव में और कोई नहीं मिला अपनी चूत मरवाने के लिए। मैंने फोन काट दी, मगर फोन फिर से बजने लगी। मैं उठा नहीं रही थी। फोन लगातार आ रही थी। मैं बाहर साक्षी को देखी तो अभी भी साक्षी कहीं नहीं दिखाई दे रही थी।कुछ देर बाद मैंने पुनः फोन रिसीव की, फोन उठाते ही राजेंद्र अंकल की तेज आवाज मेरी कानों में गूँज पड़ी- “क्यों रण्डी, फोन क्यों काट दी?”।राजेंद्र अंकल जो कि हमारे ससुर जी के चचेरे भाई हैं। उनकी उम्र करीब 42 है। वे 3 पंचवर्षीय से इस गाँव के मुखिया हैं। अब सुन रही हूँ कि वे विधायक का चुनाव लड़ेँगे। उनको मैं सिर्फ एक बार ही देखी हूँ। ऊँचा कद, गठीला बदन, लम्बी मूँछेँ, गले में सोने की मोटी चैन, हाथ की सारी उँगली में अँगूठी, जब मैं पहली बार देखी तो डर ही गई थी। उनके साथ 12वीं की साक्षी… ओफ्फ! मैं तो हैरान थी कि भला साक्षी कैसे सह पाती होगी इनको।तभी मेरे कानों में पुनः जोर की "हैलो" गूँजी।"हाँ अंकल सुन रही हूँ" हड़बड़ाती हुई बोली।अंकल - "चुप क्यों हो गई?""वो मम्मी आ गई थी ना इसलिए" अब मैं पूरी तरह साक्षी बन के बात करने लगी।अंकल- "वो साली बहुत डिस्टर्ब करती है हमें। एक बार तुम हाँ कहो तो उसको भी चोद चोद के शामिल कर लें, फिर तो मजे ही मजे।"ओह गॉड! मुझ पर तो लगातार प्रहार होती जा रही थी। मम्मी के बारे में इतनी गंदी.....। मैं संभलती हुई बोली, "प्लीज मम्मी के बारे में कुछ मत कहिए।अंकल- "अच्छा ठीक है नहीं कहूँगा”।"फिर उन्होंने पूछा, "अच्छा वो तेरी नई भाभी की क्या नाम है? "मैं अपने बारे में सुन के तो सन्न रह गई। मेरे हाथ- पाँव कांप गई। फिर किसी तरह अपना नाम बताई।"हाँ याद आया भारती, साली क्या माल लगती है। गोरी चमड़ी, रस से भरी होंठ, गोल व सख्त चुची, चूतड़ निकली हुई, काले और लम्बे बाल, ओफ्फ साली को देख के मेरा लण्ड पानी छोड़ने लगता है।"मैं अपने बारे में ऐसी बातें सुन के पसीने छूट रहे थे। मुँह से आवाजें निकलनी बंद ही हो गई थी… बस सुनती रही।अंकल-"साक्षी, प्लीज एक बार तुम भारती को मेरे लण्ड के नीचे ला दो। मैं तुम्हें रुपयों से तौल दूँगा। प्रमोद तो उसकी सिर्फ सील तोड़ा होगा, असली चुदाई के मजे तो उसे मेरे लण्ड से ही आएगी। जब उसकी कसी चूत में तड़ा-तड़ लण्ड पेलूँगा तो वो प्रमोद को भूल जाएगी। जन्नत की सैर करवा दूँगा। बोलो साक्षी मेरे लण्ड के इतना नहीं करोगी?"मैं तो अब तक पसीने से भीँग गई थी। क्या बोलूँ कुछ समझ नहीं आ रही थी। कुछ देर तो मूक बनी रही, फिर जल्दी से बोली, "ठीक है, मैं कोशिश करूँगी। मम्मी आ रही है शायद मैं रखती हूँ, बाद में बात करूँगी। "सिर्फ इतनी बातें ही बोल पाई और जल्दी से फोन काट दी।मेरी साँसे काफी तेज हो गई थी मानो दौड़ के आ रही हूँ। मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रही थी। अचानक मुझे चूत के पास कुछ गीली सी महसूस हुई। मैंने हाथ लगा कर देखी तो उफ्फ! मेरी बुर तो पूरी तरह भीँगी हुई थी।हे भगवान! ये क्या हो गया? अंकल की बातें सुन के मैं गीली हो गई। मैं भी कितनी पागल थी जो आराम से सुन रही थी। एक बात तो थी कि अंकल की बातें अच्छी लग रही थी तभी तो सुन रही थी।साक्षी की बातें तक तो नॉर्मल थी पर जब अपनी बातें सुनी तो पता नहीं क्या हो गया हमें। एक अलग सी नशा आ गई मुझमें। मैं मदहोश हो कर सुन रही थी और नीचे मेरी बुर फव्वारे छोड़ रही थी। इतनी मदहोश तो रात में चुदाई के वक्त भी नहीं हुई थी।साक्षी तो जानती होगी कि अंकल मुझे चोदना चाहते हैं। जानती होगी तभी तो वो हमसे दोस्ती की वर्ना आज के जमाने में ननद-भाभी में कहीं दोस्ती होती है। अगर होती भी होगी तो इतनी जल्दी नहीं होती। अगर साक्षी इस बारे में कभी बात की तो क्या कहूँगी? ना.. ना.. मैं ये सब नहीं करूँगी। मेरी शादी हो चुकी है, अब तो प्रमोद को छोड़ किसी के बारे में सोच भी नहीं सकती।मैं यही सब सोच रही थी कि दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई। सामने साक्षी आ रही थी। मैं तो एकटक देखती ही रह गई। कितनी मासूम लग रही है दिखने में, मगर काम तो ऐसा करती है जिसमें बड़ी बड़ी को मात दे दे। मैं साक्षी को ऊपर से नीचे गौर से देखने लगी। मैं तो कल्पना भी नहीं कर पा रही थी कि इतनी प्यारी और छोटी लड़की भला एक 45 साल के मर्द को अपने ऊपर चढ़ा सकती है।साक्षी- "क्या हुआ भारती डॉर्लिँग, किस सोच में डूबी हुई हैं। डरिए मत, मैं अपनी मेहनताना लिए बिना छोड़ूँगी नहीं" कहते हुए खिलखिला कर हँस पड़ी।मैं भी हल्की मुस्कान के साथ उसका साथ दी।"नाश्ता बना कर आती हूँ, फिर लूँगी।" साक्षी अपना उठाके जाने के लिए मुड़ी।"साक्षी, तुम्हारा फोन…” इतनी बातें सुनते ही साक्षी के चेहरे की रंग मानो उड़ सी गई हो। वो जल्दी से आई और फोन मेरे हाथ से ले ली। फिर मेरी तरफ ऐसे देखने लगी मानो पूछ रही हो कि किसका फोन आया था।मैं मुस्कुराती हुई बोली, " तुम्हारी किसी सहेली का फोन था शायद। मैं बात करना नहीं चाहती थी, तुम्हें आवाज भी दी पर तब तक तुम बाहर निकल चुकी थी। कई बार रिंग हुई तो मैं बात कर ली।"साक्षी मेरी बात को सुनते हुए कॉल लॉग चेक करने लगी। नम्बर देखते ही वो पसीने से लथपथ सी हो गई। फिर मेरी तरफ देखने लगी। उसकी आँखे गुस्से से लाल पीली हो रही थी, मगर बोली कुछ नहीं।मैं सीधे टॉपिक पर आते हुए बोली, "कल शाम को श्रेया और तुमसे मिलना चाहते हैं”। इतना सुनते ही वो पैर पटकती हुई निकल गई। मुझे तो उसकी हालत देख कर हँसी भी आ रही थी। तुरंत में मेरे सर पे बैठने वाली लड़की पल भर में बिल्ली बन गई।वैसे मेरा इरादा उसके दिल पे ठोस पहुँचाने वाली नहीं थी। मैं तो उससे एक दोस्त की तरह सारी बातें जानना चाहती थी, फिर समझाना चाहती थी।मैं पीछे से आवाज दी, "साक्षी, मेरी बात तो सुनो”, मगर वो तो अपने रूम की तरफ चलती चली गई और अंदर जा कर लॉक कर ली। अब मैं क्या करूँ? बेचारी नाराज हो गई हमसे… बेकार ही फोन रिसीव की थी। कम से कम नाश्ता तो करवा देती। खैर; मैं बात को ज्यादा बढ़ाना ठीक नहीं समझी।फिर रात का खाना प्रमोद के साथ खा कर सोने चली गई। साक्षी सर दर्द का बहाना बना कर खाने से मना कर दी। रात में प्रमोद ने दो बार जम के चोदा, फिर सो गए… दर्द तो ज्यादा नहीं हुई पर थक ज्यादा गई तो सोते ही नींद आ गयी।Continue...
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parkas

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Chapter-3
सुबह 5 बजे मेरी नींद खुली तो अपनी हालत देख खुद ही शर्मा गई। मैं पूरी तरह नंगी थी और प्रमोद के नंगे जिस्म से चिपकी हुई थी। मैं उठी, तो मेरी नजर बेडशीट पर पड़ी। बेडशीट पर खून और वीर्य के गहरे दाग थे। मैंने जल्दी से अपने कपड़े पहने और प्रमोद को नींद से जगाया। प्रमोद भी यह देखकर मुस्कुरा दिए।

मैंने फौरन बेडशीट बदली और नई बेडशीट बिछा दी। तब तक प्रमोद ने भी अपने कपड़े पहन लिए और फिर से सो गए। नींद तो मुझे भी आ रही थी, लेकिन नई जगह होने के कारण देर तक सोने का मन नहीं हुआ क्योंकि पता नहीं घर के लोग क्या सोचते।

कुछ देर बाद घर के सभी सदस्य जाग गए। मैंने नहा-धोकर खुद को फ्रेश किया और नाश्ता करने के बाद अपने कमरे में आ गई। सुबह 11 बजे तक प्रमोद सोते रहे। फिर वे उठे, फ्रेश हुए और अपने दोस्तों के साथ बाहर चले गए।

उनके जाते ही मेरी ननद साक्षी अचानक आ धमकी। शायद सुबह प्रमोद घर पर थे, इसलिए वह नहीं आई थी। साक्षी हँसते हुए बोली, "भाभी, भैया को रात में सोने नहीं दिया क्या, जो इतनी देर तक सोते रहे?" उसकी बात सुनकर मुझे भी हँसी आ गई।

साक्षी हमारे घर की लाडली थी। उसने हाल ही में 12वीं की परीक्षा दी थी और दिखने में काफी सुंदर थी। हमेशा हँसती-खिलखिलाती रहती थी। उसकी शारीरिक संरचना भी काफी आकर्षक थी।

साक्षी अचानक बेड पर चढ़कर मुझे पीछे से बाँहों में भर ली और अपनी गाल मेरी गाल से सटाते हुए बोली, "भाभी, बताओ ना प्लीज, रात में क्या सब किया?"

मैंने हँसते हुए जवाब दिया, "आप अपने भैया से पूछ लीजिए कि रात में क्या हुआ।"

"क्या भाभी...? भैया से कैसे पूछ सकती हूँ? बताओ ना प्लीज,"
वह जिद्द करने लगी।

"नहीं पूछ सकती तो छोड़ दो। जब तुम्हारी शादी होगी, तब खुद जान जाओगी।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

साक्षी- "अरे, 1 मिनट भाभी। ये 'आप-आप' क्यों लगा रखी है? मैं अपनी भाभी से दोस्ती करने आई हूँ और आप हैं कि...?"

"ओके, साक्षी!"

"थैंक्यू, भाभी!"
साक्षी ने खुश होकर कहा।

फिर वह कमरे में इधर-उधर देखते हुए पूछी, "अच्छा, ये बताओ, मेरी बेडशीट कहाँ है जो कल बिछाई थी?"

"क्या? वो तुम्हारी बेडशीट थी?",
मैंने चौंकते हुए पूछा।

"हाँ, मेरी प्यारी 'भारती डार्लिंग'! जरा दिखाओ तो, क्या हालत कर दी है।" यह कहते हुए साक्षी मेरे गालों को चूम ली।

"नहीं, अभी वो देखने लायक नहीं है। मैं साफ कर दूँगी, तब देखना।" मैंने जवाब दिया।

"भाभी, अगर जल्दी साफ नहीं करोगी तो दाग और ज्यादा गहरे हो जाएँगे। मुझे दे दो, मैं साफ कर दूँगी, प्लीज निकालो।"

"ठीक है, लेकिन किसी को दिखाना मत, वरना सब हँसेंगे।"
मैंने साक्षी को चेताया।

"क्या, भाभी? दिखाएँगे नहीं तो लोग कैसे समझेंगे कि दुल्हन कितनी संस्कारी है।"

"पागल हो गई है क्या? हमें मरवाएगी! जाओ, हमें साफ नहीं करवाना।"
मैंने मना करते हुए कहा।

साक्षी ने जोर से हँसते हुए कहा- "ही ही ही... मजाक कर रही थी भाभी, वो सब दिखाने वाली चीज होती है क्या? अब दो, जल्दी से"।

मैंने सूटकेस खोलकर बेडशीट निकाली ही थी कि साक्षी ने झपटकर उसे ले लिया और फुर्ती से पलंग पर फैला दी।

बेडशीट देखकर वह चिल्ला पड़ी, "हाय! मेरी प्यारी भाभी की कितनी धुनाई हुई है पूरी रात! इस बेडशीट को देखकर तो मैं शादी के नाम से डरने लगूँगी।"

उसकी बात सुन मैं शर्म से लाल हो गई और जल्दी से बेडशीट समेटने की कोशिश करने लगी। तभी साक्षी ने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए और मुझे पलंग पर धक्का देते हुए खुद मेरे ऊपर गिर पड़ी।
उसने अपना चेहरा मेरे चेहरे के पास लाते हुए कहा- "भाभी, रात में मजे ले रही थी, तब तो शर्म नहीं आई, अब क्यों शर्मा रही हो?"

"पागल, मरवाएगी क्या? अगर भैया को पता चला तो जानती हो क्या होगा?"
मैंने उसे समझाने की कोशिश की।

"कुछ नहीं होगा क्योंकि हम दोनों में से कोई भैया को कुछ बताएगा ही नहीं। वैसे भाभी, आपके होंठ काफी मस्त हैं, मन कर रहा है चिपका दूँ..."

उसके कुछ और करने से पहले ही मैंने उसे धक्का देकर अपने से दूर कर दिया। साक्षी जोर से हँसने लगी और मैं भी मुस्कुरा दी।

फिर साक्षी ने बेडशीट समेटी और अपने बैग में डालते हुए बोली, "भाभी, अपने दोस्त के यहाँ जा रही हूँ। वहीं इसे साफ कर दूँगी। चिंता मत करो, किसी को नहीं दिखाऊँगी। शाम तक वापस आ जाऊँगी।"
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "ठीक है, जल्दी आना, अकेले बोर हो जाऊँगी।" साक्षी ने मुझे बाय कहा और चली गई।

उसके जाने के बाद दोपहर के 12 बज चुके थे। मुझे भी नींद आने लगी। मैं बेड पर पड़ी और गहरी नींद में सो गई।

रात की थकावट के कारण मैं बेसुध होकर सो रही थी। अचानक, मैंने अपने होंठों पर कुछ गीला सा महसूस किया, लेकिन नींद इतनी गहरी थी कि मैं पूरी तरह जाग नहीं पाई। तभी मेरे होंठों में तेज दर्द हुआ, और मैं हड़बड़ाकर नींद से जाग गई।

ओह, गॉड! एक लड़की मुझे अपनी बाँहों में जकड़े हुए मेरे होंठ चूस रही थी। मैं पूरी तरह चौंक गई और उसे पहचान नहीं पाई। किसी तरह उसे धक्का देकर अपने से अलग किया। जैसे ही वह अलग हुई, मैंने देखा कि वह साक्षी की दोस्त श्रेया थी। अलग होते ही साक्षी और श्रेया जोर-जोर से हँसने लगीं।

मुझे गुस्सा भी आ रहा था, लेकिन साक्षी को देखकर मैंने खुद को शांत रखा।

साक्षी ने हँसते हुए कहा- "भाभी, ये लो आपकी बेडशीट, पूरी तरह साफ हो गई है"।

"ये मेरी दोस्त श्रेया है। इसके यहाँ बेडशीट साफ करवाने गई थी। काफी मेहनत करनी पड़ी हम दोनों को, तब जाकर यह दाग साफ हुआ"
, साक्षी ने मुस्कुराते हुए कहा।


मैंने नाराज़गी भरे लहजे में पूछा- "ठीक है, बेडशीट साफ हो गई, मगर ये गंदी हरकत क्यों की तुम दोनों ने?"

साक्षी पलंग पर चढ़ते हुए शरारत से बोली, "भाभी, इतनी मेहनत से बेडशीट साफ की है, तो क्या बिना कुछ लिए छोड़ देती? श्रेया ने तो अपना हिस्सा ले लिया। अब हमें भी जल्दी से अपना हिस्सा दे दो"।

मैं कुछ बोलती, उससे पहले ही श्रेया ने कहा, "भाभीजी, आप सोते हुए इतनी प्यारी लग रही थीं कि मैं बर्दाश्त नहीं कर सकी और चिपक गई। वो तो साक्षी ने ही लेने की सोची थी, मगर मैंने रोक लिया। वर्ना साक्षी आपकी और बुरी हालत कर देती!"

दोनों की चुहलबाजी सुनकर मेरा गुस्सा भी शांत हो गया। "तुम दोनों पागल हो गई हो, कम से कम मुझे जगा तो देती!" मैंने हँसते हुए जवाब दिया।

मेरी बात सुनते ही साक्षी झट से मेरी तरफ लपकी। मैं कुछ समझ पाती या कुछ करने की सोचती, उससे पहले ही मैं पलंग पर गिर चुकी थी। साक्षी ने मेरे दोनों हाथ जकड़ लिए और मेरे ऊपर चढ़ गई।

हम तीनों हँसने लगे, खासकर साक्षी की इस हरकत पर। उसकी मस्ती और चंचलता अब मुझे भी अच्छी लगने लगी थी। इसलिए मैं भी बिना किसी विरोध के, उसकी शरारतों का हिस्सा बनकर उसके नीचे पड़ी रही।

साक्षी ने शरारत करते हुए मेरी चुचियों को दबाया और फिर मेरे गालों को चूमते हुए बोली, "भारती डार्लिंग, आप मना भी करतीं, तो मैं अपना हक ले ही लेती। मगर मान गईं, ये आपकी अच्छी बात है। वरना ऐसा हाल करती, जो भैया ने भी नहीं किया होगा!"

"चलो, बड़ी आई हालत खराब करने वाली। तुम्हारे भैया भी पहले इसी तरह बोलते थे, लेकिन थोड़ी तकलीफ के बाद सब ठीक हो गया था।"
मैंने भी ताने भरे अंदाज में जवाब दिया।

हम दोनों की बातें सुनकर श्रेया भी हँसते हुए पास आ गई और बोली, "भाभीजी, अब तो आपकी खैर नहीं। साक्षी वो सब करती है, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकतीं। आपकी ऐसी हालत करेगी कि आप तड़प-तड़पकर छोड़ने की भीख माँगेंगी।"

तभी बाहर से मम्मीजी की आवाज सुनाई दी। आवाज सुनते ही साक्षी झट से उठ गई, और मैंने भी फुर्ती से अपने कपड़े ठीक कर लिए।

मम्मीजी कमरे में आते हुए बोलीं, "साक्षी, तुम बस बातों में ही लगी रहती हो। बहू ने सुबह ही खाया था। अब कुछ नाश्ता बना दो और श्रेया को भी खिला दो, काफी दिनों बाद आई है।"

"ठीक है, मम्मी", साक्षी ने जवाब दिया।

इतना कहकर मम्मीजी चली गईं। शायद उन्हें कहीं जाना था।

"साक्षी, अब मैं चलती हूँ। मुझे लेट हो जाएगा," श्रेया हम दोनों की ओर देखते हुए बोली।

"अरे, इतनी जल्दी क्यों? नाश्ता कर लो, फिर चले जाना", मैंने श्रेया से कहा।

"नहीं, भाभीजी, अगली बार आऊँगी, तो खाना जरूर खाऊँगी। आज मम्मी को कुछ काम है, इसलिए जाना जरूरी है", श्रेया ने सफाई देते हुए जवाब दिया।

मैंने साक्षी की तरफ देखा, और उसने भी श्रेया की बात पर सहमति जताई। फिर साक्षी श्रेया को छोड़ने बाहर चली गई।

कुछ देर बाद, साक्षी के बैग से मोबाइल के कंपन की आवाज आने लगी। मैंने सोचा कि साक्षी को बुला दूँ, इसलिए गेट की ओर लपकी। लेकिन तब तक, साक्षी और श्रेया बाहर जा चुकी थीं। मैं बाहर नहीं जा सकती थी, इसलिए खिड़की से झाँककर देखा। दोनों सड़क किनारे खड़ी होकर बातें कर रही थीं। अब वहाँ से आवाज देना भी मुश्किल था।

उधर, तब तक मोबाइल की रिंग कट चुकी थी। मैंने बैग से मोबाइल निकाला और स्क्रीन पर देखा कि किसका फोन था। कोई अनजान नंबर था। तभी फोन दोबारा बजने लगा। मैंने खिड़की से देखा, तो साक्षी और श्रेया अभी भी वहीं बातें कर रही थीं।

मैंने सोचा कि फोन उठा लेती हूँ और कॉलर को बता दूँ कि साक्षी कुछ देर बाद बात कर सकती है। मैंने फोन रिसीव किया और धीरे से कान पर लगाया।

"क्यों, साली, फोन क्यों नहीं उठा रही थी?" फोन पर एक मर्द की आवाज सुनकर मैं सन्न रह गई।

आवाज सुनने तक तो ठीक था, लेकिन उसकी भाषा ने मुझे असहज कर दिया। कुछ पल के लिए मेरा गला सूख गया। मैंने हिम्मत जुटाई और जवाब दिया, "आप कौन बोल रहे हैं और किससे बात करनी है?"

उधर से आवाज आई- "तुम साक्षी ही हो, ना?" और अब तो मेरा दिमाग पूरी तरह झकझोर गया।

मैंने खिड़की से देखा, लेकिन साक्षी और श्रेया अब वहाँ नहीं थीं। शायद बातें करते हुए वे आगे निकल गई थीं। मैंने खुद को शांत करने की कोशिश की। मन में कई सवाल उठने लगे, लेकिन मैंने जल्द ही स्थिति संभालने का फैसला किया।

फोन को कान से लगाते हुए मैंने जवाब दिया, "हाँ, मैं साक्षी ही हूँ, लेकिन मैं आपको पहचान नहीं पा रही हूँ, आप कौन हैं?"

"साली नाटक मत कर वर्ना तेरे घर आकर इतना चोदूँगा कि नानी याद आ जाएगी"


मैं तो इतना सुन के पानी पानी हो गई। फिर भी हिम्मत कर बोली, "सच कह रही हूँ, आपकी आवाज चेँज है सो नहीं पहचान पा रही हूँ।" मैं उसका नाम जानने की कोशिश कर रही थी।

“हाँ रात में कुछ ज्यादा ही शराब पी लिया था तो आवाज थोड़ी भारी हो गई”।

अब मेरी तीर निशाने पर लग रही थी। मैंने थोड़ी रिक्वेस्ट करते हुए बोली, "हाँ तभी तो नहीं पहचान रही हूँ कि कौन बोल रहे हैं”।

“साली लण्ड तो अँधेरे में भी पहचान लेती है और लपक के चुसने लगती है। आवाज क्यूँ नहीं पहचान रही है” ।


मैं तो ऐसी बातें सुन के शर्म के मरी जा रही थी मगर कुछ कुछ मजे भी आने लगी थी। हल्की मुस्कान आ गई मेरे चेहरे पर।

मैं- "प्लीज बता दीजिए ना!"

"बता दूँगा मगर मेरी एक शर्त है, वो माननी पड़ेगी तुम्हें” ।


मैं-"कैसी शर्त?

"कल शाम में मैं घर आ रहा हूँ तो तुम अपने दोस्त श्रेया के साथ मेरा लण्ड लेने के लिए तैयार रहेगी।"


मेरी तो हलक सूख गई, ये साक्षी और श्रेया क्या- क्या गुल खिलाती है। मुझे तो गुस्सा भी आ रही थी और थोड़ी-थोड़ी मजे भी आ रही थी। मगर मैं नाम जानना चाहती थी ।

मैं ज्यादा रिस्क नहीं लेना चाहती थी, "मैं तो तैयार हूँ मगर श्रेया से पूछ के कहूँगी।"

"तो ठीक है उस रण्डी से जल्दी पूछ के बताना।"


"अब तो नाम बता दीजिए।"

"साली बिना पहचाने चूत मरवाने के लिए हाँ कैसे कह दी। एक नम्बर की रण्डी हो गई है।”
इस बात पर मुझे भी हँसी आ गई। क्यों नहीं आती आखिर वो सही ही तो कह रहे थे।

हँसते हुए मैंने पुनः रिक्वेस्ट की नाम बताने की। फिर उन्होंने अपना नाम राजेंद्र बताया। नाम सुनते ही मैं तो बेहोश होते होते बची… मैं तो साक्षी को मन ही मन गाली देना शुरू कर दी थी। साली पूरे गाँव में और कोई नहीं मिला अपनी चूत मरवाने के लिए। मैंने फोन काट दी, मगर फोन फिर से बजने लगी। मैं उठा नहीं रही थी। फोन लगातार आ रही थी। मैं बाहर साक्षी को देखी तो अभी भी साक्षी कहीं नहीं दिखाई दे रही थी।

कुछ देर बाद मैंने पुनः फोन रिसीव की, फोन उठाते ही राजेंद्र अंकल की तेज आवाज मेरी कानों में गूँज पड़ी- “क्यों रण्डी, फोन क्यों काट दी?”

राजेंद्र अंकल जो कि हमारे ससुर जी के चचेरे भाई हैं। उनकी उम्र करीब 42 है। वे 3 पंचवर्षीय से इस गाँव के मुखिया हैं। अब सुन रही हूँ कि वे विधायक का चुनाव लड़ेँगे। उनको मैं सिर्फ एक बार ही देखी हूँ। ऊँचा कद, गठीला बदन, लम्बी मूँछेँ, गले में सोने की मोटी चैन, हाथ की सारी उँगली में अँगूठी, जब मैं पहली बार देखी तो डर ही गई थी। उनके साथ 12वीं की साक्षी… ओफ्फ! मैं तो हैरान थी कि भला साक्षी कैसे सह पाती होगी इनको।

तभी मेरे कानों में पुनः जोर की "हैलो" गूँजी।

"हाँ अंकल सुन रही हूँ" हड़बड़ाती हुई बोली।

अंकल - "चुप क्यों हो गई?"

"वो मम्मी आ गई थी ना इसलिए"
अब मैं पूरी तरह साक्षी बन के बात करने लगी।

अंकल- "वो साली बहुत डिस्टर्ब करती है हमें। एक बार तुम हाँ कहो तो उसको भी चोद चोद के शामिल कर लें, फिर तो मजे ही मजे।"

ओह गॉड! मुझ पर तो लगातार प्रहार होती जा रही थी। मम्मी के बारे में इतनी गंदी.....। मैं संभलती हुई बोली, "प्लीज मम्मी के बारे में कुछ मत कहिए।

अंकल- "अच्छा ठीक है नहीं कहूँगा”।

"फिर उन्होंने पूछा, "अच्छा वो तेरी नई भाभी की क्या नाम है? "

मैं अपने बारे में सुन के तो सन्न रह गई। मेरे हाथ- पाँव कांप गई। फिर किसी तरह अपना नाम बताई।

"हाँ याद आया भारती, साली क्या माल लगती है। गोरी चमड़ी, रस से भरी होंठ, गोल व सख्त चुची, चूतड़ निकली हुई, काले और लम्बे बाल, ओफ्फ साली को देख के मेरा लण्ड पानी छोड़ने लगता है।"

मैं अपने बारे में ऐसी बातें सुन के पसीने छूट रहे थे। मुँह से आवाजें निकलनी बंद ही हो गई थी… बस सुनती रही।

अंकल-"साक्षी, प्लीज एक बार तुम भारती को मेरे लण्ड के नीचे ला दो। मैं तुम्हें रुपयों से तौल दूँगा। प्रमोद तो उसकी सिर्फ सील तोड़ा होगा, असली चुदाई के मजे तो उसे मेरे लण्ड से ही आएगी। जब उसकी कसी चूत में तड़ा-तड़ लण्ड पेलूँगा तो वो प्रमोद को भूल जाएगी। जन्नत की सैर करवा दूँगा। बोलो साक्षी मेरे लण्ड के इतना नहीं करोगी?"

मैं तो अब तक पसीने से भीँग गई थी। क्या बोलूँ कुछ समझ नहीं आ रही थी। कुछ देर तो मूक बनी रही, फिर जल्दी से बोली, "ठीक है, मैं कोशिश करूँगी। मम्मी आ रही है शायद मैं रखती हूँ, बाद में बात करूँगी। "सिर्फ इतनी बातें ही बोल पाई और जल्दी से फोन काट दी।

मेरी साँसे काफी तेज हो गई थी मानो दौड़ के आ रही हूँ। मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रही थी। अचानक मुझे चूत के पास कुछ गीली सी महसूस हुई। मैंने हाथ लगा कर देखी तो उफ्फ! मेरी बुर तो पूरी तरह भीँगी हुई थी।

हे भगवान! ये क्या हो गया? अंकल की बातें सुन के मैं गीली हो गई। मैं भी कितनी पागल थी जो आराम से सुन रही थी। एक बात तो थी कि अंकल की बातें अच्छी लग रही थी तभी तो सुन रही थी।

साक्षी की बातें तक तो नॉर्मल थी पर जब अपनी बातें सुनी तो पता नहीं क्या हो गया हमें। एक अलग सी नशा आ गई मुझमें। मैं मदहोश हो कर सुन रही थी और नीचे मेरी बुर फव्वारे छोड़ रही थी। इतनी मदहोश तो रात में चुदाई के वक्त भी नहीं हुई थी।

साक्षी तो जानती होगी कि अंकल मुझे चोदना चाहते हैं। जानती होगी तभी तो वो हमसे दोस्ती की वर्ना आज के जमाने में ननद-भाभी में कहीं दोस्ती होती है। अगर होती भी होगी तो इतनी जल्दी नहीं होती। अगर साक्षी इस बारे में कभी बात की तो क्या कहूँगी? ना.. ना.. मैं ये सब नहीं करूँगी। मेरी शादी हो चुकी है, अब तो प्रमोद को छोड़ किसी के बारे में सोच भी नहीं सकती।

मैं यही सब सोच रही थी कि दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई। सामने साक्षी आ रही थी। मैं तो एकटक देखती ही रह गई। कितनी मासूम लग रही है दिखने में, मगर काम तो ऐसा करती है जिसमें बड़ी बड़ी को मात दे दे। मैं साक्षी को ऊपर से नीचे गौर से देखने लगी। मैं तो कल्पना भी नहीं कर पा रही थी कि इतनी प्यारी और छोटी लड़की भला एक 45 साल के मर्द को अपने ऊपर चढ़ा सकती है।

साक्षी- "क्या हुआ भारती डॉर्लिँग, किस सोच में डूबी हुई हैं। डरिए मत, मैं अपनी मेहनताना लिए बिना छोड़ूँगी नहीं" कहते हुए खिलखिला कर हँस पड़ी।

मैं भी हल्की मुस्कान के साथ उसका साथ दी।

"नाश्ता बना कर आती हूँ, फिर लूँगी।" साक्षी अपना उठाके जाने के लिए मुड़ी।

"साक्षी, तुम्हारा फोन…” इतनी बातें सुनते ही साक्षी के चेहरे की रंग मानो उड़ सी गई हो। वो जल्दी से आई और फोन मेरे हाथ से ले ली। फिर मेरी तरफ ऐसे देखने लगी मानो पूछ रही हो कि किसका फोन आया था।

मैं मुस्कुराती हुई बोली, " तुम्हारी किसी सहेली का फोन था शायद। मैं बात करना नहीं चाहती थी, तुम्हें आवाज भी दी पर तब तक तुम बाहर निकल चुकी थी। कई बार रिंग हुई तो मैं बात कर ली।"

साक्षी मेरी बात को सुनते हुए कॉल लॉग चेक करने लगी। नम्बर देखते ही वो पसीने से लथपथ सी हो गई। फिर मेरी तरफ देखने लगी। उसकी आँखे गुस्से से लाल पीली हो रही थी, मगर बोली कुछ नहीं।

मैं सीधे टॉपिक पर आते हुए बोली, "कल शाम को श्रेया और तुमसे मिलना चाहते हैं”। इतना सुनते ही वो पैर पटकती हुई निकल गई। मुझे तो उसकी हालत देख कर हँसी भी आ रही थी। तुरंत में मेरे सर पे बैठने वाली लड़की पल भर में बिल्ली बन गई।

वैसे मेरा इरादा उसके दिल पे ठोस पहुँचाने वाली नहीं थी। मैं तो उससे एक दोस्त की तरह सारी बातें जानना चाहती थी, फिर समझाना चाहती थी।

मैं पीछे से आवाज दी, "साक्षी, मेरी बात तो सुनो”, मगर वो तो अपने रूम की तरफ चलती चली गई और अंदर जा कर लॉक कर ली। अब मैं क्या करूँ? बेचारी नाराज हो गई हमसे… बेकार ही फोन रिसीव की थी। कम से कम नाश्ता तो करवा देती। खैर; मैं बात को ज्यादा बढ़ाना ठीक नहीं समझी।

फिर रात का खाना प्रमोद के साथ खा कर सोने चली गई। साक्षी सर दर्द का बहाना बना कर खाने से मना कर दी। रात में प्रमोद ने दो बार जम के चोदा, फिर सो गए… दर्द तो ज्यादा नहीं हुई पर थक ज्यादा गई तो सोते ही नींद आ गयी।

Continue...
Nice and excellent update....
 
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kamdev99008

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ये कहानी बहुत जबर्दस्त है
इन्सेस्ट एडल्टरी दोनों ही भरपूर
बस एंड फुसफुसा सा लगा

Xossip पर "गांव की लड़की शहर में" नाम से 8-10 साल पहले पढ़ी थी
 

Killer_king

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Chapter-4
सुबह हमारी नींद देर से खुली। मैं जल्दी से फ्रेश हुई और किचन की तरफ चल दी। सोचा शायद साक्षी होगी तो उसे मनाने की कोशिश करूँगी। मगर वहाँ मम्मीजी और साक्षी दोनों साथ खाना बना रही थीं। मैं भी खाना बनाने में हाथ बँटाने लगी। इस दौरान साक्षी ने मेरी तरफ एक बार भी पलटकर देखा नहीं। मैंने भी वहाँ बात करने की ज्यादा कोशिश नहीं की।

किचन का काम खत्म कर मैं अपने रूम में आ गई। तब तक प्रमोद भी फ्रेश हो चुके थे। वे खाना खाकर निकल गए। 11 बजे तक सब खा चुके थे। मम्मीजी आराम करने अपने रूम में चली गईं। अब मैं साक्षी से बात करने की सोच रही थी।

मैं उठी और साक्षी के रूम की तरफ चल दी। मम्मी, पापा, प्रमोद और मैं नीचे रहते थे, जबकि साक्षी ऊपर बने कमरे में रहती थी। सीढ़ियाँ चढ़ती हुई मैं रूम तक पहुँची और दरवाजा खटखटाया अंदर से साक्षी की आवाज आई, "कौन?"

मैंने कहा, "साक्षी, मैं हूँ... दरवाजा खोलो", कुछ देर बाद दरवाजा खुला। मैं हल्के से गेट को धक्का देती हुई अंदर आई और दरवाजा बंद कर दिया।

अंदर का नजारा देखकर मैं चौंक गई। रूम की सजावट और हर एक चीज नई और लेटेस्ट थी। पूरे कमरे में टाइल्स लगी थीं, जिन पर एक कालीन बिछी थी। रूम की दीवारे कलरफूल, जिस पर तरह तरह के पेंटिंग्स लगे थे। दीवार पर नई स्मार्ट L.E.D. टीवी टंगी थी। रूम में फ्रिज, वॉटर प्यूरीफायर, ए.सी. और फैन सब कुछ नया था। काँच की टेबल पर लेटेस्ट नाइटलैंप रखा था। बेड देखकर मैं दंग रह गई, बड़ा सा आलीशान पलंग पर बहुत ही अच्छी क्वालिटी का मोटा गद्दा पर सुंदर सी बेडसीट बिछी थी। चार पांच अलग अलग साइज के तकिये रखे थे। ऐसी बेड मैंने आज तक छुई भी नहीं थी। रूम की सुगंध ने मानो मुझे स्वर्ग में पहुँचा दिया। मैं यह सब देखकर भूल गई थी कि यहाँ क्यों आई हूँ।

अचानक एल.ई.डी. से आवाज आने लगी और मेरी तंद्रा टूटी। देखा, साक्षी बेड पर बैठकर कोई धारावाहिक देखने लगी थी। मेरी तरफ देख भी नहीं रही थी। मैं चुपचाप उसके पास जाकर बेड पर बैठ गई। कुछ देर इंतजार किया कि वह मुझसे कुछ पूछेगी, लेकिन वह चुप थी। अंत में मैंने कहा, "साक्षी, हमसे बात नहीं करोगी?"

मैं उसके जवाब का इंतजार करने लगी, लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

मैं फिर बोली, "मैं तो एक दोस्त की तरह तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ। जो अच्छी बातें बताए, सुने और सुनाए, पर मुझे ऐसी दोस्त कभी नहीं मिली। कल जब तुमसे मिली, तो लगा कि मुझे जिसकी तलाश थी, वह अब पूरी हो गई।"

मैं बोलती रही, "कल जो हुआ, उसकी जिम्मेदार मैं ही हूँ। मुझे बिना पूछे फोन रिसीव नहीं करना चाहिए था। मैं सोच रही थी कि दोस्त की फोन है, रिसीव कर भी ली तो क्या होगा। पर मुझे नहीं पता था कि इससे किसी को ठेस पहुँचेगी। इसके लिए मुझे माफ कर दो। मैं वादा करती हूँ कि अब ऐसी गलती नहीं करूँगी।" ये बोलते बोलते मेरी आँखें भर आईं।

मैंने कहा, "अगर माफ नहीं करोगी, तो कोई बात नहीं। दोस्त न सही, भाभी से तो बात कर लो। शायद मेरे नसीब में दोस्ती नहीं है।"

यह कहते हुए मैं दरवाजा खोलकर बाहर निकलने लगी। तभी साक्षी पीछे से दौड़ती हुई आई और मुझसे लिपटकर रोने लगी।

मैं चौंक गई, धीरे-धीरे उसे शांत करने लगी और पूछा, "क्या हुआ? क्यों रो रही हो?"

साक्षी ने सुबकते हुए कहा, "सॉरी भाभी, मैं आपको गलत समझ रही थी। मुझे लगा कहीं आप किसी को बता न दें, मैं तो मर ही जाऊँगी।"

मैं मुस्कुराते हुए बोली, "इतनी पागल लगती हूँ क्या? दोस्त का काम परेशानी में डालना नहीं, बल्कि संभालना होता है। अब रोना बंद करो, फिर बात करेंगे।"

साक्षी को लेकर मैं वापस बेड की तरफ आई और उसे साथ लेकर बैठ गई। कुछ देर में वह चुप हो गई। फिर उठकर बाथरूम में गई, हाथ-मुँह धोकर फ्रेश हुई, और वापस आकर मेरे पास बैठ गई।

मुझे अचानक एक ख्याल आया। मैं उससे सट गई और एक हाथ उसकी बगल में ले जाकर हल्की गुदगुदी कर दी। साक्षी न चाहते हुए भी हँस पड़ी और हल्की उछल गई।

मैं भी हँसते हुए बोली, "देखो, हँसते हुए कितनी प्यारी लगती हो। कल शाम से ऐसा मुँह फुलाया हुआ था, जैसे किसी ने किडनी निकाल ली हो।"

अब मैं साक्षी से खुलकर बात करना चाहती थी, और उसे भी बेहिचक अपनी बातें कहने का मौका देना चाहती थी। मैंने उसे बाँहों में भर लिया और हम दोनों बेड पर आराम से पसर गए।

मैंने हँसते हुए पूछा, "क्यों साक्षी रानी? जरा हमें भी तो बताओ कि राजेंद्र अंकल में ऐसी क्या खास बात है, जो तुम उनकी दीवानी हो गई हो?"

साक्षी मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दी। उसकी मुस्कान ने माहौल को हल्का और खुशमिजाज बना दिया। साक्षी मेरे नीचे दबी मुस्कुरा रही थी। उसकी चुची मेरी चुची से दब रही थी, और मेरी होंठ लगभग सट रही थी। हम दोनों की साँसें आपस में टकरा रही थी।

साक्षी जब कुछ देर तक नहीं बोली तो मैंने अपनी नाक उसके होंठ पर रगड़ते हुए बोली, "अरे, कुछ तो बोलो! तुम कब और कहाँ उनसे मिलने जा रही हो?"

साक्षी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "मैं कहीं नहीं जा रही, भाभी।"

यह सुनकर मैं थोड़ी चौंक गई, "क्यों? ऐसा क्यों कह रही हो?"

साक्षी हँसते हुए बोली, "मैंने कब कहा कि मैं उनसे मिलने जाऊँगी? जो तुम्हें जाना हो, तुम जाओ!"

यह सुनकर हम दोनों ठहाका मारकर हँस पड़े, माहौल और हल्का हो गया।

मैंने हँसते हुए कहा, "सच में, साली, तुम्हें शर्म नहीं आती? भाभी को ऐसे बोलती हो! खुद तो फँसोगी ही, और मुझे भी फँसाओगी!"

साक्षी ने खिलखिलाते हुए जवाब दिया, "अरे भाभी, अंकल वैसे आदमी नहीं हैं जो किसी को बदनाम कर दें, वो पूरी तरह सुरक्षित हैं।"

मैंने उसकी बात को बीच में काटते हुए कहा, "रहने दे, मैं यहाँ ही खुश हूँ और हाँ, अंकल को बोल देना कि वह मुझ पर से अपना ध्यान हटा लें, क्योंकि मैं ऐसे चक्करों में कभी पड़ने वाली नहीं हूँ।"

साक्षी मेरी बात सुनकर हँस पड़ी और बोली, "मेरी भाभी, भारती डॉर्लिंग है ही इतनी प्यारी कि कोई भी उनके दीदार के लिए मचल जाए।"

मैं साक्षी की ऐसी रोमांचित बातें सुन आपा खो दी और अपने होंठ साक्षी की होंठ से सटा दी। साक्षी भी बिना किसी हिचक के साथ देने लगी। कुछ ही देर में साक्षी पूरी तरह से गर्म हो कर जोर से चूसने लगी। मेरी साँसे भी तेजी से चलने लगी थी पर पीछे नहीं हटना चाहती थी। अगले ही पल साक्षी अपनी बाहोँ में मुझे कसते हुए पलटी, अब मैं साक्षी के नीचे दबी थी। हाथ को उसने मेरी गर्दन के नीचे रखी थी जिससे मैं चाह कर भी होंठ नहीं हटा सकती थी।

अचानक एक हाथ खींच कर मेरी चुची पर रख दी। मैं चौंक गई और तेजी से अपने हाथ से उसकी हाथ पकड़ी पर हटा नहीं पाई क्योंकि मुझे भी अच्छा लग रहा था। साक्षी अब चूसने को साथ साथ मेरी चुची भी दबाने लगी। मैं तो आनंद को सागर में गोते लगा रही थी। दो दिन में तो मेरी जिंदगी बदल गई थी।

अचानक साक्षी होंठ को छोड़ दी और नीचे आ कर एक चुची को मुँह में कैद कर ली। मेरी तो आह निकल गई। ब्लॉउज के ऊपर से ही मेरी चुची की चुसाई और घिसाई जारी थी। मैं तो स्वर्ग में उड़ रही थी।

कुछ देर बाद साक्षी अपना मुँह मेरी चुची से हटाते हुए बोली, "भाभी आपको यकीन नहीं होगी कि आज मैं कितनी खुश हूँ, सच भाभी आप काफी अच्छी हो।"

मैंने साक्षी को ऊपर खिंची और उसकी होंठों को चूमते हुए बोली, " खुश तो मैं भी हूँ कि मुझे इतनी अच्छी दोस्त और प्यारी ननद मिली है। चल अब तो बता कि सारे लड़के मर गए थे क्या जो तूने अंकल से दोस्ती कर ली।"

“नहीं भाभी, कॉलेज में एक बॉयफ्रेंड भी है पर उसके साथ सिर्फ बात करती हूँ। पता है, जब सिर्फ बात करती हूँ तो सारा कॉलेज जान गया। अगर उसके साथ सेक्स की तो पता नहीं कौन-कौन जान जाएगा।”

" ऐसी बात है तो उसे छोड़ क्यों नहीं देती?”


साक्षी- "नहीं भाभी, अगर ब्रेकअप कर लूँगी तो रोज 10 लड़के मेरे पीछे पड़े रहेंगे। अभी तो कम से कम आराम से कॉलेज आ जा तो रही हूँ ना। जब तक कॉलेज है बात करूँगी, बाद में अलग हो जाऊंगी।"

बात कुछ हद तक तो सही ही कह रही थी।

"हम्म दिमाग तो बहुत चलती है, पर ऐसा करना तो धोखा देना होगा ना।"

साक्षी - "नहीं नहीं! मैं पहले ही बोल चुकी हूँ कि नो शादी, नो सेक्स"।

साक्षी हंसती हुई कहने लगी, "वो भी मेरे टाइप का ही है। उसे जब भी मन होती है तो सेक्स करने वाली को ले के चला जाता है।"

"चल ठीक है, कुछ भी करना पर बदनामी वाली कोई हरकत मत करना।"

"नहीं भाभी, मैं ऐसी वैसी कोई काम नहीं करती।"

"अच्छा, सच बता तो अंकल को चांस कैसे दे दी अपनी इस आम को चुसवाने के लिए?"
, मैं नीचे दबी ही साक्षी की चुची को मसलते हुए बोली।

"वो सब जाने दो, बस इतना जान लो कि राजेंद्र अंकल काफी अच्छे हैं। मैं उन्हें बचपन से ही काफी पसंद करती थी। जब कॉलेज जाने लगी तो देखी अंकल की नजरें भी कॉलेज के लड़कों जैसी ही मुझे निहारती थी। तो मैं भी हिम्मत कर के आगे बढ़ने लगी और एक दिन ऐसा हुआ कि मैं उनकी पूरी तरह दीवानी हो गई।” साक्षी अब मेरे सीने से लग के बोली जा रही थी और मैं उसकी पीठ सहला रही थी।

“साक्षी! एक बात और बता, अंकल जब चढ़ते होंगे तो कैसे संभाल पाती होगी तुम”, कहते हुए मैं हँस दी।

साक्षी भी हंसती हुई बोली, "एक बार तुम भी चढवा लो अंकल को फिर देखना कैसी संभालती हूँ।"

"ना-ना मुझे नहीं देखनी, मुफ्त में मारी जाउँगी।"

"भाभी, अंकल आपके कितने से दीवाने हैं ये तो अंकल से सुन ही चुकी हो। बस तुम हाँ कह दोगी तो फिर तुम भी दीवानी हो जाओगी और उनसे बातें करना तो आपको पसंद भी है|"


मैं तो सोच में पड़ गई कि क्या साक्षी अंकल को बता दी कि उस समय मैं बात कर रही थी। मेरे तो पसीने निकलने लगी थी।

मुझे सोच मे देख साक्षी कान में धीरे से बोली, "ओह भाभी, टेँशन क्यों लेती हो। मेरी फोन में ऑटो रिकॉर्डिंग होती है। उसी में सुनी हूँ… अंकल से अभी तक बात नहीं की हूँ। अगर आप कहोगी तो कर लूँगी वर्ना जाने दो। अब आप हो तो अंकल की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।"

साक्षी की बातें सुन ढेर सारा प्यार जग गई मेरे अंदर। खुद को संभालती हुई बोली, "बात कर लेना अंकल से और प्लीज मेरा नाम मत लेना। अब मम्मी जी आएगी तो मैं नीचे जा रही हूँ"।

"भाभी, एक बार अंकल से बात तो कर लो फिर चली जाना"
, साक्षी हंसती हुई मेरे शरीर से उठती हुई बोली।

मैं भी हँस के बोल पड़ी, "पहले तुम कर लो फिर बाद में मैं कर लूँगी।" तभी नीचे से मम्मी जी की आवाज सुनाई दी। मैं उठी और कपड़े ठीक कर के जाने लगी।

पीछे से साक्षी बोली, "और कुछ करने की इच्छा हुई तो बेहिचक दोस्त की तरह बताना। " मैं बिना कुछ बोले मुस्कुराती हुई नीचे आ गई।

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Chapter-4
सुबह हमारी नींद देर से खुली। मैं जल्दी से फ्रेश हुई और किचन की तरफ चल दी। सोचा शायद साक्षी होगी तो उसे मनाने की कोशिश करूँगी। मगर वहाँ मम्मीजी और साक्षी दोनों साथ खाना बना रही थीं। मैं भी खाना बनाने में हाथ बँटाने लगी। इस दौरान साक्षी ने मेरी तरफ एक बार भी पलटकर देखा नहीं। मैंने भी वहाँ बात करने की ज्यादा कोशिश नहीं की।

किचन का काम खत्म कर मैं अपने रूम में आ गई। तब तक प्रमोद भी फ्रेश हो चुके थे। वे खाना खाकर निकल गए। 11 बजे तक सब खा चुके थे। मम्मीजी आराम करने अपने रूम में चली गईं। अब मैं साक्षी से बात करने की सोच रही थी।

मैं उठी और साक्षी के रूम की तरफ चल दी। मम्मी, पापा, प्रमोद और मैं नीचे रहते थे, जबकि साक्षी ऊपर बने कमरे में रहती थी। सीढ़ियाँ चढ़ती हुई मैं रूम तक पहुँची और दरवाजा खटखटाया अंदर से साक्षी की आवाज आई, "कौन?"

मैंने कहा, "साक्षी, मैं हूँ... दरवाजा खोलो", कुछ देर बाद दरवाजा खुला। मैं हल्के से गेट को धक्का देती हुई अंदर आई और दरवाजा बंद कर दिया।

अंदर का नजारा देखकर मैं चौंक गई। रूम की सजावट और हर एक चीज नई और लेटेस्ट थी। पूरे कमरे में टाइल्स लगी थीं, जिन पर एक कालीन बिछी थी। रूम की दीवारे कलरफूल, जिस पर तरह तरह के पेंटिंग्स लगे थे। दीवार पर नई स्मार्ट L.E.D. टीवी टंगी थी। रूम में फ्रिज, वॉटर प्यूरीफायर, ए.सी. और फैन सब कुछ नया था। काँच की टेबल पर लेटेस्ट नाइटलैंप रखा था। बेड देखकर मैं दंग रह गई, बड़ा सा आलीशान पलंग पर बहुत ही अच्छी क्वालिटी का मोटा गद्दा पर सुंदर सी बेडसीट बिछी थी। चार पांच अलग अलग साइज के तकिये रखे थे। ऐसी बेड मैंने आज तक छुई भी नहीं थी। रूम की सुगंध ने मानो मुझे स्वर्ग में पहुँचा दिया। मैं यह सब देखकर भूल गई थी कि यहाँ क्यों आई हूँ।

अचानक एल.ई.डी. से आवाज आने लगी और मेरी तंद्रा टूटी। देखा, साक्षी बेड पर बैठकर कोई धारावाहिक देखने लगी थी। मेरी तरफ देख भी नहीं रही थी। मैं चुपचाप उसके पास जाकर बेड पर बैठ गई। कुछ देर इंतजार किया कि वह मुझसे कुछ पूछेगी, लेकिन वह चुप थी। अंत में मैंने कहा, "साक्षी, हमसे बात नहीं करोगी?"

मैं उसके जवाब का इंतजार करने लगी, लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

मैं फिर बोली, "मैं तो एक दोस्त की तरह तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ। जो अच्छी बातें बताए, सुने और सुनाए, पर मुझे ऐसी दोस्त कभी नहीं मिली। कल जब तुमसे मिली, तो लगा कि मुझे जिसकी तलाश थी, वह अब पूरी हो गई।"

मैं बोलती रही, "कल जो हुआ, उसकी जिम्मेदार मैं ही हूँ। मुझे बिना पूछे फोन रिसीव नहीं करना चाहिए था। मैं सोच रही थी कि दोस्त की फोन है, रिसीव कर भी ली तो क्या होगा। पर मुझे नहीं पता था कि इससे किसी को ठेस पहुँचेगी। इसके लिए मुझे माफ कर दो। मैं वादा करती हूँ कि अब ऐसी गलती नहीं करूँगी।" ये बोलते बोलते मेरी आँखें भर आईं।

मैंने कहा, "अगर माफ नहीं करोगी, तो कोई बात नहीं। दोस्त न सही, भाभी से तो बात कर लो। शायद मेरे नसीब में दोस्ती नहीं है।"

यह कहते हुए मैं दरवाजा खोलकर बाहर निकलने लगी। तभी साक्षी पीछे से दौड़ती हुई आई और मुझसे लिपटकर रोने लगी।

मैं चौंक गई, धीरे-धीरे उसे शांत करने लगी और पूछा, "क्या हुआ? क्यों रो रही हो?"

साक्षी ने सुबकते हुए कहा, "सॉरी भाभी, मैं आपको गलत समझ रही थी। मुझे लगा कहीं आप किसी को बता न दें, मैं तो मर ही जाऊँगी।"

मैं मुस्कुराते हुए बोली, "इतनी पागल लगती हूँ क्या? दोस्त का काम परेशानी में डालना नहीं, बल्कि संभालना होता है। अब रोना बंद करो, फिर बात करेंगे।"

साक्षी को लेकर मैं वापस बेड की तरफ आई और उसे साथ लेकर बैठ गई। कुछ देर में वह चुप हो गई। फिर उठकर बाथरूम में गई, हाथ-मुँह धोकर फ्रेश हुई, और वापस आकर मेरे पास बैठ गई।

मुझे अचानक एक ख्याल आया। मैं उससे सट गई और एक हाथ उसकी बगल में ले जाकर हल्की गुदगुदी कर दी। साक्षी न चाहते हुए भी हँस पड़ी और हल्की उछल गई।

मैं भी हँसते हुए बोली, "देखो, हँसते हुए कितनी प्यारी लगती हो। कल शाम से ऐसा मुँह फुलाया हुआ था, जैसे किसी ने किडनी निकाल ली हो।"

अब मैं साक्षी से खुलकर बात करना चाहती थी, और उसे भी बेहिचक अपनी बातें कहने का मौका देना चाहती थी। मैंने उसे बाँहों में भर लिया और हम दोनों बेड पर आराम से पसर गए।

मैंने हँसते हुए पूछा, "क्यों साक्षी रानी? जरा हमें भी तो बताओ कि राजेंद्र अंकल में ऐसी क्या खास बात है, जो तुम उनकी दीवानी हो गई हो?"

साक्षी मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दी। उसकी मुस्कान ने माहौल को हल्का और खुशमिजाज बना दिया। साक्षी मेरे नीचे दबी मुस्कुरा रही थी। उसकी चुची मेरी चुची से दब रही थी, और मेरी होंठ लगभग सट रही थी। हम दोनों की साँसें आपस में टकरा रही थी।

साक्षी जब कुछ देर तक नहीं बोली तो मैंने अपनी नाक उसके होंठ पर रगड़ते हुए बोली, "अरे, कुछ तो बोलो! तुम कब और कहाँ उनसे मिलने जा रही हो?"

साक्षी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "मैं कहीं नहीं जा रही, भाभी।"

यह सुनकर मैं थोड़ी चौंक गई, "क्यों? ऐसा क्यों कह रही हो?"

साक्षी हँसते हुए बोली, "मैंने कब कहा कि मैं उनसे मिलने जाऊँगी? जो तुम्हें जाना हो, तुम जाओ!"

यह सुनकर हम दोनों ठहाका मारकर हँस पड़े, माहौल और हल्का हो गया।

मैंने हँसते हुए कहा, "सच में, साली, तुम्हें शर्म नहीं आती? भाभी को ऐसे बोलती हो! खुद तो फँसोगी ही, और मुझे भी फँसाओगी!"

साक्षी ने खिलखिलाते हुए जवाब दिया, "अरे भाभी, अंकल वैसे आदमी नहीं हैं जो किसी को बदनाम कर दें, वो पूरी तरह सुरक्षित हैं।"

मैंने उसकी बात को बीच में काटते हुए कहा, "रहने दे, मैं यहाँ ही खुश हूँ और हाँ, अंकल को बोल देना कि वह मुझ पर से अपना ध्यान हटा लें, क्योंकि मैं ऐसे चक्करों में कभी पड़ने वाली नहीं हूँ।"

साक्षी मेरी बात सुनकर हँस पड़ी और बोली, "मेरी भाभी, भारती डॉर्लिंग है ही इतनी प्यारी कि कोई भी उनके दीदार के लिए मचल जाए।"

मैं साक्षी की ऐसी रोमांचित बातें सुन आपा खो दी और अपने होंठ साक्षी की होंठ से सटा दी। साक्षी भी बिना किसी हिचक के साथ देने लगी। कुछ ही देर में साक्षी पूरी तरह से गर्म हो कर जोर से चूसने लगी। मेरी साँसे भी तेजी से चलने लगी थी पर पीछे नहीं हटना चाहती थी। अगले ही पल साक्षी अपनी बाहोँ में मुझे कसते हुए पलटी, अब मैं साक्षी के नीचे दबी थी। हाथ को उसने मेरी गर्दन के नीचे रखी थी जिससे मैं चाह कर भी होंठ नहीं हटा सकती थी।

अचानक एक हाथ खींच कर मेरी चुची पर रख दी। मैं चौंक गई और तेजी से अपने हाथ से उसकी हाथ पकड़ी पर हटा नहीं पाई क्योंकि मुझे भी अच्छा लग रहा था। साक्षी अब चूसने को साथ साथ मेरी चुची भी दबाने लगी। मैं तो आनंद को सागर में गोते लगा रही थी। दो दिन में तो मेरी जिंदगी बदल गई थी।

अचानक साक्षी होंठ को छोड़ दी और नीचे आ कर एक चुची को मुँह में कैद कर ली। मेरी तो आह निकल गई। ब्लॉउज के ऊपर से ही मेरी चुची की चुसाई और घिसाई जारी थी। मैं तो स्वर्ग में उड़ रही थी।

कुछ देर बाद साक्षी अपना मुँह मेरी चुची से हटाते हुए बोली, "भाभी आपको यकीन नहीं होगी कि आज मैं कितनी खुश हूँ, सच भाभी आप काफी अच्छी हो।"

मैंने साक्षी को ऊपर खिंची और उसकी होंठों को चूमते हुए बोली, " खुश तो मैं भी हूँ कि मुझे इतनी अच्छी दोस्त और प्यारी ननद मिली है। चल अब तो बता कि सारे लड़के मर गए थे क्या जो तूने अंकल से दोस्ती कर ली।"

“नहीं भाभी, कॉलेज में एक बॉयफ्रेंड भी है पर उसके साथ सिर्फ बात करती हूँ। पता है, जब सिर्फ बात करती हूँ तो सारा कॉलेज जान गया। अगर उसके साथ सेक्स की तो पता नहीं कौन-कौन जान जाएगा।”

" ऐसी बात है तो उसे छोड़ क्यों नहीं देती?”


साक्षी- "नहीं भाभी, अगर ब्रेकअप कर लूँगी तो रोज 10 लड़के मेरे पीछे पड़े रहेंगे। अभी तो कम से कम आराम से कॉलेज आ जा तो रही हूँ ना। जब तक कॉलेज है बात करूँगी, बाद में अलग हो जाऊंगी।"

बात कुछ हद तक तो सही ही कह रही थी।

"हम्म दिमाग तो बहुत चलती है, पर ऐसा करना तो धोखा देना होगा ना।"

साक्षी - "नहीं नहीं! मैं पहले ही बोल चुकी हूँ कि नो शादी, नो सेक्स"।

साक्षी हंसती हुई कहने लगी, "वो भी मेरे टाइप का ही है। उसे जब भी मन होती है तो सेक्स करने वाली को ले के चला जाता है।"

"चल ठीक है, कुछ भी करना पर बदनामी वाली कोई हरकत मत करना।"

"नहीं भाभी, मैं ऐसी वैसी कोई काम नहीं करती।"

"अच्छा, सच बता तो अंकल को चांस कैसे दे दी अपनी इस आम को चुसवाने के लिए?"
, मैं नीचे दबी ही साक्षी की चुची को मसलते हुए बोली।

"वो सब जाने दो, बस इतना जान लो कि राजेंद्र अंकल काफी अच्छे हैं। मैं उन्हें बचपन से ही काफी पसंद करती थी। जब कॉलेज जाने लगी तो देखी अंकल की नजरें भी कॉलेज के लड़कों जैसी ही मुझे निहारती थी। तो मैं भी हिम्मत कर के आगे बढ़ने लगी और एक दिन ऐसा हुआ कि मैं उनकी पूरी तरह दीवानी हो गई।” साक्षी अब मेरे सीने से लग के बोली जा रही थी और मैं उसकी पीठ सहला रही थी।

“साक्षी! एक बात और बता, अंकल जब चढ़ते होंगे तो कैसे संभाल पाती होगी तुम”, कहते हुए मैं हँस दी।

साक्षी भी हंसती हुई बोली, "एक बार तुम भी चढवा लो अंकल को फिर देखना कैसी संभालती हूँ।"

"ना-ना मुझे नहीं देखनी, मुफ्त में मारी जाउँगी।"

"भाभी, अंकल आपके कितने से दीवाने हैं ये तो अंकल से सुन ही चुकी हो। बस तुम हाँ कह दोगी तो फिर तुम भी दीवानी हो जाओगी और उनसे बातें करना तो आपको पसंद भी है|"


मैं तो सोच में पड़ गई कि क्या साक्षी अंकल को बता दी कि उस समय मैं बात कर रही थी। मेरे तो पसीने निकलने लगी थी।

मुझे सोच मे देख साक्षी कान में धीरे से बोली, "ओह भाभी, टेँशन क्यों लेती हो। मेरी फोन में ऑटो रिकॉर्डिंग होती है। उसी में सुनी हूँ… अंकल से अभी तक बात नहीं की हूँ। अगर आप कहोगी तो कर लूँगी वर्ना जाने दो। अब आप हो तो अंकल की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।"

साक्षी की बातें सुन ढेर सारा प्यार जग गई मेरे अंदर। खुद को संभालती हुई बोली, "बात कर लेना अंकल से और प्लीज मेरा नाम मत लेना। अब मम्मी जी आएगी तो मैं नीचे जा रही हूँ"।

"भाभी, एक बार अंकल से बात तो कर लो फिर चली जाना"
, साक्षी हंसती हुई मेरे शरीर से उठती हुई बोली।

मैं भी हँस के बोल पड़ी, "पहले तुम कर लो फिर बाद में मैं कर लूँगी।" तभी नीचे से मम्मी जी की आवाज सुनाई दी। मैं उठी और कपड़े ठीक कर के जाने लगी।

पीछे से साक्षी बोली, "और कुछ करने की इच्छा हुई तो बेहिचक दोस्त की तरह बताना। " मैं बिना कुछ बोले मुस्कुराती हुई नीचे आ गई।

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parkas

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Chapter-4
सुबह हमारी नींद देर से खुली। मैं जल्दी से फ्रेश हुई और किचन की तरफ चल दी। सोचा शायद साक्षी होगी तो उसे मनाने की कोशिश करूँगी। मगर वहाँ मम्मीजी और साक्षी दोनों साथ खाना बना रही थीं। मैं भी खाना बनाने में हाथ बँटाने लगी। इस दौरान साक्षी ने मेरी तरफ एक बार भी पलटकर देखा नहीं। मैंने भी वहाँ बात करने की ज्यादा कोशिश नहीं की।

किचन का काम खत्म कर मैं अपने रूम में आ गई। तब तक प्रमोद भी फ्रेश हो चुके थे। वे खाना खाकर निकल गए। 11 बजे तक सब खा चुके थे। मम्मीजी आराम करने अपने रूम में चली गईं। अब मैं साक्षी से बात करने की सोच रही थी।

मैं उठी और साक्षी के रूम की तरफ चल दी। मम्मी, पापा, प्रमोद और मैं नीचे रहते थे, जबकि साक्षी ऊपर बने कमरे में रहती थी। सीढ़ियाँ चढ़ती हुई मैं रूम तक पहुँची और दरवाजा खटखटाया अंदर से साक्षी की आवाज आई, "कौन?"

मैंने कहा, "साक्षी, मैं हूँ... दरवाजा खोलो", कुछ देर बाद दरवाजा खुला। मैं हल्के से गेट को धक्का देती हुई अंदर आई और दरवाजा बंद कर दिया।

अंदर का नजारा देखकर मैं चौंक गई। रूम की सजावट और हर एक चीज नई और लेटेस्ट थी। पूरे कमरे में टाइल्स लगी थीं, जिन पर एक कालीन बिछी थी। रूम की दीवारे कलरफूल, जिस पर तरह तरह के पेंटिंग्स लगे थे। दीवार पर नई स्मार्ट L.E.D. टीवी टंगी थी। रूम में फ्रिज, वॉटर प्यूरीफायर, ए.सी. और फैन सब कुछ नया था। काँच की टेबल पर लेटेस्ट नाइटलैंप रखा था। बेड देखकर मैं दंग रह गई, बड़ा सा आलीशान पलंग पर बहुत ही अच्छी क्वालिटी का मोटा गद्दा पर सुंदर सी बेडसीट बिछी थी। चार पांच अलग अलग साइज के तकिये रखे थे। ऐसी बेड मैंने आज तक छुई भी नहीं थी। रूम की सुगंध ने मानो मुझे स्वर्ग में पहुँचा दिया। मैं यह सब देखकर भूल गई थी कि यहाँ क्यों आई हूँ।

अचानक एल.ई.डी. से आवाज आने लगी और मेरी तंद्रा टूटी। देखा, साक्षी बेड पर बैठकर कोई धारावाहिक देखने लगी थी। मेरी तरफ देख भी नहीं रही थी। मैं चुपचाप उसके पास जाकर बेड पर बैठ गई। कुछ देर इंतजार किया कि वह मुझसे कुछ पूछेगी, लेकिन वह चुप थी। अंत में मैंने कहा, "साक्षी, हमसे बात नहीं करोगी?"

मैं उसके जवाब का इंतजार करने लगी, लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

मैं फिर बोली, "मैं तो एक दोस्त की तरह तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ। जो अच्छी बातें बताए, सुने और सुनाए, पर मुझे ऐसी दोस्त कभी नहीं मिली। कल जब तुमसे मिली, तो लगा कि मुझे जिसकी तलाश थी, वह अब पूरी हो गई।"

मैं बोलती रही, "कल जो हुआ, उसकी जिम्मेदार मैं ही हूँ। मुझे बिना पूछे फोन रिसीव नहीं करना चाहिए था। मैं सोच रही थी कि दोस्त की फोन है, रिसीव कर भी ली तो क्या होगा। पर मुझे नहीं पता था कि इससे किसी को ठेस पहुँचेगी। इसके लिए मुझे माफ कर दो। मैं वादा करती हूँ कि अब ऐसी गलती नहीं करूँगी।" ये बोलते बोलते मेरी आँखें भर आईं।

मैंने कहा, "अगर माफ नहीं करोगी, तो कोई बात नहीं। दोस्त न सही, भाभी से तो बात कर लो। शायद मेरे नसीब में दोस्ती नहीं है।"

यह कहते हुए मैं दरवाजा खोलकर बाहर निकलने लगी। तभी साक्षी पीछे से दौड़ती हुई आई और मुझसे लिपटकर रोने लगी।

मैं चौंक गई, धीरे-धीरे उसे शांत करने लगी और पूछा, "क्या हुआ? क्यों रो रही हो?"

साक्षी ने सुबकते हुए कहा, "सॉरी भाभी, मैं आपको गलत समझ रही थी। मुझे लगा कहीं आप किसी को बता न दें, मैं तो मर ही जाऊँगी।"

मैं मुस्कुराते हुए बोली, "इतनी पागल लगती हूँ क्या? दोस्त का काम परेशानी में डालना नहीं, बल्कि संभालना होता है। अब रोना बंद करो, फिर बात करेंगे।"

साक्षी को लेकर मैं वापस बेड की तरफ आई और उसे साथ लेकर बैठ गई। कुछ देर में वह चुप हो गई। फिर उठकर बाथरूम में गई, हाथ-मुँह धोकर फ्रेश हुई, और वापस आकर मेरे पास बैठ गई।

मुझे अचानक एक ख्याल आया। मैं उससे सट गई और एक हाथ उसकी बगल में ले जाकर हल्की गुदगुदी कर दी। साक्षी न चाहते हुए भी हँस पड़ी और हल्की उछल गई।

मैं भी हँसते हुए बोली, "देखो, हँसते हुए कितनी प्यारी लगती हो। कल शाम से ऐसा मुँह फुलाया हुआ था, जैसे किसी ने किडनी निकाल ली हो।"

अब मैं साक्षी से खुलकर बात करना चाहती थी, और उसे भी बेहिचक अपनी बातें कहने का मौका देना चाहती थी। मैंने उसे बाँहों में भर लिया और हम दोनों बेड पर आराम से पसर गए।

मैंने हँसते हुए पूछा, "क्यों साक्षी रानी? जरा हमें भी तो बताओ कि राजेंद्र अंकल में ऐसी क्या खास बात है, जो तुम उनकी दीवानी हो गई हो?"

साक्षी मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दी। उसकी मुस्कान ने माहौल को हल्का और खुशमिजाज बना दिया। साक्षी मेरे नीचे दबी मुस्कुरा रही थी। उसकी चुची मेरी चुची से दब रही थी, और मेरी होंठ लगभग सट रही थी। हम दोनों की साँसें आपस में टकरा रही थी।

साक्षी जब कुछ देर तक नहीं बोली तो मैंने अपनी नाक उसके होंठ पर रगड़ते हुए बोली, "अरे, कुछ तो बोलो! तुम कब और कहाँ उनसे मिलने जा रही हो?"

साक्षी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "मैं कहीं नहीं जा रही, भाभी।"

यह सुनकर मैं थोड़ी चौंक गई, "क्यों? ऐसा क्यों कह रही हो?"

साक्षी हँसते हुए बोली, "मैंने कब कहा कि मैं उनसे मिलने जाऊँगी? जो तुम्हें जाना हो, तुम जाओ!"

यह सुनकर हम दोनों ठहाका मारकर हँस पड़े, माहौल और हल्का हो गया।

मैंने हँसते हुए कहा, "सच में, साली, तुम्हें शर्म नहीं आती? भाभी को ऐसे बोलती हो! खुद तो फँसोगी ही, और मुझे भी फँसाओगी!"

साक्षी ने खिलखिलाते हुए जवाब दिया, "अरे भाभी, अंकल वैसे आदमी नहीं हैं जो किसी को बदनाम कर दें, वो पूरी तरह सुरक्षित हैं।"

मैंने उसकी बात को बीच में काटते हुए कहा, "रहने दे, मैं यहाँ ही खुश हूँ और हाँ, अंकल को बोल देना कि वह मुझ पर से अपना ध्यान हटा लें, क्योंकि मैं ऐसे चक्करों में कभी पड़ने वाली नहीं हूँ।"

साक्षी मेरी बात सुनकर हँस पड़ी और बोली, "मेरी भाभी, भारती डॉर्लिंग है ही इतनी प्यारी कि कोई भी उनके दीदार के लिए मचल जाए।"

मैं साक्षी की ऐसी रोमांचित बातें सुन आपा खो दी और अपने होंठ साक्षी की होंठ से सटा दी। साक्षी भी बिना किसी हिचक के साथ देने लगी। कुछ ही देर में साक्षी पूरी तरह से गर्म हो कर जोर से चूसने लगी। मेरी साँसे भी तेजी से चलने लगी थी पर पीछे नहीं हटना चाहती थी। अगले ही पल साक्षी अपनी बाहोँ में मुझे कसते हुए पलटी, अब मैं साक्षी के नीचे दबी थी। हाथ को उसने मेरी गर्दन के नीचे रखी थी जिससे मैं चाह कर भी होंठ नहीं हटा सकती थी।

अचानक एक हाथ खींच कर मेरी चुची पर रख दी। मैं चौंक गई और तेजी से अपने हाथ से उसकी हाथ पकड़ी पर हटा नहीं पाई क्योंकि मुझे भी अच्छा लग रहा था। साक्षी अब चूसने को साथ साथ मेरी चुची भी दबाने लगी। मैं तो आनंद को सागर में गोते लगा रही थी। दो दिन में तो मेरी जिंदगी बदल गई थी।

अचानक साक्षी होंठ को छोड़ दी और नीचे आ कर एक चुची को मुँह में कैद कर ली। मेरी तो आह निकल गई। ब्लॉउज के ऊपर से ही मेरी चुची की चुसाई और घिसाई जारी थी। मैं तो स्वर्ग में उड़ रही थी।

कुछ देर बाद साक्षी अपना मुँह मेरी चुची से हटाते हुए बोली, "भाभी आपको यकीन नहीं होगी कि आज मैं कितनी खुश हूँ, सच भाभी आप काफी अच्छी हो।"

मैंने साक्षी को ऊपर खिंची और उसकी होंठों को चूमते हुए बोली, " खुश तो मैं भी हूँ कि मुझे इतनी अच्छी दोस्त और प्यारी ननद मिली है। चल अब तो बता कि सारे लड़के मर गए थे क्या जो तूने अंकल से दोस्ती कर ली।"

“नहीं भाभी, कॉलेज में एक बॉयफ्रेंड भी है पर उसके साथ सिर्फ बात करती हूँ। पता है, जब सिर्फ बात करती हूँ तो सारा कॉलेज जान गया। अगर उसके साथ सेक्स की तो पता नहीं कौन-कौन जान जाएगा।”

" ऐसी बात है तो उसे छोड़ क्यों नहीं देती?”


साक्षी- "नहीं भाभी, अगर ब्रेकअप कर लूँगी तो रोज 10 लड़के मेरे पीछे पड़े रहेंगे। अभी तो कम से कम आराम से कॉलेज आ जा तो रही हूँ ना। जब तक कॉलेज है बात करूँगी, बाद में अलग हो जाऊंगी।"

बात कुछ हद तक तो सही ही कह रही थी।

"हम्म दिमाग तो बहुत चलती है, पर ऐसा करना तो धोखा देना होगा ना।"

साक्षी - "नहीं नहीं! मैं पहले ही बोल चुकी हूँ कि नो शादी, नो सेक्स"।

साक्षी हंसती हुई कहने लगी, "वो भी मेरे टाइप का ही है। उसे जब भी मन होती है तो सेक्स करने वाली को ले के चला जाता है।"

"चल ठीक है, कुछ भी करना पर बदनामी वाली कोई हरकत मत करना।"

"नहीं भाभी, मैं ऐसी वैसी कोई काम नहीं करती।"

"अच्छा, सच बता तो अंकल को चांस कैसे दे दी अपनी इस आम को चुसवाने के लिए?"
, मैं नीचे दबी ही साक्षी की चुची को मसलते हुए बोली।

"वो सब जाने दो, बस इतना जान लो कि राजेंद्र अंकल काफी अच्छे हैं। मैं उन्हें बचपन से ही काफी पसंद करती थी। जब कॉलेज जाने लगी तो देखी अंकल की नजरें भी कॉलेज के लड़कों जैसी ही मुझे निहारती थी। तो मैं भी हिम्मत कर के आगे बढ़ने लगी और एक दिन ऐसा हुआ कि मैं उनकी पूरी तरह दीवानी हो गई।” साक्षी अब मेरे सीने से लग के बोली जा रही थी और मैं उसकी पीठ सहला रही थी।

“साक्षी! एक बात और बता, अंकल जब चढ़ते होंगे तो कैसे संभाल पाती होगी तुम”, कहते हुए मैं हँस दी।

साक्षी भी हंसती हुई बोली, "एक बार तुम भी चढवा लो अंकल को फिर देखना कैसी संभालती हूँ।"

"ना-ना मुझे नहीं देखनी, मुफ्त में मारी जाउँगी।"

"भाभी, अंकल आपके कितने से दीवाने हैं ये तो अंकल से सुन ही चुकी हो। बस तुम हाँ कह दोगी तो फिर तुम भी दीवानी हो जाओगी और उनसे बातें करना तो आपको पसंद भी है|"


मैं तो सोच में पड़ गई कि क्या साक्षी अंकल को बता दी कि उस समय मैं बात कर रही थी। मेरे तो पसीने निकलने लगी थी।

मुझे सोच मे देख साक्षी कान में धीरे से बोली, "ओह भाभी, टेँशन क्यों लेती हो। मेरी फोन में ऑटो रिकॉर्डिंग होती है। उसी में सुनी हूँ… अंकल से अभी तक बात नहीं की हूँ। अगर आप कहोगी तो कर लूँगी वर्ना जाने दो। अब आप हो तो अंकल की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।"

साक्षी की बातें सुन ढेर सारा प्यार जग गई मेरे अंदर। खुद को संभालती हुई बोली, "बात कर लेना अंकल से और प्लीज मेरा नाम मत लेना। अब मम्मी जी आएगी तो मैं नीचे जा रही हूँ"।

"भाभी, एक बार अंकल से बात तो कर लो फिर चली जाना"
, साक्षी हंसती हुई मेरे शरीर से उठती हुई बोली।

मैं भी हँस के बोल पड़ी, "पहले तुम कर लो फिर बाद में मैं कर लूँगी।" तभी नीचे से मम्मी जी की आवाज सुनाई दी। मैं उठी और कपड़े ठीक कर के जाने लगी।

पीछे से साक्षी बोली, "और कुछ करने की इच्छा हुई तो बेहिचक दोस्त की तरह बताना। " मैं बिना कुछ बोले मुस्कुराती हुई नीचे आ गई।

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Nice and beautiful update....
 

Killer_king

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Chapter-5

शाम के 4 बज चुके थे। प्रमोद आए तो उन्हें नाश्ता दिया। वे रूम में बैठकर नाश्ता कर रहे थे। मम्मी जी नाश्ता करके पड़ोस वाली आंटी के यहाँ बैठी गप्पें मार रही थीं। तभी बाहर से किसी के बोलने की आवाज आई। वो प्रमोद को बुला रहा था। प्रमोद उनकी आवाज पहचान गए थे।

प्रमोद मुँह का निवाला जल्दी से अंदर करते हुए बोले- "हाँ अंकल, अंदर आइए ना, पटना से कब आए?"

इतना सुनते ही मेरी तो रूह कांप उठी। मैंने अनुमान लगा लिया कि शायद राजेंद्र अंकल आए हैं। तब तक अंकल अंदर आ गए। चूँकि मैं रूम में ही थी तो देख नहीं पाई, परंतु उनके पदचाप सुनकर मालूम पड़ गया था।

अंकल- "क्या बेटा? हर वक्त घर में ही घुसे रहते हो। मैं तो तुम्हारी शादी करके पछता रहा हूँ। मैं यहाँ आँगन तक आ गया हूँ और तुम हो कि अभी भी घर में ही हो।"

यह सुनकर हम दोनों की हँसी निकल पड़ी।

प्रमोद हँसते हुए बोले, "नहीं अंकल, अभी-अभी बाहर से आया हूँ। भूख लग गई थी तो नाश्ता कर रहा हूँ। आप बैठिए ना, मैं तुरंत आ रहा हूँ।"

अंकल- "हाँ हाँ बेटा, अब तो ऐसी ही 5 मिनट पर भूख लगेगी। चलो कोई बात नहीं, मैं बैठता हूँ।" अंकल भी हँसते हुए बोले और वहीं पड़ी कुर्सी खींचकर बैठ गए।

मेरी तो हँसी के मारे बुरी हालत हो रही थी। किसी तरह अपनी हँसी रोककर रखी थी।

अंकल कुछ देर बैठने के बाद पुनः पूछे- "साक्षी और भाभीजी (मम्मी) कहाँ गई हैं? दिखाई नहीं दे रही हैं।"

प्रमोद बोले- "अंकल, मम्मी अभी तुरंत ही आंटी के यहाँ गई हैं और साक्षी अपने कमरे में होगी, टीवी देख रही होगी।"

प्रमोद- "क्या जाएगी कम्पीटिशन की तैयारी करने! अभी से दिनभर टीवी से चिपकी रहती है।"

अंकल आश्चर्य और नाराजगी से मिश्रित आवाज में साक्षी को आवाज देकर बुलाने लगे। पर साक्षी शायद सो रही थी, जिस वजह से उसने कोई जवाब नहीं दिया।

तभी प्रमोद बोले, "रुकिए अंकल, मैं बुलवा देता हूँ," और प्रमोद हमें साक्षी को बुलाने कह दिए।

मैं तो डर और शर्म से पसीने पसीने होने लगी, पर क्या करती? मैंने साड़ी से अच्छी तरह शरीर को ढँक ली और लम्बी साँस खींचते हुए जाने के आगे बढ़ी। क्योंकि साक्षी के रूम तक जाने के लिए जिस तरफ से जाती उसी ओर अंकल बैठे थे।

मैं रूम से निकलते ही तेजी से जाने की सोच रही थी पर मेरे कदम बढ़ ही नहीं रही थी। ज्यों-ज्यों अंकल निकट आ रहे थे त्यों-त्यों मेरी जान लगभग जवाब दे रही थी। अंकल के निकट पहुँचते ही मेरी नजर खुद-ब-खुद उनकी तरफ घूम गई। चूँकि मैं घूँघट कर रखी थी जिस से उनके चेहरे नहीं देख पाई और ना ही वे देख पाए।

मैं तो सिर्फ उनके पेट तक के हिस्से को देख पाई। क्षण भर में ही मेरी नजर उनके पेट से होते हुए नीचे बढ़ गई और उनके लण्ड के उभारोँ तक जा पहुँची। मैं तो देख कर सन्न रह गई। अंकल एक सभ्य नेता की तरह कुरता-पाजामा पहने थे। लेकिन पाजामे मे उनका लण्ड लगभग पूरी तरह तनी हुई ठुमके लगा रही थी, जिसका उभार एकदम साफ-साफ दिख रही थी।

मैंने तुरंत नजर सीधी की और तेजी से आगे बढ़ गई। लगभग दौड़ते हुए साक्षी के कमरे तक जा पहुँची। कुछ क्षण यूँ ही रुकी रही फिर गेट खटखटाई। एक दो बार खटखटाने के बाद अंदर से साक्षी बोली, "आ रही हूँ।"

मैं गेट खुलने का इंतजार कर रही थी कि फिर से मेरी नजर नीचे बैठे अंकल की तरफ घूम गई। ओह गोड! ये क्या। अंकल अभी भी मेरी तरफ देख रहे थे और अब तो उनका एक हाथ लण्ड पर था। मैं जल्दी से नजर घुमा ली, कि तभी गेट खुली। मैं सट से अंदर घुस गई और बेड पर धम्म से बैठ के हांफने लगी।

साक्षी मेरी तरफ हैरानी से देख रही थी। उसकी आँखों में सवाल थे कि आखिर हुआ क्या है।
"क्या हुआ भाभी?" उसने जल्दी से मेरे पास आकर पूछा। उसकी आवाज में चिंता और उत्सुकता थी। मैंने गहरी साँस लेते हुए, अपने दिल की धड़कनों को काबू में किया और एक ही सुर में सारी बातें कह डालीं। साक्षी ने मेरी बातें सुनीं और तुरंत जोर से हँस पड़ी। मैं भी उसकी हँसी देखकर हल्के से मुस्कुरा दी।

तभी नीचे से अंकल की आवाज सुनाई दी, "साक्षी बेटा, जल्दी नीचे आओ, मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ।"

साक्षी ने लगभग चिल्लाते हुए जवाब दिया, "अंकल!, बस एक मिनट में आ रही हूँ।"

वह फिर मेरी तरफ मुड़ी और बोली, "चलो भाभी, अंकल से मिलते हैं।"

"नहीं-नहीं मैं यहीं रुकती हूँ, तुम जाओ"
, मैंने हड़बड़ाते हुए कहा।

"चलती हो या मैं यहीं अंकल को बुला लाऊँ?" उसने मजाकिया लेकिन धमकी भरे अंदाज में कहा।

उसकी बात सुनकर मैं घबरा गई और तुरंत हामी भर दी। मैं और साक्षी नीचे उतरे। साक्षी अंकल के पास जाकर बैठ गई, लेकिन मैं तो बिना रुके सीधे कमरे में चली गई। पीछे से साक्षी और अंकल की हँसी की आवाज आ रही थी। उनकी हँसी सुनकर मेरी भी हल्की मुस्कान आ गई।

प्रमोद तब तक नाश्ता खत्म कर चुके थे। बाहर जाने की तैयारी में वे हाथ-मुँह पोछ रहे थे। वह हमारी ओर देखकर मुस्कुराए, मानो बात का अंदाजा हो गया हो, और फिर निकल गए।
बाहर जाकर उन्होंने अंकल से कुछ कहा और जरूरी काम बताकर घर से चले गए।

अब अंकल और साक्षी पूरी तरह फ्री थे। दोनों आपस में बातें करने लगे। मैं उनकी बातें सुनने के लिए उत्सुक थी, लेकिन उनकी आवाज इतनी धीमी थी कि कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। मेरी बेचैनी बढ़ रही थी, लेकिन मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी।

कुछ समय, लगभग 10-15 मिनट के बाद, साक्षी मेरे कमरे में आई और बोली, "भाभी, बाहर चलो अंकल बुला रहे हैं।"

उसकी बात सुनते ही मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा, "किसलिए?" मैंने डर और हिचकिचाहट के साथ पूछा।

मेरी हालत देखकर साक्षी हँस पड़ी फिर बोली "चलो तो, मुझे थोड़े ही पता है किसलिए बुला रहे हैं। उन्होंने बुलाने को कहा, तो मैं आ गई।"

मैंने जिद की, "नहीं, पहले बताओ क्यों बुला रहे हैं, तभी जाऊँगी।"

साक्षी झुंझला गई, "तुम बेकार ही परेशान हो रही हो। कल वाली बात अंकल को नहीं पता। कोई और काम है, इसलिए बुला रहे हैं।"

कुछ देर तक मैं सोचती रही कि क्या करूँ। अंदर ही अंदर डर लग रहा था कि शायद कल की बात अंकल को पता चल गई हो। लेकिन साक्षी लगातार "प्लीज, प्लीज" करती रही। आखिरकार मैंने हार मान ली और चलने के लिए तैयार हो गई।

मैंने घूँघट सही किया और साक्षी के पीछे-पीछे चल पड़ी। पूरे रास्ते डर और अनिश्चितता से मेरा दिल धड़क रहा था। आखिरकार, हम अंकल के पास पहुँचे। मैंने उनके पैर छूकर प्रणाम किया और साक्षी के पीछे खड़ी हो गई। हम दोनों अंकल के दाएँ तरफ खड़ी थीं।

मेरा दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि मैं अपनी साँसों को भी सुन पा रही थी। तभी साक्षी ने सामने रखी कुर्सी पर बैठने का साहस दिखाया। अंकल के बाएँ और साक्षी के दाएँ तरफ एक और कुर्सी रखी थी, जो शायद पहले से मँगवाई गई थी। अब मुझे समझ आ गया था कि मुझे बीच में बैठाने की योजना थी। मैं अकेली खड़ी रही। शर्म और घबराहट से मेरा चेहरा तपने लगा।

तभी अंकल ने मजाकिया लहजे में कहा, "साक्षी, मैं तो अपनी बेटी से मिलने आया था, और तुम किसे ले आई हो?" साक्षी उनकी बात सुनकर हँस पड़ी लेकिन उसने कुछ जवाब नहीं दिया।

फिर अंकल ने कहा- "भारती बेटा, बुरा मत मानना, मैं तो मजाक कर रहा था। आओ, पहले बैठो, फिर बात करते हैं।"

यह कहते हुए अंकल अपनी जगह से उठे और मेरी बाजू पकड़कर मुझे कुर्सी तक ले गए।
मैं हक्की-बक्की रह गई। उनकी छुअन से मेरी रूह काँप गई। मैं चुपचाप कुर्सी पर बैठ गई।

अंकल ने कहा- "देखो बेटा, हम लोग एक ही घर के हैं। यहाँ पर्दा करने की जरूरत नहीं। पर्दा करना हो, तो दुनिया वालों के लिए करना। जैसे साक्षी मेरी लाडली बेटी है, वैसे ही तुम भी हो। अगर कभी मेरी जरूरत पड़े, तो बेहिचक कहना।"

उनकी बातों से मुझे थोड़ी राहत महसूस हुई। लेकिन अभी भी शर्म मुझे जकड़े हुए थी।

अंकल बोले, "अरे, मैं इतना कुछ बोल रहा हूँ, और तुम अब तक घूँघट किए बैठी हो, औरों के लिए बहू हो सकती हो, लेकिन हमारे लिए तो बेटी ही हो।"

इतना सुनकर साक्षी मेरी ओर आई और घूँघट हटाते हुए बोली, "क्या भाभी, अब तो शर्म छोड़ दो।" साक्षी फिर अपनी जगह पर जाकर बैठ गई।

मेरा चेहरा पसीने से तर-बतर हो गया था। अंकल ने अपनी जेब से रूमाल निकालकर मुझे दिया। "देखो, घूँघट रखने से कितना नुकसान होता है। इतनी खूबसूरत चेहरा पसीने से भीग गया। लो, इसे साफ कर लो।" उनकी बात पर मैं और ज्यादा शर्मिंदा हो गई। मैंने उनकी बात मानकर रूमाल लिया और चेहरा पोंछ लिया।

"गुड बेटा, अब थोड़ी हमारी बेटी जैसी लग रही हो," उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। उधर, साक्षी हमारी बातें सुनकर बस मुस्कुरा रही थी।

तभी मम्मीजी की आवाज आई, "क्या बातें हो रही हैं, देवर जी?" सबने पलटकर उनकी ओर देखा। मैं खड़ी हो गई।

अंकल ने कहा- "अरे, बेटी, तुम बैठो। साक्षी, कुर्सी ला दो।" मम्मीजी के बैठने के बाद सबने बातचीत शुरू की।

"भाभीजी, बहू आ गई तो आप गायब ही रहती हैं। अब तो बच्चों के साथ ही गप्पे लड़ाना पड़ेगा।" अंकल मम्मी को ताना देते हुए बोले।

तब तक साक्षी कुर्सी ला दी। मम्मी के बैठने के बाद मैं और साक्षी भी बैठ गई। मम्मी जी के साथ साथ हम सब भी अंकल की बातें सुन हँस पड़ी।

"भाभीजी, मैं अपनी बेटी को फुर्सत के अभाव में मुँह देखाई नहीं दे पाया। बस इसी कारण आते ही यहाँ आया हूँ, वर्ना आप तो ताने देते देते मेरी जान ले लेते।" अंकल मुस्कुरा कर अपनी सफाई देते हुए बोले।

अब मुझे पूरी तरह समझ में आ चुका था कि अंकल ने मुझे क्यों बुलाया था। माहौल अब हल्का और सहज हो चुका था।

मम्मी जी भी हँसते हुए बोलीं, "ही ही ही... आप अपनी बेटी को नहीं देंगे, ऐसा कभी हो सकता है क्या? अगर ऐसा सोचते भी, तो सच में आपकी जान ले लेती।" उनकी बात पर सब हँस पड़े।

सच कहूँ तो, मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि मेरे ससुराल में इतना अच्छा परिवार मिलेगा। मेरे ससुर जी और अंकल, दोनों ही भाई थे, लेकिन उनके चचेरे भाइयों में इतना प्यार और लगाव पहली बार देखने को मिला।

थोड़ी देर बाद, अंकल बाहर गए। वापस लौटे तो उनके हाथ में एक बड़ा-सा पैकेट था, जो शायद गेस्ट रूम में रखा हुआ था। उन्होंने पैकेट मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, "लो बेटा, मेरी तरफ से एक छोटी-सी भेंट। अगर पसंद न आए, तो बेझिझक बता देना, क्योंकि मैंने अपनी पसंद से लिया है।"

उनकी बात सुनकर मैं हल्का सा मुस्कुराई और शर्माते हुए पैकेट ले लिया। मैंने साक्षी की ओर देखा तो वह मुझे देखकर अब भी मुस्कुरा रही थी। उसकी मुस्कान से मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे वह सब कुछ पहले से जानती हो। मैंने नजरें चुराते हुए उसे इशारा किया कि अब चलें। साक्षी मेरी बात समझ गई।

वह खड़ी होते हुए बोली, "अंकल, आपलोग बात कीजिए, मैं चाय लाती हूँ। चलो भाभी..." उसके इतना कहते ही मैं जल्दी से खड़ी हुई और सीधे कमरे की ओर चल दी। साक्षी भी हँसते हुए मेरे पीछे आई।

जैसे ही हम कमरे में पहुँचे, साक्षी ने पीछे से मुझे गले लगा लिया और चहकते हुए बोली, "भाभी, प्लीज अभी पैकेट मत खोलना, जब मैं आ जाऊँ, तब खोलना। मैं भी देखूँगी, सो इसमें क्या है।"

उसकी बात सुनकर मेरी हँसी छूट गई। हँसते हुए मैंने कहा, "अच्छा ठीक है।"

साक्षी ने मेरे गालों पर एक हल्की-सी किस की और कमरे से बाहर चली गई। मैंने पैकेट को एक तरफ रखा और उसके लौटने तक इंतजार करने लगी। इस पूरे समय मेरे दिल में उत्सुकता थी कि आखिर इस पैकेट में ऐसा क्या हो सकता है।

पैकेट में क्या हो सकती है, यह सोचकर मैं खुद परेशान थी। पर मम्मी जी के सामने दिए थे तो कुछ राहत जरूर मिली कि कोई ऐसी-वैसी चीजें तो नहीं ही होगी। फिर भी मेरे अंदर एक अलग ही उत्सुकता थी जल्द से जल्द देखने की। पर ये साक्षी पता नहीं कहाँ मर गई थी। चाय बनाने गई या चूत मरवाने जो इतनी देर लगा रही है। किसी तरह मैं अपने मन को शांत कर रही थी।

तभी साक्षी धड़धड़ाती हुई अंदर आई और आते ही बोली, "भाभी अब जल्दी से खोल के दिखाओ।"

उसकी बातों पर मुझे थोड़ी शरारत सूझी.. होंठों पर कुटील मुस्कान लाते हुए पूछा, "क्या खोल के दिखाऊँ?

सुनते ही साक्षी आँख दिखाते हुए बोली, "कमीनी, अभी तो पैकेट खोलो और कुछ खोलने की इच्छा है तो अंकल को बुलाती हूँ, फिर खोलना।" कहते हुए साक्षी जाने के लिए मुड़ी कि मैं जल्दी से उसे पकड़ी।

"साक्षी की बच्ची, मार खाएगी अब तू। मैं तो यूँ ही मजाक कर रही थी और तुम तो सच मान गई, चल पैकेट खोलती हूँ।", उसे अपनी बाँहों में कसते हुए बोली।

साक्षी मेरी बातें सुन मुस्कुरा दी और वापस आने के लिए मुड़ गई। फिर हम दोनों बेड पर बैठ, बीच में पैकेट रख कर और उसकी सील हटाने लगी। सील हटते ही अंदर दो पैकेट थीं, साक्षी उसमें रखी एक पैकेट उठा ली, दूसरी पैकेट मैं उठा के, खाली पैकेट को साइड में कर दी।

"भाभी, पहले ये वाली खोलो।" साक्षी अपना पैकेट मुझे पकड़ाते हुए बोली।

मैं भी हंसती हुई पैकेट लेकर उसे खोलने लगी। मैं जानती थी अगर साक्षी को खोलने कहती तो वो कभी हाँ नहीं कहेगी। अब तक तो उसकी काफी चीजें मैं जान गई थी। ऐसी लड़की कभी घमंडी या खुदगर्ज नहीं होती। तभी तो मुझे साक्षी इतनी अच्छी लगने लगी थी।

पैकेट खुलते ही लाल रंग के कपड़े नजर आए। साक्षी जल्दी से उठा के देखने के लिए बेड पर रख खोलने लगी। पूरी तरह से खुलते ही हम दोनों की मुख से "Wowwwww!" निकल पड़ी।

यह बहुत ही खूबसूरत नेट वाली रेशम की लहंगा साड़ी थी। Red और Maroon कलर की थी, जिस पर तिरछी डाली की तरह गोल्ड कलर की डिजाइन बनी हुई थी। जिसके ऊपर stones से काम किया हुआ था, जो कि एक बिगुल की तरह लग रही थी। बॉर्डर पर काफी सुंदर Lace से काम किया हुआ था। कढ़ाई भी बहुत अच्छे से की हुई थी। ठीक से देखने पर भी कोई त्रुटि नहीं मिलती। मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं, इतने महँगे साड़ी को देख कर।

तभी साक्षी के हाथों में ब्लाउज देखा, जो कि देख के मंद-मंद मुस्कान दे रही थी। मैंने देखा तो एक बारगी शर्मा गई। ब्लाउज ऑफ-सोल्डर डिजाइन का था, जिस पर नाम मात्र की हल्की वर्क की हुई थी। बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। मैं तो ये सोचने लगी कि ऐसी ब्लाउज मैं गाँव में कैसे पहन सकती हूँ। मैं तो सोच के ही शर्मा गई।

तभी साक्षी हंसती हुई बोली "भाभी, इस ड्रेस में पूरी कयामत लगेगी। जो भी देखेगा, देखता ही रह जाएगा।"

"भाभी, जल्दी से एक बार पहन के दिखाओ ना। सच कहती हूँ, काफी सुंदर लगोगी।"

"नहीं, नहीं मुझे नहीं पहननी।"

"प्लीज भाभी, सिर्फ एक बार, फिर जल्दी से खोल देना,"
साक्षी गिड़गिड़ाते हुए मनाने लगी। साक्षी की इस प्यारी अदा को देख कर मुझे तो काफी हँसी आ रही थी।

फिर मैं हामी भरते हुए बोली, "अच्छा ठीक है, पर अभी दूसरी पैकेट बाकी है देखने के लिए। उसे भी देख लेते है, फिर पहन के दिखा दूँगी।"

"Thanks, भाभी"
, साक्षी कहते हुए जल्दी से साड़ी समेटने लगी। मैं भी साथ-साथ समेट कर उसी पैकेट में रख दी।

फिर दूसरी पैकेट खोलने के लिए बैठ गई। पहली पैकेट में तो इतनी अच्छी साड़ी मिली जो कि Latest डिजाइन और बहुत ही खूबसूरत के साथ-साथ काफी महँगी भी थी। अब इस पैकेट में कितनी अच्छी और कितनी महँगी होगी, मैं कितनी भी अनुमान लगाती तो वो विफल ही होती।

साक्षी और मैं दोनों काफी उत्सुक थे देखने के लिए। पैकेट खुलते ही मेरी तो आँखें चौंधिया गईं। साक्षी भी "Wowwww भाभी!" कहती हुई एक टक देख रही थी।

पैकेट चमचमाती गहने से भरी हुई थीं। साक्षी एक-एक कर गहने निकालने लगी। मैं तो सिर्फ निहारे ही जा रही थी। सारे गहने एक दम नई डिजाइन के थे। नेकलेस सेट तो देखने लायक था। गोल्ड मीनाकारी कलर की बहुत ही खूबसूरत हार थी, जिस पर बहुत ही फैन्सी वर्क की हुई थी। साथ में लटकी हुई छोटी-छोटी झुमकी और भी कयामत बना रही थीं। माँग टीका भी बहुत प्यारी था, जिस पर स्टोन और डायमंड जड़ी हुई थी। सोने की मध्यम सी मोटी मंगलसूत्र तो अद्भुत थी। एक पतली सी काफी सुन्दर सोने की कमरबंध, साथ ही कान के लिए 3 अलग-अलग डिजाइन की रिंग और हुप्स थीं। नाक की एक दम छोटी सी पिन, सभी उँगलियों के लिए अंगूठी, बहुत ही सुन्दर सी दो जोड़ी पायल तारीफ के काबिल थीं।

मैं तो हर एक चीज देख हैरान थी। ऐसा नहीं था कि मेरे पास ये सब नहीं थे, थे मगर इतनी सुंदर और महँगी नहीं थी।

मैं तो मंत्रमुग्ध हो एक टक देखे जा रही थी और ये सुनहले रंग की बहुत ही सुन्दर सी घड़ी देख तो मैं मचल सी गई। सच कहूँ तो मैं अब पूरी तरह से अंकल की दीवानी हो चुकी थी। कोई सगे भी इतनी महँगी गिफ्ट नहीं देता है।

मन तो कर रहा था कि अभी ये सारी गहने और कपड़े पहन के अंकल के बाँहों में जा गिरूँ। मगर इतनी जल्दी अगर कहती भी तो साक्षी जैसी लड़की कुछ और ही समझ लेती। भले ही अभी वो कुछ भी कह लेती, मगर वो तो मुझे एक चालू लड़की का नाम जरूर दे देती, जो सिर्फ दिखाने के लिए शरीफ बनती है। मन में ही अंकल के प्यार को कुछ दिनों के लिए दबा देने में ही भलाई थी।

अंत में एक चीज देख तो हम दोनों एक साथ चौंक पड़ी। फिर साक्षी हंसती हुई हाथ में उठा ली। ये एक दम नई मॉडल की लेटेस्ट स्मार्ट फोन थी। साक्षी जल्दी से फोन ऑन की; ऑन होते ही उसके चेहरे पर एक नाराजगी सी आ गई। उसने फोन मेरे हाथ में पकड़ा के बाहर निकल गई।

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parkas

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Chapter-5

शाम के 4 बज चुके थे। प्रमोद आए तो उन्हें नाश्ता दिया। वे रूम में बैठकर नाश्ता कर रहे थे। मम्मी जी नाश्ता करके पड़ोस वाली आंटी के यहाँ बैठी गप्पें मार रही थीं। तभी बाहर से किसी के बोलने की आवाज आई। वो प्रमोद को बुला रहा था। प्रमोद उनकी आवाज पहचान गए थे।

प्रमोद मुँह का निवाला जल्दी से अंदर करते हुए बोले- "हाँ अंकल, अंदर आइए ना, पटना से कब आए?"

इतना सुनते ही मेरी तो रूह कांप उठी। मैंने अनुमान लगा लिया कि शायद राजेंद्र अंकल आए हैं। तब तक अंकल अंदर आ गए। चूँकि मैं रूम में ही थी तो देख नहीं पाई, परंतु उनके पदचाप सुनकर मालूम पड़ गया था।

अंकल- "क्या बेटा? हर वक्त घर में ही घुसे रहते हो। मैं तो तुम्हारी शादी करके पछता रहा हूँ। मैं यहाँ आँगन तक आ गया हूँ और तुम हो कि अभी भी घर में ही हो।"

यह सुनकर हम दोनों की हँसी निकल पड़ी।

प्रमोद हँसते हुए बोले, "नहीं अंकल, अभी-अभी बाहर से आया हूँ। भूख लग गई थी तो नाश्ता कर रहा हूँ। आप बैठिए ना, मैं तुरंत आ रहा हूँ।"

अंकल- "हाँ हाँ बेटा, अब तो ऐसी ही 5 मिनट पर भूख लगेगी। चलो कोई बात नहीं, मैं बैठता हूँ।" अंकल भी हँसते हुए बोले और वहीं पड़ी कुर्सी खींचकर बैठ गए।

मेरी तो हँसी के मारे बुरी हालत हो रही थी। किसी तरह अपनी हँसी रोककर रखी थी।

अंकल कुछ देर बैठने के बाद पुनः पूछे- "साक्षी और भाभीजी (मम्मी) कहाँ गई हैं? दिखाई नहीं दे रही हैं।"

प्रमोद बोले- "अंकल, मम्मी अभी तुरंत ही आंटी के यहाँ गई हैं और साक्षी अपने कमरे में होगी, टीवी देख रही होगी।"

प्रमोद- "क्या जाएगी कम्पीटिशन की तैयारी करने! अभी से दिनभर टीवी से चिपकी रहती है।"

अंकल आश्चर्य और नाराजगी से मिश्रित आवाज में साक्षी को आवाज देकर बुलाने लगे। पर साक्षी शायद सो रही थी, जिस वजह से उसने कोई जवाब नहीं दिया।

तभी प्रमोद बोले, "रुकिए अंकल, मैं बुलवा देता हूँ," और प्रमोद हमें साक्षी को बुलाने कह दिए।

मैं तो डर और शर्म से पसीने पसीने होने लगी, पर क्या करती? मैंने साड़ी से अच्छी तरह शरीर को ढँक ली और लम्बी साँस खींचते हुए जाने के आगे बढ़ी। क्योंकि साक्षी के रूम तक जाने के लिए जिस तरफ से जाती उसी ओर अंकल बैठे थे।

मैं रूम से निकलते ही तेजी से जाने की सोच रही थी पर मेरे कदम बढ़ ही नहीं रही थी। ज्यों-ज्यों अंकल निकट आ रहे थे त्यों-त्यों मेरी जान लगभग जवाब दे रही थी। अंकल के निकट पहुँचते ही मेरी नजर खुद-ब-खुद उनकी तरफ घूम गई। चूँकि मैं घूँघट कर रखी थी जिस से उनके चेहरे नहीं देख पाई और ना ही वे देख पाए।

मैं तो सिर्फ उनके पेट तक के हिस्से को देख पाई। क्षण भर में ही मेरी नजर उनके पेट से होते हुए नीचे बढ़ गई और उनके लण्ड के उभारोँ तक जा पहुँची। मैं तो देख कर सन्न रह गई। अंकल एक सभ्य नेता की तरह कुरता-पाजामा पहने थे। लेकिन पाजामे मे उनका लण्ड लगभग पूरी तरह तनी हुई ठुमके लगा रही थी, जिसका उभार एकदम साफ-साफ दिख रही थी।

मैंने तुरंत नजर सीधी की और तेजी से आगे बढ़ गई। लगभग दौड़ते हुए साक्षी के कमरे तक जा पहुँची। कुछ क्षण यूँ ही रुकी रही फिर गेट खटखटाई। एक दो बार खटखटाने के बाद अंदर से साक्षी बोली, "आ रही हूँ।"

मैं गेट खुलने का इंतजार कर रही थी कि फिर से मेरी नजर नीचे बैठे अंकल की तरफ घूम गई। ओह गोड! ये क्या। अंकल अभी भी मेरी तरफ देख रहे थे और अब तो उनका एक हाथ लण्ड पर था। मैं जल्दी से नजर घुमा ली, कि तभी गेट खुली। मैं सट से अंदर घुस गई और बेड पर धम्म से बैठ के हांफने लगी।

साक्षी मेरी तरफ हैरानी से देख रही थी। उसकी आँखों में सवाल थे कि आखिर हुआ क्या है।
"क्या हुआ भाभी?" उसने जल्दी से मेरे पास आकर पूछा। उसकी आवाज में चिंता और उत्सुकता थी। मैंने गहरी साँस लेते हुए, अपने दिल की धड़कनों को काबू में किया और एक ही सुर में सारी बातें कह डालीं। साक्षी ने मेरी बातें सुनीं और तुरंत जोर से हँस पड़ी। मैं भी उसकी हँसी देखकर हल्के से मुस्कुरा दी।

तभी नीचे से अंकल की आवाज सुनाई दी, "साक्षी बेटा, जल्दी नीचे आओ, मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ।"

साक्षी ने लगभग चिल्लाते हुए जवाब दिया, "अंकल!, बस एक मिनट में आ रही हूँ।"

वह फिर मेरी तरफ मुड़ी और बोली, "चलो भाभी, अंकल से मिलते हैं।"

"नहीं-नहीं मैं यहीं रुकती हूँ, तुम जाओ"
, मैंने हड़बड़ाते हुए कहा।

"चलती हो या मैं यहीं अंकल को बुला लाऊँ?" उसने मजाकिया लेकिन धमकी भरे अंदाज में कहा।

उसकी बात सुनकर मैं घबरा गई और तुरंत हामी भर दी। मैं और साक्षी नीचे उतरे। साक्षी अंकल के पास जाकर बैठ गई, लेकिन मैं तो बिना रुके सीधे कमरे में चली गई। पीछे से साक्षी और अंकल की हँसी की आवाज आ रही थी। उनकी हँसी सुनकर मेरी भी हल्की मुस्कान आ गई।

प्रमोद तब तक नाश्ता खत्म कर चुके थे। बाहर जाने की तैयारी में वे हाथ-मुँह पोछ रहे थे। वह हमारी ओर देखकर मुस्कुराए, मानो बात का अंदाजा हो गया हो, और फिर निकल गए।
बाहर जाकर उन्होंने अंकल से कुछ कहा और जरूरी काम बताकर घर से चले गए।

अब अंकल और साक्षी पूरी तरह फ्री थे। दोनों आपस में बातें करने लगे। मैं उनकी बातें सुनने के लिए उत्सुक थी, लेकिन उनकी आवाज इतनी धीमी थी कि कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। मेरी बेचैनी बढ़ रही थी, लेकिन मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी।

कुछ समय, लगभग 10-15 मिनट के बाद, साक्षी मेरे कमरे में आई और बोली, "भाभी, बाहर चलो अंकल बुला रहे हैं।"

उसकी बात सुनते ही मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा, "किसलिए?" मैंने डर और हिचकिचाहट के साथ पूछा।

मेरी हालत देखकर साक्षी हँस पड़ी फिर बोली "चलो तो, मुझे थोड़े ही पता है किसलिए बुला रहे हैं। उन्होंने बुलाने को कहा, तो मैं आ गई।"

मैंने जिद की, "नहीं, पहले बताओ क्यों बुला रहे हैं, तभी जाऊँगी।"

साक्षी झुंझला गई, "तुम बेकार ही परेशान हो रही हो। कल वाली बात अंकल को नहीं पता। कोई और काम है, इसलिए बुला रहे हैं।"

कुछ देर तक मैं सोचती रही कि क्या करूँ। अंदर ही अंदर डर लग रहा था कि शायद कल की बात अंकल को पता चल गई हो। लेकिन साक्षी लगातार "प्लीज, प्लीज" करती रही। आखिरकार मैंने हार मान ली और चलने के लिए तैयार हो गई।

मैंने घूँघट सही किया और साक्षी के पीछे-पीछे चल पड़ी। पूरे रास्ते डर और अनिश्चितता से मेरा दिल धड़क रहा था। आखिरकार, हम अंकल के पास पहुँचे। मैंने उनके पैर छूकर प्रणाम किया और साक्षी के पीछे खड़ी हो गई। हम दोनों अंकल के दाएँ तरफ खड़ी थीं।

मेरा दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि मैं अपनी साँसों को भी सुन पा रही थी। तभी साक्षी ने सामने रखी कुर्सी पर बैठने का साहस दिखाया। अंकल के बाएँ और साक्षी के दाएँ तरफ एक और कुर्सी रखी थी, जो शायद पहले से मँगवाई गई थी। अब मुझे समझ आ गया था कि मुझे बीच में बैठाने की योजना थी। मैं अकेली खड़ी रही। शर्म और घबराहट से मेरा चेहरा तपने लगा।

तभी अंकल ने मजाकिया लहजे में कहा, "साक्षी, मैं तो अपनी बेटी से मिलने आया था, और तुम किसे ले आई हो?" साक्षी उनकी बात सुनकर हँस पड़ी लेकिन उसने कुछ जवाब नहीं दिया।

फिर अंकल ने कहा- "भारती बेटा, बुरा मत मानना, मैं तो मजाक कर रहा था। आओ, पहले बैठो, फिर बात करते हैं।"

यह कहते हुए अंकल अपनी जगह से उठे और मेरी बाजू पकड़कर मुझे कुर्सी तक ले गए।
मैं हक्की-बक्की रह गई। उनकी छुअन से मेरी रूह काँप गई। मैं चुपचाप कुर्सी पर बैठ गई।

अंकल ने कहा- "देखो बेटा, हम लोग एक ही घर के हैं। यहाँ पर्दा करने की जरूरत नहीं। पर्दा करना हो, तो दुनिया वालों के लिए करना। जैसे साक्षी मेरी लाडली बेटी है, वैसे ही तुम भी हो। अगर कभी मेरी जरूरत पड़े, तो बेहिचक कहना।"

उनकी बातों से मुझे थोड़ी राहत महसूस हुई। लेकिन अभी भी शर्म मुझे जकड़े हुए थी।

अंकल बोले, "अरे, मैं इतना कुछ बोल रहा हूँ, और तुम अब तक घूँघट किए बैठी हो, औरों के लिए बहू हो सकती हो, लेकिन हमारे लिए तो बेटी ही हो।"

इतना सुनकर साक्षी मेरी ओर आई और घूँघट हटाते हुए बोली, "क्या भाभी, अब तो शर्म छोड़ दो।" साक्षी फिर अपनी जगह पर जाकर बैठ गई।

मेरा चेहरा पसीने से तर-बतर हो गया था। अंकल ने अपनी जेब से रूमाल निकालकर मुझे दिया। "देखो, घूँघट रखने से कितना नुकसान होता है। इतनी खूबसूरत चेहरा पसीने से भीग गया। लो, इसे साफ कर लो।" उनकी बात पर मैं और ज्यादा शर्मिंदा हो गई। मैंने उनकी बात मानकर रूमाल लिया और चेहरा पोंछ लिया।

"गुड बेटा, अब थोड़ी हमारी बेटी जैसी लग रही हो," उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। उधर, साक्षी हमारी बातें सुनकर बस मुस्कुरा रही थी।

तभी मम्मीजी की आवाज आई, "क्या बातें हो रही हैं, देवर जी?" सबने पलटकर उनकी ओर देखा। मैं खड़ी हो गई।

अंकल ने कहा- "अरे, बेटी, तुम बैठो। साक्षी, कुर्सी ला दो।" मम्मीजी के बैठने के बाद सबने बातचीत शुरू की।

"भाभीजी, बहू आ गई तो आप गायब ही रहती हैं। अब तो बच्चों के साथ ही गप्पे लड़ाना पड़ेगा।" अंकल मम्मी को ताना देते हुए बोले।

तब तक साक्षी कुर्सी ला दी। मम्मी के बैठने के बाद मैं और साक्षी भी बैठ गई। मम्मी जी के साथ साथ हम सब भी अंकल की बातें सुन हँस पड़ी।

"भाभीजी, मैं अपनी बेटी को फुर्सत के अभाव में मुँह देखाई नहीं दे पाया। बस इसी कारण आते ही यहाँ आया हूँ, वर्ना आप तो ताने देते देते मेरी जान ले लेते।" अंकल मुस्कुरा कर अपनी सफाई देते हुए बोले।

अब मुझे पूरी तरह समझ में आ चुका था कि अंकल ने मुझे क्यों बुलाया था। माहौल अब हल्का और सहज हो चुका था।

मम्मी जी भी हँसते हुए बोलीं, "ही ही ही... आप अपनी बेटी को नहीं देंगे, ऐसा कभी हो सकता है क्या? अगर ऐसा सोचते भी, तो सच में आपकी जान ले लेती।" उनकी बात पर सब हँस पड़े।

सच कहूँ तो, मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि मेरे ससुराल में इतना अच्छा परिवार मिलेगा। मेरे ससुर जी और अंकल, दोनों ही भाई थे, लेकिन उनके चचेरे भाइयों में इतना प्यार और लगाव पहली बार देखने को मिला।

थोड़ी देर बाद, अंकल बाहर गए। वापस लौटे तो उनके हाथ में एक बड़ा-सा पैकेट था, जो शायद गेस्ट रूम में रखा हुआ था। उन्होंने पैकेट मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, "लो बेटा, मेरी तरफ से एक छोटी-सी भेंट। अगर पसंद न आए, तो बेझिझक बता देना, क्योंकि मैंने अपनी पसंद से लिया है।"

उनकी बात सुनकर मैं हल्का सा मुस्कुराई और शर्माते हुए पैकेट ले लिया। मैंने साक्षी की ओर देखा तो वह मुझे देखकर अब भी मुस्कुरा रही थी। उसकी मुस्कान से मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे वह सब कुछ पहले से जानती हो। मैंने नजरें चुराते हुए उसे इशारा किया कि अब चलें। साक्षी मेरी बात समझ गई।

वह खड़ी होते हुए बोली, "अंकल, आपलोग बात कीजिए, मैं चाय लाती हूँ। चलो भाभी..." उसके इतना कहते ही मैं जल्दी से खड़ी हुई और सीधे कमरे की ओर चल दी। साक्षी भी हँसते हुए मेरे पीछे आई।

जैसे ही हम कमरे में पहुँचे, साक्षी ने पीछे से मुझे गले लगा लिया और चहकते हुए बोली, "भाभी, प्लीज अभी पैकेट मत खोलना, जब मैं आ जाऊँ, तब खोलना। मैं भी देखूँगी, सो इसमें क्या है।"

उसकी बात सुनकर मेरी हँसी छूट गई। हँसते हुए मैंने कहा, "अच्छा ठीक है।"

साक्षी ने मेरे गालों पर एक हल्की-सी किस की और कमरे से बाहर चली गई। मैंने पैकेट को एक तरफ रखा और उसके लौटने तक इंतजार करने लगी। इस पूरे समय मेरे दिल में उत्सुकता थी कि आखिर इस पैकेट में ऐसा क्या हो सकता है।

पैकेट में क्या हो सकती है, यह सोचकर मैं खुद परेशान थी। पर मम्मी जी के सामने दिए थे तो कुछ राहत जरूर मिली कि कोई ऐसी-वैसी चीजें तो नहीं ही होगी। फिर भी मेरे अंदर एक अलग ही उत्सुकता थी जल्द से जल्द देखने की। पर ये साक्षी पता नहीं कहाँ मर गई थी। चाय बनाने गई या चूत मरवाने जो इतनी देर लगा रही है। किसी तरह मैं अपने मन को शांत कर रही थी।

तभी साक्षी धड़धड़ाती हुई अंदर आई और आते ही बोली, "भाभी अब जल्दी से खोल के दिखाओ।"

उसकी बातों पर मुझे थोड़ी शरारत सूझी.. होंठों पर कुटील मुस्कान लाते हुए पूछा, "क्या खोल के दिखाऊँ?

सुनते ही साक्षी आँख दिखाते हुए बोली, "कमीनी, अभी तो पैकेट खोलो और कुछ खोलने की इच्छा है तो अंकल को बुलाती हूँ, फिर खोलना।" कहते हुए साक्षी जाने के लिए मुड़ी कि मैं जल्दी से उसे पकड़ी।

"साक्षी की बच्ची, मार खाएगी अब तू। मैं तो यूँ ही मजाक कर रही थी और तुम तो सच मान गई, चल पैकेट खोलती हूँ।", उसे अपनी बाँहों में कसते हुए बोली।

साक्षी मेरी बातें सुन मुस्कुरा दी और वापस आने के लिए मुड़ गई। फिर हम दोनों बेड पर बैठ, बीच में पैकेट रख कर और उसकी सील हटाने लगी। सील हटते ही अंदर दो पैकेट थीं, साक्षी उसमें रखी एक पैकेट उठा ली, दूसरी पैकेट मैं उठा के, खाली पैकेट को साइड में कर दी।

"भाभी, पहले ये वाली खोलो।" साक्षी अपना पैकेट मुझे पकड़ाते हुए बोली।

मैं भी हंसती हुई पैकेट लेकर उसे खोलने लगी। मैं जानती थी अगर साक्षी को खोलने कहती तो वो कभी हाँ नहीं कहेगी। अब तक तो उसकी काफी चीजें मैं जान गई थी। ऐसी लड़की कभी घमंडी या खुदगर्ज नहीं होती। तभी तो मुझे साक्षी इतनी अच्छी लगने लगी थी।

पैकेट खुलते ही लाल रंग के कपड़े नजर आए। साक्षी जल्दी से उठा के देखने के लिए बेड पर रख खोलने लगी। पूरी तरह से खुलते ही हम दोनों की मुख से "Wowwwww!" निकल पड़ी।

यह बहुत ही खूबसूरत नेट वाली रेशम की लहंगा साड़ी थी। Red और Maroon कलर की थी, जिस पर तिरछी डाली की तरह गोल्ड कलर की डिजाइन बनी हुई थी। जिसके ऊपर stones से काम किया हुआ था, जो कि एक बिगुल की तरह लग रही थी। बॉर्डर पर काफी सुंदर Lace से काम किया हुआ था। कढ़ाई भी बहुत अच्छे से की हुई थी। ठीक से देखने पर भी कोई त्रुटि नहीं मिलती। मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं, इतने महँगे साड़ी को देख कर।

तभी साक्षी के हाथों में ब्लाउज देखा, जो कि देख के मंद-मंद मुस्कान दे रही थी। मैंने देखा तो एक बारगी शर्मा गई। ब्लाउज ऑफ-सोल्डर डिजाइन का था, जिस पर नाम मात्र की हल्की वर्क की हुई थी। बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। मैं तो ये सोचने लगी कि ऐसी ब्लाउज मैं गाँव में कैसे पहन सकती हूँ। मैं तो सोच के ही शर्मा गई।

तभी साक्षी हंसती हुई बोली "भाभी, इस ड्रेस में पूरी कयामत लगेगी। जो भी देखेगा, देखता ही रह जाएगा।"

"भाभी, जल्दी से एक बार पहन के दिखाओ ना। सच कहती हूँ, काफी सुंदर लगोगी।"

"नहीं, नहीं मुझे नहीं पहननी।"

"प्लीज भाभी, सिर्फ एक बार, फिर जल्दी से खोल देना,"
साक्षी गिड़गिड़ाते हुए मनाने लगी। साक्षी की इस प्यारी अदा को देख कर मुझे तो काफी हँसी आ रही थी।

फिर मैं हामी भरते हुए बोली, "अच्छा ठीक है, पर अभी दूसरी पैकेट बाकी है देखने के लिए। उसे भी देख लेते है, फिर पहन के दिखा दूँगी।"

"Thanks, भाभी"
, साक्षी कहते हुए जल्दी से साड़ी समेटने लगी। मैं भी साथ-साथ समेट कर उसी पैकेट में रख दी।

फिर दूसरी पैकेट खोलने के लिए बैठ गई। पहली पैकेट में तो इतनी अच्छी साड़ी मिली जो कि Latest डिजाइन और बहुत ही खूबसूरत के साथ-साथ काफी महँगी भी थी। अब इस पैकेट में कितनी अच्छी और कितनी महँगी होगी, मैं कितनी भी अनुमान लगाती तो वो विफल ही होती।

साक्षी और मैं दोनों काफी उत्सुक थे देखने के लिए। पैकेट खुलते ही मेरी तो आँखें चौंधिया गईं। साक्षी भी "Wowwww भाभी!" कहती हुई एक टक देख रही थी।

पैकेट चमचमाती गहने से भरी हुई थीं। साक्षी एक-एक कर गहने निकालने लगी। मैं तो सिर्फ निहारे ही जा रही थी। सारे गहने एक दम नई डिजाइन के थे। नेकलेस सेट तो देखने लायक था। गोल्ड मीनाकारी कलर की बहुत ही खूबसूरत हार थी, जिस पर बहुत ही फैन्सी वर्क की हुई थी। साथ में लटकी हुई छोटी-छोटी झुमकी और भी कयामत बना रही थीं। माँग टीका भी बहुत प्यारी था, जिस पर स्टोन और डायमंड जड़ी हुई थी। सोने की मध्यम सी मोटी मंगलसूत्र तो अद्भुत थी। एक पतली सी काफी सुन्दर सोने की कमरबंध, साथ ही कान के लिए 3 अलग-अलग डिजाइन की रिंग और हुप्स थीं। नाक की एक दम छोटी सी पिन, सभी उँगलियों के लिए अंगूठी, बहुत ही सुन्दर सी दो जोड़ी पायल तारीफ के काबिल थीं।

मैं तो हर एक चीज देख हैरान थी। ऐसा नहीं था कि मेरे पास ये सब नहीं थे, थे मगर इतनी सुंदर और महँगी नहीं थी।

मैं तो मंत्रमुग्ध हो एक टक देखे जा रही थी और ये सुनहले रंग की बहुत ही सुन्दर सी घड़ी देख तो मैं मचल सी गई। सच कहूँ तो मैं अब पूरी तरह से अंकल की दीवानी हो चुकी थी। कोई सगे भी इतनी महँगी गिफ्ट नहीं देता है।

मन तो कर रहा था कि अभी ये सारी गहने और कपड़े पहन के अंकल के बाँहों में जा गिरूँ। मगर इतनी जल्दी अगर कहती भी तो साक्षी जैसी लड़की कुछ और ही समझ लेती। भले ही अभी वो कुछ भी कह लेती, मगर वो तो मुझे एक चालू लड़की का नाम जरूर दे देती, जो सिर्फ दिखाने के लिए शरीफ बनती है। मन में ही अंकल के प्यार को कुछ दिनों के लिए दबा देने में ही भलाई थी।

अंत में एक चीज देख तो हम दोनों एक साथ चौंक पड़ी। फिर साक्षी हंसती हुई हाथ में उठा ली। ये एक दम नई मॉडल की लेटेस्ट स्मार्ट फोन थी। साक्षी जल्दी से फोन ऑन की; ऑन होते ही उसके चेहरे पर एक नाराजगी सी आ गई। उसने फोन मेरे हाथ में पकड़ा के बाहर निकल गई।

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Bahut hi badhiya update diya hai Killer_king bhai....
Nice and beautiful update....
 
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