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Serious _SHAAYAREE_

Niks96

A professional writer is amateur who didn't quit
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अंजाम ख़ुशी का दुनिया में सच कहते हो ग़म होता है
साबित है गुल और शबनम से जो हँसता है वो रोता है

हम शौक़ का नामा लिखते हैं के सब्र ऐ दिल क्यूँ रोता है
ये क्या तरकीब है ऐ ज़ालिम हम लिखते हैं तू धोता है

है दिल इक मर्द-ए-आख़िर-बीं अपने आमाल पर रोता है
गर डूब के देखो अश्क नहीं मोती से कुछ ये पिरोता है

घर इस से इश्क़ का बनता है दिल सख़्ती से क्यूँ घबराए
शीरीं ये महल उठवाती है फ़रहाद ये पत्थर ढोता है

ठुकरा कर नाश हर ईसा कहता है नाज़ से हो बरहम
उठ जल्द खड़े हैं देर से हम किन नींदों ग़ाफ़िल होता है

हम रो-रो अश्क बहाते हैं वो तूफ़ाँ बैठे उठाते हैं
यूँ हँस हँस कर फ़रमाते हैं क्यूँ मर्द का नाम डुबोता है

क्या संग-दिली है उल्फ़त में हम जिस की जान से जाते हैं
अनजान वो बन कर कहता है क्यूँ जान ये अपनी खोता है

ले दे के सारे आलम में हम-दर्द जो पूछो इक दिल है
मैं दिल के हाल पे रोता हूँ दिल मेरे हाल पे रोता है

दुख दर्द ने ऐसा ज़ार किया इक गाम भी चलना दूभर है
चलिए तो जिस्म-ए-ज़ार अपना ख़ुद राह में काँटे बोता है

वो उमंग कहाँ वो शबाब कहाँ हुए दोनों नज़्र-ए-इश्क़-मिज़ा
पूछो मत आलम दिल का मेरे नश्तर सा कोई चुभोता है

अब्दुल ग़फ़ूर 'शहबाज़'
 
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"मैं अपना अज़्म लेकर मंज़िलों की सम्त निकला था

मशक्कत हाथ पे रक्खी थी, क़िस्मत घर पे रक्खी थी..."

 

Niks96

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वो जरा सा मुझसे छोटी थी

उसका माथा ... मेरे होंठो तक आता था
 

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वो थक गई थी....
भीड़ मे चलते हुए...

उसके बदन पर....
बहुत सी निगाहो का बोझ था...
 

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ये दिल ख्वाइशों में अटका रहा,

और "ज़िन्दगी" हमे जी कर चली गयी....
 
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जिंदगी में कुछ पाना हो
तो खुद पर ऐतबार रखना,
सोच पक्की और क़दमों में रफ़्तार रखना !
सफलता मिल जाएगी एक दिन निश्चित ही तुम्हें,
बस खुद को आगे बढ़ने के लिए तैयार रखना !
 
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ठोकरें अपना काम करेंगी,
तू अपना काम करता चल ...
वो गिराएंगी बार बार,
तू उठकर फिर से चलता चल ...

हर वक्त, एक ही रफ्तार से,
दौड़ना कतई जरुरी नहीं तुम्हारा ...
मौसम की प्रतिकूलता हो,
तो बेशक थोड़ा सा ठहरता चल ...

अपने से भरोसा न हटे,
बस ये ध्यान रहे तुम्हें सदा ...
नकारात्मक ख्याल दूर रहे तुझसे,
उनसे थोड़ा संभलता चल ...

पसीने की पूंजी लूटाकर,
दिन रात मंजिल की राह में ...
दिल के ख़्वाबों को,
जमीनी हकीकत में बदलता चल ...
 
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मैं गजल हूँ मुझे जब आप सुना करते हैं
चंद लम्हे मेरा गम बाँट लिया करते हैं

लोग चाहत की किताबों में छिपा कर चेहरे
सिर्फ ज़िस्मों की ही तहरीर पढा करते हैं

लोग नफरतों की फजाओं में भी जी लेते हैं
हम मोहब्बत की हवा से भी डरा करते हैं

अपने बच्चो के लिए लाख गरीबी हो मगर
माँ के पल्लू में कई सिक्के मिला करते हैं

जिनके जज्बात हों नुकसान नफा की जद में
उनके दिल में कई बाजार सजा करते हैं

फिक्र-ओ-एहसास पे पर्दा है हया का वरना
हम गलत बात न सुना न कहा करते हैं

-लता हया
 
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सवाल ये था की चाय में चीनी कितनी लोगे,

उन्होंने जवाब दिया सिर्फ दो घूंट पी कर दे दीजिये
 
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मेरे क़त्ल की कोशिश तो उनकी निगाहों ने की थी मगर अदालत ने उन्हें हथियार मानने से ही इनकार कर दिया।
 
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