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Incest विक्रम की जागीर बहु नव्या

mastmast123

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सुबह की नमी और शब्दों का संभोग
स्थान: कोठी का पिछला आंगन (तुलसी का चौरा)
समय: सुबह ८:१५ बजे
रात के उस 'महा-विस्फोट' के बाद की सुबह और भी भारी थी। नव्या नहा-धोकर, मस्तक पर हल्दी का तिलक लगाए और बदन पर एक कसी हुई नारंगी साड़ी लपेटे तुलसी के चौरे के पास जल चढ़ा रही थी। पर आज उसकी चाल में वह 'सावित्री' वाला अनुशासन कम और एक मदहोश नागिन की लचक ज्यादा थी। उसे पता था कि पीछे बरामदे में बैठे विक्रम सिंह की नज़रें उसके हर उभार को साड़ी के पार भी 'नग्न' देख रही हैं।
विक्रम सिंह के चेहरे पर आज एक अजीब सी विजय वाली चमक थी। उन्होंने अखबार मेज पर पटका और अपनी भारी, कामुक आवाज़ में सन्नाटा तोड़ा।
विक्रम सिंह: "आज तुलसी में जल कुछ ज्यादा ही चढ़ाया जा रहा है नव्या? लगता है रात की 'तपन' अभी तक शांत नहीं हुई... या फिर अंदर कहीं ऐसी आग लगी है जिसे बुझाने के लिए ये लोटा छोटा पड़ रहा है?"
नव्या का हाथ ठिठका, पर उसने नज़रें नहीं उठाईं। रात को जो विकराल मूसल उसने झिरी से देखा था, उसकी छवि उसकी आँखों के सामने नाच गई। उसने पलौटकर ससुर की आँखों में सीधे झाँका—आज डर नहीं, एक चुनौती थी।
नव्या: (अपने भीगे होंठों पर जीभ फेरते हुए) "आग जब कोठी के भीतर ही सुलग रही हो बाबूजी, तो बाहर जल चढ़ाने से क्या होगा? और तपन तो तब शांत हो जब 'बुझाने वाला' अपनी सीमा में रहे। आप तो रात भर खुद ही किसी 'मूसल' की तरह अपनी प्यास से लड़ रहे थे, मैंने सुना था कि रात को आपकी नींद कुछ ज्यादा ही उखड़ी हुई थी।"
विक्रम सिंह का दिल धक से रह गया। नव्या का 'मूसल' शब्द का प्रयोग करना साफ़ इशारा था कि उसने कुछ देख लिया है। उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फ़ैल गई।
विक्रम सिंह: "नीद तो तब आए जब आँखों के सामने वह 'लाल चुनरी' वाला मंज़र न हो। और मेरा वह 'मूसल'... वह तो अब उस 'कुंड' की गहराई नापने के लिए उतावला है जिसे तुमने सुबह-सुबह खुले आम दिखाया था। क्या करूँ नव्या, उसकी जिद्द के आगे मैं भी हार जाता हूँ। वह कहता है कि जब तक उस 'कंटीली' बाड़ को नहीं तोड़ेगा, उसे चैन नहीं आएगा।"
नव्या ने खाली लोटा कमर पर टिकाया, जिससे उसकी भारी गांड़ एक तरफ को तन गई। उसने एक अदा के साथ अपने बालों को पीछे झटका।
नव्या: (द्विअर्थी अंदाज़ में) "जिद्द तो बुरी बला है बाबूजी। पर याद रखियेगा, बाड़ 'कंटीली' है... अगर बिना इजाजत हाथ लगाया तो खून भी निकल सकता है। हाँ, आप अपनी आँखों से जितना चाहें उतना 'दोहन' कर लीजिये। दूध वही अच्छा जो बिना थन छुए नज़रों से पी लिया जाए। क्या आपकी प्यास सिर्फ 'देखने' से नहीं बुझती? या फिर आपको उस 'विकराल औजार' के लिए कोई और ही काम चाहिए?"
विक्रम सिंह: (कुर्सी पर अकड़ते हुए) "देखने से तो सिर्फ भूख बढ़ती है नव्या। असली सुख तो उस 'मंथन' में है जिससे अमृत निकलता है। तू चाहे जितना भी 'छूना मना है' की तख्ती टांग ले, पर तेरी आँखों की ये नमी बता रही है कि रात को तूने भी उस 'मूसल' की मार को ख्यालों में महसूस किया है। बता न... क्या वह खयाल उस 'लाल कपड़े' में तुझे सुहाग की याद नहीं दिला रहा था?"
नव्या का बदन सिहर उठा। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को सीने पर और कसा, पर उसकी उभरी हुई छाती ससुर की आँखों को जवाब दे रही थी।
नव्या: "सुहाग की सेज तो दूर की बात है बाबूजी, अभी तो आपको इसी 'दर्शन' पर गुजारा करना होगा। आप अपनी उस 'जागीर' को संभाल कर रखिये, कहीं ऐसा न हो कि मर्यादा की आग में वह जलकर राख हो जाए। मैं तो सावित्री हूँ... सिर्फ नज़रों से जलाना जानती हूँ।"
वह मटकती हुई रसोई की ओर बढ़ गई, पर जाते-जाते पीछे की ओर एक ऐसी नज़र डाल गई जिसने विक्रम सिंह के लन्ड में फिर से जान फूंक दी। दोनों के बीच स्पर्श की दीवार अभी भी खड़ी थी, पर शब्दों के जरिए वे एक-दूसरे को नंगा करके भोग रहे थे।
नव्या रसोई की दहलीज तक जाकर अचानक ठिठक गई। उसने एक गहरी सांस ली, जिससे उसकी नारंगी साड़ी में कसे हुए बोबे बाहर निकलने को बेताब हो उठे। वह धीरे से पलटी और अपनी कमर पर हाथ रखकर, तिरछी नजरों से विक्रम सिंह को देखने लगी। उसकी आँखों में अब वह 'बहू' वाली शर्म नहीं, बल्कि एक शिकारी की शोखी थी।
नव्या: (मुस्कुराते हुए) "बाबूजी, एक बात कहना तो भूल ही गई। रात को जिस 'नाग' को आप अपने हाथ में थामे फुफकार रहे थे, उसे इतना खुला न छोड़ें। वह बहुत खतरनाक लग रहा था। कहीं ऐसा न हो कि अपनी फुफकार के नशे में वह किसी ऐसे 'बिल' में घुसने की कोशिश कर बैठे, जिसकी गहराई नापने की उसे इजाजत नहीं है।"
विक्रम सिंह ने चाय का घूंट भरा और अपनी मूंछों पर ताव देते हुए नव्या के बदन के एक-एक उतार-चढ़ाव को अपनी आँखों से चाटने लगे।
विक्रम सिंह: "बिल अगर इतना रसीला और तंग हो नव्या, तो नाग अपनी जान की परवाह नहीं करता। और वह कोई मामूली सांप नहीं है, वह तो 'काल' है। उसे बिल की गहराई से डर नहीं लगता, उसे तो बस उस 'गर्मी' की तलाश है जो आज सुबह तेरे उस गीले बदन से छूट रही थी। तूने उसे खुली आँखों से देख लिया है, अब वह शांत नहीं बैठेगा।"
नव्या ने अपने गुलाबी होंठों को फिर से दाँतों तले दबाया और अपनी गांड़ को थोड़ा और पीछे की ओर मटकाया।
नव्या: "गर्मी तो बिल में बहुत है बाबूजी, पर उस बिल के मुहाने पर मर्यादा के पत्थर रखे हैं। आपका वह नाग चाहे जितना भी विकराल हो जाए, उन पत्थरों से टकराकर अपना सिर ही फोड़ेगा। और सुनिए, वह जो आप 'अमृत' की बातें कर रहे थे... उसे अपनी मुट्ठी में ही कैद रखिये। उसे फर्श पर बहाना शोभा नहीं देता, वह तो किसी 'पवित्र कलश' की अमानत है।"
विक्रम सिंह की आँखों में अश्लीलता का सैलाब उमड़ पड़ा। उन्होंने अपनी कुर्सी को थोड़ा आगे खिसकाया।
विक्रम सिंह: "कलश तो तू ही है नव्या... पर तूने उस पर 'छूना मना है' की मुहर लगा रखी है। पर तू भूल रही है, नाग को छूने की ज़रूरत नहीं होती, वह तो अपनी ज़हरीली फुफकार और नज़रों से ही शिकार को अधमरा कर देता है। और जो तूने रात को झिरी से मेरा वह 'औजार' देखा है, वह अब तेरे सपनों में भी बिल खोदने आएगा। बता न... क्या उसे देखकर तेरी उस 'कंटीली चूत' में खुजली नहीं हुई? क्या तुझे यह नहीं लगा कि काश यह पत्थर की दीवार अभी गिर जाए और वह नाग सीधे अपनी मंजिल पा ले?"
नव्या का चेहरा तप उठा, पर वह हटी नहीं। उसने एक कदम और आगे बढ़ाया, इतनी करीब कि विक्रम सिंह को उसके जिस्म की मांसल महक आने लगी।
नव्या: "खुजली तो उसे भी होती है बाबूजी, जो प्यासा हो और सामने समंदर दिख रहा हो। पर मैं वो दरिया हूँ जो सिर्फ सुमित के लिए बहता है। आप बस किनारे बैठकर उसकी लहरें देखिये और अपने उस 'विकराल मूसल' को हाथ से सहलाकर मन बहला लीजिये। क्योंकि इस बिल का दरवाजा तो बंद ही रहेगा, चाहे आपका नाग कितना ही फन क्यों न पटक ले।"
इतना कहकर नव्या ने एक जोरदार ठुमका लगाया, जिससे उसके तरबूज जैसे गांड़ के दोनों हिस्से साड़ी के नीचे एक-दूसरे को मसल गए, और वह खिलखिलाती हुई अंदर चली गई। विक्रम सिंह वहीं बैठे अपनी धोती के भीतर उस पत्थर हो चुके अंग को संभालते रह गए। उन्हें पता था कि नव्या उन्हें तड़पा रही है, पर उस तड़प में जो मज़ा था, वह दुनिया के किसी और सुख में नहीं था।
खिड़की का उलटफेर और नग्न गुणगान
स्थान: नव्या का शयनकक्ष / गलियारा
समय: रात के २:१५ बजे
आज रात फिजाओं में वासना की नमी कुछ ज्यादा ही भारी थी। नव्या के बदन में रात के उस 'दर्शन' ने ऐसी आग सुलगा दी थी कि वह कमरे की ठंडक में भी पसीने से नहा रही थी। उसे लगा कि बाबूजी अपने कमरे में अपने उसी विकराल मूसल की सेवा में व्यस्त होंगे, जैसा उन्होंने कल किया था। इसी बेफिक्री और चरम उत्तेजना में नव्या ने अपनी साड़ी, पेटीकोट और चोली उतारकर फेंक दी।
वह अपने कमरे में पूरी तरह नग्न होकर किसी मदहोश हिरणी की तरह टहल रही थी। मद्धम दूधिया रोशनी में उसके विशाल और रसीले बोबे और उसकी भारी गांड़ के मांसल पट अपनी पूरी नग्नता के साथ चमक रहे थे। वह अपनी जांघों के बीच हाथ फेरते हुए और अपनी चूत के गीलेपन को महसूस करते हुए जोर-जोर से बड़बड़ा रही थी।
नव्या: (सिसकते हुए और बदन को मरोड़ते हुए) "ओह... बाबूजी! क्या चीज़ पाल रखी है आपने अपनी धोती के नीचे। वह खूंखार काला लन्ड... जब से देखा है, मेरी इस चूत ने पानी छोड़ना बंद नहीं किया। मेरा सुमित तो इसके सामने कुछ भी नहीं है। हाय! वह विकराल अंग अगर एक बार मेरी इन फांकों को चीरता हुआ अंदर घुस जाए, तो मैं तो पागल ही हो जाऊँगी।"
उसी वक्त, विक्रम सिंह बाथरूम जाने के लिए अपने कमरे से बाहर निकले। गलियारे से गुजरते वक्त उनकी नज़र अचानक नव्या के कमरे की उसी खिड़की की झिरी पर पड़ी, जहाँ से कल नव्या ने उन्हें देखा था। उन्होंने ठिठक कर एक नज़र अंदर मारी और उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
अंदर का दृश्य किसी महा-विस्फोट से कम नहीं था। उनकी 'सावित्री' बहू पूरी तरह निर्वस्त्र होकर अपना ही बदन मसल रही थी और उनके मूसल के कसीदे पढ़ रही थी।
नव्या: (अपने बोबों को दोनों हाथों से भींचते हुए) "बाबूजी... कहाँ छुपा कर रखा था आपने यह कामुक औजार? इसे देखकर तो पत्थर भी पिघल जाए। मेरा मन कर रहा है कि इसे अभी अपने मुँह में भर लूँ और इसका सारा जहर पी जाऊँ। आप कह रहे थे न कि मैं आपकी 'कामधेनु' हूँ... तो आइये न, अपने उस हथियार से मेरी इस जवानी का शिकार कीजिये। मेरी यह गांड़... ये तरबूज... ये सब आपके उस विकराल लन्ड की मार सहने के लिए तड़प रहे हैं।"
खिड़की के बाहर खड़े विक्रम सिंह का बुरा हाल था। उनकी धोती के भीतर उनका मूसल फिर से पत्थर की तरह सख्त हो गया और नसें उभर आईं। अपनी बहू के मुँह से अपने 'अंग' की ऐसी अश्लील तारीफ सुनकर उनका पोर-पोर कांपने लगा।
विक्रम सिंह (बाहर से बुदबुदाते हुए): "ओह... मेरी कंटीली नागिन! तो तुझे मेरा वह मूसल इतना पसंद आया है? तू अंदर नंगी होकर मेरा नाम जप रही है और मैं बाहर अपनी प्यास से लड़ रहा हूँ। देख ले... देख ले अपनी इस बेबसी को, क्योंकि अब ये आँखें तुझे सिर्फ देख कर नहीं मानेंगी।"
नव्या अपनी ही धुन में अपनी चूत पर उंगलियां चला रही थी, वह ससुर के शब्दों को याद कर-कर के और भी उत्तेजित हो रही थी। वह बार-बार अपनी पीठ फेरकर अपनी भारी गांड़ आईने में देख रही थी और कल्पना कर रही थी कि उस पर ससुर के थप्पड़ और उनके लन्ड की मार पड़ रही है।
विक्रम सिंह वहीं बुत बनकर अपनी बहू के उस नग्न तांडव को देख रहे थे। आज पासा पलट चुका था। कल उसने देखा था, आज वह देख रहे थे। और इस 'देखने' ने कोठी की मर्यादा की अंतिम ईंट को भी हिलाकर रख दिया था।
सुबह की नमी और शब्दों का संभोग

स्थान: कोठी का पिछला आंगन (तुलसी का चौरा)

समय: सुबह ८:१५ बजे

रात के उस 'महा-विस्फोट' के बाद की सुबह और भी भारी थी। नव्या नहा-धोकर, मस्तक पर हल्दी का तिलक लगाए और बदन पर एक कसी हुई नारंगी साड़ी लपेटे तुलसी के चौरे के पास जल चढ़ा रही थी। पर आज उसकी चाल में वह 'सावित्री' वाला अनुशासन कम और एक मदहोश नागिन की लचक ज्यादा थी। उसे पता था कि पीछे बरामदे में बैठे विक्रम सिंह की नज़रें उसके हर उभार को साड़ी के पार भी 'नग्न' देख रही हैं।

विक्रम सिंह के चेहरे पर आज एक अजीब सी विजय वाली चमक थी। उन्होंने अखबार मेज पर पटका और अपनी भारी, कामुक आवाज़ में सन्नाटा तोड़ा।

विक्रम सिंह: "आज तुलसी में जल कुछ ज्यादा ही चढ़ाया जा रहा है नव्या? लगता है रात की 'तपन' अभी तक शांत नहीं हुई... या फिर अंदर कहीं ऐसी आग लगी है जिसे बुझाने के लिए ये लोटा छोटा पड़ रहा है?"

नव्या का हाथ ठिठका, पर उसने नज़रें नहीं उठाईं। रात को जो विकराल मूसल उसने झिरी से देखा था, उसकी छवि उसकी आँखों के सामने नाच गई। उसने पलौटकर ससुर की आँखों में सीधे झाँका—आज डर नहीं, एक चुनौती थी।

नव्या: (अपने भीगे होंठों पर जीभ फेरते हुए) "आग जब कोठी के भीतर ही सुलग रही हो बाबूजी, तो बाहर जल चढ़ाने से क्या होगा? और तपन तो तब शांत हो जब 'बुझाने वाला' अपनी सीमा में रहे। आप तो रात भर खुद ही किसी 'मूसल' की तरह अपनी प्यास से लड़ रहे थे, मैंने सुना था कि रात को आपकी नींद कुछ ज्यादा ही उखड़ी हुई थी।"

विक्रम सिंह का दिल धक से रह गया। नव्या का 'मूसल' शब्द का प्रयोग करना साफ़ इशारा था कि उसने कुछ देख लिया है। उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फ़ैल गई।

विक्रम सिंह: "नीद तो तब आए जब आँखों के सामने वह 'लाल चुनरी' वाला मंज़र न हो। और मेरा वह 'मूसल'... वह तो अब उस 'कुंड' की गहराई नापने के लिए उतावला है जिसे तुमने सुबह-सुबह खुले आम दिखाया था। क्या करूँ नव्या, उसकी जिद्द के आगे मैं भी हार जाता हूँ। वह कहता है कि जब तक उस 'कंटीली' बाड़ को नहीं तोड़ेगा, उसे चैन नहीं आएगा।"

नव्या ने खाली लोटा कमर पर टिकाया, जिससे उसकी भारी गांड़ एक तरफ को तन गई। उसने एक अदा के साथ अपने बालों को पीछे झटका।

नव्या: (द्विअर्थी अंदाज़ में) "जिद्द तो बुरी बला है बाबूजी। पर याद रखियेगा, बाड़ 'कंटीली' है... अगर बिना इजाजत हाथ लगाया तो खून भी निकल सकता है। हाँ, आप अपनी आँखों से जितना चाहें उतना 'दोहन' कर लीजिये। दूध वही अच्छा जो बिना थन छुए नज़रों से पी लिया जाए। क्या आपकी प्यास सिर्फ 'देखने' से नहीं बुझती? या फिर आपको उस 'विकराल औजार' के लिए कोई और ही काम चाहिए?"

विक्रम सिंह: (कुर्सी पर अकड़ते हुए) "देखने से तो सिर्फ भूख बढ़ती है नव्या। असली सुख तो उस 'मंथन' में है जिससे अमृत निकलता है। तू चाहे जितना भी 'छूना मना है' की तख्ती टांग ले, पर तेरी आँखों की ये नमी बता रही है कि रात को तूने भी उस 'मूसल' की मार को ख्यालों में महसूस किया है। बता न... क्या वह खयाल उस 'लाल कपड़े' में तुझे सुहाग की याद नहीं दिला रहा था?"

नव्या का बदन सिहर उठा। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को सीने पर और कसा, पर उसकी उभरी हुई छाती ससुर की आँखों को जवाब दे रही थी।

नव्या: "सुहाग की सेज तो दूर की बात है बाबूजी, अभी तो आपको इसी 'दर्शन' पर गुजारा करना होगा। आप अपनी उस 'जागीर' को संभाल कर रखिये, कहीं ऐसा न हो कि मर्यादा की आग में वह जलकर राख हो जाए। मैं तो सावित्री हूँ... सिर्फ नज़रों से जलाना जानती हूँ।"

वह मटकती हुई रसोई की ओर बढ़ गई, पर जाते-जाते पीछे की ओर एक ऐसी नज़र डाल गई जिसने विक्रम सिंह के लन्ड में फिर से जान फूंक दी। दोनों के बीच स्पर्श की दीवार अभी भी खड़ी थी, पर शब्दों के जरिए वे एक-दूसरे को नंगा करके भोग रहे थे।

नव्या रसोई की दहलीज तक जाकर अचानक ठिठक गई। उसने एक गहरी सांस ली, जिससे उसकी नारंगी साड़ी में कसे हुए बोबे बाहर निकलने को बेताब हो उठे। वह धीरे से पलटी और अपनी कमर पर हाथ रखकर, तिरछी नजरों से विक्रम सिंह को देखने लगी। उसकी आँखों में अब वह 'बहू' वाली शर्म नहीं, बल्कि एक शिकारी की शोखी थी।

नव्या: (मुस्कुराते हुए) "बाबूजी, एक बात कहना तो भूल ही गई। रात को जिस 'नाग' को आप अपने हाथ में थामे फुफकार रहे थे, उसे इतना खुला न छोड़ें। वह बहुत खतरनाक लग रहा था। कहीं ऐसा न हो कि अपनी फुफकार के नशे में वह किसी ऐसे 'बिल' में घुसने की कोशिश कर बैठे, जिसकी गहराई नापने की उसे इजाजत नहीं है।"

विक्रम सिंह ने चाय का घूंट भरा और अपनी मूंछों पर ताव देते हुए नव्या के बदन के एक-एक उतार-चढ़ाव को अपनी आँखों से चाटने लगे।

विक्रम सिंह: "बिल अगर इतना रसीला और तंग हो नव्या, तो नाग अपनी जान की परवाह नहीं करता। और वह कोई मामूली सांप नहीं है, वह तो 'काल' है। उसे बिल की गहराई से डर नहीं लगता, उसे तो बस उस 'गर्मी' की तलाश है जो आज सुबह तेरे उस गीले बदन से छूट रही थी। तूने उसे खुली आँखों से देख लिया है, अब वह शांत नहीं बैठेगा।"

नव्या ने अपने गुलाबी होंठों को फिर से दाँतों तले दबाया और अपनी गांड़ को थोड़ा और पीछे की ओर मटकाया।

नव्या: "गर्मी तो बिल में बहुत है बाबूजी, पर उस बिल के मुहाने पर मर्यादा के पत्थर रखे हैं। आपका वह नाग चाहे जितना भी विकराल हो जाए, उन पत्थरों से टकराकर अपना सिर ही फोड़ेगा। और सुनिए, वह जो आप 'अमृत' की बातें कर रहे थे... उसे अपनी मुट्ठी में ही कैद रखिये। उसे फर्श पर बहाना शोभा नहीं देता, वह तो किसी 'पवित्र कलश' की अमानत है।"

विक्रम सिंह की आँखों में अश्लीलता का सैलाब उमड़ पड़ा। उन्होंने अपनी कुर्सी को थोड़ा आगे खिसकाया।

विक्रम सिंह: "कलश तो तू ही है नव्या... पर तूने उस पर 'छूना मना है' की मुहर लगा रखी है। पर तू भूल रही है, नाग को छूने की ज़रूरत नहीं होती, वह तो अपनी ज़हरीली फुफकार और नज़रों से ही शिकार को अधमरा कर देता है। और जो तूने रात को झिरी से मेरा वह 'औजार' देखा है, वह अब तेरे सपनों में भी बिल खोदने आएगा। बता न... क्या उसे देखकर तेरी उस 'कंटीली चूत' में खुजली नहीं हुई? क्या तुझे यह नहीं लगा कि काश यह पत्थर की दीवार अभी गिर जाए और वह नाग सीधे अपनी मंजिल पा ले?"

नव्या का चेहरा तप उठा, पर वह हटी नहीं। उसने एक कदम और आगे बढ़ाया, इतनी करीब कि विक्रम सिंह को उसके जिस्म की मांसल महक आने लगी।

नव्या: "खुजली तो उसे भी होती है बाबूजी, जो प्यासा हो और सामने समंदर दिख रहा हो। पर मैं वो दरिया हूँ जो सिर्फ सुमित के लिए बहता है। आप बस किनारे बैठकर उसकी लहरें देखिये और अपने उस 'विकराल मूसल' को हाथ से सहलाकर मन बहला लीजिये। क्योंकि इस बिल का दरवाजा तो बंद ही रहेगा, चाहे आपका नाग कितना ही फन क्यों न पटक ले।"

इतना कहकर नव्या ने एक जोरदार ठुमका लगाया, जिससे उसके तरबूज जैसे गांड़ के दोनों हिस्से साड़ी के नीचे एक-दूसरे को मसल गए, और वह खिलखिलाती हुई अंदर चली गई। विक्रम सिंह वहीं बैठे अपनी धोती के भीतर उस पत्थर हो चुके अंग को संभालते रह गए। उन्हें पता था कि नव्या उन्हें तड़पा रही है, पर उस तड़प में जो मज़ा था, वह दुनिया के किसी और सुख में नहीं था।

खिड़की का उलटफेर और नग्न गुणगान

स्थान: नव्या का शयनकक्ष / गलियारा

समय: रात के २:१५ बजे

आज रात फिजाओं में वासना की नमी कुछ ज्यादा ही भारी थी। नव्या के बदन में रात के उस 'दर्शन' ने ऐसी आग सुलगा दी थी कि वह कमरे की ठंडक में भी पसीने से नहा रही थी। उसे लगा कि बाबूजी अपने कमरे में अपने उसी विकराल मूसल की सेवा में व्यस्त होंगे, जैसा उन्होंने कल किया था। इसी बेफिक्री और चरम उत्तेजना में नव्या ने अपनी साड़ी, पेटीकोट और चोली उतारकर फेंक दी।

वह अपने कमरे में पूरी तरह नग्न होकर किसी मदहोश हिरणी की तरह टहल रही थी। मद्धम दूधिया रोशनी में उसके विशाल और रसीले बोबे और उसकी भारी गांड़ के मांसल पट अपनी पूरी नग्नता के साथ चमक रहे थे। वह अपनी जांघों के बीच हाथ फेरते हुए और अपनी चूत के गीलेपन को महसूस करते हुए जोर-जोर से बड़बड़ा रही थी।

नव्या: (सिसकते हुए और बदन को मरोड़ते हुए) "ओह... बाबूजी! क्या चीज़ पाल रखी है आपने अपनी धोती के नीचे। वह खूंखार काला लन्ड... जब से देखा है, मेरी इस चूत ने पानी छोड़ना बंद नहीं किया। मेरा सुमित तो इसके सामने कुछ भी नहीं है। हाय! वह विकराल अंग अगर एक बार मेरी इन फांकों को चीरता हुआ अंदर घुस जाए, तो मैं तो पागल ही हो जाऊँगी।"

उसी वक्त, विक्रम सिंह बाथरूम जाने के लिए अपने कमरे से बाहर निकले। गलियारे से गुजरते वक्त उनकी नज़र अचानक नव्या के कमरे की उसी खिड़की की झिरी पर पड़ी, जहाँ से कल नव्या ने उन्हें देखा था। उन्होंने ठिठक कर एक नज़र अंदर मारी और उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

अंदर का दृश्य किसी महा-विस्फोट से कम नहीं था। उनकी 'सावित्री' बहू पूरी तरह निर्वस्त्र होकर अपना ही बदन मसल रही थी और उनके मूसल के कसीदे पढ़ रही थी।

नव्या: (अपने बोबों को दोनों हाथों से भींचते हुए) "बाबूजी... कहाँ छुपा कर रखा था आपने यह कामुक औजार? इसे देखकर तो पत्थर भी पिघल जाए। मेरा मन कर रहा है कि इसे अभी अपने मुँह में भर लूँ और इसका सारा जहर पी जाऊँ। आप कह रहे थे न कि मैं आपकी 'कामधेनु' हूँ... तो आइये न, अपने उस हथियार से मेरी इस जवानी का शिकार कीजिये। मेरी यह गांड़... ये तरबूज... ये सब आपके उस विकराल लन्ड की मार सहने के लिए तड़प रहे हैं।"

खिड़की के बाहर खड़े विक्रम सिंह का बुरा हाल था। उनकी धोती के भीतर उनका मूसल फिर से पत्थर की तरह सख्त हो गया और नसें उभर आईं। अपनी बहू के मुँह से अपने 'अंग' की ऐसी अश्लील तारीफ सुनकर उनका पोर-पोर कांपने लगा।

विक्रम सिंह (बाहर से बुदबुदाते हुए): "ओह... मेरी कंटीली नागिन! तो तुझे मेरा वह मूसल इतना पसंद आया है? तू अंदर नंगी होकर मेरा नाम जप रही है और मैं बाहर अपनी प्यास से लड़ रहा हूँ। देख ले... देख ले अपनी इस बेबसी को, क्योंकि अब ये आँखें तुझे सिर्फ देख कर नहीं मानेंगी।"

नव्या अपनी ही धुन में अपनी चूत पर उंगलियां चला रही थी, वह ससुर के शब्दों को याद कर-कर के और भी उत्तेजित हो रही थी। वह बार-बार अपनी पीठ फेरकर अपनी भारी गांड़ आईने में देख रही थी और कल्पना कर रही थी कि उस पर ससुर के थप्पड़ और उनके लन्ड की मार पड़ रही है।

विक्रम सिंह वहीं बुत बनकर अपनी बहू के उस नग्न तांडव को देख रहे थे। आज पासा पलट चुका था। कल उसने देखा था, आज वह देख रहे थे। और इस 'देखने' ने कोठी की मर्यादा की अंतिम ईंट को भी हिलाकर रख दिया था।

विक्रम सिंह खिड़की की झिरी से चिपके हुए थे, उनकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। अंदर नव्या नग्नता के उस मुकाम पर थी जहाँ सुध-बुध पूरी तरह खो चुकी थी। वह अपने जिस्म को मसलते हुए अब अपनी माँ मालती को याद करने लगी थी। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा नशा और अश्लीलता का उबाल था।

नव्या (अंदर नग्नता में झूमते हुए): "आह... माँ! तू सही कहती थी कि इस खानदान की औरतों के खून में ही प्यास है। मौसी ने मुझे सब बताया था माँ... कि तेरी शादी की उन फेरों वाली रातों में, जब पूरा घर सोया था, तू एक जवान और कतई खूंखार लन्ड के नीचे दबी घंटों अपनी चूत की प्यास बुझा रही थी। तूने मर्यादा की चुनरी उतारकर उस मर्दानगी का जहर पिया था, और आज देख... तेरी बेटी भी उसी राह पर है!"

बाहर खड़े विक्रम सिंह यह सुनकर सन्न रह गए। मालती का वह पुराना किस्सा उनके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरा। वह हैरान थे कि नव्या को अपनी माँ के उस गुप्त 'रति-काण्ड' का पता है और वह उसे बड़े गर्व से याद कर रही है।

नव्या: (अपनी भारी गांड़ को दीवार से सटाकर रगड़ते हुए) "माँ, तूने तो किसी गै़र के लन्ड से अपनी आग बुझाई थी, पर तेरी बेटी तो अपने ही ससुर के उस विकराल मूसल की दीवानी हो गई है। माँ, अगर तू आज देखती कि बाबूजी के पास क्या औजार है, तो तू भी अपनी कब्र से निकल आती। वह काला और मोटा नाग... जब वह हिलता है, तो मेरा जी करता है कि मैं अपनी माँ की तरह ही बेशर्म होकर उसे अपने भीतर उतार लूँ।"

विक्रम सिंह का कलेजा मुँह को आ गया। नव्या के मुँह से 'माँ' और 'चुदाई' जैसे शब्द सुनकर उनकी कामुकता हिंसक होने लगी। उनकी धोती अब उस पत्थर हुए लन्ड का बोझ नहीं सह पा रही थी। उन्हें समझ आ गया कि नव्या के भीतर सिर्फ जवानी नहीं, बल्कि एक खानदानी 'आग' विरासत में मिली है।

नव्या: "माँ, तूने फेरों की रात जो सुख पाया था, मैं उसे रोज़ अपनी आँखों से देख रही हूँ। बाबूजी का वह लाल सुपाड़ा... आह! जब वह मुट्ठी में उसे दबाते हैं, तो मुझे अपनी चूत में तेरी वही वाली तड़प महसूस होती है। मैं भी तेरी ही तरह कुलटा बनूँगी माँ... इस कोठी की इज्जत को बाबूजी के उस मूसल के नीचे कुचलवा दूँगी!"

विक्रम सिंह अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। उनकी बहू, जिसे वह सिर्फ एक 'कंटीली औरत' समझ रहे थे, वह तो वासना की एक पूरी 'परम्परा' ढो रही थी। मालती का वह पुराना ज़िक्र और नव्या की यह नग्नता—दोनों ने मिलकर विक्रम सिंह के संयम की चिता जला दी थी। वह खिड़की से चिपके, अपनी धोती के भीतर उस विकराल अंग को सहलाते हुए बस यही सोच रहे थे कि इस 'मालती की बेटी' को अब वो मज़ा चखाना है जो उसे उसकी माँ ने भी नहीं चखाया होगा।

नग्न विरासत और दोहरा चरमोत्कर्ष

स्थान: नव्या का शयनकक्ष और बाहरी गलियारा

समय: रात के ३:०० बजे

अंदर और बाहर, वासना का वह घमासान छिड़ा था जिसकी गूँज कोठी की दीवारों को कपा रही थी।

नव्या अपनी माँ मालती की उस 'फेरों वाली रात' की चुदाई को अपनी बंद आँखों के पीछे फिर से जी रही थी। वह अपनी नग्न जांघों को फर्श पर पटक रही थी और उसके विशाल बोबे उसकी तेज सांसों के साथ पागलपन की हद तक उछल रहे थे।

नव्या (अंदर सिसकते हुए): "आह माँ! तूने उस रात जो चीखें दबाई थीं, वो आज मेरे गले से निकलना चाहती हैं। तूने उस जवान लन्ड को अपनी चूत की गहराइयों में उतार कर जो स्वर्ग पाया था... देख माँ, आज तेरी बेटी भी वैसे ही सिसक रही है। बाबूजी का वह मूसल देख कर मेरा रोम-रोम तुझे पुकार रहा है। ये खानदानी प्यास है माँ... जो आज बाबूजी के इस विकराल अंग को देख कर फट पड़ी है! फाड़ दीजिये बाबूजी... जैसे उस मर्द ने मेरी माँ को फाड़ा था, वैसे ही मुझे भी तहस-नहस कर दीजिये!"

खिड़की के बाहर विक्रम सिंह का हाल बेहाल था। मालती के उस पुराने किस्से और नव्या की इन अश्लील बातों ने उनके मूसल को लोहे की छड़ से भी ज्यादा सख्त कर दिया था। उनके हाथ की रफ़्तार अब किसी मशीन जैसी थी। वह झिरी से नव्या के उस पूरी तरह नग्न और पसीने से भीगे बदन को देख रहे थे, जो फर्श पर लोट रहा था।

विक्रम सिंह (बाहर गुर्राते हुए): "मालती की बच्ची... तूने अपनी माँ का राज खोलकर अपनी मौत बुला ली है। अब तेरा ये तरबूज जैसा बदन और ये भरी हुई गांड़ मेरी इस मर्दानगी की मार से बच नहीं पाएगी। तू प्यासी है न? ले... देख अपनी माँ के उस 'पुराने पापकर्म' का जवाब... मेरा ये विकराल लन्ड तुझे वो मज़ा देगा जो तेरी माँ भी भूल जाएगी!"

अंदर नव्या का हाथ अब उसकी चूत की गहराई में पागलों की तरह चल रहा था। उसे खिड़की के बाहर ससुर के हाथ की रफ़्तार का अंदाज़ा था। वह अपनी माँ की उस रात की कल्पना और ससुर के इस काले नाग के बीच पिस रही थी।

नव्या: "आह... माँ... मैं जा रही हूँ... बाबूजी का वो लाल सुपाड़ा मेरी आँखों में धंस गया है... ले लीजिये मुझे... आह! माँ... मैं झड़ रही हूँ!"

ठीक उसी पल, नव्या के शरीर में एक ज़ोरदार ऐंठन आई। उसकी चूत ने गरम काम-रस का फव्वारा छोड़ दिया और वह फर्श पर मछली की तरह तड़प कर निढाल हो गई। उसकी आँखों के सामने अपनी माँ की चुदाई और ससुर का नंगा लन्ड एक साथ विलीन हो गए।

बाहर विक्रम सिंह का भी बांध टूट चुका था। नव्या के मुँह से 'माँ की चुदाई' के किस्से सुनते ही उनका सफ़ेद और गाढ़ा लावा झटके के साथ उनकी मुट्ठी से निकलकर गलियारे की दीवार और फर्श पर बिखर गया। वह हांफते हुए दीवार से टिक गए, उनका विकराल मूसल अभी भी थरथरा रहा था।

दो अलग-अलग दुनिया, एक ही प्यास, और दो चरम—पर 'छूना' अभी भी वर्जित था।

दोनों ससुर बहु एक साथ झड़े हैं कितना हसीन इत्तेफाक है देवियों, क्या कोई बहु इतनी कामुक होती है कमेंट में बताए कोई औरत,,,,
 
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विरासत का जाल और 'अधूरा हिसाब'
स्थान: कोठी का बरामदा
समय: सुबह ९:०० बजे
रात के उस 'महा-संगम' के बाद कोठी की हवा में अब एक अजीब सी भारीपन थी। नव्या आज रसोई से बाहर निकली तो उसकी निगाहें झुकी हुई थीं। कल रात उसने ससुर के विकराल मूसल की जो अश्लील वंदना अपनी माँ का नाम लेकर की थी, वह बात अब उसे अंदर ही अंदर काट रही थी।
विक्रम सिंह अपनी कुर्सी पर लाल कपड़ा बिछाए ऐसे बैठे थे जैसे किसी ऊंचे सिंहासन पर कोई सम्राट बैठा हो। उनके चेहरे पर एक ऐसी कुटिल मुस्कान थी जो यह बता रही थी कि उनके हाथ में अब नव्या की 'गर्दन' आ गई है।
जैसे ही नव्या ने चाय का कप मेज पर रखा, विक्रम सिंह ने अखबार हटाकर सीधे उसकी आँखों में देखा। आज उनकी नज़रों में 'प्यास' के साथ-साथ एक 'अधिकार' भी था।
विक्रम सिंह: (गहरी और मखमली आवाज़ में) "आज हल्दी का तिलक बहुत गहरा लगाया है नव्या... पर लगता है रात की 'बेचैनी' अभी भी आँखों के घेरों में बाकी है। रात भर तुम अपनी माँ मालती को याद कर रही थीं... बहुत याद आ रही है क्या उनकी?"
नव्या के हाथ से लोटा छूटते-छूटते बचा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसे अहसास हो गया कि उसकी 'नग्नता' और उसके 'राज' की झिरी अब ससुर के कब्ज़े में है।
नव्या: (हकलाते हुए) "बाबूजी... वो... माँ... हाँ, बहुत दिन हो गए मिले।"
विक्रम सिंह: (कुर्सी पर पीछे झुकते हुए, एक रहस्यमयी हंसी के साथ) "तो फिर बुला लो उसे। बहुत दिन हुए, मुझे भी मालती से कुछ 'पुराने हिसाब' बराबर करने हैं। उसे बुला लो, तुम दोनों माँ-बेटी जब इस कोठी में साथ होगी, तब असली रौनक आएगी। आखिर जो विरासत उसने तुम्हें दी है, उसे फलते-फूलते देखना उसका भी तो हक है।"
नव्या के कान खड़े हो गए। उसे लगा कि ससुर के शब्दों में 'हिसाब' शब्द किसी पैसे के लेनदेन का नहीं, बल्कि उसी 'चुदाई' की प्यास का है जिसका ज़िक्र उसने रात को किया था। वह अंदर ही अंदर कांप गई। उसे नहीं पता था कि उसकी माँ और ससुर के बीच क्या 'पुराना खेल' बाकी है जिसे विक्रम सिंह ने अभी तक राज बना कर रखा है।
विक्रम सिंह: "हैरान क्यों हो? मैंने कहा न... माँ को बुला लो। उसे कहना कि सुमित नहीं है तो क्या हुआ, उसका 'समधी' अभी भी जवान है और कोठी का मेहमान नवाजी का तरीका अभी बदला नहीं है। वह आएगी, तो तुम दोनों साथ मिलकर इस 'नाग' की सेवा करना जिसे तुम कल रात बहुत याद कर रही थीं।"
नव्या ने अपने गुलाबी होंठों को दांतों तले दबाया। उसे समझ आ गया कि ससुर अब उसे और उसकी माँ को एक ही तराजू में तौलने वाले हैं।
नव्या: (दबी आवाज़ में, पर शोखी के साथ) "बाबूजी... माँ आएगी तो कोठी में आग लग जाएगी। आपको पता है न, वह भी मेरी तरह ही 'कंटीली' है। क्या आपका वह विकराल मूसल हम दोनों की आग सह पाएगा?"
विक्रम सिंह: "सहना ही तो मर्दानगी है नव्या। उसे बुलाओ... और देखो कि यह 'पुराना हिसाब' कैसे चुकता होता है। बस याद रखना, शर्त वही रहेगी—कोठी की दीवारें और मेरा यह मूसल, किसी की गवाही नहीं देंगे।"
नव्या मुड़ी और अपनी भारी गांड़ को एक विजयी ठुमके के साथ मटकाते हुए अंदर चली गई। उसे डर भी था और एक अजीब सी उत्तेजना भी, कि जब माँ आएगी, तो इस कोठी में 'नग्नता' का कौन सा नया अध्याय लिखा जाएगा।
: साये का डर और उभरती हवस
स्थान: कोठी का बरामदा / रसोई की दहलीज
समय: सुबह ९:३० बजे
विक्रम सिंह की उस 'हिसाब' वाली बात ने नव्या के मन में खलबली मचा दी थी। वह रसोई में खड़ी थी, पर उसके हाथ काम नहीं कर रहे थे। उसे बार-बार ससुर की वह कुटिल मुस्कान और उनके शब्दों की भारीपन याद आ रही थी— "उसे बुला लो, मुझे भी मालती से कुछ पुराने हिसाब बराबर करने हैं।"
नव्या ने अपने मन में सोचा, "क्या माँ और बाबूजी के बीच पहले से कुछ ऐसा था जिसके बारे में मुझे नहीं पता? क्या माँ की उस 'फेरों वाली रात' का राज बाबूजी की नज़रों के सामने ही घटा था?"
इधर बरामदे में बैठे विक्रम सिंह अपनी अगली चाल सोच रहे थे। उन्होंने देखा कि नव्या रसोई के द्वार पर खड़ी अपनी साड़ी का पल्लू उंगलियों में लपेट रही है। उसकी भारी गांड़ का उभार साड़ी को तान रहा था, जो विक्रम की आँखों को फिर से न्यौता दे रहा था।
विक्रम सिंह: (ऊँची आवाज़ में) "क्या हुआ नव्या? माँ के आने के डर से हाथ-पांव फूल गए क्या? या फिर उस 'पुराने हिसाब' की कल्पना मात्र से ही तुम्हारी चूत में फिर से वही रात वाली 'नमी' भर गई है?"
नव्या धीरे से बाहर आई, उसकी आँखों में अब एक तीखापन था।
नव्या: "बाबूजी, माँ आएगी तो अपना हिसाब खुद कर लेगी। पर अभी जो हिसाब मेरे और आपके बीच है, उसका क्या? आप नज़रों से तो मुझे रोज़ नंगा करते हैं, पर आपकी ये प्यास तो दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। कहीं ऐसा न हो कि माँ के आने तक आप इस 'नाग' को काबू में ही न रख सकें।"
विक्रम सिंह: (हंसते हुए) "काबू तो तुम ही कर सकती हो नव्या... बिना छुए। आज शाम जब तुम आँगन में दीपक जलाओगी, तो याद रखना कि तुम्हारी साड़ी का पल्लू कंधे से ढलका हुआ हो। मैं देखना चाहता हूँ कि तुम्हारी माँ ने तुम्हें सजाने के लिए कौन से 'गहने' दिए हैं।"
नव्या ने अपनी गर्दन को एक ओर झुकाया और अपने गुलाबी होंठों को सिकोड़ते हुए कहा, "शर्त याद है न बाबूजी? देखना मना नहीं है, पर छुएंगे आप तब भी नहीं। चाहे मैं आपके सामने पूरी नग्न ही क्यों न खड़ी हो जाऊं।"
विक्रम सिंह का विकराल मूसल फिर से उनकी धोती के भीतर अंगड़ाई लेने लगा। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि मालती के आने से पहले वह नव्या को उस मुकाम पर ले आएंगे जहाँ वह खुद स्पर्श की भीख मांगेगी।
 

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रहस्य की परछाईं
स्थान: कोठी का बरामदा
समय: सुबह १०:०० बजे
नव्या के चेहरे पर उभरी उस बेचैनी और जिज्ञासा को देखकर विक्रम सिंह समझ गए कि उन्होंने एक बड़ा पत्ता चल दिया है। नव्या की आँखें बार-बार उस 'हिसाब' की गहराई को टटोलने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन विक्रम सिंह अभी उस राज की पोटली खोलने के मूड में नहीं थे।
जैसे ही नव्या ने एक कदम और आगे बढ़ाकर पूछना चाहा, विक्रम सिंह ने अपनी आवाज़ का लहजा अचानक बदल दिया और एक ठंडी हंसी हंसे।
विक्रम सिंह: "अरे! तू तो गंभीर हो गई नव्या। हिसाब-विसाब कुछ नहीं है, मैं तो बस तुझे छेड़ रहा था। मालती से भला मेरा क्या हिसाब होगा? वह तो तेरी माँ है और मेरी समधिन। मैं तो बस मज़ाक कर रहा था कि बहुत दिन हुए उसे देखे, तो घर में रौनक आ जाएगी।"
नव्या को लगा जैसे किसी ने ऊँचाई से उसे नीचे पटक दिया हो। उसकी आँखों में चमकता वह कौतूहल अचानक संशय में बदल गया।
नव्या: (संदेह भरी नज़रों से देखते हुए) "मज़ाक? पर बाबूजी आपकी आवाज़ में तो उस वक्त कुछ और ही लग रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई बरसों पुरानी आग आज भी धधक रही है।"
विक्रम सिंह: (नव्या के उभरे हुए बोबों पर अपनी नज़रें टिकाते हुए) "आग तो आज भी धधक रही है नव्या... पर वह पुरानी नहीं, बल्कि बिलकुल नई है। वह आग जो कल रात उस खिड़की की झिरी से फूट रही थी। मालती का आना तो बस एक बहाना है, असली मकसद तो उस 'विरासत' को अपनी आँखों के सामने जलते देखना है जो उसने तुझे दी है।"
नव्या खड़ी रही, पर उसका मन यह मानने को तैयार नहीं था कि वह सिर्फ मज़ाक था। उसे लगा कि ससुर कुछ बहुत गहरा छुपा रहे हैं। वह समझ गई कि यह 'हिसाब' कोई गुप्त पहेली है जो विक्रम सिंह सिर्फ मालती के सामने ही सुलझाएंगे।
नव्या: "ठीक है बाबूजी, अगर मज़ाक है तो मज़ाक ही सही। मैं आज ही माँ को चिट्ठी लिखती हूँ या संदेश भेजती हूँ। पर याद रखियेगा, माँ आ गई तो कोठी के कायदे बदल जाएंगे। वह मेरी तरह चुप रहकर आपकी नज़रों का 'अत्याचार' नहीं सहेगी।"
विक्रम सिंह: (अपनी धोती के भीतर सख्त होते विकराल लन्ड को महसूस करते हुए) "कायदे बदलने के लिए ही तो उसे बुला रहा हूँ। तू बस उसे आने को कह... फिर देखना कि यह ससुर अपनी बहू और समधिन के बीच किस तरह का 'न्याय' करता है। जा... जाकर रसोई संभाल, और याद रखना कि शाम को जब तू दीया जलाएगी, तो हवा का एक झोंका तेरी साड़ी के पल्लू को बेपर्दा करने के लिए बेताब रहेगा।"
नव्या पीछे मुड़ी, पर उसके दिमाग में अब मालती का वह 'फेरों वाली रात' का राज और ससुर का यह 'गुप्त हिसाब' गड्डमड्ड हो रहे थे। वह समझ गई थी कि मालती का आना इस कोठी में वासना का एक नया तांडव शुरू करेगा, जिसके तार किसी पुराने राज से जुड़े हैं।
विक्रम सिंह ने देखा कि नव्या के चेहरे पर अविश्वास की लकीरें अभी भी गहरी हैं। उसे समझ आ गया कि 'हिसाब' शब्द ने बहू के दिमाग में संदेह का बीज बो दिया है। खेल को सुरक्षित रखने के लिए उसे नव्या को पूरी तरह आश्वस्त करना होगा कि वह सिर्फ शब्दों का खेल था।
उसने अखबार वापस मेज पर रखा और चेहरे पर एक बहुत ही सरल, पिता समान (पर भीतर से कामुक) मुस्कान ओढ़ ली।
विक्रम सिंह: "नव्या, इधर आ... बैठ यहाँ।"
नव्या झिझकती हुई पास पड़ी मूढ़ी पर बैठ गई। विक्रम सिंह ने अपनी नज़रों को उसके सीने से हटाकर सीधे उसके चेहरे पर टिकाया, जैसे कोई बहुत बड़ी सफाई दे रहे हों।
विक्रम सिंह: "तू तो नाहक ही परेशान हो गई। अरे पगली, हिसाब की बात मैंने इसलिए कही क्योंकि तेरी माँ मालती और मैंने मिलकर सुमित की शादी में कुछ लेन-देन के वादे किए थे। कुछ जेवर, कुछ व्यवहार... वही बातें दिमाग में आ गई थीं। पर अब मुझे लगता है कि इस उम्र में उन पुरानी बातों को 'हिसाब' कहना गलत था। मैं तो बस तुझे छेड़ने के लिए कह गया कि मालती आएगी तो उसे याद दिलाऊँगा कि वह अपना वादा भूल गई है।"
नव्या ने अपनी आँखों को सिकोड़ा, वह अभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थी। "सिर्फ जेवर-कपड़ों की बात थी बाबूजी?"
विक्रम सिंह: (हल्के से हंसते हुए) "और क्या होगा नव्या? तू तो ऐसे देख रही है जैसे हम दोनों के बीच कोई गहरा राज़ दबा हो। अरे, समधी-समधिन के बीच हंसी-ठिठोली का रिश्ता होता है। मैं तो बस ये चाह रहा था कि तू अपनी माँ को याद करके जो रात भर तड़पती है, उसका आना हो जाए तो तेरा मन लग जाए। देख, सुमित है नहीं... और तू इतनी जवान, भरी-पूरी औरत... अकेले इस कोठी में तेरा जी घबराता होगा।"
विक्रम सिंह ने बड़ी चतुराई से बात का रुख मोड़ दिया।
विक्रम सिंह: "भूल जा उस बात को। कोई हिसाब-विसाब नहीं है। बस एक बाप का अपनी बहू से मजाक समझ ले। तू तो मेरी अपनी बेटी जैसी है, बस फर्क इतना है कि तेरी ये 'कंटीली' जवानी मुझे बाप बनने नहीं देती। अब जा... रसोई में देख क्या पक रहा है, और अपनी माँ को आने का न्यौता भेज दे। मेरा यकीन मान, सब ठीक रहेगा।"
नव्या को लगा कि शायद वह ही ज्यादा सोच रही थी। ससुर की बातों में वह 'हिसाब' अब उसे सांसारिक लेनदेन जैसा लगने लगा। उसने एक राहत भरी सांस ली, जिससे उसके बोबे साड़ी के भीतर एक बार फिर उभरे और विक्रम की धड़कनें बढ़ा दीं।
नव्या: "ठीक है बाबूजी, अगर मज़ाक था तो मैं इसे मज़ाक ही समझूंगी। मैं आज ही माँ को खबर भिजवाती हूँ।"
वह उठी और अंदर की ओर चल दी। विक्रम सिंह ने उसे जाते हुए देखा और मन ही मन बुदबुदाए, "कन्विंस तो तू हो गई नव्या... पर मालती जब आएगी, तब उसे पता चलेगा कि यह 'हिसाब' जेवर का नहीं, बल्कि उस 'जिस्म' का है जो उसने बरसों पहले अधूरा छोड़ा था।"
 
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आधी रात का कन्फेशन और माँ का पाप
स्थान: नव्या का शयनकक्ष
समय: रात के १२:१५ बजे
कोठी में सन्नाटा पसरा था, लेकिन नव्या के भीतर तूफानों का शोर था। ससुर के साथ हुई शाम की उस 'दीपक वाली' छेड़छाड़ ने उसके शरीर में एक ऐसी आग लगा दी थी कि वह चाहकर भी सो नहीं पा रही थी। उसने अपना फोन उठाया और अपनी माँ, मालती को फोन लगाया। उसे पता था कि मालती इस वक्त जाग रही होगी।
दूसरी तरफ से फोन उठा, और नव्या ने बिना किसी भूमिका के सीधे अपनी माँ के उस घाव पर हाथ रखा जिसे उसने बरसों से छुपा रखा था।
नव्या: (धीमी पर जहरीली आवाज़ में) "माँ... सो रही हो? या आज भी वैसी ही जाग रही हो जैसे मेरी शादी की रात जागी थी?"
मालती की आवाज़ में एक कपकपी थी। "नव्या... ये क्या कह रही है बेटी? इतनी रात को..."
नव्या: (एक अश्लील हंसी के साथ) "सच कह रही हूँ माँ। मौसी ने मुझे सब बता दिया है। जिस वक्त मैं बाहर अग्नि के फेरे ले रही थी और सात जन्मों के वादे कर रही थी, तुम अंदर किसी के खूंखार लन्ड के नीचे दबी अपनी चूत की आग बुझा रही थी। माँ, तुझे शर्म नहीं आई? तेरी बेटी की नई ज़िंदगी शुरू हो रही थी और तू अपनी पुरानी हवस को परवान चढ़ा रही थी!"
मालती चुप थी, उसकी सिसकियाँ फोन पर साफ सुनाई दे रही थीं।
नव्या: "चुप क्यों हो माँ? ताना नहीं मार रही, बस तुझे तेरी हकीकत बता रही हूँ। तूने जो बीज उस रात बोया था, उसकी फसल आज मैं काट रही हूँ। यहाँ कोठी में ससुर जी के पास एक ऐसा विकराल मूसल है जिसे देखकर तेरा वो 'फेरों वाली रात' का मर्द भी पानी भरता। माँ, तूने तो किसी गैर से अपनी प्यास बुझाई थी, पर तेरी बेटी की किस्मत देख... वह तो अपने ही ससुर के उस काले नाग की दीवानी हो गई है।"
मालती ने कांपते हुए कहा, "नव्या... रुक जा... ये तू क्या कह रही है? वह तेरे ससुर हैं।"
नव्या: "ससुर बाद में हैं माँ, पहले वो एक ऐसे मर्द हैं जिसकी नसों में लोहा भरा है। जब वह अपनी मुट्ठी में उसे दबाते हैं और अश्लील बातें करते हैं, तो मुझे तेरी याद आती है। मुझे लगता है कि मैं भी तेरी ही तरह कुलटा बनूँगी। माँ, तूने अपनी मर्यादा उस रात बेची थी, मैं अपनी हर रात इनके कदमों में बेचने को तैयार हूँ। तू यहाँ आ रही है न? आना माँ... हम दोनों माँ-बेटी मिलकर उनके उस मूसल की पूजा करेंगे।"
नव्या ने फोन पटक दिया। वह हांफ रही थी। ताना देकर उसे एक अजीब सा सुकून मिला था। उसे लग रहा था कि उसने अपनी माँ के चरित्र को नंगा करके अपनी खुद की वासना को जायज ठहरा दिया है।
नव्या अभी फोन रखकर बिस्तर पर लेटी ही थी कि मोबाइल फिर से थरथरा उठा। स्क्रीन पर 'माँ' का नाम चमक रहा था। नव्या को अपनी कड़वाहट पर थोड़ा पछतावा हुआ, उसने गहरी सांस ली और खुद को संयमित किया। अब उसकी आवाज़ में वह ज़हर नहीं, बल्कि एक अजीब सी रेशमी और कामुक कोमलता थी।
नव्या: (धीमी और संभली हुई आवाज़ में) "हाँ माँ... सॉरी, मैं थोड़ा बहक गई थी। पर जो सच है, सो है।"
फोन के उस पार मालती की सांसें अभी भी तेज थीं। वह कुछ कहना चाह रही थी पर शब्द नहीं मिल रहे थे।
नव्या: "सुनो माँ... मैं तुम्हें डरा नहीं रही हूँ। बस इतना कह रही हूँ कि यहाँ जो है, वो बहुत ही 'खतरनाक' और जादुई है। ससुर जी का वह विकराल मूसल... माँ, वह किसी को भी अपनी मर्यादा भूलने पर मजबूर कर दे। पर तुम फिक्र मत करो, अगर तुम्हारी मंजूरी होगी तभी कुछ आगे बढ़ेगा, वरना मेरी तरफ से तुम पर कोई ज़ोर नहीं है। मैं तुम्हारी बेटी हूँ, तुम्हारी इज्जत का ख्याल रखूँगी।"
मालती की आवाज़ इस बार थोड़ी स्थिर थी, "नव्या... तू पागल हो गई है।"
नव्या: "पागल नहीं माँ, प्यासी हूँ। और मुझे लगता है कि तुम्हारी आँखों में भी वही पुरानी प्यास दबी है। तुम बस यहाँ आ जाओ, मेरा मन बिल्कुल नहीं लग रहा है। सुमित के बिना यह कोठी काटती है, और बाबूजी की ये मखमली बातें... माँ, मुझे तुम्हारी ज़रूरत है। तुम आओगी तो मुझे लगेगा कि मेरी अपनी कोई साथ है।"
नव्या ने बड़े प्यार से मालती को राजी कर लिया। उसने फोन काटा और एक गहरी, तृप्त मुस्कान के साथ तकिये पर सिर रख दिया। उसे नहीं पता था कि विक्रम सिंह अपने कमरे में सो रहे हैं या जाग रहे हैं, पर उसे इस बात का सुकून था कि अब यह खेल 'माँ-बेटी' के बीच साझा होने वाला है।
उधर अपने कमरे में विक्रम सिंह अपनी ही धुन में थे। उन्हें इस फोन कॉल की भनक तक नहीं थी। वह तो बस सुबह का इंतज़ार कर रहे थे कि कब वह उस 'कंटीली' नव्या को अपनी नज़रों से फिर से नंगा करेंगे।
 
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mastmast123

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कोई बहु ये बताए कि यह कहानी वास्तविकता के बहुत करीब है या नहीं, बहु ससुर का रिश्ता और मां बेटी के रिश्ता ऐसा होता है सच में या नहीं
 

mastmast123

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कोई बहु ये बताए कि यह कहानी वास्तविकता के बहुत करीब है या नहीं, बहु ससुर का रिश्ता और मां बेटी के रिश्ता ऐसा होता है सच में या नहीं
 
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mastmast123

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Aap bahut hi lajawab chitran kar rahe ho
Thnks, अगर सच लग रही हो तो एक बार अवश्य बताइए ताकि मुझे और ठीक से लिखने की प्रेरणा मिले
 

sanskari bahu 1

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Aap bahut acche se likh rahe ho Jitna realistic rakhoge Kahani utnahii acchi Banegi aur donon sasur bahu ke bich Jitna no joke Hoga utna hi aur Achcha lagega
 
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