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सुबह की नमी और शब्दों का संभोग
स्थान: कोठी का पिछला आंगन (तुलसी का चौरा)
समय: सुबह ८:१५ बजे
रात के उस 'महा-विस्फोट' के बाद की सुबह और भी भारी थी। नव्या नहा-धोकर, मस्तक पर हल्दी का तिलक लगाए और बदन पर एक कसी हुई नारंगी साड़ी लपेटे तुलसी के चौरे के पास जल चढ़ा रही थी। पर आज उसकी चाल में वह 'सावित्री' वाला अनुशासन कम और एक मदहोश नागिन की लचक ज्यादा थी। उसे पता था कि पीछे बरामदे में बैठे विक्रम सिंह की नज़रें उसके हर उभार को साड़ी के पार भी 'नग्न' देख रही हैं।
विक्रम सिंह के चेहरे पर आज एक अजीब सी विजय वाली चमक थी। उन्होंने अखबार मेज पर पटका और अपनी भारी, कामुक आवाज़ में सन्नाटा तोड़ा।
विक्रम सिंह: "आज तुलसी में जल कुछ ज्यादा ही चढ़ाया जा रहा है नव्या? लगता है रात की 'तपन' अभी तक शांत नहीं हुई... या फिर अंदर कहीं ऐसी आग लगी है जिसे बुझाने के लिए ये लोटा छोटा पड़ रहा है?"
नव्या का हाथ ठिठका, पर उसने नज़रें नहीं उठाईं। रात को जो विकराल मूसल उसने झिरी से देखा था, उसकी छवि उसकी आँखों के सामने नाच गई। उसने पलौटकर ससुर की आँखों में सीधे झाँका—आज डर नहीं, एक चुनौती थी।
नव्या: (अपने भीगे होंठों पर जीभ फेरते हुए) "आग जब कोठी के भीतर ही सुलग रही हो बाबूजी, तो बाहर जल चढ़ाने से क्या होगा? और तपन तो तब शांत हो जब 'बुझाने वाला' अपनी सीमा में रहे। आप तो रात भर खुद ही किसी 'मूसल' की तरह अपनी प्यास से लड़ रहे थे, मैंने सुना था कि रात को आपकी नींद कुछ ज्यादा ही उखड़ी हुई थी।"
विक्रम सिंह का दिल धक से रह गया। नव्या का 'मूसल' शब्द का प्रयोग करना साफ़ इशारा था कि उसने कुछ देख लिया है। उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फ़ैल गई।
विक्रम सिंह: "नीद तो तब आए जब आँखों के सामने वह 'लाल चुनरी' वाला मंज़र न हो। और मेरा वह 'मूसल'... वह तो अब उस 'कुंड' की गहराई नापने के लिए उतावला है जिसे तुमने सुबह-सुबह खुले आम दिखाया था। क्या करूँ नव्या, उसकी जिद्द के आगे मैं भी हार जाता हूँ। वह कहता है कि जब तक उस 'कंटीली' बाड़ को नहीं तोड़ेगा, उसे चैन नहीं आएगा।"
नव्या ने खाली लोटा कमर पर टिकाया, जिससे उसकी भारी गांड़ एक तरफ को तन गई। उसने एक अदा के साथ अपने बालों को पीछे झटका।
नव्या: (द्विअर्थी अंदाज़ में) "जिद्द तो बुरी बला है बाबूजी। पर याद रखियेगा, बाड़ 'कंटीली' है... अगर बिना इजाजत हाथ लगाया तो खून भी निकल सकता है। हाँ, आप अपनी आँखों से जितना चाहें उतना 'दोहन' कर लीजिये। दूध वही अच्छा जो बिना थन छुए नज़रों से पी लिया जाए। क्या आपकी प्यास सिर्फ 'देखने' से नहीं बुझती? या फिर आपको उस 'विकराल औजार' के लिए कोई और ही काम चाहिए?"
विक्रम सिंह: (कुर्सी पर अकड़ते हुए) "देखने से तो सिर्फ भूख बढ़ती है नव्या। असली सुख तो उस 'मंथन' में है जिससे अमृत निकलता है। तू चाहे जितना भी 'छूना मना है' की तख्ती टांग ले, पर तेरी आँखों की ये नमी बता रही है कि रात को तूने भी उस 'मूसल' की मार को ख्यालों में महसूस किया है। बता न... क्या वह खयाल उस 'लाल कपड़े' में तुझे सुहाग की याद नहीं दिला रहा था?"
नव्या का बदन सिहर उठा। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को सीने पर और कसा, पर उसकी उभरी हुई छाती ससुर की आँखों को जवाब दे रही थी।
नव्या: "सुहाग की सेज तो दूर की बात है बाबूजी, अभी तो आपको इसी 'दर्शन' पर गुजारा करना होगा। आप अपनी उस 'जागीर' को संभाल कर रखिये, कहीं ऐसा न हो कि मर्यादा की आग में वह जलकर राख हो जाए। मैं तो सावित्री हूँ... सिर्फ नज़रों से जलाना जानती हूँ।"
वह मटकती हुई रसोई की ओर बढ़ गई, पर जाते-जाते पीछे की ओर एक ऐसी नज़र डाल गई जिसने विक्रम सिंह के लन्ड में फिर से जान फूंक दी। दोनों के बीच स्पर्श की दीवार अभी भी खड़ी थी, पर शब्दों के जरिए वे एक-दूसरे को नंगा करके भोग रहे थे।
नव्या रसोई की दहलीज तक जाकर अचानक ठिठक गई। उसने एक गहरी सांस ली, जिससे उसकी नारंगी साड़ी में कसे हुए बोबे बाहर निकलने को बेताब हो उठे। वह धीरे से पलटी और अपनी कमर पर हाथ रखकर, तिरछी नजरों से विक्रम सिंह को देखने लगी। उसकी आँखों में अब वह 'बहू' वाली शर्म नहीं, बल्कि एक शिकारी की शोखी थी।
नव्या: (मुस्कुराते हुए) "बाबूजी, एक बात कहना तो भूल ही गई। रात को जिस 'नाग' को आप अपने हाथ में थामे फुफकार रहे थे, उसे इतना खुला न छोड़ें। वह बहुत खतरनाक लग रहा था। कहीं ऐसा न हो कि अपनी फुफकार के नशे में वह किसी ऐसे 'बिल' में घुसने की कोशिश कर बैठे, जिसकी गहराई नापने की उसे इजाजत नहीं है।"
विक्रम सिंह ने चाय का घूंट भरा और अपनी मूंछों पर ताव देते हुए नव्या के बदन के एक-एक उतार-चढ़ाव को अपनी आँखों से चाटने लगे।
विक्रम सिंह: "बिल अगर इतना रसीला और तंग हो नव्या, तो नाग अपनी जान की परवाह नहीं करता। और वह कोई मामूली सांप नहीं है, वह तो 'काल' है। उसे बिल की गहराई से डर नहीं लगता, उसे तो बस उस 'गर्मी' की तलाश है जो आज सुबह तेरे उस गीले बदन से छूट रही थी। तूने उसे खुली आँखों से देख लिया है, अब वह शांत नहीं बैठेगा।"
नव्या ने अपने गुलाबी होंठों को फिर से दाँतों तले दबाया और अपनी गांड़ को थोड़ा और पीछे की ओर मटकाया।
नव्या: "गर्मी तो बिल में बहुत है बाबूजी, पर उस बिल के मुहाने पर मर्यादा के पत्थर रखे हैं। आपका वह नाग चाहे जितना भी विकराल हो जाए, उन पत्थरों से टकराकर अपना सिर ही फोड़ेगा। और सुनिए, वह जो आप 'अमृत' की बातें कर रहे थे... उसे अपनी मुट्ठी में ही कैद रखिये। उसे फर्श पर बहाना शोभा नहीं देता, वह तो किसी 'पवित्र कलश' की अमानत है।"
विक्रम सिंह की आँखों में अश्लीलता का सैलाब उमड़ पड़ा। उन्होंने अपनी कुर्सी को थोड़ा आगे खिसकाया।
विक्रम सिंह: "कलश तो तू ही है नव्या... पर तूने उस पर 'छूना मना है' की मुहर लगा रखी है। पर तू भूल रही है, नाग को छूने की ज़रूरत नहीं होती, वह तो अपनी ज़हरीली फुफकार और नज़रों से ही शिकार को अधमरा कर देता है। और जो तूने रात को झिरी से मेरा वह 'औजार' देखा है, वह अब तेरे सपनों में भी बिल खोदने आएगा। बता न... क्या उसे देखकर तेरी उस 'कंटीली चूत' में खुजली नहीं हुई? क्या तुझे यह नहीं लगा कि काश यह पत्थर की दीवार अभी गिर जाए और वह नाग सीधे अपनी मंजिल पा ले?"
नव्या का चेहरा तप उठा, पर वह हटी नहीं। उसने एक कदम और आगे बढ़ाया, इतनी करीब कि विक्रम सिंह को उसके जिस्म की मांसल महक आने लगी।
नव्या: "खुजली तो उसे भी होती है बाबूजी, जो प्यासा हो और सामने समंदर दिख रहा हो। पर मैं वो दरिया हूँ जो सिर्फ सुमित के लिए बहता है। आप बस किनारे बैठकर उसकी लहरें देखिये और अपने उस 'विकराल मूसल' को हाथ से सहलाकर मन बहला लीजिये। क्योंकि इस बिल का दरवाजा तो बंद ही रहेगा, चाहे आपका नाग कितना ही फन क्यों न पटक ले।"
इतना कहकर नव्या ने एक जोरदार ठुमका लगाया, जिससे उसके तरबूज जैसे गांड़ के दोनों हिस्से साड़ी के नीचे एक-दूसरे को मसल गए, और वह खिलखिलाती हुई अंदर चली गई। विक्रम सिंह वहीं बैठे अपनी धोती के भीतर उस पत्थर हो चुके अंग को संभालते रह गए। उन्हें पता था कि नव्या उन्हें तड़पा रही है, पर उस तड़प में जो मज़ा था, वह दुनिया के किसी और सुख में नहीं था।
खिड़की का उलटफेर और नग्न गुणगान
स्थान: नव्या का शयनकक्ष / गलियारा
समय: रात के २:१५ बजे
आज रात फिजाओं में वासना की नमी कुछ ज्यादा ही भारी थी। नव्या के बदन में रात के उस 'दर्शन' ने ऐसी आग सुलगा दी थी कि वह कमरे की ठंडक में भी पसीने से नहा रही थी। उसे लगा कि बाबूजी अपने कमरे में अपने उसी विकराल मूसल की सेवा में व्यस्त होंगे, जैसा उन्होंने कल किया था। इसी बेफिक्री और चरम उत्तेजना में नव्या ने अपनी साड़ी, पेटीकोट और चोली उतारकर फेंक दी।
वह अपने कमरे में पूरी तरह नग्न होकर किसी मदहोश हिरणी की तरह टहल रही थी। मद्धम दूधिया रोशनी में उसके विशाल और रसीले बोबे और उसकी भारी गांड़ के मांसल पट अपनी पूरी नग्नता के साथ चमक रहे थे। वह अपनी जांघों के बीच हाथ फेरते हुए और अपनी चूत के गीलेपन को महसूस करते हुए जोर-जोर से बड़बड़ा रही थी।
नव्या: (सिसकते हुए और बदन को मरोड़ते हुए) "ओह... बाबूजी! क्या चीज़ पाल रखी है आपने अपनी धोती के नीचे। वह खूंखार काला लन्ड... जब से देखा है, मेरी इस चूत ने पानी छोड़ना बंद नहीं किया। मेरा सुमित तो इसके सामने कुछ भी नहीं है। हाय! वह विकराल अंग अगर एक बार मेरी इन फांकों को चीरता हुआ अंदर घुस जाए, तो मैं तो पागल ही हो जाऊँगी।"
उसी वक्त, विक्रम सिंह बाथरूम जाने के लिए अपने कमरे से बाहर निकले। गलियारे से गुजरते वक्त उनकी नज़र अचानक नव्या के कमरे की उसी खिड़की की झिरी पर पड़ी, जहाँ से कल नव्या ने उन्हें देखा था। उन्होंने ठिठक कर एक नज़र अंदर मारी और उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
अंदर का दृश्य किसी महा-विस्फोट से कम नहीं था। उनकी 'सावित्री' बहू पूरी तरह निर्वस्त्र होकर अपना ही बदन मसल रही थी और उनके मूसल के कसीदे पढ़ रही थी।
नव्या: (अपने बोबों को दोनों हाथों से भींचते हुए) "बाबूजी... कहाँ छुपा कर रखा था आपने यह कामुक औजार? इसे देखकर तो पत्थर भी पिघल जाए। मेरा मन कर रहा है कि इसे अभी अपने मुँह में भर लूँ और इसका सारा जहर पी जाऊँ। आप कह रहे थे न कि मैं आपकी 'कामधेनु' हूँ... तो आइये न, अपने उस हथियार से मेरी इस जवानी का शिकार कीजिये। मेरी यह गांड़... ये तरबूज... ये सब आपके उस विकराल लन्ड की मार सहने के लिए तड़प रहे हैं।"
खिड़की के बाहर खड़े विक्रम सिंह का बुरा हाल था। उनकी धोती के भीतर उनका मूसल फिर से पत्थर की तरह सख्त हो गया और नसें उभर आईं। अपनी बहू के मुँह से अपने 'अंग' की ऐसी अश्लील तारीफ सुनकर उनका पोर-पोर कांपने लगा।
विक्रम सिंह (बाहर से बुदबुदाते हुए): "ओह... मेरी कंटीली नागिन! तो तुझे मेरा वह मूसल इतना पसंद आया है? तू अंदर नंगी होकर मेरा नाम जप रही है और मैं बाहर अपनी प्यास से लड़ रहा हूँ। देख ले... देख ले अपनी इस बेबसी को, क्योंकि अब ये आँखें तुझे सिर्फ देख कर नहीं मानेंगी।"
नव्या अपनी ही धुन में अपनी चूत पर उंगलियां चला रही थी, वह ससुर के शब्दों को याद कर-कर के और भी उत्तेजित हो रही थी। वह बार-बार अपनी पीठ फेरकर अपनी भारी गांड़ आईने में देख रही थी और कल्पना कर रही थी कि उस पर ससुर के थप्पड़ और उनके लन्ड की मार पड़ रही है।
विक्रम सिंह वहीं बुत बनकर अपनी बहू के उस नग्न तांडव को देख रहे थे। आज पासा पलट चुका था। कल उसने देखा था, आज वह देख रहे थे। और इस 'देखने' ने कोठी की मर्यादा की अंतिम ईंट को भी हिलाकर रख दिया था।
सुबह की नमी और शब्दों का संभोग
स्थान: कोठी का पिछला आंगन (तुलसी का चौरा)
समय: सुबह ८:१५ बजे
रात के उस 'महा-विस्फोट' के बाद की सुबह और भी भारी थी। नव्या नहा-धोकर, मस्तक पर हल्दी का तिलक लगाए और बदन पर एक कसी हुई नारंगी साड़ी लपेटे तुलसी के चौरे के पास जल चढ़ा रही थी। पर आज उसकी चाल में वह 'सावित्री' वाला अनुशासन कम और एक मदहोश नागिन की लचक ज्यादा थी। उसे पता था कि पीछे बरामदे में बैठे विक्रम सिंह की नज़रें उसके हर उभार को साड़ी के पार भी 'नग्न' देख रही हैं।
विक्रम सिंह के चेहरे पर आज एक अजीब सी विजय वाली चमक थी। उन्होंने अखबार मेज पर पटका और अपनी भारी, कामुक आवाज़ में सन्नाटा तोड़ा।
विक्रम सिंह: "आज तुलसी में जल कुछ ज्यादा ही चढ़ाया जा रहा है नव्या? लगता है रात की 'तपन' अभी तक शांत नहीं हुई... या फिर अंदर कहीं ऐसी आग लगी है जिसे बुझाने के लिए ये लोटा छोटा पड़ रहा है?"
नव्या का हाथ ठिठका, पर उसने नज़रें नहीं उठाईं। रात को जो विकराल मूसल उसने झिरी से देखा था, उसकी छवि उसकी आँखों के सामने नाच गई। उसने पलौटकर ससुर की आँखों में सीधे झाँका—आज डर नहीं, एक चुनौती थी।
नव्या: (अपने भीगे होंठों पर जीभ फेरते हुए) "आग जब कोठी के भीतर ही सुलग रही हो बाबूजी, तो बाहर जल चढ़ाने से क्या होगा? और तपन तो तब शांत हो जब 'बुझाने वाला' अपनी सीमा में रहे। आप तो रात भर खुद ही किसी 'मूसल' की तरह अपनी प्यास से लड़ रहे थे, मैंने सुना था कि रात को आपकी नींद कुछ ज्यादा ही उखड़ी हुई थी।"
विक्रम सिंह का दिल धक से रह गया। नव्या का 'मूसल' शब्द का प्रयोग करना साफ़ इशारा था कि उसने कुछ देख लिया है। उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फ़ैल गई।
विक्रम सिंह: "नीद तो तब आए जब आँखों के सामने वह 'लाल चुनरी' वाला मंज़र न हो। और मेरा वह 'मूसल'... वह तो अब उस 'कुंड' की गहराई नापने के लिए उतावला है जिसे तुमने सुबह-सुबह खुले आम दिखाया था। क्या करूँ नव्या, उसकी जिद्द के आगे मैं भी हार जाता हूँ। वह कहता है कि जब तक उस 'कंटीली' बाड़ को नहीं तोड़ेगा, उसे चैन नहीं आएगा।"
नव्या ने खाली लोटा कमर पर टिकाया, जिससे उसकी भारी गांड़ एक तरफ को तन गई। उसने एक अदा के साथ अपने बालों को पीछे झटका।
नव्या: (द्विअर्थी अंदाज़ में) "जिद्द तो बुरी बला है बाबूजी। पर याद रखियेगा, बाड़ 'कंटीली' है... अगर बिना इजाजत हाथ लगाया तो खून भी निकल सकता है। हाँ, आप अपनी आँखों से जितना चाहें उतना 'दोहन' कर लीजिये। दूध वही अच्छा जो बिना थन छुए नज़रों से पी लिया जाए। क्या आपकी प्यास सिर्फ 'देखने' से नहीं बुझती? या फिर आपको उस 'विकराल औजार' के लिए कोई और ही काम चाहिए?"
विक्रम सिंह: (कुर्सी पर अकड़ते हुए) "देखने से तो सिर्फ भूख बढ़ती है नव्या। असली सुख तो उस 'मंथन' में है जिससे अमृत निकलता है। तू चाहे जितना भी 'छूना मना है' की तख्ती टांग ले, पर तेरी आँखों की ये नमी बता रही है कि रात को तूने भी उस 'मूसल' की मार को ख्यालों में महसूस किया है। बता न... क्या वह खयाल उस 'लाल कपड़े' में तुझे सुहाग की याद नहीं दिला रहा था?"
नव्या का बदन सिहर उठा। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को सीने पर और कसा, पर उसकी उभरी हुई छाती ससुर की आँखों को जवाब दे रही थी।
नव्या: "सुहाग की सेज तो दूर की बात है बाबूजी, अभी तो आपको इसी 'दर्शन' पर गुजारा करना होगा। आप अपनी उस 'जागीर' को संभाल कर रखिये, कहीं ऐसा न हो कि मर्यादा की आग में वह जलकर राख हो जाए। मैं तो सावित्री हूँ... सिर्फ नज़रों से जलाना जानती हूँ।"
वह मटकती हुई रसोई की ओर बढ़ गई, पर जाते-जाते पीछे की ओर एक ऐसी नज़र डाल गई जिसने विक्रम सिंह के लन्ड में फिर से जान फूंक दी। दोनों के बीच स्पर्श की दीवार अभी भी खड़ी थी, पर शब्दों के जरिए वे एक-दूसरे को नंगा करके भोग रहे थे।
नव्या रसोई की दहलीज तक जाकर अचानक ठिठक गई। उसने एक गहरी सांस ली, जिससे उसकी नारंगी साड़ी में कसे हुए बोबे बाहर निकलने को बेताब हो उठे। वह धीरे से पलटी और अपनी कमर पर हाथ रखकर, तिरछी नजरों से विक्रम सिंह को देखने लगी। उसकी आँखों में अब वह 'बहू' वाली शर्म नहीं, बल्कि एक शिकारी की शोखी थी।
नव्या: (मुस्कुराते हुए) "बाबूजी, एक बात कहना तो भूल ही गई। रात को जिस 'नाग' को आप अपने हाथ में थामे फुफकार रहे थे, उसे इतना खुला न छोड़ें। वह बहुत खतरनाक लग रहा था। कहीं ऐसा न हो कि अपनी फुफकार के नशे में वह किसी ऐसे 'बिल' में घुसने की कोशिश कर बैठे, जिसकी गहराई नापने की उसे इजाजत नहीं है।"
विक्रम सिंह ने चाय का घूंट भरा और अपनी मूंछों पर ताव देते हुए नव्या के बदन के एक-एक उतार-चढ़ाव को अपनी आँखों से चाटने लगे।
विक्रम सिंह: "बिल अगर इतना रसीला और तंग हो नव्या, तो नाग अपनी जान की परवाह नहीं करता। और वह कोई मामूली सांप नहीं है, वह तो 'काल' है। उसे बिल की गहराई से डर नहीं लगता, उसे तो बस उस 'गर्मी' की तलाश है जो आज सुबह तेरे उस गीले बदन से छूट रही थी। तूने उसे खुली आँखों से देख लिया है, अब वह शांत नहीं बैठेगा।"
नव्या ने अपने गुलाबी होंठों को फिर से दाँतों तले दबाया और अपनी गांड़ को थोड़ा और पीछे की ओर मटकाया।
नव्या: "गर्मी तो बिल में बहुत है बाबूजी, पर उस बिल के मुहाने पर मर्यादा के पत्थर रखे हैं। आपका वह नाग चाहे जितना भी विकराल हो जाए, उन पत्थरों से टकराकर अपना सिर ही फोड़ेगा। और सुनिए, वह जो आप 'अमृत' की बातें कर रहे थे... उसे अपनी मुट्ठी में ही कैद रखिये। उसे फर्श पर बहाना शोभा नहीं देता, वह तो किसी 'पवित्र कलश' की अमानत है।"
विक्रम सिंह की आँखों में अश्लीलता का सैलाब उमड़ पड़ा। उन्होंने अपनी कुर्सी को थोड़ा आगे खिसकाया।
विक्रम सिंह: "कलश तो तू ही है नव्या... पर तूने उस पर 'छूना मना है' की मुहर लगा रखी है। पर तू भूल रही है, नाग को छूने की ज़रूरत नहीं होती, वह तो अपनी ज़हरीली फुफकार और नज़रों से ही शिकार को अधमरा कर देता है। और जो तूने रात को झिरी से मेरा वह 'औजार' देखा है, वह अब तेरे सपनों में भी बिल खोदने आएगा। बता न... क्या उसे देखकर तेरी उस 'कंटीली चूत' में खुजली नहीं हुई? क्या तुझे यह नहीं लगा कि काश यह पत्थर की दीवार अभी गिर जाए और वह नाग सीधे अपनी मंजिल पा ले?"
नव्या का चेहरा तप उठा, पर वह हटी नहीं। उसने एक कदम और आगे बढ़ाया, इतनी करीब कि विक्रम सिंह को उसके जिस्म की मांसल महक आने लगी।
नव्या: "खुजली तो उसे भी होती है बाबूजी, जो प्यासा हो और सामने समंदर दिख रहा हो। पर मैं वो दरिया हूँ जो सिर्फ सुमित के लिए बहता है। आप बस किनारे बैठकर उसकी लहरें देखिये और अपने उस 'विकराल मूसल' को हाथ से सहलाकर मन बहला लीजिये। क्योंकि इस बिल का दरवाजा तो बंद ही रहेगा, चाहे आपका नाग कितना ही फन क्यों न पटक ले।"
इतना कहकर नव्या ने एक जोरदार ठुमका लगाया, जिससे उसके तरबूज जैसे गांड़ के दोनों हिस्से साड़ी के नीचे एक-दूसरे को मसल गए, और वह खिलखिलाती हुई अंदर चली गई। विक्रम सिंह वहीं बैठे अपनी धोती के भीतर उस पत्थर हो चुके अंग को संभालते रह गए। उन्हें पता था कि नव्या उन्हें तड़पा रही है, पर उस तड़प में जो मज़ा था, वह दुनिया के किसी और सुख में नहीं था।
खिड़की का उलटफेर और नग्न गुणगान
स्थान: नव्या का शयनकक्ष / गलियारा
समय: रात के २:१५ बजे
आज रात फिजाओं में वासना की नमी कुछ ज्यादा ही भारी थी। नव्या के बदन में रात के उस 'दर्शन' ने ऐसी आग सुलगा दी थी कि वह कमरे की ठंडक में भी पसीने से नहा रही थी। उसे लगा कि बाबूजी अपने कमरे में अपने उसी विकराल मूसल की सेवा में व्यस्त होंगे, जैसा उन्होंने कल किया था। इसी बेफिक्री और चरम उत्तेजना में नव्या ने अपनी साड़ी, पेटीकोट और चोली उतारकर फेंक दी।
वह अपने कमरे में पूरी तरह नग्न होकर किसी मदहोश हिरणी की तरह टहल रही थी। मद्धम दूधिया रोशनी में उसके विशाल और रसीले बोबे और उसकी भारी गांड़ के मांसल पट अपनी पूरी नग्नता के साथ चमक रहे थे। वह अपनी जांघों के बीच हाथ फेरते हुए और अपनी चूत के गीलेपन को महसूस करते हुए जोर-जोर से बड़बड़ा रही थी।
नव्या: (सिसकते हुए और बदन को मरोड़ते हुए) "ओह... बाबूजी! क्या चीज़ पाल रखी है आपने अपनी धोती के नीचे। वह खूंखार काला लन्ड... जब से देखा है, मेरी इस चूत ने पानी छोड़ना बंद नहीं किया। मेरा सुमित तो इसके सामने कुछ भी नहीं है। हाय! वह विकराल अंग अगर एक बार मेरी इन फांकों को चीरता हुआ अंदर घुस जाए, तो मैं तो पागल ही हो जाऊँगी।"
उसी वक्त, विक्रम सिंह बाथरूम जाने के लिए अपने कमरे से बाहर निकले। गलियारे से गुजरते वक्त उनकी नज़र अचानक नव्या के कमरे की उसी खिड़की की झिरी पर पड़ी, जहाँ से कल नव्या ने उन्हें देखा था। उन्होंने ठिठक कर एक नज़र अंदर मारी और उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
अंदर का दृश्य किसी महा-विस्फोट से कम नहीं था। उनकी 'सावित्री' बहू पूरी तरह निर्वस्त्र होकर अपना ही बदन मसल रही थी और उनके मूसल के कसीदे पढ़ रही थी।
नव्या: (अपने बोबों को दोनों हाथों से भींचते हुए) "बाबूजी... कहाँ छुपा कर रखा था आपने यह कामुक औजार? इसे देखकर तो पत्थर भी पिघल जाए। मेरा मन कर रहा है कि इसे अभी अपने मुँह में भर लूँ और इसका सारा जहर पी जाऊँ। आप कह रहे थे न कि मैं आपकी 'कामधेनु' हूँ... तो आइये न, अपने उस हथियार से मेरी इस जवानी का शिकार कीजिये। मेरी यह गांड़... ये तरबूज... ये सब आपके उस विकराल लन्ड की मार सहने के लिए तड़प रहे हैं।"
खिड़की के बाहर खड़े विक्रम सिंह का बुरा हाल था। उनकी धोती के भीतर उनका मूसल फिर से पत्थर की तरह सख्त हो गया और नसें उभर आईं। अपनी बहू के मुँह से अपने 'अंग' की ऐसी अश्लील तारीफ सुनकर उनका पोर-पोर कांपने लगा।
विक्रम सिंह (बाहर से बुदबुदाते हुए): "ओह... मेरी कंटीली नागिन! तो तुझे मेरा वह मूसल इतना पसंद आया है? तू अंदर नंगी होकर मेरा नाम जप रही है और मैं बाहर अपनी प्यास से लड़ रहा हूँ। देख ले... देख ले अपनी इस बेबसी को, क्योंकि अब ये आँखें तुझे सिर्फ देख कर नहीं मानेंगी।"
नव्या अपनी ही धुन में अपनी चूत पर उंगलियां चला रही थी, वह ससुर के शब्दों को याद कर-कर के और भी उत्तेजित हो रही थी। वह बार-बार अपनी पीठ फेरकर अपनी भारी गांड़ आईने में देख रही थी और कल्पना कर रही थी कि उस पर ससुर के थप्पड़ और उनके लन्ड की मार पड़ रही है।
विक्रम सिंह वहीं बुत बनकर अपनी बहू के उस नग्न तांडव को देख रहे थे। आज पासा पलट चुका था। कल उसने देखा था, आज वह देख रहे थे। और इस 'देखने' ने कोठी की मर्यादा की अंतिम ईंट को भी हिलाकर रख दिया था।
विक्रम सिंह खिड़की की झिरी से चिपके हुए थे, उनकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। अंदर नव्या नग्नता के उस मुकाम पर थी जहाँ सुध-बुध पूरी तरह खो चुकी थी। वह अपने जिस्म को मसलते हुए अब अपनी माँ मालती को याद करने लगी थी। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा नशा और अश्लीलता का उबाल था।
नव्या (अंदर नग्नता में झूमते हुए): "आह... माँ! तू सही कहती थी कि इस खानदान की औरतों के खून में ही प्यास है। मौसी ने मुझे सब बताया था माँ... कि तेरी शादी की उन फेरों वाली रातों में, जब पूरा घर सोया था, तू एक जवान और कतई खूंखार लन्ड के नीचे दबी घंटों अपनी चूत की प्यास बुझा रही थी। तूने मर्यादा की चुनरी उतारकर उस मर्दानगी का जहर पिया था, और आज देख... तेरी बेटी भी उसी राह पर है!"
बाहर खड़े विक्रम सिंह यह सुनकर सन्न रह गए। मालती का वह पुराना किस्सा उनके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरा। वह हैरान थे कि नव्या को अपनी माँ के उस गुप्त 'रति-काण्ड' का पता है और वह उसे बड़े गर्व से याद कर रही है।
नव्या: (अपनी भारी गांड़ को दीवार से सटाकर रगड़ते हुए) "माँ, तूने तो किसी गै़र के लन्ड से अपनी आग बुझाई थी, पर तेरी बेटी तो अपने ही ससुर के उस विकराल मूसल की दीवानी हो गई है। माँ, अगर तू आज देखती कि बाबूजी के पास क्या औजार है, तो तू भी अपनी कब्र से निकल आती। वह काला और मोटा नाग... जब वह हिलता है, तो मेरा जी करता है कि मैं अपनी माँ की तरह ही बेशर्म होकर उसे अपने भीतर उतार लूँ।"
विक्रम सिंह का कलेजा मुँह को आ गया। नव्या के मुँह से 'माँ' और 'चुदाई' जैसे शब्द सुनकर उनकी कामुकता हिंसक होने लगी। उनकी धोती अब उस पत्थर हुए लन्ड का बोझ नहीं सह पा रही थी। उन्हें समझ आ गया कि नव्या के भीतर सिर्फ जवानी नहीं, बल्कि एक खानदानी 'आग' विरासत में मिली है।
नव्या: "माँ, तूने फेरों की रात जो सुख पाया था, मैं उसे रोज़ अपनी आँखों से देख रही हूँ। बाबूजी का वह लाल सुपाड़ा... आह! जब वह मुट्ठी में उसे दबाते हैं, तो मुझे अपनी चूत में तेरी वही वाली तड़प महसूस होती है। मैं भी तेरी ही तरह कुलटा बनूँगी माँ... इस कोठी की इज्जत को बाबूजी के उस मूसल के नीचे कुचलवा दूँगी!"
विक्रम सिंह अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। उनकी बहू, जिसे वह सिर्फ एक 'कंटीली औरत' समझ रहे थे, वह तो वासना की एक पूरी 'परम्परा' ढो रही थी। मालती का वह पुराना ज़िक्र और नव्या की यह नग्नता—दोनों ने मिलकर विक्रम सिंह के संयम की चिता जला दी थी। वह खिड़की से चिपके, अपनी धोती के भीतर उस विकराल अंग को सहलाते हुए बस यही सोच रहे थे कि इस 'मालती की बेटी' को अब वो मज़ा चखाना है जो उसे उसकी माँ ने भी नहीं चखाया होगा।
नग्न विरासत और दोहरा चरमोत्कर्ष
स्थान: नव्या का शयनकक्ष और बाहरी गलियारा
समय: रात के ३:०० बजे
अंदर और बाहर, वासना का वह घमासान छिड़ा था जिसकी गूँज कोठी की दीवारों को कपा रही थी।
नव्या अपनी माँ मालती की उस 'फेरों वाली रात' की चुदाई को अपनी बंद आँखों के पीछे फिर से जी रही थी। वह अपनी नग्न जांघों को फर्श पर पटक रही थी और उसके विशाल बोबे उसकी तेज सांसों के साथ पागलपन की हद तक उछल रहे थे।
नव्या (अंदर सिसकते हुए): "आह माँ! तूने उस रात जो चीखें दबाई थीं, वो आज मेरे गले से निकलना चाहती हैं। तूने उस जवान लन्ड को अपनी चूत की गहराइयों में उतार कर जो स्वर्ग पाया था... देख माँ, आज तेरी बेटी भी वैसे ही सिसक रही है। बाबूजी का वह मूसल देख कर मेरा रोम-रोम तुझे पुकार रहा है। ये खानदानी प्यास है माँ... जो आज बाबूजी के इस विकराल अंग को देख कर फट पड़ी है! फाड़ दीजिये बाबूजी... जैसे उस मर्द ने मेरी माँ को फाड़ा था, वैसे ही मुझे भी तहस-नहस कर दीजिये!"
खिड़की के बाहर विक्रम सिंह का हाल बेहाल था। मालती के उस पुराने किस्से और नव्या की इन अश्लील बातों ने उनके मूसल को लोहे की छड़ से भी ज्यादा सख्त कर दिया था। उनके हाथ की रफ़्तार अब किसी मशीन जैसी थी। वह झिरी से नव्या के उस पूरी तरह नग्न और पसीने से भीगे बदन को देख रहे थे, जो फर्श पर लोट रहा था।
विक्रम सिंह (बाहर गुर्राते हुए): "मालती की बच्ची... तूने अपनी माँ का राज खोलकर अपनी मौत बुला ली है। अब तेरा ये तरबूज जैसा बदन और ये भरी हुई गांड़ मेरी इस मर्दानगी की मार से बच नहीं पाएगी। तू प्यासी है न? ले... देख अपनी माँ के उस 'पुराने पापकर्म' का जवाब... मेरा ये विकराल लन्ड तुझे वो मज़ा देगा जो तेरी माँ भी भूल जाएगी!"
अंदर नव्या का हाथ अब उसकी चूत की गहराई में पागलों की तरह चल रहा था। उसे खिड़की के बाहर ससुर के हाथ की रफ़्तार का अंदाज़ा था। वह अपनी माँ की उस रात की कल्पना और ससुर के इस काले नाग के बीच पिस रही थी।
नव्या: "आह... माँ... मैं जा रही हूँ... बाबूजी का वो लाल सुपाड़ा मेरी आँखों में धंस गया है... ले लीजिये मुझे... आह! माँ... मैं झड़ रही हूँ!"
ठीक उसी पल, नव्या के शरीर में एक ज़ोरदार ऐंठन आई। उसकी चूत ने गरम काम-रस का फव्वारा छोड़ दिया और वह फर्श पर मछली की तरह तड़प कर निढाल हो गई। उसकी आँखों के सामने अपनी माँ की चुदाई और ससुर का नंगा लन्ड एक साथ विलीन हो गए।
बाहर विक्रम सिंह का भी बांध टूट चुका था। नव्या के मुँह से 'माँ की चुदाई' के किस्से सुनते ही उनका सफ़ेद और गाढ़ा लावा झटके के साथ उनकी मुट्ठी से निकलकर गलियारे की दीवार और फर्श पर बिखर गया। वह हांफते हुए दीवार से टिक गए, उनका विकराल मूसल अभी भी थरथरा रहा था।
दो अलग-अलग दुनिया, एक ही प्यास, और दो चरम—पर 'छूना' अभी भी वर्जित था।
दोनों ससुर बहु एक साथ झड़े हैं कितना हसीन इत्तेफाक है देवियों, क्या कोई बहु इतनी कामुक होती है कमेंट में बताए कोई औरत,,,,
स्थान: कोठी का पिछला आंगन (तुलसी का चौरा)
समय: सुबह ८:१५ बजे
रात के उस 'महा-विस्फोट' के बाद की सुबह और भी भारी थी। नव्या नहा-धोकर, मस्तक पर हल्दी का तिलक लगाए और बदन पर एक कसी हुई नारंगी साड़ी लपेटे तुलसी के चौरे के पास जल चढ़ा रही थी। पर आज उसकी चाल में वह 'सावित्री' वाला अनुशासन कम और एक मदहोश नागिन की लचक ज्यादा थी। उसे पता था कि पीछे बरामदे में बैठे विक्रम सिंह की नज़रें उसके हर उभार को साड़ी के पार भी 'नग्न' देख रही हैं।
विक्रम सिंह के चेहरे पर आज एक अजीब सी विजय वाली चमक थी। उन्होंने अखबार मेज पर पटका और अपनी भारी, कामुक आवाज़ में सन्नाटा तोड़ा।
विक्रम सिंह: "आज तुलसी में जल कुछ ज्यादा ही चढ़ाया जा रहा है नव्या? लगता है रात की 'तपन' अभी तक शांत नहीं हुई... या फिर अंदर कहीं ऐसी आग लगी है जिसे बुझाने के लिए ये लोटा छोटा पड़ रहा है?"
नव्या का हाथ ठिठका, पर उसने नज़रें नहीं उठाईं। रात को जो विकराल मूसल उसने झिरी से देखा था, उसकी छवि उसकी आँखों के सामने नाच गई। उसने पलौटकर ससुर की आँखों में सीधे झाँका—आज डर नहीं, एक चुनौती थी।
नव्या: (अपने भीगे होंठों पर जीभ फेरते हुए) "आग जब कोठी के भीतर ही सुलग रही हो बाबूजी, तो बाहर जल चढ़ाने से क्या होगा? और तपन तो तब शांत हो जब 'बुझाने वाला' अपनी सीमा में रहे। आप तो रात भर खुद ही किसी 'मूसल' की तरह अपनी प्यास से लड़ रहे थे, मैंने सुना था कि रात को आपकी नींद कुछ ज्यादा ही उखड़ी हुई थी।"
विक्रम सिंह का दिल धक से रह गया। नव्या का 'मूसल' शब्द का प्रयोग करना साफ़ इशारा था कि उसने कुछ देख लिया है। उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फ़ैल गई।
विक्रम सिंह: "नीद तो तब आए जब आँखों के सामने वह 'लाल चुनरी' वाला मंज़र न हो। और मेरा वह 'मूसल'... वह तो अब उस 'कुंड' की गहराई नापने के लिए उतावला है जिसे तुमने सुबह-सुबह खुले आम दिखाया था। क्या करूँ नव्या, उसकी जिद्द के आगे मैं भी हार जाता हूँ। वह कहता है कि जब तक उस 'कंटीली' बाड़ को नहीं तोड़ेगा, उसे चैन नहीं आएगा।"
नव्या ने खाली लोटा कमर पर टिकाया, जिससे उसकी भारी गांड़ एक तरफ को तन गई। उसने एक अदा के साथ अपने बालों को पीछे झटका।
नव्या: (द्विअर्थी अंदाज़ में) "जिद्द तो बुरी बला है बाबूजी। पर याद रखियेगा, बाड़ 'कंटीली' है... अगर बिना इजाजत हाथ लगाया तो खून भी निकल सकता है। हाँ, आप अपनी आँखों से जितना चाहें उतना 'दोहन' कर लीजिये। दूध वही अच्छा जो बिना थन छुए नज़रों से पी लिया जाए। क्या आपकी प्यास सिर्फ 'देखने' से नहीं बुझती? या फिर आपको उस 'विकराल औजार' के लिए कोई और ही काम चाहिए?"
विक्रम सिंह: (कुर्सी पर अकड़ते हुए) "देखने से तो सिर्फ भूख बढ़ती है नव्या। असली सुख तो उस 'मंथन' में है जिससे अमृत निकलता है। तू चाहे जितना भी 'छूना मना है' की तख्ती टांग ले, पर तेरी आँखों की ये नमी बता रही है कि रात को तूने भी उस 'मूसल' की मार को ख्यालों में महसूस किया है। बता न... क्या वह खयाल उस 'लाल कपड़े' में तुझे सुहाग की याद नहीं दिला रहा था?"
नव्या का बदन सिहर उठा। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को सीने पर और कसा, पर उसकी उभरी हुई छाती ससुर की आँखों को जवाब दे रही थी।
नव्या: "सुहाग की सेज तो दूर की बात है बाबूजी, अभी तो आपको इसी 'दर्शन' पर गुजारा करना होगा। आप अपनी उस 'जागीर' को संभाल कर रखिये, कहीं ऐसा न हो कि मर्यादा की आग में वह जलकर राख हो जाए। मैं तो सावित्री हूँ... सिर्फ नज़रों से जलाना जानती हूँ।"
वह मटकती हुई रसोई की ओर बढ़ गई, पर जाते-जाते पीछे की ओर एक ऐसी नज़र डाल गई जिसने विक्रम सिंह के लन्ड में फिर से जान फूंक दी। दोनों के बीच स्पर्श की दीवार अभी भी खड़ी थी, पर शब्दों के जरिए वे एक-दूसरे को नंगा करके भोग रहे थे।
नव्या रसोई की दहलीज तक जाकर अचानक ठिठक गई। उसने एक गहरी सांस ली, जिससे उसकी नारंगी साड़ी में कसे हुए बोबे बाहर निकलने को बेताब हो उठे। वह धीरे से पलटी और अपनी कमर पर हाथ रखकर, तिरछी नजरों से विक्रम सिंह को देखने लगी। उसकी आँखों में अब वह 'बहू' वाली शर्म नहीं, बल्कि एक शिकारी की शोखी थी।
नव्या: (मुस्कुराते हुए) "बाबूजी, एक बात कहना तो भूल ही गई। रात को जिस 'नाग' को आप अपने हाथ में थामे फुफकार रहे थे, उसे इतना खुला न छोड़ें। वह बहुत खतरनाक लग रहा था। कहीं ऐसा न हो कि अपनी फुफकार के नशे में वह किसी ऐसे 'बिल' में घुसने की कोशिश कर बैठे, जिसकी गहराई नापने की उसे इजाजत नहीं है।"
विक्रम सिंह ने चाय का घूंट भरा और अपनी मूंछों पर ताव देते हुए नव्या के बदन के एक-एक उतार-चढ़ाव को अपनी आँखों से चाटने लगे।
विक्रम सिंह: "बिल अगर इतना रसीला और तंग हो नव्या, तो नाग अपनी जान की परवाह नहीं करता। और वह कोई मामूली सांप नहीं है, वह तो 'काल' है। उसे बिल की गहराई से डर नहीं लगता, उसे तो बस उस 'गर्मी' की तलाश है जो आज सुबह तेरे उस गीले बदन से छूट रही थी। तूने उसे खुली आँखों से देख लिया है, अब वह शांत नहीं बैठेगा।"
नव्या ने अपने गुलाबी होंठों को फिर से दाँतों तले दबाया और अपनी गांड़ को थोड़ा और पीछे की ओर मटकाया।
नव्या: "गर्मी तो बिल में बहुत है बाबूजी, पर उस बिल के मुहाने पर मर्यादा के पत्थर रखे हैं। आपका वह नाग चाहे जितना भी विकराल हो जाए, उन पत्थरों से टकराकर अपना सिर ही फोड़ेगा। और सुनिए, वह जो आप 'अमृत' की बातें कर रहे थे... उसे अपनी मुट्ठी में ही कैद रखिये। उसे फर्श पर बहाना शोभा नहीं देता, वह तो किसी 'पवित्र कलश' की अमानत है।"
विक्रम सिंह की आँखों में अश्लीलता का सैलाब उमड़ पड़ा। उन्होंने अपनी कुर्सी को थोड़ा आगे खिसकाया।
विक्रम सिंह: "कलश तो तू ही है नव्या... पर तूने उस पर 'छूना मना है' की मुहर लगा रखी है। पर तू भूल रही है, नाग को छूने की ज़रूरत नहीं होती, वह तो अपनी ज़हरीली फुफकार और नज़रों से ही शिकार को अधमरा कर देता है। और जो तूने रात को झिरी से मेरा वह 'औजार' देखा है, वह अब तेरे सपनों में भी बिल खोदने आएगा। बता न... क्या उसे देखकर तेरी उस 'कंटीली चूत' में खुजली नहीं हुई? क्या तुझे यह नहीं लगा कि काश यह पत्थर की दीवार अभी गिर जाए और वह नाग सीधे अपनी मंजिल पा ले?"
नव्या का चेहरा तप उठा, पर वह हटी नहीं। उसने एक कदम और आगे बढ़ाया, इतनी करीब कि विक्रम सिंह को उसके जिस्म की मांसल महक आने लगी।
नव्या: "खुजली तो उसे भी होती है बाबूजी, जो प्यासा हो और सामने समंदर दिख रहा हो। पर मैं वो दरिया हूँ जो सिर्फ सुमित के लिए बहता है। आप बस किनारे बैठकर उसकी लहरें देखिये और अपने उस 'विकराल मूसल' को हाथ से सहलाकर मन बहला लीजिये। क्योंकि इस बिल का दरवाजा तो बंद ही रहेगा, चाहे आपका नाग कितना ही फन क्यों न पटक ले।"
इतना कहकर नव्या ने एक जोरदार ठुमका लगाया, जिससे उसके तरबूज जैसे गांड़ के दोनों हिस्से साड़ी के नीचे एक-दूसरे को मसल गए, और वह खिलखिलाती हुई अंदर चली गई। विक्रम सिंह वहीं बैठे अपनी धोती के भीतर उस पत्थर हो चुके अंग को संभालते रह गए। उन्हें पता था कि नव्या उन्हें तड़पा रही है, पर उस तड़प में जो मज़ा था, वह दुनिया के किसी और सुख में नहीं था।
खिड़की का उलटफेर और नग्न गुणगान
स्थान: नव्या का शयनकक्ष / गलियारा
समय: रात के २:१५ बजे
आज रात फिजाओं में वासना की नमी कुछ ज्यादा ही भारी थी। नव्या के बदन में रात के उस 'दर्शन' ने ऐसी आग सुलगा दी थी कि वह कमरे की ठंडक में भी पसीने से नहा रही थी। उसे लगा कि बाबूजी अपने कमरे में अपने उसी विकराल मूसल की सेवा में व्यस्त होंगे, जैसा उन्होंने कल किया था। इसी बेफिक्री और चरम उत्तेजना में नव्या ने अपनी साड़ी, पेटीकोट और चोली उतारकर फेंक दी।
वह अपने कमरे में पूरी तरह नग्न होकर किसी मदहोश हिरणी की तरह टहल रही थी। मद्धम दूधिया रोशनी में उसके विशाल और रसीले बोबे और उसकी भारी गांड़ के मांसल पट अपनी पूरी नग्नता के साथ चमक रहे थे। वह अपनी जांघों के बीच हाथ फेरते हुए और अपनी चूत के गीलेपन को महसूस करते हुए जोर-जोर से बड़बड़ा रही थी।
नव्या: (सिसकते हुए और बदन को मरोड़ते हुए) "ओह... बाबूजी! क्या चीज़ पाल रखी है आपने अपनी धोती के नीचे। वह खूंखार काला लन्ड... जब से देखा है, मेरी इस चूत ने पानी छोड़ना बंद नहीं किया। मेरा सुमित तो इसके सामने कुछ भी नहीं है। हाय! वह विकराल अंग अगर एक बार मेरी इन फांकों को चीरता हुआ अंदर घुस जाए, तो मैं तो पागल ही हो जाऊँगी।"
उसी वक्त, विक्रम सिंह बाथरूम जाने के लिए अपने कमरे से बाहर निकले। गलियारे से गुजरते वक्त उनकी नज़र अचानक नव्या के कमरे की उसी खिड़की की झिरी पर पड़ी, जहाँ से कल नव्या ने उन्हें देखा था। उन्होंने ठिठक कर एक नज़र अंदर मारी और उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
अंदर का दृश्य किसी महा-विस्फोट से कम नहीं था। उनकी 'सावित्री' बहू पूरी तरह निर्वस्त्र होकर अपना ही बदन मसल रही थी और उनके मूसल के कसीदे पढ़ रही थी।
नव्या: (अपने बोबों को दोनों हाथों से भींचते हुए) "बाबूजी... कहाँ छुपा कर रखा था आपने यह कामुक औजार? इसे देखकर तो पत्थर भी पिघल जाए। मेरा मन कर रहा है कि इसे अभी अपने मुँह में भर लूँ और इसका सारा जहर पी जाऊँ। आप कह रहे थे न कि मैं आपकी 'कामधेनु' हूँ... तो आइये न, अपने उस हथियार से मेरी इस जवानी का शिकार कीजिये। मेरी यह गांड़... ये तरबूज... ये सब आपके उस विकराल लन्ड की मार सहने के लिए तड़प रहे हैं।"
खिड़की के बाहर खड़े विक्रम सिंह का बुरा हाल था। उनकी धोती के भीतर उनका मूसल फिर से पत्थर की तरह सख्त हो गया और नसें उभर आईं। अपनी बहू के मुँह से अपने 'अंग' की ऐसी अश्लील तारीफ सुनकर उनका पोर-पोर कांपने लगा।
विक्रम सिंह (बाहर से बुदबुदाते हुए): "ओह... मेरी कंटीली नागिन! तो तुझे मेरा वह मूसल इतना पसंद आया है? तू अंदर नंगी होकर मेरा नाम जप रही है और मैं बाहर अपनी प्यास से लड़ रहा हूँ। देख ले... देख ले अपनी इस बेबसी को, क्योंकि अब ये आँखें तुझे सिर्फ देख कर नहीं मानेंगी।"
नव्या अपनी ही धुन में अपनी चूत पर उंगलियां चला रही थी, वह ससुर के शब्दों को याद कर-कर के और भी उत्तेजित हो रही थी। वह बार-बार अपनी पीठ फेरकर अपनी भारी गांड़ आईने में देख रही थी और कल्पना कर रही थी कि उस पर ससुर के थप्पड़ और उनके लन्ड की मार पड़ रही है।
विक्रम सिंह वहीं बुत बनकर अपनी बहू के उस नग्न तांडव को देख रहे थे। आज पासा पलट चुका था। कल उसने देखा था, आज वह देख रहे थे। और इस 'देखने' ने कोठी की मर्यादा की अंतिम ईंट को भी हिलाकर रख दिया था।
सुबह की नमी और शब्दों का संभोग
स्थान: कोठी का पिछला आंगन (तुलसी का चौरा)
समय: सुबह ८:१५ बजे
रात के उस 'महा-विस्फोट' के बाद की सुबह और भी भारी थी। नव्या नहा-धोकर, मस्तक पर हल्दी का तिलक लगाए और बदन पर एक कसी हुई नारंगी साड़ी लपेटे तुलसी के चौरे के पास जल चढ़ा रही थी। पर आज उसकी चाल में वह 'सावित्री' वाला अनुशासन कम और एक मदहोश नागिन की लचक ज्यादा थी। उसे पता था कि पीछे बरामदे में बैठे विक्रम सिंह की नज़रें उसके हर उभार को साड़ी के पार भी 'नग्न' देख रही हैं।
विक्रम सिंह के चेहरे पर आज एक अजीब सी विजय वाली चमक थी। उन्होंने अखबार मेज पर पटका और अपनी भारी, कामुक आवाज़ में सन्नाटा तोड़ा।
विक्रम सिंह: "आज तुलसी में जल कुछ ज्यादा ही चढ़ाया जा रहा है नव्या? लगता है रात की 'तपन' अभी तक शांत नहीं हुई... या फिर अंदर कहीं ऐसी आग लगी है जिसे बुझाने के लिए ये लोटा छोटा पड़ रहा है?"
नव्या का हाथ ठिठका, पर उसने नज़रें नहीं उठाईं। रात को जो विकराल मूसल उसने झिरी से देखा था, उसकी छवि उसकी आँखों के सामने नाच गई। उसने पलौटकर ससुर की आँखों में सीधे झाँका—आज डर नहीं, एक चुनौती थी।
नव्या: (अपने भीगे होंठों पर जीभ फेरते हुए) "आग जब कोठी के भीतर ही सुलग रही हो बाबूजी, तो बाहर जल चढ़ाने से क्या होगा? और तपन तो तब शांत हो जब 'बुझाने वाला' अपनी सीमा में रहे। आप तो रात भर खुद ही किसी 'मूसल' की तरह अपनी प्यास से लड़ रहे थे, मैंने सुना था कि रात को आपकी नींद कुछ ज्यादा ही उखड़ी हुई थी।"
विक्रम सिंह का दिल धक से रह गया। नव्या का 'मूसल' शब्द का प्रयोग करना साफ़ इशारा था कि उसने कुछ देख लिया है। उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फ़ैल गई।
विक्रम सिंह: "नीद तो तब आए जब आँखों के सामने वह 'लाल चुनरी' वाला मंज़र न हो। और मेरा वह 'मूसल'... वह तो अब उस 'कुंड' की गहराई नापने के लिए उतावला है जिसे तुमने सुबह-सुबह खुले आम दिखाया था। क्या करूँ नव्या, उसकी जिद्द के आगे मैं भी हार जाता हूँ। वह कहता है कि जब तक उस 'कंटीली' बाड़ को नहीं तोड़ेगा, उसे चैन नहीं आएगा।"
नव्या ने खाली लोटा कमर पर टिकाया, जिससे उसकी भारी गांड़ एक तरफ को तन गई। उसने एक अदा के साथ अपने बालों को पीछे झटका।
नव्या: (द्विअर्थी अंदाज़ में) "जिद्द तो बुरी बला है बाबूजी। पर याद रखियेगा, बाड़ 'कंटीली' है... अगर बिना इजाजत हाथ लगाया तो खून भी निकल सकता है। हाँ, आप अपनी आँखों से जितना चाहें उतना 'दोहन' कर लीजिये। दूध वही अच्छा जो बिना थन छुए नज़रों से पी लिया जाए। क्या आपकी प्यास सिर्फ 'देखने' से नहीं बुझती? या फिर आपको उस 'विकराल औजार' के लिए कोई और ही काम चाहिए?"
विक्रम सिंह: (कुर्सी पर अकड़ते हुए) "देखने से तो सिर्फ भूख बढ़ती है नव्या। असली सुख तो उस 'मंथन' में है जिससे अमृत निकलता है। तू चाहे जितना भी 'छूना मना है' की तख्ती टांग ले, पर तेरी आँखों की ये नमी बता रही है कि रात को तूने भी उस 'मूसल' की मार को ख्यालों में महसूस किया है। बता न... क्या वह खयाल उस 'लाल कपड़े' में तुझे सुहाग की याद नहीं दिला रहा था?"
नव्या का बदन सिहर उठा। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को सीने पर और कसा, पर उसकी उभरी हुई छाती ससुर की आँखों को जवाब दे रही थी।
नव्या: "सुहाग की सेज तो दूर की बात है बाबूजी, अभी तो आपको इसी 'दर्शन' पर गुजारा करना होगा। आप अपनी उस 'जागीर' को संभाल कर रखिये, कहीं ऐसा न हो कि मर्यादा की आग में वह जलकर राख हो जाए। मैं तो सावित्री हूँ... सिर्फ नज़रों से जलाना जानती हूँ।"
वह मटकती हुई रसोई की ओर बढ़ गई, पर जाते-जाते पीछे की ओर एक ऐसी नज़र डाल गई जिसने विक्रम सिंह के लन्ड में फिर से जान फूंक दी। दोनों के बीच स्पर्श की दीवार अभी भी खड़ी थी, पर शब्दों के जरिए वे एक-दूसरे को नंगा करके भोग रहे थे।
नव्या रसोई की दहलीज तक जाकर अचानक ठिठक गई। उसने एक गहरी सांस ली, जिससे उसकी नारंगी साड़ी में कसे हुए बोबे बाहर निकलने को बेताब हो उठे। वह धीरे से पलटी और अपनी कमर पर हाथ रखकर, तिरछी नजरों से विक्रम सिंह को देखने लगी। उसकी आँखों में अब वह 'बहू' वाली शर्म नहीं, बल्कि एक शिकारी की शोखी थी।
नव्या: (मुस्कुराते हुए) "बाबूजी, एक बात कहना तो भूल ही गई। रात को जिस 'नाग' को आप अपने हाथ में थामे फुफकार रहे थे, उसे इतना खुला न छोड़ें। वह बहुत खतरनाक लग रहा था। कहीं ऐसा न हो कि अपनी फुफकार के नशे में वह किसी ऐसे 'बिल' में घुसने की कोशिश कर बैठे, जिसकी गहराई नापने की उसे इजाजत नहीं है।"
विक्रम सिंह ने चाय का घूंट भरा और अपनी मूंछों पर ताव देते हुए नव्या के बदन के एक-एक उतार-चढ़ाव को अपनी आँखों से चाटने लगे।
विक्रम सिंह: "बिल अगर इतना रसीला और तंग हो नव्या, तो नाग अपनी जान की परवाह नहीं करता। और वह कोई मामूली सांप नहीं है, वह तो 'काल' है। उसे बिल की गहराई से डर नहीं लगता, उसे तो बस उस 'गर्मी' की तलाश है जो आज सुबह तेरे उस गीले बदन से छूट रही थी। तूने उसे खुली आँखों से देख लिया है, अब वह शांत नहीं बैठेगा।"
नव्या ने अपने गुलाबी होंठों को फिर से दाँतों तले दबाया और अपनी गांड़ को थोड़ा और पीछे की ओर मटकाया।
नव्या: "गर्मी तो बिल में बहुत है बाबूजी, पर उस बिल के मुहाने पर मर्यादा के पत्थर रखे हैं। आपका वह नाग चाहे जितना भी विकराल हो जाए, उन पत्थरों से टकराकर अपना सिर ही फोड़ेगा। और सुनिए, वह जो आप 'अमृत' की बातें कर रहे थे... उसे अपनी मुट्ठी में ही कैद रखिये। उसे फर्श पर बहाना शोभा नहीं देता, वह तो किसी 'पवित्र कलश' की अमानत है।"
विक्रम सिंह की आँखों में अश्लीलता का सैलाब उमड़ पड़ा। उन्होंने अपनी कुर्सी को थोड़ा आगे खिसकाया।
विक्रम सिंह: "कलश तो तू ही है नव्या... पर तूने उस पर 'छूना मना है' की मुहर लगा रखी है। पर तू भूल रही है, नाग को छूने की ज़रूरत नहीं होती, वह तो अपनी ज़हरीली फुफकार और नज़रों से ही शिकार को अधमरा कर देता है। और जो तूने रात को झिरी से मेरा वह 'औजार' देखा है, वह अब तेरे सपनों में भी बिल खोदने आएगा। बता न... क्या उसे देखकर तेरी उस 'कंटीली चूत' में खुजली नहीं हुई? क्या तुझे यह नहीं लगा कि काश यह पत्थर की दीवार अभी गिर जाए और वह नाग सीधे अपनी मंजिल पा ले?"
नव्या का चेहरा तप उठा, पर वह हटी नहीं। उसने एक कदम और आगे बढ़ाया, इतनी करीब कि विक्रम सिंह को उसके जिस्म की मांसल महक आने लगी।
नव्या: "खुजली तो उसे भी होती है बाबूजी, जो प्यासा हो और सामने समंदर दिख रहा हो। पर मैं वो दरिया हूँ जो सिर्फ सुमित के लिए बहता है। आप बस किनारे बैठकर उसकी लहरें देखिये और अपने उस 'विकराल मूसल' को हाथ से सहलाकर मन बहला लीजिये। क्योंकि इस बिल का दरवाजा तो बंद ही रहेगा, चाहे आपका नाग कितना ही फन क्यों न पटक ले।"
इतना कहकर नव्या ने एक जोरदार ठुमका लगाया, जिससे उसके तरबूज जैसे गांड़ के दोनों हिस्से साड़ी के नीचे एक-दूसरे को मसल गए, और वह खिलखिलाती हुई अंदर चली गई। विक्रम सिंह वहीं बैठे अपनी धोती के भीतर उस पत्थर हो चुके अंग को संभालते रह गए। उन्हें पता था कि नव्या उन्हें तड़पा रही है, पर उस तड़प में जो मज़ा था, वह दुनिया के किसी और सुख में नहीं था।
खिड़की का उलटफेर और नग्न गुणगान
स्थान: नव्या का शयनकक्ष / गलियारा
समय: रात के २:१५ बजे
आज रात फिजाओं में वासना की नमी कुछ ज्यादा ही भारी थी। नव्या के बदन में रात के उस 'दर्शन' ने ऐसी आग सुलगा दी थी कि वह कमरे की ठंडक में भी पसीने से नहा रही थी। उसे लगा कि बाबूजी अपने कमरे में अपने उसी विकराल मूसल की सेवा में व्यस्त होंगे, जैसा उन्होंने कल किया था। इसी बेफिक्री और चरम उत्तेजना में नव्या ने अपनी साड़ी, पेटीकोट और चोली उतारकर फेंक दी।
वह अपने कमरे में पूरी तरह नग्न होकर किसी मदहोश हिरणी की तरह टहल रही थी। मद्धम दूधिया रोशनी में उसके विशाल और रसीले बोबे और उसकी भारी गांड़ के मांसल पट अपनी पूरी नग्नता के साथ चमक रहे थे। वह अपनी जांघों के बीच हाथ फेरते हुए और अपनी चूत के गीलेपन को महसूस करते हुए जोर-जोर से बड़बड़ा रही थी।
नव्या: (सिसकते हुए और बदन को मरोड़ते हुए) "ओह... बाबूजी! क्या चीज़ पाल रखी है आपने अपनी धोती के नीचे। वह खूंखार काला लन्ड... जब से देखा है, मेरी इस चूत ने पानी छोड़ना बंद नहीं किया। मेरा सुमित तो इसके सामने कुछ भी नहीं है। हाय! वह विकराल अंग अगर एक बार मेरी इन फांकों को चीरता हुआ अंदर घुस जाए, तो मैं तो पागल ही हो जाऊँगी।"
उसी वक्त, विक्रम सिंह बाथरूम जाने के लिए अपने कमरे से बाहर निकले। गलियारे से गुजरते वक्त उनकी नज़र अचानक नव्या के कमरे की उसी खिड़की की झिरी पर पड़ी, जहाँ से कल नव्या ने उन्हें देखा था। उन्होंने ठिठक कर एक नज़र अंदर मारी और उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
अंदर का दृश्य किसी महा-विस्फोट से कम नहीं था। उनकी 'सावित्री' बहू पूरी तरह निर्वस्त्र होकर अपना ही बदन मसल रही थी और उनके मूसल के कसीदे पढ़ रही थी।
नव्या: (अपने बोबों को दोनों हाथों से भींचते हुए) "बाबूजी... कहाँ छुपा कर रखा था आपने यह कामुक औजार? इसे देखकर तो पत्थर भी पिघल जाए। मेरा मन कर रहा है कि इसे अभी अपने मुँह में भर लूँ और इसका सारा जहर पी जाऊँ। आप कह रहे थे न कि मैं आपकी 'कामधेनु' हूँ... तो आइये न, अपने उस हथियार से मेरी इस जवानी का शिकार कीजिये। मेरी यह गांड़... ये तरबूज... ये सब आपके उस विकराल लन्ड की मार सहने के लिए तड़प रहे हैं।"
खिड़की के बाहर खड़े विक्रम सिंह का बुरा हाल था। उनकी धोती के भीतर उनका मूसल फिर से पत्थर की तरह सख्त हो गया और नसें उभर आईं। अपनी बहू के मुँह से अपने 'अंग' की ऐसी अश्लील तारीफ सुनकर उनका पोर-पोर कांपने लगा।
विक्रम सिंह (बाहर से बुदबुदाते हुए): "ओह... मेरी कंटीली नागिन! तो तुझे मेरा वह मूसल इतना पसंद आया है? तू अंदर नंगी होकर मेरा नाम जप रही है और मैं बाहर अपनी प्यास से लड़ रहा हूँ। देख ले... देख ले अपनी इस बेबसी को, क्योंकि अब ये आँखें तुझे सिर्फ देख कर नहीं मानेंगी।"
नव्या अपनी ही धुन में अपनी चूत पर उंगलियां चला रही थी, वह ससुर के शब्दों को याद कर-कर के और भी उत्तेजित हो रही थी। वह बार-बार अपनी पीठ फेरकर अपनी भारी गांड़ आईने में देख रही थी और कल्पना कर रही थी कि उस पर ससुर के थप्पड़ और उनके लन्ड की मार पड़ रही है।
विक्रम सिंह वहीं बुत बनकर अपनी बहू के उस नग्न तांडव को देख रहे थे। आज पासा पलट चुका था। कल उसने देखा था, आज वह देख रहे थे। और इस 'देखने' ने कोठी की मर्यादा की अंतिम ईंट को भी हिलाकर रख दिया था।
विक्रम सिंह खिड़की की झिरी से चिपके हुए थे, उनकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। अंदर नव्या नग्नता के उस मुकाम पर थी जहाँ सुध-बुध पूरी तरह खो चुकी थी। वह अपने जिस्म को मसलते हुए अब अपनी माँ मालती को याद करने लगी थी। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा नशा और अश्लीलता का उबाल था।
नव्या (अंदर नग्नता में झूमते हुए): "आह... माँ! तू सही कहती थी कि इस खानदान की औरतों के खून में ही प्यास है। मौसी ने मुझे सब बताया था माँ... कि तेरी शादी की उन फेरों वाली रातों में, जब पूरा घर सोया था, तू एक जवान और कतई खूंखार लन्ड के नीचे दबी घंटों अपनी चूत की प्यास बुझा रही थी। तूने मर्यादा की चुनरी उतारकर उस मर्दानगी का जहर पिया था, और आज देख... तेरी बेटी भी उसी राह पर है!"
बाहर खड़े विक्रम सिंह यह सुनकर सन्न रह गए। मालती का वह पुराना किस्सा उनके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरा। वह हैरान थे कि नव्या को अपनी माँ के उस गुप्त 'रति-काण्ड' का पता है और वह उसे बड़े गर्व से याद कर रही है।
नव्या: (अपनी भारी गांड़ को दीवार से सटाकर रगड़ते हुए) "माँ, तूने तो किसी गै़र के लन्ड से अपनी आग बुझाई थी, पर तेरी बेटी तो अपने ही ससुर के उस विकराल मूसल की दीवानी हो गई है। माँ, अगर तू आज देखती कि बाबूजी के पास क्या औजार है, तो तू भी अपनी कब्र से निकल आती। वह काला और मोटा नाग... जब वह हिलता है, तो मेरा जी करता है कि मैं अपनी माँ की तरह ही बेशर्म होकर उसे अपने भीतर उतार लूँ।"
विक्रम सिंह का कलेजा मुँह को आ गया। नव्या के मुँह से 'माँ' और 'चुदाई' जैसे शब्द सुनकर उनकी कामुकता हिंसक होने लगी। उनकी धोती अब उस पत्थर हुए लन्ड का बोझ नहीं सह पा रही थी। उन्हें समझ आ गया कि नव्या के भीतर सिर्फ जवानी नहीं, बल्कि एक खानदानी 'आग' विरासत में मिली है।
नव्या: "माँ, तूने फेरों की रात जो सुख पाया था, मैं उसे रोज़ अपनी आँखों से देख रही हूँ। बाबूजी का वह लाल सुपाड़ा... आह! जब वह मुट्ठी में उसे दबाते हैं, तो मुझे अपनी चूत में तेरी वही वाली तड़प महसूस होती है। मैं भी तेरी ही तरह कुलटा बनूँगी माँ... इस कोठी की इज्जत को बाबूजी के उस मूसल के नीचे कुचलवा दूँगी!"
विक्रम सिंह अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। उनकी बहू, जिसे वह सिर्फ एक 'कंटीली औरत' समझ रहे थे, वह तो वासना की एक पूरी 'परम्परा' ढो रही थी। मालती का वह पुराना ज़िक्र और नव्या की यह नग्नता—दोनों ने मिलकर विक्रम सिंह के संयम की चिता जला दी थी। वह खिड़की से चिपके, अपनी धोती के भीतर उस विकराल अंग को सहलाते हुए बस यही सोच रहे थे कि इस 'मालती की बेटी' को अब वो मज़ा चखाना है जो उसे उसकी माँ ने भी नहीं चखाया होगा।
नग्न विरासत और दोहरा चरमोत्कर्ष
स्थान: नव्या का शयनकक्ष और बाहरी गलियारा
समय: रात के ३:०० बजे
अंदर और बाहर, वासना का वह घमासान छिड़ा था जिसकी गूँज कोठी की दीवारों को कपा रही थी।
नव्या अपनी माँ मालती की उस 'फेरों वाली रात' की चुदाई को अपनी बंद आँखों के पीछे फिर से जी रही थी। वह अपनी नग्न जांघों को फर्श पर पटक रही थी और उसके विशाल बोबे उसकी तेज सांसों के साथ पागलपन की हद तक उछल रहे थे।
नव्या (अंदर सिसकते हुए): "आह माँ! तूने उस रात जो चीखें दबाई थीं, वो आज मेरे गले से निकलना चाहती हैं। तूने उस जवान लन्ड को अपनी चूत की गहराइयों में उतार कर जो स्वर्ग पाया था... देख माँ, आज तेरी बेटी भी वैसे ही सिसक रही है। बाबूजी का वह मूसल देख कर मेरा रोम-रोम तुझे पुकार रहा है। ये खानदानी प्यास है माँ... जो आज बाबूजी के इस विकराल अंग को देख कर फट पड़ी है! फाड़ दीजिये बाबूजी... जैसे उस मर्द ने मेरी माँ को फाड़ा था, वैसे ही मुझे भी तहस-नहस कर दीजिये!"
खिड़की के बाहर विक्रम सिंह का हाल बेहाल था। मालती के उस पुराने किस्से और नव्या की इन अश्लील बातों ने उनके मूसल को लोहे की छड़ से भी ज्यादा सख्त कर दिया था। उनके हाथ की रफ़्तार अब किसी मशीन जैसी थी। वह झिरी से नव्या के उस पूरी तरह नग्न और पसीने से भीगे बदन को देख रहे थे, जो फर्श पर लोट रहा था।
विक्रम सिंह (बाहर गुर्राते हुए): "मालती की बच्ची... तूने अपनी माँ का राज खोलकर अपनी मौत बुला ली है। अब तेरा ये तरबूज जैसा बदन और ये भरी हुई गांड़ मेरी इस मर्दानगी की मार से बच नहीं पाएगी। तू प्यासी है न? ले... देख अपनी माँ के उस 'पुराने पापकर्म' का जवाब... मेरा ये विकराल लन्ड तुझे वो मज़ा देगा जो तेरी माँ भी भूल जाएगी!"
अंदर नव्या का हाथ अब उसकी चूत की गहराई में पागलों की तरह चल रहा था। उसे खिड़की के बाहर ससुर के हाथ की रफ़्तार का अंदाज़ा था। वह अपनी माँ की उस रात की कल्पना और ससुर के इस काले नाग के बीच पिस रही थी।
नव्या: "आह... माँ... मैं जा रही हूँ... बाबूजी का वो लाल सुपाड़ा मेरी आँखों में धंस गया है... ले लीजिये मुझे... आह! माँ... मैं झड़ रही हूँ!"
ठीक उसी पल, नव्या के शरीर में एक ज़ोरदार ऐंठन आई। उसकी चूत ने गरम काम-रस का फव्वारा छोड़ दिया और वह फर्श पर मछली की तरह तड़प कर निढाल हो गई। उसकी आँखों के सामने अपनी माँ की चुदाई और ससुर का नंगा लन्ड एक साथ विलीन हो गए।
बाहर विक्रम सिंह का भी बांध टूट चुका था। नव्या के मुँह से 'माँ की चुदाई' के किस्से सुनते ही उनका सफ़ेद और गाढ़ा लावा झटके के साथ उनकी मुट्ठी से निकलकर गलियारे की दीवार और फर्श पर बिखर गया। वह हांफते हुए दीवार से टिक गए, उनका विकराल मूसल अभी भी थरथरा रहा था।
दो अलग-अलग दुनिया, एक ही प्यास, और दो चरम—पर 'छूना' अभी भी वर्जित था।
दोनों ससुर बहु एक साथ झड़े हैं कितना हसीन इत्तेफाक है देवियों, क्या कोई बहु इतनी कामुक होती है कमेंट में बताए कोई औरत,,,,
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