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Erotica मेरी माँ कामिनी

deo_mukesh

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भाई मै पहले भी बोल चूका हूँ, ये incest story नहीं है.
ये माँ बेटे की कहानी नहीं है.
बेटे के नजरिये से लिखी गई कहानी है सिर्फ.
तो बेवजह उम्मीद ना करे.
डेफिनेटली, बड़ी मुश्किल से इतनी शानदार स्टोरी बेटे के नजरिये से लिखी हुई मिली है. ये सुकून देने वाली कहानी है. मैंने जैसा की रात में कहा भी की अरसे बाद xossip को बंद हुए ऐसी कहानी मिली है जो इरोटिका के एकदम टॉप पर है. आप को बहुत बहुत बधाई और शुक्रिया ऐसा टेस्टी और नशीला कहानी देने के लिए.
लार्ड भाई/बहन प्लीज़ ये भी बताइए की आपने कब से कहानियां लिखने का अनुभव है ? क्या पहले भी कहनी आपने कुछ लिखा है ?
 
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Ajju Landwalia

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मेरी माँ कामिनी - भाग 31


माहौल में अब सिर्फ़ मटन पकने की खुशबू नहीं थी, बल्कि दो जिस्मों के जलने की गंध भी थी।
आग की लपटें नाच रही थीं।
कादर का हाथ भगोने में मटन चला रहा था, लेकिन उसकी आँखें कामिनी की "खुली हुई घाटी" में भटक रही थीं।
उस सफ़ेद, महीन दुपट्टे के नीचे... उसका औज़ार अब पूरी तरह जाग चुका था।

वह दुपट्टे को तंबू की तरह आगे धकेल रहा था।
कपड़ा इतना पतला था कि उसके नीचे कादर के लिंग का काला तना और आगे का वह लाल टोप एक धुंधली परछाई की तरह साफ़ दिख रहा था। वह रह-रहकर फड़क रहा था, जैसे बाहर आने के लिए बेताब हो।

"म... मटन पकने वाला है मैडम," कादर की आवाज़ भारी और फटी हुई थी। उसका गला सूख रहा था।
उसने भगोने से कलछी बाहर निकाली।
उसमें गाढ़ा, रसीला शोरबा (Gravy) और एक मांस का टुकड़ा था।
कादर ने अपनी हथेली पर थोड़ा सा शोरबा गिराया।
वह गरम था, लेकिन कादर को महसूस ही नहीं हुआ।
उसने अपना हाथ धीरे से कामिनी के चेहरे की तरफ बढ़ाया।

उसकी उंगलियां शोरबे में सनी हुई थीं।
"चखिये..." कादर ने कामिनी की आँखों में झांका। "देखिये, नमक बराबर है या नहीं?"

कामिनी की नज़रें कादर के लंड के उभार से फिसलकर उसकी उंगलियों पर आईं।
उन खुरदरे, बड़े और मर्दाने हाथों पर लगा वो लाल शोरबा।
कामिनी धीरे से आगे झुकी।
उसके झुकते ही उसका ब्लाउज़ और ढीला हो गया, और उसके स्तनों का मांसल उभार कादर की आँखों के बिल्कुल सामने आ गया।
कामिनी ने अपने होंठ खोले।

उसने कादर की तर्जनी (Index Finger) को अपने मुंह में लिया।
"स्स्स्लर्प..."
कामिनी ने कादर की उंगली को अपनी जीभ से चाटा।
वह शोरबा तीखा और नमकीन था... लेकिन उसमें कादर के पसीने और उसकी मर्दानगी का स्वाद भी मिला हुआ था।
कामिनी ने उसकी उंगली को अपने होंठों के बीच दबाया और धीरे से चूसा।
कादर के बदन में एक बिजली दौड़ गई।

"आह्ह्ह..." कादर के मुंह से सिसकी निकल गई।
उसे लगा जैसे कामिनी उसकी उंगली नहीं, बल्कि उसका लंड चूस रही हो।
कामिनी ने उंगली मुंह से निकाली। उसकी जीभ पर अभी भी सालन लगा था।
"बहुत... बहुत स्वादिष्ट है," कामिनी ने कादर की आँखों में देखते हुए कहा। उसका इशारा मटन की तरफ कम और कादर की तरफ ज्यादा था।

"नमक तो ठीक है... लेकिन..."
कामिनी की नज़रें नीचे झुकीं।
सीधे कादर की कमर पर।
वहाँ उस सफ़ेद दुपट्टे के नीचे... वह 'दानव' अब बेकाबू हो रहा था। वह दुपट्टे को फाड़कर बाहर आने को तैयार था।
*************************

आग की लपटें नाच रही थीं, और उनके बीच कामिनी कादर की उंगली को अपने मुंह में भरे हुए थी।
उसकी जीभ कादर की पोरों पर लगे सालन को चाट रही थी, लेकिन उसकी आँखों में जो भूख थी, वह मटन के लिए नहीं थी।
वह उसकी उंगली को चूसते हुए उसे ऐसे घूर रही थी, जैसे कह रही हो 'मुझे उंगली नहीं, वो चाहिए जो नीचे लटक रहा है।'

कादर, जो अब तक थोड़ा झिझक रहा था, कामिनी का यह रूप देखकर समझ गया।
वह एक माहिर खिलाड़ी था। उसने औरतों की आँखों में हवस पढ़ी थी, लेकिन कामिनी की आँखों में तो समर्पण था।
कादर ने अपनी उंगली कामिनी के गीले और गरम मुंह से बाहर निकाली।
एक लिसलिसी लार की तार उसकी उंगली और कामिनी के होंठों के बीच खिंच गई।

"मसाला तो आपने चख लिया मैडम..." कादर की आवाज़ अब भारी और फटी हुई थी, जैसे कोई जानवर गुर्रा रहा हो।
"लेकिन असली स्वाद अभी बाकी है। रुकिए, आपको और स्वादिष्ट सूप चखाता हूँ।"

कादर अपनी जगह से हल्का सा ऊपर उठा।
उसने एक झटके में अपनी कमर पर बंधे उस सफ़ेद दुपट्टे की गांठ को खींच दिया।
"सर्रररर......"
रेशमी दुपट्टा उसकी कमर से फिसलकर नीचे चटाई पर जा गिरा।
और फिर... धमाका।
कादर का विशाल, काला और पूरी तरह से खड़ा 10 इंच का लंड स्प्रिंग की तरह उछलकर कामिनी के चेहरे के बिल्कुल सामने आ गया।

वह हवा में ऐसे लहराया जैसे कोई कोबरा फन फैलाकर खड़ा हो गया हो।
कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं।
कल रात और अभी थोड़ी देर पहले जो दिखा था, वह 'झांकी' थी। यह 'विश्वरूप' था।

वह लंड रघु के औज़ार से भी कहीं ज्यादा मोटा और लंबा था।
उसका तना (Shaft) लोहे की रॉड जैसा सख्त था, जिस पर मोटी-मोटी नसें तनी हुई थीं।
और उसका आगे का हिस्सा...
खतने की वजह से उसका विशाल, लाल और मशरूम जैसा सुपाड़ा (Glans) पूरी तरह नंगा था। वह इतना चौड़ा था कि कामिनी सोचने लगी कि यह मेरे मुंह में समाएगा भी या नहीं।

कामिनी अभी उस विशालता को देखकर सम्मोहन में थी ही कि कादर ने कुछ ऐसा किया जिसने उसे हिला कर रख दिया।
कादर ने भगोने से कलछी उठाई।
उसमें से भाप निकल रही थी। गरम, मसालेदार और लाल तरी (Gravy) कलछी में भरी हुई थी।

कादर ने कामिनी की आँखों में देखा और मुस्कुराया।
और अगले ही पल...
उसने वह खौलता हुआ मसालेदार सूप अपने खड़े और नंगे लंड पर उंडेल दिया।
"छनन्नन्न......!!"
गरम तेल और मसालों की धार सीधे उसके नंगे लाल सुपाड़े पर गिरी और वहां से फिसलकर उसके नसों भरे तने और अंडकोषों पर बहने लगी।

सूप गरम था, बहुत गरम।
आम इंसान चीख पड़ता।
लेकिन कादर? कादर ने उफ़ तक नहीं की।
उल्टा, उस जलन और गर्मी ने उसके लंड को और भी ज्यादा पत्थर जैसा सख्त कर दिया।

लाल तरी (Gravy) उसके काले लंड पर बह रही थी, जिससे वह और भी ज्यादा चमकदार, रसीला और खतरनाक लग रहा था। तेल की बूंदें उस लाल टोप से टपक रही थीं।
कादर ने अपनी कमर को एक झटका दिया और अपने उस 'सूप से नहाए हुए' लंड को कामिनी के होंठों से इंच भर की दूरी पर ले आया।

उससे मटन, मसालों और कादर के पौरुष की मिली-जुली महक आ रही थी।
"अब चख के बताइये मैडम..." कादर ने चुनौती दी। "मसाला ठीक है? नमक ज्यादा तो नहीं?"

कामिनी पूरी तरह बेकाबू हो चुकी थी। उसने ऐसा अहसास, ऐसे सख्त मर्द की कल्पना भी नहीं की थी.
उसकी योनि से इतना पानी बह रहा था कि वह चटाई पर फिसल रही थी।
उसके सामने एक गरम, मसालेदार और मांसल लॉलीपॉप था।20240511-213750
वह खुद को रोक नहीं पाई।
उसने अपने खूबसूरत, लाल होंठों को पूरा खोल दिया।
उसके होंठ कांप रहे थे, फड़फड़ा रहे थे।
कादर ने देखा कि शिकार तैयार है।

उसने अपनी कमर को आगे धकेला।
"धप्प..."
उसका विशाल, गरम और चिकना सुपाड़ा (Tip) कामिनी के खुले होंठों से टकराया।
कामिनी को अपने होंठों पर आग और मांस का अहसास हुआ।
उसने अपनी जीभ बाहर निकाली और उस मसालेदार टोप को चाट लिया।
"स्स्स्लर्प..."
तीखे मसालों का स्वाद और कादर की नमकीन त्वचा का स्वाद... यह नशा कामिनी के दिमाग को चढ़ गया।
उसने अपना मुंह और चौड़ा किया, अपनी जबड़े की हड्डियों को पूरा खोल दिया।

कादर ने धीरे से दबाब बनाया।
वह मोटा, लाल सुपाड़ा कामिनी के दांतों को पार करते हुए उसके मुंह में घुसता चला गया।65573-domme-switch-wifey-adores-daddys-penis
कामिनी का मुंह छोटा पड़ रहा था, उसका गला भर गया था।
लेकिन वह उसे लेती गई... लेती गई...
उसका मुंह उस कसैले, मसालेदार और गरम लंड से भर गया।
कादर के मुँह से एक गहरी गुरराहट निकली— "आआआह्ह्ह्ह.... कामिनी...."
कामिनी की जीभ पागलों की तरह उस गरम लंड के नीचे की नसों को और उस सूप के स्वाद को चाटने लगी। उसकी नजरें कादर के वासना से भरे चेहरे पर टिकी हुई थी, आग की लाल रौशनी मे कामिनी का चेहरा दमक रहा था.
मटन सूप अब भगोने में नहीं... कामिनी के मुंह और कादर के लंड के बीच पक रहा था।
*******************

चूल्हे की आग धीमी हो चुकी थी, लेकिन मटन के भगोने में "खदबद-खदबद" की आवाज़ जारी थी।
और ठीक वैसी ही, बल्कि उससे भी ज्यादा गीली और गंदी आवाज़ कामिनी के मुंह से आ रही थी।
"फच्... फच्... ग्लोप... स्लर्प..."
कामिनी, जो अब चटाई पर घुटनों के बल आ गई थी, कादर के उस विशाल, मसालेदार और लोहे जैसे सख्त लंड से जूझ रही थी।
शुरुआत में उसे बहुत मुश्किल हुई।
कादर का 'औज़ार' इतना मोटा था कि कामिनी के जबड़े दुखने लगे थे। वह उसके मुंह में समा ही नहीं रहा था।


उसका लाल, नंगा और चौड़ा टोप (Head) बार-बार कामिनी के दांतों से टकरा रहा था।
लेकिन कामिनी अब वो सभ्य घरेलु महिला नहीं थी, वो प्यासी शेरनी बन चुकी थी।

उसने अपनी जीभ से उस मटन सूप के जायके और कादर के पौरुष के स्वाद को चाटा, जिससे उसका मुंह लिसलिसा हो गया।
और फिर... उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस 'मूसल' को अंदर खींचना शुरू किया।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, कामिनी की लय (Rhythm) बनती गई।
उसने अपने गालों को पिचकाया और एक वैक्यूम (Vacuum) बनाया।
"सुऊऊऊप्प..."
कादर का वह 10 इंच का राक्षस, कामिनी के गीले, गरम और तंग हलक में सरकता चला गया।
कामिनी का गला घुट रहा था, आँखों से पानी बह रहा था, नाक से सांस लेना मुश्किल हो रहा था... लेकिन वह रुक नहीं रही थी।

उसे वो 'ठूंसने' का अहसास पागल कर रहा था।
हर बार जब कादर का वो मसालेदार टोप उसके गले की घंटी (Uvula) से टकराता, कामिनी को उबकाई आती, लेकिन वह उसे दबाकर और जोर से चूसती।

कामिनी का मुंह पूरी तरह भरा हुआ था, इसलिए वह अपनी लार (Saliva) निगल नहीं पा रही थी।
उसके मुंह के कोनों से गाढ़ी, लिसलिसी और चिपचिपी राल (Drool) की धार बह निकली।
वह राल कादर के काले लंड पर तेल की तरह फिसलती हुई नीचे गिरी...
सीधे उसके विशाल, लटकते हुए अंडकोषों (टट्टो) पर।
कादर के टट्टे, जो पहले से ही पसीने और सूप की बूंदों से सने थे, अब कामिनी की गरम थूक से नहा गए।

कामिनी ने एक पल के लिए लंड को मुंह से बाहर निकाला— "प्लॉप!"
एक लंबी तार लंड और उसके होंठों के बीच खिंच गई।
सांस लेने के लिए नहीं... बल्कि उन टट्टों का इन्साफ करने के लिए।

कामिनी ने अपना चेहरा नीचे झुकाया।unnamed
उसने कादर के उन भारी-भरकम, साफ़-चिकने और गीले 'अंडों' को अपनी हथेलियों में भरा।
वे गरम थे और भारी थे।
कामिनी ने अपनी जीभ निकाली और उन टट्टों को चाटना शुरू किया।
नीचे से ऊपर तक... जैसे कोई बच्चा आइसक्रीम चाटता है।
फिर उसने एक पूरा अंडकोष अपने मुंह में भर लिया और उसे चूसने लगी।
"स्स्स्लर्प... हम्मम्म..."
वह उन्हें चूम रही थी, चाट रही थी, अपने गालों से रगड़ रही थी।c27d9ec894641ee05b3a57ea3f433febवह पूरी तरह पागल और वहशी हो गई थी। उसे कादर के जिस्म का हर एक हिस्सा अपने मुंह में चाहिए था।

और कादर?
कादर खान अपनी जगह पर किसी पहाड़ की तरह जमा खड़ा था।
उसकी टांगें चौड़ी थीं, ताकि कामिनी को खेलने के लिए पूरी जगह मिल सके।
उसकी आँखें आधी बंद थीं, और मुंह से "सी... सी..." की सिसकारी निकल रही थी।
लेकिन उसका ध्यान... अभी भी अपने 'काम' पर था।
हवस और वासना के इस तूफ़ान के बीच भी, कादर ने अपनी ज़िम्मेदारी नहीं छोड़ी थी।

उसका एक हाथ (बायां हाथ) कामिनी के रेशमी बालों में उलझा हुआ था, जो उसके सिर को अपने लंड पर दबा रहा था।
लेकिन उसका दूसरा हाथ (दायां हाथ)... करछी चला रहा था।
कादर बीच-बीच में भगोने में करछी घुमाता, मटन को जलने से बचाता, और फिर अपनी कमर को कामिनी के मुंह में धकेल देता।

कादर पाक कला और यौनकला मे माहिर जान पड़ता था, उसे अहसास था समय के साथ पकवान को चलाया ना जाये तो वो जल जाता है.

यह दृश्य अद्भुत था।
ऊपर एक आदमी मटन पका रहा है... और नीचे एक औरत उसका 'मीट' खा रही है।brunette-sucks-big-black-cock-deepthroat
कादर ने करछी चलाते हुए नीचे देखा।
कामिनी की हालत ख़राब थी—बाल बिखरे हुए, काजल फैला हुआ, मुंह थूक से सना हुआ, और वह पागलों की तरह उसके लंड पर सिर पटक रही थी।20211009-204636

कादर के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आ गई।
"आराम से मेरी जान... आराम से..." कादर ने कामिनी के बालों को सहलाया, और फिर करछी से मटन को पलटा।
"मटन अभी कच्चा है... लेकिन मेरा तो तुमने पूरा पका दिया है।"
कामिनी ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने बस ऊपर देखा... उसकी आँखें चढ़ी हुई थीं।
और उसने दोबारा अपना मुंह खोला और उस विशाल खंभे को जड़ तक अपने अंदर समा लिया।
"ग्लोप... ग्लोप... ग्लोप..."
अब उसे किसी के आने का डर नहीं था, रमेश का डर नहीं था... उसे बस यह लंड चाहिए था, अभी और इसी वक़्त।

भगोने में मटन पक चुका था, लेकिन बाहर जो 'पक' रहा था, वह अब जलने की कगार पर था।
कादर का विशाल शरीर कांपने लगा था।
उसकी जांघें थरथरा रही थीं।
कामिनी के मुंह का वह वैक्यूम (Vacuum) और उसकी जीभ की वो सर्कुलर मोशन कादर की बर्दाश्त के बाहर हो रही थी।
उसका 10 इंच का काला लोहा अब कामिनी के हलक की गहराई नाप रहा था।
उस पर लगा मटन सूप, कामिनी की लार, और कादर का अपना प्री-कम (Pre-cum)... सब मिलकर एक चिकना लुब्रिकेंट बन गए थे।

"फच्... फच्... ग्लोप...!"
कादर के मुंह से अब सिसकियों की जगह गुर्राहट निकल रही थी।
"ओह्ह्ह... कामिनी... बस... बस अब... मैं गया... मैं गया..."
कादर का हाथ कामिनी के बालों को जोर से भींच रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि उसका लावा अब नसों से होता हुआ ऊपर चढ़ रहा है।
वह फटने वाला था। वह अपनी "सफेद मलाई" कामिनी के हलक में भरने ही वाला था।
और नीचे?
कामिनी की हालत उससे भी बुरी थी।
उसका एक हाथ कादर की जांघ पर था, और दूसरा हाथ... अपनी साड़ी के अंदर।
वह घुटनों के बल बैठी थी, और उसका बायां हाथ अपनी दोनों जांघों के बीच तेज़ी से चल रहा था।
वह अपनी साड़ी के ऊपर से ही अपनी उभरी हुई योनि (Clitoris) को पागलों की तरह रगड़ रही थी।
उसके मुंह में कादर का लंड था, और नीचे उसकी उंगलियां।

दोहरी मार।
उसका पूरा शरीर अकड़ गया था। उसकी योनि संकुचित (Contract) हो रही थी। वह भी बस कुछ ही पलों में झड़ने (Climax) वाली थी।
दोनों एक साथ उस ऊंचाई पर थे जहाँ से गिरने पर सिर्फ़ मोक्ष मिलता है।

अगले 10 सेकंड में कादर की पिचकारी छूटने वाली थी और कामिनी की चीख निकलने वाली थी।
लेकिन तभी...

"धड़ड़ड़ड़ड़.......धड... धड... धड.... पी... पी... पो... पो....!!"
सन्नाटे को चीरती हुई एक भारी और कर्कश आवाज़ आई।
घर के मुख्य लोहे के गेट को किसी ने ज़ोर से धक्का देकर खोला था।
और उसके तुरंत बाद...
"घुर्र्र्र्र्र्र........ पीं पीं!!"
एक भारी डीज़ल इंजन की गड़गड़ाहट और जीप का तेज़ हॉर्न।
वह आवाज़ स्टोर रूम के पिछवाड़े तक साफ़ सुनाई दी।
वह किसी आम कार की आवाज़ नहीं थी। वह पुलिस जीप की जानी-पहचानी, डरावनी आवाज़ थी।
शमशेर और रमेश आ गए थे।
उस आवाज़ ने उन दोनों के ऊपर बर्फ का ठंडा पानी डाल दिया।
कादर, जो झड़ने ही वाला था, एक पल के लिए पत्थर (Freeze) हो गया।
कामिनी, जो अपनी योनि रगड़ रही थी, उसका हाथ वहीं रुक गया।
एक सेकंड का सन्नाटा छाया रहा... जिसमें सिर्फ़ उनकी भारी सांसें सुनाई दे रही थीं।
फिर हकीकत ने जोर का झटका दिया।

"धम्म!!" (कार का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़)।
और फिर रमेश की आवाज़ गूंजी "अरे बंटी! गेट खोल बेटा... कामिनी कहाँ हो भई, दरवाजा खोलो..."
रमेश गार्डन से होता बंगले के मैन गेट को बाजा रहा था.

कामिनी की आँखों में नशा तुरंत डर में बदल गया।
उसने झटके से अपना मुंह पीछे खींचा।
"प्लॉप!"
कादर का विशाल, गीला और लाल लंड कामिनी के मुंह से बाहर निकल आया।

कामिनी के मुंह से और कादर के टोप से एक लंबी, गाढ़ी और चमकदार लार की तार जुड़ी हुई थी, जो खिंचती चली गई और अंत में टूटकर कादर के लटकते हुए टट्टों पर गिर गई।

कादर का लंड अभी भी लोहे की तरह खड़ा था। वह अभी भी चरम (Climax) पर था, उसे शांत होने में वक़्त लगता।
वह हवा में झूल रहा था, थूक और सूप से सना हुआ, कामिनी की तरफ इशारा करता हुआ।

कामिनी हड़बड़ाकर खड़ी हो गई।
उसकी टांगें कांप रही थीं। उसका ब्लाउज़ अभी भी खुला था, पल्लू गिरा हुआ था, और चेहरे पर "चूसने" के निशान थे—होंठ सूजे हुए और लाल।

"वो... वो आ गए..." कामिनी ने हांफते हुए फुसफुसाया। "रमेश... और शमशेर..."
उसने जल्दी से अपना पल्लू उठाया और अपने खुले हुए स्तनों को ढका।
उसने अपने होंठों को पल्लू से ज़ोर से पोंछा, ताकि कादर की लार और मटन सूप का निशान मिट जाए।
कादर भई सकपका गया, वो कितना ही बड़ा गुंडा हो लेकिन इस हालात मे पकडे जाने का अंजाम वो जनता था.

उसका 10 इंच का तंबू अभी भी खड़ा था। और उसने पहना क्या था? सिर्फ़ एक पारदर्शी सफ़ेद दुपट्टा।
अगर रमेश या शमशेर अभी यहाँ आ जाते, तो सब कुछ साफ़ दिख जाता, ऊपर से उसका खड़ा वो काला नाग।
उसे दर्द हो रहा था।
रुका हुआ वीर्य उसके अंडकोषों में दर्द पैदा कर रहा था। इसे 'Blue Balls' का दर्द कहते हैं।

"उफ्फ्फ..." कादर ने अपने लंड को मुट्ठी में भींच लिया।
"साला... इसी टाइम पर मरना था इनको..." कादर बड़बड़ाया।
"तुम... तुम संभालो..." कामिनी ने हड़बड़ाहट में कहा।
"मैं... मैं जाती हूँ, मै अंदर देखती हूँ..."
कामिनी ने एक आखिरी बार कादर के उस गीले, खड़े और अतृप्त (Unsatisfied) लंड को देखा।
उसकी आँखों में एक टीस थी— 'काश 1 मिनट और मिल जाता...'

कामिनी अपने बाल ठीक करती हुई, अपनी साड़ी संवारती हुई, तेज कदमों से घर के पिछले दरवाज़े की तरफ भागी।
उसे अब रमेश और शमशेर का सामना करना था।
और कादर?
कादर वहीं खड़ा था... हाथ में करछी, कमर पर दुपट्टा, और जांघों के बीच एक आग का गोला लिए।

कामिनी भागती हुई पिछले गेट से अंदर पहुंची ही थी, बंटी भागता हुआ, छत से नीचे सीढिया उतरता हुआ आ रहा था.
कमीनी की नजरें बंटी से मिली, कामिनी की हालात ख़राब थी, उसके चेहरे पे हवाइया उडी हुई थी.
"आप आपने कमरे मे जाओ, मै दरवाजा खोलता हूँ "
बंटी के अस्वसन से कामिनी हक्की बक्की रह गई, इसका मतलब बंटी छत से सब कुछ देख रहा रहा..
खेर अभी वक़्त नहीं था ये सब सोचने का, कामिनी अपने रूम मे पहुंच सीधा बाथरूम मे घुस गई.


क्रमशः...

Bahut hi behtareen update he Lord haram Bro

Ek aurat apne jism ki aag bujhane ke liye kis had tak ja sakti he

Iska jita jagta example he kamini.......

Barso ki anbujhi pyas pehle raghu aur an kadar ne is tarah se bhadka di he ki jaldi se thandi nahi hone wali..........

Kamal ki story chal rahi he............

Keep rocking Bro
 

Ajju Landwalia

Well-Known Member
4,469
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159
मेरी माँ कामिनी - भाग 32


कामिनी ने बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और अपनी पीठ उससे टिका दी।
उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। "हमफ़्फ़्फ़... हमफ़्फ़्फ़... हमफ़्फ़्फ़........"
उसका पूरा शरीर पसीने से तर-बतर था, लेकिन यह पसीना गर्मी का नहीं, चरम उत्तेजना का था।
एक चोर चोरी कर के भागा था.
कामिनी लड़खड़ाते कदमों से वॉशबेसिन के पास गई और आईने में अपनी शक्ल देखी।
उसका चेहरा... वह पहचान नहीं पा रही थी कि यह वही 'कामिनी' है।
उसकी आँखें चढ़ी हुई थीं, पुतलियां फैली हुई थीं, और गाल टमाटर की तरह लाल थे।
लेकिन सबसे बुरी हालत उसके होंठों की थी।
कादर के उस खुरदरे, मोटे और विशाल लंड को इतनी देर तक चूसने की वजह से उसके होंठ सूजकर मोटे हो गए थे। वे कांप रहे थे।

कामिनी ने अपनी उंगली अपने निचले होंठ पर फेरी।
उसे वहां अभी भी कादर के लंड की गरमाहट और उस मसालेदार सूप का कसैला स्वाद महसूस हो रहा था।

"कादर..." कामिनी के मुंह से एक आह निकली।
उसकी नज़र अपनी छाती पर गई।
उसका ब्लाउज़ पसीने से चिपक गया था।
अंदर, उसके भारी स्तन फूलकर सख्त हो गए थे।
उत्तेजना के कारण उसके स्तनों पर नीली नसें उभर आई थीं, जो उसकी गोरी त्वचा के नीचे साफ़ चमक रही थीं।
निप्पल इतने सख्त हो गए थे कि ब्लाउज़ के कपड़े में चुभ रहे थे।
उसे अपने स्तनों में एक मीठा-मीठा दर्द हो रहा था, जैसे वे किसी के मज़बूत हाथों का इंतज़ार कर रहे हों। वो मर्दाने हाथ जो कस कस के उसके स्तनों को भींचे उसका सारा दर्द निकाल दे.
और नीचे... उसकी योनि?
वह तो रो रही थी।

कामिनी की जांघों के बीच एक अजीब सी फड़कन (Throbbing) हो रही थी।
उसकी योनि की दीवारें बार-बार सिकुड़ रही थीं और फैल रही थीं— "धक्-धक्... धक्-धक्..."
वह अधूरी रह गई थी। वह उस मुकाम पर थी जहाँ से लौटना नामुमकिन होता है।

उसकी योनि चीख-चीख कर "लंड" मांग रही थी—मोटा, सख्त और भरने वाला।
कामिनी ने ठंडा पानी अपने चेहरे पर मारा, लेकिन अंदर का ज्वालामुखी शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। वह हताश होकर आईने को घूरने लगी।
***********************

उधर बाहर हॉल में, रमेश अपनी ही धुन में था।
रमेश को रत्ती भर भी परवाह नहीं थी कि उसकी बीवी कहाँ गायब हो गई। उसे बस अपनी दारू और मटन की पड़ी थी। उसने एक बार भी नहीं पूछा— "कामिनी कहाँ है? ठीक तो है?
बंटी ने दरवाजा खोला था,
उसकी नज़रें मोबाइल स्क्रीन पर गड़ी थीं, उंगलियां तेज़ी से गेम खेल रही थीं।
"अरे सुन.. वो... बहार... कुर्सी...." रमेश के शब्द मुँह मे ही बंद हो गए.

बंटी ने अपने बाप को देखा तक नहीं, और बिना कुछ बोले पलटकर वापस अपने कमरे की तरफ चल दिया।
उसे अपने बाप, उसके शराबी दोस्त, या अपनी माँ की 'हरकतों' से कोई मतलब नहीं दिख रहा था—या शायद वह सब जानकर भी अनजान बना हुआ था।

रमेश बड़बड़ाया, "साला... आजकल की औलाद..." और खुद ही कुर्सी उठाने लगा। शमशेर ने भी हाथ बटाया.

बगीचे में, उसी चूल्हे और आग के पास, जहाँ थोड़ी देर पहले 'रासलीला' हुई थी, अब महफ़िल जम रही थी।
रमेश और शमशेर ने प्लास्टिक की कुर्सियां आग के पास लगा ली थीं।
शमशेर ने गर्मी और 'माहौल' बनाने के लिए अपनी पुलिस की वर्दी उतार दी थी।
वह अब सिर्फ़ अपनी सफ़ेद बनियान और खाकी पैंट में बैठा था।
उसका गठीला, कसरती बदन और चौड़ा सीना बनियान में साफ़ दिख रहा था। उसके डोले (Biceps) रमेश के थुलथुले शरीर के सामने लोहे जैसे लग रहे थे।
शमशेर ने व्हिस्की की बोतल खोली और दो गिलास बनाए।
और कादर खान?

कादर की हालत 'सांप-छछूंदर' जैसी थी।
उसने कामिनी का दिया हुआ सफ़ेद दुपट्टा जल्दी से खोलकर एक कोने में छुपा दिया था, क्योंकि अगर वह दुपट्टा रमेश देख लेता तो सवाल खड़े हो जाते।
लेकिन अब समस्या यह थी कि उसका पाजामा तो अभी भी फटा हुआ था।
और उसका लंड... वह अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ था। वह अर्ध-जागृत (Semi-hard) अवस्था में था और फटे हुए कपड़े से बाहर झांकने को बेताब था।

कादर ने एक हाथ में मटन का भगोना पकड़ा हुआ था, और दूसरे हाथ से अपनी पाजामे को जांघों के बीच भींचकर पकड़ रखा था।

वह अपनी टांगें सिकोड़कर, छोटे-छोटे कदम बढ़ाता हुआ चल रहा था, ताकि उसका 'खुला हुआ राज़' किसी को न दिखे।
"अरे कादर भाई! लाओ लाओ..." रमेश ने आवाज़ दी। "खुशबू से ही नशा हो रहा है।"
कादर धीरे से आया और टेबल की आड़ लेकर खड़ा हो गया, ताकि उसका निचला हिस्सा टेबल के पीछे छुप जाए।
उसने मटन का भगोना टेबल पर रखा।
उसकी नज़र शमशेर पर पड़ी।
शमशेर बनियान में बैठा सिगरेट फूंक रहा था। उसकी नज़रें कादर पर नहीं, बल्कि घर के दरवाज़े पर थी, शायद कमीनी की तलाश मे था.

एक तरफ कादर अपनी फटी हुई इज़्ज़त (पाजामा) बचा रहा था, दूसरी तरफ कामिनी बाथरूम में अपनी आग बुझाने का विचार कर रही थी, जिस्म मे फट पड़ने को बेताब ज्वालामुखी को दबा रही थी.
***************

बाहर बगीचे में आग जल रही थी।
रमेश ने मटन सूप का कटोरा मुंह से लगाया।
"सुऊऊऊप्प... सुड़पपप्पाप्प्पप...."
उसने एक बड़ा घूंट भरा। गरम, मसालेदार और रसीला शोरबा उसके गले से नीचे उतरा।
रमेश की आँखें फैल गईं।

"वाह! वाह भाई वाह!" रमेश चिल्लाया। "कादर... क्या जादू है तेरे हाथों में यार! कसम से, ऐसा स्वाद आज तक नहीं आया। एकदम... एकदम अलग ही नशा है इसमें, तुझे घर पर छुपा के रखने का अच्छा ईनाम दिया तूने"

"शुक्रिया साब " कादर, जो टेबल की आड़ में अपनी फटी हुई इज़्ज़त (पाजामा) छुपाए खड़ा था, फीका सा मुस्कुराया।
उसने दबी हुई आवाज़ में कहा, "साब वो कुछ खबर लगी? छापा क्यों पड़ा था, किसने खबर दी "
कादर ने शमशेर की तरफ उत्सुकता से पूछा, जैसे जानना चाहता था उसके पास कितना वक़्त है.

तभी पीछे से आहट हुई।
कामिनी सामने दरवाज़े से बाहर चली आ रही थी, बलखाती कमर मटकाती, पीछे से आती दूधिया रौशनी मे उसका कामुक जिस्म साफ झलक रहा था,
रमेश की पीठ उसकी तरफ थी लेकिन शमशेर और कादर इस अद्भुत नज़ारे का लुत्फ़ उठाया रहे थे.

उसने अपना चेहरा धो लिया था, बाल ठीक कर लिए थे, लेकिन साड़ी का पल्लू अभी भी सरका ही हुआ था, या यूँ कहिये उसने इसे ठीक करने की जरुरत ही नहीं समझी।
हाथ में पानी की बोतल और सलाद की प्लेट थी।

रमेश ने कामिनी को देखा।
"अरे कामिनी! आ भई... देख क्या चीज़ बनाई है कादर ने। अमृत है अमृत! तू भी ले एक कटोरी।"
कामिनी की सांस अटक गई।

उस सूप को पीना तो दूर, उसे देखकर ही कामिनी को अपनी जांघों के बीच गीलापन महसूस होने लगा। उसे याद आ गया कि कैसे वह सूप कादर के लाल टोप पर बह रहा था।
"न... नहीं," कामिनी हकलायी। "म... मैंने चख लिया था। आप लोग खाओ।" कामिनी ने जिस तरीके से इस सूप को चखा था शायद ही और किसी औरत ने चखा हो.

कामिनी आगे बढ़ी और टेबल पर सलाद रखने लगी।
तभी उसे एक तीखी नज़र का अहसास हुआ।
सामने शमशेर बैठा था।
उसने अपनी वर्दी उतार दी थी। वह सिर्फ़ सफ़ेद बनियान में था।

आग की रौशनी में शमशेर का चौड़ा सीना, उसके बांहों के कसे हुए डोले और उसकी मोटी गर्दन साफ़ दिख रही थी। रमेश का शरीर ढीला-ढाला था, लेकिन शमशेर का शरीर कसा हुआ (Tight) और ताकतवर था।

शमशेर के हाथ में व्हिस्की का गिलास था, लेकिन उसकी नज़रें गिलास पर नहीं, कामिनी पर थीं।
उसकी बाज़ जैसी नज़रें कामिनी के चेहरे पर गड़ गईं।
उसने देखा...
वो कामिनी के हुस्न को बारीकी से निहार रहा था.
उसकी फूली हुई सांसें...
और सबसे अहम्... उसके सूजे हुए, लाल और कांपते होंठ।
शमशेर, जो एक पुराना पुलिस वाला था, औरतों की 'बॉडी लैंग्वेज' पढ़ना बखूबी जानता था।
उसने एक घूंट भरा और कामिनी की आँखों में सीधा देखा।e54e31c42f08ecf5a477a5239e4e62a6
"भाभी जी..." शमशेर की आवाज़ भारी और गहरी थी। "आज आप बहुत थकी हुई लग रही हैं। होंठ भी सूज गए हैं... क्या मटन ज्यादा तीखा था?"

शमशेर के इस सवाल में एक चिंगारी थी।
कामिनी का दिल धक से रह गया। उसे लगा शायद शमशेर ने उसे वहाँ से भाग कर जाता देख लिया है।

"व... वो... बस गर्मी बहुत है," कामिनी ने नज़रें चुरा लीं।
शमशेर मुस्कुराया।
जवाब मे कामिनी भी काँखियो से कादर की तरफ देख शमशेर को देख मुस्कुरा दी.
कादर अभी भी जाँघे दबाये खड़ा था.
"सुनिए आपके पुराने कपडे इसे दे दूँ क्या?" कामिनी ने रमेश के कंधे पर हाथ रख पूछा.
"मेरे कपडे कादर को कहाँ से आएंगे, देख उसे एक बार, साला राक्षस जैसा है " रमेश हस पड़ा.
कामिनी जाने को ही थी की.
"अच्छा सुन वो एक दो पुरानी लुंगी होंगी वो दे दे, क्यों भाई कादर काम चला अभी कल देखते है तेरे लिए कोई कपडे "
रमेश ने बेपरवाही से कहाँ.
उसने कादर को देखा तक नहीं, वो दारू और मटन सूप पीने में मगन था।
"आओ मै देती हूँ " कामिनी आगे बढ़ चली पीछे पीछे कादर कामिनी की मादक गांड को निहारता चल पड़ा, चल क्या पड़ा जैसे उसकी गांड ने खिंच लिया हो.From-Klick-Pin-CF-Pinterest-Pin-923589836095991793

तभी शमशेर ने रमेश के गिलास में और शराब डाल दी—बिना पानी के। "ले.भाई.... आज जी भर के पी। साला घर मे ऐसा मजा फिर कब मिलेगा,
शमशेर की कुटिल, चालक पोलीसिया नजरें कामिनी और कादर को अलग ही नजर से देख रही थी.

रमेश ने वह कड़क पेग एक सांस में गटक लिया।
शराब और कबाब का दौर चलने लगा.

कामिनी तेज़ कदमों से अपने बेडरूम में दाखिल हुई। उसके पीछे-पीछे कादर खान किसी साये की तरह अंदर आ गया।
कामिनी ने दरवाज़ा तो नहीं लगाया (ताकि शक न हो), लेकिन उसे हल्का सा भिड़ा दिया।
कमरे में सफ़ेद ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी जल रही थी।
बाहर की पीली आग की रौशनी के मुकाबले यहाँ सब कुछ साफ़, नंगा और सच दिख रहा था।

कामिनी अलमारी की तरफ लपकी और एक पुरानी चेकदार लुंगी निकाल लाई।
वह पलटी, "ये लो कादर... इसे..."
लेकिन उसके शब्द गले में ही अटक गए।
कादर ने लुंगी पकड़ने का इंतज़ार नहीं किया था।
उसने कामिनी के पलटते ही, अपने उस फटे हुए पाजामे को एक झटके में नीचे सरका दिया था।
वह बेडरूम के बीचों-बीच, सफ़ेद रौशनी में कमर के नीचे नंगा खड़ा था।20240603-122407

कामिनी की नज़रें सीधे उसके पैरों के बीच गड़ गईं।
बाहर तो अँधेरा था, लेकिन यहाँ ट्यूबलाइट की रौशनी में वह 'राक्षस' और भी डरावना और लुभावना लग रहा था।
उसका 10 इंच का काला, नसों भरा लंड अभी भी पूरी तरह तना हुआ था।042-450
उसके लाल और नंगे टोप (सुपाड़े) पर अभी भी कहीं कहीं मटन सूप की चिकनाई और कामिनी की लार चमक रही थी। वह गीला था और फनफना रहा था।
कामिनी की सांसें अटक गईं।

उसका गला सूख गया, लेकिन जांघों के बीच सुनामी आ गई।
वह उस काले खंभे की तरफ खिंची चली गई। उसे बस उसे छूना था, अपनी मुट्ठी में भरना था।

कामिनी ने कांपते हाथों से लुंगी बेड पर फेंकी और कादर की तरफ बढ़ी।
उसका हाथ उस सलामी देते हुए टोप को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा।
लेकिन तभी...
"खटाक!"
कादर ने हवा में ही कामिनी की कलाई थाम ली।
उसकी पकड़ लोहे जैसी मज़बूत थी।
कामिनी ने हैरान होकर कादर के चेहरे को देखा। कादर की आँखों में हवस की आग थी, लेकिन साथ ही एक जिद भी थी।

"रुको मैडम....." कादर की आवाज़ भारी और मर्दाने गुरूर से भरी थी।
"अभी नहीं... तूने मेरा चखा है, अब मेरी बारी है।"
कामिनी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही कादर ने उसे एक झटके से अपनी तरफ खींचा और अगले ही पल...
"धप्प!!"
कादर ने कामिनी को, उसकी साड़ी समेत, पीछे बेड पर धक्का दे दिया।
कामिनी का भारी बदन गद्दे पर गिरा। स्प्रिंग चरचरा उठे।

गिरते ही कामिनी की साड़ी और पेटीकोट घुटनों से ऊपर सरक गए।
उसने पैंटी नहीं पहनी थी, वो इतनी गीली हो चुकी थी की उसे उतार देना ही कामिनी को उचित लगा था.
कामिनी ने अपनी टांगें सिकोड़नी चाहीं, लेकिन कादर ने उन्हें अपने मज़बूत हाथों से पकड़कर चौड़ा कर दिया।

बेड की सफ़ेद चादर पर कामिनी की गोरी, मांसल और भरी हुई जांघें फैल गईं।
और उन दोनों जांघों के बीच...
उसकी गुलाबी, सूजी हुई और रस टपकाती योनि कादर के सामने बेपर्दा थी।
वह पूरी तरह गीली थी।
उसके गुलाबी होठ (Labia) बाहर की तरफ उभरे हुए थे और उनमें से कामिनी का पारदर्शी पानी (Lubrication) रिसकर जांघों पर बह रहा था।
वह मंज़र देखकर कादर पागल हो गया।

"आह्ह्ह... क्या माल है..." कादर बड़बड़ाया।
"वक़्त कम है मेरी जान... लेकिन प्यास बहुत है।"
कादर ने बिना कोई चेतावनी दिए, बिना कोई तैयारी किए, अपना सिर कामिनी की दोनों जांघों के बीच घुसा दिया।
"स्स्स्लर्प......!!"
कादर ने अपनी खुरदरी और चौड़ी जीभ सीधे कामिनी की योनि के द्वार पर दे मारी।
"आआआआहहहहह.... कादर....!!"
कामिनी की चीख निकल गई। उसने जल्दी से अपना मुंह अपने हाथ से दबा लिया, ताकि आवाज़ बाहर न जाए।

लेकिन उसका शरीर बेड पर तड़प उठा।
कादर किसी भूखे कुत्ते की तरह उस पर टूट पड़ा था।
उसने अपने दोनों हाथों से कामिनी के कूल्हों (Buttocks) को जकड़ लिया और उन्हें ऊपर उठा दिया, ताकि उसकी योनि का दाना-दाना उसके मुंह के सामने आ जाए।

कादर की जीभ कामिनी की योनि की गहराइयों को खंगालने लगी।
वह अपनी जीभ की नोक को कामिनी के उभरे हुए दाने (Clitoris) पर फिराता, और फिर पूरी जीभ से उसकी योनि के छेद को चाटने लगता।nude-licking-clit-gif-4
"फच्... फच्... चप्प... चप्प..."
पूरे कमरे में चाटने की गीली और गंदी आवाज़ें गूंजने लगीं।
कामिनी की योनि का स्वाद... नमकीन, खट्टा और कस्तूरी जैसा नशीला था।
कादर उसे ऐसे पी रहा था जैसे रेगिस्तान में पानी मिल गया हो।1553567530321
कामिनी की हालत ख़राब थी।
उसकी कमर हवा में उठ रही थी। उसकी उंगलियां बेडशीट को नोच रही थीं।

"उफ्फ्फ्फ... कादर... मार डालोगे क्या... आह्ह्ह... ऐसे ही... और ज़ोर से..."
कामिनी का सिर दाएं-बाएं डोल रहा था।
उसे लंड चाहिए था, लेकिन कादर की गरम जीभ उसे पागल कर रही थी।1553567530321
कादर ने अपनी नाक कामिनी के दाने पर रगड़ दी। वह उसकी महक को सूंघ रहा था, चाट रहा था।
उसने अपनी एक उंगली कामिनी की फड़कती हुई योनि में घुसा दी और जीभ से ऊपर क्लिटोरिस को रगड़ने लगा।

बाहर रमेश और शमशेर शराब पी रहे थे... और यहाँ अंदर कादर कामिनी की जवानी का रस पी रहा था।
कामिनी अब बर्दाश्त की सीमा पर थी।
उसकी जांघें कादर के सिर को भींच रही थीं।
"कादर... रुकना मत... मैं... मैं झड़ने वाली हूँ... कादर...!!"235606840-encn6hhucaeomhk
कामिनी वैसे ही वासना की दहलीज पर खड़ी थी, बस थोड़ी और मेहनत और कुएँ से शर्तिया पानी निकलना ही था.
लेकिन कामिनी की किस्मत उसकी हवास उसकी परीक्षा लेने के मूड मे थी.
****************


कामिनी का शरीर धनुष की तरह तन गया था।
उसकी एड़ियां बिस्तर पर रगड़ खा रही थीं।
उसकी योनि के अंदर कादर की उंगली और बाहर उसकी जीभ ने ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया था कि अब वह ज्वालामुखी फटने ही वाला था।(m ldpwiqacxt E Ai)(mh FXo Za8To6TOx7 u3)45810781b
"कादर... बस... बस आ गई... आह्ह्ह्ह... मत रुकना... !!"
कामिनी का सिर पीछे लुढ़क गया, आँखें चढ़ गईं। वह उस 'मोक्ष' के अंतिम पड़ाव पर थी।
अगले 5 सेकंड में उसका शरीर ऐंठने वाला था और सारा रस कादर के मुंह में बहने वाला था।
लेकिन ठीक उसी "नाज़ुक पल" (Crucial Moment) पर...
बाहर से एक भारी और शराबी आवाज़ ने बेडरूम के सन्नाटे को चीर दिया।
"अरे ओ कादर भाई!! कहाँ रह गए यार??"
वह शमशेर की आवाज़ थी। नशे में धुत, लेकिन तेज़।
"सूप ठंडा हो रहा है... और बोतल ख़त्म हो गई है! जल्दी आ भाई!"

वह आवाज़ किसी हथौड़े की तरह कामिनी के दिमाग पर पड़ी। ऐसा लगा ठीक उसके पीछे से, बिल्कुल पास से आवाज़ आई हो, दोनों ने चौंक कार बैडरूम की खुली खिड़की की तरफ देखा, वो खुली हुई थी.
कामिनी की सांसे थाम गई, उसने कैसे इस बात पर गौर नहीं किया, अक्सर हवास मे डूबा इंसान खुले दरवाजे, खुली खिड़की नहीं देख पाता.
कामिनी के साथ भी यही हुआ.

और उससे भी बड़ा झटका तब लगा, जब कादर ने अचानक अपना मुंह हटा लिया।
"चटाक!"
कादर ने एक झटके में अपना सिर पीछे खींच लिया।
कामिनी की योनि, जो चरम सुख के लिए तैयार थी, एकदम से सन्न रह गई।
वह 'झड़ने' वाली थी, लेकिन वह करंट वहीं का वहीं नसों में जम गया।

कादर खड़ा हुआ और लगभग नंगा ही दौड़ता हुआ खिड़की के पास पंहुचा, उसने देखा शमशेर और रमेश वही स्टोर के पास बैठे गप मार रहे थे,
"आया साब..... " कादर वही से चिल्लाया।

उसके होंठ और दाढ़ी कामिनी के पानी (Juices) से सने हुए थे।
उसने अपनी कलाई से अपना मुंह पोंछा और एक गहरी सांस ली।
"मै जाता हूँ, वरना लफड़ा हो जायेगा " कादर ने कामिनी की तरफ देखा, जो बिस्तर पर अभी भी टांगें फैलाए, तड़प रही थी।

कादर ने एक पल के लिए कामिनी की उस गीली, लाल और फड़कती हुई योनि को ललचाई नज़रों से देखा।

कादर ने पास पड़ी वो चेकदार लुंगी उठाई।
उसने उसे झटका और अपनी कमर पर बांधना शुरू किया।
कामिनी की नज़रें अभी भी धुंधली थीं, लेकिन उसने देखा...
कादर ने लुंगी के नीचे कुछ नहीं पहना था।
उसका काला, विशाल लंड अभी भी लोहे की तरह खड़ा था।
जैसे ही उसने लुंगी बांधी...
लुंगी के कपड़े में आगे की तरफ एक विशाल तंबू (Tent) बन गया।
वह खड़ा लंड लुंगी को आगे की तरफ धकेल रहा था, जैसे कह रहा हो कि 'मैं अभी शांत नहीं हुआ हूँ'।

"मैं चलता हूँ..." आपकी सेवा मे फिर हाजिर होऊंगा.
कादर मुड़ा और बेडरूम से बाहर निकल गया।

कामिनी बिस्तर पर अकेली रह गई।
उसकी साड़ी उठी हुई थी, जांघें फैली हुई थीं।
उसकी योनि गीली थी, लेकिन प्यासी थी।
उस अधूरेपन ने उसे अंदर से तोड़ दिया। उसे रोना आ रहा था, और साथ ही गुस्सा भी।
गुस्सा रमेश पर, शमशेर पर..... जिसने गलत वक़्त पर आवाज़ दी।
गुस्सा कादर पर... जो उसे ऐसे छोड़ गया।
और गुस्सा खुद पर... कि वह अपनी हवस की गुलाम बन गई थी।

कामिनी ने अपनी जांघों को सिकोड़ा और करवट लेकर तकिये में मुंह छुपा लिया।
उसने अपनी मुट्ठी भींची और गद्दे पर दे मारी।
"उफ्फ्फ्फ......!!"
उसकी योनि में एक मीठा-मीठा दर्द हो रहा था। यह दर्द उसे पूरी रात सोने नहीं देने वाला था।
*****************
कादर बेडरूम से निकला और गैलरी से होता हुआ अंधेरे बगीचे में आया।
उसकी चाल अजीब थी।
वह अपनी टांगें चौड़ी करके चल रहा था, जैसे किसी पहलवान ने अखाड़े में लंगोट बांधा हो।
वजह साफ़ थी—लुंगी के नीचे उसका 10 इंच का खंभा अभी भी पूरे उफान पर था। वह ठंडा होने का नाम नहीं ले रहा था।
लुंगी का कपड़ा आगे से बुरी तरह तना हुआ था, एक विशाल तंबू बना हुआ था जो हवा में झूल रहा था।
कादर टेबल के पास पहुंचा।
रमेश तो नशे में धुत था, उसकी गर्दन एक तरफ लुढ़की हुई थी।
लेकिन शमशेर?
शमशेर की आँखें जल रही थीं।
उसने कादर को आते हुए देखा।
उसकी नज़र सबसे पहले कादर के चेहरे पर गई।
कादर ने अपना मुंह पोंछ लिया था, लेकिन कामिनी की योनि का रस और उसकी लार की चमक अभी भी उसकी दाढ़ी और होठों पर कहीं-कहीं बाकी थी।
फिर शमशेर की नज़र नीचे गई... कादर की लुंगी पर।
शमशेर ने वो "उभार" देख लिया।

वह कोई बच्चा नहीं था। वह समझ गया कि लुंगी के नीचे क्या छुपा है और यह "हथियार" इतना तना हुआ क्यों है।
"आ गए कादर भाई..." शमशेर ने एक गहरी सांस ली और कुर्सी पर पीछे टिक गया।
उसने रमेश को कोहनी मारी। "ओए रमेश... उठ! तेरा बावर्ची आ गया।"
फिर शमशेर ने कादर की आँखों में देखा।
"बड़ा वक़्त लगाया अंदर? लुंगी ढूंढ रहे थे... या कुछ और भी कर रहे थे?"
शमशेर की आवाज़ में एक कुटिल व्यंग्य था।
उसने अपनी उंगली से इशारा किया।
"और ये लुंगी में क्या 'तोप' छुपा लाए हो भाई? लगता है अंदर कुछ ज्यादा ही 'गर्मी' थी?"
कादर का दिल धक से रह गया।
उसे लगा पकड़ा गया।
लेकिन शमशेर के चेहरे पर गुस्सा नहीं था... बल्कि एक गंदी मुस्कान थी।
शमशेर मज़े ले रहा था।
"कुछ नहीं साब..." कादर ने नज़रें झुका लीं और टेबल की आड़ में हो गया। "वो... बस कपड़ा टाइट बांध लिया है।"
अभी कादर कुछ सफाई देता की तभी बगीचे सन्नाटे को तोड़ता रघु लड़खड़ाते कदमों से अंदर दाखिल हुआ,

रघु, जो अपनी 'दवाई' (दारू) पीकर वापस आ गया था, नशे में झूमता हुआ स्टोर रूम की तरफ बढ़ा चला आ रहा था,
"अच्छा कादर भाई आ गया तेरा दोस्त, तुम लोग दावत उड़ाओ, हम लोगो का तो हो गया " शमशेर ने रमेश को उठाया और अपने कंधे का सहारा दे घर की ओर बढ़ गया.

कादर, जो वहीं अंधेरे में लुंगी लपेटे खड़ा था, रघु को देखकर मन मसोस कर रह गया।
'साला कबाब में हड्डी...' कादर ने दांत पीसे।
रघु के आ जाने से अब कादर के लिए दोबारा घर में घुसना नामुमकिन था। उसका 'खेल' अधूरा रह गया था।

उधर, रमेश पूरी तरह नशे में धुत्त था।
उसे कादर के उस 'जादुई मटन सूप' पर इतना भरोसा था कि लड़खड़ाते हुए भी उसे लग रहा था कि आज रात वह कामिनी की चीखें निकलवा देगा।
"कामिनी... मेरी जान...देख तेरा शेर आ रहा है..." रमेश बड़बड़ा रहा था, जबकि उसके पैर ज़मीन पर टिक भी नहीं रहे थे।

शमशेर ने रमेश का हाथ अपने कंधे पर रखा और उसे सहारा देकर घर के अंदर ले जाने लगा।
शमशेर के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। एक रहस्य था,

इन्ही सब उपक्रम मे कोई आधे घंटे बीत गए थे, शमशेर रमेश को घसीटता हुआ बेडरूम के दरवाज़े तक ले आया।

शमशेर ने बेडरूम का दरवाज़ा धकेला।
अंदर का नज़ारा देखकर शमशेर के कदम वहीं जम गए।
ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी में... कामिनी बिस्तर पर औंधे मुंह (पेट के बल) लेटी हुई थी।
उसका चेहरा तकिये में दबा हुआ था, शायद वह अपनी सिसकियाँ दबा रही थी।
लेकिन उसकी पोजीशन...
उसकी भारी और मांसल गांड (Buttocks) पीछे की तरफ उभरी हुई थी। साड़ी घुटनों तक ऊपर चढ़ी हुई थी, जिससे उसकी गोरी, सुडौल पिंडलियां (Calves) और जांघों का पिछला हिस्सा साफ़ चमक रहा था।

शमशेर का दिमाग यह नज़ारा देखकर सुन्न हो गया।
उसे लगा जैसे कोई "हथिनी" अपने साथी का इंतज़ार कर रही हो।
उसकी मर्दानगी ने उसकी खाकी पैंट के अंदर तुरंत सलामी दे दी।

"आओ रमेश..." शमशेर ने जानबूझकर भारी आवाज़ में कहा, अपनी नज़रें कामिनी की गांड से हटाए बिना।

शमशेर की आवाज़ सुनते ही कामिनी बिजली के करंट की तरह चौंकी।
वह ख्यालों में थी—कादर के लंड और अपनी अधूरी प्यास के ख्यालों में।
हड़बड़ाहट में उसे याद ही नहीं रहा कि उसका हुक खुला हुआ है और पल्लू गिरा हुआ है।

"उह्ह... आप..."
कामिनी घबराकर झटके से पलटी और खड़ी होने की कोशिश की।
लेकिन इस जल्दबाज़ी में वही हुआ जिसका शमशेर को इंतज़ार था।
कामिनी का पल्लू, जो उसने बस नाम के लिए कंधे पर रखा था, सरककर नीचे ज़मीन पर आ गिरा।
और उसके साथ ही...
उसका ब्लाउज़, जिसका ऊपर का हुक कादर के लिए खोला गया था, तनाव न सह सका और फैल गया।
शमशेर की आँखों के सामने जन्नत का दरवाज़ा खुल गया।

कामिनी के विशाल, गोरे और पसीने से सने हुए स्तन लगभग पूरी तरह बेपर्दा हो गए।
वे भारी थे, और तेज़ सांसों की वजह से ऊपर-नीचे हो रहे थे।
उनकी गहरी घाटी (Cleavage) इतनी गहरी थी कि उसमें पसीने की बूंदें चमक रही थीं।
कादर के लंड को चूसने और उत्तेजना की वजह से उसके निप्पल ब्लाउज़ के कपड़े को चीरकर बाहर झांक रहे थे।


उन पर उभरी हुई नीली नसें शमशेर को साफ़ दिखाई दे रही थीं।
शमशेर किसी भूखे कुत्ते की तरह उन घाटियों को घूरे जा रहा था।
उसने रमेश को पकड़ा हुआ था, लेकिन उसकी आँखें कामिनी के 'मांस' को नोच रही थीं।
कामिनी ने शमशेर की नज़रों को अपने स्तनों पर रेंगते हुए महसूस किया।
वह शर्म से लाल हो गई, लेकिन उसने खुद को ढका नहीं।
शायद वह भी चाहती थी कि कोई उसे देखे... कोई उसे सराहे... क्योंकि कादर ने उसे 'अधूरी' छोड़ दिया था।

"थैंक्स भाई... थैंक्स..." रमेश ने लड़खड़ाते हुए कहा। उसकी आँखें बंद हो रही थीं।
"अब तू जा... और कामिनी... कामिनी तू इधर आ..."
रमेश बेहोशी में भी हुकुम चला रहा था। उसे लगा वह कामिनी को प्यार करेगा, जबकि वह खड़े होने के लायक भी नहीं था।

शमशेर ने रमेश को एक झटके में बेड पर पटक दिया।
रमेश गद्दे पर गिरते ही ढेर हो गया।
अब कमरे में सिर्फ़ दो लोग जाग रहे थे— शमशेर और कामिनी।
शमशेर कमरे से बाहर नहीं गया।
वह बेड के पास, रमेश के पैरों की तरफ खड़ा हो गया।
उसने अपनी बनियान ठीक की, जिससे उसका चौड़ा सीना और तन गया।

इस पोज़ (Pose) ने कामिनी का ध्यान शमशेर के निचले हिस्से पर खींच लिया।
शमशेर की टाइट खाकी पुलिसिया पैंट में एक विशाल उभार (Bulge) साफ़... बिल्कुल साफ़ दिख रहा था।
उसका लंड पूरा खड़ा था और पैंट की ज़िप को फाड़ने की कोशिश कर रहा था।
वह उभार कादर के लंड जितना विशाल तो नहीं था, लेकिन वह सख्त और खतरनाक लग रहा था।
शमशेर ने कामिनी की आँखों में देखा, फिर उसके खुले हुए स्तनों पर, और फिर वापस आँखों में।

"रमेश तो सो गया भाभी..." शमशेर की आवाज़ में एक गहरा नशा था।
वह एक कदम आगे बढ़ा।
"लेकिन लगता है... आपको नींद नहीं आ रही।"

कामिनी के होंठ (जो अभी भी सूजे हुए थे) कांपने लगे।
उसकी योनि ने एक बार फिर "धक्-धक्" किया।
सामने पति बेहोश पड़ा था, और उसके पैरों के पास एक 'सांड' जैसा मर्द खड़ा था जो उसे कच्चा चबाने को तैयार था।
कामिनी के पास दो रास्ते थे—चीखना, या... समर्पण करना।


क्रमशः........

Gazab ki hahakari update he Lord haram Bro

Jo kaam kadir adhura chhod gaya tha, lagta he ab vo shamsher pura krega.......

Ya fir kamini ka beta Bunty shamsher se apni maa ko bacha lega????

Keep rocking Bro
 

Lord haram

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डेफिनेटली, बड़ी मुश्किल से इतनी शानदार स्टोरी बेटे के नजरिये से लिखी हुई मिली है. ये सुकून देने वाली कहानी है. मैंने जैसा की रात में कहा भी की अरसे बाद xossip को बंद हुए ऐसी कहानी मिली है जो इरोटिका के एकदम टॉप पर है. आप को बहुत बहुत बधाई और शुक्रिया ऐसा टेस्टी और नशीला कहानी देने के लिए.
लार्ड भाई/बहन प्लीज़ ये भी बताइए की आपने कब से कहानियां लिखने का अनुभव है ? क्या पहले भी कहनी आपने कुछ लिखा है ?
हाहाहाहा.... भाई धन्यवाद.
नाम नया है मै पुराना खिलाडी हूँ यहाँ का.
Xforum वालो ने मुझे बैन कर दिया है.
उन्हें पसंद नहीं आता जिस तरह से बेबाक मै लिख बोल देता हूँ.
मेरा नाम andypndy है.
आप यदि नये है तो मुझे नहीं जानते.

आप मेरे ब्लॉग पर चले जाये, आपको मेरी कहानियाँ मिल जाएगी
 

deo_mukesh

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भाई आईडी मैंने नया बनाया है, यूजर तो 2019 में xossip बैंड होने के बाद से हूँ पर सिर्फ कहानी पढ़ने तक रहा।
आपने अबतक जो समा बांधा है कहानी को एक इरोटिक उपन्यास की तरह लिखा है, वो मारबलस है, ब्लॉग का कोई आता पता आपके प्रोफाइल से नही मिला।
वैसे पुराने जमाने के blogspot के जमाने के राज शर्मा की भी कोई खोज खबर मिलती तो आज के पाठकों को पता चलता कि कहानी लिखने वाले लेखक कैसे होते हैं।
हाहाहाहा.... भाई धन्यवाद.
नाम नया है मै पुराना खिलाडी हूँ यहाँ का.
Xforum वालो ने मुझे बैन कर दिया है.
उन्हें पसंद नहीं आता जिस तरह से बेबाक मै लिख बोल देता हूँ.
मेरा नाम andypndy है.
आप यदि नये है तो मुझे नहीं जानते.

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Ajju Landwalia

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मेरी माँ कामिनी - भाग 33



(कुछ मिनट पहले: बगीचे में)

रमेश नशे में धुत होकर कुर्सी पर झूल रहा था। उसके हाथ से गिलास छूटने को हो रहा था।
सामने जल रही लकड़ियाँ अब राख बन चुकी थीं, आग बुझने की कगार पर थी।

"अबे... ये कादर कहाँ मर गया?" रमेश लड़खड़ाती जुबान में बड़बड़ाया। "सूप भी ठंडा हो रहा है... और आग भी ठंडी हो गई।"
शमशेर ने अपनी सिगरेट का कश खींचा और उसे पैर से मसल दिया।
"तू बैठ रमेश... मैं देखता हूँ। थोड़ी लकड़ियाँ और ले आता हूँ, लगाता हूँ चूल्हे मे" शमशेर अपनी कुर्सी से उठा।

शमशेर अंधेरे में चलता हुआ स्टोर रूम के पास लकड़ियों के ढेर की तरफ गया। वहाँ कुछ नहीं मिला, वो थोड़ा आगे बड़ा की उसे खिड़की से आतिज़ रौशनी मे कुछ लकड़िया दिखाई दी,
लकड़ियों का ढेर कामिनी के बेडरूम की खिड़की के ठीक नीचे था।
वह पास गया और झुककर लकड़ी उठाने ही वाला था कि तभी...

सन्नाटे में उसे एक दबी हुई आवाज़ सुनाई दी।
"आह्ह्ह.... उफ्फ्फ्फ.... कादर...."
शमशेर का हाथ हवा में रुक गया।
यह आवाज़ किसी बिल्ली की नहीं, एक औरत की सिसकारी थी।
और वो औरत कोई और नहीं, उसके खास दोस्त रमेश की बीवी कामिनी की थी।
शमशेर ने गर्दन उठाई ।
बेडरूम की खिड़की के पल्ले हल्के से खुले हुए थे। पर्दा नाम मात्र माँ लगा हुआ था।
अंदर ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी जल रही थी।
शमशेर ने सांस रोकी और दबे पांव खिड़की के पास गया।
उसने उस झीरी (Gap) से अंदर झांका।
और जो उसने देखा... उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

बेड पर कामिनी अपनी साड़ी समेटे, टांगें चौड़ी किए पड़ी थी।
और उसके दोनों पैरों के बीच... वह 'गुंडा, कसाई दो कोड़ी का मटन काटने वाला कादर खान अपना मुंह गड़ाए हुए था।

शमशेर की आँखों ने देखा कि कैसे कादर की जीभ कामिनी की गुलाबी गुफा को चाट रही थी।
"फच्... फच्... चप्प... चप्प..." की आवाज़ें अब शमशेर को साफ़ सुनाई दे रही थीं।
शमशेर का लंड, जो पैंट के अंदर सोया हुआ था, एक झटके में लोहे की रॉड बन गया।
'साला... यह क्या चल रहा है?' शमशेर का दिमाग चकरा गया।
'साला इसे तो मैं सती-सावित्री समझता था... और यहाँ ये रांड इस कल के आए लौंडे से अपनी चुत चटवा रही है?'
शमशेर की आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि हवस और जलन थी।
उसे जलन इस बात की थी कि वह जगह (कामिनी की टांगों के बीच) उसकी होनी चाहिए थी, लेकिन वहां कादर मज़े ले रहा था।

उसने देखा कामिनी तड़प रही थी।
कामिनी ने कादर के बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़ रखा था और उसे अपनी योनि पर दबा रही थी।
"चूस कादर.... खा जा मेरी चुत.... आह्ह्ह्ह... मुझे ख़त्म कर दे...."
कामिनी के ये शब्द शमशेर के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरे।
'अरे बाप रे... यह तो पूरी खिलाडी निकली...' शमशेर ने अपने होंठों पर जीभ फेरी। 'इतनी प्यास? इतनी आग?'
उसने देखा कि कामिनी की कमर हवा में उठने लगी है। वह क्लाइमेक्स (झड़ने) के करीब थी।

शमशेर की पुलिसिया खोपड़ी ने तुरंत काम किया।
'अगर यह अभी झड़ गई... तो इसकी आग शांत हो जाएगी। और फिर यह मुझे भाव नहीं देगी।'

'नहीं... इसे शांत नहीं होने देना। इसे तड़पाना है।'
एक भूखे जानवर को काबू करना आसान होता है,

शमशेर के दिमाग में एक वहशी प्लान ने जन्म लिया।
उसने तुरंत खिड़की से हटकर अपनी नज़रें रमेश की तरफ घुमाईं और अपनी आवाज़ को भारी और ऊँचा कर लिया।
उसने जानबूझकर ठीक उसी वक़्त चिल्लाया जब कामिनी चरम पर थी।
"अरे ओ कादर भाई!! कहाँ रह गए यार??"
उसकी आवाज़ अंदर बम की तरह फटी।
शमशेर ने खिड़की की झीरी से देखा—कादर झटके से पीछे हटा और कामिनी बिस्तर पर अधूरी तड़पती रह गई।
शमशेर के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई।
'तड़प मेरी जान... तड़प... अब तेरी यह अधूरी आग मैं बुझाऊंगा। कादर ने तो सिर्फ़ सुलगाया है... राख तो मैं करूँगा।'

शमशेर ने जल्दी से वहां से हटकर अपनी जगह वापस ले ली, जैसे उसे कुछ पता ही न हो।
*********************

वही कहीं इस घर से दूर


स्थान: पुलिस कमिश्नर ऑफिस, शहर | समय: रात के 12:15 बजे)

कमरे में एसी की 'हम्म्म' की आवाज़ के अलावा सिर्फ़ बूटों की 'ठक-ठक' गूंज रही थी।
पुलिस कमिश्नर विक्रम सिंह एक घायल शेर की तरह अपने केबिन में इधर से उधर टहल रहा था।
उसकी वर्दी की बांहें ऊपर चढ़ी हुई थीं, टाई ढीली थी, और आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। उसकी आँखें लाल थीं—गुस्से से और थकान से।

"धत् तेरे की!" विक्रम ने टेबल पर मुक्का मारा। कांच का पेपरवेट हिल गया।

कल रात की रेड... उसके करियर का एक काला धब्बा बन गई थी।
उसे पक्की खबर थी कि कादर खान ढाबे पर ड्रग्स की बड़ी खेप के साथ मौजूद है। लेकिन जब उसकी टीम वहां पहुंची, तो चिड़िया उड़ चुकी थी। ढाबा खाली था।
कादर खान और 50 लाख का माल... दोनों हवा हो गए थे।

विक्रम के लिए यह सिर्फ़ एक केस नहीं, उसकी नाक का सवाल था। वह हार मानने वालों में से नहीं था।
तभी केबिन का दरवाज़ा हल्का सा खुला।
हवलदार ने डरते-डरते झांका।

"स... साहब..." हवलदार की आवाज़ कांप रही थी। "वो... वो खबरी आया है। 'कल्लू काना'। बोल रहा है बहुत ज़रूरी बात बतानी है।"

विक्रम की आँखों में खून उतर आया।
"भेजो साले को अंदर..." विक्रम गुर्राया। "आज अगर उसने बकवास की, तो उसकी दूसरी आँख भी फोड़ दूंगा। हरामखोर ने मेरी इज़्ज़त मिटटी में मिला दी।"

दो मिनट बाद, एक मरियल, गंदा और शराब की बदबू में डूबा हुआ आदमी लगभग घिसटता हुआ अंदर आया।
उसके कपड़े फटे थे और वह नशे में झूल रहा था।
विक्रम ने उसे देखते ही अपना आपा खो दिया।
उसने लपककर उस खबरी की गिरेबान पकड़ी और उसे दीवार से सटा दिया।

"आ साले मादरचोद..." विक्रम चिल्लाया। "तूने गलत टिप दी मुझे? मेरा टाइम ख़राब किया?"
विक्रम का हाथ उठा, वह उसे मारने ही वाला था।

"मलिक... मलिक... रहम!" खबरी गिड़गिड़ाया। उसके हाथ जुड़ गए। "खबर सही थी मेरी माई-बाप... कसम खुदा की! कादर खान ड्रग का धंधा करता है और वो वहीं था।"

"तो कहाँ गया वो?" विक्रम ने उसकी गर्दन दबोच ली, उसकी सांसें घुटने लगीं। "कहाँ है कादर खान? कहाँ है उसकी ड्रग? ज़मीन खा गई या आसमान निगल गया?"

"साहब... वही... वही तो बताने आया हूँ..." खबरी ने मुश्किल से सांस ली।
विक्रम ने अपनी पकड़ थोड़ी ढीली की।
"बक! जल्दी बक!"

खबरी ने हांफते हुए कहा, "कादर खान वहां से माल लेके भाग गया था साहब। उसे भी किसी ने टिप दे दी थी कि पुलिस आ रही है।"

विक्रम की भौहें तन गईं। 'पुलिस की रेड की खबर लीक हुई? मतलब विभाग में कोई गद्दार है?'

खबरी ने अपनी बात जारी रखी, "आज शाम... जब मैं देसी ठेके पर था, तो एक आदमी नशे में बड़बड़ा रहा था। मैंने उससे दोस्ती की... उसे थोड़ी और पिलाई।"
खबरी ने एक कुटिल हंसी हंसी। "दारू पेट में जाती है तो राज़ बाहर आते हैं साहब।"

"उसने बताया उसका नाम रघु है... साला कभी कादर के ढाबे पर रहता था। आज हिचहह.... हिचहह..." खबरी को हिचकी आ गई।

"आज क्या?" विक्रम का सब्र टूट रहा था। उसने उसे झिंझोड़ा। "पूरा बोल!"
"आज साला बोल रहा था कि वो मेरे घर पर पड़ा हुआ है।"
"कौनसा घर? कैसा घर?" विक्रम उत्तेजना में चिल्लाया।
"बंगला नंबर 69..." खबरी ने धीरे से कहा।

विक्रम चौंक गया। "बंगला नंबर 69? सिविल लाइन्स वाला इलाका?"
विक्रम ने खबरी को घूरा। "साले, वो पॉश इलाका है। वहां बड़े अफ़सर और रईस लोग रहते हैं। वो शराबी वहां कैसे रह सकता है? तू फिर मुझे घुमा रहा है?"

विक्रम ने गुस्से में खबरी का कान पकड़कर मरोड़ दिया।
"आईईईई.... साहब पूरा तो सुनो बाप..." खबरी दर्द से बिलबिलाया। "वो उस बंगले का मालिक नहीं है। वो वहां नौकर है। कुछ दिन पहले ही वहां के बाबू ने उसे काम पर रखा है। वो अपना नाम रघु बताता है, और बोलता है कादर उसका पुराना जिगरी यार है।"

विक्रम ने खबरी को छोड़ा।
उसका दिमाग कंप्यूटर की तरह चलने लगा।
'कादर का पुराना दोस्त... रघु... बंगला नंबर 69 में नौकर है। और कादर गायब है।'

'यानी कादर खान कहीं भागा नहीं है... वो शहर के बीचों-बीच, एक रईस बंगले में, नौकर के क्वार्टर में छुपा बैठा है। पुलिस जंगलों, सस्ते होटेलों और ढाबों में खाक छान रही है, और वो एसी बंगले में मज़े कर रहा है!'

विक्रम के चेहरे पर एक शिकारी की चमक आ गई।
उसने तुरंत लैंडलाइन फ़ोन उठाया और नंबर घुमाया।
"ट्रिन... ट्रिन... ट्रिन..."
उधर पुलिस स्टेशन में सब-इंस्पेक्टर मोहन ऊंघ रहा था। फ़ोन की घंटी सुनकर वह हड़बड़ाकर उठा।

"ह... हेलो? पुलिस स्टेशन...सिविल लाइन"
"मोहन!" विक्रम की आवाज़ में बिजली कड़क रही थी। "कमिश्नर विक्रम बोल रहा हूँ।"

मोहन कुर्सी से खड़ा होकर सावधान की मुद्रा में आ गया। "जय हिन्द सर! सलाम सर!"
"सलाम छोड़," विक्रम ने कड़क कर पूछा। "थाना इंचार्ज शमशेर सिंह कहाँ है? उसे फ़ोन दे।"

मोहन के पसीने छूट गए।
"स... सर... वो तो घर गए। उनकी शिफ्ट ख़त्म हो गई थी। शाम को ही निकल गए थे।"

"बास्टर्ड...!!" विक्रम चिल्लाया। "पुलिस कभी ऑफ़ ड्यूटी नहीं होती! शहर में इतना बड़ा क्रिमिनल घुम रहा है और ये हरामखोर घर जाकर सो रहा है?"

विक्रम ने एक पल सोचा, फिर आदेश दिया।
"मोहन, कान खोलकर सुन। अभी के अभी, पूरी फोर्स तैयार कर। एक रेड करनी है।"

"जी सर... कहाँ सर?" मोहन ने कांपते हुए पूछा।
"शहर के बंगला नंबर 69 में।"
विक्रम की आवाज़ में मौत का सन्नाटा था।

"मैं खुद वहां पहुँच रहा हूँ। तुम अपनी जीप लेकर निकलो। बंगले को चारों तरफ से घेर लो। एक भी परिंदा अंदर नहीं जाना चाहिए और एक भी चूहा बाहर नहीं निकलना चाहिए। समझ गया?"

"जी... जी सर! समझ गया!" मोहन ने फ़ोन रख दिया और "रेड अलर्ट" का सायरन बजा दिया।
विक्रम ने फ़ोन पटका।
उसने अपनी सर्विस रिवॉल्वर चेक की, उसे लोडेड किया और होल्स्टर में डाला।

उसकी आँखों में अंगारे दहक रहे थे।
"कादर खान..." विक्रम बड़बड़ाया। "आज तू पाताल में भी छुपा होगा, तो घसीट कर निकालूँगा।"
वह लंबे डग भरता हुआ अपनी जीप की तरफ बढ़ा।
************************

वहीँ दूसरी तरफ... शहर के उसी बंगला नंबर 69 में...
बाहर का गेट बस आपस मे सटा हुआ था किसी को सुध नहीं थी की उसे बंद किया जाये,

घर का मालिक रमेश, शराब और मटन के नशे में बेड पर औंधे मुंह पड़ा था, दुनिया से बेखबर।
और उसके बेडरूम में...
उसकी खूबसूरत बीवी कामिनी दीवार से सटी खड़ी थी, उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसका पल्लू ज़मीन पर था, और छाती खुली हुई थी।
और उसके ठीक सामने...
उस इलाके का थाना इंचार्ज, दरोगा शमशेर सिंह खड़ा था।

जिसकी खाकी पैंट में 'तंबू' बना हुआ था और जिसकी आँखों में वहशीपन था।
उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस 'शिकार' (कामिनी) को वह खाने जा रहा है...
उसके घर के बाहर पुलिस की गाड़ियों के सायरन और कमिश्नर विक्रम के कदम बस कुछ ही पलों की दूरी पर हैं।
एक तूफ़ान बाहर आ रहा था... और एक तूफ़ान अंदर आने वाला था।

बेडरूम में रमेश के खर्राटों की गूंज थी, लेकिन कामिनी के कानों में सिर्फ़ अपनी धड़कनों का शोर और शमशेर की भारी सांसें थीं।
शमशेर ने कामिनी को दीवार से सटा रखा था। उसका विशाल शरीर कामिनी के लिए एक पिंजरे की तरह था।
कामिनी की नज़रें नीचे झुकी हुई थीं, जहाँ शमशेर की खाकी पैंट का ज़िप अब खुल चुका था।
शमशेर ने एक हाथ से अपनी पैंट नीचे सरकाई और अपना अंडरवियर भी खींच दिया।
"फटाक..."
इलास्टिक छूटने की आवाज़ के साथ ही शमशेर का विशाल, काला और लोहे जैसा सख्त लंड आज़ाद होकर बाहर उछल आया।
वह पूरी तरह तना हुआ था, हवा में झूल रहा था और कामिनी के पेट को लगभग छू रहा था।
कामिनी की आँखें उस मर्दाने हथियार पर गड़ गईं।
कादर का लंड 'जंगली' था, लेकिन शमशेर का लंड 'ताकतवर' था। वह मोटा था, और उसका सुपाड़ा (Head) गुस्से में लाल होकर चमक रहा था।
कामिनी की योनि, जो कादर के अधूरेपन से तड़प रही थी, अब उस पुलिसिया डंडे को महसूस करने के लिए मचल उठी।
उसका हाथ अनजाने में ही आगे बढ़ा।
उसकी उंगलियां उस गरम और नसों भरे लंड को अपनी मुट्ठी में भरने के लिए तड़प रही थीं।
लेकिन शमशेर खिलाड़ी था। वह शिकार को इतनी आसानी से शिकार नहीं करने देने वाला था।
"ना... ना..."
जैसे ही कामिनी का हाथ वहां पहुंचा, शमशेर ने उसका हाथ झटक दिया।
उसने कामिनी की साड़ी का पल्लू, जो पहले ही गिर चुका था, उसे एक झटके में पूरी तरह खींच लिया।

"पहले कपड़े उतारो..." शमशेर का आदेश स्पष्ट और खूंखार था। "ब्लाउज़ और पेटीकोट... सब कुछ। मुझे तुम्हारे जिस्म का कोना-कोना देखना है।"

कामिनी के पास कोई रास्ता नहीं था। वासना ने उसे लाचार बना दिया था।
कांपते हाथों से उसने अपनी कमर पर बंधी पेटीकोट की डोरी खोली।
"सर्रररर......"
रेशमी साड़ी और पेटीकोट एक साथ उसके पैरों पर गिरकर ढेर हो गए।

अब वह सिर्फ अपने ब्लाउज़ में खड़ी थी।
कामिनी ने अपने कन्धों को झटका, और ब्लाउज़ भी सरककर ज़मीन पर गिर गया।

ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी में कामिनी का सम्पूर्ण नंगा यौवन चमक उठा।

शमशेर की आँखें फटी की फटी रह गईं।
उसने सुनैना को देखा था, कई औरतों, कोठे की रंडियो को देखा था, लेकिन कामिनी... कामिनी का जिस्म किसी संगमरमर की मूरत जैसा था, जो वासना की आग में तपकर गुलाबी हो गया था।

उसका बदन मक्खन जैसा गोरा और गठा हुआ था।
सबसे पहले शमशेर की नज़र उसके विशाल और भारी स्तनों पर गई।

वे पसीने से सने हुए थे और तेल की तरह चमक रहे थे।
वे इतने भारी थे कि उनका वजन कामिनी की छाती पर साफ़ दिख रहा था, लेकिन फिर भी वे तनकर खड़े थे।
कादर के चूसने और कामिनी की उत्तेजना की वजह से, उन गोरे स्तनों पर नीली नसें (Blue Veins) साफ़ उभर आई थीं, जो किसी नक्शे की तरह उसके निप्पलों तक जा रही थीं।images-2

और उसके निप्पल...
मोटे, काले और बेर की तरह सख्त। वे अकड़े हुए थे और शमशेर को चुनौती दे रहे थे।
नीचे उसकी गहरी नाभि, और फिर उसकी चौड़ी कमर जो किसी सुराही की तरह थी।
और उन भरी हुई जांघों के बीच... उसका कामुक त्रिकोण... जहाँ बाल का कोई नामोनिशान नहीं था, एक दम साफ चिकना खूबसूरत, जहाँ से अब भी रस बह रहा था।
शमशेर ने ऐसा 'भरा हुआ' और 'कसावदार' माल अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखा था।


"उफ्फ्फ्फ... क्या चीज़ हो तुम कामिनी..."
शमशेर के मुंह से लार टपकने को हो गई।
उससे अब रहा नहीं गया।
उसने एक जानवर की तरह कामिनी पर हमला बोल दिया।
उसने कामिनी को दीवार से इतनी जोर से सटाया कि कामिनी की नंगी पीठ ठंडी दीवार से चिपक गई।

"सीइइइ......" कामिनी के मुंह से सिसकी निकल गई।
दीवार बर्फ जैसी ठंडी थी, लेकिन सामने शमशेर का जिस्म भट्टी जैसा गरम था।

शमशेर ने कामिनी के दोनों गालों को अपने मज़बूत पंजों में जकड़ लिया और उसके सूजे हुए होंठों को अपने मुंह में भर लिया।
"म्मम्मम्म... चप्प... चप्प..."
वह उसे चूम नहीं रहा था, वह उसे नोच रहा था। शमशेर की जीभ कामिनी के मुंह को खंगाल रही थी।
मटन और शराब का तीखा नशा कामिनी के मुँह मे घुलने लगा, लार से होता हुआ पेट मे जाने लगा,
एक अजीब सा अहसास था, हल्का सा तीखा, कसैला लेकिन नशीला.
शमशेर का एक हाथ नीचे गया और उसने कामिनी के भरे हुए, भारी स्तन को अपनी मुट्ठी में भर लिया।
उसने उसे बुरी तरह भींचा, मसला और दबाया।


वह उस गोरे मांस को अपनी उंगलियों में ऐसे गूंथ रहा था जैसे कोई आटा गूंथता है।
"आह्ह्ह्ह... उम्मम्म... धीरे..." कामिनी दर्द और मज़े में सिसक उठी।

शमशेर ने उसके खड़े निप्पल को अपनी उंगलियों में पकड़कर मरोड़ दिया, और फिर अपना मुंह नीचे ले जाकर उस काले निप्पल को अपने दांतों और होंठों में जकड़ लिया।
"स्स्स्लर्प......"
शमशेर उसे पीने लगा, चूसने लगा, जैसे कोई बच्चा माँ का दूध पीता है,82759920लेकिन एक शैतानी भूख के साथ।
कामिनी का सिर पीछे दीवार से टकरा रहा था।
उसका पूरा जिस्म जल रहा था।
वह बार-बार अपने हाथ नीचे ले जाती, शमशेर के उस खड़े लंड को पकड़ने की कोशिश करती।

उसे उस खंभे की गर्मी अपनी हथेली में चाहिए थी।
लेकिन शमशेर उसे अपना 'लंड ' पकड़ने ही नहीं दे रहा था।
जैसे ही कामिनी का हाथ नीचे जाता, शमशेर उसे पकड़कर वापस दीवार पर पटक देता।

"तड़प...साली रांड " शमशेर उसके कान में गुर्राया, उसके स्तन को और ज़ोर से भींचते हुए।
"अभी और तड़प... जब तक मैं न कहूँ, तू मुझे छुएगी नहीं।"

कामिनी बेबस थी, गंदे शब्द खुद को रांड कहना उसे सुकून दे रहा था, शमशेर का ये जंगलीपना उसे मदहोश कर रहा था, साथ ही यही बेबसी उसे और गीला कर रही थी।
सामने बेड पर उसका पति रमेश बेहोश पड़ा था, और यहाँ दीवार से सटी कामिनी एक गैर-मर्द के हाथों अपनी जवानी लुटवा रही थी, अपने स्तनों को मसलवा रही थी।
उसकी योनि से पानी की धार बह निकली।
वह दर्द और हवस में चिल्ला रही थी—
"आह्ह्ह... शमशेर... मार डालोगे... आह्ह्ह... और ज़ोर से... !!"

बेडरूम की दीवार से सटी कामिनी अब सिर्फ़ मांस का एक टुकड़ा बनकर रह गई थी।
शमशेर, जो अब पूरी तरह 'जानवर' बन चुका था, कामिनी के जिस्म को नोच रहा था।
उसका मुंह कामिनी की गर्दन और स्तनों को चूस रहा था, लेकिन उसके हाथ... उसके हाथ पीछे जाकर कामिनी के सबसे मादक हिस्से के साथ खेल रहे थे।
शमशेर के मज़बूत और खुरदरे पंजे कामिनी की विशाल, नंगी और मुलायम गांड पर गड़ गए थे।
उसने उन दोनों भारी-भरकम कूल्हों (Buttocks) को अपनी मुट्ठी में भरकर बुरी तरह भींचा।

"आह्ह्ह..." कामिनी दर्द से बिलबिला उठी।
"साली... क्या मांस भरा है पीछे..." शमशेर गुर्राया। "आज तेरी यह गांड मारूंगा।"
कामिनी के रोंगटे खड़े हो गए।
उसे याद आया... जब शमशेर पहली बार उनके घर डिनर पर आया था। तब कामिनी साड़ी में थी, और झुककर पानी दे रही थी।
तब शमशेर ने रमेश से हंसते हुए कहा था— "भाई, अगर मेरी बीवी की गांड ऐसी होती, तो कसम से मार-मार के लाल कर देता।"
आज वह डरावनी फैंटेसी हकीकत बनने जा रही थी।
कामिनी को लगा जैसे कोई गर्म लोहे की सलाख उसके अंदर घुसने वाली है।

शमशेर की उंगलियां उसकी गांड की गहरी दरार (Butt Crack) में रेंगने लगीं।
वह सूखी थी, तंग थी। शमशेर ने अपनी ऊँगली पर थूका और फिर वापस से कामिनी की गांड दरार ने तेराने लगा, शमशेर वहां रास्ता बनाने की कोशिश कर रहा था।

"न... नहीं... प्लीज..." कामिनी ने तड़पते हुए शमशेर के सीने पर हाथ रखा।
"आअह्ह्ह.... उउउफ्फ्फ्फ़... ये क्या कर रहे हो? मैं तुम्हारे दोस्त की बीवी हूँ शमशेर... होश में आओ।"
कामिनी ने अपनी 'इज़्ज़त' और 'रिश्ते' का वास्ता देकर उसे रोकना चाहा।

यह सुनते ही शमशेर की आँखों में खून उतर आया।
वह रुका नहीं, बल्कि उसने कामिनी के बालों को पकड़कर उसका चेहरा ऊपर खींच लिया।

"दोस्त की बीवी?" शमशेर ने कामिनी की आँखों में झांका।
"साली... रांड... चुप!" शमशेर दहाड़ा।
"हरामखोर... अभी जब उस कादर से, उस दो टके के कसाई से अपनी चुत चटवा रही थी, तब याद नहीं आया कि तू दोस्त की बीवी है? तब तो बड़ा मज़ा आ रहा था तुझे?"

शमशेर का यह कथन सुनते ही कामिनी का जिस्म काठ (लकवा) मार गया।
उसकी गांड की मांसपेशियां, जो कस गई थीं, डर के मारे ढीली पड़ गईं।
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया, जैसे जिस्म से सारा खून निचोड़ लिया गया हो।
उसकी चोरी पकड़ी गई थी। रंगे हाथों।

अब उसके पास कोई दलील नहीं थी, कोई बहाना नहीं था।
वह शमशेर की नज़रों में अब 'भाभी' नहीं, बस एक 'बिगड़ी हुई रंडी' थी।
शमशेर ने उसकी घबराहट को महसूस कर लिया,
"क्यों? निकल गई हवा?" शमशेर ने एक कुटिल मुस्कान दी।

"शुक्र मना कि तू मेरे दोस्त की बीवी है, इसलिए यहाँ बेडरूम में प्यार से पेश आ रहा हूँ। वरना जैसी हरकत तूने की है ना... तुझे तो भरे बाज़ार में नंगा करके चोदता।"
शमशेर का चेहरा गुस्से और उत्तेजना से लाल टमाटर हो रहा था। उसका खूंखार पुलिसिया रूप अब पूरी तरह बाहर आ चुका था।
कामिनी अभी सदमे में थी, कुछ सोच ही नहीं पा रही थी।
तभी शमशेर ने एक्शन लिया।
उसने कामिनी के बालों को मुट्ठी में जकड़ा और उसे एक झटके से बिस्तर की तरफ धकेल दिया।
"चल... झुक जा अपने खसम के सामने।"
शमशेर ने उसे ठीक उसी जगह झुकाया जहाँ रमेश बेहोश पड़ा था।

रमेश का मुंह खुला था, और उसके होंठों से थूक (लार) बहकर तकिये पर गिर रही थी।
कामिनी अपने ही पति के चेहरे के सामने, उसके बिल्कुल पास, घुटनों और कोहनी के बल (Doggy Style) आ गई।
उसकी आँखों के सामने रमेश का बेहोश चेहरा था।
उसे अजीब सी बेचैनी हो रही थी, ग्लानि (Guilt) हो रही थी...
लेकिन उसका जिस्म?
उसका जिस्म इस अपमान और जबरदस्ती पर पागलों की तरह प्रतिक्रिया दे रहा था।
डर के बावजूद, उसकी योनि अभी भी कादर की याद में और अब शमशेर के डर में पानी छोड़ रही थी।

जैसे ही कामिनी झुकी, शमशेर के सामने जो मंज़र पेश हुआ, वह किसी भी मर्द का ईमान डगमगा देने वाला था।
कामिनी की विशाल, गोरी और मखमली गांड हवा में ऊपर उठ गई।
झुकने की वजह से उसके गांड के दोनों भारी पाट (Cheeks) फैलकर अलग हो गए।263 240
ट्यूबलाइट की रौशनी सीधे उस 'गुलाबी घाटी' पर पड़ रही थी।

नीचे लटकती हुई उसकी योनि के गुलाबी होंठ (Lips) साफ़ दिख रहे थे। वे सूजे हुए थे और गीले थे।
उनमें से एक महीन लकीर में पारदर्शी पानी (Kamras) रिस रहा था, जो उसकी जांघों के अंदरूनी हिस्से को भिगो रहा था। वह गुफा कादर के जाने के बाद से खाली थी और अब भरने के लिए चीख रही थी।
और उसके ठीक ऊपर... वह छोटा, तंग और भूरा-गुलाबी छेद (Anus)।
गांड के पाटों के फैलने से वह छेद बिल्कुल नुमाया (Exposed) हो गया था।
कामिनी के डर और उत्तेजना की वजह से वह छेद "लपक" रहा था।
वह बार-बार सिकुड़ रहा था और खुल रहा था (Puckering)।solo porn porn porn gif ass 1945491
जैसे उसे समझ नहीं आ रहा हो कि वह शमशेर के लंड के स्वागत के लिए खुले, या अपनी सुरक्षा के लिए बंद हो जाए।
वह "खुल-बंद" होता हुआ छेद शमशेर को सीधा निमंत्रण दे रहा था— "आओ और मुझे फाड़ दो।"
शमशेर उस नज़ारे को देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठा।
उसका खड़ा लंड पैंट को फाड़ने पर उतारू था।
"उफ्फ्फ्फ... साली..." शमशेर बड़बड़ाया।
"साला रमेश ऐसा नसीब पा कर भी बहार मुँह मारता रहा... शमशेर मन ही मन बड़बड़या,


शमशेर की आँखों के सामने कामिनी की वह विशाल, गोरी गांड किसी जन्नत के दरवाज़े की तरह खुली हुई थी।20220105-171037
ट्यूबलाइट की रौशनी में वह तंग, सिकुड़ता हुआ और गुलाबी छेद (Anus) उसे चुम्बन के लिए बुला रहा था।
वह नज़ारा इतना मादक था कि शमशेर का सारा पुलिसिया संयम, सारी सभ्यता धरी की धरी रह गई।
उसे अब लंड डालने की जल्दी नहीं थी... उसे उस "वर्जित फल" को चखना था।
शमशेर ने आव देखा न ताव।
उसने अपने दोनों मज़बूत हाथों से कामिनी के गांड के दोनों पाटों (Butt Cheeks) को पकड़कर और कसकर चौड़ा कर दिया।
और अगले ही पल...
उसने अपना पूरा चेहरा कामिनी की उस गहरी, महकती हुई दरार में दे मारा।km16729867
"चटाक...!!"
उसके खुरदरे गाल और दाढ़ी कामिनी के मुलायम कूल्हों से टकराए।
और शमशेर की मोटी, चौड़ी और खुरदरी जीभ सीधे निशाने पर लगी—कामिनी के गांड के छेद पर।

"आअह्ह्ह.... आउच.... उउउफ्फ्फ्फ़...!!"
कामिनी के मुंह से एक बेकाबू चीख निकल गई।
उसका पूरा शरीर बिजली का झटका खाकर कांप उठा (Convulsed)।
वह बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठी में भींचकर ऐंठ गई।
यह स्पर्श... यह हमला... उसने अपनी ज़िंदगी में, अपने सपनों में भी नहीं सोचा था।
शमशेर की जीभ गरम लोहे की तरह थी, लेकिन गीली और रसीली।
शमशेर ने अपनी जीभ की नोक को सुई की तरह कड़ा किया और उसे कामिनी के तंग छेद (Sphincter) पर गोल-गोल फिराने लगा।

"स्स्स्लर्प... लप... लप... लप..."
कमरे में चाटने की गीली और गंदी आवाज़ें गूंजने लगीं, जो रमेश के खर्राटों को भी दबा रही थीं।
कामिनी का डर, उसकी हया, उसकी कुलीनता... सब इस एक स्पर्श के साथ हवा हो गए।
उसका जिस्म हवस की आग में दहक उठा।
यह मज़ा योनि के मज़े से बिल्कुल अलग था। यह गहरा था।

कामिनी को महसूस हुआ कि शमशेर की जीभ सिर्फ़ उसकी चमड़ी को नहीं चाट रही।
जैसे-जैसे शमशेर अपनी थूक से उस सूखे छेद को गीला कर रहा था और अपनी जीभ को अंदर धकेलने की कोशिश कर रहा था...
कामिनी को लगा जैसे गांड के उस छेद से होती हुई कोई बारीक नस (Nerve) सीधे उसके दिल से जुडी है।
शमशेर का हर एक 'चाट'... उसके दिल को अंदर से गुदगुदा रही थी, झिंझोड़ रहा थी.

"उफ्फ्फ्फ... शमशेर... आह्ह्ह्ह... यह क्या... उईईई माँ..."
कामिनी का सिर तकिये में धंस गया।
वह किसी मादा भेड़िया की तरह हुंकार उठी।
उसकी पीठ धनुष की तरह तन गई और अनजाने में उसने अपनी गांड को और पीछे धकेल दिया—सीधे शमशेर के मुंह पर।
यह एक मूक सहमति थी— "और चाटो... और अंदर तक..."
शमशेर समझ गया कि नशा चढ़ गया है।
उसने कामिनी की जांघों के बीच से बहते हुए पानी (Vaginal Juice) को अपनी उंगलियों पर लिया और उसे कामिनी के गांड के छेद पर लगा दिया।

और फिर उसने अपनी जीभ को चपटा करके उस पूरे इलाके को एक आइसक्रीम की तरह चाटना शुरू किया।
वह अपनी नाक को कामिनी के कूल्हों के बीच रगड़ रहा था, उसकी कस्तूरी (Musk) जैसी गंध को सूंघ रहा था।
कामिनी की मनोदशा अब किसी जानवर जैसी हो गई थी।

उसे अब यह नहीं याद था कि वह किसकी बीवी है, या सामने कौन है।
उसे बस वह "गीलापन" और वह "गरमाहट" चाहिए थी।
उसकी गांड का छेद, जो पहले डर से बंद था, अब मज़े में ढीला पड़ने लगा था... शमशेर के स्वागत के लिए खुलने लगा था।
शमशेर ने अपना मुंह हटाया, उसकी दाढ़ी कामिनी के रसों से सनी हुई थी।
उसने कामिनी की कांपती हुई गांड पर एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा।
"चटाक!!"
"साली... स्वाद आ गया..." शमशेर गुर्राया।
" अब हुई ना तैयार तेरी गुफा.."

शमशेर अब रुकने वाला नहीं था। कामिनी की गांड चाटने के बाद उस पर हवस का नशा पूरी तरह हावी हो चुका था।
उसने एक हाथ से अपनी बेल्ट का बक्कल पहले ही खोल रखा था।
अब उसने एक ही झटके में अपनी खाकी पैंट और अंडरवियर को घुटनों से नीचे सरका दिया।
पैंट के नीचे गिरते ही उसका विशाल, काला और नसों भरा लंड पूरी तरह आज़ाद हो गया।

वह हवा में ऐसे डोल रहा था जैसे कोई भूखा और गुस्से में भरा कोबरा (सांप) अपना फन फैलाए शिकार ढूंढ रहा हो।
वह 'सांप' फनफना रहा था, उसका लाल टोप (Suapada) सूजा हुआ था और वह अपना बिल (कामिनी की गांड) तलाश रहा था।
शमशेर ने कामिनी की कमर को अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया।
उसने अपने उस बेचैन सांप को दिशा दिखाई।
शमशेर ने अपने लंड को मुट्ठी में भरा और उसे कामिनी की गीली और खुली हुई गांड की दरार पर रख दिया।
उसने लंड को ऊपर-नीचे रगड़ना शुरू किया।
"स्लप... स्लप..."
शमशेर का गरम और सख्त लंड, कामिनी की मुलायम और थूक से गीली गांड के छेद पर घिसने लगा।14399842
कामिनी उस झुलसा देने वाली गर्मी से सिहर उठी।
उसे पता चल गया कि अब 'मौत या मजा दरवाज़े पर खड़ा है।
उसमें अब विरोध करने की न तो हिम्मत बची थी, और सच कहें तो... न ही इच्छा।
उसका शरीर उस कठोर दंड को पाने के लिए तैयार हो गया।
सामने बिस्तर पर रमेश बेहोश पड़ा था।
कामिनी ने झट से रमेश की शर्ट का कॉलर अपनी मुट्ठी में भरा और उसे अपने मुंह में ठूंस लिया।
उसने अपने जबड़े भींच लिए, ताकि उसकी चीखें बाहर न जा सकें।

उसने अपनी गांड को हल्का सा पीछे धकेला, अनजाने में ही शमशेर को इशारा कर दिया।
उसकी गांड का वह छोटा सा, गुलाबी छेद बाहर की तरफ (Prolapse) खुलने लगा, जैसे कह रहा हो— "आओ, मुझे भर दो।"
शमशेर ने अब और इंतज़ार नहीं किया।
उसने अपने लंड के विशाल, मशरूम जैसे टोपे (Glans) को कामिनी की गांड के ठीक मुहाने पर सेट किया।
वह छेद बहुत छोटा था, और टोप बहुत बड़ा।
शमशेर ने कामिनी की कमर को कसकर पकड़ा और अपनी कमर को आगे की तरफ धकेला।
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एक धीमा लेकिन ताकतवर दबाव।
कामिनी की गांड की मांसपेशियां (Sphincter) खिंचने लगीं।
उसकी आँखें चौड़ी हो गईं, पुतलियां फैल गईं। उसने रमेश की शर्ट को दांतों तले दबा लिया।
"तड़ड़ड़......"
गांड की चमड़ी तनने लगी। लंड का मोटा टोप उस तंग रास्ते को जबरदस्ती चौड़ा कर रहा था।
वह एक टाइट रबर रिंग को फाड़कर अंदर घुसने जैसा था।unnamed
"खचाक.....!!"
एक गीली और भारी आवाज़ के साथ शमशेर ने एक ज़ोरदार धक्का मारा।
मेहनत रंग लाई।
शमशेर के लंड का वह मोटा, लाल और विशाल टोप कामिनी की गांड के तंग दरवाज़े को तोड़ता हुआ अंदर घुस गया।
"आआआआआहहहहह...... उउउउफ्फ्फ्फ़.... म्म्म्म्म्प्पप्प.....!!!"
कामिनी की चित्कार निकल गई।
उसे लगा जैसे किसी ने गरम लोहे की कील उसकी गांड में ठोक दी हो।
उसका सिर झटके से ऊपर उठा, नसे तन गईं।
लेकिन रमेश की शर्ट ने उसकी उस गगनभेदी चीख को घोंट दिया।
और ठीक उसी पल...
जैसे ही वह विशाल लंड गांड के अंदर घुसा और उसने अंदर के अंगों (Bladder/G-Spot) पर ज़बरदस्त दबाव बनाया...
कामिनी का शरीर अपना नियंत्रण खो बैठा।
उसकी चुत, जो पहले से ही गीली थी, लंड के इस अचानक हमले को बर्दाश्त नहीं कर पाई।
"सर्ररररर...... पिच....पाचककक ससससररर......!!"
कामिनी की चुत से पेशाब और उत्तेजना के पानी की एक तेज़ धार (Squirt) फव्वारे की तरह छूट गई।
वह धार सीधे बिस्तर पर गिरी, बिस्तर की चादर गीली हो गई।

ऐसा लगा जैसे कामिनी के शरीर ने शमशेर के लंड के लिए जगह खाली की हो।
वह नज़ारा अद्भुत था।
पीछे एक मर्द उसकी गांड मार रहा था, और आगे से वह औरत झड़ (Squirt) रही थी।
शमशेर ने उस गीलेपन को देखा और पागल हो गया।
"साली... मूत दिया तूने?" शमशेर हांफते हुए हंसा। "ले अब पूरा ले..."
और उसने अपना बाकी का 8 इंच का तना भी अंदर उतारना शुरू कर दिया।

शमशेर का विशाल लंड का 'सुपाड़ा' (Topa) कामिनी की गांड के तंग दरवाज़े को तोड़कर अंदर घुस चुका था।
शुरुआत में तो लगा जैसे कामिनी की गांड फट गई हो, लेकिन जैसे ही शमशेर ने रुकने के बजाय धीरे-धीरे कमर चलानी शुरू की, मंज़र बदलने लगा।
"स्लप... चप... स्लप..."
गीली थूक और कामिनी के रसों की वजह से लंड चिकना होकर अंदर-बाहर होने लगा।
शमशेर ने बहुत सधे हुए अंदाज़ में छोटे-छोटे धक्के मारने शुरू किए।
वह अपने लंड को आधा बाहर खींचता, और फिर धीरे से वापस अंदर ठेल देता।
इस रगड़ ने कामिनी के अंदर एक नया ही तूफ़ान खड़ा कर दिया।
वह गांड, जो कुछ पलों पहले दर्द से चीख रही थी, अब उस 'भराव' (Fullness) को महसूस करके पागल होने लगी।
कामिनी को महसूस हुआ कि उसकी गांड की मांसपेशियां (Sphincter) शमशेर के लंड को किसी रबर बैंड की तरह जकड़ रही हैं, उसे चूम रही हैं।

दर्द पल भर में ही उत्तेजना में तब्दील होने लगा।
उसे अपनी नाभि के नीचे, पेट की गहराई में एक मीठा-मीठा दर्द और भारीपन महसूस हुआ।
यह चुत के मज़े से ज्यादा गहरा और नशीला था।
कामिनी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि गांड मरवाने में भी इतना मज़ा है। वह उस 'भरने' के अहसास की गुलाम हो गई।
उसने रमेश की शर्ट को मुंह से थूक दिया और दबी हुई आवाज़ में सिसकी—
"आह्ह्ह... शमशेर... और... और अंदर..."
उसने अपनी गांड को पीछे की तरफ धकेला।
वह चाहती थी कि वह मोटा सांप उसकी आंतों तक घुस जाए। वह अब और लंड मांग रही थी।
शमशेर ने यह इशारा समझ लिया।
"साली... स्वाद आ गया तुझे भी?" शमशेर हांफते हुए हंसा।
उसने कामिनी की कमर को कसकर पकड़ा और मौका देखकर एक ज़ोरदार धक्का मारा।
"धप्प...!!"
शमशेर का लंड, जो अब तक सिर्फ़ सुपाड़ा अंदर डाले हुए था, अब आधा (Half Shaft) अंदर चला गया।
कामिनी की आँखें पलट गईं। उसे लगा वह जन्नत में है।


वे दोनों अपनी लय (Rhythm) पकड़ने ही वाले थे।
कामिनी और लंड लेने के लिए पीछे धकेल रही थी, और शमशेर पूरा अंदर डालने के लिए जोर लगा रहा था।
तभी...
अचानक रात के सन्नाटे को चीरती हुई एक तेज़ और डरावनी आवाज़ बेडरूम में गूंज उठी।
"वी... वू... वी... वू... वी... वू...!!!!"
(Police Siren Wailing Loudly)

आवाज़ इतनी तेज़ और नज़दीक थी कि लगा पुलिस की जीप सीधे बेडरूम के अंदर घुस आई है।
और आवाज़ के साथ ही...
बेडरूम की खिड़की के पर्दे पर लाल और नीली रौशनी (Red & Blue Lights) चमकने लगी।
पर्दे से छनकर आती वह घूमती हुई रौशनी पूरे कमरे में डिस्को लाइट की तरह नाचने लगी—कभी कामिनी की नंगी पीठ पर लाल, तो कभी शमशेर के चेहरे पर नीला।
कामिनी और शमशेर बुरी तरह डर गए।
उनका नशा एक सेकंड में हिरन हो गया।
कामिनी, जो अभी मज़े में झूम रही थी, अब खौफ से कांप उठी।
"हय राम! ये... ये क्या हुआ? इतनी रात को पुलिस?" कामिनी बड़बड़ाई।
वह किसी खूंटे से बंधे जानवर की तरह छटपटाने लगी। उसे लगा अब सब ख़त्म। इज़्ज़त, घर, सब कुछ।

लेकिन असली मुसीबत तो अब शुरू हुई।
पुलिस के सायरन की आवाज़ सुनकर शमशेर का, जो एक पुलिस वाला ही था, डर के मारे बुरा हाल हो गया।
डर का सीधा असर उसके लंड पर पड़ा।
उसका वह लोहे जैसा खड़ा लंड, जो कामिनी की गांड में आधा घुसा हुआ था, अचानक सिकुड़ने लगा। वह ढीला पड़ गया।
शमशेर ने हड़बड़ाहट में अपना लंड बाहर खींचना चाहा।
लेकिन यहाँ फिजिक्स ने खेल कर दिया।
कामिनी भी डरी हुई थी। डर के कारण उसकी गांड की मांसपेशियां (Sphincter) बुरी तरह सिकुड़ गईं।

उसकी तंग गांड ने शमशेर के आधे-अधूरे और अब ढीले पड़ते हुए लंड पर एक वैक्यूम बना दिया।

शमशेर अपना लंड बहार खींच रहा था, लेकिन लंड बाहर नहीं आ रहा था।
उसका सुपाड़ा (Topa) अंदर बुरी तरह फंस (Stuck) गया था।
"अरे... अरे... छोड़ इसे..." शमशेर फुसफुसाया, पसीने से तर-बतर होकर।
"आआआआह्हः..... बहार निकालो इसे... हाय माँ..." कामिनी सिसक उठी।
उसे ऐसा लग रहा था जैसे शमशेर लंड नहीं, उसकी आंतें खींच रहा है।23089586

शमशेर ने एक हाथ कामिनी की कमर पर रखा और दूसरे हाथ से अपनी जांघ पर जोर दिया।
उसने एक झटका मारा।
"इइइइ... पप्पाप्प... पुककक...!!" (PLUCK!)
एक गीली और अजीब सी आवाज़ आई, जैसे किसी ने शैंपेन की बोतल का कॉर्क (Cork) खोला हो, या कीचड़ में फंसा पैर बाहर निकाला हो।

शमशेर का लंड झटके से बाहर निकल आया।
उसका सुपाड़ा लाल था और उस पर कामिनी की गांड की गीलापन लगा हुआ था।
कामिनी को ऐसा लगा जैसे उसकी गांड का छेद बाहर की तरफ पलट गया हो।
उसे महसूस हुआ कि उसका दिल और कलेजा उस रास्ते से बाहर खिंच आया है।
उसकी गांड का छेद अब खुला (Gaping) रह गया था, जो हवा में "धक्-धक्" कर रहा था।
दर्द और खिंचाव ने उसकी आँखों में आंसू ला दिए।

लंड के निकलते ही शमशेर तुरंत पीछे हटा।
उसने आव देखा न ताव, अपनी खाकी पैंट और अंडरवियर को जल्दी-जल्दी ऊपर चढ़ाया।
उसकी हालत पतली थी। उसका लंड अब पूरी तरह सिकुड़कर केंचुआ बन गया था।

उसने बेल्ट लगाई भी नहीं, बस हाथ में पकड़ ली।
"मै... मैं देखता हूँ बाहर क्या है..." शमशेर ने हकलाते हुए कहा। "शायद रेड है... तुम... तुम जल्दी से कपड़े पहन लो।"
शमशेर ने रमेश की तरफ इशारा किया।
"और इस चूतिये को... रमेश को जगाओ! जल्दी!"
कामिनी के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं।
वह नंगी थी, पसीने से लथपथ थी, उसकी गांड और योनि से पानी बह रहा था।
बाहर लाल-नीली बत्ती चमक रही थी।
उसने कांपते हाथों से अपनी साड़ी और पेटीकोट को उठाया जो ज़मीन पर पड़े थे।
उसने उन्हें लपेटा नहीं, बस अपने आगे पकड़ लिया।
वह रमेश के पास गई और उसे झिंझोड़ने लगी।
"उठो... उठो रमेश... प्लीज उठो..." कामिनी की आवाज़ में रुलाई थी।
"देखो बाहर पुलिस आई है... उठो ना!"
रमेश नशे में "हूं... हां..." कर रहा था, उसे खबर ही नहीं थी कि उसकी बीवी की गांड अभी-अभी मारी गई है और घर के बाहर पुलिस खड़ी है।
तभी बाहर से मेगाफोन (Loudspeaker) पर आवाज़ आई—
"बंगला नंबर 69! पुलिस ने घर को चारों तरफ से घेर लिया है। जो भी अंदर है, हाथ ऊपर करके बाहर आ जाओ!"
आवाज़ किसी और की नहीं, कमिश्नर विक्रम सिंह की थी।
शमशेर का खून जम गया।
(क्रमशः)

Bahut hi gazab ki update he Lord haram Bro

Ek din me dusri baar kamini ki pyas bujhte bujhte reh gayi

Shamsher, Ramesh aur Kadir ki to gaand lagne wali he

Keep rocking Bro
 

Lord haram

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मेरी माँ कामिनी - भाग 35




रात के 3 बज रहे थे
बेडरूम में अब अजीब सी शांति थी, जिसे सिर्फ़ रमेश के भारी खर्राटों और रघु की दबी हुई कराहों ने तोड़ा हुआ था।
बंटी जा चुका था।
कामिनी बेड के किनारे बैठी थी। उसके हाथ में आयोडीन (दवा) की रुई थी।
वह रघु के सूजे हुए गालों और फटे हुए होंठों पर दवा लगा रही थी।
"सीइइइ... आह्ह्ह... मैडम..." रघु दर्द से कुलबुला रहा था।
वह आधे होश में था, आधे नशे में। उसे पता भी नहीं था कि शमशेर की मार के बाद अब उसे कौन सा 'मरहम' मिलने वाला है।
कामिनी दवा लगा रही थी, लेकिन उसका दिमाग कहीं और था।
उसकी चुत अधूरी प्यास से जूझ रही थी, इतनी मुसीबत के बावजूद उसे अपनी जांघो के बीच गिलापन महसूस हो रहा था, शमशेर का अधूरा लंड और फिर पुलिस का डर... इस सबने उसकी अधूरी प्यास को एक जुनून बना दिया था।

उसे मुक्ति चाहिए थी। उसे शांति चाहिए थी।
और यह शांति अब सिर्फ़ एक मर्द ही दे सकता था। वही जिसने हमेशा कामिनी की मदद की, फिलहाल वो कामिनी के सामने खुद मदद के लिए मोहताज़ था.

दवा लगाते-लगाते कामिनी की नज़र रघु के पजामे पर गई।
मैला-कुचैला, सस्ता सा पजामा।
लेकिन उस पजामे के बीचों-बीच... एक तंबू तना हुआ था।
रघु भले ही मार खाकर अधमरा था, लेकिन कामिनी के यौवन की महक, उसके स्तनों का दृश्य (जो झुकने पर दिख रहे थे) और उसके कोमल स्पर्श ने रघु की मर्दानगी को जगा दिया था।
उसका लंड पजामे के अंदर सिर उठाए खड़ा था, जैसे कह रहा हो— "मालिक पिट गया तो क्या हुआ, मैं तो ज़िंदा हूँ।"
कामिनी की सांसें अटक गईं।
उसकी उंगलियां कांपने लगीं। दवा की रुई उसके हाथ से छूटकर गिर गई।
अब और नहीं... अब वह एक पल भी इंतज़ार नहीं कर सकती थी।
उसने आव देखा न ताव।
उसने अपने दोनों हाथों से रघु के पजामे का नाड़ा पकड़ा और उसे एक झटके में खींच दिया।(m ldpwiqacxt E Ai)(mh Mm VTWa9itj4L7Aut)34863672b

"सर्ररर......"
रघु का काला, झांटों से भरा और नसों वाला देसी लंड बाहर उछल आया।
वह शमशेर जैसा विशाल था लेकिन कादर जैसा साफ़-सुथरा नहीं था।
वह एक मज़दूर का लंड था।
काला, टेढ़ा, और जिसके टोपे (Supada) पर एक अजीब सी लस्सेदार गंदगी (Smegma) और पेशाब की बूंदें जमा थीं।
उससे कच्ची शराब, पसीने और मूत्र की एक तीखी गंध आ रही थी।
लेकिन इस वक़्त कामिनी के लिए यह गंदगी ही सबसे बड़ा इत्र (Perfume) थी।
उस लंड को देखते ही कामिनी की लार टपक पड़ी।
रघु का लंड कामिनी की नज़रों का स्पर्श पाकर ही झटके मारने लगा।
"फच्... फच्..."
कामिनी से अब रहा नहीं गया।
वह किसी प्यासे जानवर की तरह उस पर टूट पड़ी।
उसने अपनी गर्दन झुकाई शनिफ्फफ्फ्फ़.... आअहम्म.. ससससस्स्स.... संउफ्फ्फ्फ़... कामिनी ने एक जबरजस्त सांस अंदर खिंच ली, एक कैसेली गंदी पेशाब से भारी खुसबू उसके जहन मे उतरती चली गई, उसके निप्पल टाइट होते गए,
उसने अपना पूरा मुँह खोल दिया, लाल होंठ खुलते गए और रघु के उस खड़े लंड को जड़ तक अपने मुंह में भर लिया।
"गप्पप....गुलप.... गप.....!!"
कामिनी का मुंह रघु के गरम और सख्त मांस से भर गया।

जैसे ही वह लंड उसकी जुबान से टकराया, एक देसी, कच्चा, गंदा और कसैला स्वाद उसके मुंह में घुल गया।
यह स्वाद बासी पसीने, सस्ती शराब और मर्द की हवस का था।

आम औरत होती तो अभी उल्टी कर देती, लेकिन ये कामिनी थी, हवास के ज्वालामुखी पर बैठी हुई एक प्यासी औरत,
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उसे चूसना शुरू किया।
"स्स्स्लर्प... चप्प... चप्प... गलोक..."
उसके गाल पिचक गए। वह अपनी जीभ को लंड के नीचे की नस और उसके गंदे टोपे पर फिराने लगी।20240514-142140

वह रघु के गंदे लंड को किसी कुतिया की तरह चाट चाट के साफ कर रही थी, उसे पी रही थी।
रघु, जो अभी दर्द में कराह रहा था, इस अचानक मिले स्वर्ग-सुख से हक्का-बक्का रह गया।
उसे लगा वह सपना देख रहा है।

उसकी मालकिन... बड़े साहब की बीवी... उसके लंड को किसी लॉलीपॉप की तरह चूस रही है।
उसका दर्द, उसकी मार... सब हवा हो गया।
"आह्ह्ह... उफ्फ्फ्फ... मैडम ... हाय राम..."
उसकी दर्द भरी कराहें अब कामुक सिसकारियों में बदलने लगीं।

"मा... मारे गए... उईईई... क्या सुख है..."
कामिनी पागलों की तरह अपना सिर ऊपर-नीचे कर रही थी। उसकी चुत कांप रही थी, होंठो के किनारे से लार चु रही थी.

originalउसके बाल रघु के पेट और जांघों पर बिखर गए थे।
उसने रघु के अंडकोषों (Balls) को अपने हाथ में पकड़ लिया और उन्हें जोर से दबाया, जबकि उसका मुंह लंड को गले (Throat) तक उतार रहा था।

हर बार जब लंड उसके गले में टकराता, कामिनी को उबकाई आती, लेकिन वह रुकती नहीं।
वह उस कसैलेपन को, उस गंदगी को अपने अंदर उतार लेना चाहती थी।
बगल में रमेश खर्राटे ले रहा था।
और यहाँ उसकी पत्नी, उसके नौकर की गंदगी को अपने मुंह से साफ़ कर रही थी।
कामिनी का यह रूप "चरम गिरावट" और "चरम सुख" का अद्भुत संगम था।

रघु के लंड को अपने मुंह की लार और थूक से लथपथ करने के बाद कामिनी का सब्र जवाब दे गया।
उसने रघु के उस काले, खड़े और चिपचिपे लंड को एक आखिरी बार अपनी जीप से चाटा और फिर झटके से खड़ी हो गई।
उसका मुंह गीला था, होंठ सूजे हुए थे, और आँखों में वहशीपन तैर रहा था।
अब उसे और कोई रुकावट नहीं चाहिए थी। न कपड़ों की, न शर्म की।
कामिनी ने आव देखा न ताव।
उसने अपनी साड़ी का पल्लू, जो पहले से ही गिर रहा था, उसे पूरी तरह खींचकर ज़मीन पर फेंक दिया।
उसके हाथ बिजली की रफ़्तार से चले।
उसने ब्लाउज़ के बचे-खुचे हुक नोच डाले। ब्लाउज़ उतरकर दूर जा गिरा।

फिर पेटीकोट की डोरी खोली और उसे अपने पैरों से ठोकर मारकर अलग कर दिया।

कमरे की ट्यूबलाइट की रौशनी में कामिनी बिल्कुल नंगी खड़ी थी।
उसका दूधिया जिस्म (Milky White Body) पसीने और उत्तेजना की वजह से किसी संगमरमर की मूरत की तरह चमक रहा था।
उसके विशाल स्तन, जो अब आज़ाद थे, उसकी भारी सांसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। उनके काले और खड़े निप्पल सामने रघु को घूर रहे थे।
उसकी गहरी नाभि, उसकी चौड़ी कमर, और उसकी भरी हुई जांघें...
और उन जांघों के बीच... उसका कामुक त्रिकोण जो की बिल्कुल बाल रहित था, अपने पुरे शबाब पर था।

उसकी गुलाबी चुत से निकलता पानी उसकी जांघों पर चांदी की लकीर की तरह बह रहा था।
रघु ने अपनी सूजी हुई आँखें खोलीं।
दर्द और नशे के धुंधलके में उसे लगा जैसे वह मर चुका है और सामने स्वर्ग की अप्सरा खड़ी है।

उसे शमशेर की मार का ऐसा कामुक ईनाम सात जन्मों में नहीं मिल सकता था।
कामिनी ने रघु को घूरते हुए देखा, लेकिन शर्माने के बजाय उसने अपनी जांघें थोड़ी और चौड़ी कर दीं।
"देख ले..." कामिनी मन ही मन बोली। "जी भर के देख ले...तेरी ही है।"
कामिनी बिस्तर पर चढ़ गई।
गद्दे पर उसके घुटने टिके और वह रघु के ऊपर आ गई।
उसने अपने दोनों पैर रघु की कमर के दोनों तरफ (Straddle) जमा दिए।

अब वह रघु के ऊपर विराजमान थी, एक देवी की तरह, लेकिन हवस की देवी।
कामिनी ने नीचे झांका।

रघु का काला, नसों वाला और थूक से चमकता हुआ लंड सीधा उसकी गीली चुत की तरफ तना हुआ था।
वह भाला अपने लक्ष्य को भेदने के लिए तैयार था।
कामिनी की योनि, जो कादर और शमशेर की वजह से अधूरी रह गई थी, उस नज़ारे को देखकर फड़क उठी।

"अब और नहीं..." कामिनी बड़बड़ाई। "अब बर्दाश्त करना मुश्किल है।"
कामिनी ने अपने घुटनों को मोड़ा।
वह धीरे-धीरे, बहुत ही सधे हुए अंदाज़ में नीचे बैठने लगी।
उसने अपने एक हाथ से रघु के लंड को पकड़ा और उसके मोटे टोपे (Head) को अपनी योनि के गीले और खुले हुए मुहाने (Opening) पर सेट किया।gifcandy ass 55
"स्लप..."
गीले मांस के टकराने की आवाज़ आई।
रघु का लंड कामिनी की चुत के बाहरी होठों (Labia) से रगड़ खाया।
कामिनी की आत्मा सिसकार उठी।
वह स्पर्श ही इतना बिजलीदार था कि कामिनी का पूरा बदन कांप गया।
"आह्ह्ह... माँ..."
कामिनी ने अपनी कमर को और नीचे किया।
रघु का गंदा और देसी टोपा कामिनी की मखमली गुफा में रास्ता बनाने लगा।

"पछह... पचक...!!"
योनि इतनी गीली थी कि लंड मक्खन की तरह फिसलने लगा।
कामिनी ने अपनी सांस रोकी और अपना पूरा वजन छोड़ दिया।
"आआहहब... मा.... इसससससस......"
कामिनी चित्कार उठी।
जैसे किसी ने गर्म तवे पर पानी के छींटे मारे हों— "छनन्नnn..." वैसी ही आग उसके जिस्म में लगी।
रघु का मोटा लंड उसकी योनि की दीवारों को चीरता हुआ, फैलाता हुआ अंदर समाता चला गया।
वह कसाव, वह फैलाव (Stretch)... यही तो वह चाहती थी।
कामिनी को महसूस हुआ कि रघु का लंड उसकी बच्चेदानी (Cervix) तक दस्तक दे रहा है।
वह पूरी तरह उसके ऊपर बैठ गई थी।
रघु का पूरा जड़ तक (Balls deep) लंड कामिनी के अंदर गायब हो चुका था।

दोनों के पेट और पेडू (Pelvis) आपस में टकरा गए।
"धप्प..."
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपना सिर पीछे की तरफ फेंक दिया।
उसके खुले बाल हवा में लहराए।
"उफ्फ्फ्फ... रघूऊऊऊ..."
यह सिर्फ़ सेक्स नहीं था। यह अधिकार था।
आज कामिनी चुद नहीं रही थी, वह एक मर्द को चोद रही थी।
उसने अपनी हवास को आज सारे आम उजागर कर दिया था।

उसने रघु की छाती पर अपने दोनों हाथ जमाए।
उसकी योनि ने रघु के लंड को अंदर जकड़ लिया (Clench किया)।
"अब देख तेरा क्या करती हूँ..."
कामिनी ने अपनी कमर को हिलाना शुरू किया।
धीरे-धीरे... गोल-गोल... जैसे वह उस लंड को अपने अंदर मथ (Churn) रही हो।

कामिनी रघु के ऊपर पूरी तरह जम चुकी थी।21125338
रघु का काला, देसी और सख्त लंड उसकी योनि की गहराइयों में जड़ तक (Root deep) समाया हुआ था।
कामिनी को महसूस हो रहा था कि रघु का वह 'हथियार' उसकी बच्चेदानी के मुंह को चूम रहा है।

यह अहसास, यह भराव (Fullness) ही तो वह चाहती थी, जिसके लिए वह दिन भर से तड़प रही थी।
शुरुआत में कामिनी ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की।
उसने अपनी आँखें बंद कीं और एक गहरी सांस ली।
"उफ्फ्फ्फ... रघूऊऊ..."
उसने अपनी कमर को बहुत ही धीमे-धीमे, गोल-गोल (Circular Motion) घुमाना शुरू किया।

जैसे कोई पुराने ज़माने की चक्की पीस रहा हो।
उसकी योनि की दीवारें, जो लंड के स्वागत में गीली और सूजी हुई थीं, रघु के लंड के चारों तरफ लिपट गईं।
कामिनी अपनी अंदरूनी मांसपेशियों को सिकोड़ रही थी और छोड़ रही थी.

वह रघु के लंड की नसों को अपने अंदर निचोड़ रही थी, उसे मसाज दे रही थी।
"स्लप... चप... स्क्विश..."
कमरे में सिर्फ़ गीले मांस के रगड़ने की आवाज़ें गूंज रही थीं।
रघु नशे मे कभी आंखे खोलता तो कभी बंद करता, वो स्वर्ग मे था आज.
उसका लंड कामिनी की गीली चुत पा कर ओर भी फल फूल रहा था.

कामिनी का दूधिया बदन पसीने से नहाया हुआ था।
ट्यूबलाइट की रौशनी में उसकी पीठ, उसके कंधे और उसके स्तन तेल की तरह चमक रहे थे।
अब कामिनी ने रफ़्तार बदली।
उसने अपने दोनों हाथों को रघु की छाती पर जमाया, जहाँ बाल थे और पसीना था।

उसने अपने घुटनों पर जोर दिया और खुद को थोड़ा ऊपर उठाया।
रघु का लंड उसकी योनि से आधा बाहर आया...
और फिर कामिनी ने अपनी भारी कमर को धप्प से नीचे पटक दिया।Taught To Talk Dirty big ass Ava Addams GIFs
"पछहहहहक....पचक.... आआककक.....!!"
एक गूंजने वाली, गीली आवाज़ आई।
कामिनी की रसीली और भरी हुई जांघें रघु की जांघों से टकराईं।
"आह्ह्ह... मैडम... ये क्या कर रही है आप..." भारी नशे और दर्द मे भी रघु के मुंह से सिसकी निकल गई।
कामिनी ने उसे घूर कर देखा। उसकी आँखों में नशा था।
"चुप कर..." कामिनी फुसफुसाई।
"इलाज चल रहा है।" कामिनी खुद की बात पर ही मुस्कुरा दी, कितना बदल गई थी वो ग्रहणी.
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कामिनी अब सवारी के लेय में आ गई थी।
ऊपर... और नीचे... थप... थप... ठप ठप...
ऊपर... और नीचे... पच... ओच... फच... गच... फाचक..

जैसे-जैसे कामिनी की रफ़्तार बढ़ रही थी, नज़ारा और भी मादक होता जा रहा था।
कामिनी के विशाल और भारी स्तन हवा में आज़ाद होकर उछल रहे थे।25970699
जब वह ऊपर उठती, तो स्तन तन जाते...
और जब वह धप्प से नीचे बैठती, तो वे स्तन धक्के के साथ हिलते और झूल जाते।
उनका वह "बाउंस" रघु को पागल कर रहा था।

काले, खड़े निप्पल हवा को चीर रहे थे। कभी-कभी कामिनी के बाल उसके स्तनों पर गिरते और चिपक जाते।
कामिनी का चेहरा देखने लायक था।
उसने अपने निचले होंठ को दांतों तले दबा रखा था।
सिर पीछे की तरफ झुका हुआ था, गर्दन तनी हुई थी।
पसीने की एक बूंद उसकी गर्दन से लुढ़कती हुई, उसके स्तनों के बीच की घाटी (Cleavage) से होती हुई, सीधे उसके पेट पर जा गिरी।

वह आज चुद नहीं रही थी, वह सचमुच एक मर्द को चोद रही थी।
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वह अपनी मनमानियाँ कर रही थी।
हर बार जब वह नीचे बैठती, रघु का मोटा टोपा उसकी उस 'G-Spot' को रगड़ता, जिसे शमशेर अधूरा छोड़ गया था।

कामिनी को अपनी टांगों के बीच करंट महसूस हो रहा था।
उसकी योनि से पानी की बाढ़ आ गई थी।
वह पानी रघु के लंड को, उसके अंडकोषों को और कामिनी की जांघों को भिगो रहा था।

"पच... पच... पच... पच..."
यह आवाज़ अब तेज़ हो गई थी।
बगल में रमेश ने करवट ली।
"हहूं... उं..." रमेश ने नींद में कुछ बड़बड़ाया।
कामिनी का दिल एक पल के लिए थमा, उसकी रफ़्तार रुकी।
उसने डरते-डरते रमेश की तरफ देखा।
रमेश ने बस अपना हाथ हिलाया था, वह अभी भी गहरी नींद में था।
लेकिन इस डर ने कामिनी की उत्तेजना को और भड़का दिया।
'पति के बगल में... उसके नौकर के ऊपर चढ़कर...'
इस विचार ने कामिनी को पागल कर दिया।
उसने रघु की तरफ देखा और अपनी रफ़्तार दोगुनी कर दी।11765730
"ले... और ले..."
कामिनी अब पागलों की तरह उछल रही थी।
बिस्तर "चर्र-चर्र" कर रहा था।
कामिनी के स्तन बेतहाशा नाच रहे थे।
उसका योनि का मुख रघु के लंड को निगल रहा था और उगल रहा था।
"आह्ह्ह... रघू... मैं गई... मैं गई..."
कामिनी हांफने लगी।
उसे महसूस हुआ कि वह किनारे पर है।
उसने रघु के सीने को अपने नाखूनों से नोच लिया।
"भर दे मुझे... अपनी गंदगी से भर दे..."

कामिनी अब किसी घुड़सवार की तरह बेकाबू हो चुकी थी।
उसकी रफ़्तार अब तुफानी थी।
वह रघु के लंड पर सिर्फ़ बैठ नहीं रही थी, बल्कि उसे जड़ से उखाड़ने की कोशिश कर रही थी।
"धप्प... धप्प... धप्प..."
बिस्तर की स्प्रिंग और मांस के टकराने की आवाज़ें एक होकर गूंज रही थीं।

कामिनी की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा था।
उसकी बच्चेदानी (Cervix) पर रघु के मोटे टोपे की हर चोट, उसके दिमाग में धमाके कर रही थी।
"आह्ह्ह... और... और ज़ोर से..."
कामिनी ने अपने दांत किटकिटाए। उसने रघु के कंधों को अपने नाखूनों से बुरी तरह नोच लिया।
उसकी चुत के अंदर एक ज्वालामुखी फटने को तैयार था।

उसे अपनी नाभि के नीचे एक असहनीय दबाव महसूस हुआ—वही दबाव जो शमशेर ने अधूरा छोड़ दिया था, आज रघु उसे पूरा कर रहा था।
अचानक कामिनी का पूरा जिस्म अकड़ गया।
उसकी कमर हवा में ही थम गई।
उसने अपना सिर पीछे फेंका और मुंह खोल दिया।
उसकी योनि की मांसपेशियां (Vaginal Walls) रघु के लंड के इर्द-गिर्द किसी अजगर की तरह कसने लगीं।
इतना कसाव, इतनी जकड़न कि रघु को लगा उसका लंड अब कट जाएगा।
और फिर... विस्फोट हुआ।

"आआआआआहहहहह...... ईईईईईई......!!"
कामिनी एक लंबी, दर्दभरी और मदहोश कर देने वाली चीख के साथ चरम (Climax) पर पहुँच गई।
उसका शरीर कांपने लगा।
और उसी पल... उसके अंदर के दबाव ने अपना रास्ता बना लिया।
"सर्रररर...... पिच...... छनन्नन्न......!!"
कामिनी की योनि से पेशाब और उत्तेजना के पानी (Squirting) का एक तेज़ और गरम फव्वारा छूट गया।
वह धार इतनी तेज़ थी कि उसने रघु के पेट और छाती को भिगो दिया।
कामिनी लगातार झड़ रही थी।
उसका शरीर झटके खा रहा था, और हर झटके के साथ पानी की एक नई धार रघु के ऊपर गिर रही थी।
बिस्तर, रघु, और कामिनी की जांघें... सब जलमग्न हो गए।

इधर रघु, जो पहले से ही कामिनी की उस कातिलाना जकड़ (Grip) में फंसा हुआ था, कामिनी के इस "बाढ़" और कसाव को बर्दाश्त नहीं कर पाया।
कामिनी की योनि उसे चूस रही थी, निचोड़ रही थी।
रघु की आँखों के सामने तारे नाच गए।
"आआआआआह्ह्ह्ह्ह...... मालकिन्नन्न...... मर गया......!!!"
रघु के मुंह से भी एक गगनभेदी चीख निकल गई।
उसने अपनी कमर को ऊपर की तरफ झटका दिया और कामिनी के अंदर ही फट पड़ा।
उसका गाढ़ा, गरम और देसी वीर्य की पिचकारियां कामिनी की बच्चेदानी के मुंह पर छूटने लगीं।
एक... दो... तीन... लगातार धक्के।
रघु ने अपनी ज़िन्दगी का सारा निचोड़, अपनी सारी गर्मी कामिनी के अंदर भर दी।
कामिनी, जो अभी भी झड़ रही थी, उसने गरम लावा को अपने अंदर महसूस किया।

वह अहसास... वह भरने का सुकून...
कामिनी की टांगों में अब जान नहीं बची थी।
उसका पूरा शरीर पसीने और पानी से लथपथ होकर ढीला पड़ गया।
वह धीरे-धीरे, किसी कटी हुई पतंग की तरह, रघु के ऊपर ही ढेर हो गई।
उसका सिर रघु की गीली छाती पर टिक गया।
उसके बाल रघु के चेहरे पर बिखर गए।
कामिनी की दिन भर की तपस्या सफल हुई थी, आखिरकार कामदेव उसपर मेहरबान बुए, उसकी चुत ने हवास के लावे को बहार उगल ही दिया,
इफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... उईफ़्फ़्फ़... आअह्ह्ह... क्या सुकून था, अभी तक चुत मे जो जलता अंगारा फसा हुआ था वो पानी मे घुल के निकल ही गया.

दोनों के जिस्म एक-दूसरे से चिपके गए —पसीना, पेशाब, वीर्य और काम-रस सब एक साथ मिल गए थे।
कमरे में सिर्फ़ उन दोनों की हांफने की आवाज़ें थीं।
और बगल में...
रमेश ने एक लंबी सांस ली और करवट बदलकर दूसरी तरफ मुंह कर लिया, इस बात से पूरी तरह अनजान कि उसकी पत्नी ने अभी-अभी उसके बिस्तर पर क्या "तूफ़ान" मचाया है।
रघु और कामिनी की सांसे आपस मे मिलने लगी, कामिनी की आंखे थकान और वासना की अधिकता से बंद होने लगी, उसका सर रघु के सीने लार झुकता चला गया, दोनों नींद के आगोश मे समा गए थे.
लेकिन रघु का लंड अभी भी कमीनी की चुत मे धसा हुआ था.


(क्रमशः)
 

Ajju Landwalia

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मेरी माँ कामिनी - भाग 34


समय: रात के 2:05 बजे

पुलिस के सायरन की "वी-वू... वी-वू..." अब कान फाड़ रही थी।
शमशेर, जो अभी-अभी अपनी पैंट चढ़ाकर कामिनी के बेडरूम से भागा था, अब बगीचे के अंधेरे कोने में खड़ा था।
उसका दिल हथौड़े की तरह धड़क रहा था।
उसने कांपते हाथों से अपना फ़ोन निकाला और अपने जूनियर मोहन को मिलाया।

"हैलो! मोहन! मादरचोद क्या हो रहा है ये? मेरे इलाके में मेरी इज़ाज़त के बिना ये सायरन क्यों बज रहे हैं?"
शमशेर ने रौब झाड़ने की कोशिश की, लेकिन उसकी आवाज़ में डर था।
उधर से मोहन की हड़बड़ाई हुई आवाज़ आई, "सर! सर आप कहाँ हैं? हमें कमिश्नर साहब की तरफ से सख्त आदेश हैं। बंगला नंबर 69 पर रेड मारनी है। कादर खान और ड्रग्स की टिप मिली है।"

शमशेर का हलक सूख गया। ड्रग्स! कादर के बारे मे जानकारी कहाँ से लीक हुई.
मोहन ने आगे कहा, "सर, हम बंगले के गेट पर खड़े हैं। कमिश्नर साहब खुद पहुँच रहे हैं। अगर 5 मिनट में गेट नहीं खुला, तो हम तोड़कर घुस जाएंगे।"

शमशेर का पॉलिसीया शातिर दिमाग बिजली की तरह दौड़ा।
वह दौड़कर स्टोर रूम की तरफ गया।
"धड़ाम!"
उसने स्टोर रूम का दरवाज़ा लात मारकर खोला।
अंदर कादर खान हड़बड़ाकर उठ बैठा। सायरन की आवाज़ से उसकी नींद खुल गई थी, लेकिन पास में पड़ा रघु अभी भी नशे में मुर्दे की तरह सो रहा था।

"साब... पुलिस..आ गई क्या? ." कादर ने घबराकर पूछा।
"बैग कहाँ है..." शमशेर ने आस पास देखा, बैग लावारिस जमीनी पर पड़ा था, उसने बैग उठाकर कादर की छाती पर दे मारा।

"ये ले! इसे पकड़!" शमशेर फुसफुसाया, लेकिन उसकी आँखों में खौफ था।
"भागकर अंदर जा! कामिनी मैडम को दे! कहना शमशेर साहब ने भेजा है, इसे कहीं भी छुपा दें! जल्दी कर वरना सब मारे जाएंगे!"


शमशेर जानता था कामिनी से ज्यादा सवाल जवाब नहीं किया जायेगा, कुछ सोचने समझने का वक़्त मिल जायेगा।

कादर को खुद को कुछ समझ नहीं आ रहा था, उसकी जान हलक मे थी, वह नंगे पैर ही घर के पिछले दरवाज़े की तरफ भागा।

इधर बेडरूम में कामिनी अपनी साड़ी ठीक कर रही थी।
उसके हाथ कांप रहे थे।
उसकी गांड में अभी भी वह मीठा-मीठा दर्द और खिंचाव था। चलने में उसे दिक्कत हो रही थी, उसके पैर लड़खड़ा रहे थे।
उसके चेहरे पे जिस्मानी दर्द कम और अधूरापन ज्यादा दिख रहा था, बार बार झड़ने के करीब पहुँचती की कोई ना कोई मुसीबत आ ही जाती.
उसका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था.

"रमेश... उठो ना..." वह रमेश को झिंझोड़ रही थी।
तभी पीछे से कादर आंधी की तरह अंदर आया।
"मैडम... मैडम...!"
कामिनी चौंक गई।
कादर ने वह काला बैग कामिनी के हाथों में थमा दिया।
"साब ने भेजा है... शमशेर साब ने! बोले पुलिस आई है... इसे छुपा दो!"

कामिनी का दिमाग सुन्न हो गया। बैग भारी था।
उसे तुरंत समझ आ गया, पुलिस क्यों और किसलिए आई है।

"हाय राम..." कामिनी ने इधर-उधर देखा।
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, समझने का समय ही कहाँ था.
"इसे मुझे दो माँ " कामिनी ने सकपाकते हुए पीछे देखा, बंटी खड़ा था
उसने आगे बढ़ कर बैग कामिनी के हाथ से ले लिया,
"सब ठीक हो जायेगा " कामिनी अभी भी बद हवास थी.
सिर्फ बंटी को जाता देखती रही.
उसकी सांसे तेज़ चल रही थी.
"और मैडम मै....?" कादर के चेहरे पे डर, सवाल सब एक साथ था.
"त तत... तुम?" कामिनी ना चाहते हुए भी उसे बचा लेना चाहती थी, कादर का इस घर मे पकड़ा जाना उसके और रमेश के लिए शर्मनाक होता.
"यहाँ नीचे... जल्दी.... " कामिनी ने बेड के नीचे इशारा किया.
कादर को इशारा मिलने की देर थी की फुर्ती से किसी चूहें की तरह वो बेड के नीचे सरक गया.

इस उपक्रम मे कोई 5 मिनट गुज़र चुके थे। कामिनी ने खुद को नार्मल किया, एक बात रमेश को फिर से उठाने की कोशिश की, लेकिन रमेश नहीं उठाया.

"धाड़... धाड़.... धाड़..... बहार मैन गेट का दरवाजा पीटने की आवाज़ आने लगी.

"कौन है इतनी रात को?"
कामिनी हॉल से होती मुख्य दरवाज़े तक पहुंची।
उसने कांपते हाथों से चिटकनी खोली।
"चरररर......"
दरवाज़ा खुलते ही सामने का नज़ारा किसी फिल्म जैसा था।
चारों तरफ पुलिस थी, उनके पीछे गार्डन मे पुलिस की की गाड़ियाँ, लाल-नीली बत्तिया।
और उन सबके बीच... अपनी जीप से उतरता हुआ, वर्दी में तना हुआ कमिश्नर विक्रम सिंह।

विक्रम के बूटों की आवाज़ मार्बल के फर्श पर गूंजी।
"ठक... ठक... ठक..."
वह तेज़ कदमों से पोर्च में चढ़ा।
"माफ़ करना," विक्रम ने अपनी कड़क आवाज़ में कहा, बिना ऊपर देखे। "हमें पुख्ता खबर है कि यहाँ ड्रग्स है। आपके घर की तलाशी लेनी होगी।"
विक्रम अपनी धुन में था, उसका ध्यान अपने मिशन पर था।
लेकिन जैसे ही उसने अपनी नज़रें उठाईं...
"अ... अ... आप...?"20220201-175631
विक्रम के शब्द गले में ही फंस गए। उसका मुंह जाम हो गया।
उसके कदम वहीं रुक गए।
उसके सामने कामिनी खड़ी थी।
लेकिन यह वह कामिनी नहीं थी जिसे उसने कल शाम अपने घर पर देखा था,
यह एक 'टूटी हुई, बिखरी हुई और अधूरी वासना मे जलती हुई ' कामिनी थी।


उसका चेहरा पसीने से भीगा हुआ था, बाल बिखरे हुए थे और गालों पर उत्तेजना की लाली थी।
होंठ सूजकर मोटे और लाल हो गए थे, वे ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने उन्हें बेदर्दी से नोचा हो।

आँखों में नींद नहीं, बल्कि एक अजीब सा नशा और गुस्से का मिश्रण था।
उसकी साड़ी बेतरतीब लपेटी हुई थी। ब्लाउज़ के बटन शायद गलत लगे थे।

कामिनी उस वक़्त अपने कामुक हुस्न के चरम पर थी।
वह एक ' अधूरी' औरत लग रही थी, जिससे अभी-अभी किसी मर्द ने खेला हो।
विक्रम उसे एकटक देखता रह गया। उसे विश्वास नहीं हो रहा था।
"कामिनी जी...?" विक्रम के मुंह से अनजाने में उसका नाम निकल गया।
"ये... ये आपका घर है?"

विक्रम की आवाज़ में पुलिसिया रौब गायब हो गया था, उसकी जगह हैरानी और एक अजीब सी सहर (Fascination) ने ले ली थी।
कामिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ा, अपनी छाती को ढकने की नाकाम कोशिश की।


दरवाज़े पर खड़ी कामिनी का चेहरा तमतमा रहा था।
उसकी आँखों में जो लाल डोरे थे, वे अब नींद या नशे के नहीं, बल्कि खालिस गुस्से के थे।
उसके पीछे पुलिस की जीप की लाल-नीली बत्तियाँ चमक रही थीं, जो उसके पसीने से भीगे हुए चेहरे को और भी ज्यादा मादक और आकर्षक बना रही थीं।
विक्रम ने जैसे ही ड्रग्स की बात की, कामिनी के सब्र का बांध टूट गया।
उसके अंदर का लावा—जो कादर और शमशेर ने सुलगाया था, लेकिन बुझाया नहीं था—अब एक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा।

"ये क्या हरकत है कमिश्नर साहब?" कामिनी एकाएक विक्रम पर बरस पड़ी।
उसकी आवाज़ इतनी ऊंची और तीखी थी कि विक्रम के साथ खड़े दो हवलदार भी दो कदम पीछे हट गए।
"इतनी रात को... बिना बताए, आप शरीफों के घर का दरवाज़ा तोड़ रहे हैं?"
कामिनी एक कदम आगे बढ़ी। उसका सीना गुस्से से ऊपर-नीचे हो रहा था।
उसकी साड़ी का पल्लू फिर से हल्का सा सरक गया, लेकिन इस बार उसने उसे संभालने की ज़हमत नहीं उठाई।

"और कौनसी ड्रग? आपको क्या लगता है मैं यहाँ ड्रग बेचती हूँ? मेरा घर आपको अड्डा नज़र आता है?"
कामिनी किसी भूखी शेरनी की तरह दहाड़ रही थी।
उसका पूरा शरीर कांप रहा था। उसकी मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं।
पीछे खड़ा बंटी भी अपनी माँ का यह रूप देखकर एक पल के लिए सहम गया। उसने माँ को हमेशा दबी-कुचली, शांत देखा था। लेकिन आज... आज वह दुर्गा बनी खड़ी थी।
उसे अंदाज़ा नहीं था कि एक असंतुष्ट और उत्तेजित औरत का गुस्सा कितना खौफनाक हो सकता है।
सामने खड़ा कमिश्नर विक्रम सिंह, जिसे पूरा शहर ईमानदार और कड़क आदमी के रूप मे जानता था, आज एक औरत के सामने सकते में आ गया।

उसने मुजरिमों को रोते देखा था, लेकिन किसी औरत को अपनी आँखों में आँखें डालकर, इस तरह ललकारते हुए पहली बार देख रहा था।
और सच तो यह था...
कामिनी का यह बिखरा हुआ रूप—सूजे होंठ, अस्त-व्यस्त कपड़े, और आँखों में आग—विक्रम को बेइंतहा मोहक लग रहा था।
उसे लगा जैसे वह किसी 'फायर ब्रांड' को देख रहा है।
"म... म... माफ़ करना कामिनी जी..." विक्रम की जुबान लड़खड़ा गई।
वह शेर, जो अभी दहाड़ते हुए जीप से उतरा था, अब भीगी बिल्ली बन चुका था।
उसने अपनी कैप (Cap) को हल्का सा ठीक किया, जैसे अपनी घबराहट छुपा रहा हो।

"मुझे... मुझे सच में नहीं पता था कि यह आपका घर है," विक्रम ने अपनी आवाज़ को और नरम किया। उसकी नज़रों में अब रौब नहीं, शर्मिंदगी थी।
"क्या करूँ मैडम... ड्यूटी ही ऐसी है मेरी। गलत फहमी हो गई होगी।"
विक्रम सफाई देना चाह रहा था, लेकिन कामिनी की जलती हुई आँखें उसे चुप करा रही थीं।
अक्सर बड़े से बड़ा शूरवीर भी औरत के हुस्न और गुस्से के कॉकटेल के आगे घुटने टेक देता है।

विक्रम पीछे मुड़ने ही वाला था, "हम चलते हैं..."
तभी पीछे से बंटी आगे आया।
उसका चेहरा एकदम शांत था, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

"नमस्ते अंकल!" बंटी ने बहुत ही शालीनता से हाथ जोड़े।
विक्रम रुका। "नमस्ते बेटा..."
"आप ऐसे कैसे जा सकते हैं? आप तो अपनी ड्यूटी कर रहे थे," बंटी ने एक शातिर चाल चली।

"अगर आपको शक है, तो प्लीज... अंदर आ कर देख लीजिये।"
बंटी का यह दांव मास्टरस्ट्रोक था। अगर वह रोकता, तो शक होता। उसने बुलाकर शक ख़त्म कर दिया।
विक्रम असमंजस में पड़ गया।
"नहीं... नहीं बेटा... मैं चलता हूँ। लगता है खबरी ने नशा ज्यादा कर लिया था," विक्रम अब कामिनी से नज़रें नहीं मिला पा रहा था।
"कोई बात नहीं अंकल... प्लीज, आईये," बंटी ने दरवाज़ा पूरा खोल दिया।
विक्रम ने एक नज़र कामिनी पर डाली।
कामिनी अभी भी उसे घूर रही थी, उसकी छाती तेज़ चल रही थी।
"Sorry... कामिनी जी..." विक्रम ने धीरे से कहा।
और फिर वह दबे पांव, एक पुलिस वाले की तरह नहीं, बल्कि एक मेहमान की तरह घर के अंदर दाखिल हुआ।
लेकिन यह तलाशी सिर्फ़ एक औपचारिकता थी।
विक्रम मन ही मन कामिनी को 'क्लीन चिट' दे चुका था।
उसे क्या पता था कि जिस घर को वह 'शरीफों का घर' समझ रहा है...
"कामिनी पानी ले आई तब तक "
वो माफ़ करना रात मे नींद ख़राब हुई तो गुस्सा आ गया थोड़ा.
कामिनी ने खुद को संभाल लिया था.

हॉल में सन्नाटा था। पुलिस वाले बाहर खड़े थे, और अंदर सिर्फ़ विक्रम और बंटी थे।
विक्रम ने अपनी बाज़ जैसी नज़रों से ड्राइंग रूम का जायज़ा लिया। सब कुछ सामान्य था—सोफे, टीवी, पर्दे—कहीं भी ड्रग्स या किसी अपराधी के होने का नामोनिशान नहीं था।
"हम्म..." विक्रम ने धीरे से हुंकार भरी।
"रमेश जी नहीं दिख रहे कहीं?" विक्रम ने सवालिया नज़रों से पूछा।


"घर के मालिक हैं, कम से कम पुलिस को देखकर तो उठना चाहिए था।"
बंटी के चेहरे पर एक भी शिकन नहीं थी। गज़ब का शातिर और आत्मविश्वास से भरा लड़का था यह। इतनी बड़ी मुसीबत सामने थी, लेकिन वह ऐसे शांत था जैसे रोज़ का काम हो।
"पापा तो सो रहे हैं अंकल," बंटी ने बहुत ही मासूमियत से कहा। "आज तबियत थोड़ी नासाज़ थी, शायद दवाई लेकर सोए हैं। आइये, मैं दिखाता हूँ।"

बंटी ने खुद आगे बढ़कर उस बेडरूम का रास्ता दिखाया, जो इस पूरी रात के गुनाहों का गवाह था।

विक्रम बंटी के पीछे-पीछे बेडरूम में दाखिल हुआ।
अंदर घुसते ही सबसे पहले रमेश के भारी खर्राटों की आवाज़ सुनाई दी।
सामने किंग साइज़ बेड पर रमेश औंधे मुंह, बेसुध पड़ा था।
"लो... इंजीनियर बाबू तो घोड़े बेचकर सो रहे हैं," विक्रम ने मन ही मन सोचा। "हम बाहर दुनिया हिला रहे हैं और यह यहाँ मज़े में है।"
विक्रम पलटने ही वाला था कि तभी...
उसकी नज़र बिस्तर की चादर पर गई।
चादर बुरी तरह सिमटी हुई थी, उस पर अनगिनत सिलवटें थीं। तकिये इधर-उधर बिखरे हुए थे। ऐसा लग रहा था जैसे उस बिस्तर पर अभी-अभी कुश्ती लड़ी गई हो।

लेकिन जिस चीज़ ने विक्रम का ध्यान खींचा, वह था बिस्तर के बीचों-बीच बना एक बड़ा सा गीला धब्बा।
वह कामिनी के पेशाब और काम-रस (Squirt) का निशान था।
वह धब्बा अभी भी ताज़ा था, गीला था और ट्यूबलाइट की रौशनी में अलग ही चमक रहा था।
और कमरे की हवा में...
मटन की खुशबू के साथ-साथ एक मादक, कामुक और तीखी गंध (Sex Smell) फैली हुई थी। पसीने और स्त्री-रस की वह गंध,

विक्रम के चेहरे पर एक शरारती और समझदार मुस्कान आ गई।
वह सब समझ गया कामिनी इतने गुस्से मे क्यों थी,
'ओह... तो ये बात है...' विक्रम ने मन ही मन सोचा।

विक्रम को अपनी गलती का अहसास हुआ, लेकिन साथ ही एक अजीब सी जलन भी हुई कि रमेश जैसा साधारण आदमी कामिनी जैसी 'आग' के मज़े ले रहा है।

उसी बेड के ठीक नीचे...
फर्श पर चिपका हुआ कादर खान अपनी सांस रोके पड़ा था।
उसकी आँखों के ठीक सामने कमिश्नर विक्रम के काले, चमकते हुए बूट (Boots) थे।
कादर का दिल उसके हलक में आ गया था।
अगर विक्रम ज़रा सा भी नीचे झुकता, या रमेश का हाथ नीचे लटक जाता... तो खेल ख़त्म था।

कादर ने अपनी आँखें बंद कर लीं और दुआ मांगने लगा। उसके पसीने की बूंदें फर्श पर गिर रही थीं।

विक्रम ने बेड के नीचे नहीं देखा। उसे लगा उसने "सच" देख लिया है।
"ठीक है बेटा..." विक्रम ने बंटी के कंधे पर हाथ रखा।


"सोने दो अपने पापा को। डिस्टर्ब मत करो।"
विक्रम मुस्कुराता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।
वह वापस हॉल में आया।
कामिनी अभी भी सोफे के पास कुर्सी पर बैठी थी।
उसका चेहरा पीला पड़ा हुआ था। वह अपने पल्लू को बार-बार अपनी उंगलियों में लपेट रही थी। वह बेचैन थी, डरी हुई थी, शंका में थी कि कहीं कादर की कोई आवाज़ न आ जाए।

विक्रम उसके पास जाकर रुक गया।
उसने कामिनी को ऊपर से नीचे तक देखा। अब उसकी नज़रों में पुलिसिया सख्ती नहीं, बल्कि एक मर्द की प्रशंसा थी।
"माफ़ कीजियेगा कामिनी जी..." विक्रम ने धीमी आवाज़ में कहा।
"मुझे अंदाज़ा नहीं था कि मैंने गलत वक़्त पर दखल दे दिया।"
उसकी आँखों में एक चमक थी जो बिस्तर के उस 'गीले धब्बे' की तरफ इशारा कर रही थी।

कामिनी समझ नहीं पाई कि वह क्या कह रहा है, बस उसने राहत की सांस ली कि तलाशी ख़त्म हुई।
"जी... कोई बात नहीं..." कामिनी ने नज़रें नहीं मिलाईं।
विक्रम जाने के लिए मुड़ा, फिर रुका।
उसने कामिनी की आँखों में सीधे देखा।

"चलता हूँ बेटा बंटी..." विक्रम ने हाथ हिलाया और तेज़ कदमों से बाहर निकल गया, अपनी नाकामी और असफलता को एक नई उम्मीद के पीछे छुपाते हुए।
विक्रम का बहार निकलना था की कामिनी लगभग दौड़ती हुई बंटी के गले जा लगी, उसकी आँखों मे आंसू थे,From Klick Pin CF Pin on Quick saves
उसके स्तन बंटी के सीने मे पूरी तरह पीस गए.
"कोई बात नहीं माँ.... मै हूँ ना, आप पर कोई आंच नहीं आ सकती "
बंटी ने अपनी माँ की नंगी पीठ को सहलाया.
इस छुवन मे असीम प्यार था, सांत्वना थी, हिम्मत थी.
कामिनी मन ही मन खुद पे गर्व महसूस कर रही थी की उसने बंटी जैसे बेटे को पैदा किया.
माँ बेटे का ये मिलन अभी चलता ही की....
चल... साले... मादरचोद शराबी.... जिस घर मे रहता है, उनकी को बदनाम करता है... चाट... चाट.....
बहार से शमशेर के गुरराने की आवाज़ आ रही थी.
कामिनी और बंटी तुरंत भागते हुए बहार गए.....
सामने जो नजारा था उसने कामिनी के पैरो तले जमीनी खिसका दी...
****************

कामिनी और बंटी दौड़ते हुए पोर्च में आए।
सामने का नज़ारा देखकर उनकी सांसें थम गईं।
बगीचे की धुंधली रौशनी में, शमशेर सिंह किसी जल्लाद की तरह चला आ रहा था।

उसने रघु का कॉलर अपनी मुट्ठी में जकड़ रखा था और उसे ज़मीन पर घसीटता हुआ ला रहा था।
रघु के पैर ज़मीन पर रगड़ खा रहे थे, वह धूल में सना हुआ था, और उसके होंठ से खून बह रहा था। वह किसी मरे हुए जानवर की तरह शमशेर की पकड़ में झूल रहा था।

कमिश्नर विक्रम सिंह, जो अपनी जीप का दरवाज़ा खोलकर बैठने ही वाला था, शोर सुनकर रुका।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
शमशेर, रघु को घसीटता हुआ सीधे विक्रम के बूटों के पास ले आया।
शमशेर का सीना तना हुआ था, माथे पर पसीना चमक रहा था, और आंखों में एक विजेता की चमक थी।
शमशेर ने एक झटके से रघु को विक्रम के कदमों में फेंक दिया।
"धप्प!!"
रघु धूल चाटता हुआ विक्रम के जूतों पर गिरा।

"जय हिन्द साहब!" शमशेर ने कड़क आवाज़ में सैल्यूट मारा।
"ये है वो हरामखोर... जिस घर में खाता है, उसी घर को बदनाम करना चाहता था।"
शमशेर ने रघु की पसलियों में एक लात मारी।

"साहब, इसी ने दारू के ठेके पे वो झूठी अफवाह फैलाई थी कि यहाँ ड्रग्स है। साला नशे में धुत था, और इसने पूरे डिपार्टमेंट को नचा दिया।"

रघु दर्द से कराह उठा। वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाया—
"ससस... सब... साब... मुझे कुछ नहीं पता... माई बाप... गलती हो गई..."
उसकी आवाज़ शराब और डर में डूबी हुई थी।
विक्रम ने रघु की हालत देखी—फटे कपड़े, शराब की बदबू और लड़खड़ाती जुबान।

वह तुरंत सारा माजरा समझ गया।
'साला... शराबीयों का नाटक है ये। खामखां मेरी नींद भी हराम हुई और इज़्ज़त का फालूदा भी बना।'

विक्रम को अपनी बेवकूफी पर गुस्सा आया।
फिर उसकी नज़र शमशेर पर गई।
शमशेर का बदन पसीने से लथपथ था, और वह यहाँ पहले से मौजूद था।
विक्रम की भौहें तन गईं।
"तुम...?" विक्रम ने शमशेर को ऊपर से नीचे तक देखा।
"तुम यहाँ कब आए शमशेर? मोहन ने तो कहा था तुम ऑफ ड्यूटी हो, घर पर हो?"

यह सवाल एक जाल था। अगर शमशेर लड़खड़ाता, तो फंस जाता।
लेकिन शमशेर ने विक्रम की आँखों में सीधे देखा। उसके चेहरे पर एक कुटिल और आत्मविश्वास भरी मुस्कान थी।
"सर..." शमशेर ने अपनी छाती चौड़ी की।
"पुलिस कभी ऑफ ड्यूटी नहीं होती।"
शमशेर ने विक्रम का ही डायलॉग (जो विक्रम ने फोन पर मोहन को बोला था) उसे वापस चिपका दिया।

"मेरे भी अपने खबरी हैं सर। मुझे शाम को ही भनक लग गई थी कि ये शराबी कुछ बकवास कर रहा है। इसलिए मैं घर जाने के बजाय सीधा यहाँ आ गया, ताकि मामले की तफ्तीश कर सकूं।"

शमशेर ने एक ही वार में बाज़ी पलट दी थी।
उसने अपनी इज़्ज़त, अपना ओहदा और अपनी मौज-मस्ती... सब बचा लिया था।
वह यह साबित करने में सफल हो गया कि वह कमिश्नर से भी एक कदम आगे है।
पूरे पुलिस डिपार्टमेंट के सामने वह हीरो बन गया था। आस पास के हवलदार धीमी हसीं हस रहे रहे, जिसे कमिश्नर विक्रम ने साफ महसूस किया.

विक्रम का चेहरा उतर गया।
उसे महसूस हुआ कि उसने जल्दबाज़ी में गलती की है। वह शमशेर के सामने छोटा साबित हो गया था।
अब वहां एक पल भी रुकना विक्रम के लिए गवारा नहीं था। उसकी नाक कट चुकी थी।

विक्रम ने एक बार फिर कामिनी की तरफ देखा, जो अभी भी दरवाज़े पर खड़ी थी—बिखरी हुई, लेकिन सुरक्षित।
विक्रम ने गुस्से और शर्मिंदगी में अपनी कैप ठीक की।
"हम्म... गुड जॉब शमशेर। इसे (रघु को) थाने ले जाओ और साले का नशा उतारो।"
विक्रम मुड़ा और अपनी जीप में बैठ गया।

ड्राइवर पीछे मुड़कर कुछ पूछने ही वाला था कि विक्रम उस पर फट पड़ा।
"निकलो यहाँ से! अब मेरा मुंह क्या देख रहे हो? गाड़ी बढ़ाओ!"
"घुर्र्र्र्र्र........"
जीप का इंजन दहाड़ा और टायरों ने धूल उड़ा दी।
पुलिस की गाड़ियाँ एक-एक करके वहां से निकल गईं। सायरन अब बंद हो चुके थे।
धूल के गुबार के बीच...
अब बंगले के पोर्च में सन्नाटा था।
वहां सिर्फ़ तीन लोग खड़े थे—
विजेता के अंदाज़ में खड़ा शमशेर,
दरवाज़े पर खड़ी हांफती हुई कामिनी,
और सब कुछ खामोशी से देखता हुआ बंटी।
और उनके कदमों में... रघु बेहोश पड़ा था।
रघु ने एक बार फिर अपने नमक का कर्ज अदा किया था, उसने कामिनी और रमेश पार आई मुसीबत खुद पर ले ली थी, हालांकि गलती भी उसी की थी भुगता भी उसी ने ही.

"चल बे अब जा के सो जा वापस " शमशेर ने एक ठोंकर रघु को जमा दी और अपनी टोपी ठीक करता हुआ जीप मे जा बैठा, गगगगह्ह्हह्ह्ह्हर्र्टट... घरररररररर.... करती उसकी जीप भी बहार निकल गई.
सन्नाटा.... घुप... बस बंटी और कामिनी के दिल धड़क रहे थे.
"उठो.. उठो... रघु.... ठीक तो हो ना?" कामिनी ने भाग के रघु के सर को अपनी गोद मे राख लिया, ना जाने क्या आकर्षण था कामिनी को रघु से.
बंटी भागता हुआ पानी ले आया.
उसने देखा रघु को बहुत मार मारी थी शमशेर ने...
होंठ फट गए थे, गाल सूज गया था.
इसे अंदर ले चल बंटी....
कामिनी और बंटी ने रघु को सहारा दे अंदर ले आये...
"ये वही है.... वही मार.... साले ने बहुत मारा, रघु नशे मे बड़बड़ा रहा था, जैसे कुछ याद आ रहा हो"
इस बड़बड़हत को कामिनी और बंटी ने साफ इग्नोर कर दिया.
दोनों रघु को ले कर घर के बरामदे मे पहुचे तब तक कादर भी बहार आ गया था,
"क्या हुआ मैडम? " कादर ने आते ही पूछा.
"जाओ तुम यहाँ से " याकायाक कामिनी चिल्ला उठी.. जिसे सुन कादर भी सहम उठाया,
इन सब की गलती की वजह से बेचारा रघु मार खा रहा था, उसकी इस हालात के जिम्मेदार रमेश, शमशेर और कादर ही थे.
कादर समझ गया ये शेरनी फाड़ खायेगी.
बंटी ने जैसे तैसे रघु को बैडरूम मे रमेश के बाजु मे लेता दिया.
और तुरंत भाग कर फर्स्ट ऐड ले आया.
लो माँ.... दवाई लगा देना.... बेचारे ने मार खाई है...
बंटी की आँखों मे दया थी, माँ कर प्रति एक अजीब सा भाव था, जैसे वो समझ रहा हो की वो किस स्थिति से गुजर रही है.
उसने कामिनी के हाथ मे फर्स्ट ऐड बॉक्स पकड़ाया और बिना कुछ कहे अपने कमरे मे चल दिया.
चारो तरफ सन्नाटा था.
बस एक बैडरूम था, जहाँ रमेश के खर्राटे की आवाज़ थी, उसके पास लेता उसका नोकरी दर्द और नशे मे कराह रहा था,

क्रमशः....

Bahut hi behtareen update he Lord haram Bro

Shamsher sala bach gaya, bahut hi chalaki aur pulsiye dimag ka sahi istemal karke.......

Lekin is beech bechara raghu fans gaya.............

Namak ka sahi karz chuka raha he raghu..........

Raghu ko ab shayad shamsher aur ramesh ki haivaniyat yaad aa rahi he.......

Keep rocking Bro
 
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