मेरी माँ कामिनी - भाग 34

समय: रात के 2:05 बजे
पुलिस के सायरन की "वी-वू... वी-वू..." अब कान फाड़ रही थी।
शमशेर, जो अभी-अभी अपनी पैंट चढ़ाकर कामिनी के बेडरूम से भागा था, अब बगीचे के अंधेरे कोने में खड़ा था।
उसका दिल हथौड़े की तरह धड़क रहा था।
उसने कांपते हाथों से अपना फ़ोन निकाला और अपने जूनियर मोहन को मिलाया।
"हैलो! मोहन! मादरचोद क्या हो रहा है ये? मेरे इलाके में मेरी इज़ाज़त के बिना ये सायरन क्यों बज रहे हैं?"
शमशेर ने रौब झाड़ने की कोशिश की, लेकिन उसकी आवाज़ में डर था।
उधर से मोहन की हड़बड़ाई हुई आवाज़ आई, "सर! सर आप कहाँ हैं? हमें कमिश्नर साहब की तरफ से सख्त आदेश हैं। बंगला नंबर 69 पर रेड मारनी है। कादर खान और ड्रग्स की टिप मिली है।"
शमशेर का हलक सूख गया। ड्रग्स! कादर के बारे मे जानकारी कहाँ से लीक हुई.
मोहन ने आगे कहा, "सर, हम बंगले के गेट पर खड़े हैं। कमिश्नर साहब खुद पहुँच रहे हैं। अगर 5 मिनट में गेट नहीं खुला, तो हम तोड़कर घुस जाएंगे।"
शमशेर का पॉलिसीया शातिर दिमाग बिजली की तरह दौड़ा।
वह दौड़कर स्टोर रूम की तरफ गया।
"धड़ाम!"
उसने स्टोर रूम का दरवाज़ा लात मारकर खोला।
अंदर कादर खान हड़बड़ाकर उठ बैठा। सायरन की आवाज़ से उसकी नींद खुल गई थी, लेकिन पास में पड़ा रघु अभी भी नशे में मुर्दे की तरह सो रहा था।
"साब... पुलिस..आ गई क्या? ." कादर ने घबराकर पूछा।
"बैग कहाँ है..." शमशेर ने आस पास देखा, बैग लावारिस जमीनी पर पड़ा था, उसने बैग उठाकर कादर की छाती पर दे मारा।
"ये ले! इसे पकड़!" शमशेर फुसफुसाया, लेकिन उसकी आँखों में खौफ था।
"भागकर अंदर जा! कामिनी मैडम को दे! कहना शमशेर साहब ने भेजा है, इसे कहीं भी छुपा दें! जल्दी कर वरना सब मारे जाएंगे!"
शमशेर जानता था कामिनी से ज्यादा सवाल जवाब नहीं किया जायेगा, कुछ सोचने समझने का वक़्त मिल जायेगा।
कादर को खुद को कुछ समझ नहीं आ रहा था, उसकी जान हलक मे थी, वह नंगे पैर ही घर के पिछले दरवाज़े की तरफ भागा।
इधर बेडरूम में कामिनी अपनी साड़ी ठीक कर रही थी।
उसके हाथ कांप रहे थे।
उसकी गांड में अभी भी वह मीठा-मीठा दर्द और खिंचाव था। चलने में उसे दिक्कत हो रही थी, उसके पैर लड़खड़ा रहे थे।
उसके चेहरे पे जिस्मानी दर्द कम और अधूरापन ज्यादा दिख रहा था, बार बार झड़ने के करीब पहुँचती की कोई ना कोई मुसीबत आ ही जाती.
उसका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था.
"रमेश... उठो ना..." वह रमेश को झिंझोड़ रही थी।
तभी पीछे से कादर आंधी की तरह अंदर आया।
"मैडम... मैडम...!"
कामिनी चौंक गई।
कादर ने वह काला बैग कामिनी के हाथों में थमा दिया।
"साब ने भेजा है... शमशेर साब ने! बोले पुलिस आई है... इसे छुपा दो!"
कामिनी का दिमाग सुन्न हो गया। बैग भारी था।
उसे तुरंत समझ आ गया, पुलिस क्यों और किसलिए आई है।
"हाय राम..." कामिनी ने इधर-उधर देखा।
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, समझने का समय ही कहाँ था.
"इसे मुझे दो माँ " कामिनी ने सकपाकते हुए पीछे देखा, बंटी खड़ा था
उसने आगे बढ़ कर बैग कामिनी के हाथ से ले लिया,
"सब ठीक हो जायेगा " कामिनी अभी भी बद हवास थी.
सिर्फ बंटी को जाता देखती रही.
उसकी सांसे तेज़ चल रही थी.
"और मैडम मै....?" कादर के चेहरे पे डर, सवाल सब एक साथ था.
"त तत... तुम?" कामिनी ना चाहते हुए भी उसे बचा लेना चाहती थी, कादर का इस घर मे पकड़ा जाना उसके और रमेश के लिए शर्मनाक होता.
"यहाँ नीचे... जल्दी.... " कामिनी ने बेड के नीचे इशारा किया.
कादर को इशारा मिलने की देर थी की फुर्ती से किसी चूहें की तरह वो बेड के नीचे सरक गया.
इस उपक्रम मे कोई 5 मिनट गुज़र चुके थे। कामिनी ने खुद को नार्मल किया, एक बात रमेश को फिर से उठाने की कोशिश की, लेकिन रमेश नहीं उठाया.
"धाड़... धाड़.... धाड़..... बहार मैन गेट का दरवाजा पीटने की आवाज़ आने लगी.
"कौन है इतनी रात को?"
कामिनी हॉल से होती मुख्य दरवाज़े तक पहुंची।
उसने कांपते हाथों से चिटकनी खोली।
"चरररर......"
दरवाज़ा खुलते ही सामने का नज़ारा किसी फिल्म जैसा था।
चारों तरफ पुलिस थी, उनके पीछे गार्डन मे पुलिस की की गाड़ियाँ, लाल-नीली बत्तिया।
और उन सबके बीच... अपनी जीप से उतरता हुआ, वर्दी में तना हुआ कमिश्नर विक्रम सिंह।
विक्रम के बूटों की आवाज़ मार्बल के फर्श पर गूंजी।
"ठक... ठक... ठक..."
वह तेज़ कदमों से पोर्च में चढ़ा।
"माफ़ करना," विक्रम ने अपनी कड़क आवाज़ में कहा, बिना ऊपर देखे। "हमें पुख्ता खबर है कि यहाँ ड्रग्स है। आपके घर की तलाशी लेनी होगी।"
विक्रम अपनी धुन में था, उसका ध्यान अपने मिशन पर था।
लेकिन जैसे ही उसने अपनी नज़रें उठाईं...
"अ... अ... आप...?"
विक्रम के शब्द गले में ही फंस गए। उसका मुंह जाम हो गया।
उसके कदम वहीं रुक गए।
उसके सामने कामिनी खड़ी थी।
लेकिन यह वह कामिनी नहीं थी जिसे उसने कल शाम अपने घर पर देखा था,
यह एक 'टूटी हुई, बिखरी हुई और अधूरी वासना मे जलती हुई ' कामिनी थी।
उसका चेहरा पसीने से भीगा हुआ था, बाल बिखरे हुए थे और गालों पर उत्तेजना की लाली थी।
होंठ सूजकर मोटे और लाल हो गए थे, वे ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने उन्हें बेदर्दी से नोचा हो।
आँखों में नींद नहीं, बल्कि एक अजीब सा नशा और गुस्से का मिश्रण था।
उसकी साड़ी बेतरतीब लपेटी हुई थी। ब्लाउज़ के बटन शायद गलत लगे थे।
कामिनी उस वक़्त अपने कामुक हुस्न के चरम पर थी।
वह एक ' अधूरी' औरत लग रही थी, जिससे अभी-अभी किसी मर्द ने खेला हो।
विक्रम उसे एकटक देखता रह गया। उसे विश्वास नहीं हो रहा था।
"कामिनी जी...?" विक्रम के मुंह से अनजाने में उसका नाम निकल गया।
"ये... ये आपका घर है?"
विक्रम की आवाज़ में पुलिसिया रौब गायब हो गया था, उसकी जगह हैरानी और एक अजीब सी सहर (Fascination) ने ले ली थी।
कामिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ा, अपनी छाती को ढकने की नाकाम कोशिश की।
दरवाज़े पर खड़ी कामिनी का चेहरा तमतमा रहा था।
उसकी आँखों में जो लाल डोरे थे, वे अब नींद या नशे के नहीं, बल्कि खालिस गुस्से के थे।
उसके पीछे पुलिस की जीप की लाल-नीली बत्तियाँ चमक रही थीं, जो उसके पसीने से भीगे हुए चेहरे को और भी ज्यादा मादक और आकर्षक बना रही थीं।
विक्रम ने जैसे ही ड्रग्स की बात की, कामिनी के सब्र का बांध टूट गया।
उसके अंदर का लावा—जो कादर और शमशेर ने सुलगाया था, लेकिन बुझाया नहीं था—अब एक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा।
"ये क्या हरकत है कमिश्नर साहब?" कामिनी एकाएक विक्रम पर बरस पड़ी।
उसकी आवाज़ इतनी ऊंची और तीखी थी कि विक्रम के साथ खड़े दो हवलदार भी दो कदम पीछे हट गए।
"इतनी रात को... बिना बताए, आप शरीफों के घर का दरवाज़ा तोड़ रहे हैं?"
कामिनी एक कदम आगे बढ़ी। उसका सीना गुस्से से ऊपर-नीचे हो रहा था।
उसकी साड़ी का पल्लू फिर से हल्का सा सरक गया, लेकिन इस बार उसने उसे संभालने की ज़हमत नहीं उठाई।
"और कौनसी ड्रग? आपको क्या लगता है मैं यहाँ ड्रग बेचती हूँ? मेरा घर आपको अड्डा नज़र आता है?"
कामिनी किसी भूखी शेरनी की तरह दहाड़ रही थी।
उसका पूरा शरीर कांप रहा था। उसकी मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं।
पीछे खड़ा बंटी भी अपनी माँ का यह रूप देखकर एक पल के लिए सहम गया। उसने माँ को हमेशा दबी-कुचली, शांत देखा था। लेकिन आज... आज वह दुर्गा बनी खड़ी थी।
उसे अंदाज़ा नहीं था कि एक असंतुष्ट और उत्तेजित औरत का गुस्सा कितना खौफनाक हो सकता है।
सामने खड़ा कमिश्नर विक्रम सिंह, जिसे पूरा शहर ईमानदार और कड़क आदमी के रूप मे जानता था, आज एक औरत के सामने सकते में आ गया।
उसने मुजरिमों को रोते देखा था, लेकिन किसी औरत को अपनी आँखों में आँखें डालकर, इस तरह ललकारते हुए पहली बार देख रहा था।
और सच तो यह था...
कामिनी का यह बिखरा हुआ रूप—सूजे होंठ, अस्त-व्यस्त कपड़े, और आँखों में आग—विक्रम को बेइंतहा मोहक लग रहा था।
उसे लगा जैसे वह किसी 'फायर ब्रांड' को देख रहा है।
"म... म... माफ़ करना कामिनी जी..." विक्रम की जुबान लड़खड़ा गई।
वह शेर, जो अभी दहाड़ते हुए जीप से उतरा था, अब भीगी बिल्ली बन चुका था।
उसने अपनी कैप (Cap) को हल्का सा ठीक किया, जैसे अपनी घबराहट छुपा रहा हो।
"मुझे... मुझे सच में नहीं पता था कि यह आपका घर है," विक्रम ने अपनी आवाज़ को और नरम किया। उसकी नज़रों में अब रौब नहीं, शर्मिंदगी थी।
"क्या करूँ मैडम... ड्यूटी ही ऐसी है मेरी। गलत फहमी हो गई होगी।"
विक्रम सफाई देना चाह रहा था, लेकिन कामिनी की जलती हुई आँखें उसे चुप करा रही थीं।
अक्सर बड़े से बड़ा शूरवीर भी औरत के हुस्न और गुस्से के कॉकटेल के आगे घुटने टेक देता है।
विक्रम पीछे मुड़ने ही वाला था, "हम चलते हैं..."
तभी पीछे से बंटी आगे आया।
उसका चेहरा एकदम शांत था, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
"नमस्ते अंकल!" बंटी ने बहुत ही शालीनता से हाथ जोड़े।
विक्रम रुका। "नमस्ते बेटा..."
"आप ऐसे कैसे जा सकते हैं? आप तो अपनी ड्यूटी कर रहे थे," बंटी ने एक शातिर चाल चली।
"अगर आपको शक है, तो प्लीज... अंदर आ कर देख लीजिये।"
बंटी का यह दांव मास्टरस्ट्रोक था। अगर वह रोकता, तो शक होता। उसने बुलाकर शक ख़त्म कर दिया।
विक्रम असमंजस में पड़ गया।
"नहीं... नहीं बेटा... मैं चलता हूँ। लगता है खबरी ने नशा ज्यादा कर लिया था," विक्रम अब कामिनी से नज़रें नहीं मिला पा रहा था।
"कोई बात नहीं अंकल... प्लीज, आईये," बंटी ने दरवाज़ा पूरा खोल दिया।
विक्रम ने एक नज़र कामिनी पर डाली।
कामिनी अभी भी उसे घूर रही थी, उसकी छाती तेज़ चल रही थी।
"Sorry... कामिनी जी..." विक्रम ने धीरे से कहा।
और फिर वह दबे पांव, एक पुलिस वाले की तरह नहीं, बल्कि एक मेहमान की तरह घर के अंदर दाखिल हुआ।
लेकिन यह तलाशी सिर्फ़ एक औपचारिकता थी।
विक्रम मन ही मन कामिनी को 'क्लीन चिट' दे चुका था।
उसे क्या पता था कि जिस घर को वह 'शरीफों का घर' समझ रहा है...
"कामिनी पानी ले आई तब तक "
वो माफ़ करना रात मे नींद ख़राब हुई तो गुस्सा आ गया थोड़ा.
कामिनी ने खुद को संभाल लिया था.
हॉल में सन्नाटा था। पुलिस वाले बाहर खड़े थे, और अंदर सिर्फ़ विक्रम और बंटी थे।
विक्रम ने अपनी बाज़ जैसी नज़रों से ड्राइंग रूम का जायज़ा लिया। सब कुछ सामान्य था—सोफे, टीवी, पर्दे—कहीं भी ड्रग्स या किसी अपराधी के होने का नामोनिशान नहीं था।
"हम्म..." विक्रम ने धीरे से हुंकार भरी।
"रमेश जी नहीं दिख रहे कहीं?" विक्रम ने सवालिया नज़रों से पूछा।
"घर के मालिक हैं, कम से कम पुलिस को देखकर तो उठना चाहिए था।"
बंटी के चेहरे पर एक भी शिकन नहीं थी। गज़ब का शातिर और आत्मविश्वास से भरा लड़का था यह। इतनी बड़ी मुसीबत सामने थी, लेकिन वह ऐसे शांत था जैसे रोज़ का काम हो।
"पापा तो सो रहे हैं अंकल," बंटी ने बहुत ही मासूमियत से कहा। "आज तबियत थोड़ी नासाज़ थी, शायद दवाई लेकर सोए हैं। आइये, मैं दिखाता हूँ।"
बंटी ने खुद आगे बढ़कर उस बेडरूम का रास्ता दिखाया, जो इस पूरी रात के गुनाहों का गवाह था।
विक्रम बंटी के पीछे-पीछे बेडरूम में दाखिल हुआ।
अंदर घुसते ही सबसे पहले रमेश के भारी खर्राटों की आवाज़ सुनाई दी।
सामने किंग साइज़ बेड पर रमेश औंधे मुंह, बेसुध पड़ा था।
"लो... इंजीनियर बाबू तो घोड़े बेचकर सो रहे हैं," विक्रम ने मन ही मन सोचा। "हम बाहर दुनिया हिला रहे हैं और यह यहाँ मज़े में है।"
विक्रम पलटने ही वाला था कि तभी...
उसकी नज़र बिस्तर की चादर पर गई।
चादर बुरी तरह सिमटी हुई थी, उस पर अनगिनत सिलवटें थीं। तकिये इधर-उधर बिखरे हुए थे। ऐसा लग रहा था जैसे उस बिस्तर पर अभी-अभी कुश्ती लड़ी गई हो।
लेकिन जिस चीज़ ने विक्रम का ध्यान खींचा, वह था बिस्तर के बीचों-बीच बना एक बड़ा सा गीला धब्बा।
वह कामिनी के पेशाब और काम-रस (Squirt) का निशान था।
वह धब्बा अभी भी ताज़ा था, गीला था और ट्यूबलाइट की रौशनी में अलग ही चमक रहा था।
और कमरे की हवा में...
मटन की खुशबू के साथ-साथ एक मादक, कामुक और तीखी गंध (Sex Smell) फैली हुई थी। पसीने और स्त्री-रस की वह गंध,
विक्रम के चेहरे पर एक शरारती और समझदार मुस्कान आ गई।
वह सब समझ गया कामिनी इतने गुस्से मे क्यों थी,
'ओह... तो ये बात है...' विक्रम ने मन ही मन सोचा।
विक्रम को अपनी गलती का अहसास हुआ, लेकिन साथ ही एक अजीब सी जलन भी हुई कि रमेश जैसा साधारण आदमी कामिनी जैसी 'आग' के मज़े ले रहा है।
उसी बेड के ठीक नीचे...
फर्श पर चिपका हुआ कादर खान अपनी सांस रोके पड़ा था।
उसकी आँखों के ठीक सामने कमिश्नर विक्रम के काले, चमकते हुए बूट (Boots) थे।
कादर का दिल उसके हलक में आ गया था।
अगर विक्रम ज़रा सा भी नीचे झुकता, या रमेश का हाथ नीचे लटक जाता... तो खेल ख़त्म था।
कादर ने अपनी आँखें बंद कर लीं और दुआ मांगने लगा। उसके पसीने की बूंदें फर्श पर गिर रही थीं।
विक्रम ने बेड के नीचे नहीं देखा। उसे लगा उसने "सच" देख लिया है।
"ठीक है बेटा..." विक्रम ने बंटी के कंधे पर हाथ रखा।
"सोने दो अपने पापा को। डिस्टर्ब मत करो।"
विक्रम मुस्कुराता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।
वह वापस हॉल में आया।
कामिनी अभी भी सोफे के पास कुर्सी पर बैठी थी।
उसका चेहरा पीला पड़ा हुआ था। वह अपने पल्लू को बार-बार अपनी उंगलियों में लपेट रही थी। वह बेचैन थी, डरी हुई थी, शंका में थी कि कहीं कादर की कोई आवाज़ न आ जाए।
विक्रम उसके पास जाकर रुक गया।
उसने कामिनी को ऊपर से नीचे तक देखा। अब उसकी नज़रों में पुलिसिया सख्ती नहीं, बल्कि एक मर्द की प्रशंसा थी।
"माफ़ कीजियेगा कामिनी जी..." विक्रम ने धीमी आवाज़ में कहा।
"मुझे अंदाज़ा नहीं था कि मैंने गलत वक़्त पर दखल दे दिया।"
उसकी आँखों में एक चमक थी जो बिस्तर के उस 'गीले धब्बे' की तरफ इशारा कर रही थी।
कामिनी समझ नहीं पाई कि वह क्या कह रहा है, बस उसने राहत की सांस ली कि तलाशी ख़त्म हुई।
"जी... कोई बात नहीं..." कामिनी ने नज़रें नहीं मिलाईं।
विक्रम जाने के लिए मुड़ा, फिर रुका।
उसने कामिनी की आँखों में सीधे देखा।
"चलता हूँ बेटा बंटी..." विक्रम ने हाथ हिलाया और तेज़ कदमों से बाहर निकल गया, अपनी नाकामी और असफलता को एक नई उम्मीद के पीछे छुपाते हुए।
विक्रम का बहार निकलना था की कामिनी लगभग दौड़ती हुई बंटी के गले जा लगी, उसकी आँखों मे आंसू थे,
उसके स्तन बंटी के सीने मे पूरी तरह पीस गए.
"कोई बात नहीं माँ.... मै हूँ ना, आप पर कोई आंच नहीं आ सकती "
बंटी ने अपनी माँ की नंगी पीठ को सहलाया.
इस छुवन मे असीम प्यार था, सांत्वना थी, हिम्मत थी.
कामिनी मन ही मन खुद पे गर्व महसूस कर रही थी की उसने बंटी जैसे बेटे को पैदा किया.
माँ बेटे का ये मिलन अभी चलता ही की....
चल... साले... मादरचोद शराबी.... जिस घर मे रहता है, उनकी को बदनाम करता है... चाट... चाट.....
बहार से शमशेर के गुरराने की आवाज़ आ रही थी.
कामिनी और बंटी तुरंत भागते हुए बहार गए.....
सामने जो नजारा था उसने कामिनी के पैरो तले जमीनी खिसका दी...
****************
कामिनी और बंटी दौड़ते हुए पोर्च में आए।
सामने का नज़ारा देखकर उनकी सांसें थम गईं।
बगीचे की धुंधली रौशनी में, शमशेर सिंह किसी जल्लाद की तरह चला आ रहा था।
उसने रघु का कॉलर अपनी मुट्ठी में जकड़ रखा था और उसे ज़मीन पर घसीटता हुआ ला रहा था।
रघु के पैर ज़मीन पर रगड़ खा रहे थे, वह धूल में सना हुआ था, और उसके होंठ से खून बह रहा था। वह किसी मरे हुए जानवर की तरह शमशेर की पकड़ में झूल रहा था।
कमिश्नर विक्रम सिंह, जो अपनी जीप का दरवाज़ा खोलकर बैठने ही वाला था, शोर सुनकर रुका।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
शमशेर, रघु को घसीटता हुआ सीधे विक्रम के बूटों के पास ले आया।
शमशेर का सीना तना हुआ था, माथे पर पसीना चमक रहा था, और आंखों में एक विजेता की चमक थी।
शमशेर ने एक झटके से रघु को विक्रम के कदमों में फेंक दिया।
"धप्प!!"
रघु धूल चाटता हुआ विक्रम के जूतों पर गिरा।
"जय हिन्द साहब!" शमशेर ने कड़क आवाज़ में सैल्यूट मारा।
"ये है वो हरामखोर... जिस घर में खाता है, उसी घर को बदनाम करना चाहता था।"
शमशेर ने रघु की पसलियों में एक लात मारी।
"साहब, इसी ने दारू के ठेके पे वो झूठी अफवाह फैलाई थी कि यहाँ ड्रग्स है। साला नशे में धुत था, और इसने पूरे डिपार्टमेंट को नचा दिया।"
रघु दर्द से कराह उठा। वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाया—
"ससस... सब... साब... मुझे कुछ नहीं पता... माई बाप... गलती हो गई..."
उसकी आवाज़ शराब और डर में डूबी हुई थी।
विक्रम ने रघु की हालत देखी—फटे कपड़े, शराब की बदबू और लड़खड़ाती जुबान।
वह तुरंत सारा माजरा समझ गया।
'साला... शराबीयों का नाटक है ये। खामखां मेरी नींद भी हराम हुई और इज़्ज़त का फालूदा भी बना।'
विक्रम को अपनी बेवकूफी पर गुस्सा आया।
फिर उसकी नज़र शमशेर पर गई।
शमशेर का बदन पसीने से लथपथ था, और वह यहाँ पहले से मौजूद था।
विक्रम की भौहें तन गईं।
"तुम...?" विक्रम ने शमशेर को ऊपर से नीचे तक देखा।
"तुम यहाँ कब आए शमशेर? मोहन ने तो कहा था तुम ऑफ ड्यूटी हो, घर पर हो?"
यह सवाल एक जाल था। अगर शमशेर लड़खड़ाता, तो फंस जाता।
लेकिन शमशेर ने विक्रम की आँखों में सीधे देखा। उसके चेहरे पर एक कुटिल और आत्मविश्वास भरी मुस्कान थी।
"सर..." शमशेर ने अपनी छाती चौड़ी की।
"पुलिस कभी ऑफ ड्यूटी नहीं होती।"
शमशेर ने विक्रम का ही डायलॉग (जो विक्रम ने फोन पर मोहन को बोला था) उसे वापस चिपका दिया।
"मेरे भी अपने खबरी हैं सर। मुझे शाम को ही भनक लग गई थी कि ये शराबी कुछ बकवास कर रहा है। इसलिए मैं घर जाने के बजाय सीधा यहाँ आ गया, ताकि मामले की तफ्तीश कर सकूं।"
शमशेर ने एक ही वार में बाज़ी पलट दी थी।
उसने अपनी इज़्ज़त, अपना ओहदा और अपनी मौज-मस्ती... सब बचा लिया था।
वह यह साबित करने में सफल हो गया कि वह कमिश्नर से भी एक कदम आगे है।
पूरे पुलिस डिपार्टमेंट के सामने वह हीरो बन गया था। आस पास के हवलदार धीमी हसीं हस रहे रहे, जिसे कमिश्नर विक्रम ने साफ महसूस किया.
विक्रम का चेहरा उतर गया।
उसे महसूस हुआ कि उसने जल्दबाज़ी में गलती की है। वह शमशेर के सामने छोटा साबित हो गया था।
अब वहां एक पल भी रुकना विक्रम के लिए गवारा नहीं था। उसकी नाक कट चुकी थी।
विक्रम ने एक बार फिर कामिनी की तरफ देखा, जो अभी भी दरवाज़े पर खड़ी थी—बिखरी हुई, लेकिन सुरक्षित।
विक्रम ने गुस्से और शर्मिंदगी में अपनी कैप ठीक की।
"हम्म... गुड जॉब शमशेर। इसे (रघु को) थाने ले जाओ और साले का नशा उतारो।"
विक्रम मुड़ा और अपनी जीप में बैठ गया।
ड्राइवर पीछे मुड़कर कुछ पूछने ही वाला था कि विक्रम उस पर फट पड़ा।
"निकलो यहाँ से! अब मेरा मुंह क्या देख रहे हो? गाड़ी बढ़ाओ!"
"घुर्र्र्र्र्र........"
जीप का इंजन दहाड़ा और टायरों ने धूल उड़ा दी।
पुलिस की गाड़ियाँ एक-एक करके वहां से निकल गईं। सायरन अब बंद हो चुके थे।
धूल के गुबार के बीच...
अब बंगले के पोर्च में सन्नाटा था।
वहां सिर्फ़ तीन लोग खड़े थे—
विजेता के अंदाज़ में खड़ा शमशेर,
दरवाज़े पर खड़ी हांफती हुई कामिनी,
और सब कुछ खामोशी से देखता हुआ बंटी।
और उनके कदमों में... रघु बेहोश पड़ा था।
रघु ने एक बार फिर अपने नमक का कर्ज अदा किया था, उसने कामिनी और रमेश पार आई मुसीबत खुद पर ले ली थी, हालांकि गलती भी उसी की थी भुगता भी उसी ने ही.
"चल बे अब जा के सो जा वापस " शमशेर ने एक ठोंकर रघु को जमा दी और अपनी टोपी ठीक करता हुआ जीप मे जा बैठा, गगगगह्ह्हह्ह्ह्हर्र्टट... घरररररररर.... करती उसकी जीप भी बहार निकल गई.
सन्नाटा.... घुप... बस बंटी और कामिनी के दिल धड़क रहे थे.
"उठो.. उठो... रघु.... ठीक तो हो ना?" कामिनी ने भाग के रघु के सर को अपनी गोद मे राख लिया, ना जाने क्या आकर्षण था कामिनी को रघु से.
बंटी भागता हुआ पानी ले आया.
उसने देखा रघु को बहुत मार मारी थी शमशेर ने...
होंठ फट गए थे, गाल सूज गया था.
इसे अंदर ले चल बंटी....
कामिनी और बंटी ने रघु को सहारा दे अंदर ले आये...
"ये वही है.... वही मार.... साले ने बहुत मारा, रघु नशे मे बड़बड़ा रहा था, जैसे कुछ याद आ रहा हो"
इस बड़बड़हत को कामिनी और बंटी ने साफ इग्नोर कर दिया.
दोनों रघु को ले कर घर के बरामदे मे पहुचे तब तक कादर भी बहार आ गया था,
"क्या हुआ मैडम? " कादर ने आते ही पूछा.
"जाओ तुम यहाँ से " याकायाक कामिनी चिल्ला उठी.. जिसे सुन कादर भी सहम उठाया,
इन सब की गलती की वजह से बेचारा रघु मार खा रहा था, उसकी इस हालात के जिम्मेदार रमेश, शमशेर और कादर ही थे.
कादर समझ गया ये शेरनी फाड़ खायेगी.
बंटी ने जैसे तैसे रघु को बैडरूम मे रमेश के बाजु मे लेता दिया.
और तुरंत भाग कर फर्स्ट ऐड ले आया.
लो माँ.... दवाई लगा देना.... बेचारे ने मार खाई है...
बंटी की आँखों मे दया थी, माँ कर प्रति एक अजीब सा भाव था, जैसे वो समझ रहा हो की वो किस स्थिति से गुजर रही है.
उसने कामिनी के हाथ मे फर्स्ट ऐड बॉक्स पकड़ाया और बिना कुछ कहे अपने कमरे मे चल दिया.
चारो तरफ सन्नाटा था.
बस एक बैडरूम था, जहाँ रमेश के खर्राटे की आवाज़ थी, उसके पास लेता उसका नोकरी दर्द और नशे मे कराह रहा था,
क्रमशः....
Bahut hi behtareen update he
Lord haram Bro
Shamsher sala bach gaya, bahut hi chalaki aur pulsiye dimag ka sahi istemal karke.......
Lekin is beech bechara raghu fans gaya.............
Namak ka sahi karz chuka raha he raghu..........
Raghu ko ab shayad shamsher aur ramesh ki haivaniyat yaad aa rahi he.......
Keep rocking Bro