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Incest मेरी बहन नेहाकी कातिल जवानी

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sam21003

Mirtyu hi satya hai
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अपडेट ५:

मैं कुछ देर सोया ही था की शायद एक घंटे बाद, पेशाब की प्रेशरसे जागा। मैं बिस्तर से उठा और बाथरूम गया। नेहा के कमरे से हल्का संगीत आ रहा था। शायद वह अभी तक सोई नहीं थी। अपने कमरे में वापस आने के बाद, मैंने मोबाइल चेक किया। उसने 'हैलो' मैसेज भेजा था। उसका मैसेज पाकर मैं रोमांचित हो गया। मेरा दिल धड़क गया। यह वही पल था जिसका मैं इंतजार कर रहा था।

कुछ देर इंतजार करके मैंने उसे जवाब दिया।

आदित्य: हैलो श्रिया।

कोई जवाब नहीं।

आदित्य: क्या तुम सो गई हो?

नेहा ने जवाब दिया।

श्रिया: हाय। मुझे लगा तुम सो गए हो। जवाब देने में बहुत समय लगाया।

आदित्य: मैं अभी घर आया हूँ। दोस्तों के साथ पब गया था कुछ ड्रिंक्स के लिए।

आदित्य: कैसी हो? आज दिन कैसा गुज़रा?

श्रिया: मैं ठीक हूँ। दिन तो वैसे ही बीता, ऑफिस का काम, घर के काम। तुम सुनाओ?

आदित्य: बस यार, तुम्हारी नई रील देखी। गाना बहुत अच्छा चुना है, और तुम उसमें बहुत खूबसूरत लग रही थी।

श्रिया: अरे शुक्रिया! तुमने देख ली? मुझे लगा तुमने नोटिस नहीं किया।

आदित्य: कैसे ना देखता? तुम्हारी हर पोस्ट मैं देखता हूँ। तुम्हारी आँखों में एक अलग ही चमक है, और वो मुस्कान... दिल चुरा लेती है।

श्रिया: (हँसती इमोजी) तुम तो बड़े चापलूस निकले, आदित्य।

आदित्य: सच कह रहा हूँ। और उस रील में तुमने जो ग्रीन टॉप पहना था, उसमें तुम्हारी फिगर बहुत अच्छी दिख रही थी। कहीं जिम जाती हो?

श्रिया: हाँ, थोड़ा-बहुत कर लेती हूँ। घर पर ही एक्सरसाइज करती हूँ। पर तुम तो बहुत ध्यान से देखते हो मेरी रीलें।

आदित्य: क्योंकि तुम हर रील में और भी खूबसूरत दिखती हो। तुम्हारे बाल, तुम्हारी गर्दन, तुम्हारी... हर चीज़।

मैंने धीरे-धीरे बात को मोड़ना शुरू किया। उसकी रील में उसके क्लीवेज पर भी मैंने गौर किया था, लेकिन सीधे कहने की बजाय, मैंने उसके शरीर के बारे में सामान्य तारीफ करनी शुरू की।

आदित्य: वीकेंड पर क्या करती हो? कोई प्लान?

श्रिया: कुछ खास नहीं। मूवी देखती हूँ घर पर, या सोशल मीडिया पर समय बिताती हूँ।

आदित्य: तुम जैसी हॉट गर्ल को तो नाइटलाइफ़ एंजॉय करनी चाहिए। पब, डिस्को – वहाँ जाओ, डांस करो, मज़े करो।

श्रिया: अरे नहीं, फैमिली अलाउ नहीं करेगी। इंडियन घरों में ऐसी चीज़ें थोड़ी अलाउ होती हैं।

आदित्य: सुनो श्रिया, शादी से पहले ज़िंदगी एंजॉय करो। शादी के बाद तो पति और सास-ससुर और भी ज्यादा रोकेंगे। अभी तुम जवान हो, खूबसूरत हो, अपनी ज़िंदगी जियो।

श्रिया: तुम सही कहते हो, पर डर लगता है। कभी किसी ने देख लिया तो?

आदित्य: तुम होशियार हो। अगर कोई सही आदमी हो जो तुम्हारा ख्याल रखे, तो कोई डर नहीं। वैसे भी, तुम अकेली हो या किसी को डेट कर रही हो?

श्रिया: मैं सिंगल हूँ। पहले एक लड़का था, पर उसने मुझे चीट किया। तब से ब्रेकअप हो गया।

आदित्य: ओह, सॉरी यार। पर तुम तो बहुत अच्छी हो, कैसे कोई तुम्हें चीट कर सकता है? तुम्हें कैसा लड़का पसंद है?

श्रिया: हैंडसम, केयरिंग, और अंडरस्टैंडिंग। जो चीट ना करे। बस यही चाहिए।

आदित्य: तो फिर तो मैं भी वही हूँ। मैं भी हाल ही में ब्रेकअप से गुज़रा हूँ। अब एक ऐसी लड़की ढूँढ रहा हूँ जो प्यार करे, समझे, और हॉट भी हो – तुम्हारी तरह, श्रिया। सेक्सी फिगर, खूबसूरत चेहरा, और अंदर से प्यारी।

श्रिया: (शर्माती इमोजी) तुम तो बहुत क्यूट हो, आदित्य। अगर तुम मेरे शहर में होते तो क्या करते?

आदित्य: मैं तुम्हें डिस्को ले जाता। नाइटलाइफ़ एंजॉय करवाता। तुम्हारे साथ डांस करता, तुम्हें हैंडल करता।

मैं अपने कमरे में लेटा हुआ था, और बस कुछ ही दूरी पर नेहा अपने कमरे में थी। मुझे पता था कि वह श्रिया बनकर मुझसे बात कर रही है – मेरी अपनी बहन। इस बात ने मुझे अंदर से हिला दिया था। मेरी पैंट में जोरों से खड़ा हो गया था। मैं जानता था कि यह गलत है, लेकिन इसी गलत होने की वजह से मुझे और भी एक्साइटमेंट मिल रही थी।

श्रिया: और अगर तुम मुझे इम्प्रेस करना चाहो तो और क्या करोगे?

आदित्य: सबसे पहले तो तुम्हें डिनर पर ले जाऊँगा। कोई अच्छी रेस्टोरेंट में। फिर डिस्को। और वहाँ तुम्हें कुछ सेक्सी डांस मूव्स सिखाऊँगा।

श्रिया: कैसे सेक्सी डांस मूव्स? मुझे बताओ।

आदित्य: मैं तुम्हें पीछे से होल्ड करूँगा, तुम्हारी कमर पर हाथ रखूँगा, और तुम्हारे साथ धीमी धुन पर झूलूँगा। तुम्हारी सेक्सी हिप्स को महसूस करूँगा। फिर धीरे से तुम्हारी गर्दन पर एक सॉफ्ट किस करूँगा।

श्रिया: (सिर्फ एक स्माइली इमोजी भेजा)

वह चुप हो गई। मुझे लगा कि वह हिचक रही है। मैंने बात को आगे बढ़ाने का फैसला किया।

आदित्य: अगर तुम किसी आदमी को सेड्यूस करना चाहो, तो तुम क्या करोगी?

श्रिया: वक़्त बताएगा... पर अभी के लिए, मैं उसे पूरे बदन पर किस करूँगी।

आदित्य: मतलब नीचे भी?

श्रिया: (शरमाती इमोजी) हाँ, नीचे भी।

मेरी साँस रुक गई। मेरी बहन ने यह लिखा था। मैंने अपनी पैंट का बटन खोल दिया।

आदित्य: वो आदमी बहुत लकी होगा जिसे एक हॉट और सेक्सी गर्ल से स्वीट बी.जे. मिले। तुम तो मास्टर लगती हो।

श्रिया: यह तो सच है।

आदित्य: सुनो श्रिया, तुम्हारे साथ इस सेक्सी बातचीत ने मुझे बहुत हॉर्नी कर दिया है। मुझे हिलानेका मन कर रहा है।

श्रिया: तो क्यों नहीं कर लेते? जाओ और करो।

आदित्य: मैं तुम्हारी रील देखकर करूँगा।

श्रिया: (LOL इमोजी) गुडनाइट, आदित्य।

आदित्य: नहीं, प्लीज़ और बात करो। मुझे तुमसे बात करनी है।

श्रिया: बाद में बात करते हैं, हॉर्नी बॉय।

मैंने मोबाइल रख दिया। मेरे हाथ काँप रहे थे। उसके कमरे की तरफ देखा। नेहा वहाँ थी, सो रही होगी, या शायद मुस्कुरा रही होगी। मैंने आँखें बंद कीं और उसकी आखिरी वाली बातों को दोहराया। मेरी साँसें भारी हो गईं। मैंने अपनी पैंट उतार दी और वही किया जो मैंने उससे कहा था – उसकी रील देखते हुए, उसके चेहरे को, उसके शरीर को याद करते हुए।

रात भर मैं सो नहीं पाया। मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही बात थी – मैं अपनी बहन को बहका रहा था, और वह मजे ले रही थी। यह गलत था, लेकिन यह मुझे रोमांचित कर रहा था। और मुझे पता था कि यह सिर्फ शुरुआत थी।
Very nice update
 

sam21003

Mirtyu hi satya hai
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अपडेट ९:

फ्रेश होने के बाद मैं छत पर गया। रात की हल्की ठंडक अब भी हवा में बाकी थी। मैंने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला — एक लाइटर फ्लिक किया और धुआँ छोड़ते हुए वहाँ खड़ा हो गया, आसमान की तरफ देखते हुए।

मुझे नहीं पता था कि नेहा किचन से खिड़की के रास्ते मुझे देख रही थी।

"भैया!" उसकी आवाज़ ने मुझे चौंका दिया। वह किचन का दरवाज़ा खोलकर बाहर आई, हाथों में एक गिलास पानी लिए। "घर में सिगरेट मत पीया करो। पिताजी को पता चल जाए तो डाँट पड़ेगी।"

मैंने धुआँ छोड़ा और मुस्कुराया। "तू जानती है मैं पीता हूँ?"

"हाँ, सबको पता है। तुम अपने कमरे में भी पीते हो, मुझे महक आती है कभी-कभी," उसने कहा, हल्की नज़रों से मुझे देखते हुए।

"अच्छा। चल, तू भी पी ले एक कश," मैंने पैकेट उसकी तरफ बढ़ाया। "मन शांत हो जाता है।"

नेहा ने हिचकिचाया नहीं। उसने पैकेट से एक सिगरेट निकाली, अपने होठों पर रखी, और मेरे हाथ से लाइटर लेकर खुद ही जला लिया। उसने पहला कश अंदर खींचा — गहरा, तसल्ली से। फिर धुआँ बाहर छोड़ा, धीरे-धीरे, उंगलियों के बीच सिगरेट को पकड़े हुए।

मैं उसे देखता रह गया। जिस तरह वह सिगरेट पकड़ रही थी, जिस तरह उसके होंठ सिगरेट के फिल्टर को दबा रहे थे, जिस तरह वह धुआँ बाहर छोड़ रही थी—एक एक्सपर्ट की तरह। मुझे एहसास हो गया, वह सिर्फ आज नहीं, पहले भी पी चुकी थी।

"तू भी पीती है, है न?"

नेहा ने मुस्कुराते हुए दूसरा कश लिया। "हाँ भैया, कभी-कभी। दोस्तों के साथ बाहर होती हूँ तो पी लेती हूँ। बस घर पर नहीं पीती।"

मैंने उसकी तरफ एक कदम बढ़ाया, पास आते हुए। "तो अब से हम साथ पी सकते हैं। घर पर ही।"




उसकी आँखों में एक चमक आई। वह मुस्कुराई — वही शरारती मुस्कान। "तुम बहुत प्यारे और फ्रेंडली भाई हो, भैया।"

उसने अपने हाथ बढ़ाए और मेरे गालों को दोनों हाथों से पकड़कर हल्के से खिंचा — एक बचकानी हरकत, लेकिन उसके स्पर्श ने मेरे शरीर में करंट सा दौड़ा दिया। उसकी उँगलियाँ गर्म थीं, मुलायम।

मैंने मौका देखा। अपने हाथ से उसके गांड को एक हल्का सा थप्पड़ मारा — जैसे मज़ाक में, लेकिन जानबूझकर। उसका गांड सख्त और मुलायम दोनों था, शॉर्ट्स के कपड़े के नीचे गोल और तना हुआ।

"मुझे नहीं पता था मेरी बहन इतनी मॉडर्न है," मैंने कहा, "जो बड़े भाई के साथ सिगरेट शेयर करना चाहती है।"

नेहा ने अपने होंठों के बीच जीभ निकाली — उसे एक मज़ाकिया चेहरा बनाते हुए, आँखें थोड़ी बंद, जीभ बाहर, फिर वह हँसते हुए किचन की तरफ भाग गई। उसकी शॉर्ट्स में उसके गांड लहराते हुए, वह दृश्य मेरे दिमाग में बस गया।




मैंने सिगरेट खत्म की, बट को पानी की बोतल से बुझाया और फर्श पर पड़ी राख को साफ किया। फिर किचन में गया।

नेहा अब वहाँ थी — उसने एप्रन बाँध लिया था, बर्तन निकाल रही थी। "भैया, डिनर बनाने में मेरी मदद कर दो। तुम प्याज काट सकते हो?"

"हाँ, क्यों नहीं," मैंने कहा और चाकू-बोर्ड निकाल लिया।

हम साथ किचन में खड़े हो गए — मैं प्याज काट रहा था, वह गैस पर सब्ज़ी का तड़का लगा रही थी। बातचीत शुरू हुई — बॉलीवुड की नई फिल्मों से लेकर, दोस्तों की गॉसिप तक।




"कल पार्टी में क्या प्लान है?" मैंने पूछा, प्याज के छल्लों को पानी डालते हुए।



"सीमा ने कहा है, वह शायद यहाँ आएगी और हम साथ में पब जाएँगे। प्लान बदल सकता है, बदलेगा तो वह बता देगी", नेहा ने कहा।

नेहा ने आगे कहा, "भैया, आपके भी कोई गर्लफ्रेंड होगी। उसे भी क्यों नहीं बुलाते। मुझे अपनी होने वाली भाभी को देखने का मौका मिलेगा"।

मैंने कहा, "मेरे पास गर्लफ्रेंड बनाने का वक्त नहीं है, तुम जानते हो मैं ऑफिस के कामों में व्यस्त हूँ। वैसे तुम अपने दोस्तों के ग्रुप से कोई सेटअप क्यों नहीं करवा देती?"


वह मुस्कुराई और बोली, "मेरे भी ज्यादा दोस्त नहीं हैं। आपतो गर्लफ्रेंड के लिए बहुत बेकरार लग रहे हो"।

मैंने सिर्फ सिर हिलाया और शर्मानेका नाटक करते हुए बोला, "थोड़ा सा"।

हम चिढ़ाने लगे एक-दूसरे को — उसने मेरा प्याज वाला बोर्ड थोड़ा हिला दिया, मैंने उसके सिर पर हाथ रखकर बाल बिगाड़ दिए। वह चिल्लाई, "भैया! मेरे बाल देख!" और हँसने लगी।




मैंने उसका पेट सहलाया — गुदगुदी करने के लिए — और वह चीखते-चीखते हँसने लगी। "रुको भैया, अब मैं भी दूँगी!" उसने मेरी तरफ हाथ बढ़ाया और मेरी बगल में गुदगुदी की। मैं हँसते-हँसते पीछे हटा, लेकिन वह पीछे आ गई, गैस के पास खड़ी होकर।

थोड़ी देर तक हमारी गुदगुदी की लड़ाई चलती रही — उसकी हँसी, मेरी हँसी, किचन में गूँजती रही। अंत में मैंने उसे अपनी बाँहों में कस लिया — मज़ाकिया अंदाज में — उसकी पीठ को छाती से लगा कर। उसके बाल मेरी नाक से टकराए, उसकी शैम्पू की खुशबू ने मेरे दिमाग को भर दिया। मेरा लंड जाँघों के बीच सख्त हो गया, लेकिन मैंने खुद को संभाला।

"चल, खाना बना लेते हैं, पागल लड़की," मैंने कहा और उसे छोड़ दिया।




हमने डिनर बनाना खत्म किया — रोटी, सब्ज़ी, दाल। ताल में ताल मिलाकर, हँसते-खिलखिलाते। खाना तैयार था, मैं सिगरेट लाइट करने वाला था कि नीचे से आवाज़ आई — दरवाज़ा खुलने की आवाज़।



पिताजी भी आ गए।



मैंने सिगरेट और लाइटर वापस जेब में डाल दिए। नेहा ने मेरी तरफ देखा, आँखों में चेतावनी थी। हम चुप हो गए, अपने-अपने काम में लग गए।



डिनर टेबल पर पिताजी बैठे, मैं और नेहा सामने। खाना परोस दिया गया। पिताजी ने कुछ नहीं कहा — शुरू में चुपचाप खाते रहे। फिर बोले, " राज, तुझे कल थोड़ी जल्दी उठना पड़ेगा। मैं सुबह जल्दी घर से निकल रहा हूँ। तुझे मुझे सुबह 6 बजे तक स्टेशन छोड़ना पड़ेगा। तुम दोनों को एक-दूसरे का ध्यान रखना है। मेरे जानेके बाद जब भी घर से बाहर निकलो तो समय से वापस आना। वीकेंड पर पार्टी-वार्टी का चक्कर मत करना, शराब मत पीना। समझ गया?"

"जी पिताजी," मैंने कहा, रोटी तोड़ते हुए।

"और नेहा, तू भी अकेली घर पर बंद मत रहा कर। राज के साथ बाहर जा कभी-कभी।"

"हाँ पिताजी," नेहा ने कहा, आवाज़ में आज्ञाकारिता।

खाना खत्म होने के बाद पिताजी नीचे अपने कमरे में चले गए — सामान पैक करने के लिए। मैं और नेहा टेबल साफ करने लगे। बर्तन सिंक में रखते हुए हमने एक-दूसरे की तरफ देखा — एक चुप्पी, एक समझदारी भरी नज़र।

मैंने नेहा से पूछा, "बर्तन धोने में तुम्हारी मदद करूं?" उसने कहा, "रहने दो, मैं खुद कर लूंगी। अगर मेरी मदद करनी है तो तुम अपने कमरे में जाने से पहले किचनको झाड़ू लगादो।" यह कहकर वह बर्तन धोने लगी।

मैंने फर्श झाड़ू लगाया। फर्श झाड़ते हुए, मैंने सोने से पहले आखिरी बार उसके प्यारे और सेक्सी गांडको घूरा। झाड़ने के बाद, मैंने पूछा, "और कोई मदद चाहिए?" उसने कहा, "थैंक यू, भैया। गुड नाइट।" मैंने भी "गुड नाइट" कहा और अपने कमरे में आ गया।




मैंने अपना नाइट ड्रेस पहना और बिस्तर पर लेट गया। मैंने अपना मोबाइल खोला और नेहा के वीडियो स्क्रॉल करने लगा। उसके शरीर को छूने की लालच मुझे और उत्तेजित करने लगी। उसे टेक्स्ट मैसेज भेजने का प्रलोभन था, पर मैंने कंट्रोल किया। फिर, मैंने एक हिंदी डब्ड साउथ मूवी लगाई और देखने लगा। मूवी देखते-देखते मुझे कब नींद आ गई पता ही नहीं चला..

आँख खुली तो सुबह के पाँच बज रहे थे। नीचे से आवाज़ आ रही थी — पिताजी के कदमों की, सामान उठाने की। मैंने करवट बदली, फिर उठ बैठा। आज ही का दिन था जब पिताजी राजस्थान के टूर पर जा रहे थे।

मैंने शॉर्ट्स बदले, एक टी-शर्ट पहनी और नीचे गया। पिताजी के कमरे का दरवाज़ा खुला था — वह बैग में कपड़े रख रहे थे, चेहरे पर वही व्यस्तता भरी गंभीरता।

"पिताजी, मैं मदद कर देता हूँ," मैंने कहा और अंदर घुस गया।

"हाँ, वो शेविंग किट वाला बैग निकाल दो," उन्होंने कहा बिना मेरी तरफ देखे।

मैंने अलमारी से बैग निकाला, उसमें शेविंग किट, तौलिया, और कुछ ज़रूरी सामान रख दिया। तभी सीढ़ियों से हल्के कदमों की आवाज़ आई — नेहा नीचे आ रही थी। उसके बाल बिखरे हुए थे, नाइटी पहनी हुई थी — हल्के पीले रंग की ढीली नाइटी जो उसके घुटनों तक आती थी। उसके निप्पल कपड़े के नीचे हल्के उभरे हुए दिख रहे थे, सुबह की ठंड या शायद कुछ और वजह से।

"पिताजी, चाय बनाऊँ क्या जाने से पहले?" उसने नींद भरी आवाज़ में पूछा।

"हाँ बेटा, बना दो। बस जल्दी," पिताजी ने कहा, बैग का ज़िप बंद करते हुए।

नेहा किचन में चली गई। मैंने देखा — नाइटी में उसके गांड हर कदम पर हिलते थे, ढीले कपड़े के नीचे गोलाई साफ़ दिखती थी। मैंने अपनी नज़रें हटाईं और पिताजी की मदद करने में लग गया।

पाँच मिनट में नेहा तीन कप चाय लेकर लाउंज में आ गई। उसने नाइटी के ऊपर एक हल्का दुपट्टा डाल लिया था — शायद मेरी नज़रों को भाँपते हुए। या शायद पिताजी के सामने शर्म की वजह से।

हम तीनों ड्राइंगरूम में बैठ गए — पिताजी एक कुर्सी पर, मैं सोफे पर, नेहा फर्श पर बिछी चटाई पर। चाय की चुस्कियाँ, थोड़ी खामोशी।




"राज," पिताजी ने चाय का कप रखते हुए कहा, "घर और नेहा का ध्यान रखना। मैं तीन-चार दिन में वापस आऊँगा। बाहर जाओ तो वक़्त पर लौटना। कोई लापरवाही नहीं चाहिए।"

"जी पिताजी, आप फिक्र मत करो। सब ठीक रहेगा," मैंने कहा, आवाज़ में आत्मविश्वास।

नेहा ने मेरी तरफ देखा — उसकी आँखों में एक हल्की सी चमक थी। पिताजी के जाने के बाद का ख्याल शायद उसके दिमाग में भी था।

चाय खत्म हुई। पिताजी ने बैग उठाया, मैंने भी एक बैग उठाया। नेहा दरवाज़े तक आई — "पिताजी, अपना ख्याल रखना। जल्दी आना।"

"हाँ बेटा, तुम भी ध्यान रखना," पिताजी ने उसके सिर पर हाथ रखा और मुझसे बोले, "चलो, बस स्टॉप छोड़ दो।"

हम बाहर निकले। मैंने बाइक स्टार्ट की, पिताजी पीछे बैठ गए। बस स्टॉप ज़्यादा दूर नहीं था — पाँच मिनट की दूरी। बस आने में दस मिनट बाकी थे। हम बेंच पर बैठ गए।

"पिताजी, वहाँ अपनी हेल्थ का ध्यान रखना। ज़्यादा मेहनत मत करना," मैंने कहा।

"तू भी अपना ख्याल रख, राज। और हाँ, नेहा को अकेला मत छोड़ना। वह छोटी है, उसे गाइडेंस की ज़रूरत है," उन्होंने कहा, आँखों में वही पिता वाली चिंता।

"मैं समझ गया, पिताजी। आप निश्चिंत रहिए। घर की सारी ज़िम्मेदारी मेरी है।"

बस आई। पिताजी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, एक बार पीठ थपथपाई और बस में चढ़ गए। बस चल दी — मैं वहीं खड़ा रहा, जब तक बस मोड़ पर गायब नहीं हो गई।

घर लौटा तो नेहा किचन में थी। उसने कपड़े बदल लिए थे — अब उसने ढीली सलवार और एक ढीली कमीज़ पहन रखी थी, हल्के गुलाबी रंग की, जो उसके शरीर पर लटक रही थी लेकिन फिर भी उसके स्तनों के उभार को दबा रही थी।

"भैया, तुम अपने कमरे में आराम करो। मैं सुबह का खाना खुद बना लूँगी," उसने मुस्कुराते हुए कहा, हाथ में करछुल लिए।




"ठीक है, थक गया हूँ। बुलाना जब खाना तैयार हो," मैंने कहा और ऊपर चला गया।



अपने कमरे में आते ही मैंने पंखा चालू किया, बिस्तर पर पीठ के बल लेट गया। कुछ पल वहाँ पड़ा रहा — मेरी नज़रें छत पर टिक गईं। फिर फोन निकाला, इंस्टाग्राम खोला।



नेहा का अकाउंट खोला। वाह! रात भर में उस नए रील को हज़ारों व्यूज़ मिल गए थे। लाइक्स भी बढ़ गए थे — पाँच हज़ार से ऊपर। फॉलोअर्स भी दो सौ बढ़ गए थे। उसने वही हॉट रील डाली थी — जिसमें वह रेड ड्रेस में थी, कैमरे की तरफ देखते हुए, होठों को काटते हुए, बालों को हवा में लहराते हुए। मेरे दिमाग में वह दृश्य ताज़ा हो गया — जब उसने मुझे वह ड्रेस दिखाई थी, तंग और गहरी नेकलाइन के साथ।

मैंने देखा — उसके फिगर को, उसके होंठों को, उसकी आँखों को। हर फ्रेम में मैं उसे और अधिक चाहने लगा। मेरी पैंट में लंड सख्त हो गया — उसे देखते हुए, उसकी हर हरकत को देखते हुए। मैंने जाँघों को दबाया, गहरी साँस ली और मैसेज टाइप करने का समय आ गया।




आदित्य के अकाउंट से मैंने लिखा:

"गुड मोर्निंग, श्रीया! 😊 बहुत बहुत बधाई! आज सुबह देखा तो हैरान रह गया — हज़ारों व्यूज़, पाँच हज़ार से ऊपर लाइक्स, और फॉलोअर्स भी बढ़ गए! मेरा सुझाव काम कर गया, है न? ड्रेस ने कमाल कर दिया — तुम बहुत खूबसूरत लग रही थी।"

कुछ ही मिनटों में जवाब आया —“हैलो आदित्य! हाँ, वाक़ई बहुत अच्छा रिस्पॉन्स आया है। थैंक यू सो मच फॉर योर सजेशन। तुम्हारी बात सही थी — थोड़ा रिवीलिंग ड्रेस ने चीज़ें बदल दीं। 😊"

वह रसोई से खाना बनाते हुए जवाब दे रही थी। और, मैं नीचे के कमरे से उसके साथ फ़्लर्ट कर रहा था। मैंने मुस्कुराते हुए दूसरा मैसेज टाइप किया:

"मैंने तो सिर्फ सुझाव दिया था, सारा क्रेडिट तुम्हारी ब्यूटी को जाता है। तुम्हारा चेहरा, तुम्हारी आँखें, तुम्हारी मुस्कान — सब कुछ परफेक्ट है। तुम्हारा बॉयफ्रेंड बहुत लकी होगा अगर वह तुम्हारे करीब है।"

श्रीया : "बॉयफ्रेंड? नहीं है कोई। मैं सिंगल हूँ। अभी तक कोई खास नहीं है। 😅"

मेरे दिमाग में एक और आइडिया आया — उसकी ज़िंदगी के बारे में और पूछने का।

"वाक़ई? तुम जैसी लड़की के लिए यह विश्वास करना मुश्किल है। वैसे तुम्हारी फैमिली को तुम्हारे रील्स के बारे में पता है? तुम घर पर कैसे बनाती हो ये रील्स?"

श्रीया :"मेरे पिताजी और एक बड़ा भाई है। वे दोनों सोशल मीडिया पर ज़्यादा एक्टिव नहीं हैं। पिताजी ऑफिस में व्यस्त रहते हैं, भैया भी अपने काम में बिज़ी रहते हैं। उन्हें नहीं पता कि मैं क्या बनाती हूँ। बस मज़े के लिए बनाती हूँ।"

मैंने जवाब दिया: "अगर तुम्हारे भाई को पता चल जाए तब भी वह नाराज़ नहीं होगा। तुम्हारी ब्यूटी को दिखाने में कोई बुराई नहीं है। इसके उलट, उसे गर्व होगा कि उसकी इतनी प्यारी और खूबसूरत बहन है।"

श्रीया: "मेरा भाई मेरा बेस्ट फ्रेंड भी है। हम लगभग सब कुछ शेयर करते हैं। वह बहुत केयरिंग है। ❤️"

मैंने गहरी साँस ली। अब थोड़ा रिस्क लेने का समय आ गया था। उँगलियाँ थोड़ी रुकीं, फिर टाइप किया:"सब कुछ शेयर करते हो? मतलब एकदम सब कुछ? 😉"




मैंने भेज दिया। फोन हाथ में पकड़े, नज़रें स्क्रीन पर टिकी। वह समझेगी या नहीं? मेरा डबल मीनिंग सेंटेंस — क्या वह इसका मतलब समझ पाई?

श्रीया:"😂😂"

सिर्फ Laugh Out Loud इमोजी। कुछ नहीं। न कोई कन्फर्मेशन, न कोई इनकार — बस हँसी। मैं हैरान था — क्या वह समझ गई और बस टाल दिया? या समझी ही नहीं?

तीस सेकंड बाद एक और मैसेज आया:

श्रीया:"अभी मुझे जाना होगा। बहुत लंबा दिन है। बाद में बात करते हैं। बाय!"

मैंने स्क्रीन देखी। उसकी बात का जवाब देना चाहता था, लेकिन कुछ कहा नहीं। बस फोन नीचे रख दिया और छत की तरफ देखने लगा।

एक तरफ मैं उसका भाई था, जिसने पापा को वादा किया था कि वह उसकी देखभाल करेगा। दूसरी तरफ 'आदित्य' था, जो उसकी रील्स पर फिदा हो रहा था और अब उससे डबल मीनिंग बातें कर रहा था।

मैंने फोन नीचे रखा, हाथ सिर के नीचे रखकर छत की तरफ देखने लगा। वह आज पूरे दिन घर पर थी। पिताजी नहीं थे। सिर्फ हम दोनों।

एक गहरी साँस ली। लंड अब भी सख्त था, जाँघों के बीच दबा हुआ। मैंने अपने हाथ को पेट पर रखा, उसे नीचे सरकाते हुए — लेकिन तभी नीचे से आवाज़ आई।




"भैया! खाना तैयार है! आ जाओ!"

नेहा की आवाज़ — मीठी, साफ़, बिना किसी शक के।

मैं उठ बैठा। लंड को पैंट के अंदर एडजस्ट किया, टी-शर्ट ठीक की, और नीचे की तरफ बढ़ गया — दिमाग में हज़ारों ख़्याल, आँखों में एक ही दृश्य: उसकी बॉडी, उसके होंठ, और आज का पूरा दिन — बस हम दोनों, घर पर, अकेले।
Zabardast update 😀
 

Raaj Sinha

Raaz
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अपडेट : २४

आँख खुली तो कमरे में सन्नाटा था। पर्दों से छनकर आती हल्की धूप, हवा में बिखरी हुई उसकी खुशबू—वही शैम्पू, वही रात की रहस्यमयी गंध जो अब भी मेरे तकिये पर बनी हुई थी। मैंने करवट बदली और बगल में देखा—खाली। नेहा जा चुकी थी।
Raj-Waking-UP.jpg


पेशाब की तीव्र इच्छा ने मेरी नींद तोड़ी, लेकिन मेरा मन अभी भी उसी जगह अटका था जहाँ कल रात हम दोनों ने सारी मर्यादाएं लांघी थीं। थोड़ी सी शराब, ढेर सारी दबी हुई हसरत और फिर वह विस्फोट। मैंने नेहा के शरीर के हर कर्व, उसकी हर आह और उसकी उन भीगी आँखों को महसूस किया था जिन्होंने मुझे पूरी तरह अपना बना लिया था। वह कमरे में नहीं थी। उसने कल रात ही कहा था कि वह देर तक सोना चाहती है, इसलिए मैं उसके कमरे की ओर नहीं गया, हालांकि मेरा शरीर अभी भी उसकी छुअन के लिए तड़प रहा था।

बाथरूम में जाते हुए मैं सोच रहा था कि वह क्या सोच रही होगी? क्या वह इस गुनाह पर शर्मिंदा है, या वह भी मेरी तरह उस सुख की लत में पड़ चुकी है? मैंने अपना पेट साफ किया, ब्रश किया, चेहरा धोया, लेकिन आईने में खुद को देखते हुए मुझे अपनी आँखों में एक अजीब सी चमक दिखी—एक शिकारी की चमक, जो अब अपनी बहन के शरीर का स्वाद चख चुका था।

कमरे में लौटकर मैंने फ़ोन उठाया। आदित्या अकाउंटसे इंस्टाग्राम खोला। उसने हाल में अपने अकाउंट पर कोई रील या फोटो पोस्ट नहीं की थी। मैंने सीधे मैसेज बॉक्स खोला और लिखा—"Hello"।

कुछ ही सेकंड में जवाब आया। उसकी उंगलियां शायद फोन पर ही थीं।

"Good morning, Aaditya!"

मैंने उससे पूछा, "कल रात का आउटिंग कैसा रहा?"

उसने जवाब दिया, "बहुत मज़ा आया!"

मैं मुस्कुराया। मुझे पता था कि वह किस 'मज़े' की बात कर रही है। मैंने उसे थोड़ा छेड़ना चाहा और पूछा, "अपने बॉयफ्रेंड के साथ गई थी क्या?"

उसने झूठ बोला, "हाँ, बॉयफ्रेंड और दोस्तों के साथ गई थी।"

मैं बिस्तर पर लेटा उसकी इस मासूमियत और झूठ पर हंस रहा था। वह झूठ बोल रही थी, और मैं उस झूठ का आनंद ले रहा था क्योंकि हकीकत तो मेरे सामने थी—उसकी देह की गर्मी अभी भी मेरी यादों में ताज़ा थी।

मैंने फिर पूछा, "और फिर? नाइट आउट के बाद कुछ हुआ क्या?"

उसने एक और झूठ गढ़ा। उसने लिखा, "अरे, कुछ नहीं हुआ, बस मस्ती, धेर सारी मस्ती, मैं सोच रही हूँ कि अपना अकाउंट डिलीट कर दूँ, क्योंकि मुझे अब सच्चा प्यार मिल गया है और मुझे अब अकेलापन महसूस नहीं होता। गुडबाय, अगर समय मिला तो बात करूँगी। मुझे अभी बाथरूम जाना है और शावर भी लेना है।" बस इतना कहकर वह ऑफ़लाइन हो गई।

शायद वह अपने बिस्तर से उठकर नहाने जा रही थी। मैंने सोचा उसकी मदद करूँ नाश्ता बनाने में।

मैं रसोई में गया। फ्रिज खोला—दूध नहीं। पापा आमतौर पर सुबह की वॉक के बाद दूध लाते हैं । यानी आज मुझे ही जाना पड़ेगा। मैंने जल्दी से जेब में पर्स रखे, चप्पल पहनी और नीचे सीढ़ियाँ उतरने लगा।

जैसे ही मैं गलियारे से गुजरा, वह अपने कमरे के दरवाजे पर बाहर निकलती मिली।

मेरा दिल एक पल के लिए रुका।

उसने अभी भी वही रात वाली नाइटी पहनी हुई थी—हल्की, छोटी, जो उसकी जांघों को मुश्किल से ढक रही थी। एक कंधे पर मुलायम तौलिया था, नहाने जानेके लिए।

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उसकी नज़र मुझसे टकराई। और उसी पल वह शरमा गई।

यह वही नेहा नहीं थी, जो कुछ मिनट पहले मैसेज में इतनी बिंदास थी। यह वही नेहा थी, जिसने कल रात अपनी नंगा बदन मेरी बाँहों में अपनी सुम्पी थी—और अब सुबह होते ही वह इस तरह सिकुड़कर रह गई थी, जैसे पिछली रात का बसेरा सिर्फ़ सपना था।

उसने नीचे देखा। गालों पर हल्की लाली, एक सिकुड़ती हुई होंठों वाली मुस्कान—वह मासूमियत में भी शरारत थी। शरारत में भी इकरार। उसके होंठ एक बार हिले, मानो कुछ कहना चाहते हों, पर बोल न सके। उसका हाथ तौलिये को ज़रूरत से ज़्यादा कस कर पकड़े हुए था।

"गुड मॉर्निंग," मैंने अपनी आवाज़ को सामान्य बनाते हुए कहा।

"गुड मॉर्निंग, भैया," उसके होंठ फुसफुसाए। उसने आँखें ऊपर उठाईं, पर तुरंत नीचे कर लीं। जैसे उसे डर था कि मेरी आँखें उसकी नाइटी के अंदर तक देख लेंगी। और सच कहूँ तो, मैं देख रहा था।

अजीब खामोशी पल भर के लिए छाई। वह खामोशी जिसमें रात का हर शब्द, हर आह, हर छुआव गूँज रहा था। मैंने खुद को संभाला और बोला:

"मैं दुकान जा रहा हूँ दूध लेने, चाय के लिए। कुछ चाहिए तुम्हें साथ में?" मैंने धीरे से पूछा, मेरी आवाज में एक हल्की सी खनक थी।

उसने धीरे से अपनी आँखें मिलाईं। इस बार उसमें थोड़ी हिम्मत थी। उसने अपने होठों को काटा, जैसे कुछ सोच रही हो। फिर एक हल्की मुस्कान के साथ बोली:

"अगर दुकान पर आलू के पकौड़े दिखें तो ले आना।"

उसकी आवाज़ में नरमी थी, मगर आँखों में एक कोमल चुनौती। जैसे वह जानती हो कि मैं उसे मना नहीं कर पाऊँगा। और मैं नहीं करना चाहता था।

"पक्का," मेरी आवाज़ में हल्की मुस्कान थी। "मैं हर दुकान देखूँगा। जब तक नहीं मिलेंगे, वापस नहीं आऊँगा।"

उसके चेहरे पर एक हल्की सी लाली और बढ़ गई। उसने ज़मीन पर देखा, फिर एक नज़र मेरी तरफ। उस नज़र में कुछ था—कभी झूठ न बोलने वाली चमक। फिर वह धीरे से कमरे के अंदर मुड़ी, और दरवाज़े को आधा बंद करने से पहले उसने इतना कहा:

"जल्दी आना, भैया। "

मैं तेजी से दुकान की ओर बढ़ा, लेकिन मेरा दिमाग अभी भी उसी दरवाजे पर टिका था। मैं सोच रहा था कि उसके मन में क्या चल रहा है। क्या वह इस नए रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहती है? क्या वह मुझे फिर से अपने शरीर के उन गुप्त कोनों को तलाशने की इजाजत देगी, या वह इसे सिर्फ एक बार की गलती कहकर खत्म कर देगी?

जब मैं पकोड़े लेकर वापस घर की ओर मुड़ रहा था, तो मेरे चेहरे पर एक जीत वाली मुस्कान थी।

मैं दूध और गरमा-गरम आलू के पराठे लेकर घर लौटा। जैसे ही मैं ऊपर आया, मेरी नज़र बाथरूम के दरवाज़े पर पड़ी। नेहा अभी-अभी शावर लेकर निकली थी। उसके बाल गीले थे। उसने अपने नग्न शरीर को तौलिये से ढका हुआ था। तौलिया उसके सीने के चारों ओर लिपटा हुआ था, जिससे उसकी छाती की दरार खुली हुई दिख रही थी और तौलिया उसकी जांघों का आधा हिस्सा ही ढक पा रहा था, जिससे उसकी दूधिया सफेद नर्म जांघें बेपर्दा हो रही थीं।
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उसकी आँखों में वही शरारत थी, वही एक अनकहा सवाल। मैंने अपनी धड़कनों को काबू में किया और थोड़ा औपचारिक बनते हुए कहा, "मैं दूध और पराठे सीढ़ियों पर रख रहा हूँ। जब तू ऊपर किचन में जाए, तो ले लेना।"

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उसने कुछ कहा नहीं, बस धीरे से अपना सिर हिलाया। उसकी वह खामोश सहमति भी मुझे उत्तेजित कर रही थी। मैं अपना तौलिया उठाकर बाथरूम में चला गया। शरीर की गंदगी साफ करते हुए भी मेरा दिमाग उसी एक छवि पर अटका था—नेहा की वह भीगी हुई मुस्कान। मैंने ठंडे पानी की फुहारों के नीचे खुद को शांत करने की कोशिश की, लेकिन यादें आग की तरह दहक रही थीं।
 
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Raaj Sinha

Raaz
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अपडेट : २५

ट्रैक सलवार और ग्रे टी-शर्ट पहनकर जब मैं ऊपर किचन की तरफ बढ़ा।

नेहा गैस के चूल्हे के सामने खड़ी थी। चाय की केतली में उबलती चाय से भाप उठ रही थी, ओवन के ऊपर। उसने पीले रंग की कुर्ती पहनी थी, जिसमें बगल में एक गहरा स्लिट (कट) था। वह सब्जियाँ—आलू, मूली और गोभी—काट चुकी थी । जैसे ही मैं उसके करीब पहुँचा, मेरी नज़र उस दरार पर पड़ी। वह सफेद टाइट लेगिंग्स में लिपटी उसकी सुडौल जांघें और उभरे हुए गांड साफ़ दिख रहे थे। वह हर बार जब हिलती, लेगिंग्स उसके शरीर के कर्व्स को और भी उभार देती।


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उसके गीले बाल अभी भी तौलिये में लिपटे थे, और कानों में बड़े हूप रिंग्स थे, जो उसकी खूबसूरती में एक अलग ही आकर्षण जोड़ रहे थे। वह किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी, और उसकी यह सादगी ही उसे और भी हॉट बना रही थी।

"चाय बन गई?" मैंने फुसफुसाते हुए पूछा, मेरा हाथ अनजाने में उसकी कमर के ठीक पीछे वाले काउंटर पर टिका था।

नेहा ने धीरे से अपनी नजरें उठाईं। उसकी आँखों में एक अजीब सी कशमकश थी—शर्म, डर और एक दबी हुई प्यास। उसने अपनी पलकें झुका लीं और बहुत धीमी आवाज में कहा, "जी... बस दो मिनट, भइया।"



मैं चुपके से उसके पीछे गया और धीमी आवाज़ में पूछा, "इतनी जल्दी उठ गई? कल रात तो तू कह रही थी कि देर तक सोना चाहती है... क्या नींद पूरी हुई तेरी?"

वह धीरे से मुस्कुराई, बिना मेरी तरफ देखे, लेकिन उसकी मुस्कान में एक गहरा निमंत्रण था। "सोचा तो था कि देर तक सोऊँगी," उसने अपनी आवाज़ में एक हल्की सी खनक लाते हुए कहा, "पर फिर ख्याल आया कि आपको समय पर चाय और खानाभी तो तयारी करनी है। आखिर आपकी सेहत का ख्याल रखना मेरी ज़िम्मेदारी है ना?"

मैंने एक शरारती मुस्कान के साथ उसके करीब होते हुए पूछा, "अच्छा? तो तूने मेरी खातिर अपनी प्यारी सी नींद कुर्बान कर दी?"

उसने एक धीमी, गहरी "हम्म..." की आवाज़ निकाली, जो किसी संगीत की तरह मेरे कानों में गूँजी। वह आवाज़ सिर्फ़ हाँ नहीं थी, वह एक इशारा था।

अब मैं खुद को रोक नहीं पाया। मैं उसके बिल्कुल पीछे जा खड़ा हुआ। मैंने अपनी बाँहें उसके पेट के चारों ओर लपेट लीं और अपनी ठुड्डी (chin) उसके मुलायम कंधे पर टिका दी। उसकी त्वचा की गर्माहट और वह हल्की सी खुशबू मेरे होश उड़ा रही थी।


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"मैं दुनिया का सबसे खुशनसीब भाई हूँ," मैंने उसकी गर्दन के पास फुसफुसाते हुए कहा, "जिसके पास इतनी खूबसूरत बहन है, जो उसका इतना ख्याल रखती है।"

नेहा ने हल्के से अपनी कमर मटकाई, जिससे उसकी लेगिंग्स और भी तन गई। उसने खिलखिलाते हुए कहा, "उफ़! सुबह-सुबह मस्का मारना शुरू कर दिया आपने? रहने दीजिये, भैया।"

मैंने अपनी पकड़ थोड़ी और मजबूत की और उसकी गर्दन के पास अपनी साँसें छोड़ते हुए कहा, "मैं मस्का नहीं लगा रहा, नेहा। मैं सच कह रहा हूँ। मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूँ... तेरा ख्याल रखता हूँ, और मैं वादा करता हूँ कि तेरी हर ज़रूरत को पूरा करूँगा।"

'हर ज़रूरत' शब्द बोलते समय मेरी आवाज़ में एक भारीपन था, एक ऐसी भूख जो सिर्फ़ उसे पाकर शांत हो सकती थी।

जैसे ही यह शब्द उसके कानों में गया, उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने अपनी आँखें मूँद लीं। उसी पल, मैंने अपने हाथ ऊपर सरकाए और उसके भारी, उभरे हुए दूधों पर रख दिए। मैंने उन्हें धीरे से, लेकिन मजबूती से अपने हाथों में भींचा। उसकी कुर्ती के कपड़े के नीचे उसकी गर्माहट और दूधों की वह नरमी मेरे हाथों में महसूस हो रही थी।
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नेहा के मुँह से एक दबी हुई आह निकली। उसने अपना सिर पीछे की ओर झुकाया, जिससे उसकी गर्दन पूरी तरह खुल गई। मैंने बिना देर किए, उसके गले के एक तरफ एक गहरा, एक प्यारी सी किस किया।

उसकी त्वचा रेशम की तरह मुलायम थी और मेरा होंठ उसकी गर्दन की नसों की धड़कन को महसूस कर सकता था। वह काँप रही थी, लेकिन उसने खुद को मुझसे दूर नहीं किया। बल्कि, उसने अपने हाथों से कड़ाही को पकड़े हुए अपनी कमर को थोड़ा और मेरे करीब धकेल दिया, जैसे वह मुझे और भी ज़्यादा महसूस करना चाहती हो।

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"भैया..." उसने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी आवाज़ में अब समर्पण और हवस का मिश्रण था।

मैंने उसके दूधों को और ज़ोर से दबाया और उसकी गर्दन पर अपनी ज़ुबान फेरी। किचन की वह गर्मी अब चूल्हे की आग से नहीं, बल्कि हमारे बीच की उस तपिश से बढ़ रही थी जिसे अब और छिपाया नहीं जा सकता था।

"भैया... क्या कर रहे हैं आप..." उसने धीमी आवाज में कहा, लेकिन उसकी सांसें तेज हो रही थीं।
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मेरे हाथ उसकी कुर्ती के ऊपर से उसके दूधों को सहला रहे थे। वो नरम थे, भारी, और मेरी हथेलियों में पूरी तरह समा रहे थे। मैंने उन्हें निचोड़ा, दबाया। नहा की साँसें तेज़ हो गईं।

"भैया... मत करो..." उसने कहा, पर उसकी आवाज़ में कोई रोक नहीं थी।

आह... सस्स्स्... भैया... छोड़िए ना... आह... कल रात जो हुआ वो एक गलती थी... प्लीज... दोबारा नहीं..." वह शब्दों से तो मना कर रही थी, लेकिन उसके शरीर की भाषा कुछ और ही कह रही थी। वो अपनी गांड को मेरे उभरे हुए लंड पर रगड़ रही थी, घुमा रही थी।

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"नेहा..." मैंने उसके कान में फुसफुसाया, मेरी आवाज़ में काँप था। "कल रात गलती लग रही थी, है ना? तो आज रात हम कोई और बहाना ढूँढ लेंगे..."

"भैया!" वो बोली, पर उसकी आवाज़ में हँसी थी, और उसकी गांड मेरी लंड पर और ज़ोर से दब गई। "आप तो... आपने तो... आह-ओउच..."

मैंने उसके दूधों को और ज़ोर से दबाया। कुर्ती के कपड़े के नीचे से मेरे नाखून उसकी चूचुकों पर एक झटके से फेर दिए। उसका शरीर झुलस गया—उसकी रीढ़ की हड्डी सख्त हो गई, उसके घुटने ज़रा से मुड़े, और उसकी गांड मेरी लंड पर इस तरह घूमने लगी जैसे वो मेरे उभार को काटने की कोशिश कर रही हो।


"औच... भैया... नहीं... अब तो रुको..." उसने भारी साँसों के बीच कहा। "ऐसे नहीं... सुबह-सुबह... अगर किसी ने..."

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मैंने उसकी कुर्ती के स्लिट से हाथ अंदर डाला। उसकी लेगिंग्स की टाइट सतह पर मेरी उँगलियाँ उसकी जाँघों के ऊपर चढ़ीं। वो मुलायम थीं, नर्म थीं, जैसे गरम रेत पर लेटना। मेरी उंगलियाँ उसकी जाँघ की भीतरी सतह पर बढ़ीं.

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तभी अचानक, ओवन के पास रखे उसके फोन की स्क्रीन जल उठी। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था— 'पापा'।


हम दोनों जैसे बिजली के झटके से अलग हुए। नेहा ने तुरंत अपनी उंगली अपने होंठों पर रखी, मुझे चुप रहने का इशारा किया। उसकी सांसें अभी भी फूल रही थीं, चेहरा लाल था और आंखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने जल्दी से पानी की एक बोतल उठाई, एक घूंट पिया ताकि उसकी आवाज सामान्य हो सके, और कॉल रिसीव किया।


"हेलो पापा," उसने अपनी आवाज को जितना हो सके उतना स्थिर रखते हुए कहा।
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उसकी आवाज़ में अब वो तरीके से थी—मासूम, इत्मीनान से, जैसे वो बस बेफिक्र सुबह बिता रही हो। वह अपना कपड़ा ठीक करते हुए बोली, "हाँ पापा। हाँ, जी... मैं ठीक हूँ।"


वो मेरी तरफ़ देखी—उसकी आँखें मुझसे कह रही थीं—*स्थिति सँभलो... प्लीज़... उसके होंठ काँप रहे थे पर आवाज़ नहीं। "हाँ जी... भैया भी उठ चुके हैं। वो यहीं किचन में हैं, चाय पीने वाले हैं..."

मैं पास ही किचन की मेज वाली कुर्सी पर बैठ गया, अपनी उत्तेजना को दबाते हुए उसे देख रहा था। वह पापा से बात कर रही थी, "जी...जी..हूँ... हूँ... जी पापा।" वह उनकी राजस्थान यात्रा के बारे में पूछ रही थी। उसकी नजरें बीच-बीच में मेरी तरफ आ रही थीं, जिनमें एक चुनौती और एक शरारत थी।

"पापा, आप कैसे हैं? हाँ... जी... राजस्थान में मौसम कैसा है वहाँ? हूँ... हूँ... हाँ जी, ध्यान रखिए। और पापा..." उसकी आवाज़ में हल्का सा सख्ती आ गया, "...आप शराब ज़्यादा मत पीना, ठीक है? वो बताइए ना, डॉक्टर ने भी तो मना किया है। हूँ... हूँ..."

उसने दो कप चाय बनाई और एक कप मेरी तरफ बढ़ाते हुए पापा को सलाह दे रही थी कि वे अपनी सेहत का ध्यान रखें और ज्यादा ड्रिंक ना पिएं। फिर उसने फोन मेरी तरफ बढ़ाया, "पापा आपसे बात करना चाहते हैं।"

"जी पापा..." मैंने फोन उठाया।

"राज, बेटा... मैं दो दिन बाद वापस आ रहा हूँ। सुन—नहा को शाम को अकेला मत छोड़ना। तुम्हें पता है, वो थोड़ी डरती है। घर का भी ध्यान रखना। किसी से कोई दिक्कत हो, तो बताना।"

"जी पापा, घबराइए मत। मैं उसका पूरा ख्याल रखूँगा..." मैंने कहा, और उस पल मेरी नज़रें नहा पर टिकी थीं। वो चाय के कप में देख रही थी, पर उसकी आँखों की कोर मेरी तरफ़ थी। "...घर भी, और घर के अंदर जो भी है... मेरी ज़िम्मेदारी है। आप बेफिक्र रहिए।"

"ठीक है। और जब बस पहुँचने वाली हो तो मैं फोन कर दूँगा।"

"जी, मैं पहुँच जाऊँगा।"

"अच्छा बेटा, ख्याल रखना अपना भी।" कहकर पापा ने फोन काट दिया।

किचन में फिर से वही भारी सन्नाटा छा गया।

मैंने उसका हाथ फिर से पकड़ा और उसे अपनी ओर खींचते हुए कहा, "चाय पीने से पहले मुझे तुम्हारे इन रसीले होंठों का स्वाद चाहिए नेहा। बस एक बार..."

उसने अपनी उंगली मेरे होंठों पर रख दी, जिससे मेरी सांसें थम गईं। उसने अपनी नजरें मेरी आंखों में गड़ा दीं। वह दुविधा में लग रही थी—एक तरफ वो डर कि हम क्या कर रहे हैं, और दूसरी तरफ कल रात का वो आनंद जो उसकी आंखों में साफ दिख रहा था।

"भैया... प्लीज़। अभी नहीं।"

"क्यों?"

"कंट्रोल कीजिए खुद को, भैया," उसने धीरे से कहा, उसके चेहरे पर एक हल्की, कामुक मुस्कान थी। "अभी सुबह ही है। देखिए कितने सारे काम हैं। मुझे नाश्ता बनाना है, कपड़े धोने हैं... घर के इतने सारे काम पड़े हैं।"

"तो मैं तुम्हारी मदद करूँ?"

"नहीं। मैं अकेले ही कर लूँगी। बस... आप प्लीज़ मुझे समय दो।"

"कल रात... भैया," उसने धीमे से कहा। मैंने महसूस किया उसका शरीर मेरी बाँहों में हल्का सा काँपा। "वो सब गलत था।"


मैंने उसे और पास खींच लिया। उसकी गर्दन पर मेरे होंठ पहुँचे — नरम, हल्के, बिना दबाव के। सिर्फ़ एक निशान सा। उसकी साँस रुक गई।

"गलत क्यों था?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ इतनी धीमी थी कि सिर्फ़ वो ही सुन पा रही थी। "तुम्हें क्या लगता है — कल रात जो हुआ, वो शराब का नशा था?"

वो चुप रही। उसका हाथ अब भी मेरे हाथ पर ही था — उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों में फँसी हुईं।

वो मुड़ी। धीरे से, मेरी बाँहों से निकलकर उसने अपना चेहरा मेरी तरफ़ किया। उसकी आँखें नम थीं, पर उनमें सिर्फ़ पानी नहीं था — दर्द, उलझन, और कुछ ऐसा जो वो खुद नहीं समझ पा रही थी। उसने मेरी आँखों में देखा। उस रोशनी में उसका चेहरा इतना मासूम लग रहा था कि मेरा दिल पसीज गया।

"भैया, कल रात हम दोनों ने बहुत ग़लत किया," उसकी आवाज़ रुँध गई। "हम पीकर बहक गए थे। हमें... शराब ने कुछ ऐसा कर दिया जो हमें नहीं करना चाहिए था। ये सब... ये रिश्ता हमारे बीच कभी कुछ और नहीं हो सकता। ये बात... दोबारा कभी नहीं होनी चाहिए।"

"नेहा," मैंने कहा। सिर्फ़ उसका नाम। एक बार। फिर एक पल की चुप्पी। उसकी आँखों में सवाल था, इंतज़ार था। "कल रात जो हुआ, वो शराब नहीं थी। वो नशा नहीं था।"

उसका चेहरा हिला। उसने मुँह खोलकर कुछ कहना चाहा, पर मैंने उसे बोलने नहीं दिया।

"तुमने कभी सोचा है," मैंने धीमे से कहा, उसके होंठों से बस एक उँगली दूर रुककर, "कि कल रात सिर्फ़ इसलिए हुआ क्योंकि शराब ने वो रास्ता खोल दिया जो हम दोनों बहुत पहले से तलाश रहे थे?"

उसकी साँसों की रफ़्तार बदल गई। उसकी आँखों में कुछ छलका — इनकार, और उसके नीचे एक और सच्चाई, जो वो जानती थी।

नेहा," मैंने फुसफुसाया, "शराब बहाना थी। हम दोनों ने उस शराब को बहाना बनाया। पर आज सुबह मैं शांत हूँ। तुम भी शांत हो। कोई बहाना नहीं है। और फिर भी मैं यहाँ खड़ा हूँ, तुम्हारी पीठ पर साँसें ले रहा हूँ, तुम्हें चाहते हुए। अगर कल रात प्यार नहीं था, तो ये प्यार क्या है?"

"पर भैया," उसकी आवाज़ अब काँपती नहीं थी। धीमी, गहरी, हिचकती हुई — पर पहले से ज़्यादा मज़बूत। "लोग क्या कहेंगे? समाज क्या कहेगा?"

मैंने उसका चेहरा उठाया। उसकी आँखों में देखा — और उन आँखों में मैंने वही देखा जो मैं खुद रोज़ आईने में देखता था। एक चाहत जो पाप से ज़्यादा ताकतवर थी, जो समाज से नहीं डरती थी।

"समाज तो बहुत कुछ कहता है," मैंने उसके माथे पर हल्की चूम ली, "पर क्या तुम्हें लगता है, मैं अपनी ज़िन्दगी का सबसे गहरा रिश्ता समाज के डर से छोड़ दूँगा? तुम मेरी बहन हो — ये रिश्ता मैं कभी नहीं खोता। पर तुम उससे बढ़कर हो। तुम मेरी नेहा हो। मेरी ज़िन्दगी की सबसे खूबसूरत चीज़ हो। और कल रात मैंने जो महसूस किया — वो कभी गलत नहीं हो सकता, क्योंकि वो मेरे दिल से आया था। शराब से नहीं।"

उसने धीरे से मेरा हाथ हटाया और मेरी आंखों में देखते हुए बहुत ही धीमे स्वर में कहा, "आप थोड़ा समय लीजिए। ठंडे दिमाग से सोचिए कि क्या यह सब सही है।"
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उसकी आवाज में एक ऐसा नशा था जिसने मेरे शरीर के निचले हिस्से में हलचल मचा दी। वह 'हार्ड टू गेट' खेल रही थी, लेकिन उसके शब्द मुझे पूरी तरह से नग्न कर रहे थे। वह मुझे मना नहीं कर रही थी, बल्कि वह मुझे और ज्यादा भूखा बना रही थी।

मैंने एक गहरी सांस ली और पीछे हट गया। मैंने एक कुटिल मुस्कान के साथ उसकी आंखों में देखा।

"ठीक है नेहा। मैं तुम्हें समय देता हूँ। और खुद को भी," मैंने धीमी आवाज में कहा।

"तो आप... आप इस पर सोचो। पूरे दिन सोचो। रात को सोने से पहले बताना। अगर आपको सच में लगता है कि ये ठीक है, कि हम ये कर सकते हैं... तो में तैयार हूँ। हर उस चीज़ के लिए जो मेरे प्यारे भैया चाहेंगे।"

उसने ये कहा तो मेरे पेट में बिजली सी दौड़ गई। "हर उस चीज़ के लिए" — उसके शब्द मेरे दिमाग़ में गूँजे। वह खेल खेल रही थी। मुझे पता था। वह मुझे फँसा रही थी। लेकिन मैं फँसना चाहता था।

मैंने उसका चेहरा पकड़कर उसे अपनी ओर उठाया।

"ठीक है। मैं सोचूँगा। पूरे दिन। पर आज रात... सिर्फ़ बताऊँगा नहीं। दिखाऊँगा भी।"

उसकी आँखों में चमक आ गई। वह न जाने कहाँ खो गई। फिर उसने अपना चेहरा मेरे हाथ से हल्के से छुड़ाया और चूल्हे की तरफ़ मुड़ गई।

"चाय पी लो, भैया। ठंडी हो जाएगी।"

मैंने तय कर लिया था। मैं अभी जल्दबाजी नहीं करूँगा। मैं इस तनाव को और बढ़ने दूंगा। मैं भी उसे पूरे दिन तड़पाऊंगा, उसकी हर हरकत पर नजर रखूंगा और उसे फिरसे ऐसा सिडुस करूँगा की वह खुद अपना नंगा बदन मुझे सौपने पर मजबूर होगी।


मैंने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा, "चाय के साथ एक सिगरेट हो जाये?"

उसने पहले तो नखरे दिखाए, "इतनी सुबह सिगरेट? मुझे पसंद नहीं है।"

लेकिन मेरी जिद और मेरी नजरों के दबाव के आगे वह हार गई।

हम दोनों छत पर गए-आलू पकोड़े और चायके साथ। सुबह की हल्की ठंडक थी। मैंने सिगरेट जलाई और उसकी तरफ बढ़ाया। उसने मना कर दिया कि वह पूरी नहीं पिएगी, बस एक-दो कश लेगी। जब उसने सिगरेट अपने होंठों से लगाई और धुंआ छोड़ा, तो वह दृश्य इतना कामुक था कि मैं अपनी नजरें नहीं हटा पाया।

जब वह एक हातमें सिगरेट रखकर, दूसरी हात से पकोड़ेको खानेके लिए मुह खोला, मैं सोचने लगा कि वह पल कब आएगा जब मेरा तना हुवा लंड उसके खूबसूरत नर्म होंठों के बीच दाखिल होगा।
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"भैया, देखना बंद कीजिए और चाय पीजिए," उसने शरारत से कहा।

"तुम जानती हो तुम इस वक्त कितनी हॉट और मेस्मेराइजिंग लग रही हो?" मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा "मैं तो आँखें हटा ही नहीं पा रहा हूँ तुझ से।"।

उसने एक प्यारा सा चेहरा बनाया और मुस्कुराते हुए सिगरेट मुझे वापस थमा दी। "मैं अंदर जा रही हूँ शब्जी बनाने, आप चाय खत्म कीजिए।"


जैसे ही वह मुड़ी और किचन की तरफ चलने लगी, मेरी नजरें उसकी लेगिंग्स में लिपटे उन सेक्सी कूल्हों पर टिक गईं जो हर कदम के साथ लयबद्ध तरीके से हिल रहे थे। वह जानती थी कि मैं उसे देख रहा हूँ, और वह जानबूझकर अपनी चाल को और भी ज्यादा उत्तेजक बना रही थी।
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चाय और सिगरेट का धुंआ मेरे दिमाग को शांत कर रहा था, लेकिन मेरा शरीर अभी भी नेहा की यादों से उत्तेजित था। तभी मेरे फोन की घंटी बजी—किरण का कॉल था।

"ओए, कहाँ मर गया? घर में ही बैठा है क्या?" किरण ने अपनी चिर-परिचित बेबाक आवाज़ में पूछा।

"हाँ यार, बस चाय पी रहा हूँ," मैंने आराम से जवाब दिया।

"अबे, जल्दी बाहर आ! हमारे पुराने जंक्शन वाले टी-स्टॉल पर आ जा, जहाँ हम हर शनिवार सुबह मिलते हैं। तूने कल रात पब में भी हमारा साथ नहीं दिया, अब यहाँ भी गायब है?" उसने शिकायत भरे लहजे में कहा।

मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, "बिकाश भी साथ है क्या?"


"नहीं भाई, बोल रहा था उसको ज़बरदस्त हैंगओवर है, इसलिए वह नहीं आया। मैं यहाँ अकेला बैठा बोर हो रहा हूँ, जल्दी आ और मुझे कंपनी दे," किरण ने आग्रह किया।

सच कहूँ तो मेरा मन बाहर जाने का बिल्कुल नहीं था। मेरा मन तो बस नेहा के पास रहने का था, उसकी उन जांघों को फिर से छूने का और उसकी सिसकियों को सुनने का। लेकिन मुझे पता था कि नेहा अब किचन में सब्जी बनाने में व्यस्त हो जाएगी। मुझे लगा कि थोड़ा समय बाहर बिताना ठीक रहेगा, ताकि जब मैं वापस आऊं, तो हमारे बीच की यह तड़प और भी ज्यादा बढ़ जाए।

मैं वापस किचन में गया। नेहा गैस के पास खड़ी थी, उसकी कुर्ती का वह कट अब भी मेरी नज़रों को अपनी ओर खींच रहा था।

"नेहा, मैं थोड़ी देर के लिए बाहर जा रहा हूँ, किरण ने बुलाया है," मैंने उसके पास जाकर धीरे से कहा।

उसने पलटकर मेरी तरफ देखा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वह मुझे जाने नहीं देना चाहती हो। "ठीक है, लेकिन समय पर वापस आ जाइएगा... खाना खानेके लिए," उसने धीमी और शरारती आवाज़ में कहा।



मैंने अपना चाय का कप सिंक में रखा। जैसे ही मैं मुड़ा, मैंने देखा कि वह मुझे बड़ी हवस और चाहत भरी नज़रों से देख रही थी। सोचा कि मैं उसे अभी इसी वक्त पकड़ लूं।

मैंने उसकी कमर को हल्का सा छुआ और उसे अपने करीब खींचकर उसके माथे पर एक छोटा सा, लेकिन गहरा चुंबन दिया। "मैं जल्दी वापस आऊंगा," मैंने उसके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा।
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उसने अपनी छोटी सी मुट्ठी से मेरे सीने पर एक हल्का सा, चंचल प्रहार किया। "जल्दी आइएगा... मैं आपका इंतज़ार करूँगी... खाने के लिए," उसने आखिरी शब्दों पर थोड़ा ज़ोर दिया, जिससे साफ़ था कि उसके दिमाग में सिर्फ खाने की बात नहीं चल रही थी।

मैं उसकी उस शरारत पर मुस्कुराया और तेज़ी से अपने कमरे की ओर बढ़ा। मैंने जल्दी से अपने कपड़े बदले और खुद को तैयार किया। मेरा दिमाग तो जंक्शन की तरफ जा रहा था, लेकिन मेरी रूह अभी भी उसी किचन में नेहा के साथ उलझी हुई थी।


मैं तेज़ी से घर से निकला और उस टी-स्टॉल की तरफ बढ़ा जहाँ किरण मेरा इंतज़ार कर रहा था, लेकिन मेरे ज़हन में बस एक ही ख्याल था—कि जब मैं वापस आऊंगा, तो वह 'इंतज़ार' किस मोड़ पर खत्म होगा।
 

Rouny

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अपडेट : २५

ट्रैक सलवार और ग्रे टी-शर्ट पहनकर जब मैं ऊपर किचन की तरफ बढ़ा।

नेहा गैस के चूल्हे के सामने खड़ी थी। चाय की केतली में उबलती चाय से भाप उठ रही थी, ओवन के ऊपर। उसने पीले रंग की कुर्ती पहनी थी, जिसमें बगल में एक गहरा स्लिट (कट) था। वह सब्जियाँ—आलू, मूली और गोभी—काट चुकी थी । जैसे ही मैं उसके करीब पहुँचा, मेरी नज़र उस दरार पर पड़ी। वह सफेद टाइट लेगिंग्स में लिपटी उसकी सुडौल जांघें और उभरे हुए गांड साफ़ दिख रहे थे। वह हर बार जब हिलती, लेगिंग्स उसके शरीर के कर्व्स को और भी उभार देती।


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उसके गीले बाल अभी भी तौलिये में लिपटे थे, और कानों में बड़े हूप रिंग्स थे, जो उसकी खूबसूरती में एक अलग ही आकर्षण जोड़ रहे थे। वह किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी, और उसकी यह सादगी ही उसे और भी हॉट बना रही थी।

"चाय बन गई?" मैंने फुसफुसाते हुए पूछा, मेरा हाथ अनजाने में उसकी कमर के ठीक पीछे वाले काउंटर पर टिका था।

नेहा ने धीरे से अपनी नजरें उठाईं। उसकी आँखों में एक अजीब सी कशमकश थी—शर्म, डर और एक दबी हुई प्यास। उसने अपनी पलकें झुका लीं और बहुत धीमी आवाज में कहा, "जी... बस दो मिनट, भइया।"



मैं चुपके से उसके पीछे गया और धीमी आवाज़ में पूछा, "इतनी जल्दी उठ गई? कल रात तो तू कह रही थी कि देर तक सोना चाहती है... क्या नींद पूरी हुई तेरी?"

वह धीरे से मुस्कुराई, बिना मेरी तरफ देखे, लेकिन उसकी मुस्कान में एक गहरा निमंत्रण था। "सोचा तो था कि देर तक सोऊँगी," उसने अपनी आवाज़ में एक हल्की सी खनक लाते हुए कहा, "पर फिर ख्याल आया कि आपको समय पर चाय और खानाभी तो तयारी करनी है। आखिर आपकी सेहत का ख्याल रखना मेरी ज़िम्मेदारी है ना?"

मैंने एक शरारती मुस्कान के साथ उसके करीब होते हुए पूछा, "अच्छा? तो तूने मेरी खातिर अपनी प्यारी सी नींद कुर्बान कर दी?"

उसने एक धीमी, गहरी "हम्म..." की आवाज़ निकाली, जो किसी संगीत की तरह मेरे कानों में गूँजी। वह आवाज़ सिर्फ़ हाँ नहीं थी, वह एक इशारा था।

अब मैं खुद को रोक नहीं पाया। मैं उसके बिल्कुल पीछे जा खड़ा हुआ। मैंने अपनी बाँहें उसके पेट के चारों ओर लपेट लीं और अपनी ठुड्डी (chin) उसके मुलायम कंधे पर टिका दी। उसकी त्वचा की गर्माहट और वह हल्की सी खुशबू मेरे होश उड़ा रही थी।


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"मैं दुनिया का सबसे खुशनसीब भाई हूँ," मैंने उसकी गर्दन के पास फुसफुसाते हुए कहा, "जिसके पास इतनी खूबसूरत बहन है, जो उसका इतना ख्याल रखती है।"

नेहा ने हल्के से अपनी कमर मटकाई, जिससे उसकी लेगिंग्स और भी तन गई। उसने खिलखिलाते हुए कहा, "उफ़! सुबह-सुबह मस्का मारना शुरू कर दिया आपने? रहने दीजिये, भैया।"

मैंने अपनी पकड़ थोड़ी और मजबूत की और उसकी गर्दन के पास अपनी साँसें छोड़ते हुए कहा, "मैं मस्का नहीं लगा रहा, नेहा। मैं सच कह रहा हूँ। मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूँ... तेरा ख्याल रखता हूँ, और मैं वादा करता हूँ कि तेरी हर ज़रूरत को पूरा करूँगा।"

'हर ज़रूरत' शब्द बोलते समय मेरी आवाज़ में एक भारीपन था, एक ऐसी भूख जो सिर्फ़ उसे पाकर शांत हो सकती थी।

जैसे ही यह शब्द उसके कानों में गया, उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने अपनी आँखें मूँद लीं। उसी पल, मैंने अपने हाथ ऊपर सरकाए और उसके भारी, उभरे हुए दूधों पर रख दिए। मैंने उन्हें धीरे से, लेकिन मजबूती से अपने हाथों में भींचा। उसकी कुर्ती के कपड़े के नीचे उसकी गर्माहट और दूधों की वह नरमी मेरे हाथों में महसूस हो रही थी।
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नेहा के मुँह से एक दबी हुई आह निकली। उसने अपना सिर पीछे की ओर झुकाया, जिससे उसकी गर्दन पूरी तरह खुल गई। मैंने बिना देर किए, उसके गले के एक तरफ एक गहरा, एक प्यारी सी किस किया।

उसकी त्वचा रेशम की तरह मुलायम थी और मेरा होंठ उसकी गर्दन की नसों की धड़कन को महसूस कर सकता था। वह काँप रही थी, लेकिन उसने खुद को मुझसे दूर नहीं किया। बल्कि, उसने अपने हाथों से कड़ाही को पकड़े हुए अपनी कमर को थोड़ा और मेरे करीब धकेल दिया, जैसे वह मुझे और भी ज़्यादा महसूस करना चाहती हो।

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"भैया..." उसने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी आवाज़ में अब समर्पण और हवस का मिश्रण था।

मैंने उसके दूधों को और ज़ोर से दबाया और उसकी गर्दन पर अपनी ज़ुबान फेरी। किचन की वह गर्मी अब चूल्हे की आग से नहीं, बल्कि हमारे बीच की उस तपिश से बढ़ रही थी जिसे अब और छिपाया नहीं जा सकता था।

"भैया... क्या कर रहे हैं आप..." उसने धीमी आवाज में कहा, लेकिन उसकी सांसें तेज हो रही थीं।
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मेरे हाथ उसकी कुर्ती के ऊपर से उसके दूधों को सहला रहे थे। वो नरम थे, भारी, और मेरी हथेलियों में पूरी तरह समा रहे थे। मैंने उन्हें निचोड़ा, दबाया। नहा की साँसें तेज़ हो गईं।

"भैया... मत करो..." उसने कहा, पर उसकी आवाज़ में कोई रोक नहीं थी।

आह... सस्स्स्... भैया... छोड़िए ना... आह... कल रात जो हुआ वो एक गलती थी... प्लीज... दोबारा नहीं..." वह शब्दों से तो मना कर रही थी, लेकिन उसके शरीर की भाषा कुछ और ही कह रही थी। वो अपनी गांड को मेरे उभरे हुए लंड पर रगड़ रही थी, घुमा रही थी।

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"नेहा..." मैंने उसके कान में फुसफुसाया, मेरी आवाज़ में काँप था। "कल रात गलती लग रही थी, है ना? तो आज रात हम कोई और बहाना ढूँढ लेंगे..."

"भैया!" वो बोली, पर उसकी आवाज़ में हँसी थी, और उसकी गांड मेरी लंड पर और ज़ोर से दब गई। "आप तो... आपने तो... आह-ओउच..."

मैंने उसके दूधों को और ज़ोर से दबाया। कुर्ती के कपड़े के नीचे से मेरे नाखून उसकी चूचुकों पर एक झटके से फेर दिए। उसका शरीर झुलस गया—उसकी रीढ़ की हड्डी सख्त हो गई, उसके घुटने ज़रा से मुड़े, और उसकी गांड मेरी लंड पर इस तरह घूमने लगी जैसे वो मेरे उभार को काटने की कोशिश कर रही हो।


"औच... भैया... नहीं... अब तो रुको..." उसने भारी साँसों के बीच कहा। "ऐसे नहीं... सुबह-सुबह... अगर किसी ने..."

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मैंने उसकी कुर्ती के स्लिट से हाथ अंदर डाला। उसकी लेगिंग्स की टाइट सतह पर मेरी उँगलियाँ उसकी जाँघों के ऊपर चढ़ीं। वो मुलायम थीं, नर्म थीं, जैसे गरम रेत पर लेटना। मेरी उंगलियाँ उसकी जाँघ की भीतरी सतह पर बढ़ीं.

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तभी अचानक, ओवन के पास रखे उसके फोन की स्क्रीन जल उठी। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था— 'पापा'।


हम दोनों जैसे बिजली के झटके से अलग हुए। नेहा ने तुरंत अपनी उंगली अपने होंठों पर रखी, मुझे चुप रहने का इशारा किया। उसकी सांसें अभी भी फूल रही थीं, चेहरा लाल था और आंखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने जल्दी से पानी की एक बोतल उठाई, एक घूंट पिया ताकि उसकी आवाज सामान्य हो सके, और कॉल रिसीव किया।


"हेलो पापा," उसने अपनी आवाज को जितना हो सके उतना स्थिर रखते हुए कहा।
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उसकी आवाज़ में अब वो तरीके से थी—मासूम, इत्मीनान से, जैसे वो बस बेफिक्र सुबह बिता रही हो। वह अपना कपड़ा ठीक करते हुए बोली, "हाँ पापा। हाँ, जी... मैं ठीक हूँ।"


वो मेरी तरफ़ देखी—उसकी आँखें मुझसे कह रही थीं—*स्थिति सँभलो... प्लीज़... उसके होंठ काँप रहे थे पर आवाज़ नहीं। "हाँ जी... भैया भी उठ चुके हैं। वो यहीं किचन में हैं, चाय पीने वाले हैं..."

मैं पास ही किचन की मेज वाली कुर्सी पर बैठ गया, अपनी उत्तेजना को दबाते हुए उसे देख रहा था। वह पापा से बात कर रही थी, "जी...जी..हूँ... हूँ... जी पापा।" वह उनकी राजस्थान यात्रा के बारे में पूछ रही थी। उसकी नजरें बीच-बीच में मेरी तरफ आ रही थीं, जिनमें एक चुनौती और एक शरारत थी।

"पापा, आप कैसे हैं? हाँ... जी... राजस्थान में मौसम कैसा है वहाँ? हूँ... हूँ... हाँ जी, ध्यान रखिए। और पापा..." उसकी आवाज़ में हल्का सा सख्ती आ गया, "...आप शराब ज़्यादा मत पीना, ठीक है? वो बताइए ना, डॉक्टर ने भी तो मना किया है। हूँ... हूँ..."

उसने दो कप चाय बनाई और एक कप मेरी तरफ बढ़ाते हुए पापा को सलाह दे रही थी कि वे अपनी सेहत का ध्यान रखें और ज्यादा ड्रिंक ना पिएं। फिर उसने फोन मेरी तरफ बढ़ाया, "पापा आपसे बात करना चाहते हैं।"

"जी पापा..." मैंने फोन उठाया।

"राज, बेटा... मैं दो दिन बाद वापस आ रहा हूँ। सुन—नहा को शाम को अकेला मत छोड़ना। तुम्हें पता है, वो थोड़ी डरती है। घर का भी ध्यान रखना। किसी से कोई दिक्कत हो, तो बताना।"

"जी पापा, घबराइए मत। मैं उसका पूरा ख्याल रखूँगा..." मैंने कहा, और उस पल मेरी नज़रें नहा पर टिकी थीं। वो चाय के कप में देख रही थी, पर उसकी आँखों की कोर मेरी तरफ़ थी। "...घर भी, और घर के अंदर जो भी है... मेरी ज़िम्मेदारी है। आप बेफिक्र रहिए।"

"ठीक है। और जब बस पहुँचने वाली हो तो मैं फोन कर दूँगा।"

"जी, मैं पहुँच जाऊँगा।"

"अच्छा बेटा, ख्याल रखना अपना भी।" कहकर पापा ने फोन काट दिया।

किचन में फिर से वही भारी सन्नाटा छा गया।

मैंने उसका हाथ फिर से पकड़ा और उसे अपनी ओर खींचते हुए कहा, "चाय पीने से पहले मुझे तुम्हारे इन रसीले होंठों का स्वाद चाहिए नेहा। बस एक बार..."

उसने अपनी उंगली मेरे होंठों पर रख दी, जिससे मेरी सांसें थम गईं। उसने अपनी नजरें मेरी आंखों में गड़ा दीं। वह दुविधा में लग रही थी—एक तरफ वो डर कि हम क्या कर रहे हैं, और दूसरी तरफ कल रात का वो आनंद जो उसकी आंखों में साफ दिख रहा था।

"भैया... प्लीज़। अभी नहीं।"

"क्यों?"

"कंट्रोल कीजिए खुद को, भैया," उसने धीरे से कहा, उसके चेहरे पर एक हल्की, कामुक मुस्कान थी। "अभी सुबह ही है। देखिए कितने सारे काम हैं। मुझे नाश्ता बनाना है, कपड़े धोने हैं... घर के इतने सारे काम पड़े हैं।"

"तो मैं तुम्हारी मदद करूँ?"

"नहीं। मैं अकेले ही कर लूँगी। बस... आप प्लीज़ मुझे समय दो।"

"कल रात... भैया," उसने धीमे से कहा। मैंने महसूस किया उसका शरीर मेरी बाँहों में हल्का सा काँपा। "वो सब गलत था।"


मैंने उसे और पास खींच लिया। उसकी गर्दन पर मेरे होंठ पहुँचे — नरम, हल्के, बिना दबाव के। सिर्फ़ एक निशान सा। उसकी साँस रुक गई।

"गलत क्यों था?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ इतनी धीमी थी कि सिर्फ़ वो ही सुन पा रही थी। "तुम्हें क्या लगता है — कल रात जो हुआ, वो शराब का नशा था?"

वो चुप रही। उसका हाथ अब भी मेरे हाथ पर ही था — उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों में फँसी हुईं।

वो मुड़ी। धीरे से, मेरी बाँहों से निकलकर उसने अपना चेहरा मेरी तरफ़ किया। उसकी आँखें नम थीं, पर उनमें सिर्फ़ पानी नहीं था — दर्द, उलझन, और कुछ ऐसा जो वो खुद नहीं समझ पा रही थी। उसने मेरी आँखों में देखा। उस रोशनी में उसका चेहरा इतना मासूम लग रहा था कि मेरा दिल पसीज गया।

"भैया, कल रात हम दोनों ने बहुत ग़लत किया," उसकी आवाज़ रुँध गई। "हम पीकर बहक गए थे। हमें... शराब ने कुछ ऐसा कर दिया जो हमें नहीं करना चाहिए था। ये सब... ये रिश्ता हमारे बीच कभी कुछ और नहीं हो सकता। ये बात... दोबारा कभी नहीं होनी चाहिए।"

"नेहा," मैंने कहा। सिर्फ़ उसका नाम। एक बार। फिर एक पल की चुप्पी। उसकी आँखों में सवाल था, इंतज़ार था। "कल रात जो हुआ, वो शराब नहीं थी। वो नशा नहीं था।"

उसका चेहरा हिला। उसने मुँह खोलकर कुछ कहना चाहा, पर मैंने उसे बोलने नहीं दिया।

"तुमने कभी सोचा है," मैंने धीमे से कहा, उसके होंठों से बस एक उँगली दूर रुककर, "कि कल रात सिर्फ़ इसलिए हुआ क्योंकि शराब ने वो रास्ता खोल दिया जो हम दोनों बहुत पहले से तलाश रहे थे?"

उसकी साँसों की रफ़्तार बदल गई। उसकी आँखों में कुछ छलका — इनकार, और उसके नीचे एक और सच्चाई, जो वो जानती थी।

नेहा," मैंने फुसफुसाया, "शराब बहाना थी। हम दोनों ने उस शराब को बहाना बनाया। पर आज सुबह मैं शांत हूँ। तुम भी शांत हो। कोई बहाना नहीं है। और फिर भी मैं यहाँ खड़ा हूँ, तुम्हारी पीठ पर साँसें ले रहा हूँ, तुम्हें चाहते हुए। अगर कल रात प्यार नहीं था, तो ये प्यार क्या है?"

"पर भैया," उसकी आवाज़ अब काँपती नहीं थी। धीमी, गहरी, हिचकती हुई — पर पहले से ज़्यादा मज़बूत। "लोग क्या कहेंगे? समाज क्या कहेगा?"

मैंने उसका चेहरा उठाया। उसकी आँखों में देखा — और उन आँखों में मैंने वही देखा जो मैं खुद रोज़ आईने में देखता था। एक चाहत जो पाप से ज़्यादा ताकतवर थी, जो समाज से नहीं डरती थी।

"समाज तो बहुत कुछ कहता है," मैंने उसके माथे पर हल्की चूम ली, "पर क्या तुम्हें लगता है, मैं अपनी ज़िन्दगी का सबसे गहरा रिश्ता समाज के डर से छोड़ दूँगा? तुम मेरी बहन हो — ये रिश्ता मैं कभी नहीं खोता। पर तुम उससे बढ़कर हो। तुम मेरी नेहा हो। मेरी ज़िन्दगी की सबसे खूबसूरत चीज़ हो। और कल रात मैंने जो महसूस किया — वो कभी गलत नहीं हो सकता, क्योंकि वो मेरे दिल से आया था। शराब से नहीं।"

उसने धीरे से मेरा हाथ हटाया और मेरी आंखों में देखते हुए बहुत ही धीमे स्वर में कहा, "आप थोड़ा समय लीजिए। ठंडे दिमाग से सोचिए कि क्या यह सब सही है।"
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उसकी आवाज में एक ऐसा नशा था जिसने मेरे शरीर के निचले हिस्से में हलचल मचा दी। वह 'हार्ड टू गेट' खेल रही थी, लेकिन उसके शब्द मुझे पूरी तरह से नग्न कर रहे थे। वह मुझे मना नहीं कर रही थी, बल्कि वह मुझे और ज्यादा भूखा बना रही थी।

मैंने एक गहरी सांस ली और पीछे हट गया। मैंने एक कुटिल मुस्कान के साथ उसकी आंखों में देखा।

"ठीक है नेहा। मैं तुम्हें समय देता हूँ। और खुद को भी," मैंने धीमी आवाज में कहा।

"तो आप... आप इस पर सोचो। पूरे दिन सोचो। रात को सोने से पहले बताना। अगर आपको सच में लगता है कि ये ठीक है, कि हम ये कर सकते हैं... तो में तैयार हूँ। हर उस चीज़ के लिए जो मेरे प्यारे भैया चाहेंगे।"

उसने ये कहा तो मेरे पेट में बिजली सी दौड़ गई। "हर उस चीज़ के लिए" — उसके शब्द मेरे दिमाग़ में गूँजे। वह खेल खेल रही थी। मुझे पता था। वह मुझे फँसा रही थी। लेकिन मैं फँसना चाहता था।

मैंने उसका चेहरा पकड़कर उसे अपनी ओर उठाया।

"ठीक है। मैं सोचूँगा। पूरे दिन। पर आज रात... सिर्फ़ बताऊँगा नहीं। दिखाऊँगा भी।"

उसकी आँखों में चमक आ गई। वह न जाने कहाँ खो गई। फिर उसने अपना चेहरा मेरे हाथ से हल्के से छुड़ाया और चूल्हे की तरफ़ मुड़ गई।

"चाय पी लो, भैया। ठंडी हो जाएगी।"

मैंने तय कर लिया था। मैं अभी जल्दबाजी नहीं करूँगा। मैं इस तनाव को और बढ़ने दूंगा। मैं भी उसे पूरे दिन तड़पाऊंगा, उसकी हर हरकत पर नजर रखूंगा और उसे फिरसे ऐसा सिडुस करूँगा की वह खुद अपना नंगा बदन मुझे सौपने पर मजबूर होगी।


मैंने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा, "चाय के साथ एक सिगरेट हो जाये?"

उसने पहले तो नखरे दिखाए, "इतनी सुबह सिगरेट? मुझे पसंद नहीं है।"

लेकिन मेरी जिद और मेरी नजरों के दबाव के आगे वह हार गई।

हम दोनों छत पर गए-आलू पकोड़े और चायके साथ। सुबह की हल्की ठंडक थी। मैंने सिगरेट जलाई और उसकी तरफ बढ़ाया। उसने मना कर दिया कि वह पूरी नहीं पिएगी, बस एक-दो कश लेगी। जब उसने सिगरेट अपने होंठों से लगाई और धुंआ छोड़ा, तो वह दृश्य इतना कामुक था कि मैं अपनी नजरें नहीं हटा पाया।

जब वह एक हातमें सिगरेट रखकर, दूसरी हात से पकोड़ेको खानेके लिए मुह खोला, मैं सोचने लगा कि वह पल कब आएगा जब मेरा तना हुवा लंड उसके खूबसूरत नर्म होंठों के बीच दाखिल होगा।
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"भैया, देखना बंद कीजिए और चाय पीजिए," उसने शरारत से कहा।

"तुम जानती हो तुम इस वक्त कितनी हॉट और मेस्मेराइजिंग लग रही हो?" मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा "मैं तो आँखें हटा ही नहीं पा रहा हूँ तुझ से।"।

उसने एक प्यारा सा चेहरा बनाया और मुस्कुराते हुए सिगरेट मुझे वापस थमा दी। "मैं अंदर जा रही हूँ शब्जी बनाने, आप चाय खत्म कीजिए।"


जैसे ही वह मुड़ी और किचन की तरफ चलने लगी, मेरी नजरें उसकी लेगिंग्स में लिपटे उन सेक्सी कूल्हों पर टिक गईं जो हर कदम के साथ लयबद्ध तरीके से हिल रहे थे। वह जानती थी कि मैं उसे देख रहा हूँ, और वह जानबूझकर अपनी चाल को और भी ज्यादा उत्तेजक बना रही थी।
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चाय और सिगरेट का धुंआ मेरे दिमाग को शांत कर रहा था, लेकिन मेरा शरीर अभी भी नेहा की यादों से उत्तेजित था। तभी मेरे फोन की घंटी बजी—किरण का कॉल था।

"ओए, कहाँ मर गया? घर में ही बैठा है क्या?" किरण ने अपनी चिर-परिचित बेबाक आवाज़ में पूछा।

"हाँ यार, बस चाय पी रहा हूँ," मैंने आराम से जवाब दिया।

"अबे, जल्दी बाहर आ! हमारे पुराने जंक्शन वाले टी-स्टॉल पर आ जा, जहाँ हम हर शनिवार सुबह मिलते हैं। तूने कल रात पब में भी हमारा साथ नहीं दिया, अब यहाँ भी गायब है?" उसने शिकायत भरे लहजे में कहा।

मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, "बिकाश भी साथ है क्या?"


"नहीं भाई, बोल रहा था उसको ज़बरदस्त हैंगओवर है, इसलिए वह नहीं आया। मैं यहाँ अकेला बैठा बोर हो रहा हूँ, जल्दी आ और मुझे कंपनी दे," किरण ने आग्रह किया।

सच कहूँ तो मेरा मन बाहर जाने का बिल्कुल नहीं था। मेरा मन तो बस नेहा के पास रहने का था, उसकी उन जांघों को फिर से छूने का और उसकी सिसकियों को सुनने का। लेकिन मुझे पता था कि नेहा अब किचन में सब्जी बनाने में व्यस्त हो जाएगी। मुझे लगा कि थोड़ा समय बाहर बिताना ठीक रहेगा, ताकि जब मैं वापस आऊं, तो हमारे बीच की यह तड़प और भी ज्यादा बढ़ जाए।

मैं वापस किचन में गया। नेहा गैस के पास खड़ी थी, उसकी कुर्ती का वह कट अब भी मेरी नज़रों को अपनी ओर खींच रहा था।

"नेहा, मैं थोड़ी देर के लिए बाहर जा रहा हूँ, किरण ने बुलाया है," मैंने उसके पास जाकर धीरे से कहा।

उसने पलटकर मेरी तरफ देखा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वह मुझे जाने नहीं देना चाहती हो। "ठीक है, लेकिन समय पर वापस आ जाइएगा... खाना खानेके लिए," उसने धीमी और शरारती आवाज़ में कहा।



मैंने अपना चाय का कप सिंक में रखा। जैसे ही मैं मुड़ा, मैंने देखा कि वह मुझे बड़ी हवस और चाहत भरी नज़रों से देख रही थी। सोचा कि मैं उसे अभी इसी वक्त पकड़ लूं।

मैंने उसकी कमर को हल्का सा छुआ और उसे अपने करीब खींचकर उसके माथे पर एक छोटा सा, लेकिन गहरा चुंबन दिया। "मैं जल्दी वापस आऊंगा," मैंने उसके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा।
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उसने अपनी छोटी सी मुट्ठी से मेरे सीने पर एक हल्का सा, चंचल प्रहार किया। "जल्दी आइएगा... मैं आपका इंतज़ार करूँगी... खाने के लिए," उसने आखिरी शब्दों पर थोड़ा ज़ोर दिया, जिससे साफ़ था कि उसके दिमाग में सिर्फ खाने की बात नहीं चल रही थी।

मैं उसकी उस शरारत पर मुस्कुराया और तेज़ी से अपने कमरे की ओर बढ़ा। मैंने जल्दी से अपने कपड़े बदले और खुद को तैयार किया। मेरा दिमाग तो जंक्शन की तरफ जा रहा था, लेकिन मेरी रूह अभी भी उसी किचन में नेहा के साथ उलझी हुई थी।


मैं तेज़ी से घर से निकला और उस टी-स्टॉल की तरफ बढ़ा जहाँ किरण मेरा इंतज़ार कर रहा था, लेकिन मेरे ज़हन में बस एक ही ख्याल था—कि जब मैं वापस आऊंगा, तो वह 'इंतज़ार' किस मोड़ पर खत्म होगा।
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