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Incest माई

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एपिसोड 17: समर्पण की दहलीज और वह प्रथम मिलन
पल भर के लिए उनका वह इनकार मुझे किसी फाँस की तरह चुभा, और एक अनजानी निराशा ने मेरे मन को घेर लिया। जिस सुख की मैं बड़ी आतुरता से प्रतीक्षा कर रहा था, वह अधरों का मिलन अधर में ही लटक गया था। पर वह निराशा अधिक देर तक नहीं टिकी; मेरे भीतर धधकती उस बेकाबू चाहत ने मुझे फिर से संभाल लिया। मेरे मन ने तुरंत खुद को तर्क दिया—'क्या हुआ जो होंठ नहीं मिले? उनके ये भरे हुए गाल, जिनकी कोमलता के सपने मैंने न जाने कितनी रातों में देखे थे, वे तो अब मेरे स्पर्श में थे।' उनकी खाल की वह रेशमी गर्माहट मेरी संवेदनाओं को और भी तीव्र कर रही थी। उस शुरुआती झटके को भूलकर, मैं उसी क्षण उनके गालों को चूमने लगा। पहले मेरे होंठ अत्यंत सहजता से वहाँ थमे, पर देखते ही देखते उस स्पर्श ने एक व्याकुल रूप धारण कर लिया।
मेरा वह बीस साल का उफनता यौवन और जीवन में पहली बार किसी स्त्री के देह से हुआ यह साक्षात् और जीवंत स्पर्श—इस सबने मेरे विवेक को पूरी तरह हर लिया था। मुझे नहीं पता था कि प्रेम की अभिव्यक्ति कैसे की जाती है या कोई स्त्री जब इतने करीब होती है तो क्या करना चाहिए, पर मेरा शरीर उस खिंचाव के वश होकर खुद अपना मार्ग खोज रहा था। उनके गालों पर जब मेरे होंठ रेंग रहे थे, तब मुझे एक अनूठा स्वाद महसूस हुआ—उनकी आँखों से ढलकते आँसुओं का वह खारापन मेरे होंठों पर उतरा, पर उस स्वाद में भी एक अलौकिक नशा था। मेरी आक्रामकता और शरीर के बोझ तले वे दबी हुई थीं, उन्हें सांस लेने में भी थोड़ी कठिनाई हो रही थी, पर उनकी वह छटपटाहट और विवशता मुझे और भी उकसा रही थी।
निराशा अब कपूर की तरह उड़ चुकी थी और उसका स्थान एक नए, अदम्य उन्माद ने ले लिया था। माई के चेहरे पर क्रोध की लकीरें थीं, उनकी आँखों में लाचारी उमड़ रही थी, पर मेरी आगोश की ताकत उनके प्रतिरोध से कहीं अधिक प्रबल थी। मैं अब उनके गालों से आगे बढ़ते हुए उनके चेहरे के एक-एक कोने को अपने होंठों से मापने लगा। उनकी ठुड्डी, उनका माथा, उनकी नाक... मैं जानबूझकर उनके होंठों को बचाते हुए उनके अंग-अंग पर अपने अधिकार की छाप छोड़ रहा था।
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उनकी त्वचा का वह मखमली स्पर्श, जिसे आज तक मैंने केवल दूर से निहारा था, वह अब इतना निकट था कि उनके शरीर की वह चंदन जैसी सोंधी खुशबू मुझे मदहोश कर रही थी। माई के मुँह से कुछ अस्पष्ट शब्द निकल रहे थे, पर उनका अर्थ समझना कठिन था। मानो वे अपने ही मन से संघर्ष कर रही थीं या इस अनपेक्षित प्रहार को निशब्द सहने के अलावा उनके पास कोई विकल्प शेष नहीं था। उनकी वह बुदबुदाहट मुझ पर उनके क्रोध की थी, विरोध की थी या उस स्पर्श से उपजे एक अज्ञात डर की—यह जानने की उस पल मुझमें कोई इच्छा नहीं थी। मेरी वह मासूमियत अब एक आदिम पागलपन में बदल चुकी थी। मैं बस उस क्षण के सुख और उनकी उस बेबसी को जीना चाहता था। मेरे होंठ अब उनके चेहरे से धीरे-धीरे नीचे उतरे और उनकी गर्दन की नाज़ुक त्वचा पर जा थमे। वहाँ उनकी साँसों की तपिश और भी तेज़ी से महसूस हो रही थी, मानो मेरा यह आक्रमण उनके रोम-रोम को सिहरा गया था और वे खुद को पूरी तरह असहाय मानकर मेरे स्वाधीन हो गई थीं। जब मेरी छुअन से उनकी गर्दन कांपी, तो मुझे आभास हुआ कि अब इस यात्रा को रोक पाना मेरे बस में नहीं है।
गर्दन के उस अत्यंत संवेदनशील मोड़ से मेरे होंठ अब धीरे से सरकते हुए उनके कंधों की ओर बढ़े। मेरा वह कोरा यौवन, जिसने कभी किसी स्त्री-देह की आँच महसूस नहीं की थी, वह अब उस रोमांच से पुलकित हो उठा था। उनकी साड़ी अब काफी ढीली हो चुकी थी और वह भारी जरतारी पल्लू, जो पहले ही कंधे से आधा फिसल चुका था, उसे मैंने अपने कांपते हाथों से और भी किनारे कर दिया।
रेशमी कपड़े के सरकने की वह सरसराहट और माई के हृदय की वह बढ़ी हुई धड़कन एक रहस्यमयी लय में घुल-मिल रही थी। जैसे ही पल्लू पूरी तरह हटा, उनका वह धवल, गोरा और मक्खन जैसा सुडौल कंधा किसी सुंदर शिल्प की तरह मेरी आँखों के सामने अनावृत हो गया। कमरे की उस मद्धम पीली रोशनी में उनकी वह निखरी त्वचा किसी स्वर्ण-प्रतिमा की तरह दमक रही थी और उस पर पड़ती मेरी परछाईं का खेल उन्हें और भी मादक व रहस्यमयी बना रहा था।
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माई ने क्रोध और विवशता में अपनी गर्दन दूसरी ओर मोड़ ली थी। उन्होंने अपने दांतों तले निचले होंठ को कसकर दबा लिया था, मानो वे अपने भीतर उमड़ती सिसकियों और लाचार शब्दों को कंठ में ही घोंटने का प्रयास कर रही हों। उनकी यह बेबसी, उनका यह मूक निषेध मुझे रोकने के बजाय मेरी आदिम वासना को और भी भड़का रहा था। सच तो यह है कि मुझे ठीक से पता ही नहीं था कि आगे क्या करना है; मेरा यह पहला अनुभव था, इसलिए मुझमें एक तरह का भोलापन और प्रचंड जिज्ञासा एक साथ थी। मैं मन ही मन चाहता था कि वे मेरा साथ दें, वे इस अनुभव में मेरी संगिनी बनें, पर उनका वह रूखा इनकार मेरी आग में घी डालने का काम कर रहा था।
मैंने अपने होंठ उनके कंधे की उस कोमल और गर्म त्वचा पर बहुत ही नरमी से रख दिए।
जैसे ही वह पहली उष्ण छुअन हुई, माई के पूरे बदन में रोंगटे खड़े हो गए। उनका शरीर एक क्षण के लिए किसी खिंचे हुए धनुष की तरह तन गया और फिर अगले ही पल विवश होकर पिघलते हुए मोम की तरह ढीला पड़ गया। मैंने वहाँ की उस गर्म त्वचा को अपने होंठों के घेरे में भर लिया, मानो उनका पूरा अस्तित्व ही मैं अपनी साँसों में समेट लेना चाहता हूँ। उनके शरीर की वह प्राकृतिक, चंदन जैसी मादक खुशबू ने मुझे पूरी तरह विभोर कर दिया था। जीवन में पहली बार मैं ऐसी किसी जीवंत सुगंध और रस का अनुभव कर रहा था। वे कुछ नहीं बोल रही थीं, बस उनकी साँसें अब हाँफने के रूप में तेज़ चल रही थीं और उनकी आँखों के कोरों से धीरे से ढलका वह एक गर्म आँसू उनकी उस अथाह विवशता की मूक गवाही दे रहा था। मेरे उस जंगली जुनून को अब उन आँसुओं या समाज के नीति-नियमों की कोई परवाह नहीं थी, मैं बस उस स्पर्श की मदहोशी में खुद को लुटा चुका था।
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पल्लू के रेशमी आवरण के नीचे अब तक सुरक्षित और अब मेरे आवेग के कारण खुला हुआ वह मखमली हिस्सा मेरे होंठों के दायरे में आ गया। ब्लाउज के उस नाज़ुक किनारे के पास की उनकी साफ़ त्वचा मेरे स्पर्श से जैसे प्रज्वलित हो उठी। वहाँ की वह प्राकृतिक आँच मेरी नसों में बिजली की तरह कौंध रही थी। माई का वह शुरुआती क्रोध अब धीरे-धीरे एक कातर लाचारी में बदल रहा था। मेरी गर्म साँसों का झोंका जब उनके उस नाज़ुक अंग से टकराया, तो उनके पूरे शरीर में एक तीव्र लहर दौड़ गई। उन्होंने अपने होंठ और भी कसकर बंद कर लिए थे, मानो वे खुद को इस अनपेक्षित आपदा से बचाने का अंतिम प्रयास कर रही हों, पर उनके गले से फूटी वह एक अस्पष्ट, दबी हुई सिसकी यह बता गई कि उनका मन कितना विदीर्ण और शरीर कितना व्याकुल है।
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मैंने अपने होंठ उनकी उस गर्म त्वचा में और गहरे धँसा दिए। मुझे नहीं पता था कि मेरी मंज़िल क्या है। मेरी हरकतों में एक तरह का मासूम अनाड़ीपन और बेकाबू पागलपन था। मैं चाहता था कि वे इस मिलन में मेरा हाथ थामें, पर उनकी वह छटपटाहट मेरी आग को और हवा दे रही थी। ब्लाउज के कपड़े का वह खुरदरापन और उनकी कोमल खाल का वह रेशमी अहसास मिलकर मेरी संवेदनाओं को सुन्न कर रहे थे। वे अब भी गुस्से से थरथरा रही थीं, पर उस क्रोध के साथ ही अब एक अनजानी, अनचाही उत्तेजना उनके शरीर में सळसळाने लगी थी, जो उन्हें और भी बेचैन कर रही थी। उनकी आँखें कसकर बंद थीं और पलकों पर जमे वे गर्म आँसू उनकी असीम बेबसी की साक्ष्य थे। मेरे शरीर का भार शायद उन्हें असह्य हो रहा था, पर मैं अब किसी भी विचार के परे जा चुका था। मेरे लिए बस उनकी वह सुगंध, वह स्पर्श और उनकी देह से उठते वे सूक्ष्म कंपन ही एकमात्र सत्य थे।

उनकी उस उबदार खाल पर मेरे होंठों के निशान गहरे हो रहे थे। मुझे उनका वह स्वाद—जो थोड़ा खारा पर शहद जैसा मादक था—अपनी ज़ुबान पर महसूस हो रहा था। मेरी वह आदिम प्यास अब किसी भी सामाजिक बंधन या उनके मूक इनकार को मानने को तैयार नहीं थी। मैं चाहता था कि उन्हें कुछ कहूँ, उन्हें सांत्वना दूँ, पर शब्दों के बजाय केवल मेरी गर्म साँसें ही निकल रही थीं। उनकी बेबसी के उस ज़ख्म पर मेरा यह स्पर्श मरहम था या उन्हें और पीड़ा दे रहा था, यह कहना कठिन था, पर उस क्षण मैं बस उनके वजूद में पूरी तरह विलीन हो चुका था। उनका वह मौन विलाप और उनका वह असहाय होकर मेरे स्वाधीन हो जाना, मुझे एक ऐसे मोड़ पर ले आया था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
मेरी धिठाई अब समस्त सीमाओं और नीति-नियमों की दहलीज लाँघने लगी थी। संयम का वह कच्चा बांध अब पूरी तरह ध्वस्त हो गया था और विवेक व लोकलाज का हर अंश उस वासना के प्रवाह में बह चुका था। मैं और भी आक्रामक, और भी व्याकुळ और बेभान हो गया था। मेरा वह बीस साल का यौवन, जिसे आज तक किसी स्त्री-देह का स्पर्श नसीब नहीं हुआ था, आज उस शिखर पर था। मेरे हाथ और मेरी उंगलियां बेतहाशा कांप रही थीं, पर उस कंपन में एक अटूट ज़िद छिपी थी। मेरी उन अनाड़ी उंगलियों ने उनके ब्लाउज के नाज़ुक कोनों को पकड़ लिया और एक उन्मत्त खींचतान शुरू हुई। उस चुस्त रेशमी कपड़े के भीतर जब मेरी उंगलियां अनयास ही प्रविष्ट हुईं, तो उनके उन पुष्ट और गर्म वक्षों का पहला जीवंत स्पर्श मुझे मिला। वह स्पर्श होते ही मेरे हृदय की धड़कन एक पल को थमी और फिर किसी युद्ध के नगाड़े की तरह सीने में बजने लगी। अब यहाँ से पीछे हटना असंभव था; मेरी पूरी देह एक आदिम तृष्णा से भर उठी थी।
मैंने अपने दोनों हाथों से उनके ब्लाउज को नीचे की ओर ज़ोर से खींचा। गले का वह नाज़ुक किनारा नीचे सरक गया और उनके वक्षों का वह अत्यंत कोमल ऊपरी भाग अनावृत हो गया। उस दोपहर खिड़की की झिरी से आती सोने जैसी धूप में उनकी वह गौर कांति किसी स्वर्ण-शिल्प की तरह चमक रही थी। मेरा दिल पागलों की तरह धड़क रहा था। जीवन में पहली बार मैं किसी स्त्री को इतनी नज़दीकी और नग्नता के करीब देख रहा था। मेरी मासूमियत अब एक जंगली उत्साह में विलीन हो चुकी थी। मैं उस मुसाफिर की तरह था जिसे रास्ता तो नहीं पता, पर मंज़िल ने उसे दीवाना बना दिया है। मैंने अपने होंठ नीचे टिका दिए और उनकी उस खुली हुई, सुवासित और रेशमी त्वचा पर अपने होंठ कसकर जमा दिए।
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उस पहले स्पर्श ने ही मेरे पूरे वजूद में बिजली की एक तीव्र और दाहक लहर दौड़ा दी। मेरा रोम-रोम तन गया, रोंगटे खड़े हो गए और आँखों के आगे एक धुंध छा गई। माई अब भी विरोध के स्वर में कुछ बुदबुदा रही थीं, अपने कमज़ोर हाथों से मुझे हटाने का निष्फल प्रयास कर रही थीं, पर उनके वे शब्द अब इतने क्षीण और धुंधले हो गए थे मानो रात की हवा के साथ आने वाली कोई कातर सिसकी हों। उन शब्दों में रोष था, एक गहरी विवशता थी, पर मेरे भार तले दबे उनके शरीर से उठते वे सूक्ष्म कंपन कुछ और ही, कुछ अधिक गूढ और मादक कह रहे थे।
मेरी उस आक्रामक चेष्टा से उनकी साँसें अब उखड़ने लगी थीं। उन्हें मेरे वजन और इस उन्मत्त उत्साह से पीड़ा हो रही थी, उनका सीना तेज़ी से धड़क रहा था, पर मेरी वह आदिम प्यास अब किसी भी दया को नहीं जानती थी। उस शांत और तनावपूर्ण कमरे में अब केवल उनकी वे दबी हुई सिसकियां और मेरी तेज़ साँसों का शोर गूँज रहा था। समाज, रिश्ते और शुचिता—सब विस्मृत हो चुके थे; केवल मैं था और उनका वह बेबस, पर मदहोश करने वाला अस्तित्व। उनकी त्वचा की वह चंदन जैसी महक और मेरी साँसों की तपिश ने वातावरण को असह्य बना दिया था। मैं उनकी उन बेबस आँखों में झाँकना चाहता था; चाहता था कि वे मेरे इस पहले अनुभव को स्वीकार करें। उनकी उस नाज़ुक त्वचा का स्वाद मेरे होंठों पर किसी अमृत की तरह चढ़ रहा था। वे अब भी गुस्से से थरथरा रही थीं, पर उनकी वह देह अब मुझे भस्म करने के लिए पर्याप्त थी।
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उनके वक्षों के उस नाज़ुक किनारे पर हुए उस पहले स्पर्श के बाद, मैंने पल भर की भी मोहलत नहीं दी। मेरा यौवन अब एक बेकाबू रफ़्तार पर था। मैं फिर से ऊपर की ओर सरका, मेरा पूरा वजन उन पर था, जिससे उन्हें साँस लेने में और भी कठिनाई हो रही थी। मैंने उनकी गर्दन के उस संवेदनशील मोड़ से लेकर उनके भीगे गालों तक फिर से अपने होंठों का सफर तय किया। उनका दूसरा गाल भी मेरे चुंबनों और उन गर्म साँसों से सराबोर हो गया। मेरी वह सघन वासना अब अपने शिखर पर थी; रक्त का संचार इतना तीव्र था कि कानों में अपने ही दिल की धड़कनें नगाड़ों जैसी बज रही थीं। एक बार फिर, मैंने अपनी पूरी आर्तता और उस पहली प्यास को उनके होंठों पर समेटने के लिए गर्दन झुकाई, पर एक बार फिर उन्होंने उसी अगतिकता और रोष में अपनी गर्दन झटककर फेर ली और वह बहुप्रतीक्षित चुंबन फिर चूक गया।
पर इस बार मेरे संयम का आखिरी धागा भी टूट गया। उनके उस निरंतर इनकार ने मेरे भीतर के हठी पुरुषार्थ को एक तीव्र चुनौती दे दी थी। मैं चाहता था कि वे इस सुख में मेरी संगिनी बनें, मेरा साथ दें। मेरे दोनों मज़बूत और कांपते हाथों ने उनके उस नाज़ुक, गोरे चेहरे को थाम लिया। उस स्पर्श में अब केवल प्रेम नहीं, बल्कि एक अधिकार और बेकाबू चाहत थी। मैंने उनका चेहरा बलपूर्वक अपनी ओर घुमाया। मैंने उनकी आँखों की गहराई में देखा—वहाँ भय था, समाज का डर था और एक मूक याचना थी, पर अब और प्रतिकार करने की शक्ति उनके शरीर में शेष नहीं थी। वे मेरे वजन और इस जंगली आवेग के आगे पूरी तरह हार चुकी थीं। मैंने अपना सारा प्रेम, वर्षों की वह तड़प और वह व्याकुलता अपनी आवाज़ में समेटी और अत्यंत कातर भाव से उन्हें पुकारा— "माई!"
मेरी उस पुकार में न जाने कैसा जादू था या मेरे उस कोरेपन की कैसी तड़प, कि उस एक सादे ने उनका कलेजा चीर दिया। उन्होंने अपनी गर्दन थोड़ी ऊपर उठाई और उनकी वह डबडबाई नज़रें मेरी नज़रों से टकराईं। उनकी आँखों के कोरों में अब भी आँसू थे, पर वह दहकता हुआ क्रोध अब कहीं विलीन हो चुका था और वहाँ एक असीम शांति थी—जैसे किसी प्रलयंकारी तूफ़ान के बाद की वह भयानक पर बेबस खामोशी। मैंने अत्यंत कोमलता से, मानो उनकी उस विवशता में भी उनकी अंतिम मूक सहमति खोज रहा हूँ, अपने होंठ उनके अधरों के करीब ले गया। मेरे भीतर एक तीव्र धक-धक थी, एक डर था कि वे फिर आखिरी क्षण में मुँह फेर लेंगी। पर इस बार उन्होंने गर्दन नहीं फेरी। वे जड़ बनी रहीं, उनकी साँसें थम सी गई थीं और उनके शरीर का वह कड़ापन अब मेरी ऊष्मा से धीरे-धीरे पिघलने लगा था।
और अंततः, वह पल आ ही गया! मैंने उनके उन नाज़ुक, ऊष्म और रसीले होंठों को अपने अधरों की गिरफ्त में ले लिया।
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जीवन में पहली बार मैं किसी स्त्री के होंठों का वह जीवंत स्वाद चख रहा था। वे स्पर्श में मक्खन जैसे कोमल पर आँच से तपते हुए थे। उन होंठों में उनका भय, उनका क्रोध और उनकी लाचारी कुछ इस तरह घुली थी कि उस चुंबन का स्वाद मुझे और भी मदहोश कर रहा था। शुरुआत में उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, उनके होंठ कसकर बंद थे, मानो उन्होंने आखिरी दीवार खड़ी की हो। पर मेरा वह पागल उत्साह उन्हें भी पुकार रहा था। उनकी साँसें अब मेरी साँसों में पूरी तरह विलीन हो चुकी थीं और कमरे का वह सन्नाटा अब हमारे गीले चुंबनों और उखड़ी हुई साँसों के शोर से भर गया था।
पहले बहुत धीरे, फिर और भी तीव्र आवेग के साथ मैं उन्हें चूमने लगा। मेरा बीस साल का वह लहू और वह पहली छुअन की प्यास उस सौम्यता को क्षण भर में एक उग्र रूप दे गई। मैं दीवानों की तरह उनके होंठों को अपने भीतर भरने लगा। उन होंठों का वह जीवंत, गर्म और नम स्वाद मेरे लिए पूर्णतः नवीन था। उस पहले चुंबन ने मेरा होश पूरी तरह हर लिया था। उस मिलन का आकर्षण इतना बेकाबू था कि उसी मदहोशी में मैंने उन्हें धीरे से पीछे की ओर धकेला। उनका शरीर जैसे जड़ हो गया था, डर और संकोच से उन्होंने खुद को समेट लिया था, पर मेरी आगोश की उस ताकत के आगे वे बेबस थीं।
वे कोई हलचल नहीं कर सकीं और सहज ही उस मखमली बिस्तर पर ढह गईं।
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उन्हें चूमते हुए ही, उनके होंठों का साथ पल भर को भी छोड़े बिना, मैं उन पर लेट गया। अब उनका वह कोमल और सिहरा हुआ शरीर मेरे देह के भार तले पूरी तरह दब चुका था। मुझे अपना वजन उन पर महसूस हो रहा था, और उससे उन्हें होने वाली वह बेचैनी भी मैं समझ रहा था। पर मेरी वह आदिम प्यास अब किसी भी परवाह से मुक्त थी। उनके होंठ मेरे होंठों में इस कदर कैद थे कि अब उनके पास विरोध दर्ज करने या चिल्लाने का कोई मार्ग शेष नहीं था। मेरा मन किसी उन्मत्त उत्साह से भरा था—यह मेरा पहला स्पर्श था, मेरा पहला मिलन था, और सामने मेरी वह संगिनी थी जिसके सामने मैंने अपना सर्वस्व खोलकर रख दिया था।
 
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पल भर के लिए उनका वह इनकार मुझे किसी फाँस की तरह चुभा, और एक अनजानी निराशा ने मेरे मन को घेर लिया। जिस सुख की मैं बड़ी आतुरता से प्रतीक्षा कर रहा था, वह अधरों का मिलन अधर में ही लटक गया था। पर वह निराशा अधिक देर तक नहीं टिकी; मेरे भीतर धधकती उस बेकाबू चाहत ने मुझे फिर से संभाल लिया। मेरे मन ने तुरंत खुद को तर्क दिया—'क्या हुआ जो होंठ नहीं मिले? उनके ये भरे हुए गाल, जिनकी कोमलता के सपने मैंने न जाने कितनी रातों में देखे थे, वे तो अब मेरे स्पर्श में थे।' उनकी खाल की वह रेशमी गर्माहट मेरी संवेदनाओं को और भी तीव्र कर रही थी। उस शुरुआती झटके को भूलकर, मैं उसी क्षण उनके गालों को चूमने लगा। पहले मेरे होंठ अत्यंत सहजता से वहाँ थमे, पर देखते ही देखते उस स्पर्श ने एक व्याकुल रूप धारण कर लिया।
मेरा वह बीस साल का उफनता यौवन और जीवन में पहली बार किसी स्त्री के देह से हुआ यह साक्षात् और जीवंत स्पर्श—इस सबने मेरे विवेक को पूरी तरह हर लिया था। मुझे नहीं पता था कि प्रेम की अभिव्यक्ति कैसे की जाती है या कोई स्त्री जब इतने करीब होती है तो क्या करना चाहिए, पर मेरा शरीर उस खिंचाव के वश होकर खुद अपना मार्ग खोज रहा था। उनके गालों पर जब मेरे होंठ रेंग रहे थे, तब मुझे एक अनूठा स्वाद महसूस हुआ—उनकी आँखों से ढलकते आँसुओं का वह खारापन मेरे होंठों पर उतरा, पर उस स्वाद में भी एक अलौकिक नशा था। मेरी आक्रामकता और शरीर के बोझ तले वे दबी हुई थीं, उन्हें सांस लेने में भी थोड़ी कठिनाई हो रही थी, पर उनकी वह छटपटाहट और विवशता मुझे और भी उकसा रही थी।
निराशा अब कपूर की तरह उड़ चुकी थी और उसका स्थान एक नए, अदम्य उन्माद ने ले लिया था। माई के चेहरे पर क्रोध की लकीरें थीं, उनकी आँखों में लाचारी उमड़ रही थी, पर मेरी आगोश की ताकत उनके प्रतिरोध से कहीं अधिक प्रबल थी। मैं अब उनके गालों से आगे बढ़ते हुए उनके चेहरे के एक-एक कोने को अपने होंठों से मापने लगा। उनकी ठुड्डी, उनका माथा, उनकी नाक... मैं जानबूझकर उनके होंठों को बचाते हुए उनके अंग-अंग पर अपने अधिकार की छाप छोड़ रहा था।
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उनकी त्वचा का वह मखमली स्पर्श, जिसे आज तक मैंने केवल दूर से निहारा था, वह अब इतना निकट था कि उनके शरीर की वह चंदन जैसी सोंधी खुशबू मुझे मदहोश कर रही थी। माई के मुँह से कुछ अस्पष्ट शब्द निकल रहे थे, पर उनका अर्थ समझना कठिन था। मानो वे अपने ही मन से संघर्ष कर रही थीं या इस अनपेक्षित प्रहार को निशब्द सहने के अलावा उनके पास कोई विकल्प शेष नहीं था। उनकी वह बुदबुदाहट मुझ पर उनके क्रोध की थी, विरोध की थी या उस स्पर्श से उपजे एक अज्ञात डर की—यह जानने की उस पल मुझमें कोई इच्छा नहीं थी। मेरी वह मासूमियत अब एक आदिम पागलपन में बदल चुकी थी। मैं बस उस क्षण के सुख और उनकी उस बेबसी को जीना चाहता था। मेरे होंठ अब उनके चेहरे से धीरे-धीरे नीचे उतरे और उनकी गर्दन की नाज़ुक त्वचा पर जा थमे। वहाँ उनकी साँसों की तपिश और भी तेज़ी से महसूस हो रही थी, मानो मेरा यह आक्रमण उनके रोम-रोम को सिहरा गया था और वे खुद को पूरी तरह असहाय मानकर मेरे स्वाधीन हो गई थीं। जब मेरी छुअन से उनकी गर्दन कांपी, तो मुझे आभास हुआ कि अब इस यात्रा को रोक पाना मेरे बस में नहीं है।
गर्दन के उस अत्यंत संवेदनशील मोड़ से मेरे होंठ अब धीरे से सरकते हुए उनके कंधों की ओर बढ़े। मेरा वह कोरा यौवन, जिसने कभी किसी स्त्री-देह की आँच महसूस नहीं की थी, वह अब उस रोमांच से पुलकित हो उठा था। उनकी साड़ी अब काफी ढीली हो चुकी थी और वह भारी जरतारी पल्लू, जो पहले ही कंधे से आधा फिसल चुका था, उसे मैंने अपने कांपते हाथों से और भी किनारे कर दिया।
रेशमी कपड़े के सरकने की वह सरसराहट और माई के हृदय की वह बढ़ी हुई धड़कन एक रहस्यमयी लय में घुल-मिल रही थी। जैसे ही पल्लू पूरी तरह हटा, उनका वह धवल, गोरा और मक्खन जैसा सुडौल कंधा किसी सुंदर शिल्प की तरह मेरी आँखों के सामने अनावृत हो गया। कमरे की उस मद्धम पीली रोशनी में उनकी वह निखरी त्वचा किसी स्वर्ण-प्रतिमा की तरह दमक रही थी और उस पर पड़ती मेरी परछाईं का खेल उन्हें और भी मादक व रहस्यमयी बना रहा था।
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माई ने क्रोध और विवशता में अपनी गर्दन दूसरी ओर मोड़ ली थी। उन्होंने अपने दांतों तले निचले होंठ को कसकर दबा लिया था, मानो वे अपने भीतर उमड़ती सिसकियों और लाचार शब्दों को कंठ में ही घोंटने का प्रयास कर रही हों। उनकी यह बेबसी, उनका यह मूक निषेध मुझे रोकने के बजाय मेरी आदिम वासना को और भी भड़का रहा था। सच तो यह है कि मुझे ठीक से पता ही नहीं था कि आगे क्या करना है; मेरा यह पहला अनुभव था, इसलिए मुझमें एक तरह का भोलापन और प्रचंड जिज्ञासा एक साथ थी। मैं मन ही मन चाहता था कि वे मेरा साथ दें, वे इस अनुभव में मेरी संगिनी बनें, पर उनका वह रूखा इनकार मेरी आग में घी डालने का काम कर रहा था।
मैंने अपने होंठ उनके कंधे की उस कोमल और गर्म त्वचा पर बहुत ही नरमी से रख दिए।
जैसे ही वह पहली उष्ण छुअन हुई, माई के पूरे बदन में रोंगटे खड़े हो गए। उनका शरीर एक क्षण के लिए किसी खिंचे हुए धनुष की तरह तन गया और फिर अगले ही पल विवश होकर पिघलते हुए मोम की तरह ढीला पड़ गया। मैंने वहाँ की उस गर्म त्वचा को अपने होंठों के घेरे में भर लिया, मानो उनका पूरा अस्तित्व ही मैं अपनी साँसों में समेट लेना चाहता हूँ। उनके शरीर की वह प्राकृतिक, चंदन जैसी मादक खुशबू ने मुझे पूरी तरह विभोर कर दिया था। जीवन में पहली बार मैं ऐसी किसी जीवंत सुगंध और रस का अनुभव कर रहा था। वे कुछ नहीं बोल रही थीं, बस उनकी साँसें अब हाँफने के रूप में तेज़ चल रही थीं और उनकी आँखों के कोरों से धीरे से ढलका वह एक गर्म आँसू उनकी उस अथाह विवशता की मूक गवाही दे रहा था। मेरे उस जंगली जुनून को अब उन आँसुओं या समाज के नीति-नियमों की कोई परवाह नहीं थी, मैं बस उस स्पर्श की मदहोशी में खुद को लुटा चुका था।
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पल्लू के रेशमी आवरण के नीचे अब तक सुरक्षित और अब मेरे आवेग के कारण खुला हुआ वह मखमली हिस्सा मेरे होंठों के दायरे में आ गया। ब्लाउज के उस नाज़ुक किनारे के पास की उनकी साफ़ त्वचा मेरे स्पर्श से जैसे प्रज्वलित हो उठी। वहाँ की वह प्राकृतिक आँच मेरी नसों में बिजली की तरह कौंध रही थी। माई का वह शुरुआती क्रोध अब धीरे-धीरे एक कातर लाचारी में बदल रहा था। मेरी गर्म साँसों का झोंका जब उनके उस नाज़ुक अंग से टकराया, तो उनके पूरे शरीर में एक तीव्र लहर दौड़ गई। उन्होंने अपने होंठ और भी कसकर बंद कर लिए थे, मानो वे खुद को इस अनपेक्षित आपदा से बचाने का अंतिम प्रयास कर रही हों, पर उनके गले से फूटी वह एक अस्पष्ट, दबी हुई सिसकी यह बता गई कि उनका मन कितना विदीर्ण और शरीर कितना व्याकुल है।
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मैंने अपने होंठ उनकी उस गर्म त्वचा में और गहरे धँसा दिए। मुझे नहीं पता था कि मेरी मंज़िल क्या है। मेरी हरकतों में एक तरह का मासूम अनाड़ीपन और बेकाबू पागलपन था। मैं चाहता था कि वे इस मिलन में मेरा हाथ थामें, पर उनकी वह छटपटाहट मेरी आग को और हवा दे रही थी। ब्लाउज के कपड़े का वह खुरदरापन और उनकी कोमल खाल का वह रेशमी अहसास मिलकर मेरी संवेदनाओं को सुन्न कर रहे थे। वे अब भी गुस्से से थरथरा रही थीं, पर उस क्रोध के साथ ही अब एक अनजानी, अनचाही उत्तेजना उनके शरीर में सळसळाने लगी थी, जो उन्हें और भी बेचैन कर रही थी। उनकी आँखें कसकर बंद थीं और पलकों पर जमे वे गर्म आँसू उनकी असीम बेबसी की साक्ष्य थे। मेरे शरीर का भार शायद उन्हें असह्य हो रहा था, पर मैं अब किसी भी विचार के परे जा चुका था। मेरे लिए बस उनकी वह सुगंध, वह स्पर्श और उनकी देह से उठते वे सूक्ष्म कंपन ही एकमात्र सत्य थे।

उनकी उस उबदार खाल पर मेरे होंठों के निशान गहरे हो रहे थे। मुझे उनका वह स्वाद—जो थोड़ा खारा पर शहद जैसा मादक था—अपनी ज़ुबान पर महसूस हो रहा था। मेरी वह आदिम प्यास अब किसी भी सामाजिक बंधन या उनके मूक इनकार को मानने को तैयार नहीं थी। मैं चाहता था कि उन्हें कुछ कहूँ, उन्हें सांत्वना दूँ, पर शब्दों के बजाय केवल मेरी गर्म साँसें ही निकल रही थीं। उनकी बेबसी के उस ज़ख्म पर मेरा यह स्पर्श मरहम था या उन्हें और पीड़ा दे रहा था, यह कहना कठिन था, पर उस क्षण मैं बस उनके वजूद में पूरी तरह विलीन हो चुका था। उनका वह मौन विलाप और उनका वह असहाय होकर मेरे स्वाधीन हो जाना, मुझे एक ऐसे मोड़ पर ले आया था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
मेरी धिठाई अब समस्त सीमाओं और नीति-नियमों की दहलीज लाँघने लगी थी। संयम का वह कच्चा बांध अब पूरी तरह ध्वस्त हो गया था और विवेक व लोकलाज का हर अंश उस वासना के प्रवाह में बह चुका था। मैं और भी आक्रामक, और भी व्याकुळ और बेभान हो गया था। मेरा वह बीस साल का यौवन, जिसे आज तक किसी स्त्री-देह का स्पर्श नसीब नहीं हुआ था, आज उस शिखर पर था। मेरे हाथ और मेरी उंगलियां बेतहाशा कांप रही थीं, पर उस कंपन में एक अटूट ज़िद छिपी थी। मेरी उन अनाड़ी उंगलियों ने उनके ब्लाउज के नाज़ुक कोनों को पकड़ लिया और एक उन्मत्त खींचतान शुरू हुई। उस चुस्त रेशमी कपड़े के भीतर जब मेरी उंगलियां अनयास ही प्रविष्ट हुईं, तो उनके उन पुष्ट और गर्म वक्षों का पहला जीवंत स्पर्श मुझे मिला। वह स्पर्श होते ही मेरे हृदय की धड़कन एक पल को थमी और फिर किसी युद्ध के नगाड़े की तरह सीने में बजने लगी। अब यहाँ से पीछे हटना असंभव था; मेरी पूरी देह एक आदिम तृष्णा से भर उठी थी।
मैंने अपने दोनों हाथों से उनके ब्लाउज को नीचे की ओर ज़ोर से खींचा। गले का वह नाज़ुक किनारा नीचे सरक गया और उनके वक्षों का वह अत्यंत कोमल ऊपरी भाग अनावृत हो गया। उस दोपहर खिड़की की झिरी से आती सोने जैसी धूप में उनकी वह गौर कांति किसी स्वर्ण-शिल्प की तरह चमक रही थी। मेरा दिल पागलों की तरह धड़क रहा था। जीवन में पहली बार मैं किसी स्त्री को इतनी नज़दीकी और नग्नता के करीब देख रहा था। मेरी मासूमियत अब एक जंगली उत्साह में विलीन हो चुकी थी। मैं उस मुसाफिर की तरह था जिसे रास्ता तो नहीं पता, पर मंज़िल ने उसे दीवाना बना दिया है। मैंने अपने होंठ नीचे टिका दिए और उनकी उस खुली हुई, सुवासित और रेशमी त्वचा पर अपने होंठ कसकर जमा दिए।
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उस पहले स्पर्श ने ही मेरे पूरे वजूद में बिजली की एक तीव्र और दाहक लहर दौड़ा दी। मेरा रोम-रोम तन गया, रोंगटे खड़े हो गए और आँखों के आगे एक धुंध छा गई। माई अब भी विरोध के स्वर में कुछ बुदबुदा रही थीं, अपने कमज़ोर हाथों से मुझे हटाने का निष्फल प्रयास कर रही थीं, पर उनके वे शब्द अब इतने क्षीण और धुंधले हो गए थे मानो रात की हवा के साथ आने वाली कोई कातर सिसकी हों। उन शब्दों में रोष था, एक गहरी विवशता थी, पर मेरे भार तले दबे उनके शरीर से उठते वे सूक्ष्म कंपन कुछ और ही, कुछ अधिक गूढ और मादक कह रहे थे।
मेरी उस आक्रामक चेष्टा से उनकी साँसें अब उखड़ने लगी थीं। उन्हें मेरे वजन और इस उन्मत्त उत्साह से पीड़ा हो रही थी, उनका सीना तेज़ी से धड़क रहा था, पर मेरी वह आदिम प्यास अब किसी भी दया को नहीं जानती थी। उस शांत और तनावपूर्ण कमरे में अब केवल उनकी वे दबी हुई सिसकियां और मेरी तेज़ साँसों का शोर गूँज रहा था। समाज, रिश्ते और शुचिता—सब विस्मृत हो चुके थे; केवल मैं था और उनका वह बेबस, पर मदहोश करने वाला अस्तित्व। उनकी त्वचा की वह चंदन जैसी महक और मेरी साँसों की तपिश ने वातावरण को असह्य बना दिया था। मैं उनकी उन बेबस आँखों में झाँकना चाहता था; चाहता था कि वे मेरे इस पहले अनुभव को स्वीकार करें। उनकी उस नाज़ुक त्वचा का स्वाद मेरे होंठों पर किसी अमृत की तरह चढ़ रहा था। वे अब भी गुस्से से थरथरा रही थीं, पर उनकी वह देह अब मुझे भस्म करने के लिए पर्याप्त थी।
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उनके वक्षों के उस नाज़ुक किनारे पर हुए उस पहले स्पर्श के बाद, मैंने पल भर की भी मोहलत नहीं दी। मेरा यौवन अब एक बेकाबू रफ़्तार पर था। मैं फिर से ऊपर की ओर सरका, मेरा पूरा वजन उन पर था, जिससे उन्हें साँस लेने में और भी कठिनाई हो रही थी। मैंने उनकी गर्दन के उस संवेदनशील मोड़ से लेकर उनके भीगे गालों तक फिर से अपने होंठों का सफर तय किया। उनका दूसरा गाल भी मेरे चुंबनों और उन गर्म साँसों से सराबोर हो गया। मेरी वह सघन वासना अब अपने शिखर पर थी; रक्त का संचार इतना तीव्र था कि कानों में अपने ही दिल की धड़कनें नगाड़ों जैसी बज रही थीं। एक बार फिर, मैंने अपनी पूरी आर्तता और उस पहली प्यास को उनके होंठों पर समेटने के लिए गर्दन झुकाई, पर एक बार फिर उन्होंने उसी अगतिकता और रोष में अपनी गर्दन झटककर फेर ली और वह बहुप्रतीक्षित चुंबन फिर चूक गया।
पर इस बार मेरे संयम का आखिरी धागा भी टूट गया। उनके उस निरंतर इनकार ने मेरे भीतर के हठी पुरुषार्थ को एक तीव्र चुनौती दे दी थी। मैं चाहता था कि वे इस सुख में मेरी संगिनी बनें, मेरा साथ दें। मेरे दोनों मज़बूत और कांपते हाथों ने उनके उस नाज़ुक, गोरे चेहरे को थाम लिया। उस स्पर्श में अब केवल प्रेम नहीं, बल्कि एक अधिकार और बेकाबू चाहत थी। मैंने उनका चेहरा बलपूर्वक अपनी ओर घुमाया। मैंने उनकी आँखों की गहराई में देखा—वहाँ भय था, समाज का डर था और एक मूक याचना थी, पर अब और प्रतिकार करने की शक्ति उनके शरीर में शेष नहीं थी। वे मेरे वजन और इस जंगली आवेग के आगे पूरी तरह हार चुकी थीं। मैंने अपना सारा प्रेम, वर्षों की वह तड़प और वह व्याकुलता अपनी आवाज़ में समेटी और अत्यंत कातर भाव से उन्हें पुकारा— "माई!"
मेरी उस पुकार में न जाने कैसा जादू था या मेरे उस कोरेपन की कैसी तड़प, कि उस एक सादे ने उनका कलेजा चीर दिया। उन्होंने अपनी गर्दन थोड़ी ऊपर उठाई और उनकी वह डबडबाई नज़रें मेरी नज़रों से टकराईं। उनकी आँखों के कोरों में अब भी आँसू थे, पर वह दहकता हुआ क्रोध अब कहीं विलीन हो चुका था और वहाँ एक असीम शांति थी—जैसे किसी प्रलयंकारी तूफ़ान के बाद की वह भयानक पर बेबस खामोशी। मैंने अत्यंत कोमलता से, मानो उनकी उस विवशता में भी उनकी अंतिम मूक सहमति खोज रहा हूँ, अपने होंठ उनके अधरों के करीब ले गया। मेरे भीतर एक तीव्र धक-धक थी, एक डर था कि वे फिर आखिरी क्षण में मुँह फेर लेंगी। पर इस बार उन्होंने गर्दन नहीं फेरी। वे जड़ बनी रहीं, उनकी साँसें थम सी गई थीं और उनके शरीर का वह कड़ापन अब मेरी ऊष्मा से धीरे-धीरे पिघलने लगा था।
और अंततः, वह पल आ ही गया! मैंने उनके उन नाज़ुक, ऊष्म और रसीले होंठों को अपने अधरों की गिरफ्त में ले लिया।
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जीवन में पहली बार मैं किसी स्त्री के होंठों का वह जीवंत स्वाद चख रहा था। वे स्पर्श में मक्खन जैसे कोमल पर आँच से तपते हुए थे। उन होंठों में उनका भय, उनका क्रोध और उनकी लाचारी कुछ इस तरह घुली थी कि उस चुंबन का स्वाद मुझे और भी मदहोश कर रहा था। शुरुआत में उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, उनके होंठ कसकर बंद थे, मानो उन्होंने आखिरी दीवार खड़ी की हो। पर मेरा वह पागल उत्साह उन्हें भी पुकार रहा था। उनकी साँसें अब मेरी साँसों में पूरी तरह विलीन हो चुकी थीं और कमरे का वह सन्नाटा अब हमारे गीले चुंबनों और उखड़ी हुई साँसों के शोर से भर गया था।
पहले बहुत धीरे, फिर और भी तीव्र आवेग के साथ मैं उन्हें चूमने लगा। मेरा बीस साल का वह लहू और वह पहली छुअन की प्यास उस सौम्यता को क्षण भर में एक उग्र रूप दे गई। मैं दीवानों की तरह उनके होंठों को अपने भीतर भरने लगा। उन होंठों का वह जीवंत, गर्म और नम स्वाद मेरे लिए पूर्णतः नवीन था। उस पहले चुंबन ने मेरा होश पूरी तरह हर लिया था। उस मिलन का आकर्षण इतना बेकाबू था कि उसी मदहोशी में मैंने उन्हें धीरे से पीछे की ओर धकेला। उनका शरीर जैसे जड़ हो गया था, डर और संकोच से उन्होंने खुद को समेट लिया था, पर मेरी आगोश की उस ताकत के आगे वे बेबस थीं।
वे कोई हलचल नहीं कर सकीं और सहज ही उस मखमली बिस्तर पर ढह गईं।
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उन्हें चूमते हुए ही, उनके होंठों का साथ पल भर को भी छोड़े बिना, मैं उन पर लेट गया। अब उनका वह कोमल और सिहरा हुआ शरीर मेरे देह के भार तले पूरी तरह दब चुका था। मुझे अपना वजन उन पर महसूस हो रहा था, और उससे उन्हें होने वाली वह बेचैनी भी मैं समझ रहा था। पर मेरी वह आदिम प्यास अब किसी भी परवाह से मुक्त थी। उनके होंठ मेरे होंठों में इस कदर कैद थे कि अब उनके पास विरोध दर्ज करने या चिल्लाने का कोई मार्ग शेष नहीं था। मेरा मन किसी उन्मत्त उत्साह से भरा था—यह मेरा पहला स्पर्श था, मेरा पहला मिलन था, और सामने मेरी वह संगिनी थी जिसके सामने मैंने अपना सर्वस्व खोलकर रख दिया था।
Super duper update just wow man amazing 🙏🙏🙏🙏🙏
 

sunoanuj

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एपिसोड 16: मर्यादाओं की राख और दहकता लहू
वह खामोशी अब और अधिक समय तक टिकने वाली नहीं थी। मेरे स्पर्श ने उनकी नींद ही नहीं तोड़ी थी, बल्कि उनके भीतर के किसी सोए हुए ज्वालामुखी को भी झकझोर दिया था। कुछ क्षणों की स्तब्धता के बाद, वे अचानक झटके से उठकर बैठ गईं। उनकी हरकतों में अब वह पुरानी सौम्यता नहीं थी; उसकी जगह एक खौलता हुआ आक्रोश था।
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उनकी आँखों में जो कुछ पल पहले तक एक अनकही शांति थी, वह अब पिघल चुकी थी और उसका स्थान तीव्र क्रोध ने ले लिया था। उन्होंने मुड़कर मेरी ओर देखा, उनकी निगाहें जैसे साक्षात् आग उगल रही थीं। डर के मारे मेरा चेहरा सफेद पड़ गया। क्या बोलूँ, क्या करूँ—दिमाग सुन्न हो गया था। मेरा अपराध इतना बड़ा और यह कृत्य इतना अनपेक्षित था कि मैं उनके सामने किसी अपराधी की तरह जड़ होकर बैठा रहा, मानो मुझे आभास ही न हो कि मैंने क्या कर दिया है।
पर माई सब समझ चुकी थीं। उनका स्वर ऊँचा हुआ। "क्या चल रहा है यह सब?" वे लगभग दहाड़ उठीं। "क्या अभी भी छोटे बच्चे हो तुम? कुछ समझ नहीं आता? मैं उम्र में तुमसे कितनी बड़ी हूँ... और तुम मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हो?" उनके स्वर में क्रोध के साथ-साथ एक गहरी हताशा और निराशा भी घुली हुई थी। "मेरा क्या कसूर था? मैं शांति से सो रही थी न? फिर तुमने... तुमने ऐसा क्यों किया?" उनके शब्द किसी चाबुक की तरह मुझ पर बरस रहे थे। वे लगातार बोलती जा रही थीं—रिश्तों की दुहाई, उम्र का फासला, और संस्कारों की मर्यादाएं।
मैं बुरी तरह घबराया हुआ था, पर मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। मैंने उन्हें शांत करने और समझाने का एक कायरतापूर्ण प्रयास किया। "माई, वैसा नहीं है... मुझसे गलती हो गई... मुझे माफ कर दो..." ऐसे ही कुछ टूटे-फूटे शब्द मेरे मुँह से निकल रहे थे। और इसी हड़बड़ाहट में, चाहे इसे मेरा साहस कहिए या मूर्खता, मेरा एक हाथ उनकी जांघ पर जा टिका। शायद उन्हें सांत्वना देने का वह एक बहुत ही अनुचित प्रयास था।
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उनके उस गुस्से और तीव्र विरोध का मुझ पर अब कोई असर नहीं हो रहा था, क्योंकि मेरे भीतर के बीस साल के उस कच्चे और बेलगाम यौवन ने आज तक किसी स्त्री-देह का ऐसा जीवंत और दहकता स्पर्श कभी महसूस नहीं किया था। मेरी हथेली उनकी जांघ पर टिकी रही। शुरुआत में अपने गुस्से के कारण शायद उन्होंने ध्यान नहीं दिया, पर जैसे ही मेरा हाथ और अधिक साहसी होकर उनकी कमर के नाज़ुक मोड़ों की ओर बढ़ने लगा, वे पूरी तरह सचेत हो गईं। उन्होंने घृणा और क्रोध के साथ मेरा हाथ झटक दिया, जैसे किसी ने अपने शरीर से किसी ज़हरीले साँप को झटक दिया हो। "हटाओ अपना हाथ!" उनके शब्द धारदार थे, पर मेरी नसों में दौड़ रहा रक्त अब किसी मर्यादा को मानने को तैयार नहीं था। मैंने फिर कोशिश की, फिर उनकी कमर पर हाथ रखा। उन्होंने फिर उसे झटक दिया। दो-तीन बार यह लुका-छिपी का खेल चलता रहा। मेरे भीतर की आदिम चाहत और उनकी बेबसी के बीच एक अदृश्य युद्ध छिड़ गया था। अंततः, उन्होंने विरोध करना छोड़ दिया। उन्होंने अब मेरा हाथ झटका तो नहीं, पर उनकी दूसरी ओर मुड़ी हुई गर्दन और उनकी वह पराजित नज़र सब कुछ बयां कर रही थी। उस भारी सन्नाटे में केवल हमारी तेज़ सांसों की आवाज़ गूँज रही थी।
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उनकी आँखों के कोर अब भीग चुके थे। उन्होंने धीरे से गर्दन घुमाई और मेरी आँखों में अपनी आँखें डाल दीं। अब उन आँखों में वह दहकता हुआ क्रोध नहीं था; उसकी जगह एक विवश और अगतिक विनती ने ले ली थी। उनकी उन डबडबाई आँखों को देखकर मेरा मन एक क्षण के लिए कांपा, पर शरीर की ऊर्जा थमने का नाम नहीं ले रही थी। "अरे, छोड़ दो न... यह अच्छा नहीं लग रहा," वे कातर स्वर में कह रही थीं। उनकी आवाज़ अब टूट रही थी। "मैं उम्र में तुमसे कितनी बड़ी हूँ, रिश्ते में भी... लोग क्या कहेंगे? अगर घर वालों को पता चला, तो कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे।" उनके हर शब्द में समाज का डर, रिश्तों का ताना-बाना और अपनी बेबसी साफ झलक रही थी। वे मुझे समझाने की आखिरी कोशिश कर रही थीं, मानो मैं अब भी वही छोटा बच्चा था।
पर मुझे पता था, मैं अब बच्चा नहीं रहा था। मेरी हथेली के नीचे उनकी उस रेशमी त्वचा का स्पर्श मुझे पुकार रहा था। मैंने उन्हें आश्वस्त करने का प्रयास किया, "माई, तुम चिंता मत करो... किसी को कुछ पता नहीं चलेगा। मैं सब समझता हूँ।" मेरे शब्द भले ही सांत्वना देने वाले थे, पर मेरा कृत्य मेरी अनियंत्रित वासना की गवाही दे रहा था। मेरा हाथ अब केवल उनकी कमर पर थमा नहीं था, बल्कि वह और भी उन्मुक्त होकर उनकी उस मक्खन जैसी मुलायम त्वचा पर रेंगने लगा था।
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स्त्री-देह का वह पहला अनुभव मेरे लिए किसी अगाध महासागर की तरह था—उनकी देह की आँच, वह विशिष्ट मादक सुगंध और मेरे स्पर्श से उनके अंग-अंग में दौड़ती वह सिहरन। इस सबने मेरे संयम के आखिरी बांध को भी ध्वस्त कर दिया था।
मैं पूरी तरह उनकी दुनिया में खो चुका था। मेरा बीस साल का यौवन आज एक ऐसी दहलीज़ पर खड़ा था, जहाँ विवेक और वासना का मेल नामुमकिन था। मैंने अपने दोनों हाथ उनके कंधों पर रखे और उन्हें थोड़ा अपनी ओर खींचा। मेरे स्पर्श में अब एक तरह का मालिकाना हक था। उनकी आँखों में डर का बवंडर था, पर मुझे उस पल वे केवल मेरी संगिनी दिख रही थीं—मेरे जीवन के उस पहले मिलन की साक्षी। मैंने उनकी नज़रों में झांकते हुए, अपनी पूरी आर्तता के साथ उन्हें पुकारा, "माई!"
मेरी उस पुकार ने उन्हें जैसे पत्थर का बना दिया। उनकी फटी हुई आँखें और कांपते होंठ जैसे किसी सदमे में जम गए थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें। उस स्तब्धता का लाभ उठाकर मैं धीरे से उनके और करीब गया। हमारे चेहरे अब इतने करीब थे कि उनकी गर्म सांसों का स्पर्श मेरे गालों को दहला रहा था। जीवन में पहली बार मैं इतने करीब से किसी के होंठों को निहार रहा था। वे डर से कांपते हुए, भीगे हुए होंठ मुझे अपनी ओर खींच रहे थे। मैं उन होंठों का स्वाद चखना चाहता था, उस महक को जीना चाहता था। मेरा हृदय किसी युद्ध के नगाड़े की तरह धड़क रहा था। मैं अब एक ऐसी यात्रा की शुरुआत पर था, जहाँ से पीछे मुड़ना हम दोनों के लिए असंभव था।
उस एक पल के लिए जैसे पूरी सृष्टि थम गई। मेरे जीवन का वह सबसे रोमांचक और रहस्यमयी क्षण था। मेरी सांसों की तपिश उनके चेहरे पर टकरा रही थी और उनकी तेज़, उखड़ी हुई सांसें मेरे होंठों को छू रही थीं। मेरे कोरे यौवन को अब किसी बात का होश नहीं था। मेरी मासूमियत अब उस अगाध वासना में विलीन हो चुकी थी। मुझे बस वे कांपते हुए होंठ चाहिए थे। मैंने आँखें मूँद लीं और उन होंठों की प्यास में दीवानों की तरह आगे झुका। एक पल को लगा कि ब्रह्मांड का सारा सुख उस एक चुंबन में सिमट जाएगा... पर उसी अंतिम क्षण में, जैसे किसी अदृश्य बिजली का झटका लगा हो, वे अचानक होश में आ गईं।
उनके भीतर का वह सामाजिक डर और रिश्तों का संकोच एक झटके में जाग उठा। उन्होंने अपनी गर्दन बड़े ज़ोर से एक तरफ घुमा ली। मेरे होंठ, जो उनके अधरों के लिए व्याकुल थे, अपने लक्ष्य तक पहुँचने के बजाय उनके मखमली और गर्म गालों पर जा टिके।
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वह स्पर्श... वह महज़ एक पल का था, पर उस एक पल में मैंने जो महसूस किया, वह शब्दों के परे था। उनके गाल रोने की वजह से थोड़े नम थे, और उन आँसुओं का वह किंचित खारापन पर मादक स्वाद मेरे होंठों से लग गया। स्त्री-देह का वह पहला जीवंत स्पर्श, भले ही वह अधूरा था, फिर भी उसने मेरे पूरे वजूद में बिजली की एक लहर दौड़ा दी।
उन गालों से मेरे होंठों को उनकी रेशमी कांति और उनके शरीर की वह प्राकृतिक, चंदन जैसी खुशबू मिली। वह अपेक्षित चुंबन भले ही चूक गया था, पर उन गालों के उस चोरी-छिपे स्पर्श ने मुझे एक अलग ही मदहोशी में डुबो दिया था। मेरी वह अनकही उत्सुकता अब और भी उग्र हो उठी थी। उनकी बेबसी मुझे दिख रही थी, उनका मूक विरोध मैं महसूस कर रहा था, पर उनके गालों का वह मक्खन जैसा अहसास मुझे और पागल बना रहा था। उन्होंने चेहरा तो मोड़ लिया था, पर मेरी आगोश में उनकी वह छटपटाहट अब मेरे पुरुषार्थ को और भी उकसा रही थी। वह एक स्पर्श मेरे लिए महासागर की उस पहली लहर जैसा था, जिसने मुझे पूरी तरह भिगो दिया था और अब मुझे उस गहराई में उतरने से कोई नहीं रोक सकता था।​
Bahut hee shandaar update hai. !
 
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sunoanuj

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एपिसोड 17: समर्पण की दहलीज और वह प्रथम मिलन
पल भर के लिए उनका वह इनकार मुझे किसी फाँस की तरह चुभा, और एक अनजानी निराशा ने मेरे मन को घेर लिया। जिस सुख की मैं बड़ी आतुरता से प्रतीक्षा कर रहा था, वह अधरों का मिलन अधर में ही लटक गया था। पर वह निराशा अधिक देर तक नहीं टिकी; मेरे भीतर धधकती उस बेकाबू चाहत ने मुझे फिर से संभाल लिया। मेरे मन ने तुरंत खुद को तर्क दिया—'क्या हुआ जो होंठ नहीं मिले? उनके ये भरे हुए गाल, जिनकी कोमलता के सपने मैंने न जाने कितनी रातों में देखे थे, वे तो अब मेरे स्पर्श में थे।' उनकी खाल की वह रेशमी गर्माहट मेरी संवेदनाओं को और भी तीव्र कर रही थी। उस शुरुआती झटके को भूलकर, मैं उसी क्षण उनके गालों को चूमने लगा। पहले मेरे होंठ अत्यंत सहजता से वहाँ थमे, पर देखते ही देखते उस स्पर्श ने एक व्याकुल रूप धारण कर लिया।
मेरा वह बीस साल का उफनता यौवन और जीवन में पहली बार किसी स्त्री के देह से हुआ यह साक्षात् और जीवंत स्पर्श—इस सबने मेरे विवेक को पूरी तरह हर लिया था। मुझे नहीं पता था कि प्रेम की अभिव्यक्ति कैसे की जाती है या कोई स्त्री जब इतने करीब होती है तो क्या करना चाहिए, पर मेरा शरीर उस खिंचाव के वश होकर खुद अपना मार्ग खोज रहा था। उनके गालों पर जब मेरे होंठ रेंग रहे थे, तब मुझे एक अनूठा स्वाद महसूस हुआ—उनकी आँखों से ढलकते आँसुओं का वह खारापन मेरे होंठों पर उतरा, पर उस स्वाद में भी एक अलौकिक नशा था। मेरी आक्रामकता और शरीर के बोझ तले वे दबी हुई थीं, उन्हें सांस लेने में भी थोड़ी कठिनाई हो रही थी, पर उनकी वह छटपटाहट और विवशता मुझे और भी उकसा रही थी।
निराशा अब कपूर की तरह उड़ चुकी थी और उसका स्थान एक नए, अदम्य उन्माद ने ले लिया था। माई के चेहरे पर क्रोध की लकीरें थीं, उनकी आँखों में लाचारी उमड़ रही थी, पर मेरी आगोश की ताकत उनके प्रतिरोध से कहीं अधिक प्रबल थी। मैं अब उनके गालों से आगे बढ़ते हुए उनके चेहरे के एक-एक कोने को अपने होंठों से मापने लगा। उनकी ठुड्डी, उनका माथा, उनकी नाक... मैं जानबूझकर उनके होंठों को बचाते हुए उनके अंग-अंग पर अपने अधिकार की छाप छोड़ रहा था।
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उनकी त्वचा का वह मखमली स्पर्श, जिसे आज तक मैंने केवल दूर से निहारा था, वह अब इतना निकट था कि उनके शरीर की वह चंदन जैसी सोंधी खुशबू मुझे मदहोश कर रही थी। माई के मुँह से कुछ अस्पष्ट शब्द निकल रहे थे, पर उनका अर्थ समझना कठिन था। मानो वे अपने ही मन से संघर्ष कर रही थीं या इस अनपेक्षित प्रहार को निशब्द सहने के अलावा उनके पास कोई विकल्प शेष नहीं था। उनकी वह बुदबुदाहट मुझ पर उनके क्रोध की थी, विरोध की थी या उस स्पर्श से उपजे एक अज्ञात डर की—यह जानने की उस पल मुझमें कोई इच्छा नहीं थी। मेरी वह मासूमियत अब एक आदिम पागलपन में बदल चुकी थी। मैं बस उस क्षण के सुख और उनकी उस बेबसी को जीना चाहता था। मेरे होंठ अब उनके चेहरे से धीरे-धीरे नीचे उतरे और उनकी गर्दन की नाज़ुक त्वचा पर जा थमे। वहाँ उनकी साँसों की तपिश और भी तेज़ी से महसूस हो रही थी, मानो मेरा यह आक्रमण उनके रोम-रोम को सिहरा गया था और वे खुद को पूरी तरह असहाय मानकर मेरे स्वाधीन हो गई थीं। जब मेरी छुअन से उनकी गर्दन कांपी, तो मुझे आभास हुआ कि अब इस यात्रा को रोक पाना मेरे बस में नहीं है।
गर्दन के उस अत्यंत संवेदनशील मोड़ से मेरे होंठ अब धीरे से सरकते हुए उनके कंधों की ओर बढ़े। मेरा वह कोरा यौवन, जिसने कभी किसी स्त्री-देह की आँच महसूस नहीं की थी, वह अब उस रोमांच से पुलकित हो उठा था। उनकी साड़ी अब काफी ढीली हो चुकी थी और वह भारी जरतारी पल्लू, जो पहले ही कंधे से आधा फिसल चुका था, उसे मैंने अपने कांपते हाथों से और भी किनारे कर दिया।
रेशमी कपड़े के सरकने की वह सरसराहट और माई के हृदय की वह बढ़ी हुई धड़कन एक रहस्यमयी लय में घुल-मिल रही थी। जैसे ही पल्लू पूरी तरह हटा, उनका वह धवल, गोरा और मक्खन जैसा सुडौल कंधा किसी सुंदर शिल्प की तरह मेरी आँखों के सामने अनावृत हो गया। कमरे की उस मद्धम पीली रोशनी में उनकी वह निखरी त्वचा किसी स्वर्ण-प्रतिमा की तरह दमक रही थी और उस पर पड़ती मेरी परछाईं का खेल उन्हें और भी मादक व रहस्यमयी बना रहा था।
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माई ने क्रोध और विवशता में अपनी गर्दन दूसरी ओर मोड़ ली थी। उन्होंने अपने दांतों तले निचले होंठ को कसकर दबा लिया था, मानो वे अपने भीतर उमड़ती सिसकियों और लाचार शब्दों को कंठ में ही घोंटने का प्रयास कर रही हों। उनकी यह बेबसी, उनका यह मूक निषेध मुझे रोकने के बजाय मेरी आदिम वासना को और भी भड़का रहा था। सच तो यह है कि मुझे ठीक से पता ही नहीं था कि आगे क्या करना है; मेरा यह पहला अनुभव था, इसलिए मुझमें एक तरह का भोलापन और प्रचंड जिज्ञासा एक साथ थी। मैं मन ही मन चाहता था कि वे मेरा साथ दें, वे इस अनुभव में मेरी संगिनी बनें, पर उनका वह रूखा इनकार मेरी आग में घी डालने का काम कर रहा था।
मैंने अपने होंठ उनके कंधे की उस कोमल और गर्म त्वचा पर बहुत ही नरमी से रख दिए।
जैसे ही वह पहली उष्ण छुअन हुई, माई के पूरे बदन में रोंगटे खड़े हो गए। उनका शरीर एक क्षण के लिए किसी खिंचे हुए धनुष की तरह तन गया और फिर अगले ही पल विवश होकर पिघलते हुए मोम की तरह ढीला पड़ गया। मैंने वहाँ की उस गर्म त्वचा को अपने होंठों के घेरे में भर लिया, मानो उनका पूरा अस्तित्व ही मैं अपनी साँसों में समेट लेना चाहता हूँ। उनके शरीर की वह प्राकृतिक, चंदन जैसी मादक खुशबू ने मुझे पूरी तरह विभोर कर दिया था। जीवन में पहली बार मैं ऐसी किसी जीवंत सुगंध और रस का अनुभव कर रहा था। वे कुछ नहीं बोल रही थीं, बस उनकी साँसें अब हाँफने के रूप में तेज़ चल रही थीं और उनकी आँखों के कोरों से धीरे से ढलका वह एक गर्म आँसू उनकी उस अथाह विवशता की मूक गवाही दे रहा था। मेरे उस जंगली जुनून को अब उन आँसुओं या समाज के नीति-नियमों की कोई परवाह नहीं थी, मैं बस उस स्पर्श की मदहोशी में खुद को लुटा चुका था।
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पल्लू के रेशमी आवरण के नीचे अब तक सुरक्षित और अब मेरे आवेग के कारण खुला हुआ वह मखमली हिस्सा मेरे होंठों के दायरे में आ गया। ब्लाउज के उस नाज़ुक किनारे के पास की उनकी साफ़ त्वचा मेरे स्पर्श से जैसे प्रज्वलित हो उठी। वहाँ की वह प्राकृतिक आँच मेरी नसों में बिजली की तरह कौंध रही थी। माई का वह शुरुआती क्रोध अब धीरे-धीरे एक कातर लाचारी में बदल रहा था। मेरी गर्म साँसों का झोंका जब उनके उस नाज़ुक अंग से टकराया, तो उनके पूरे शरीर में एक तीव्र लहर दौड़ गई। उन्होंने अपने होंठ और भी कसकर बंद कर लिए थे, मानो वे खुद को इस अनपेक्षित आपदा से बचाने का अंतिम प्रयास कर रही हों, पर उनके गले से फूटी वह एक अस्पष्ट, दबी हुई सिसकी यह बता गई कि उनका मन कितना विदीर्ण और शरीर कितना व्याकुल है।
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मैंने अपने होंठ उनकी उस गर्म त्वचा में और गहरे धँसा दिए। मुझे नहीं पता था कि मेरी मंज़िल क्या है। मेरी हरकतों में एक तरह का मासूम अनाड़ीपन और बेकाबू पागलपन था। मैं चाहता था कि वे इस मिलन में मेरा हाथ थामें, पर उनकी वह छटपटाहट मेरी आग को और हवा दे रही थी। ब्लाउज के कपड़े का वह खुरदरापन और उनकी कोमल खाल का वह रेशमी अहसास मिलकर मेरी संवेदनाओं को सुन्न कर रहे थे। वे अब भी गुस्से से थरथरा रही थीं, पर उस क्रोध के साथ ही अब एक अनजानी, अनचाही उत्तेजना उनके शरीर में सळसळाने लगी थी, जो उन्हें और भी बेचैन कर रही थी। उनकी आँखें कसकर बंद थीं और पलकों पर जमे वे गर्म आँसू उनकी असीम बेबसी की साक्ष्य थे। मेरे शरीर का भार शायद उन्हें असह्य हो रहा था, पर मैं अब किसी भी विचार के परे जा चुका था। मेरे लिए बस उनकी वह सुगंध, वह स्पर्श और उनकी देह से उठते वे सूक्ष्म कंपन ही एकमात्र सत्य थे।

उनकी उस उबदार खाल पर मेरे होंठों के निशान गहरे हो रहे थे। मुझे उनका वह स्वाद—जो थोड़ा खारा पर शहद जैसा मादक था—अपनी ज़ुबान पर महसूस हो रहा था। मेरी वह आदिम प्यास अब किसी भी सामाजिक बंधन या उनके मूक इनकार को मानने को तैयार नहीं थी। मैं चाहता था कि उन्हें कुछ कहूँ, उन्हें सांत्वना दूँ, पर शब्दों के बजाय केवल मेरी गर्म साँसें ही निकल रही थीं। उनकी बेबसी के उस ज़ख्म पर मेरा यह स्पर्श मरहम था या उन्हें और पीड़ा दे रहा था, यह कहना कठिन था, पर उस क्षण मैं बस उनके वजूद में पूरी तरह विलीन हो चुका था। उनका वह मौन विलाप और उनका वह असहाय होकर मेरे स्वाधीन हो जाना, मुझे एक ऐसे मोड़ पर ले आया था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
मेरी धिठाई अब समस्त सीमाओं और नीति-नियमों की दहलीज लाँघने लगी थी। संयम का वह कच्चा बांध अब पूरी तरह ध्वस्त हो गया था और विवेक व लोकलाज का हर अंश उस वासना के प्रवाह में बह चुका था। मैं और भी आक्रामक, और भी व्याकुळ और बेभान हो गया था। मेरा वह बीस साल का यौवन, जिसे आज तक किसी स्त्री-देह का स्पर्श नसीब नहीं हुआ था, आज उस शिखर पर था। मेरे हाथ और मेरी उंगलियां बेतहाशा कांप रही थीं, पर उस कंपन में एक अटूट ज़िद छिपी थी। मेरी उन अनाड़ी उंगलियों ने उनके ब्लाउज के नाज़ुक कोनों को पकड़ लिया और एक उन्मत्त खींचतान शुरू हुई। उस चुस्त रेशमी कपड़े के भीतर जब मेरी उंगलियां अनयास ही प्रविष्ट हुईं, तो उनके उन पुष्ट और गर्म वक्षों का पहला जीवंत स्पर्श मुझे मिला। वह स्पर्श होते ही मेरे हृदय की धड़कन एक पल को थमी और फिर किसी युद्ध के नगाड़े की तरह सीने में बजने लगी। अब यहाँ से पीछे हटना असंभव था; मेरी पूरी देह एक आदिम तृष्णा से भर उठी थी।
मैंने अपने दोनों हाथों से उनके ब्लाउज को नीचे की ओर ज़ोर से खींचा। गले का वह नाज़ुक किनारा नीचे सरक गया और उनके वक्षों का वह अत्यंत कोमल ऊपरी भाग अनावृत हो गया। उस दोपहर खिड़की की झिरी से आती सोने जैसी धूप में उनकी वह गौर कांति किसी स्वर्ण-शिल्प की तरह चमक रही थी। मेरा दिल पागलों की तरह धड़क रहा था। जीवन में पहली बार मैं किसी स्त्री को इतनी नज़दीकी और नग्नता के करीब देख रहा था। मेरी मासूमियत अब एक जंगली उत्साह में विलीन हो चुकी थी। मैं उस मुसाफिर की तरह था जिसे रास्ता तो नहीं पता, पर मंज़िल ने उसे दीवाना बना दिया है। मैंने अपने होंठ नीचे टिका दिए और उनकी उस खुली हुई, सुवासित और रेशमी त्वचा पर अपने होंठ कसकर जमा दिए।
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उस पहले स्पर्श ने ही मेरे पूरे वजूद में बिजली की एक तीव्र और दाहक लहर दौड़ा दी। मेरा रोम-रोम तन गया, रोंगटे खड़े हो गए और आँखों के आगे एक धुंध छा गई। माई अब भी विरोध के स्वर में कुछ बुदबुदा रही थीं, अपने कमज़ोर हाथों से मुझे हटाने का निष्फल प्रयास कर रही थीं, पर उनके वे शब्द अब इतने क्षीण और धुंधले हो गए थे मानो रात की हवा के साथ आने वाली कोई कातर सिसकी हों। उन शब्दों में रोष था, एक गहरी विवशता थी, पर मेरे भार तले दबे उनके शरीर से उठते वे सूक्ष्म कंपन कुछ और ही, कुछ अधिक गूढ और मादक कह रहे थे।
मेरी उस आक्रामक चेष्टा से उनकी साँसें अब उखड़ने लगी थीं। उन्हें मेरे वजन और इस उन्मत्त उत्साह से पीड़ा हो रही थी, उनका सीना तेज़ी से धड़क रहा था, पर मेरी वह आदिम प्यास अब किसी भी दया को नहीं जानती थी। उस शांत और तनावपूर्ण कमरे में अब केवल उनकी वे दबी हुई सिसकियां और मेरी तेज़ साँसों का शोर गूँज रहा था। समाज, रिश्ते और शुचिता—सब विस्मृत हो चुके थे; केवल मैं था और उनका वह बेबस, पर मदहोश करने वाला अस्तित्व। उनकी त्वचा की वह चंदन जैसी महक और मेरी साँसों की तपिश ने वातावरण को असह्य बना दिया था। मैं उनकी उन बेबस आँखों में झाँकना चाहता था; चाहता था कि वे मेरे इस पहले अनुभव को स्वीकार करें। उनकी उस नाज़ुक त्वचा का स्वाद मेरे होंठों पर किसी अमृत की तरह चढ़ रहा था। वे अब भी गुस्से से थरथरा रही थीं, पर उनकी वह देह अब मुझे भस्म करने के लिए पर्याप्त थी।
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उनके वक्षों के उस नाज़ुक किनारे पर हुए उस पहले स्पर्श के बाद, मैंने पल भर की भी मोहलत नहीं दी। मेरा यौवन अब एक बेकाबू रफ़्तार पर था। मैं फिर से ऊपर की ओर सरका, मेरा पूरा वजन उन पर था, जिससे उन्हें साँस लेने में और भी कठिनाई हो रही थी। मैंने उनकी गर्दन के उस संवेदनशील मोड़ से लेकर उनके भीगे गालों तक फिर से अपने होंठों का सफर तय किया। उनका दूसरा गाल भी मेरे चुंबनों और उन गर्म साँसों से सराबोर हो गया। मेरी वह सघन वासना अब अपने शिखर पर थी; रक्त का संचार इतना तीव्र था कि कानों में अपने ही दिल की धड़कनें नगाड़ों जैसी बज रही थीं। एक बार फिर, मैंने अपनी पूरी आर्तता और उस पहली प्यास को उनके होंठों पर समेटने के लिए गर्दन झुकाई, पर एक बार फिर उन्होंने उसी अगतिकता और रोष में अपनी गर्दन झटककर फेर ली और वह बहुप्रतीक्षित चुंबन फिर चूक गया।
पर इस बार मेरे संयम का आखिरी धागा भी टूट गया। उनके उस निरंतर इनकार ने मेरे भीतर के हठी पुरुषार्थ को एक तीव्र चुनौती दे दी थी। मैं चाहता था कि वे इस सुख में मेरी संगिनी बनें, मेरा साथ दें। मेरे दोनों मज़बूत और कांपते हाथों ने उनके उस नाज़ुक, गोरे चेहरे को थाम लिया। उस स्पर्श में अब केवल प्रेम नहीं, बल्कि एक अधिकार और बेकाबू चाहत थी। मैंने उनका चेहरा बलपूर्वक अपनी ओर घुमाया। मैंने उनकी आँखों की गहराई में देखा—वहाँ भय था, समाज का डर था और एक मूक याचना थी, पर अब और प्रतिकार करने की शक्ति उनके शरीर में शेष नहीं थी। वे मेरे वजन और इस जंगली आवेग के आगे पूरी तरह हार चुकी थीं। मैंने अपना सारा प्रेम, वर्षों की वह तड़प और वह व्याकुलता अपनी आवाज़ में समेटी और अत्यंत कातर भाव से उन्हें पुकारा— "माई!"
मेरी उस पुकार में न जाने कैसा जादू था या मेरे उस कोरेपन की कैसी तड़प, कि उस एक सादे ने उनका कलेजा चीर दिया। उन्होंने अपनी गर्दन थोड़ी ऊपर उठाई और उनकी वह डबडबाई नज़रें मेरी नज़रों से टकराईं। उनकी आँखों के कोरों में अब भी आँसू थे, पर वह दहकता हुआ क्रोध अब कहीं विलीन हो चुका था और वहाँ एक असीम शांति थी—जैसे किसी प्रलयंकारी तूफ़ान के बाद की वह भयानक पर बेबस खामोशी। मैंने अत्यंत कोमलता से, मानो उनकी उस विवशता में भी उनकी अंतिम मूक सहमति खोज रहा हूँ, अपने होंठ उनके अधरों के करीब ले गया। मेरे भीतर एक तीव्र धक-धक थी, एक डर था कि वे फिर आखिरी क्षण में मुँह फेर लेंगी। पर इस बार उन्होंने गर्दन नहीं फेरी। वे जड़ बनी रहीं, उनकी साँसें थम सी गई थीं और उनके शरीर का वह कड़ापन अब मेरी ऊष्मा से धीरे-धीरे पिघलने लगा था।
और अंततः, वह पल आ ही गया! मैंने उनके उन नाज़ुक, ऊष्म और रसीले होंठों को अपने अधरों की गिरफ्त में ले लिया।
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जीवन में पहली बार मैं किसी स्त्री के होंठों का वह जीवंत स्वाद चख रहा था। वे स्पर्श में मक्खन जैसे कोमल पर आँच से तपते हुए थे। उन होंठों में उनका भय, उनका क्रोध और उनकी लाचारी कुछ इस तरह घुली थी कि उस चुंबन का स्वाद मुझे और भी मदहोश कर रहा था। शुरुआत में उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, उनके होंठ कसकर बंद थे, मानो उन्होंने आखिरी दीवार खड़ी की हो। पर मेरा वह पागल उत्साह उन्हें भी पुकार रहा था। उनकी साँसें अब मेरी साँसों में पूरी तरह विलीन हो चुकी थीं और कमरे का वह सन्नाटा अब हमारे गीले चुंबनों और उखड़ी हुई साँसों के शोर से भर गया था।
पहले बहुत धीरे, फिर और भी तीव्र आवेग के साथ मैं उन्हें चूमने लगा। मेरा बीस साल का वह लहू और वह पहली छुअन की प्यास उस सौम्यता को क्षण भर में एक उग्र रूप दे गई। मैं दीवानों की तरह उनके होंठों को अपने भीतर भरने लगा। उन होंठों का वह जीवंत, गर्म और नम स्वाद मेरे लिए पूर्णतः नवीन था। उस पहले चुंबन ने मेरा होश पूरी तरह हर लिया था। उस मिलन का आकर्षण इतना बेकाबू था कि उसी मदहोशी में मैंने उन्हें धीरे से पीछे की ओर धकेला। उनका शरीर जैसे जड़ हो गया था, डर और संकोच से उन्होंने खुद को समेट लिया था, पर मेरी आगोश की उस ताकत के आगे वे बेबस थीं।
वे कोई हलचल नहीं कर सकीं और सहज ही उस मखमली बिस्तर पर ढह गईं।
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उन्हें चूमते हुए ही, उनके होंठों का साथ पल भर को भी छोड़े बिना, मैं उन पर लेट गया। अब उनका वह कोमल और सिहरा हुआ शरीर मेरे देह के भार तले पूरी तरह दब चुका था। मुझे अपना वजन उन पर महसूस हो रहा था, और उससे उन्हें होने वाली वह बेचैनी भी मैं समझ रहा था। पर मेरी वह आदिम प्यास अब किसी भी परवाह से मुक्त थी। उनके होंठ मेरे होंठों में इस कदर कैद थे कि अब उनके पास विरोध दर्ज करने या चिल्लाने का कोई मार्ग शेष नहीं था। मेरा मन किसी उन्मत्त उत्साह से भरा था—यह मेरा पहला स्पर्श था, मेरा पहला मिलन था, और सामने मेरी वह संगिनी थी जिसके सामने मैंने अपना सर्वस्व खोलकर रख दिया था।
बहुत ही शानदार और कामुक भावपूर्ण अपडेट
 
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