हमेशा की तरह, कहानी के शब्दों में वह प्रवाह और गहराई है जो पढ़ने वालों को तुरंत अपनी गिरफ्त में ले लेते है.. यह खंड पढ़ते हुए नज़रों के सामने एक जीवंत, साँस लेती हुई दुनिया का निर्माण हो जाता है, जहाँ हर पात्र, हर स्थिति अपनी एक विशिष्ट आभा लिए हुए है..
इस अध्याय में एम् का चरित्र और भी स्पष्ट हुआ है। उनकी योजनाएँ, सूक्ष्म दृष्टि और शत्रु से एक कदम आगे रहने की मानसिकता, बड़ी प्रभावशाली ढंग से उभरी है.. जिस तरह से आपने सुरक्षा, निगरानी और प्रतिनिगरानी के जटिल जाल को साधारण उदाहरणों (जैसे बरगद के पेड़ पर चुनरी बाँधना) के माध्यम से समझाया, वह अद्भुत रहा.. यह कौशल अधिकतर बड़े-बड़े उपन्यासकारों में होता है, जो जटिल से जटिल बात को सरल रूपक में पिरो देते हैं..
एम् द्वारा बनाए गए पाँच अड्डों का विवरण रोचक रहा, किस प्रकार एक साधारण सी दिखने वाली दुनिया के भीतर एक असाधारण, गुप्त संसार सक्रिय रहता है.. मलाड मानुष का चरित्र विशेष रूप से आकर्षक है.. वह जलेबी टाइप पहेली है, यह बिम्ब सटीक और चित्रात्मक है.. यहाँ आपने एक ऐसा पात्र गढ़ा है जो सतह पर एक फ्रंट मैन लगता है, परंतु जिसकी पकड़ और प्रभाव गहराई तक जाती है.. इस प्रकार के बहुआयामी, रहस्यमय पात्र हिंदी साहित्य की लम्बी परम्परा में मिलते रहे हैं, और आपने इस परंपरा को एक आधुनिक, तकनीकी संदर्भ में बखूबी आगे बढ़ाया है..
कथा का दूसरा भाग, जो कोमल के पति के दृष्टिकोण से है, उसमें आपने तनाव और रोमांच के बीच एक हल्के-फुल्के, मानवीय रिश्ते का समावेश किया है.. श्रेया रेड्डी का पात्र और उनके साथ का संवाद कथा को एक नया, जीवंत आयाम देता है.. यह रिश्ता इन पात्रों की मनोदशा और उनकी बहुआयामी जिंदगी को दर्शाता है.. ठीक वैसे ही जैसे अच्छे आख्यानों में पात्र केवल कथानक के साधन न होकर स्वयं में एक संसार होते हैं..
इस अध्याय में जो सबसे प्रशंसनीय बात है, वह है विवरणों का सन्तुलन.. तकनीकी शब्दावली और जटिल योजनाओं का विस्तार इस कुशलता से दिया हैं कि कहीं भी.. कुछ भी बोझिल नहीं लगता.. उलटा, वह कथा के रोमांच और गति को बनाए रखता है.. जीरो प्वाइंट पर हो रही घनघोर निगरानी का चित्रण, और फिर उसके समानान्तर एम् की प्रतिनिगरानी की तैयारियाँ, पढ़कर मज़ा आ गया..!
इस कड़ी ने कथा के सभी धागों को और मजबूती से पकड़े रखा है और आगे आने वाले तूफान का संकेत भी दिया है.. आने वाले चार दिन का जो आभास दिया गया है, वह अगले अध्यायों के लिए उत्सुकता जगा जाता है.. सब कुछ एक शतरंज के खेल जैसा प्रतीत हो रहा है, चाल और प्रति-चाल का सिलसिला चल रहा है और आप पाठकों को फ्रन्ट सीट पर बैठाकर पूरा मैदान दिखा रही हैं..
लेखन में ऐसी परिपक्वता केवल अनुभव और गहन अवलोकन से ही आती है..
अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी..