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Adultery काव्या

spatel396

New Member
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Hot'ssssssssss
🔥🔥🔥🔥🔥🔥

Ekdam erotic
Pahle se bolta hu, bahut hi shandar likhate ho aap, sabse hatkar,


Ek umda writer ka soch ka natija hai jo, Pati ke character ko dusro ekadam hat ke bich me dala he, lekin dusri taraf sab common soch ke mutabik story me pahle hi Dal dete Hain,


Aapki story mein har ek bar, har ek update mein kuchh naya dikhane ka milta Hai,

Aaj to aapne dhamaka kar diya, kafi log bathroom me Jane vale he,


Super duper hit update, maja aa gaya
🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥
 
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Premkumar65

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जब मैंने ने सुबह अपनी आँखें खोलीं तो रेशमी चादर के नीचे से सूरज की किरणें मेरी त्वचा को छू रही थीं। सुबह के आठ बजे थे और पति जी पहले ही ऑफिस के लिए निकल चुके थे। मैंने धीरे से बिस्तर से उठकर अपने लंबे काले बालों को पीछे बांधा और संगमरमर के बाथरूम की ओर चल पड़ी। गर्म पानी से नहाते हुए मैंने अपने शरीर पर फैले हुए गुलाबी साबुन के झाग को देखा - त्वचा इतनी कोमल कि एक बार फिर मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि मैं पैंतीस की उम्र पार कर चुकी हूँ।

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Sexy Kavya.
 
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"अ...अनुराग," उसने धीमी आवाज में कहा। उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे झुककर सुनना पड़ा। मैंने उसके चेहरे को गौर से देखा। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी थीं, जैसे किसी हिरण के बच्चे की। उसकी त्वचा कोमल थी, उस पर एक अजीब सी चमक थी। उसके होंठ पतले थे, और उसके दाँत एकदम सफ़ेद चमक रहे थे दूध के हो ऐसे। वह सच में बहुत सुंदर लड़का था। मैंने उसकी ओर देखते हुए मुस्कुराई। "तुम्हारा नाम बहुत सुंदर है," मैंने कहा। वह और ज्यादा शरमा गया, उसके गालों पर गुलाबी रंग और गहरा हो गया।

तभी मेरी नज़र उसके कपड़ों पर पड़ी। उसकी पतलून फटी हुई थी, घुटने के ऊपर से। ओर शर्ट भी पुरानी थी, किनारों से धागे निकले हुए। मैंने देखा कि उसके पैरों में चप्पल भी फटी हुई थी। एक तरफ का फीता टूटा हुआ था, और वह उसे बार-बार पकड़कर ठीक करने की कोशिश कर रहा था। मेरे मन में एक अजीब सी करुणा जाग गई।

"अनुराग, तुम मेरे साथ चलोगे?" मैंने अचानक पूछ लिया। वह चौंककर मेरी ओर देखने लगा। बूढ़ी औरत भी मेरी ओर देख रही थी, उसकी आँखों में एक अजीब सी जिज्ञासा थी।

"मैं तुम्हारे लिए कुछ घर पर कपड़े हे वो दूँगी," मैंने कहा। अनुराग का चेहरा खिल उठा, फिर अचानक वह अपने दादा की ओर देखने लगा, जो अब तक दुकान के बाहर बैठा था।

बूढ़े ने धीरे हा में से सिर हिलाया, जैसे अनुमति दे रहा हो। अनुराग की आँखों में चमक आ गई। वह जल्दी से मेरे सामानों को एक थैले में भरने लगा। उसकी उंगलियाँ तेजी से चल रही थीं, जैसे वह डरता हो कि मैं अपना मन बदल लूँगी। जब उसने सारा सामान थैले में डाल दिया। उसने जल्दी से सिर हिलाया और थैला उठा लिया।

बूढ़ी औरत को पैसे दिए तो वह मुस्कुराई। "बेटी, तुम बहुत अच्छी हो," उसने कहा। मैंने मुस्कुराकर सिर हिलाया और दुकान से बाहर निकल गई। अनुराग मेरे पीछे-पीछे चल रहा था।

रास्ते में चलते हुए मैंने उससे पूछा, "तुम पढ़ते हो?" वह सिर झुकाकर बोला, "हाँ आंटी।" मैंने ध्यान से देखा तो उसकी कमीज की जेब से एक किताब का कोना दिख रहा था। जब मैंने पूछा तो उसने शरमाते हुए गणित की पुरानी किताब निकाली, जिसके किनारे सफेद धागे से सिले हुए थे।

हमारे घर के मेन गेट खोलकर अंदर घर तरफ चले गए , घर के दरवाजे के बाहर पहुँचकर मैंने उसे रोका, "यहीं खड़े रहो।"

अंदर जाकर मैंने कुछ पुराने कपड़े ढूंढ़े जो मेरे बेटों के थे। एक जोड़ी जींस, दो शर्ट, और एक नई जोड़ी चप्पलें। उन्हें एक थैले में रखकर मैं बाहर आई तो देखा अनुराग एकदम सीधा खड़ा था, जैसे कोई सैनिक। उसकी आँखें थैले पर टिकी हुई थीं, लेकिन वह हिलने की हिम्मत नहीं कर रहा था।

"ले लो," मैंने थैला उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा। उसने दोनों हाथों से थैला लिया, जैसे कोई कीमती खजाना हो। मैंने उसके चेहरे पर एक अजीब सी भावना देखी। वह धीरे से बोला, "धन्यवाद, मालकिन," और फिर अचानक उसने मेरे पैर छू लिए। मैं चौंक गई, पीछे हटते हुए बोली, "अरे नहीं! ऐसा मत करो।" ओर हा, ओर मैने कहा आंटी बोलोगे तो भी चलेगा। वो हंसते हुवे चला गया।

शाम को जब मेरे पति आए तो मुझे उन्हें रोटी बनाते देखा। वे मेरे पीछे आकर खड़े हो गए और मेरी कमर पर हाथ रख दिया। मैंने चौंककर पीछे मुड़कर देखा तो वे मुस्कुरा रहे थे। "आज बहुत खुश लग रही हो,"
Nice update.
 
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करीब दो बजे थे जब खिड़की के पास खड़ी हो कर अपने बच्चों के बारे में सोच रही थी, जो घर से दूर पढ़ने गए थे। अचानक नीचे गली में हलचल हुई। पुरानि दुकान वाला वह बूढ़ा सामान लेकर आया था, लेकिन आज उसके साथ अनुराग नहीं था। मैंने गेट खोलते हुए आज जो माली पति के कंपनी से झाड़ियां साफ करने आया था, उसको सामान सौंपा और वह बाहर चला गया।

में सामान्य रूप से उसे देख रही थी, तभी जब वो गेट से आगे जाके दीवाल के उस पार मुड़ा तो मैने देखा कि वो दीवार के साथ खड़ा होकर पेशाब करने लगा। मेरी नजर अनजाने में उसके शरीर के नीचे चली गई, और मैं हैरान रह गई। उसके शरीर के हिसाब से उसका लंड बहुत मोटा था, जो उसकी उम्र के बावजूद किसी जवान की तरह कड़क और ताकतवर लग रहा था। उसका शरीर एक दुबला पतला हड्डियों वाला था, लेकिन उसकी शरीर के हिसाब से उसकी तोड़ बहुत बड़ी थी। मैंने जल्दी से अपनी नजरें हटा लीं, मेरे संस्कारों और पत्नी धर्म ने मुझे उस तरफ देखने से रोक दिया।

मैंने धीरे से खिड़की का परदा खींचा और किचन की तरफ चल दी। शाम हो गई थी, रात का खाना बनाना था। पति जी भी आने वाले थे। मैंने सब्जियाँ काटनी शुरू की। तभी दरवाजे की घंटी बजी। पति आज जल्दी आ गए थे। मैंने खाना पकाना जारी रखा। उन्होंने पीछे से आकर मेरी कमर पकड़ ली। उनके हाथ गर्म थे। मैंने पलटकर देखा तो वे मुस्कुरा रहे थे।



"आज मैं बहुत थक गया हूँ," उन्होंने कहा। मैंने हल्का सा मुस्कुराकर सिर हिलाया। ठीक हे में आपका बदन दबा दूंगी, आप स्नान कर लो।

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वो नहाने चले गए। मैंने खाना पकाया। हमने साथ खाना खाया। खाने के बाद वो टीवी देखने लगे। मैंने बर्तन साफ किए। फिर नहाने चली गई। नहाकर जब आई तो वे बेडरूम में मेरा इंतज़ार कर रहे थे। मैंने लाइट ऑफ की और बिस्तर पर लेट गई। पति जी ने मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी जो मैं पहचान नहीं पाई।

"आज...कुछ नया ट्राई करते हैं," उन्होंने धीरे से कहा, उनकी उंगलियाँ मेरी कमर पर नाच रही थीं। मैंने सिर घुमाकर देखा तो वे मुझे इस तरह देख रहे थे जैसे कोई रहस्य कहने वाले हों। मेरी साँसें थोड़ी तेज हो गईं, पर मैंने खुद को संभाला।

"क्या मतलब?" मैंने पूछा,
Good going. The story is building up.
 
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गले में एक गाँठ सी उठ रही थी। उनकी उंगलियाँ मेरे कंधे से सरककर गर्दन तक आईं, नाखूनों का हल्का सा दबाव महसूस हो रहा था। उन्होंने मेरी ठुड्डी पकड़कर मेरी आँखों में देखा। "तुम्हें पता है तुम कितनी खूबसूरत हो," उनकी सांसें मेरे चेहरे को छू रही थीं।

मैंने अपनी नजरें झुका लीं, पर उन्होंने मेरा चेहरा फिर से ऊपर उठाया। उनकी आँखों में एक आग थी जिसे मैं पहचान नहीं पा रही थी, पर आज उसमें एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे कोई रहस्यमय इच्छा उन्हें खा रही हो।

"फिर से बोले"

"पूरे दिन घर में अकेली रहती हो," उन्होंने धीमे से कहा, उनकी उँगलियाँ अब मेरे गालों पर थीं, गर्म और नरम। "बच्चे भी घर में नहीं रहते हैं, और मैं कंपनी के कामों में व्यस्त रहता हूँ। तुमहे इतना वक्त नहीं दे पाता।"

उनकी आवाज़ में एक दर्द था, पर किसका? मेरा या उनका?

मैं उनकी आँखों में झाँकने की कोशिश कर रही थी, उन्हें समझने की कोशिश कर रही थी, आखिर ये क्या बोला रहे हे, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।

हा तो? क्या करूं, जॉब करूं?, या तुम्हारी कंपनी में अभी कोई पोस्ट खाली है तो बोलो में आ जाती हु बस टाइमपास हो जाएगा, मैंने हँसते हुए कहा।

मेरी हँसी हवा में लटक गई जब उन्होंने अपनी पलकें नीची कर लीं, जैसे कोई पहले से तैयार जाल बिछा रहा हो।

"नहीं नहीं, तुम्हे ये कुछ करने की जरूरत नहीं।" उनका हाथ मेरे कमर पर आया, उंगलियों ने सिल्क के साड़ी के नीचे से गर्मी छलकाई, "में तो ये पुछ रहा था कि क्या तुम मेरे अलावा कीसी और के साथ वो सब करना चाहोगी? मेरे शरीर में एक झटका सा दौड़ गया। "

क्या बोल रहे आप, कुछ समझ में नहीं आ रहा।"

यही की... तुम किसी ओर के साथ सेक्स करो, अपनी लाइफ एन्जॉय करो, मेरी तरफ से पूरी छूट है।"

और मुझे भी बता सकती हो," उनके शब्दों ने मुझे ऐसे जकड़ा जैसे कोई बर्फ की चट्टान गिरी हो। मेरे पेट में आग सी लग गई। मैंने उनका हाथ झटक दिया और बिस्तर से उठ खड़ी हुई। "मुझे गुस्सा आ गया। क्या बकवास कर रहे हो?" मेरी आवाज़ काँप रही थी, मेरी आँखों में चिंगारियाँ उठ रही थीं।

उन्होंने मुझे घूरा, हालत को समझते हुए फिर अचानक हँस पड़े। वो ठंडी, बेमतलब की हँसी जो मेरी रीढ़ तक चुभ गई।

"में तो बस तुम्हारी परीक्षा ले रहा था," उन्होंने कहा,

क्या बकवास कर रहे हैं आप, ऐसी परीक्षा?

तभी उनका फोन बज उठा। उन्होंने मुझे एक नज़र देखा, फिर बिस्तर से उठकर बाहर चले गए। उनकी छाया दरवाज़े पर ठहर गई, जैसे कोई रहस्यमय चित्रलिपि जिसे मैं पढ़ नहीं पा रही थी। मेरी साँसें अटकी हुई थीं, जैसे किसी ने मेरे फेफड़ों में ज़हर भर दिया हो।

मैंने कभी नहीं सोचा था कि वो ऐसी बात करेंगे। वो मेरे बारे में ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं? मैं उनकी अर्धांगिनी थी, उनके बच्चों की माँ हु। मेरा धर्म, मेरी मर्यादा सब कुछ तो उन्हीं के नाम का हे। ओर फिर में ऐसे पाप के बारे में कभी सपने में भी नहीं......
Pati ne naye experiments ki buniyaad rakh di hai. Dekhte hain aage kya hota hai.
 
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में ऐसे पाप के बारे में कभी सपने में भी नहीं सोचती थी। गुस्से में करवट बदल कर लेट गई, एक दो बार उन्होंने मनानेकी कोशिश करते रहे, बाद में हम दोनों सो गए।

सुबह जब आँख खुली तो देखा वो तैयार हो चुके हैं, मैंने बिना कुछ बोले चाय का प्याला उनकी तरफ बढ़ा दिया। उन्होंने भी चुपचाप चाय पी ली। आफिस चले गए।

गुस्से को शांत करने के लिए टीवी चालू कर दिया, लेकिन मेरा मन एकदम अलग ही गलियों में भटक रहा था। उनके शब्द मेरे दिमाग में घूम रहे थे, जैसे कोई जहरीला साँप बार-बार डसने को तैयार हो।

आखिर इतने सालों बाद मुझे क्यों ऐसा प्रस्ताव दे रहे थे? क्या मेरी निष्ठा पर उन्हें शक था? या फिर........, मेरे माथे पर पसीना आ गया जब एक भयानक ख्याल आया, क्या वो खुद किसी और के साथ थे और अपने अपराधबोध को इस तरह छिपाना चाहते थे?

लेकिन मैं इतना जानती थी कि मैं एक पतिव्रता स्त्री हूँ, मेरा धर्म, मेरे संस्कार के बीच पली-बढ़ी थी। उन शब्दों ने मेरे अस्तित्व को हिला दिया था, जैसे कोई भूकंप नींव तक हिला दे। टीवी की आवाज़ बेमानी लग रही थी, ओर उठ कर टीवी बंद की ओर मैंने गेट के बाहर टहल ने का सोचा।


जब मेन गेट के जैसी ही बाहर निकली, मैंने देखा कि अनुराग अपने दादा के साथ दुकान जा रहे थे। अनुराग के हाव-भाव में एक अजीब सी बच्चों जैसी खुशी थी। उसकी नई चप्पलों पर उसकी नज़रें टिकी थीं। मैंने देखा कि उसने मेरे दिए हुए कपड़े पहन रखे थे, नीली जींस और सफेद शर्ट जो उसकी किशोरावस्था को और भी निखार रही थी। उसकी मुस्कान मेरे दिल को छू गई, पर तभी उसके दादा की खाँसी ने मेरा ध्यान खींचा।

उनके शरीर का हर कंपन मुझे सुई की तरह चुभ रहा था, उस खोखली, गहरी खाँसी ने न सिर्फ उनके फेफड़ों को हिला दिया, बल्कि मेरे भीतर भी एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी। मैंने दीवार से टिके उस बूढ़े को देखा, उनके शर्ट के बीच का बटन टूट गया था, वहां से उनकी मोटी तोंद दिखाई दे रही थी। खांसते वक्त उसका लाल होता चेहरा, नसों में उभरी तनाव की लकीरें, और अनुराग की चिंतित आँखें जो बार-बार मेरी तरफ देख रही थीं।

मैंने सहानुभूति से पूछा, "काका ठीक हैं आप?" उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, सिर्फ आँखें बंद करके सिर हिलाया, जैसे उस पीड़ा को शब्दों में बयान करने की ताकत ही नहीं बची हो। खाँसी के झटके से एक थूक उनके मुंह में भर गया, और उन्होंने थूक कर जल्दी से रुमाल निकालकर सफेद बालोवालि मूंछें ओर छोटी छोटी दाढ़ी पोंछ लीं और बोले ठीक हु बस थोड़ी खासी हे। फिर वो दुकान की तरफ चले गए।

अगले दो तीन दिनों तक मैंने उनसे बात नहीं की, वो सुबह ऑफिस जाते और रात को आते, बस। मेरी चुप्पी और उनकी अनुपस्थिति के बीच घर की हवा जमी हुई थी, जैसे किसी ने समय को रोक दिया हो। मैं बर्तन धोती तो पानी की आवाज़ भी बहुत तेज लगती, जैसे वो मेरे गुस्से को चीर रही हो। रात को जब वो सोने आते तो मैं करवट लेकर सो जाती।

एक दिन सामको वो जल्दी आ गए, उनके हाथ में मेरी पसंदीदा गुलाबी साड़ी का पैकेट था। "चलो, आज सिटी में गार्डन घूमने चलते हैं," उन्होंने कहा, मेरे होठों पर जवाब न आया, पर मैंने कुच सोचते हुवे हाँ में सिर हिला दिया।

शाम को जब हम गार्डन पहुंचे तो सूरज ढल रहा था, आसमान में नारंगी और बैंगनी रंगों का मेल जैसे किसी ने पानी में रंग घोल दिए हों। पेड़ों की छाया लंबी हो चुकी थी, और हवा में चमेली की सुगंध तैर रही थी। वो मेरा हाथ पकड़कर एक सुनसान बेंच की तरफ ले गए जहाँ कोई नहीं था।



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आसमान में पक्षियों का झुंड गुलाबी आभा में डूबता जा रहा था जब उन्होंने मेरी ठोड़ी उठाकर कहा, "तुम्हारे लिए आइसक्रीम ले आऊं?" मेरे होंठों पर मुस्कान नहीं थी, पर मैंने सिर हिला दिया। जैसे ही वो आइसक्रीम स्टाल की ओर चले, मेरी नजरें अचानक एक आवाज, जो बेंच से कुछ दूर एक आदमी पर टिक गईं। छह फुट से ऊँचा, उसका काला शरीर सूर्यास्त की रोशनी ओर काला लग रहा था, जैसे कोई भट्टी में तपा हुआ लोहा।



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उसका मोटा पेट लूंगी के ऊपर से निकला हुआ था, और पूरे शरीर पर फैले सफेद-काले बाल उसे किसी जंगली जानवर जैसा बना रहे थे। वह जमीन में कुछ खोद रहा था, खोदते वक्त उसका मोटा भद्दा पिछवाड़ा एक गेंडे की गांड जैसा लग रहा था। उसका पूरा शरीर जैसे सांड की तरह तन गया था, और मैं अचानक सिहर गई जब उसकी आँखें मुझसे टकरा गईं। उसके दांत गुटखा से लाल थे, और मेरी रूह काँप गई। मुझे देखकर उसने एक पिचकारी भरी। डर के मारे मैं फौरन स्टाल की तरफ भाग गई।
Good going. Story is building up.
 
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रास्ते में जल्दबाजी में मेरे पैर की चप्पल टूट गई। मैं अपने पति के पास पहुंची तो उन्होंने देखा मेरे पैरों में चप्पल टूट गई है। "क्या हुआ?" उन्होंने पूछा। मैंने सांस अटकाते हुए कहा, "कुछ नहीं, चलो घर चलते हैं।" आइस क्रीम खाने के बाद हम घर आ गए।

रात को सोते समय उन्होंने मेरे पैरों की मालिश की, जैसे किसी गहरे अपराधबोध को धो रहे हों। उनकी उँगलियों की गर्माहट मेरे पैरों से होकर दिल तक पहुँच रही थी, पर मेरे अंदर का जमाव अब भी नहीं टूटा था। मैंने उनकी ओर देखा और सोचने लगी ये मेरे लिए ओर घर के लिए कितना कुछ करते हे। क्या मेरा इस तरह व्यवहार करना ठीक हे। मुझे उनको नरमी से समझना चाहिए था, पर तभी मेरे मन में एक सवाल कौंधा - क्या वह सच में मेरी परीक्षा ले रहे थे या फिर उनके मन में कोई और ही बात थी?

अगले दिन सुबह सुबह मीनाक्षी का फोन आया, उसकी आवाज़ में वही पुरानी चंचलता थी। "अभी रास्ते में हूँ, तुम्हारे घर आ रही हूँ," उसने कहा, और मेरे मन की गाँठ थोड़ी सी ढीली हुई। मीनाक्षी मेरी हमदर्द थी, मेरी खास सहेली जिसके सामने मैं अपने दिल का हर राज़ खोल सकती थी। साम को हम गप्पे मार रहे थे, चाय की चुस्कियों के बीच उसने अपनी बेटी के लिए लड़का देखने के बारे में बताया। "कोई अच्छा लड़का मिल जाए जो रिश्ता तय हो जाए," वह मुस्कुराई, और मैंने उसके चेहरे पर मातृत्व की वह चमक देखी जो मुझे अपने बच्चों की याद दिला गई। सामको वो चली गई, और मैं उसके जाने के बाद भी उसके शब्दों में खोई रही, जैसे कोई पुरानी याद ताजा हो गई हो।

आज का दीन बहोत अच्छा था। मीनाक्षी के जाने के बाद मैंने कुछ समय अपने विचारों में खोई रही, जैसे कोई पुराना गीत बार-बार मेरे मन में गूँज रहा हो। शाम को जब मेरे पति घर आए तो उनके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी, जैसे कोई गुप्त खुशी उनकी आँखों के कोनों से झाँक रही हो। उन्होंने मेरी ओर देखा और मुस्कुरा दिया, पर मेरे होंठों पर जवाबी मुस्कान नहीं आई। मैंने चाय बनाई और उनके सामने रख दी, बिना एक शब्द बोले। उन्होंने चाय की चुस्की ली और फिर अचानक बोले, "आज मैंने तुम्हारे लिए एक सरप्राइज लाया हूँ।" मैंने उनकी ओर देखा, पर कोई जिज्ञासा नहीं दिखाई। उन्होंने अपने बैग से एक छोटा सा डिब्बा निकाला, उसमें से मेरी पसंदीदा चॉकलेट की खुशबू आ रही थी। मैंने उसे ले लिया, पर खोला नहीं। रात का खाना खाते समय भी मैं चुपचाप थी, बस कभी-कभी उनकी ओर देख लेती थी।

खाने के बाद वो टीवी देखने बैठ गए और मैं किचन में बर्तन साफ करने लगी। जब मैं किचन से निकली तो देखा वो बेडरूम की ओर जा रहे हैं। मैं भी धीरे-धीरे उनके पीछे चल दी। बेडरूम में AC की ठंडी हवा चल रही थी, पर मेरे शरीर में एक अजीब सी गर्मी थी। वो बिस्तर पर लेट गए और में फ्रेश होने बाथरूम में चली गई। कुच देर बाद वापस आकर में बिस्तर पर लेट गई।

वो धीरे से मेरे पास आए और उनके हाथ मेरे शरीर पर चलने लगे। मैने भी उनके तरह नरम पड़ गई थी। उनकी उंगलियों ने मेरी पीठ को छुआ। एक अजीब सी खुजली हो रही थी। मैं धीरे धीरे अपने आप को उनके स्पर्श में खोने लगी। मेरी साँसें तेज हो गईं। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। वो मेरे करीब आते गए। वो मेरी टांगों के बीच आ कर बैठ गए। ओर दोनों के शरीर आपस में घुस गए। लेकिन जब मैं चरम पर पहुँचने वाली थी, तभी उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया......

जानू एक बात बोलूं, नाराज़ मत होना," उनकी साँसें मेरे कानों में गर्मी भर रही थीं, "अगर तुम दूसरे के साथ नहीं करना चाहती तो कोई बात नहीं, लेकिन सिर्फ कल्पना तो कर सकती हो..." उनके शब्दों ने मेरे शरीर में चल रही उस गर्म लहर को अचानक बर्फ में बदल दिया। मैंने आँखें खोल दीं, और उनके चेहरे पर वही अजीब सी मुस्कान देखी जो मुझे पिछले कई दिनों से परेशान कर रही थी। मेरी साँसें फिर से तेज हो गईं, पर इस बार क्रोध से। मैंने उन्हें धक्का देकर दूर किया और बिस्तर से उठ खड़ी हुई। "बस बहुत हो चुका! ये क्या बकवास है जो तुम बार-बार दोहरा रहे हो?" मेरी आवाज़ पूरे बेडरूम में गुंज गई। ये तो अच्छा है कि हमारा घर सिटी के बाहर था और पड़ोस में कोई नहीं था।

अगली सुबह पति ने नाश्ते की मेज पर मुझे सिर झुकाए देखा तो धीरे से कहा, "माफ़ करना...मैंने तुम्हें नाराज़ कर दिया।" मैंने चाय का घूँट लिया, अपनी नज़रें उसकी प्लेट पर टिकाए रखी। चाय की गर्माहट मेरे गले से नीचे उतर रही थी, पर मेरा दिल अभी भी पत्थर की तरह गरम था। वह ऑफिस चले गए, और मैंने उनके जाने के बाद अपनी चाय का आखिरी घूँट पीते हुए उनके कप को ज़ोर से सिंक में रख दिया, जैसे किसी गुप्त क्रोध को दबा रही हो।

कुच दिनों तक गार्डनर दिखाई नहीं दिया। मैंने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, हालांकि बगीचे की घास बढ़ने लगी थी, जैसे किसी ने हरी चादर बिछा दी हो। एक सुबह जब मैं नाश्ता कर रही थी, चाय की गर्म भाप मेरे चेहरे को छू रही थी, तभी पति जी का फोन आया। "सुनो, वह गार्डनर तो गाँव चला गया है। मैंने किसी और को बुलाया है," आज वो विशेष रूप से मधुर स्वर में बोले। मेरे हाथ में चम्मच रुक गई। मैंने कोई जवाब नहीं दिया, सिर्फ धीरे से फोन रख दिया।


खिड़की से बाहर झाख रही थी, मेरी साँसों की गर्मी काँच पर धुंध की एक परत छोड़ रही थी। पेड़ों की डालियाँ हवा में झूम रही थीं, मानो कोई अदृश्य हाथ उन्हें झुला रहा हो।

"ना जाने क्यों मेरा दिल धड़क रहा था मानो कोई अनजाना तूफान आने वाला हो। "
Entry of Hero.
 
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सोचते सोचते मन में हजारों विचार चल रहे थे। तभी पंखे की हवा से अचानक से काका धोती का सिरा हट गया। मैंने देखा तो आँखें फटी की फटी रह गईं - इतना बड़ा? लेकिन कैसे? ये तो सोए हुए भी बहुत बड़ा है...अगर खड़ा हो तो........?


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मेरी साँसें तेज हो गईं जैसे किसी ने मेरे सीने पर गर्म पत्थर रख दिया हो। उस मोटे लंड ने मेरी निगाहें बाँध लीं, जैसे कोई सर्प अपने शिकार को मंत्रमुग्ध कर दे। काका के सफेद बालों के बीच वह लटक रहा था। मेरी सांसे अटक गई।

पति का तो खड़े होते हुवे भी इतना बड़ा नहीं होता...…..
Mast lund hai.
 
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पति का तो खड़े होते हुवे भी इतना बड़ा नहीं होता...….. ।

नहीं नहीं ये में क्या सोच रही हूँ, में एक पतिव्रता हूँ। मेरे संस्कार ये सब सोचने की इजाज़त नहीं देते। उनका कैसा भी हो आखिर वो मेरे पति हे।

काका की धोती को संभालते हुए वापस उस पर डाल दि, ओर ड्राइंग रूम में चली गई। टीवी पर चल रहा सीरियल बस शोर भर था। उठ कर टीवी बंद करके किचन में काम करने लगी। पंद्रह मिनट बाद एक आवाज आई "मालकिन पानी..." अनुराग खड़ा था, उसके हाथ में खाली गिलास था। उसका चेहरा गर्मी में लाल हो रहा था, पसीने की बूंदें उसकी गर्दन से नीचे खिसक रही थीं। मैंने फ्रिज से ठंडा पानी निकाला तो उसकी आँखें उस बोतल पर टिक गईं जैसे रेगिस्तान में प्यासा किसी नदी को देखे। पानी पिला के दूसरी पूरी बॉटल जिसमें बर्फ जमा था उसको दे दी। अनुराग ने बॉटल को दोनों हाथों से पकड़ा, उसकी उँगलियाँ ठंड से सिकुड़ गईं, वह मुस्कुराया।

जब वो मुड़कर जा रहा था, पसीने से भीगी शर्ट उसके पतले शरीर पर चिपक गई थी। मुझे छोटे बच्चे पर दया आ रही थी। उसके पीछे बगीचे में जाकर बोली, "अनुराग, थोड़ा आराम कर लो। अभी धूप ज्यादा है।" वो मुस्कुराया और अपनी साइकिल के पास जाके बैठ गया, उसने ठंडी बोतल को साइड में रखी और साइकिल साफ करने लगा जो करीब दो साल से गैरेज में पड़ी थी। उसकी आँखों में एक नई चमक थी जैसे उसे जीवन में पहली बार कुछ मिला हो। बच्चे की खुशी देख मेरा गला भर आया।

जब वापस पीछे के कमरे में जाने की हिम्मत जुटाई तो काका अभी भी गहरी नींद में थे, मेरी नजर एक तरह की उत्सुकता से उनके धोती पर चली गई। वहां अभी भी एक उभार था। मेरी सांसें रुक सी गईं जब मैंने देखा कि उकना उभार तो सोते हुवे भी कितना लंबा और मोटा था।

मैंने अपने हाथ को अपने सीने पर दबाया, जहाँ दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। काका के धोती के नीचे वह उभार अब भी साफ़ दिख रहा था, जैसे कोई छिपी हुई सच्चाई जो बाहर आने को बेकरार हो। मेरी जीभ सूख गई थी, और मैं अपने ही विचारों से डरने लगी थी। क्या मैं वाकई उसे छूना चाहती थी.......?

शी...... शी......., में ये क्या सोच रही हूँ। में एक संस्कारी पतिव्रता औरत हूँ। मेरे हाथों ने अपने मंगलसूत्र को कसकर पकड़ लिया, जैसे वे मुझे बेहोशी से बचा रहे हों।

लेकिन पति भी तो यही चाहता था न? मेरे मन में एक कुटिल विचार कौंधा, जैसे कोई जहरीला फूल खिलकर मुरझा गया हो।

नहीं, पति चाहे कुच भी बोले, मैं एक पतिव्रता हूँ। मेरी मर्यादा, मेरे संस्कार... मेरे विचार, ये सब कुछ मेरी चरित्र की पवित्रता का प्रतीक हैं।

मुड़कर तुरत कमरे से बाहर दरवाजे तक आ गई ओर मेरे कदम कांपते हुवे अपने आप रुक गए। दिमाग में एक अजीब सी हलचल हो रही थी।

दिल कही ओर दिमाग कही ओर भाग रहा था। ओर क्यों न भागे! आज जीवन में पहली बार इतना बड़ा लंड देखा था। और वो भी मेरे घर में, मेरी नज़रों के सामने। वो भी खुद चल कर नहीं आया था।

सिर्फ..…...., सिर्फ एक बार खाली उसे देखने में ही क्या बुराई है? मेरे मन में अचानक ये खयाल आया, जैसे कोई बिजली कौंध गई हो। तीनों कमरों के बीच खड़ी थी, जैसे कोई चोर हो। तीसरा वाला हमारा बेडरूम था। हाथ कांप रहे थे और सांसें तेज हो गई थीं। अगर कोई देख ले तो...? लेकिन घर में तो कोई था ही नहीं। अनुराग भी बाहर साइकिल रिपेयर करने में मशगूल था। ओर सिर्फ देखना तो पाप नहीं हे ना?

कमरे में पखे की आवाज़ के साथ मेरी साँसें तेज हो गईं जैसे मैंने कोई भाग दौड़ की हो। हथेलियों से पसीना टपक रहा था, उँगलियाँ साड़ी के पल्लू को मसलने लगीं। मैंने खुद को थामा, पर आँखें उस धोती के पल्लू पर जमी रहीं जो काका की हर साँस के साथ धीरे-धीरे लंद का उभार भी ऊपर नीचे हो रहा था। वह विशाल आकार मेरे घर में था, मेरी नज़रों के सामने पड़ा हुआ, जैसे कोई निषिद्ध फल जिसे छूने का प्रलोभन दे रहा हो।

दिलों दिमाग को लड़ा रही थी जब पंखे की आवाज़ के बीच मेरे काँपते पैरों से रूम के दरवाजे तरफ़ बढ़ी, जैसे कोई चोर हो। दिमाग में तूफ़ान सा उठा हुआ था, पर देह के हर रोम ने जैसे अपनी सहमति दे दी थी। कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया, पंखे की आवाज़ में मेरे दिल की धड़कनें डूब गईं। काका अभी भी बेहोशी में गहरी नींद में थे, उनके चेहरे की सफेद दाढ़ी और मूंछें पसीने से चिपकी हुई थीं, चेहरे पर बुढ़ापे की लकीरें गहरी हो चुकी थीं, मुंह में आधे दांत मुंह को खुला छोड़ रहे थे। मेरी निगाहें सरकती हुई उनकी छाती पर पड़ीं जहाँ सफेद बालों का घना जंगल फैला हुआ था, और नीचे उनका मटके जैसा फूला हुआ दुवा विशाल पेट उठ रहा था। उनके शरीर में बस एक पेट को छोड़ कर बाकी सब पतला सुखा हुआ था। हाथ पैरों की हड्डियां साफ़ दिख रही थीं।

एक बार और काका की ओर देखा, काका अभी भी बेहोश थे। बेजान की तरह। मेरी नज़र सीधे धोती के पल्लू पर गई। कमरे की हवा में वही अजीब सी दुर्गंध थी, मूत्र, पुराने पसीने और किसी बेजान चीज़ की गंध। अपनी हिम्मत को एक साथ जुटा कर कांपते हाथ आगे बढ़ाए और धोती का पल्लू थोड़ा और हटा दिया। मेरी सांसें अटक गयी जब उसके नीचे का विशालकाय लंड साफ़ नज़र आने लगा। मैंने कभी अपने पति का भी इतना बड़ा नहीं देखा था। उसकी गोलाई, उसका मोटापन, उसकी लंबाई। अभी काका बेहोश थे लेकिन फिर भी उनका लंड आधा खड़ा सा लग रहा था। लंद के चारों तरफ नीली नसें साफ़ दिख रही थीं जैसे किसी पुराने पेड़ की जड़ें।

पल भर को मेरे हाथों ने जैसे जान ही खो दी, ठंडे पत्थर की तरह जम गए। कुछ पल के बाद जैसे ही धोती को वापस ढकने के लिए हाथ बढ़ाया, मेरी उंगली उस गर्म मांस से छू गई। एक जानजनाहट सी लहर दौड़ गई शरीर में, जैसे कोई बिजली चमकी हो। मेरा हाथ झट से खिंच गया, पर तब तक देर हो चुकी थी, वह स्पर्श अब मेरी उंगलियों से नहीं, बल्कि मेरी सांसों में घुल गया था। कमरे की हवा अचानक गर्म हो उठी, जैसे पूरा कमरा उस एक छुअन की गर्मी से भर गया हो।

सोया हुआ भी कितना कड़क था वह......, अभी भी धोती से आधा बाहर झाख रहा था। ओर एक बार छू लू? मैंने अपने हाथों को देखा, जैसे वे मेरे नहीं किसी और के थे। बस एक बार उसे छू कर देखने में ही क्या बुराई है? मेरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई, जैसे कोई गुप्त द्वार खुल गया हो।

मैने वापस धोती को धीरे से हटा दिया और उसके चेहरे तरफ देखा कि कहीं उनकी नींद तो नहीं खुल गई। लेकिन काका अभी भी गहरी नींद में थे। मेरी हथेली फिर से उस जीवित वस्तु तरफ गई, जैसे किसी अज्ञात शक्ति ने मुझे खींच लिया हो। मैंने अपने हाथ को फिर से आगे बढ़ाया, इस बार ज्यादा निश्चय के साथ। मेरी हथेली उस गर्म, मखमली सतह पर पड़ी जो तुरंत ही मेरे स्पर्श के नीचे फैल गई, जैसे गर्म मोम।

एक अजीब सी गर्मी मेरे हाथ से लेकर पूरे शरीर में फैल गई, जैसे कोई गुप्त अग्नि जो मेरी नसों में दौड़ने लगी। मैंने धीरे से दबाया, उसकी नर्म लेकिन मज़बूत बनावट को महसूस करते हुए। वह मेरी उंगलियों के नीचे किसी जीवित चीज़ की तरह स्पंदित हुआ, जिससे मैं चौंककर हाथ खींच लेती। मेरी सांसें अब तेज हो चुकी थीं, गले में सूखापन महसूस हो रहा था। काका की साँसें अभी भी गहरी और नियमित थीं, पर मेरे भीतर एक तूफान उठ रहा था, जिसमें शर्म और उत्सुकता की लहरें टकरा रही थीं।

आज जो मैने देख था वो मेरे पति से भी बड़ा था, एक जीवित, सांस लेता हुआ अंग जो मेरी हथेली के नीचे गर्माहट छोड़ रहा था। उसकी विशाल भरावदार संरचना मेरी उंगलियों के नीचे फड़क रही थी, जैसे कोई जागृत प्राणी। मैंने उसकी खुरदरी नसों को महसूस किया, जो सूखी धूल की तरह रूखी थीं, पर उम्र के बावजूद कठोर त्वचा के नीचे स्पंदित हो रही थीं। उनके आसपास मेली त्वचा चिपकी थी, लेकिन मुझे गंदा बिल्कुल भी नहीं लग रहा था। मेरे भीतर एक अजीब सी हिचकिचाहट उठी, पर साथ ही एक ऐसा आकर्षण जिसे नकार पाना मेरे बस में नहीं था।


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और फिर अचानक, एक झटका। काका की जाँघ की मांसपेशी सिकुड़ी, उनका पैर ऐंठा, जैसे कोई सपने में चलने लगा हो। मैंने चौंककर हाथ खींच लिया, उठकर दो कदम पीछे हट गई। उनके चेहरे तरफ देखने लगी। लेकिन वह फिर से स्थिर हो गए थे। शायद लंद छूने से उनके अंदर का आदमी का जननांग फड़क उठा था। लेकिन इधर मेरा शरीर भी डर के मारे कांपने लगा था। पैरों में एक कंपन हो गई थी, दिल की धड़कन तेज हो चुकी थी। मैने तुरंत चारों तरफ नज़र दौड़ाई।

कमरा खाली था। खिड़की से झाँका तो अनुराग अभी भी सायकल पे था, उसकी पीठ मेरी तरफ थी। पूरे लॉन में कोई नहीं था। मेरी नज़र फिर से काका के चेहरे पर आ गई। अगर वह अभी आँखें खोल देते तो? मैंने खुद को समझाया, क्या कर लेता यह बूढ़ा? वह तो एक गरीब भिखारी जैसा आदमी है। उसकी औकात ही क्या है मेरे सामने खड़े होने की? और ऊपर से उसका पूरा शरीर बुढ़ापे में ढल हो चुका है, उसमें इतना दम नहीं कि मेरे साथ लड़ सके। मैं एक औरत हूँ, अगर चाहूँ तो चिल्लाकर किसी को भी बुला सकती हूँ। कह सकती हूँ कि इसने मेरे साथ जबरदस्ती की। यह सोचकर मैंने हिम्मत जुटाई और फिर आगे बढ़ी।


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उसके लंद को देखा तो मेरा मन चकित हो गया। वह अब पूरी तरह खड़ा था, छत की तरफ सलामी देता हुआ, उनकी जाँघों के बीच से ऊपर उठा हुआ एक विशालकाय स्तंभ। मैं उसकी मोटाई और लंबाई देखकर दंग रह गई, होंठों के बीच से एक असमंजस भरी सांस निकल गई। क्या वाकई में किसी आदमी का इतना बड़ा लंद हो सकता है? मेरे पति का तो उसके सामने बौना लगता, जैसे कोई नन्हा पौधा विशाल वटवृक्ष के सामने खड़ा हो। केवल आकार में ही नहीं, बल्कि उसकी त्वचा की बनावट भी भिन्न थी, खुरदरी, सख़्त, जैसे किसी दूसरी प्रजाति का जानवर हो। सुपारी के चमड़ी के उतर जाने से वहाँ मेल की सफेद परत जमी हुई थी, पेड़ की छाल की तरह उखड़ी हुई, जिसके नीचे का गुलाबी भाग चमक रहा था। जैसे कोई फूल अपनी कली से अचानक फटकर बाहर आ गया हो।


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हाथों को धीरे से आगे बढ़ाते हुए मैंने उसे गोल-गोल हिलाना शुरू किया, ऊपर से नीचे तक हथेली फेरने लगी जैसे कोई मूठ मार रही हो। वह झटके पर झटके खाने लगा, जैसे मेरी चूत की गहराई में उतरने को उतावला हो। यह सोचते ही मेरे भीतर एक गीला पन फैल गया, वह भी अब इस विशाल लंद की भूख के लिए तड़प कर मिन्नतें करने लगी थी। मेरी उंगलियाँ उसकी नीली नसों पर नाच रही थीं, जैसे कोई बंजारा अपने वाद्य पर थाप दे रहा हो।

सुपाड़ा फूल कर इतना मोटा हो चुका था कि मेरी हथेली उसे पूरी तरह नहीं पकड़ पा रही थी। सुपाड़े की मोटाई को देखते हुए मैं अपने चूत के छोटे से छेद के साथ मानसिक तुलना करने लगी। क्या इतना बड़ा मेरी चूत में समा पाएगा? मेरे पति का तो यह आधा भी नहीं था, फिर भी कभी-कभी उससे भी चुभन हो जाती थी। पर जब मेरी उंगलियों ने उसकी गर्म त्वचा को महसूस किया, तो मेरी चूत ने एक अजीब सी गुदगुदी महसूस की। हर एक औरत ख्वाब में एक इसे ही मोटे लंद के लिए चाहत होती है। क्या मुझे इसे अपनी चूत में लेना चाहिए?

तभी मेरे दिल के कोने से आवाज आई - नहीं नहीं, यह मैं क्या कर रही हूँ? मैं एक पतिव्रता हूँ। चाहे जो हो, मेरे पति से बेहतर कोई नहीं हो सकता। यह सोचते हुए मेरे हाथ कांपने लगे, और बात सिर्फ इसे छूने की ही थी। मैंने अपने हाथ से धोती के पल्लू को उठाकर उसे ढक दिया और अपना हाथ पीछे खींच लिया। एक ग्लानि और अपराध के भाव से मैंने खुद को कमरे के दूसरे छोर पर पाया, जहाँ से मैं उस सोए हुए बूढ़े को देख रही थी, अब एक बार फिर सिर्फ एक बीमार मजदूर के रूप में। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने उन्हें अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछा, मानो वे किसी अपराध के सबूत हों।

में इतनी गिरी हुई भी नहीं हु कि एक बूढ़े भिखारी जैसे मजदूर के साथ ऐसा काम करू। मेरे सामने उसकी कोई औकात नहीं हे, कहा वो एक भिखारी जैसा गंदी नाली कीड़ा, और एक मैं एक बड़े घर की बहु।

वो सब जाने दो में एक ऐसे परिवार की बेटी हु जहा सिर्फ पतिव्रता की कहानिया सुनाई जाती थी। पति के अलावा किसी और के सपने देखना भी पाप था। में एक उच्च संस्कारो में पली बढ़ी औरत हु। मेरा जमीर मुझे ऐसा करने की इजाजत नहीं देता, ओर मेरे पति ने मेरे जीवन की हर खुशियां मेरे दामन में डाल दी। मैंने अपनी आंखे बंद कर ली और मेरे बच्चे के चेहरे की तस्वीर मेरे दिमाग में आई। वह मेरी इज्जत है। मैं अपने बच्चे ओर पति को कैसे समझाऊंगी, अगर वह जान जाए कि उसकी मां ने एक बूढ़े मजदूर के साथ ऐसा किया? समाज में मेरी क्या इज्ज़त रह जाएगी?

तभी अनुराग का आवाज़ आयी।" मालकिन, दादा की तबीयत कैसी है? " मैने जल्दी से कमरे का दरवाजा खोला और बाहर निकल आई। मेरे चेहरे का रंग फीका पड़ चुका था, और हाथ अब भी काँप रहे थे। अनुराग ने मेरे चेहरे को देखा तो चिंतित हो गया। " मालकिन आप ठीक तो हैं? आपका चेहरा पीला पड़ गया है। " मैंने जल्दी से अपने आप को संभाला और उसे समझाया। " मैं ठीक हूं बेटा। बस थकान हो रही है। तुम क्या कर रहे हो? " उसने मुस्कुराते हुए कहा। " साइकल साफ कर रहा हूं, थोड़ा रिपेयरिंग की जरूरत है।

मुस्कान के साथ में बोली, कोई बात नहीं बेटा, काम कल करना आज अपनी साइकिल को अच्छे से देख लो। मैं फिर से जम में मुड़ी, मेरे पैर फिर से कमरे की ओर बढ़ गए। क्योंकि अंदर जाने का रास्ता वही था, वहां से ही ड्राइंग रूम में, ओर वह से ही बैडरूम जा सकते थे। मुझे लगा, मैं सच में एक चोर हूं जो चुपके से चोरी करने जा रही है। दरवाज़ा खुला छोड़कर मैं अंदर घुस गई। काका अभी भी सो रहे थे। उनका लंड अब भी तनाव में था। मेरे मन में एक हलचल शुरू हो गई।

धोती के अंदर उस विशालकाय अंग को देखकर मेरे मन में आग सी लग गई। मैं वहीं खड़ी होकर अपने आप से लड़ रही थी - एक तरफ मेरी स्त्रीत्व की प्यास जो उस मोटे लंड को चाहती थी, दूसरी ओर मेरे संस्कार जो मुझे पीछे खींच रहे थे। मेरी साँसें तेज हो गईं, छाती तेजी से उठने-गिरने लगी। चूत के अंदर गर्माहट फैल रही थी, जैसे कोई पिघला हुआ सीसा मेरे संकल्प को नष्ट कर रहा हो।

यह मौका दुबारा नहीं मिलेगा... शायद कभी नहीं। मेरे शरीर में गर्मी की लहर दौड़ गई। अगर मैं उसे अपनी चूत के अंदर नहीं ले सकती, तो कम से कम बाहर से स्पर्श तो कर सकती हूँ? बस एक छोटा सा स्पर्श... जिससे पता चले कि ऐसा कैसा लगता है। क्या मुझे ऐसा करना चाहिए?

ओर ऐसे भी इस बूढ़े का एक पैर कबर में, अपने जीवन की आखरी सांसे गिन रहा है। आज हे ओर कल नहीं। चला गया तो मेरा राज भी उसके साथ दफन हो जाएगा।

मेरे पैर उसके पास जाके ठहर गए, जैसे वे मेरे नियंत्रण से बाहर हो रहे हों। फिर भी, मेरी नज़रें उस विशाल आकार से नहीं हट रही थीं। बस सिर्फ एक बार। सिर्फ एक छोटा सा स्पर्श। मैंने अपने आप को समझाया कि पति की ख्वाहिश तो बड़ी है लेकिन यह तो सिर्फ स्पर्श की बात है। वो तो दूसरे से चुदवाने की बात कर रहे थे।

बस एक स्पर्श। यही मैंने अपने आप से कहा, जैसे कोई मंत्र जप रही हो। मेरी उंगलियाँ उसकी जांघ पर रेंगती हुई उस विशालकाय अंग की ओर बढ़ीं, जैसे कोई चोर अंधेरे में कीमती हीरे को छूने जा रहा हो। पहले स्पर्श में ही मेरी साँसें रुक सी गईं, वह इतना गर्म था, इतना जीवंत, जैसे उम्र के बावजूद उसमें अभी भी ज्वाला धधक रही हो। मैंने धीरे से उसकी लंबाई को महसूस किया, नीली नसों वाली उसकी त्वचा मेरी उंगलियों के नीचे फड़क रही थी, जैसे कोई जंगली जानवर जो अभी तक वश में नहीं किया गया हो।

अंत में खुद को संभालते हुए, अपने मनोबल को जुटाती हुई, आखिरकार अपनी जगह से उठी, कुछ करने से पहले कंफर्म करने के लिए दरवाज़े की बाहर जाके देखा। पोता अभी भी बाहर बगीचे में था। वह साइकिल के पीछे के पहिये को उलट कर खड़ा था और चेन को ठीक करने में मशगूल था। मैंने धीरे से दरवाज़ा बंद किया और वापस कमरे में आई। काका को हिला हिला कर देखा तो उनकी आंखें बंद थी। सब ठीक था।

कंफर्म करने के बाद साड़ी और पेटीकोट के अंदर हाथ डालकर मैंने अपनी चूत को छुआ तो वह गीली हो चुकी थी। यह देखकर मैं चकित रह गई, क्या सच में मैं इस बूढ़े के लिए इतनी उत्तेजित हो गई थी? एक लज्जा जो एक बूढ़े मजदूर के प्रति ऐसा महसूस करे, मेरे शरीर में आग की लहर दौड़ गई।

लेकिन मेरी उंगलियाँ खुद ब खुद साड़ी के अंदर पैंटी के कोने को पकड़ने लगीं, जैसे कोई अलग ही शक्ति उन्हें नियंत्रित कर रही हो। मैंने पैंटी उतारी और फर्श पर छोड़ दी, जहाँ वह अकेलेपन में सिमटी पड़ी रही।

मैंने अपने आप को संभालते हुए धीरे से उसके सिर की तरफ देखा। वह बूढ़ा अभी भी गहरी नींद में था, उसकी सांय-सांय करती साँसें और ढीली झुर्रियों वाला चेहरा मुझे आश्वस्त कर रहा था कि वह जाग नहीं जाएगा। मेरे हाथ कांपते हुए उसकी पतली जाँघ पर रखे, जहाँ से उसका विशाल लंद मुझे निमंत्रण दे रहा था, जैसे कोई पेड़ जिसकी जड़ें उखड़ने को तैयार हों। मैंने अपनी साड़ी के पल्लू को थामा और खुद को समझाया, बस एक स्पर्श, बस एक छोटा सा अनुभव।

अतः पूरी हिम्मत जुटाते हुए मैंने अपनी साड़ी को नीचे से उठाकर घुटनों तक समेट लिया। मेरा एक पैर उसकी पतली जाँघों की दूसरी तरफ धीरे से टिका, जैसे कोई पक्षी डाल पर उतरता हो। शरीर को थोड़ा और आगे लाते हुए मैंने उसकी गर्माहट को महसूस किया, उम्र के साथ ढल चुकी त्वचा की वह गर्मी जो अभी भी जीवंत थी। मेरी निगाह उस विशाल आकार पर टिकी रही, जो अब मेरे सामने और भी स्पष्ट हो चुका था, जैसे कोई साँप जो धूप में आराम कर रहा हो। मैंने अपने एक हाथ को धीरे से उसकी तरफ बढ़ाया, जैसे कोई जंगली जानवर को छूने की कोशिश कर रहा हो।

जैसे ही मेरी उंगलियाँ उस गर्म सतह के संपर्क में आईं, मेरे पूरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। वह कड़क खींची हुई थी और उसकी सतह के नीचे एक कड़ापन था जो मेरी हथेली को धड़कता हुआ महसूस हो रहा था। मैं अपनी हथेली से उसकी नसों को महसूस कर सकती थी, जैसे कोई छिपी हुई नदी जो उसके नीचे बह रही हो। मेरे हाथ कांप रहे थे, लेकिन मैं उस स्पर्श से खुद को दूर नहीं कर पा रही थी। मैंने उसे अपनी हथेली में लिया और हल्के से दबाया, वह और भी सख्त हो गया, जैसे मेरे स्पर्श से उसे और ताकत मिल गई हो। मैंने उसकी गर्माहट को अपनी उंगलियों के बीच महसूस किया, यह अनुभव इतना नया था कि मेरी सांसें रुक सी गईं।

धीरे-धीरे मैंने उसे ऊपर से नीचे तक टटोला, मेरी हथेली उसकी लंबाई को नापती हुई नीचे तक गई। वह मेरी चूत के ठीक नीचे था, और मैंने खुद को समझाया कि बस एक बार स्पर्श करके देख लेती हूं।

मैंने धीरे से अपने घुटने मोड़े, अपने शरीर को थोड़ा और नीचे झुकाते हुए। मेरी चूत उसके लंड के सिरे से छू गई, एक झटके सा लगा, जैसे कोई गर्म लोहा चमड़ी पर रख दिया गया हो। वह गर्म था, मुलायम और चिकना, लेकिन उसकी नोक पर पेशाब की नमी थी जो मेरी त्वचा से चिपक गई। मैंने थोड़ा सा और नीचे झुकी, और अब उसका विशाल सुपारा मेरी चूत के निचले होंठ को दबा रहा था। मेरे मुँह से एक हल्की सी आह निकल गई, जैसे कोई ठंडी हवा में तप्त धातु पर पानी गिरा हो। मैंने अपने आप को संभालने की कोशिश की, लेकिन मेरी कमर ने अपना खुद का निर्णय ले लिया, वह धीरे धीरे हिलने लगी, उसके लंड पर अपनी चूत को रगड़ते हुए।

तभी मुझे उसकी जांघों में एक हल्की सी ऐंठन महसूस हुई। मैं जमी हुई, डरकर ऊपर देखा, क्या वह जाग गया है? लेकिन उसकी आँखें अभी भी बंद थीं, केवल उसके नथुनों से भारी साँसें निकल रही थीं। उसका लंड, हालाँकि, मेरी चूत के नीचे और भी फूल चुका था, जैसे कोई साँप जो जागृत होकर फन फैला रहा हो। मेरी अंगुलियों ने अपने आप ही चूत के गीले होठों को और अलग कर दिया, जहाँ से गर्म लार की बूँदें टपककर उसके सिरे पर जमा हो रही थीं। वह चिपचिपा तरल मेरे हाथों में फैल गया, मानो मेरा शरीर अपनी खुद की भाषा में उसकी गर्माहट को आमंत्रित कर रहा हो।

मैने लंद का बड़ा सुपारा पकड़ कर चूत के होठों के बीच रखा और तभी सुपाड़े की नोक चूत के नाजुक अंग को छू गई। शरीरमे एक मिट्ठी तरंग दौड़ गई, ना चाहते हुवे भी सुपाड़े को चूत के होठों के बीच आगे पीछे करना चालू कर दिया।


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मेरी कमर ने अपने आप ही एक लय पकड़ ली, धीरे-धीरे आगे-पीछे हिलते हुए, जैसे कोई अनजानी शक्ति मेरे शरीर को संचालित कर रही हो। तभी अपने कूल्हों को थोड़ा ऊपर उठाके मैने अपनी दो उंगलियों से चूत के छोटे से द्वार को और चौड़ा किया जिससे चूत की पानी की एक बूंद उसके मोटे लंड के पेशाब वाले छेद पे गिरी। उसके लंड ने ऐसी फड़कन की जैसे उसने भी इस गर्माहट को महसूस किया हो। मेरी चूत के होठ अब पूरी तरह खुल चुके थे, गीले और सूजे हुए, उसके चमकदार सिरे पर टपकती हुई नमी को लिपटे हुए।

चूत को वापस मैंने अपनी आँखें बंद करके उस विशाल सुपारे को मेरे गीले द्वार के ऊपर रखा। मेरे पूरे शरीर में एक झटका सा दौड़ गया, वह गर्म, चिकना और अविश्वसनीय रूप से भारी लग रहा था। मैंने अपनी सांस रोककर थोड़ा और नीचे झुकी, जिससे उसका सिरा मेरे चूत के संकरे मुख में चुंबन करने लगा। एक अजीब सी तड़प से अपनी साड़ी का पल्लू और ऊपर उठा लिया जिससे मेरी गांड भी अब उजागर हो गई थी। नीचे से पूरी तरह नंगी हो गई थी, साड़ी और पेटिकोट मेरे कमर पर चारों तरफ इकठ्ठा करके बंधी हुई थी, जैसे कोई फूल जिसकी पंखुड़ियाँ खुल गई हों।

मेरी चूत के अंदर से पानी टपकने लगा था। वह गर्म तरल उसके सिरे पर जमा हो रहा था, जैसे कोई पेड़ जिसकी जड़ों में पानी टपक रहा हो। मैंने अपनी चूत के होठों को और खोल दिया। एक हाथ से अपने चूत के फैले हुए होंठों को पकड़कर और अलग किया जिससे वह गुलाबी गुफा और अधिक खुल गई। उसका विशाल सिर मेरी चूत के मुख से काफी बड़ा था।

मैं आंखे बंद करके बूढ़े के विशाल लंद को चूत के होठों के बीच महसूस कर रही थी। शरीर में एक अजीब सा खिंचाव थी, जैसे कोई मुझे अंदर से खींच रहा हो।


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तभी मुझे लगा जैसे उसके पेट के नीचे कुछ हिला। मेरे खुले हाथों के नीचे उसकी मांसपेशियाँ सिकुड़ीं।

कही ये जाग तो नहीं गया?

मेरा दिल धड़क गया, ऐसे मानो छाती फाड़कर बाहर कूद जाएगा। उसी हड़बड़ाहट में मेरा पैर फिसला और मैं अपने पूरे वजन के साथ उसके ऊपर जा गिरी, एक झटके में उसका पूरा मोटा नसों से उभरा हुआ बूढ़े का लंद मेरी चूत को चीरता हुआ अंदर धंस गया। मेरे मुँह से निकला दर्द भरा स्वर मैंने अपने मुंह में ही दबा लिया,
Bahut bhuki hai lund ke liye.
 
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