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Adultery काव्या

Kavya the green tea

👉The 🫦Hot 💚 Green ☕ Tea
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जब मैंने ने सुबह अपनी आँखें खोलीं तो रेशमी चादर के नीचे से सूरज की किरणें मेरी त्वचा को छू रही थीं। सुबह के आठ बजे थे और पति जी पहले ही ऑफिस के लिए निकल चुके थे। मैंने धीरे से बिस्तर से उठकर अपने लंबे काले बालों को पीछे बांधा और संगमरमर के बाथरूम की ओर चल पड़ी। गर्म पानी से नहाते हुए मैंने अपने शरीर पर फैले हुए गुलाबी साबुन के झाग को देखा - त्वचा इतनी कोमल कि एक बार फिर मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि मैं पैंतीस की उम्र पार कर चुकी हूँ।

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स्नान के बाद थोड़ा सा राशन लेने के लिए दुकान की ओर चल दी। गर्मी की धूप में चलते हुए मेरे पैरों के सैंडल नीचे कंकड़ चरमरा रहे थे। पति जी ने हाल ही में एक नई कंपनी शुरू की थी, इसलिए हम इस शहर में नए-नए आए थे। गाड़ी सिर्फ एक ही थी, जो उनके पास रहती थी। हमारा घर शहर से थोड़ा दूर, एकांत में बना हुआ था, जो अभी हमने सिर्फ काम-चलाव किराए पर लिया था।। घर के चारों ओर बाग़ था और बाग़ के चारों तरफ ऊंची दीवारें खड़ी थीं। दीवारों के साथ-साथ बड़े-बड़े पेड़ों की कतार थी। जब भी घर में नौकर जब जरूरत पढ़ती तो बाहर से बुला लेते थे या वो उनकी कंपनी से किसीक भेज देते थे। घर काफी बड़ा था बेडरुम ऊपर ओर नीचे भी था। पूरे घर में हम दोनों ही अकेले रहते थे बच्चे अभी बोर्डिंग में पढ़ रहे थे।

दुकान काफी पुरानी थी। वहीं थोड़ी दूर पर एक रास्ते पे छोटी सी जगह पर बनी हुई थी। दुकान एक बूढ़ी औरत चलाती थी, और उसका एक बूढ़ा नौकर था। जब मैं दुकान के पास पहुंची तो बूढ़ा नौकर बाहर बैठा था और अपने घुटनों पर हाथ रखे हुए रास्ते की ओर देख रहा था। मुझे देखते ही खड़ा हो गया।
 
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उस नौकर की कमीज फटी हुई थी, और उसके पेट पर बड़ा सा उभार था जो उसकी पतली काया के साथ बिल्कुल मेल नहीं खाता था। उसके सिर और चेहरे के हल्की दाढ़ी और मूंछों पर सफेद बाल थे। जो हवा में हल्का सा हिल रहे थे। जैसे ही मैं पास गई, उसने अपनी गर्दन घुमाकर मेरी ओर देखा और धीरे से मुस्कुरा दिया। उसकी आंखें पानीदार थीं, लेकिन उनमें कुछ ऐसी चमक थी जो बताती थी कि उसके अंदर अभी भी जीवन बचा हुआ है। मैंने उसे अपने संस्कारी बड़पन में नमस्ते कहा और दुकान के अंदर चली गई।

दुकान के अंदर बूढ़ी औरत बैठी थी, जो अपने हाथों में एक पुरानी किताब पढ़ रही थी। उसके चेहरे पर गहरी झुर्रियां थीं, और उसके हाथों की त्वचा पारदर्शी सी लग रही थी। जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, उसने अपनी आंखें उठाकर मेरी ओर देखा और मुस्कुरा दी। "बेटी, आ गई?" उसने पूछा, जैसे वह मेरा इंतजार कर रही थी। मैंने हां में सिर हिलाया और अपनी जरूरत की चीजों की लिस्ट उसे थमा दी। वह धीरे-धीरे उठी और सामान इकट्ठा करने लगी।

तभी दरवाजे पे खटखटाहट हुई और एक लड़का अंदर आया। उसकी उम्र शायद **** साल होगी, पतला-दुबला, पर चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी। वह बूढ़े का पोता था, जो कभी-कभी दुकान पर आकर अपने दादा की मदद करता था। "दादी, मैं आ गया," उसने कहा, दुकान की मालकिन को कहा।

बूढ़ी औरत ने उसकी ओर देखा और मुस्कुरा दी। "अरे, तू आ गया? अच्छा हुआ। यह ले, इन सामानों को अंदर रख दे," उसने कहा, मेरी ओर इशारा करते हुए। बेचारा बहुत भोला लड़का था। मैंने उसे देखा तो वह मेरी ओर देखकर शरमा गया। उसके गालों पर गुलाबी रंग उभर आया और वह अपनी आँखें नीचे करके मेरे पैरों की ओर देखने लगा। मैंने मन ही मन मुस्कुराई। इतने छोटे से बच्चे में इतनी शर्म? मैंने उसकी ओर देखते हुए कहा, "तुम्हारा नाम क्या है?" वह चौंक गया, जैसे उसने सोचा भी न हो कि मैं उससे बात करूँगी, क्योंकि दुकान में तो बहुत बार आई थी लेकिन आज मैने उससे बात की।
 
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"अ...अनुराग," उसने धीमी आवाज में कहा। उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे झुककर सुनना पड़ा। मैंने उसके चेहरे को गौर से देखा। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी थीं, जैसे किसी हिरण के बच्चे की। उसकी त्वचा कोमल थी, उस पर एक अजीब सी चमक थी। उसके होंठ पतले थे, और उसके दाँत एकदम सफ़ेद चमक रहे थे दूध के हो ऐसे। वह सच में बहुत सुंदर लड़का था। मैंने उसकी ओर देखते हुए मुस्कुराई। "तुम्हारा नाम बहुत सुंदर है," मैंने कहा। वह और ज्यादा शरमा गया, उसके गालों पर गुलाबी रंग और गहरा हो गया।

तभी मेरी नज़र उसके कपड़ों पर पड़ी। उसकी पतलून फटी हुई थी, घुटने के ऊपर से। ओर शर्ट भी पुरानी थी, किनारों से धागे निकले हुए। मैंने देखा कि उसके पैरों में चप्पल भी फटी हुई थी। एक तरफ का फीता टूटा हुआ था, और वह उसे बार-बार पकड़कर ठीक करने की कोशिश कर रहा था। मेरे मन में एक अजीब सी करुणा जाग गई।

"अनुराग, तुम मेरे साथ चलोगे?" मैंने अचानक पूछ लिया। वह चौंककर मेरी ओर देखने लगा। बूढ़ी औरत भी मेरी ओर देख रही थी, उसकी आँखों में एक अजीब सी जिज्ञासा थी।

"मैं तुम्हारे लिए कुछ घर पर कपड़े हे वो दूँगी," मैंने कहा। अनुराग का चेहरा खिल उठा, फिर अचानक वह अपने दादा की ओर देखने लगा, जो अब तक दुकान के बाहर बैठा था।

बूढ़े ने धीरे हा में से सिर हिलाया, जैसे अनुमति दे रहा हो। अनुराग की आँखों में चमक आ गई। वह जल्दी से मेरे सामानों को एक थैले में भरने लगा। उसकी उंगलियाँ तेजी से चल रही थीं, जैसे वह डरता हो कि मैं अपना मन बदल लूँगी। जब उसने सारा सामान थैले में डाल दिया। उसने जल्दी से सिर हिलाया और थैला उठा लिया।

बूढ़ी औरत को पैसे दिए तो वह मुस्कुराई। "बेटी, तुम बहुत अच्छी हो," उसने कहा। मैंने मुस्कुराकर सिर हिलाया और दुकान से बाहर निकल गई। अनुराग मेरे पीछे-पीछे चल रहा था।

रास्ते में चलते हुए मैंने उससे पूछा, "तुम पढ़ते हो?" वह सिर झुकाकर बोला, "हाँ आंटी।" मैंने ध्यान से देखा तो उसकी कमीज की जेब से एक किताब का कोना दिख रहा था। जब मैंने पूछा तो उसने शरमाते हुए गणित की पुरानी किताब निकाली, जिसके किनारे सफेद धागे से सिले हुए थे।

हमारे घर के मेन गेट खोलकर अंदर घर तरफ चले गए , घर के दरवाजे के बाहर पहुँचकर मैंने उसे रोका, "यहीं खड़े रहो।"

अंदर जाकर मैंने कुछ पुराने कपड़े ढूंढ़े जो मेरे बेटों के थे। एक जोड़ी जींस, दो शर्ट, और एक नई जोड़ी चप्पलें। उन्हें एक थैले में रखकर मैं बाहर आई तो देखा अनुराग एकदम सीधा खड़ा था, जैसे कोई सैनिक। उसकी आँखें थैले पर टिकी हुई थीं, लेकिन वह हिलने की हिम्मत नहीं कर रहा था।

"ले लो," मैंने थैला उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा। उसने दोनों हाथों से थैला लिया, जैसे कोई कीमती खजाना हो। मैंने उसके चेहरे पर एक अजीब सी भावना देखी। वह धीरे से बोला, "धन्यवाद, मालकिन," और फिर अचानक उसने मेरे पैर छू लिए। मैं चौंक गई, पीछे हटते हुए बोली, "अरे नहीं! ऐसा मत करो।" ओर हा, ओर मैने कहा आंटी बोलोगे तो भी चलेगा। वो हंसते हुवे चला गया।

शाम को जब मेरे पति आए तो मुझे उन्हें रोटी बनाते देखा। वे मेरे पीछे आकर खड़े हो गए और मेरी कमर पर हाथ रख दिया। मैंने चौंककर पीछे मुड़कर देखा तो वे मुस्कुरा रहे थे। "आज बहुत खुश लग रही हो,"
 
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Hills

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काव्या और बूढ़े का मिलन मजेदार रहेगा। खूब अच्छे लेखक महोदय।
 
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"आज बहुत खुश लग रही हो," उन्होंने कहा। मैंने गैस की आंच कम करते हुए जवाब दिया, "तुम्हारे लिए खास पकवान बना रही हूँ।" उन्होंने मेरे गालों को चूम लिया और धीरे से कहा,

"बस करो, खाना बनाने की जरूरत नहीं। देर हो गई है।"

मैंने उनकी बात नहीं मानी और आटा गूंथना जारी रखा। वे मेरे पीछे खड़े होकर मेरी कमर पर हाथ फेरते रहे।

"ठीक है बाबा," आपका हुक्म हम समझ गए उन्होंने हुए कहा,ओर मुस्कराते हुए किचन के बाहर चले गए। मैंने रोटी सेकते हुए उनके चेहरे पर गहरी थकान देखी - आज शायद ऑफिस में बहुत मशक्कत की थी। एक अजीब सा ख्याल आया, कि शायद मैंने उन पर ज़रूरत से ज़्यादा ही सख्ती कर दी।

सब्जी तैयार होने के बाद गैस की आंच बंद करते हुए मैंने सारा खाना प्लेट में सजाया, चपातियाँ गरम रखने के लिए उन पर परात ढक दी। बेडरूम के दरवाज़े पर पहुँचकर मैंने धीरे से खोला - वह पहले से ही बिस्तर पर लेटे थे, आँखें बंद किए हुए। उनकी साँसें गहरी चल रही थीं,

चुपचाप मैंने प्लेट बेडसाइड टेबल पर रखी और धीरे से उनके पास बैठ गई। मेरे बैठते ही उनकी पलकें फड़कीं, लेकिन आँखें नहीं खोली। मैंने उनके माथे पर उभरे पसीने की बूंदों को रूमाल से पोंछा, AC ON कर दिया।

कुछ दिन बाद सुबह, उनके ऑफिस जाने के बाद मैंने दुकान से फोन करके थोड़ा बाकी का सामान मंगवाया।
 
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करीब दो बजे थे जब खिड़की के पास खड़ी हो कर अपने बच्चों के बारे में सोच रही थी, जो घर से दूर पढ़ने गए थे। अचानक नीचे गली में हलचल हुई। पुरानि दुकान वाला वह बूढ़ा सामान लेकर आया था, लेकिन आज उसके साथ अनुराग नहीं था। मैंने गेट खोलते हुए आज जो माली पति के कंपनी से झाड़ियां साफ करने आया था, उसको सामान सौंपा और वह बाहर चला गया।

में सामान्य रूप से उसे देख रही थी, तभी जब वो गेट से आगे जाके दीवाल के उस पार मुड़ा तो मैने देखा कि वो दीवार के साथ खड़ा होकर पेशाब करने लगा। मेरी नजर अनजाने में उसके शरीर के नीचे चली गई, और मैं हैरान रह गई। उसके शरीर के हिसाब से उसका लंड बहुत मोटा था, जो उसकी उम्र के बावजूद किसी जवान की तरह कड़क और ताकतवर लग रहा था। उसका शरीर एक दुबला पतला हड्डियों वाला था, लेकिन उसकी शरीर के हिसाब से उसकी तोड़ बहुत बड़ी थी। मैंने जल्दी से अपनी नजरें हटा लीं, मेरे संस्कारों और पत्नी धर्म ने मुझे उस तरफ देखने से रोक दिया।

मैंने धीरे से खिड़की का परदा खींचा और किचन की तरफ चल दी। शाम हो गई थी, रात का खाना बनाना था। पति जी भी आने वाले थे। मैंने सब्जियाँ काटनी शुरू की। तभी दरवाजे की घंटी बजी। पति आज जल्दी आ गए थे। मैंने खाना पकाना जारी रखा। उन्होंने पीछे से आकर मेरी कमर पकड़ ली। उनके हाथ गर्म थे। मैंने पलटकर देखा तो वे मुस्कुरा रहे थे।



"आज मैं बहुत थक गया हूँ," उन्होंने कहा। मैंने हल्का सा मुस्कुराकर सिर हिलाया। ठीक हे में आपका बदन दबा दूंगी, आप स्नान कर लो।

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वो नहाने चले गए। मैंने खाना पकाया। हमने साथ खाना खाया। खाने के बाद वो टीवी देखने लगे। मैंने बर्तन साफ किए। फिर नहाने चली गई। नहाकर जब आई तो वे बेडरूम में मेरा इंतज़ार कर रहे थे। मैंने लाइट ऑफ की और बिस्तर पर लेट गई। पति जी ने मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी जो मैं पहचान नहीं पाई।

"आज...कुछ नया ट्राई करते हैं," उन्होंने धीरे से कहा, उनकी उंगलियाँ मेरी कमर पर नाच रही थीं। मैंने सिर घुमाकर देखा तो वे मुझे इस तरह देख रहे थे जैसे कोई रहस्य कहने वाले हों। मेरी साँसें थोड़ी तेज हो गईं, पर मैंने खुद को संभाला।

"क्या मतलब?" मैंने पूछा,
 
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