"अ...अनुराग," उसने धीमी आवाज में कहा। उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे झुककर सुनना पड़ा। मैंने उसके चेहरे को गौर से देखा। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी थीं, जैसे किसी हिरण के बच्चे की। उसकी त्वचा कोमल थी, उस पर एक अजीब सी चमक थी। उसके होंठ पतले थे, और उसके दाँत एकदम सफ़ेद चमक रहे थे दूध के हो ऐसे। वह सच में बहुत सुंदर लड़का था। मैंने उसकी ओर देखते हुए मुस्कुराई। "तुम्हारा नाम बहुत सुंदर है," मैंने कहा। वह और ज्यादा शरमा गया, उसके गालों पर गुलाबी रंग और गहरा हो गया।
तभी मेरी नज़र उसके कपड़ों पर पड़ी। उसकी पतलून फटी हुई थी, घुटने के ऊपर से। ओर शर्ट भी पुरानी थी, किनारों से धागे निकले हुए। मैंने देखा कि उसके पैरों में चप्पल भी फटी हुई थी। एक तरफ का फीता टूटा हुआ था, और वह उसे बार-बार पकड़कर ठीक करने की कोशिश कर रहा था। मेरे मन में एक अजीब सी करुणा जाग गई।
"अनुराग, तुम मेरे साथ चलोगे?" मैंने अचानक पूछ लिया। वह चौंककर मेरी ओर देखने लगा। बूढ़ी औरत भी मेरी ओर देख रही थी, उसकी आँखों में एक अजीब सी जिज्ञासा थी।
"मैं तुम्हारे लिए कुछ घर पर कपड़े हे वो दूँगी," मैंने कहा। अनुराग का चेहरा खिल उठा, फिर अचानक वह अपने दादा की ओर देखने लगा, जो अब तक दुकान के बाहर बैठा था।
बूढ़े ने धीरे हा में से सिर हिलाया, जैसे अनुमति दे रहा हो। अनुराग की आँखों में चमक आ गई। वह जल्दी से मेरे सामानों को एक थैले में भरने लगा। उसकी उंगलियाँ तेजी से चल रही थीं, जैसे वह डरता हो कि मैं अपना मन बदल लूँगी। जब उसने सारा सामान थैले में डाल दिया। उसने जल्दी से सिर हिलाया और थैला उठा लिया।
बूढ़ी औरत को पैसे दिए तो वह मुस्कुराई। "बेटी, तुम बहुत अच्छी हो," उसने कहा। मैंने मुस्कुराकर सिर हिलाया और दुकान से बाहर निकल गई। अनुराग मेरे पीछे-पीछे चल रहा था।
रास्ते में चलते हुए मैंने उससे पूछा, "तुम पढ़ते हो?" वह सिर झुकाकर बोला, "हाँ आंटी।" मैंने ध्यान से देखा तो उसकी कमीज की जेब से एक किताब का कोना दिख रहा था। जब मैंने पूछा तो उसने शरमाते हुए गणित की पुरानी किताब निकाली, जिसके किनारे सफेद धागे से सिले हुए थे।
हमारे घर के मेन गेट खोलकर अंदर घर तरफ चले गए , घर के दरवाजे के बाहर पहुँचकर मैंने उसे रोका, "यहीं खड़े रहो।"
अंदर जाकर मैंने कुछ पुराने कपड़े ढूंढ़े जो मेरे बेटों के थे। एक जोड़ी जींस, दो शर्ट, और एक नई जोड़ी चप्पलें। उन्हें एक थैले में रखकर मैं बाहर आई तो देखा अनुराग एकदम सीधा खड़ा था, जैसे कोई सैनिक। उसकी आँखें थैले पर टिकी हुई थीं, लेकिन वह हिलने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
"ले लो," मैंने थैला उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा। उसने दोनों हाथों से थैला लिया, जैसे कोई कीमती खजाना हो। मैंने उसके चेहरे पर एक अजीब सी भावना देखी। वह धीरे से बोला, "धन्यवाद, मालकिन," और फिर अचानक उसने मेरे पैर छू लिए। मैं चौंक गई, पीछे हटते हुए बोली, "अरे नहीं! ऐसा मत करो।" ओर हा, ओर मैने कहा आंटी बोलोगे तो भी चलेगा। वो हंसते हुवे चला गया।
शाम को जब मेरे पति आए तो मुझे उन्हें रोटी बनाते देखा। वे मेरे पीछे आकर खड़े हो गए और मेरी कमर पर हाथ रख दिया। मैंने चौंककर पीछे मुड़कर देखा तो वे मुस्कुरा रहे थे। "आज बहुत खुश लग रही हो,"