भाग -२१
उस दिन , रोज के तरह मयूर आया । लेकिन वो आज थोड़ा , बुझा हुआ सा था।
मैने उससे कारण पूछा तो वो सही से कुछ बताया नहीं। मैने भी सोच स्कूल में कुछ हुआ होगा।
आज मैं उसके लिए कहने को कुछ अच्छा बनाई थी। और फिर उसके बाद , मैं रोज़ के तरह उसको अपनी बाहों में ले ली।

मैं रोज़ उसके आने से पहले ही मैं अपने बेटे को सुला देती थी। फिर हम दोनों एक दूसरे की प्यास बुझाते थे। मुझे मानो उसकी लत सी लग गई थी। और ये ही हाल उसका भी था।
वो रोज मेरी योनि को चाटता, मेरा दूध पीता , और मेरी योनि के पानी का टेस्ट लेता।
पति जब घर पे होते मेरा दिन काटना मुश्किल हो जाता।
लेकिन वो आज उतना , उत्साहित नहीं लगा। मैने उसको फिर से पूछा तो वो तब भी सही से कुछ बताया नहीं। तो मैं उसका मूड बनाने के लिए , एक एक करके अपने कपड़े उतारने लगी।

और फिर सलवार सूट उतर कर उसके सामने ब्रा और पैंटी में लेट गई।
और उसको ले कर बेड में लेट गई। और उससे मेरे दूध को पीने को बोली। वो वैसे ही किया भी लेकिन ऐसा लग रहा था उसका ध्यान कही और है।
मैं उठ के उससे पूछने वाली थी कि मेरे घर की डोर बेल बजी । और मेरी हालत खराब हो गई। मैं उसको देखी वो मुझसे भी ज्यादा डरा हुआ था।
मैं उसको छुप जाने को बोली , मुझे लगा कि मेरे पति आ गए हैं और ये मेरा आज आख़िरी दिन है।
तभी डोर बेल फिर से बजी। मैं जल्दी से अपने कपड़े पहनी और मयूर को स्टोर रूम में छुपा दी। और बाल सही करते हुए, दरवाजे के ओर बढ़ी।
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अगर मेरे पति ने मयूर को देख लिया तो मैं क्या बोलूंगी।
अगर ये भी कहती कि वो मेरे बेटे के साथ खेलने आया है तो वो कहते इतना बड़ा लड़का , बेटे के साथ क्यों खेलेगा??
और दरवाजा खोलने में इतना देर??
मेरा दिमाग फटने को तैयार था। तभी जोर से डोर बेल बजी और दरवाजे को पीटा गया।
सच में, मैं लगभग डर से रोने को थी। लेकिन दरवाजा खोला तो हैरान थी।
ये कोई 45 साल का आदमी था। दाढ़ी हल्की सफेद, पतला और लंबा। लेकिन मूछें बड़ी बड़ी।
मैं जल्दी बजी में दुपट्टा डालना भूल गई थी। तो वो मुझे बड़े ही अजीब से गंदी नीयत से देखने लगा।
मुझे अजीब लगा तो थोड़ा सा दरवाजे के पीछे खड़े हो कर बोली।
रितिका : जी… जी..कहिए.. ( मन ही मन गुस्से से)
वो बिना कोई डर और शर्म से बोला।
आदमी: रे मारा छोरा आया होगा यां। ( रौबदार आवाज से)
वो इतना जल्दी बोला कि मेरे समझ नहीं आया तो मैं बोली ..
रितिका: वो नीचे वाले? वो लोग यह नहीं है शायद । ( जल्दी से बोली)
वो फिर से वो ही बोला लेकिन थोड़ा चिढ़ कर।
रितिका : अरे क्या कह रहे हैं आप??( थोड़ा परेशान सा हो कर)
आदमी: रे हिंदी समझ में न आरी के? ( थोड़ा ऊंची आवाज से)
मैं बोल्या , मारा छोरा कहा से?? मयूर।।
जब वो मयूर बोला ,तब मेरे समझ मैं आया छोरा, मेरा दिमाग ख़राब हो गया। मैं पता नहीं क्यों स्टोर रूम को देखी और बोली।
रितिका: वो वो.. नहीं है यहां। दूध दे कर चला गया वो।( थोड़ा हड़बड़ा कर)
आदमी: घनी सयानी न बन। सब जानू हु मैं। इब तू निकलेगी या मैं थारे मर्द को फोन करूं??( दरवाजा पकड़ कर ,अंदर को धकेल कर)
मुझसे कुछ बोला नहीं गया। और वो जोर से मयूर को आवाज दिया। और वो स्टोर रूम से बाहर आया।
और वो गुस्से से अंदर आ के , उसको 2 थप्पड़ मार के बोला।
आदमी: साले! छोरी चोद के…घनी जवानी चढ़ गी है। तू घर चल। ( उसको बाहर को धक्का दे कर)
वो तो अच्छा था कि हमारे ऊपर वाला फ्लैट खाली था । और नीचे वाले कही बाहर गए थे । नहीं तो मेरी इज्जत आज नीलाम थी।
मयूर रोते हुए बाहर को गया। मेरी तो डर से हालात खराब थी। दिल बार बार मुझे गाली देते हुए बोल रहा था।
सही हुआ । सही हुआ और कर ।
और वो मेरे सामने आ कर बोला।
आदमी: क्यों री , मेरे छोरे पे ही नजर पड़गी तेरी, फसाणे खातर?
मैं डर रही थी । लेकिन एक आखिरी कोशिश करते हुए बोली।
रितिका: आप जैसा सोच रहे हैं। वैसा नहीं है। वो बस मेरे बेटे के साथ खेलता है। आप गलत समझ रहे हैं.( डरे हुए चेहरे से)
आदमी:: घनी सयाणी मत बन। कल ही मेरे नै सब बता दिया था के वो तेरे छोरे के संग खेले सै या तेरे संग। ( मेरे ऊपर हंस के )
मैं समझ गई कि मयूर आज ,गुमसुम सा क्यों था। मेरे पास अब छुपाने को कुछ नहीं था।
मुझे बहुत डर लगने लगा ,क्योंकि मेरे पति के आने का भी टाइम होने वाला था। तो मैं सीधे उसके आगे हाथ जोड़ दी।
रितिका: आप गलत समझ रहे हैं भाई साहब ऐसा नहीं है कुछ ।( लगभग रोते हुए)
आदमी:: कोई कोन्या, अब तेरे घरवाले ने ही आण दे, वही बतावेगा के मेरा छोरा इब्ब किती देर तै के कर रया था। बड़ी आग से है तै। तेरा घरवाला कोन्या बुझावे ता किसी मर्द ने पकड़ ले। मेरा छोरा ही मिल्या तै?
मुझे उसकी भाषा भी पूरी समझ नहीं आ रही थी। लेकिन जितना भी समझ रही थी वो मेरे पति के बारे में बोल रहा था।
मैं जोर से रोने लगी और उसके आगे हाथ जोड़ के उसके पैर पड़ने लगी।
तो वो मुझे उठाया और बोला।
आदमी: सच्च सच्च बतावै। मेरा छोरे ने तेरे साथ के करा( धीरे से मुझे उठा कर)
मुझे ये समझ मैं आ गया क्यूंकि वो बहुत धीरे और आराम से बोल रहा था।
मैं उसको रोते हुए झूठ बोली।
रितिका: सच मैं,कुछ नहीं किया। आप यकीन करिए। ( रोते हुए)
आदमी:: तो इतने टाइम वो तेरा दूध काढता था? ( मेरे कान पर बोल के धीरे से)
झूठ मत बोल्ले। न हो तेरा मर्द ने फोन करके बताऊं अब्बै।( मुझे और मेरी क्लीवेज को घूर के)
मेरे पास अब कोई जवाब नहीं था। मैं जोर से रोने लगी। मैं उसके सामने आत्मसमपर्ण कर दी थी।
तो वो बोला।
आदमी:: ठीक सै। ना बताऊँ तेरे पति ने। पर मेरे तै भी वोई करैगी ज्यूँ तू मेरे छोरे के तै करै थी।
मैं उसको हैरानी से देखी और वो मुझे देख कर हंस रहा था।
मैं उसको मना कर दी । और अभी भी ये कह रही थी कि मैं उसके बेटे के साथ कुछ नहीं करी हूं।
तो वो गुस्से में आ कर , फोन निकाल कर बोला।
आदमी:: तु ऐसे कोन्या मानेगी। रुक, तेरे मर्द ने बतावूं सै कि तेरी जोरू कितनी बड़ी चरित्र हीन सै।
मेरे छोरे तै रोज़ मुंह काला करै से।रुक तू। ( गुस्से से, मोबाइल निकाल कर)
वो बहुत गुस्से मे तो मैं उसका मोबाइल पकड़ कर , बेहद डरे हुए चेहरे से उसको विनती करते हुए बोली।
रितिका: प्लीज। ऐसा मत करिए। आप जो कहेंगे मैं वो करुंगी। आप उनको मत बताना , मैं आपके हाथ जोड़ती हु।( रोते हुए)
तो वो कुटिल मुस्कान से मुझे देख कर , मेरे बिल्कुल नजदीक आ कर बोला।
आदमी:: अच्छा, ते मेरै संग के के करैगी? ( मुझे मेरी बाजुओं से पकड़ कर)
मैं नजर नीचे कर दी। तो वो दरवाजे को बंद करने लगा तो मैं उसको बोली।
रितिका: प्लीज, मेरे पति आ जायेंगे। अभी नहीं।( उसको पीछे से देख कर ,डरे हुए आवाज से विनती करते हुए)
तो वो मुझे पलट के देखा और पास आकर , मुझे मेरे कमर से पकड़ कर अपने तरफ खींच के बोला।
आदमी:: कोई कोन्या, बस जरा सा चखण दे।
मैं अपने हाथों को कोहनी से मोड़ ली और अब उसके और मेरे बीच मेरे दोनों हाथ थे। और इस तरह से न चाहते हुए भी मैं उसके सीने पर हाथ रख दी।
और वो मेरे गले में झुका कर ,पीछे से मेरे बड़े से नितंबों को मसल के मेरे कान मे बोला।
आदमी:: तू तो बिल्कुल घणा गरम मॉल से।( मेरे गुदाज़ नितंबों को सूट के ऊपर से मसल कर)
तेरा मरद नामर्द से के?( मुझे देख कर)
कोई ना। अब मैं सूं, तेरी जरूरत पूरी करन वास्ते।।( पीछे से मेरी पैंटी की साइड वाली लास्टिक से हाथ अंदर डाल कर)
मैं उसकी बाहों में, असहज महसूस करते हुए छटपटाने लगी। और उससे छोड़ देने को बोली।
लेकिन वो माना नहीं। क्योंकि उसको मेरे पति के आने का टाइम मालूम था वो रोज 6.30 बजे के बाद ही आते थे।
और फिर वो मेरे मुंह को ऊपर करके, मेरे होंठों को पहले देखा , और मुस्कुरा कर फिर चूसने लगा। मैं बस स्थिर रही। उसके मुंह से गुटके की बदबू भी आ रही थी। लेकिन क्या ही कर सकती थी।
और फिर वो मेरे होठों को चूसते हुए , अपना हाथ मेरे नीचे ले गया और सलवार के ऊपर से मेरी योनि को भींच लिया।
मैं छटपटा गई। और उसका हाथ पकड़ने लगी। लेकिन वो मेरे होंठो को जोर से चूसते हुए , मेरे सलवार के बाहर से ही मेरी काली चड्डी के साइड वाली लास्टिक से अंदर हाथ डाल दिया।
और खड़े खड़े मेरे योनि को मसलने लगा। और फिर एक दम से मेरी योनि के अंदर अपनी बड़ी अंगुली डाल दिया । जिससे मेरी सलवार भी उसके अंगुली के साथ ,अंदर चले गई।
तभी मुझे मेरे बेटे के रोने को आवाज आई।
तो मैने जैसे तैसे अपने होंठों को छुड़ाया। और उसका हाथ पकड़ के सिसक कर बोली।
रितिका: प्लीज मुझे जाने दो.. आह… मेरा.. बेटा….. सी… आई… उठ गया है।।( सिसकारियां लेते हुए ,उसका हाथ पकड़ के , परेशानी वाले चेहरे से)
लेकिन वो तो मानो सुनने के मूड में ही नहीं था और मेरी योनि को मसल के दांत भींच कर बोला।
आदमी:: कल दिन में 12 बजे आवूंगा। तू त्यार रह्यां। कल तेरे चूत का हलवा बनना सै।
और जितना हो सके मेरे योनि मे अपनी बड़ी अंगुली पूरा डाल दिया । मैं चिंहुक कर पंजे के बल खड़े हो गई। और गर्दन को न न करके हिला कर ,उसके हाथ को पकड़ने लगी।
और फिर वो मुझे छोड़ा। मैं सच में वही पर बैठ गई। मेरी सलवार अभी भी मेरे योनि मे थी।
वो मुझे नीचे बैठा देख कर,वो भी मेरे सामने उकडू बैठ गया और अपनी अंगुली को सूंघने लगा। और आंख बंद कर दिया।
मुझे सच में बहुत शर्म आ रही थी। मैं उठने ही वाली थी कि वो मुझे पकड़ कर वही पे लेटाने लगा।
मैं डर गई। क्योंकि हम लोग हमारे मुख्य दरवाजे के बिल्कुल पास ही थे। पति का कोई भरोसा नहीं था कब आ जाए।
वो उतावला हो कर मुझे अभी देने को बोला। और मेरी सलवार के नाडे को खोलने लगा।
मैं डर से आवाज दबा कर उसको मना करने लगी। और बोली।
रितिका: प्लीज अभी नहीं। मैं बर्बाद हो जाऊंगी। आप कल आ जाना । मैं मना नहीं करूंगी। प्लीज़ , देखिए मेरा बेटा रो रहा है।
मैं कह ही रही थी कि मेरा बेटा रोते हुए घुटने के बल बाहर आ गया।
वो मेरे बेटे को देखा और उठ गया और अपने कपड़े ठीक करते हुए बोला।
आदमी:: काल मैं आऊंगा। धोखा मत दिये, नहीं तो सोच ल्ये तू। ( मुझे घूर कर)
वो पता नहीं कैसे कंट्रोल किया होगा। मैं बस हां बोली और अपने बेटे को उठा ली।
और वो जाते हुए बोला।
आदमी: दरवज्जा बंद कर ले। यो माहौल ठीक कोन्या है। तेरे जईसी लुगाई के तै कई छोरे घूमते स।
मुझे अब उसकी भाषा समझ आ रही थी मैं दरवाजा बंद कर दी। और बेटे को दूध पिलाते हुए सोचने लगी।
उफ्फ कितनी बड़ी गलती की मैने , मयूर को बुला कर। कैसे भी यहां से घर चले जाती। एक बार भगवान यह से ले जा दे बस।
फिर कभी ये सब नहीं करुंगीं । अगर इसने ,इसके पापा को बता दिया तो?
नहीं नहीं। जब तक यहां हूं। मुझे कैसे भी इसको , खुश करके रखना होगा।।
मेरा सिर बहुत भारी था। और बेटे को दूध पिलाते पिलाते मेरी आंख लग गई ।
जारी रहेगा।।