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Erotica अतृप्त वासना।।

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भाग - २०

मैं पता नहीं कब सोई मुझे याद नहीं। सुबह उठी तो मेरा सिर बहुत भारी था।

पति ने मुझे सुबह उठाया , वो ही रोज की जली कटी बाते सुना कर। शायद कल रात जो मैने उनकी नामर्दी पर सवाल उठाए थे , वो उससे खफा थे। लेकिन खुल कर कुछ नहीं बोले ।

मैं भी जायदा मुंह नहीं लगाई। और नहा धो कर नाश्ता बनाने लगी। और अपने ही ख्याल में कोई थी , बार बार मन और दिल के बीच अंतर्द्वंद्व के बीच फंस के रह गई थी।

मन कहता तुझे अपने जिस्म की प्यास कैसे भी बुझानी चाहिए। लेकिन दिल कहता ये गलत है।

मन कहता तेरा पति नामर्द है। दिल कहता ,उसको टाइम दे।

खैर फिर मेरे पति चले गए और मैं घर के काम में उलझ कर रहे गई। आज मुझे मेरे बड़े ससुर से बात करने का बहुत मन था । कसम से नंबर होता तो कर भी लेती फोन।

अब उनका पर्सनल नंबर मांग भी किस्से सकती थी? मैं अपने मन को संयम करने के लिए टीवी देखने लगी। और न जाने कब मेरी आंख लग गई ।

और सपने में भी कुछ अजीब सा देखा जो मुझे याद अभी रहा। 1 बजे उठी और खाना बनाई । मुझे आज मयूर के आने का इंतजार था।

दिल बार बार मुझे रोक रहा था । लेकिन मन कहता तुझे आगे बढ़ना चाहिए। 2 दिन पहले तक मेरे मन में मयूर के लिए कोई वासना का तिनका तक नहीं था ।

लेकिन नियति ने ऐसा खेल खेला कि मुझे अब उस पर ही उम्मीद की किरण नजर आने लगी । मैं जानती थी कि वो मुझे और मेरे निजी अंगों को देखना चाहता है। जिसको सोच कर ही मेरे जिस्म में सिरहन दौड़ जाती है ।

खैर मयूर रोज़ के टाइम दूध देने आया।मैने जल्दी से दरवाजा खोला। मैं आज मैक्सी पहने हुई थी। लेकिन जैसे कि दरवाजा खोला मेरा दिल बैठ गया।

देख मयूर के साथ एक लड़का और भी था । और उसके हाथ में क्रिकेट का बैट था। वो मुझे दूध दिया । मैं उसको घूर कर देख रही थी गुस्से से।

वो नजर नीचे कर दिया। वो सोचा कि मैं शायद उससे कल के लिए गुस्सा हु। तो वो चुप चाप चला गया।

मुझे उस पर इतना गुस्सा आया कि क्या बताऊं। अब शाम तक मैने अपने को कैसे कंट्रोल किया ये मैं ही जान सकती हूं।

शाम को पति आए , वो मुंह बनाए हुए थे। मैं भी बोली नहीं उनसे और खाना खा कर हम लोग सो गए। लेकिन मेरे आंखो से नींद गायब थी।

पहले मन आया कि सूरज से बात कर लूं। लेकिन मुझे ध्यान आया कि उसका नंबर तो मैं यहां आने से पहले ही डिलीट कर चुकी हूं।

फिर मुझे मयूर का ध्यान आने लगा। सोचने लगी कि आखिर ये लड़का चाहता क्या है? मैं आज उसके लिए तैयार थी तो आया नहीं। मेरा मूड खराब हो गया। और बगल में सोते पति के खर्राटों ने मेरा और भी दिमाग़ खराब कर दिया।

अगले दिन कुछ खास नहीं हुआ। मयूर आज भी कल के जैसे ही आया। अब तो मैने भी सोच लिया था कि भाड़ में जाएं ये। मैं भी आज उसके मुंह पर दरवाजा पटक के अंदर आ गई।

करीब 4 दिन ऐसे ही गुजर गए, अब मेरे दिमाग से मयूर का फितूर निकलने लगा कि तभी एक शाम मेरे पति एक पार्टी से आए और रात को काफी पी कर आए थे।

और आते ही मेरे साथ जबर्दस्ती करने की कोशिश करने लगे।। मैं जब मना की तो मुझे भद्दी भद्दी गाली देते हुए ,मेरे कपड़े खींचने लगे।

और जब मैं थोड़ा सख्ती से पेश आई तो मुझ पर हाथ छोड़ दिए और गुस्से से मुझे गाली देते हुए बोले।

पति:: बहन की लौड़ी, साली रॉड, उस दिन साली कह रही थी ,जोर से करो और जोर से करो। कुत्तिया को बड़ा लंद चाहिए।

मैं बहुत तेज रोने लगी। और रोते हुए बाहर हाल में बैठ गई। पति अंदर से मुझे गाली देते रहे।

रात भर में सोच मे डूबे रही तभी मेरा मन मुझे बोला।

तू इस आदमी के लिए ,अपने को रोक रही थी?? इस नामर्द के लिए?

अब मेरे दिल के पास कोई जवाब नहीं था।

अगले दिन मैं कुछ बात नहीं की। पति कुछ बोलते तो भी नहीं बोली। वो फिर आफिस चले गए।

शाम को मयूर दूध देने आया। और आज मैं वो ही मैक्सी पहने और ऊपर के 2 बटन खोले हुए गई।मेरी गहरी चमकदार क्लीवेज साफ दिख रही थी। और जब मैंने दरवाजा खोला वो एक हाथ में बाल और एक में दूध का पैकेट लिए खड़ा था।

मैं उसकी आंखों में देखी और वो मुझे और मेरी क्लीवेज को देख। मैं उसको गंभीर आवाज से बोली।

रितु: अंदर आओ । बात करनी है मुझे ( गंभीर हो कर ,गर्दन से इशारा करके ,धीरे से बोली)

वो पहले पीछे पलट कर देखा। उसके साथ आज कोई नहीं था। और वो अंदर आ गया। उसकी धड़कन भी कही तेज रही होगी।

क्योंकि रोज मेरे तरफ से उसको अनदेखा करना उसको भी चुभ रहा होगा ।।

और फिर मैं दूध गरम करने रसोई पर चले गई और वो अंदर मेरे बेटे के पास ।

आज मैंने उसके आने से पहले ही अपने बेटे के सभी खिलौने फैला दिए थे। मयूर मेरे बेटे के साथ बैठा था और मेरा बेटा खेलने लगा और मैं वही बेड में लेट गई, और बस उसको देखने लगी।

वो बार बार नजर बचा कर मुझे देखने लगता। क्योंकि मैंने अपने मैक्सी के उपर के 2 बटन खोले थे तो मेरे उरोज ब्रा से बाहर आने को बेताब थे।

मेरी ब्रा का आधा कप , साफ दिख रहा था, और मेरी गोरी लम्बी क्लीवेज जिसको मयूर बार बार नजर बचा कर देखने लगा था।

हमारी कोई बात नहीं हुई थी। बस वो मुझे मुझे देखता और हमारी नजर मिलती तो वो शर्म और डर से नजर हटा देता। जबकि मैं बस उसको घूर रही थी।

तभी मेरा बेटा मेरे ऊपर आ गया और दूध मांगने लगा। जबकि मयूर वही पर हेक्साब्लॉक लगा रहा था।

मैं जानती थीं कि वो मेरे बेटे के साथ खेलने नहीं बल्कि मुझे देखने आता है। एक 9 वी क्लास का लड़का क्यों मेरे बेटे के साथ खेलता भला??

मेरा बेटा दूध मांगा तो मैंने भी ,अपने दाएं उरोज को ब्रा से निकला और मेरा बेटा दूध पीने लगा। मैने देखा कि मयूर ,मुझे दूध पिलाते हुए , गौर से देख रहा है। मेरे बेटे के लेटे होने से उसको मेरा स्तन पूरा तो नहीं दिखा होगा लेकिन काफी दिख गया था

और मैने भी उसको नजर अंदाज कर दिया। मेरे लेटे रहने से मेरी मैक्सी भी ,मेरी पिंडलियों से ऊपर चढ़ चुकी थी।

कुल मिला कर, मयूर पर मैं आज क़यामत ढहा रही थी। उसने सोचा भी नहीं होगा कि मैं उसके सामने इतना खुल जाऊंगी। मुझे उसका चेहरा देख कर हंसी आ रही थी।

वो जवानी की पहली दहलीज पर था और मैं इन रास्तों से गुजर चुकी थी और जानती थी कि उसके मन में क्या चल रहा है।
तभी मैं आंख बंद करके लेट गईं। और हल्की खुली आंख से मयूर को देखने लगी ।

वो बार बार मुझे देखता और मेरे गोरे गोरे पैरों को। तभी दूध पीते पीते मेरा बेटा सो गया और सीधा करवट ले कर सो गया।

अब जो मयूर को दिखा वो उसके जीवन का सबसे हसीन पल था।

मैं नींद का बहाना किए उसके ओर को करवट लिए सोई थी और मेरा मोटा भूरा निप्पल जो मेरे बेटे के थूक से गिला था ,मयूर के सामने लटक रहा था।

मैं हल्की सी एक आंख खोल के देखी। मयूर सच में कांप रहा था। वो तेजी से सांस ले रहा था। और मुझसे बस 4 फीट की दूरी पर था।

मैने देखा वो पहले पीछे को देखा और फिर थोड़ा सा आगे को बढ़ा । लेकिन फिर पीछे हट गया। और बस मुझे ऊपर से नीचे देखने लगा।

मेरी भी सांस ये देख कर भारी होने लगी। सच मैं बहुत अजीब सी फीलिंग थी वो।

मैं गहरी सांस ले रही थी कि तभी वो दुबारा धीरे से घुटने के बल उठा और मेरे पास आ गया। सच में मेरी जान अटक गई कि वो क्या करेगा ये सोच कर।

तभी मैने देखा वो मुझे देखते हुए , मेरे निप्पल को गौर से देखने लगा। मैने डर से अपनी आंख जो थोड़ी खुली थी, उसको पूरा बंद कर दिया ।

मयूर मुझे नीचे से ऊपर तक देखा और एक बार पीछे दरवाजे को और एक हाथ बढ़ा कर मेरे निप्पल को छू लिया।

मेरी सांस सच में रुक गई। वो मुझे देखा और फिर से मेरे निपल को पकड़ कर जोर से दबा दिया।

और न चाहते हुए भी मैं। अअआह… कहते हुए उठी।

मुझे उठा देख कर मानो वो होश मे आया और वो घबरा कर अपना हाथ जैसे ही पीछे खिंचा मैंने उसकी कलाई को पकड़ लिया।

और उठ कर बैठ गई। उसके पास कोई शब्द नहीं थे। तो मैं उसको देखते हुए बोली थोड़ा नाटक करके

रितु: क्या कर रहे थे हां??( दिखावटी गुस्से से)

वो नजर नीचे किए था । उसको लगा कि अब उसके मुंह पर एक जोरदार तमाचा पड़ेगा। वो कंधे से अपना मुंह छुपा रहा था।

मैने फिर सख़्ती से पूछा तो बस मुझे देख कर रोने वाले चेहरे से बस इतना ही बोल पाया।

मयूर: आंटी माफ कर दो। पापा को मत बोलना , वो बहुत मरेंगे आंटी। गलती हो गई। ( रोते हुए)

अब गेंद मेरे पाले में थी और मैं उसको बोली।

रितु: चुप बिल्कुल। बिल्कुल चुप । आवाज नहीं आनी चाहिए मुझे ( धीरे से डांट कर बोली)

उसकी आंखो में आंसू थे तो मैं बोली।

रितु: कई दिन से देख रहीं थी मैं। क्या देखते रहते हो मुझे हां??

अभी कुछ दिन पहले भी जब में बाथरूम जा रही थी मेरे पीछे देख रहे थे। क्या शहद लगा है वहां??( उससे मजे लेते हुए , दिखावटी गुस्से में)

वो फिर से ,दुखी आवाज से अपना हाथ छुड़ाते हुए बोला।

मयूर: आंटी नहीं। वो गलती हो गई। अब नहीं आऊंगा । आज माफ कर दो आंटी। ( बहुत देर हुए , रोने जैसे शक्ल से)

रितु: और ये क्या आंटी आंटी लगा रखी है? आंटी दिखती हूं मैं? ( आंख दिखा कर)

वो कुछ नहीं बोला। तो मैने सोचा कि जायदा डरना ठीक नहीं है। तो उससे बोली।

रितु: अच्छा क्या क्या देखते थे तुम? सच बताना सुन लो( अपनी हंसी दबा कर , उसको चेतावनी दे कर )

वो कुछ नहीं बोला बस नज़र नीचे कर दी।

रितु: बोलो कहा ना? ( आंख दिखा कर)

मयूर: आप अच्छी लगती हो।( मुझे देख कर फिर नजर नीचे करके)

रितु: ह्म्म तभी ,आते थे न रोज?? ( उसको सुनाते हुए)

क्यों आज खेलने नहीं जाना । जब रोज बाहर दूध रख के भाग जाते थे तब अच्छी नहीं लगती थी??
( उसको सुना कर)

वो कुछ बोला तो नहीं लेकिन मुझे हैरानी से देखने लगा।

रितु: ह्म्म तो क्या क्या अच्छा लगता है मुझ में? ( घमंड दिखाते हुए)

मेरी ये बात सुन कर वो मुझे हैरानी से देखा और नजर नीचे कर दिया।

तो मैं खुद ही , बड़े ही कामुक अंदाज से एक हाथ मैक्सी के अंदर डाली और अपने उरोज को बाहर कर दी।

मुझे उससे कोई शर्म नहीं थी। उसके सामने तो मानो मैं उसकी गुरु थी और वो मेरा नौसिखिया चेला।

मेरे इस अवतार को देख कर वो हैरान था। मैं उसको कुटिल मुस्कान से देखी और उसके हाथ को अपने उरोज पर रख के धीरे से बोली।

रितु: ये अच्छे लगते है? ह्म्म??( कामुक आवाज से)

मैने देखा उसकी आंखो में एक अलग सी चमक थी वो मेरे उरोज को देखते रहा और हाथ से महसूस करने लगा। और बस हां में ऐसे सिर हिलाया जैसे मैंने उसके ऊपर कोई जादू टोना कर दिया हो।

और फिर धीरे से अपने बेटे को साइड सुला कर उसका हाथ खींच कर उसको अपने साथ लेटा दी। वो मेरे उरोज को पकड़े रहा। जैसे कोई खिलौना हो।

अभी हम दोनों एक दूसरे के ओर मुंह किए हुए थे। और मैं उसके बाल सहलाते हुए , उसको मुस्कुराते हुए देख रही थी। वही वो बस मूकदर्शक बन के मेरे , उन्नत वक्षों को देख रहा था।

तभी मैंने उसको धीरे से बोला।

रितिका: एक बार मुंह में डाल इसको…..( बहुत धीरे से निप्पल को पकड़ कर बोली)

वो बिना मुझे देखे , झट से मेरे दाएं चूचक को मुंह में डाल दिया और जोर से चूसा।

उफ्फ…उस निगोड़े ने इतने जोर से कि मेरे स्तन से दूध की धारा फूट पड़ी। और उसका मुंह मेरे दूध से भर गया।

मैं धीरे धीरे, मीठी मीठी सिसकारियां मारने लगी। और उसके बाल खींचते हुए अपने होंठ काटने लगी। और वो बड़े शिद्दत से मेरे निप्पल को चूसने लगा।

अभी पोजीशन ये थी कि हम दोनों एक दूसरे के ओर मुंह किए लेटे थे। वो एक नेकर और टीशर्ट पहने था । जबकि मैं एक मैक्सी पहने हुई थी और अंदर से ब्रा और पैंटी।

तभी मैं हीट में आने लगी और उसके पैर से पैर रगड़ने लगी। और उसको अपने ओर को खींचने लगी । तो वो भी अपना बाएं घुटने को मेरे दोनों पैरों के बीच डाल दिया।

और जोर से मेरे निप्पल को काट लिया। मैं जोर से चीखते हुए उसका सिर दूर की ।

वो डर के मुझे देखने लगा। गुस्सा तो मुझे बहुत आया था लेकिन मैं बस दर्द से उसको देखी ।

और धीरे से बोली अपने निप्पल को देख कर ।

रितिका: इतना जोर से काटता है कोई?? दर्द कर दिया।।( निप्पल को सहला कर)

वो बस चुप रहा । उसको अपनी गलती का एहसास था। तभी मेरा फोन बजा। और मैं उठ के फोन देखी तो मेरे प्राण सुख गए।

मैं जल्दी से अपने स्तन को अंदर डाली और मयूर को चुप रहने का इशारा किया और फोन उठाई ।

फोन मेरे पति का था । और वो सब्जी के लिए पूछ रहे थे। मैंने उनसे बात की और फोन रख दिया।

मैने टाइम देखा , और मयूर से बोली।

रितिका: मयूर तुम जाओ अभी । इसके पापा जल्दी आने वाले है। कल बात करते हैं।( अपने बाल बांधते हुए)

मयूर का मुंह देख कर लगता था कि उसका जाने का मन नहीं है। वो कुछ नहीं बोला और बेड से उठा तो मैं उसको थोड़ा गंभीर आवाज से बोली।

रितिका: सुनो।। ( पीछे से उसको देख कर)

मयूर पलट कर मुझे देखा।

रितिका: जो आज हुआ , ये बात किसी को भी मत बोलना । खाली दिक्कत हो जाएगी। तुम समझ रहे हो न? ( उसके पास आ के उसका हाथ पकड़ के)

किसी को नहीं मतलब किसी को नहीं।( उसके कंधे पर हाथ रख कर समझाते हुए)

वो बस हां मैं सिर हिलाया। तो मैं उसको प्यार से बोली।

रितिका: तुमको जो चाहिए वो मैं दूंगी। लेकिन ये बात हमारे तक ही रहनी चाहिए ठीक है?? ( उसकी आंखो में देख कर)

वो बस हां मैं सिर हिलाया ।

रितिका: और हां जब मेरे पति घर पे होंगे तो दूध दे कर चले जाना। उनको शक नहीं होना चाहिए। नहीं तो हम दोनों मुश्किल में आ जाएंगे।

वो बस हां मे सर हिलाया और फिर चला गाया।।

मैं बहुत खुश थी कि , चलो मुझे मेरी इच्छा पुरी तो होगी कम से कम।।

फिर शाम को पति आ गए। लेकिन मेरा ध्यान आज जो शाम में हुआ उस पर ही था।

अगले दिन जब पति चले गए , मुझे मयूर का इंतजार होने लगा। लेकिन वो अपने ही टाइम पर आया। आज मैंने सलवार सूट पहना था ।

वो आया और आज भी हमने वो ही किया , वो मेरे स्तनों को चूसा। और मैं बस उससे लिपट कर रही। फिर वो उत्तेजित हो कर मेरे सलवार को खोलने की कोशिश करने लगा।

लेकिन मैं उसका हाथ पकड़ दो तो वो मुझे बोला।

मयूर,: एक बार दिखा दो प्लीज।।( बिल्कुल गंभीर आवाज से)

लेकिन मैं उसको मना कर दी। और उसके नेकर के अंदर हाथ डाल दी। उसका लिंग बहुत बड़ा नहीं था। और जैसे ही मैने उसके सुपाड़े को अपने अंगूठे से मसला। तो वो कांप उठा।

उसका जिस्म अकड़ गया। और वो मुझसे लिपट कर मेरे ऊपर चढ़ गया ,और मेरा हाथ उसके और अपने जिस्म के बीच दब गया। वो जल्दी जल्दी से कमर आगे पीछे करने लगा मेरे हथेली के ऊपर।

वो अभी आधा मेरे ऊपर लेटा था ।तो मैने भी उसके चेहरे को पकड़ा और अपने होठों के ऊपर उसके होंठों को सेट किया । और खुद ही उसके होंठों पर एक मस्त सा स्मूच 😘 लिया।
बहुत कोमल होंठ थे उसके।

मेरे किस करने से वो जोश में आ गया और वो अपनी कमर को दबा दिया मेरे हथेली पर। और मुझे अपनी हथेली पर कुछ हल्का पानी सा महसूस हुआ।

वो बुरी तरह से छटपटा रहा था। ये उसका पहला स्खलन था। अभी उसका वीर्य पूरा नहीं बना था । लेकिन शायद कुछ महीने में वो भी किसी मादा को गर्भवती कर सकता था।

उसके बाद वो चला गया। स्खलन के बाद वो बहुत शर्माया सा था । वो जल्दी से चला गया। और मुझे अधूरा छोड़ गया। लेकिन मैं उसके साथ बहुत खुश थी।

फिर एक दिन वो मुझसे ,मुझे पूरा नग्न देखने की जिद करने लगा। लेकिन मैं नहीं मानी। हां वो बाहर से ही मेरी योनि को कपड़े के ऊपर से छू चुका था । लेकिन अब दिन पर दिन उसकी हसरत बढ़ रही थी।

फिर वो मेरी योनि को देखने की जिद करने लगा तो मैने उसके सामने शर्त रखी कि वो बस देखेगा। वो तुरंत हां कर दिया ।

लेकिन मुझे अब शर्म आ रही थी। स्तन तक बात अलग थी। अब तो वो मेरी यौन अंगों को देखने की बात कर रहा था।

मैने धीरे से अपनी लैगिंग नीचे की और उसे अपनी पिंक कलर की चड्डी दिख दी । लेकिन वो नहीं माना। और मुझे मेरी चड्डी नीचे करने को बोला।

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उन गुदाज़ जांघों में मेरी चड्डी अलग चमक रही थी। लेकिन मैं नहीं मानी और अपनी लैगिंग ऊपर कर दी । वो थोड़ा मायूस सा हो गया तो मैंने उसको अपने पास खींच लिया।

और हम दोनों किस करने लगे। मैं उसको मानना जानती थी और उसके नेकर के अंदर हाथ डाल के उसके लिंग को मसलने लगी।

और वो भी मेरी योनि को लेगिंग के बाहर से ही मसलने लगा। लेकिन फिर वो अपना हाथ मेरी लैगिंग के अंदर डाल दिया।

मैं उसको देखी तो वो शरारत से मुस्कुरा दिया। मैने भी उसको मना नहीं किया और फिर वो सीधा मेरी पैंटी के अंदर हाथ डाल दिया। आज मैं भी बहुत गरम थी।

उसको कुछ माना नहीं कर पाईं । जब उसका हाथ मेरी योनि के बालों पर लगा । वो मानो पागल सा हो गया। वो पहले बार किसी वयस्क महिला ,जो कि एक बच्चे की मां और उससे उमर से लगभग दुगनी है।

उसके योनि के छोटे छोटे बालो पर हाथ सहला कर पागल सा हो गया। और जैसे ही वो अपनी अंगुली मेरी योनि की लकीर पर फिराया। और नीचे तक ले गया।

वो हैरान हो कर मुझे देखने लगा। मेरी योनि पूरी तरह से गीली थी। उस चिपचिपे पानी को महसूस करके वो पागल था।

लेकिन उस अनाड़ी को समझ नहीं आया और वो मेरे भग्नासा पर अपनी अंगुली का दवाब डालने लगा।

और मुझे आश्चर्य से देखने लगा। जैसे पूछ रहा हो। कहा डालना है। लेकिन उस पागल ने जाने अनजाने ये करके मेरी हालत खराब कर दी । और मैं कामुक सिसकारियां मारते हुए उससे लिपट कर बोली।


रितिका: सी…….सी…उम्मं सी….आराम से…..धीरे धीरे से…..अन्ह… मयूर…….

और मैं उसके छोटे लिंग को हिलाने लगी। जिसे वो भी जोर से मेरे भग्नासा को दबा दिया।

और मैं जोर से सिसकारियां मारते हुए कमर उठा कर अपना पानी छोड़ दी थोड़ा सा।। और समझ गई कि वो क्या ढूंढ रहा है। और जल्दी से अपने हाथ को उसके लिंग से निकाल कर उसके हाथ को पकड़ा जो कि मेरी लैगिंग के अंदर था।

और उसके 2 अंगुलियों को पकड़ के , अपने योनि के मुहाने पर लगा के धीरे से कामुक आवाज से बोली।।

रितिका: यहां डाल…….सी सी…………

उसको तो मानो खजाना ही मिल गया। और वो उसको लूटने के लिए उतावला हो कर मेरी योनि में 2 अंगुलियों को ठूस दिया।

मैं दर्द और मस्ती से उसको जकड़ के अपने ऊपर खींच ली। और उसके कान में बेहद कामुक आवाज से बोली।

रितिका: सी सी… आह…सी…धीरे से…..

वो धीरे धीरे मेरे अपनी अंगुलियों को अंदर बाहर करने लगा।

.रितिका: ऐसे.. ही…पूरा. डाल… सी सी। उम्म सी….कैसी है.. ह्म्म.. सी सी.. हां ऐसे ही….धीरे धीरे…


मयूर: बहुत… अच्छी…..( पागल सा हो कर)

मेरा एक हाथ उसके गले में था और दूसरा हाथ उसके नेकर के अंदर उसके नितंबों को मसल के नीचे को दबा रहा था।
और मैं उसका जोश बढ़ा रही थी । उसकी हाथ की स्पीड अब मेरे कहने के बाद बढ़ने लगी थी ।

वो मेरी योनि को अपनी अंगुली से जोर से मसलते हुए अपनी कमर आगे पीछे करने लगा।

और कुछ 2 मिनिट ही हुए होंगे और वो कांप गया और अपनी कमर दबा कर ,मेरी योनि के अंदर अपनी 2 अंगुलियों को मोड़ के मेरे जी स्पॉट को जोर से दबा दिया।

और मैं जोर से कमर को पूरा उठा कर करहाते हुए उसको जकड़ कर पानी छोड़ने लगी। मेरे पैर पूरे कांप रहे थे।

और फिर कमरे में मेरी और उसकी सांस के थमने की आवाज थी। वो मेरे ऊपर काफी देर तक लेते रहा।

और फिर जब मैं नार्मल हुई तो उसको धीरे से बोली।


रितिका: मयूर । मयूर अब जाओ। मेरे पति आने वाले होंगे ।

और वो उठा। उसके चेहरे पर आज भी शर्म और डर के भाव थे।

तो मैं उसको बोली।

रितिका: हाथ धो लो जाओ । ( अपनी ब्रा ठीक करते हुए)

वो चुप चाप बाथरूम चला गया। और फिर आ के सीधा अपना घर चला गया।

मुझे बहुत दिनों बाद आज संतुष्टि मिली थी। और चाय बना कर में बालकनी पर चले गई। और ढलते हुए सूरज को देखने लगी।

ऐसे ही कुछ दिन चला। वो आता और रोज हम लोग प्यार करते।

लेकिन कभी वो भी मेरे अंदर समाने को नहीं बोला और मैं भी कभी उसको इससे जायदा नहीं दी।

हां एक बार बहुत जिद्द की तो मैने अपनी पैंटी नीचे करके उसको अपनी योनि दिखाई थी। मेरी योनि को देख कर वो पागल हो जाता था।

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और उस दिन उसने मेरी योनि को चूसा भीं था। अब वो अंगुलियों, और अपने मुंह से चाट कर ही मुझे संतुष्ट कर देता था।

कुछ भी कहो, उसके साथ मैं
इन सब से ही संतुष्ट थी। वो बहुत प्यार करता था मुझे लेकिन जाते टाइम हमेशा के तरह शर्म में डूबा रहता था।

लेकिन कहते है ना,किसी चीज की अति कभी अच्छी नहीं होती। शायद ये ही में भूल चुकी थी।

जायदा दोहन से तो धरती भी जवाब दे देती है तो फिर तो ये मेरी नियति ही थी।

और फिर वो हुआ जो नहीं होना था।

जारी रहेगा।।
 
Last edited:

Alok

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बेहतरीन अपडेट भाई
 

Desi lugai

Mujhe mote lund acche lagte he🍌🍌🍌🍌🍌🍌🍌
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भाग ४

मेरा शादी में कोई मन नहीं था।बस दिखाने को शामिल हुई थी। शादी में कई मर्द मुझे ललचाई नज़र से देख रहे थे।

पहले जो में खुद को समेट के रखती थी।अब में भी कोई परवाह नहीं करती थी और करती भी क्यों नहीं?
जब खुद के पति ने मुझे वैश्या समझ लिया था तो अब बचा ही क्या था कि जो मैं अपनी इज्जत बचाती।

बारातियों की भीड़ में, मैं भी ऐसे खड़े रही ,जैसे कोई चालू औरत ,अवसर का फायदा उठाने जाती है। मैने दारू पीए हुए एक दो लड़कों को ,मेरे कान के पास कुछ बोलते भी सुना।

एक लड़का तो इतना ,बेशर्म निकला कि मुझे भीड़ में बोला ।

लड़का: यार अनुज लगता है गांव में दूध की कोई कमी नहीं होगी। बहुत बड़े बड़े थन वाली भाभियां हैं।।

तो दूसरा लड़का ,जो नशे में था मेरे कान के पास बोला धीरे से।

लड़का: अरे भाभी जी थोड़ा ,दूध हमें भी पिला दो।

मैं सुन के अनसुना कर दी। बस हंसी दबा के खड़े रही, और दरवाज़े में होने वाली रस्म देखने का नाटक करने लगी।

मुझे हल्का सा मुस्कुराता देख उसकी हिम्मत बढ़ गई उसकी और तभी ये कह के, वो मेरे लहंगे के ऊपर से दाएं कुल्हे पे ,भीड़ का मौका देख के हाथ फेर दिया।

और मेरे कान में बोला।।

लड़का: वाह भाभी जी ,चड्डी की लास्टिक तो बड़ी मोटी है। कहा से ली?( अपने दोस्त के कंधे पे पीछे से सिर रखे हुए मुझे धीरे से बोल के , चड्डी की कुल्हे वाली लास्टिक को खींच कर।)

उस लड़के की बेबाकी से, मैं हैरान थी। लेकिन अब डर गई।।लेकिन एक अलग सा रोमांच भर आया।लेकिन वो मुझे कोई चालू माल न समझे ,इसलिए मैं वहां से हट गई। मैं एक बार भी उसको नहीं देखी।।

फिर खाना वगैरा खाया।मेरे माता पिता भी शादी में आए थे। पति तो आज बिजी थे। और सच कहूं तो मुझे कोई परवाह भी नहीं थी। बेटा मेरा मेरी मां के पास था।

फिर सबने खाना खाया तो मैं भी खा ली। फिर शादी की रस्म शुरू हुई तो मैने देखा , सूरज वहां खड़ा , लता को देख रहा था।
वो थोड़ा दुखी लग रहा था।मुझे थोडा तरस आ गया उस पे।

तभी वो मुझे देखा। और मुझे घूरने लगा। शायद उस दिन के वजह से। मैं वहां से चले गई।

तभी मैं शादी की रस्म देख रही थी अपने घर की औरतों के साथ तो देखा सूरज मेरे पास आ के खड़ा है।

तभी मेरी छोटी जेठानी उसको बोली।

राधा: ए सूरज,थोड़ा पानी तो पिला दे रे ।( थोड़ा मजाक वाले अंदाज में)

तो सूरज मुस्कुरा के चले गया।और थोड़ी देर बाद 2 ग्लास में पानी लाया और एक ग्लास मुझे दिया।

मैं उसको देखी, और नज़र नीचे करके पानी पीने लगी। मैं लहंगा साड़ी पहने हुई थी। और बहुत खूबसूरत लग रही थी।

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पानी पी के में वही पर खड़े हो के अपने जेठानी से बात कर रही थी। सूरज वही पे खड़ा था।मेरा ध्यान बात में कम और सूरज पे ज़्यादा था।

वो बार बार मुझे देखता। दिखने में वो बहुत सुंदर नहीं था।पतला सा मुंह, हल्की दाढ़ी, सांवला सा।

पता नहीं लता को क्या दिखा इस पे । लेकिन उसके ऐसे देखने से मुझे सच में बहुत अजीब लगा।।

एक तो वो लड़के की अश्लील बतौर हरक़त, मेरे दिमाग में घूम रही थी। ऊपर से दो रात से अधूरा मिलन , मुझे सच में अजीब सा होने लगा।

क्योंकि शादी का टेंट हमारे घर के पीछे वाले खेत पर लगा हुआ था। जो घर से बस 200 मीटर दूर पे था।।तभी मुझे हल्का सा पेशाब का प्रेशर लगा। और मैं जेठानी को बोला और घर के ओर बढ़ी।

सब लोग शादी में थे। पति देव का तो पता ही नहीं था। और अधिकतर मर्द दारु पी के सेट हो चुके थे। एक तो रात का 2 बजने वाला था तो बस कुछ गिने चुने लोग ही उठे थे, जो कि शादी में थे।

हमारे घर पे सब बुजुर्ग लोगों ने डेरा जमा लिया था। खेत और घर के बीच के रस्ते में बहुत जायदा लाइट नहीं लगाई थी।लेकिन ऐसा भी नहीं था कि अंधेरा हो।

वैसे लाइट तो गांव के हिसाब से ठीक ठाक ही लगाई गई थी लेकिन शायद गांव के शरारती बच्चों ने बल्ब चोरी कर लिए थे ,इसलिए कही पे लाइट तो कही पे अंधेरा था।

मैं अपनी जेठानी को बोल के , पेशाब करने चले गई। तभी मैने महसूस किया कोई मेरे पीछे पीछे आ रहा है।मैने पीछे मूड के देखा तो ,पाया ये तो सूरज था।

मैं उसको देखी ही थी कि वो मुझे बोला।

सूरज: अरे शहर वाली भाभी कहा जा रहे हो अंधेरे में ??( थोड़ा हंस के, मजाक में)

एक्चुली गांव में हर किसी औरत का नाम रख दिया जाता है।क्योंकि मैं शहर से थी तो मुझे लोग चिढ़ाने को शहर वाली मटकनी कहते थे। क्योंकि मैं बहुत सज धज के रहती थी।

सूरज की बात सुन के मुझे कोई गुस्सा नहीं आय बस में ही हंस के बोल दी उसका इंतेज़ार करते हुए, क्योंकि आगे थोड़ा अंधेरा सा था ,सही कहूं तो डर लग रहा था।

रितु: अरे कहीं नहीं, बस वॉशरूम जा रही हूं!!( हंस कर ,खड़े हो के उसका इंतेज़ार करते हुए,)

वो जल्दी से कदम बढ़ा के मेरे पास आ गया।

सूरज: क्या भाभी आप भी ,इतना बड़ा वॉशरूम है और आप वहा जा रही हो लंका में ??( घर को इशारा करते हुए)

रितु: हां यहां करु ना सबके सामने ? ( आंख दिखा के मजाक में)

सूरज:: अरे क्या हुआ फिर, सब यही तो जाते है। ओह आप तो हुई शहर वाली, खुले में कभी गए नही होगे।??( टोंट मार के)

रितु: हां मैं तो नहीं गई।। जाती होंगी तुम्हारे गांव की भाभियां।।( हंस के, बड़े अदा से)

सूरज: शहर के हो तब भी किसी की मजबूरी नहीं समझते( शिक़ायत भरी आवाज से)

रितु : क्या ? किसकी मजबूरी?( हैरानी से)

सूरज: उस दिन आना जरूरी था? थोड़ी देर बाद ही आ जाते!!( मुझे देख कर मुंह बना कर)

मैं समझ गई वो क्या बात कर रहा है।।

रितु: हममम,,, वो तो मैं आ गई थी । नहीं तो पता चलता तुमको, जब हड्डी टूटती ना। कोई और देख लेता तो ( उसकी आंखों में देख के)

रात के करीब 2:05 बज रहे थे। और मैं अपने घर के पास खड़ी हुई , अपने एक पड़ोस के लड़के से बात कर रही थी।

सच कहूं,ये मुझे शादी से पहले के दिन याद दिला दिया।जब कोचिंग से आने टाइम ,सुनसान गली में, मेरे बॉयफ्रेंड ने कई बार मेरे स्तन निचोड़ थे ,और मैं सलवार के बहार से मेरी योनि से खेला था।

मैं ये सब याद ही कर रही थी कि, कोई आते दिखा तो सूरज मुझे जल्दी से एक आम के पुराने पेड़ के पास खींच कर ले गया।

और मैं कुछ बोल पाती कि वो मेरे मुंह पे हाथ रख दिया। और उन आदमियों को जाने देने लगा।

मुझे आवाज सुनाई दी उन आदमियों की, जो कि एक तो मेरे जेठ की थी। जों हमारे घर के तरफ से आ रहे थे। हम दोनों पेड़ के पीछे खड़े थे। मैं डरी हुईं थी।

जेठ: अरे पप्पू, साला कोई बल्ब निकाल ले गया यार।। अब लाइट वाला भी पता नहीं कहा मर रहा होगा।
( टेंट को जाते हुए)

पप्पू:: अरे रहने दो भाई जी । अब सुबह हो ही जाएगी। ये साले मादरचोद लड़के है ना, बड़े हरामी हैं।( टेंट को जाते हुए)

उन लोगों के जाने के बाद सूरज मेरे मुंह से हाथ हटाया, और इधर उधर देखने लगा।

मैं इतना डर चुकी थी कि मेरी तो आवाज भी नहीं निकल रही थीं। सांस तेज़ होने लगी थी।

ये तो सच था मेरे जेठ अगर मुझे उस टाईम सूरज के साथ बात करते देख लेते तो ,इस घर में मेरा ये आखिरी रात होती।

मैं डरे हुए आवाज से सूरज को डांट कर बोली।

रितु: क्या कर रहे थे? पागल हो? कोई देख लेता तो? जाओ यहां से( थोड़ा गुस्से से,दबे आवाज़ में, खुद को ठीक करते हुए)

सूरज भी थोड़ा गुस्सा गया और बोला।

सु:: हां अभी देख लेता न तुम्हारा जेठ तो पता चलता। खाया पिया कुछ नहीं, ग्लास तोड़ा 4 आना ( गुस्से से मुझे सुना कर)

कह तो वो सही रहा था। मैं थोड़ा नॉर्मल हुई और बोली।

रितु: ठीक है सॉरी, अब तुम जाओ ।कोई देख लेगा।( उसको समझा के आराम से , अपने कपड़े ठीक करते हुए)

तो वो बोला।

सु: क्यों आपको तो पेशाब करने जाना था?( एक दम से बोल कर)

मैं शर्मसार हो गई, उसके ऐसे बोलने से।और बोली।

रि:: पागल हो कुछ भी बोलते हो।। मैं चले जाऊंगी। तुम जाओ ( बहुत शर्म महसूस कर के, इधर उधर देख कर)

तो वो थोड़ा सा मेरे नज़दीक आया और मेरे चूड़ियों से भरे हाथ को पकड़ के बोला।

सु: यही कर लो ना भाभी??( रिक्वेस्ट वाली आवाज से)

मैं हैरान हो गई।और अपने हाथ छुड़ा के बोली।

रि:: चुप।।पागल।।।( हंसते हुए,मुंह पे हाथ रख के नज़र फेर कर )

एक बात तो थी, भले ही दिखने में अच्छा नहीं था ।लेकिन बात बहुत मज़े की करता था , शायद इसीलिए लता इसके चक्कर में फंस गई थी।

सूरज फिर से जोर दे कर बोला।

सु: कर लो ना। वहां अकेले कहा जाओगे? सब शराब पीए हुए हैं। वैसे ही आज बहुत क़ातिल लग रही हो आप। कही कोई पकड़ न ले खोपचे में ।।( आंख मार कर)

उसकी बात सुन के मुझे हंसी आ गई।।और मैं बोली।

रि: अच्छा बच्चू, मस्का।।( हंस के)

तभी किसी के आने की आहट हुई, तो हम दोनों चुप हो गए।जब लोग गए तो वो बोला।

सु: भाभी मेरी बात मानो , उधर खेत में चलते है।वहां कर लेना। फिर में छोड़ दूंगा आपको।।( मेरी आंखों में देख कर)

मैं सच कहूं तो असमंजस में पड़ गई। जाऊ की न जाऊ।।।।

ये तो सच था ,सूरज की बातों ने जादू सा कर दिया था। लेकिन मेरे अंदर की , लेकिन पतिव्रता स्त्री मुझे रोक रही थी।

तो सूरज फिर से जिद किया तो में उसको बोली।

रि: कुछ गलत तो नहीं करोगे न? अकेले में?( अंगुली दिखा के)

सु: करना होता तो यहां भी खड़े खड़े कर देता भाभी अभी तक ।( मुझे ऊपर से नीचे देख कर)

मैं कभी ज़बरदस्ती नहीं करता। उस दिन भी लता ने ही मुझे बुलाया था।
( सिर नीचे करके, भोली आवाज़ से)

मुझे उस पे भरोसा हो गया और मैं उससे सीधा ये बोली।।

रि: कहां पे जाएंगे? कोई देखेगा तो नहीं?( इधर उधर देख कर)

तो वो मेरा हाथ पकड़ा।।और मुझे थोड़ा दूर के खेत के अंदर ले गया, जहां मक्के लगे थे। सूरज आगे आगे चल रहा था ।और में उसके पीछे। वो मेरा हाथ पकड़े था।

मैं पीछे से चलते हुए उसको दिखाने को बोली।

रि: अरे कहा ले जा रहा है मुझे। हाथ छोड़ ना। गिर जाऊंगी मैं ( आवाज दबा कर ,उसके पीछे चलते हुए)

और कुछ ही पल में हम दोनों मक्के के खेत पे आ गए।

मेरा डर से बुरा हाल था ।अब तो पेशाब भी बंद हो गई थी।
वो मुझे बोला।

सु: यहां कर लो भाभी कोई नहीं आएगा।( तेज़ सांस लेते हुए)

मैं एक दम से शर्म से पानी हो गई, वो 20 साल का छोकरा मुझे ,अपने सामने पेशाब करने को बोल रहा था।

मैं एक दम से ,थोड़ा झुलझूला के बोली।

रि: पागल हो क्या? तुम्हारे सामने ? तुम तुम बाहर को जाओ( थोड़ा शर्म और परेशान वाले भाव से , अपने लहंगे को थोड़ा सा ऊपर उठाए हुए)

तो वो बेशर्म लड़का ।मेरे समाने अपनी पेंट की जिप खोल के हाथ अंदर डाला।

चांदनी रात में मुझे सब दिख रहा था। मैं एक दम से हैरान हो गई और लहंगा छोड़ कर , पलट कर अपने चेहरे पर हाथ रख कर बोली , हड़बड़ा कर।

रि: ई ई ई ई,,,,,,,, पागल लड़के।।क्या कर रहे हो? अंदर करो उसको, बेशर्म कहीं के ।।( हड़बड़ा कर,पलट के, हंसते हुए उसकी हरकत पर)

तो वो मुझसे रिक्वेस्ट करने लगा।।

सु: भाभी प्लीज। आप कर लो ना। मेरे सामने।। कसम से आप बहुत अच्छी लगती हो।भाभी उस दिन भी आपके वजह से पूरा नहीं हुआ था । भाभी।।।( अपना लिंग पकड़े हुए )

मैं पलटी और उसको आंख दिखा के बोली।

रि: अच्छा मेरे वजह से नहीं हुआ। चढ़े तो बहुत थे लता के ऊपर, जान निकाल रखी थी उसकी।( भावना में बहते हुए ,बोल दी)

फिर मुझे समझ आया कि मैं क्या बोल दी हूं और में शर्मसार सी हो गई ।।

तो वो एक दम से अपना एक हाथ से मेरा हाथ पकड़ा और दूसरे से हाथ से तेजी से अपना लिंग हिलाते हुए और तेज़ सांस लेते हुए , मेरा हाथ पकड़ के मसल कर बोला।

सु: आह भाभी।।। आह्ला , आप एकबार बोलो तो सही आपकी भी वैसे ही चीख निकाल दूंगा।।आप तो वैसे भी मस्त वाला माल हो। ( दांत भींच कर,मुझे देख कर)

एक बार मूत दो न मेरे सामने।भाभी।।।। आह।।।कभी शहर की लड़की की चूत की आवाज नहीं सुनी भाभी,,,,आहह,,,,,,( मेरे दाएं हाथ को लगभग मसल के, उत्तेजना से)

मैं रात के 2: 15 मिनिट में ,मक्के के खेत में अपने से लगभग 8 साल छोटे लड़के के साथ खड़ी थी। जो मुझे देख के अपना हिला था। और मेरा हाथ पकड़े हुए।मुझसे गंदी भाषा में पेशाब करने की इल्तिज़ा कर रहा था।

मैं भी उसके छूवन और उसके लंबे से लिंग और उसकी बात को देख सुन कर मानो पिघल सी गई। और अपने हाथ को छुड़ा के , मुस्कुरा कर , इधर उधर देख कर, अपने लहंगे को धीरे से ऊपर उठा कर। दोनों हाथ लहंगे के अंदर डाल कर अपनी काली चड्डी की लस्टिक पकड़ी और सर र र र से नीच करते हुए ,बैठ गई थोड़ा सा शर्मा कर।

और नीचे बैठते ही ,मेरी योनि से पानी की तेज़ धार निकल पड़ी।

और सुर र र र र र र र र र र सु सु सु सु सु सु सु सु,,,,,,,, सुर र र सु सु सुर र र सु सु सुर र र सु सु सुर,,,,,,,, की आवाज़ उस मक्के के खेत में गूंज गई।

वही सूरज भी मानो उस आवाज को सुन कर पागल सा हो गया। और मेरे मुंह के सामने ही अपना लंबा लिंग निकाल कर मुठियाने लगा तेजी से अपना मुंह खोल कर ।

मैं भी उसको देख के , मानो भूल चुकी थी कि मैं एक घर की बहू हूँ और अभी एक जवान लड़के के साथ रात के 2 बजे एक सुनसान खेत में उसके सामने बैठ कर , पेशाब कर रही हूं।।

और मैं भी उसको और उत्तेजना दिलाने को सोच कर , जोर लगा कर पेशाब करने लगी। और मेरे मूत्र छिद्र से पेशाब और तेज़ आवाज करके निकलने लगी।

वहीं वो मधुर संगीत सुन कर ,सूरज मानो पागल हो के , आह ह ह,,,, भाभी आह ह कहते हुए तेजी से अपना लिंग हिलाने लगा।

मैं उकड़ू बैठे हुए , मुस्कुरा कर उसको देखते रही जब तक एक एक बूंद उस धरती को गीला नहीं कर दी।

और मुस्कुरा के अदा से ,जैसे ही अपने लहंगे को पकड़ के उठीं, सूरज तेजी से मेरे तरफ़ बढ़ा और मेरे क़मर में अपना बायां हाथ डाल कर, मुझे अपने तरफ खींचा।

और में भी लड़खड़ा कर आउच कहते हुए उसके दुर्बल शरीर से जा लगी।

क्योंकि मेरी काली चड्डी अभी भी मेरे जांघों से नीचे थी ,तो मैं अपने लहंगे को पकड़ के खड़ी थी। मैं डर और उत्तेजना के मिले जुले भाव से उसको देखने लगी।।

मैं कुछ समझ भी पाती,तब तक सूरज ने अपना खड़ा लिंग छोड़ कर ,अपना दाएं हाथ को जल्दी मेरे लहंगे के अंदर डाल दिया।

और सीधा मेरी योनि को अपनी हथेली में भर लिया। और मेरे कान के पास कामुक आवाज़ से बोला।

सु:: बहुत कड़ा माल हो भाभी आप!! आह इतनी सेक्सी आवाज़ तक किसी के चूत की नहीं सुनी, क्या सीटी जैसे बजती है आपकी चूत।( मेरी पूरी योनि को ,अपनी हथेली में भर कर)

मैं कसमसा के और उसकी बात से शर्म से मर कर रह गई, और आगे को झूकने लगी ।ताकि वो अंदर अंगुली ना डाल पाए।।

पहले बार कोई मेरे पति के अलावा मेरे योनि को ऐसे दबोचा था। बॉयफ़्रेंड ने भी सलवार और जींस के बाहर से ही छुआ था।

मैं उसको कसमसा कर दूर करने लगी। लेकिन वो निगोड़ा तब तक मेरे योनि के छेद में अपनी , मध्यम अंगुली अंदर घुसेड़ चुका था । रही सही कसर उसके अंगूठे ने पूरी कर दी, जो कि मेरे भग्नासा के मोटे मटर के दाने को मसलने लगा।

मेरी सांस रुक गई, और मैं सीधा , न न न करके गर्दन को हिला कर, दर्द भरे फेस को ले कर अपने पंजे के बल खड़े हो गई।

और वो दांत पिस कर मेरे गाल को चूम कर बोला।

सु: आह भाभी , आपका नाम गांव की औरतों ने सही रखा है शहर वाली मटकनी, पूरे बाल साफ़ करके रखती हो अपनी चूत के l

आह कितनी गर्म है ये बुर अंदर से। ( योनि में अंगुली से घर्षण करते हुए, दांत पीस कर )

मैने मुश्किल से उसको ,गर्दन ना ना ना करते हुए , दूर करते हुए, तेज़ सांस लेते हुए कहा, उसके हाथबके ऊपर नाखून लगा कर ।

रि:: आअह सूरज, क्या कर रहा है, छोड़ ड ड,,,, कोई आ जाएगा। आह सूरज ज ज,,,,,( उसका दाएं हाथ की कलाई को पकड़ कर, नाखून लगा कर)

लेकिन सूरज तो मानो ,अपनी मन मानी करके ही मानने वाला था।

वो जैसे ही अपनी मध्यम अंगुली को मेरी योनि के अंदर मेरे जी स्पॉट को दबाया और अंगूठे से मेरे भग्नासा को जोर से मसला, सच कहूं मैं उस टाईम दूसरे दुनिया पे पहुंच गई।

और मेरी आंख चढ़ गई, और पंजे के बल खड़े हुए में कामुक सीत्कार भर के मारने लगी, और अपनी कमर को धीरे धीरे आगे पीछे करने लगी।

रि: आइया मेरी मां,,,,, आह ह ह ह ह ह ह ह ह।।सूरज सी सी सी सी सी सी सी सी सी सी सी सी सी सी सी सी सी सी,,,,,,,,आह।। हाय रे सी सीसी। मत कर ना।। सी सी आह सूरज सी सी, आईया रे।।मत कर र र र र र र। उम्म सी आह।

और सूरज मेरे गले लग कर , अपने होंठ को मेरे गर्दन पे दबा कर चूसने लगा और चाटने लगा और मेरी योनि में अंगुली घुमा गुम कर , कामुक आवाज से बोला।

सु: आअह भाभी,, आह पूरे गांव में तुम्हारे जैसे माल नहीं है। क्या मस्त चूत है। भाभी मेरा भी हिला दो, अपने इन मस्त हाथों से। कसम से मन कर रहा है कि यही चोद दु तुमको ,खेत में लेटा कर जैसे उस दिन लता की चूत मार रहा था।

तो मैं भी वो सीन याद करके , जो और भी कामुक हो चुकी थी उसके हरकतों से , तो मैने अपने चूड़ियों से भरे हाथ से उसके , पतले लेकिन लंबे लिंग को पकड़ कर हिलाने लगी खड़े खड़े।

सच कहूं में उस टाईम इतना चुदासी हो चुकी थी कि अगर मुझे सूरज वहां पे लेटा देता , तो मैं भी माना नहीं कर पाती ,उसके लिंग को अपने योनि के अंदर लेने से। लेकिन शर्म से मैं खुद नहीं बोली।

और न जाने वो भी क्यों नहीं बोला , जबकि उसके पास इससे अच्छा मौका नहीं था। मैं पूरी तरह से गरम थी।

हम दोनों एक दूसरे की जरूरत पूरी करने लगे थे। वो मेरे जी स्पॉट को लागतार छेड़ रहा था। और मेरे भग्नासा को लगातार मसल रहा था। मैं भी अपनी मुट्ठी में उसके लिंग को पकड़ कर हिलाने में लगी थी।

और तभी वो अपने बाएं हाथ से मेरे स्तन को दबाने लगा, ब्लाउज के बाहर से , में और ज़्यादा मस्ती में भर गई और उसके लिंग को तेजी से हिला कर , कामुक आवाज निकलेने लगी ।।

जिसे मेरी चूड़ियां खन खन खन खन खन खन खन खन खन खन कर बजने लगी, उस मक्के के खेत में।
मैं चाहती थी कि वो ब्लाउज को खोल कर मेरे निपल्स को चूसे और उनका दूध पिए। लेकिन वो नहीं किया।

तो वो मेरे गले को चूम कर बोला कामुक आवाज से।

सु: पंकज भाई को पूरी रात चोदते होंगे, तुम्हारे जैसे माल को। ह्म्म?

अपने पति का नाम सुन के , मेरे दिमाग में वो ही शब्द गूंजने लगे। साली रांड़ कितने यार पाल रखे हैं?

तो मैं भी एक वैश्या के तरह अब तेजी से क़मर आगे पीछे करने लगी बिना कुछ बोले होंठों को दबा कर , बस कामुक आवाज और तेज़ होने लगी।।

सु: बाल कब काटे भाभी? सच में तुम्हारे जैसे माल नहीं देखी कसम से। कांटे जैसे चुभ रहे है तुम्हारे बाल। पूरी चूत पे बाल आते है क्या??( चूत को धीरे धीरे मसल कर)

और में मुश्किल से बोली।

रि: आह ह ह ह।। हां आते हैं ।।।सी सी आह ह सी। हाय रे सी सीसी ऊं सी।।एक क,,, क, हफ्ते ते ते पहले,,काटी थी ल,,, सी सी, आह सूरज सी, आह, सी।। मत कर ना ऐसे सी मर जाऊंगी आंह।।।

मैं सही से बोल भी नहीं पा रही थी। बस उखड़ी हुई आवाज़ से बोलने की कोशिश कर रही थी।

सु: क्या न करु मेरी जान?

रि: सी सी उम जो कर र र रहा है।।( कमर हिला कर कामुक आवाज से उसके लिंग को जोर से दबा कर)

सु: आह ह भाभी,, अपनी चूत दे दो मारने को, कसम से ,पंकज भईया को भूल जाओगे। बस एक बार चोदने दे दो।
बोलो दोगी न।चोदने????( अपनी एक और अंगुली मेरे योनि में ठूस कर)

मैं दर्द और मस्ती से पागल हो कर बोल पड़ी।

रि: हां सी सी पर कहां? करोगे? सी सी कोई सी सी देख लेगा।सूरज दी। हाय रे सी। पागल कर देगा रे तू।।सी सी।सी। ऊं सी सी।।

मेरी हां सुन कर वो पागल सा हो गया।और मेरे अंदर अपनी दोनों अंगुली मेरे जी स्पॉट को मोड कर मसल कर बोला दांत भींच कर।

सु: तुम हां बोलो बस ,

और ये कह के मेरे चूत मैं 2 अंगुलियों को ठूस दिया। मैं दर्द और मस्ती से बिलबिला गई । और अपने कुल्हे सिकोड़ कर उस हाथ बाहर खींचने लगी ।।


सु: इतनेजाम करूंगा कुछ! कसम से भाभी , तुम्हें जवानी का ऐसा मजा दूंगा। ज़िन्दगी भर मेरी रान्ड बन के घूमेगी।।( मेरी योनि में तेजी से अपनी अंगुली अंदर बाहर करते हुए)

मुझे उसकी ये गंदी बात का कोई बुरा नहीं लगा। ऐसा लगा जैसे वो मुझे कोई पद दे रहा हो। मैं फिर से उसका पकड़ के निचोड़ने लगी

सु: पूरी रात ,बिना कंडोम के रात भर तुम्हारी ये चूत फाड़नी है। भाभी।

और ये कहते हुए वो फिर से पूरी 2 अंगुली मेरे आखिरी छोर तक पेल दिया। मेरी तो आँखें मानो बाहर निकल गई।
मेरी मुंह खोल के झटके खाने लगी, और उसके लिंग को छोड़ कर उसके हथेली को पकड़ कर रोने वाली आवाज से बोली।

रि: आआ सूरज ज ज ज ज। मां मर गई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई,,,,,,,,,,, बस स ससस स स।।आह आह।

मेरी योनि से जोर से चप चप चप और पच पच पच पच पच पच पच पच पच पच पच पच पच पच की आवाज आने लगी ।

मेरा खड़ा होना मुश्किल होने लगा। जैसे ही वो आखिरी छोर पर अंगुली ऊपर को मोड़ा। मैं उससे चिपक कर कमर पुरी उसके तरफ करके अपने कुल्हे सिकोड़ ली उसके गाल गले को चूम कर कमर को तेजी से आगे पीछे करते हुए।

और कामुक आवाज से बोली। आईया।।। स स स स स सु सु सु सु रज ज ज।। नाही सी सी सी सी बस कर र र र र।

पहले बार मुझे ऐसा लगा मेरे गर्भ से कुछ निकला। और मैं वही पे गिर गई ज़मीन पर हाथ रख कर। इतनी थकान लगी , मन किया कि यही पर सो जाऊ। एक नशा सा आंखों में था। आंख खुल नहीं रही थी।

वहीं मैंने अधखुली आंख से देखा, सूरज अपने दाएं हाथ की वो दो अंगुली,अपने मुंह में डाल कर चूस रहा था जैसे मेरे चिपचिपा पानी को चाट रहा हो,और अपना साथ में लिंग हिला रहा था, मुझे देख कर।

और आह भाभी तुम्हारी चूत का स्वाद आह।आह कहते हुए ,एक पिचकारी मक्के के फूल के तरफ मारा।

मैं अभी भी गहरी सांस ले रही थीं। और सूरज को देख रही थी।।जो आंख बंद किए स्खलित हो रहा था।

तभी मुझे ध्यान आया कि , हद से ज्यादा देर हो चुकी है।

अब मेरे मन में थोड़ा ग्लानि का भाव आया। और में उठ के अपने चड्डी को ऊपर चढ़ने लगी, उसके तरफ पीठ करते हुए तो वो बोला।

सु: भाभी अपनी पैंटी दे दो ना प्लीज।।( निवेदन करते हुए)

मैं जो थोड़े देर पहले उसके नीचे भी लेटने को तैयार थी, अब शर्म से उससे कुछ बोल नहीं पाई।

समझ नहीं आया कि क्या उसको बोलूं। लेकिन पता नहीं कैसे मैने अपनी चड्डी ऊपर न करके , थोड़ा झुक कर अपने पैरों से नीचे उतर दी, और पहले चड्डी से अपनी चूत को पूछा और फिर पीछे को हाथ करके उसको दे दी, बिना उसको देखे।

जैसे ये उसका इनाम हो।

वो भी गहरी सांस ले कर मेरी चड्डी को सूंघा और आह करते हुए जेब में डाल दिया।

मैं बिना उसको कुछ बोले ,खेत से बाहर को आई।।और बोली धीरे से।

रि: सूरज मुझे घर तक छोड़ देगा? ( परेशान और डर भरे आवाज से)

वो भी हां हां बोल के खेत से बाहर आया।और हम दोनों चलने लगे।

मुझे समझ नहीं आया कि अब क्या उसको बोलूं? मैं एक शादी शुदा औरत की सीमा लांघ चुकी थी। अब क्यूंकि वासना के बदल छठ चुके थे । तो अब समझ में आ रहा था कि यह क्या हुआ था।

मैं डर से बस उसको ये ही बोली रूक कर, उसके तरफ देख कर।

रि: सूरज ,कभी किसी को मत बताना प्लीज़।( निवेदन करते हुए,हाथ जोड़ कर)

वो आगे बढ़ कर मेरे हाथ पकड़ कर बोला।

सु: विश्वास करो भाभी, आप पर आंच भी नहीं आएगी।। ( मुस्करा कर मेरे आंखों में देख कर)

मैं बस उसका धन्यवाद ही कर पाई।

तो वो बोला।

सु: दुबारा मिलोगे? ( संशय में)

मेरे मुंह से निकल पड़ा।

रि: कहां? मैं कही नहीं आ पाऊंगी सूरज( रिक्वेस्ट वाली आवाज से)

सु: रात को मैं आ जाऊंगा अपके पास।( मुझे देख कर)

मैं डर गई और बोली।

रि: नहीं नहीं प्लीज, घर पे नहीं किसी को पता चल जाएगा।( डर से)

सु: अरे मैं लता से मिलने आता था , आपके गौशाला के पीछे। आप टेंशन मत लो, आपको ठीक लगेगा तो आना।

रि: ह्म्म।।( सोच कर)

सु: अच्छा नंबर तो दे दो अपना।( मुस्करा कर,)

मैं कुछ सोची और उसको अपना नंबर दे दो और बोली।

रि: प्लीज तुम मत करना फोन, मैं टाइम होगा तो खुद करूंगी।

सु: ठीक है भाभी।।( मुस्करा कर)

रि: अब मेरी इज़्ज़त तुम्हारे हाथ में है, विश्वास से दिया है सब तुम्हें।

सु: कहा ना,आपको कभी दिक्कत नहीं होगी मेरे तरफ़ से ( मुस्करा कर)

फिर हम दोनों आ गए। मैं अपने कमरे में गई, और अपने को ठीक की, और दूसरी पैंटी पहनी ।

और फिर सूरज मुझे शादी तक छोड़ कर ,अपने घर चले गया।

शादी में गई तो ,मेरी जेठानी इतना देर से आने को बोली तो मैं बहना बना दी।

मैं वह बैठी तो थी लेकिन ध्यान पूरा जो अभी हुआ उस पर था।
मेरी योनि के अंदर अभी भी नदी सी बह रही थी। ऐसा लग रहा था कि मानो सूरज की अंगुली अभी भी मेरी योनि की गहराई नाप रही हो।

जारी रहेगा।।
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babakhosho

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ये कहानी सबसे बेहतरीन कहानी होगी, बस राइटर बीच में ना छोड़ दे
 

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भाग -२१

उस दिन , रोज के तरह मयूर आया । लेकिन वो आज थोड़ा , बुझा हुआ सा था।

मैने उससे कारण पूछा तो वो सही से कुछ बताया नहीं। मैने भी सोच स्कूल में कुछ हुआ होगा।

आज मैं उसके लिए कहने को कुछ अच्छा बनाई थी। और फिर उसके बाद , मैं रोज़ के तरह उसको अपनी बाहों में ले ली।

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मैं रोज़ उसके आने से पहले ही मैं अपने बेटे को सुला देती थी। फिर हम दोनों एक दूसरे की प्यास बुझाते थे। मुझे मानो उसकी लत सी लग गई थी। और ये ही हाल उसका भी था।

वो रोज मेरी योनि को चाटता, मेरा दूध पीता , और मेरी योनि के पानी का टेस्ट लेता।

पति जब घर पे होते मेरा दिन काटना मुश्किल हो जाता।

लेकिन वो आज उतना , उत्साहित नहीं लगा। मैने उसको फिर से पूछा तो वो तब भी सही से कुछ बताया नहीं। तो मैं उसका मूड बनाने के लिए , एक एक करके अपने कपड़े उतारने लगी।

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और फिर सलवार सूट उतर कर उसके सामने ब्रा और पैंटी में लेट गई।


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और उसको ले कर बेड में लेट गई। और उससे मेरे दूध को पीने को बोली। वो वैसे ही किया भी लेकिन ऐसा लग रहा था उसका ध्यान कही और है।

मैं उठ के उससे पूछने वाली थी कि मेरे घर की डोर बेल बजी । और मेरी हालत खराब हो गई। मैं उसको देखी वो मुझसे भी ज्यादा डरा हुआ था।

मैं उसको छुप जाने को बोली , मुझे लगा कि मेरे पति आ गए हैं और ये मेरा आज आख़िरी दिन है।

तभी डोर बेल फिर से बजी। मैं जल्दी से अपने कपड़े पहनी और मयूर को स्टोर रूम में छुपा दी। और बाल सही करते हुए, दरवाजे के ओर बढ़ी।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अगर मेरे पति ने मयूर को देख लिया तो मैं क्या बोलूंगी।

अगर ये भी कहती कि वो मेरे बेटे के साथ खेलने आया है तो वो कहते इतना बड़ा लड़का , बेटे के साथ क्यों खेलेगा??

और दरवाजा खोलने में इतना देर??

मेरा दिमाग फटने को तैयार था। तभी जोर से डोर बेल बजी और दरवाजे को पीटा गया।

सच में, मैं लगभग डर से रोने को थी। लेकिन दरवाजा खोला तो हैरान थी।

ये कोई 45 साल का आदमी था। दाढ़ी हल्की सफेद, पतला और लंबा। लेकिन मूछें बड़ी बड़ी।

मैं जल्दी बजी में दुपट्टा डालना भूल गई थी। तो वो मुझे बड़े ही अजीब से गंदी नीयत से देखने लगा।

मुझे अजीब लगा तो थोड़ा सा दरवाजे के पीछे खड़े हो कर बोली।

रितिका : जी… जी..कहिए.. ( मन ही मन गुस्से से)

वो बिना कोई डर और शर्म से बोला।

आदमी: रे मारा छोरा आया होगा यां। ( रौबदार आवाज से)

वो इतना जल्दी बोला कि मेरे समझ नहीं आया तो मैं बोली ..

रितिका: वो नीचे वाले? वो लोग यह नहीं है शायद । ( जल्दी से बोली)

वो फिर से वो ही बोला लेकिन थोड़ा चिढ़ कर।

रितिका : अरे क्या कह रहे हैं आप??( थोड़ा परेशान सा हो कर)

आदमी: रे हिंदी समझ में न आरी के? ( थोड़ा ऊंची आवाज से)

मैं बोल्या , मारा छोरा कहा से?? मयूर।।

जब वो मयूर बोला ,तब मेरे समझ मैं आया छोरा, मेरा दिमाग ख़राब हो गया। मैं पता नहीं क्यों स्टोर रूम को देखी और बोली।

रितिका: वो वो.. नहीं है यहां। दूध दे कर चला गया वो।( थोड़ा हड़बड़ा कर)

आदमी: घनी सयानी न बन। सब जानू हु मैं। इब तू निकलेगी या मैं थारे मर्द को फोन करूं??( दरवाजा पकड़ कर ,अंदर को धकेल कर)

मुझसे कुछ बोला नहीं गया। और वो जोर से मयूर को आवाज दिया। और वो स्टोर रूम से बाहर आया।

और वो गुस्से से अंदर आ के , उसको 2 थप्पड़ मार के बोला।

आदमी: साले! छोरी चोद के…घनी जवानी चढ़ गी है। तू घर चल। ( उसको बाहर को धक्का दे कर)

वो तो अच्छा था कि हमारे ऊपर वाला फ्लैट खाली था । और नीचे वाले कही बाहर गए थे । नहीं तो मेरी इज्जत आज नीलाम थी।

मयूर रोते हुए बाहर को गया। मेरी तो डर से हालात खराब थी। दिल बार बार मुझे गाली देते हुए बोल रहा था।

सही हुआ । सही हुआ और कर ।

और वो मेरे सामने आ कर बोला।

आदमी: क्यों री , मेरे छोरे पे ही नजर पड़गी तेरी, फसाणे खातर?

मैं डर रही थी । लेकिन एक आखिरी कोशिश करते हुए बोली।

रितिका: आप जैसा सोच रहे हैं। वैसा नहीं है। वो बस मेरे बेटे के साथ खेलता है। आप गलत समझ रहे हैं.( डरे हुए चेहरे से)

आदमी:: घनी सयाणी मत बन। कल ही मेरे नै सब बता दिया था के वो तेरे छोरे के संग खेले सै या तेरे संग। ( मेरे ऊपर हंस के )

मैं समझ गई कि मयूर आज ,गुमसुम सा क्यों था। मेरे पास अब छुपाने को कुछ नहीं था।

मुझे बहुत डर लगने लगा ,क्योंकि मेरे पति के आने का भी टाइम होने वाला था। तो मैं सीधे उसके आगे हाथ जोड़ दी।

रितिका: आप गलत समझ रहे हैं भाई साहब ऐसा नहीं है कुछ ।( लगभग रोते हुए)

आदमी:: कोई कोन्या, अब तेरे घरवाले ने ही आण दे, वही बतावेगा के मेरा छोरा इब्ब किती देर तै के कर रया था। बड़ी आग से है तै। तेरा घरवाला कोन्या बुझावे ता किसी मर्द ने पकड़ ले। मेरा छोरा ही मिल्या तै?

मुझे उसकी भाषा भी पूरी समझ नहीं आ रही थी। लेकिन जितना भी समझ रही थी वो मेरे पति के बारे में बोल रहा था।

मैं जोर से रोने लगी और उसके आगे हाथ जोड़ के उसके पैर पड़ने लगी।

तो वो मुझे उठाया और बोला।

आदमी: सच्च सच्च बतावै। मेरा छोरे ने तेरे साथ के करा( धीरे से मुझे उठा कर)

मुझे ये समझ मैं आ गया क्यूंकि वो बहुत धीरे और आराम से बोल रहा था।

मैं उसको रोते हुए झूठ बोली।

रितिका: सच मैं,कुछ नहीं किया। आप यकीन करिए। ( रोते हुए)

आदमी:: तो इतने टाइम वो तेरा दूध काढता था? ( मेरे कान पर बोल के धीरे से)

झूठ मत बोल्ले। न हो तेरा मर्द ने फोन करके बताऊं अब्बै।( मुझे और मेरी क्लीवेज को घूर के)


मेरे पास अब कोई जवाब नहीं था। मैं जोर से रोने लगी। मैं उसके सामने आत्मसमपर्ण कर दी थी।

तो वो बोला।

आदमी:: ठीक सै। ना बताऊँ तेरे पति ने। पर मेरे तै भी वोई करैगी ज्यूँ तू मेरे छोरे के तै करै थी।

मैं उसको हैरानी से देखी और वो मुझे देख कर हंस रहा था।

मैं उसको मना कर दी । और अभी भी ये कह रही थी कि मैं उसके बेटे के साथ कुछ नहीं करी हूं।

तो वो गुस्से में आ कर , फोन निकाल कर बोला।

आदमी:: तु ऐसे कोन्या मानेगी। रुक, तेरे मर्द ने बतावूं सै कि तेरी जोरू कितनी बड़ी चरित्र हीन सै।

मेरे छोरे तै रोज़ मुंह काला करै से।रुक तू। ( गुस्से से, मोबाइल निकाल कर)

वो बहुत गुस्से मे तो मैं उसका मोबाइल पकड़ कर , बेहद डरे हुए चेहरे से उसको विनती करते हुए बोली।

रितिका: प्लीज। ऐसा मत करिए। आप जो कहेंगे मैं वो करुंगी। आप उनको मत बताना , मैं आपके हाथ जोड़ती हु।( रोते हुए)

तो वो कुटिल मुस्कान से मुझे देख कर , मेरे बिल्कुल नजदीक आ कर बोला।


आदमी:: अच्छा, ते मेरै संग के के करैगी? ( मुझे मेरी बाजुओं से पकड़ कर)

मैं नजर नीचे कर दी। तो वो दरवाजे को बंद करने लगा तो मैं उसको बोली।

रितिका: प्लीज, मेरे पति आ जायेंगे। अभी नहीं।( उसको पीछे से देख कर ,डरे हुए आवाज से विनती करते हुए)

तो वो मुझे पलट के देखा और पास आकर , मुझे मेरे कमर से पकड़ कर अपने तरफ खींच के बोला।

आदमी:: कोई कोन्या, बस जरा सा चखण दे।

मैं अपने हाथों को कोहनी से मोड़ ली और अब उसके और मेरे बीच मेरे दोनों हाथ थे। और इस तरह से न चाहते हुए भी मैं उसके सीने पर हाथ रख दी।

और वो मेरे गले में झुका कर ,पीछे से मेरे बड़े से नितंबों को मसल के मेरे कान मे बोला।

आदमी:: तू तो बिल्कुल घणा गरम मॉल से।( मेरे गुदाज़ नितंबों को सूट के ऊपर से मसल कर)

तेरा मरद नामर्द से के?( मुझे देख कर)

कोई ना। अब मैं सूं, तेरी जरूरत पूरी करन वास्ते।।( पीछे से मेरी पैंटी की साइड वाली लास्टिक से हाथ अंदर डाल कर)


मैं उसकी बाहों में, असहज महसूस करते हुए छटपटाने लगी। और उससे छोड़ देने को बोली।

लेकिन वो माना नहीं। क्योंकि उसको मेरे पति के आने का टाइम मालूम था वो रोज 6.30 बजे के बाद ही आते थे।

और फिर वो मेरे मुंह को ऊपर करके, मेरे होंठों को पहले देखा , और मुस्कुरा कर फिर चूसने लगा। मैं बस स्थिर रही। उसके मुंह से गुटके की बदबू भी आ रही थी। लेकिन क्या ही कर सकती थी।

और फिर वो मेरे होठों को चूसते हुए , अपना हाथ मेरे नीचे ले गया और सलवार के ऊपर से मेरी योनि को भींच लिया।

मैं छटपटा गई। और उसका हाथ पकड़ने लगी। लेकिन वो मेरे होंठो को जोर से चूसते हुए , मेरे सलवार के बाहर से ही मेरी काली चड्डी के साइड वाली लास्टिक से अंदर हाथ डाल दिया।

और खड़े खड़े मेरे योनि को मसलने लगा। और फिर एक दम से मेरी योनि के अंदर अपनी बड़ी अंगुली डाल दिया । जिससे मेरी सलवार भी उसके अंगुली के साथ ,अंदर चले गई।

तभी मुझे मेरे बेटे के रोने को आवाज आई।

तो मैने जैसे तैसे अपने होंठों को छुड़ाया। और उसका हाथ पकड़ के सिसक कर बोली।

रितिका: प्लीज मुझे जाने दो.. आह… मेरा.. बेटा….. सी… आई… उठ गया है।।( सिसकारियां लेते हुए ,उसका हाथ पकड़ के , परेशानी वाले चेहरे से)


लेकिन वो तो मानो सुनने के मूड में ही नहीं था और मेरी योनि को मसल के दांत भींच कर बोला।

आदमी:: कल दिन में 12 बजे आवूंगा। तू त्यार रह्यां। कल तेरे चूत का हलवा बनना सै।

और जितना हो सके मेरे योनि मे अपनी बड़ी अंगुली पूरा डाल दिया । मैं चिंहुक कर पंजे के बल खड़े हो गई। और गर्दन को न न करके हिला कर ,उसके हाथ को पकड़ने लगी।

और फिर वो मुझे छोड़ा। मैं सच में वही पर बैठ गई। मेरी सलवार अभी भी मेरे योनि मे थी।

वो मुझे नीचे बैठा देख कर,वो भी मेरे सामने उकडू बैठ गया और अपनी अंगुली को सूंघने लगा। और आंख बंद कर दिया।

मुझे सच में बहुत शर्म आ रही थी। मैं उठने ही वाली थी कि वो मुझे पकड़ कर वही पे लेटाने लगा।

मैं डर गई। क्योंकि हम लोग हमारे मुख्य दरवाजे के बिल्कुल पास ही थे। पति का कोई भरोसा नहीं था कब आ जाए।

वो उतावला हो कर मुझे अभी देने को बोला। और मेरी सलवार के नाडे को खोलने लगा।

मैं डर से आवाज दबा कर उसको मना करने लगी। और बोली।

रितिका: प्लीज अभी नहीं। मैं बर्बाद हो जाऊंगी। आप कल आ जाना । मैं मना नहीं करूंगी। प्लीज़ , देखिए मेरा बेटा रो रहा है।

मैं कह ही रही थी कि मेरा बेटा रोते हुए घुटने के बल बाहर आ गया।

वो मेरे बेटे को देखा और उठ गया और अपने कपड़े ठीक करते हुए बोला।

आदमी:: काल मैं आऊंगा। धोखा मत दिये, नहीं तो सोच ल्ये तू। ( मुझे घूर कर)

वो पता नहीं कैसे कंट्रोल किया होगा। मैं बस हां बोली और अपने बेटे को उठा ली।

और वो जाते हुए बोला।

आदमी: दरवज्जा बंद कर ले। यो माहौल ठीक कोन्या है। तेरे जईसी लुगाई के तै कई छोरे घूमते स।


मुझे अब उसकी भाषा समझ आ रही थी मैं दरवाजा बंद कर दी। और बेटे को दूध पिलाते हुए सोचने लगी।

उफ्फ कितनी बड़ी गलती की मैने , मयूर को बुला कर। कैसे भी यहां से घर चले जाती। एक बार भगवान यह से ले जा दे बस।

फिर कभी ये सब नहीं करुंगीं । अगर इसने ,इसके पापा को बता दिया तो?

नहीं नहीं। जब तक यहां हूं। मुझे कैसे भी इसको , खुश करके रखना होगा।।

मेरा सिर बहुत भारी था। और बेटे को दूध पिलाते पिलाते मेरी आंख लग गई ।


जारी रहेगा।।
 
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babakhosho

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भाग -२१

उस दिन , रोज के तरह मयूर आया । लेकिन वो आज थोड़ा , बुझा हुआ सा था।

मैने उससे कारण पूछा तो वो सही से कुछ बताया नहीं। मैने भी सोच स्कूल में कुछ हुआ होगा।

आज मैं उसके लिए कहने को कुछ अच्छा बनाई थी। और फिर उसके बाद , मैं रोज़ के तरह उसको अपनी बाहों में ले ली।

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मैं रोज़ उसके आने से पहले ही मैं अपने बेटे को सुला देती थी। फिर हम दोनों एक दूसरे की प्यास बुझाते थे। मुझे मानो उसकी लत सी लग गई थी। और ये ही हाल उसका भी था।

वो रोज मेरी योनि को चाटता, मेरा दूध पीता , और मेरी योनि के पानी का टेस्ट लेता।

पति जब घर पे होते मेरा दिन काटना मुश्किल हो जाता।

लेकिन वो आज उतना , उत्साहित नहीं लगा। मैने उसको फिर से पूछा तो वो तब भी सही से कुछ बताया नहीं। तो मैं उसका मूड बनाने के लिए , एक एक करके अपने कपड़े उतारने लगी।

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और फिर सलवार सूट उतर कर उसके सामने ब्रा और पैंटी में लेट गई।


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और उसको ले कर बेड में लेट गई। और उससे मेरे दूध को पीने को बोली। वो वैसे ही किया भी लेकिन ऐसा लग रहा था उसका ध्यान कही और है।

मैं उठ के उससे पूछने वाली थी कि मेरे घर की डोर बेल बजी । और मेरी हालत खराब हो गई। मैं उसको देखी वो मुझसे भी ज्यादा डरा हुआ था।

मैं उसको छुप जाने को बोली , मुझे लगा कि मेरे पति आ गए हैं और ये मेरा आज आख़िरी दिन है।

तभी डोर बेल फिर से बजी। मैं जल्दी से अपने कपड़े पहनी और मयूर को स्टोर रूम में छुपा दी। और बाल सही करते हुए, दरवाजे के ओर बढ़ी।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अगर मेरे पति ने मयूर को देख लिया तो मैं क्या बोलूंगी।

अगर ये भी कहती कि वो मेरे बेटे के साथ खेलने आया है तो वो कहते इतना बड़ा लड़का , बेटे के साथ क्यों खेलेगा??

और दरवाजा खोलने में इतना देर??

मेरा दिमाग फटने को तैयार था। तभी जोर से डोर बेल बजी और दरवाजे को पीटा गया।

सच में, मैं लगभग डर से रोने को थी। लेकिन दरवाजा खोला तो हैरान थी।

ये कोई 45 साल का आदमी था। दाढ़ी हल्की सफेद, पतला और लंबा। लेकिन मूछें बड़ी बड़ी।

मैं जल्दी बजी में दुपट्टा डालना भूल गई थी। तो वो मुझे बड़े ही अजीब से गंदी नीयत से देखने लगा।

मुझे अजीब लगा तो थोड़ा सा दरवाजे के पीछे खड़े हो कर बोली।

रितिका : जी… जी..कहिए.. ( मन ही मन गुस्से से)

वो बिना कोई डर और शर्म से बोला।

आदमी: रे मारा छोरा आया होगा यां। ( रौबदार आवाज से)

वो इतना जल्दी बोला कि मेरे समझ नहीं आया तो मैं बोली ..

रितिका: वो नीचे वाले? वो लोग यह नहीं है शायद । ( जल्दी से बोली)

वो फिर से वो ही बोला लेकिन थोड़ा चिढ़ कर।

रितिका : अरे क्या कह रहे हैं आप??( थोड़ा परेशान सा हो कर)

आदमी: रे हिंदी समझ में न आरी के? ( थोड़ा ऊंची आवाज से)

मैं बोल्या , मारा छोरा कहा से?? मयूर।।

जब वो मयूर बोला ,तब मेरे समझ मैं आया छोरा, मेरा दिमाग ख़राब हो गया। मैं पता नहीं क्यों स्टोर रूम को देखी और बोली।

रितिका: वो वो.. नहीं है यहां। दूध दे कर चला गया वो।( थोड़ा हड़बड़ा कर)

आदमी: घनी सयानी न बन। सब जानू हु मैं। इब तू निकलेगी या मैं थारे मर्द को फोन करूं??( दरवाजा पकड़ कर ,अंदर को धकेल कर)

मुझसे कुछ बोला नहीं गया। और वो जोर से मयूर को आवाज दिया। और वो स्टोर रूम से बाहर आया।

और वो गुस्से से अंदर आ के , उसको 2 थप्पड़ मार के बोला।

आदमी: साले! छोरी चोद के…घनी जवानी चढ़ गी है। तू घर चल। ( उसको बाहर को धक्का दे कर)

वो तो अच्छा था कि हमारे ऊपर वाला फ्लैट खाली था । और नीचे वाले कही बाहर गए थे । नहीं तो मेरी इज्जत आज नीलाम थी।

मयूर रोते हुए बाहर को गया। मेरी तो डर से हालात खराब थी। दिल बार बार मुझे गाली देते हुए बोल रहा था।

सही हुआ । सही हुआ और कर ।

और वो मेरे सामने आ कर बोला।

आदमी: क्यों री , मेरे छोरे पे ही नजर पड़गी तेरी, फसाणे खातर?

मैं डर रही थी । लेकिन एक आखिरी कोशिश करते हुए बोली।

रितिका: आप जैसा सोच रहे हैं। वैसा नहीं है। वो बस मेरे बेटे के साथ खेलता है। आप गलत समझ रहे हैं.( डरे हुए चेहरे से)

आदमी:: घनी सयाणी मत बन। कल ही मेरे नै सब बता दिया था के वो तेरे छोरे के संग खेले सै या तेरे संग। ( मेरे ऊपर हंस के )

मैं समझ गई कि मयूर आज ,गुमसुम सा क्यों था। मेरे पास अब छुपाने को कुछ नहीं था।

मुझे बहुत डर लगने लगा ,क्योंकि मेरे पति के आने का भी टाइम होने वाला था। तो मैं सीधे उसके आगे हाथ जोड़ दी।

रितिका: आप गलत समझ रहे हैं भाई साहब ऐसा नहीं है कुछ ।( लगभग रोते हुए)

आदमी:: कोई कोन्या, अब तेरे घरवाले ने ही आण दे, वही बतावेगा के मेरा छोरा इब्ब किती देर तै के कर रया था। बड़ी आग से है तै। तेरा घरवाला कोन्या बुझावे ता किसी मर्द ने पकड़ ले। मेरा छोरा ही मिल्या तै?

मुझे उसकी भाषा भी पूरी समझ नहीं आ रही थी। लेकिन जितना भी समझ रही थी वो मेरे पति के बारे में बोल रहा था।

मैं जोर से रोने लगी और उसके आगे हाथ जोड़ के उसके पैर पड़ने लगी।

तो वो मुझे उठाया और बोला।

आदमी: सच्च सच्च बतावै। मेरा छोरे ने तेरे साथ के करा( धीरे से मुझे उठा कर)

मुझे ये समझ मैं आ गया क्यूंकि वो बहुत धीरे और आराम से बोल रहा था।

मैं उसको रोते हुए झूठ बोली।

रितिका: सच मैं,कुछ नहीं किया। आप यकीन करिए। ( रोते हुए)

आदमी:: तो इतने टाइम वो तेरा दूध काढता था? ( मेरे कान पर बोल के धीरे से)

झूठ मत बोल्ले। न हो तेरा मर्द ने फोन करके बताऊं अब्बै।( मुझे और मेरी क्लीवेज को घूर के)


मेरे पास अब कोई जवाब नहीं था। मैं जोर से रोने लगी। मैं उसके सामने आत्मसमपर्ण कर दी थी।

तो वो बोला।

आदमी:: ठीक सै। ना बताऊँ तेरे पति ने। पर मेरे तै भी वोई करैगी ज्यूँ तू मेरे छोरे के तै करै थी।

मैं उसको हैरानी से देखी और वो मुझे देख कर हंस रहा था।

मैं उसको मना कर दी । और अभी भी ये कह रही थी कि मैं उसके बेटे के साथ कुछ नहीं करी हूं।

तो वो गुस्से में आ कर , फोन निकाल कर बोला।

आदमी:: तु ऐसे कोन्या मानेगी। रुक, तेरे मर्द ने बतावूं सै कि तेरी जोरू कितनी बड़ी चरित्र हीन सै।

मेरे छोरे तै रोज़ मुंह काला करै से।रुक तू। ( गुस्से से, मोबाइल निकाल कर)

वो बहुत गुस्से मे तो मैं उसका मोबाइल पकड़ कर , बेहद डरे हुए चेहरे से उसको विनती करते हुए बोली।

रितिका: प्लीज। ऐसा मत करिए। आप जो कहेंगे मैं वो करुंगी। आप उनको मत बताना , मैं आपके हाथ जोड़ती हु।( रोते हुए)

तो वो कुटिल मुस्कान से मुझे देख कर , मेरे बिल्कुल नजदीक आ कर बोला।


आदमी:: अच्छा, ते मेरै संग के के करैगी? ( मुझे मेरी बाजुओं से पकड़ कर)

मैं नजर नीचे कर दी। तो वो दरवाजे को बंद करने लगा तो मैं उसको बोली।

रितिका: प्लीज, मेरे पति आ जायेंगे। अभी नहीं।( उसको पीछे से देख कर ,डरे हुए आवाज से विनती करते हुए)

तो वो मुझे पलट के देखा और पास आकर , मुझे मेरे कमर से पकड़ कर अपने तरफ खींच के बोला।

आदमी:: कोई कोन्या, बस जरा सा चखण दे।

मैं अपने हाथों को कोहनी से मोड़ ली और अब उसके और मेरे बीच मेरे दोनों हाथ थे। और इस तरह से न चाहते हुए भी मैं उसके सीने पर हाथ रख दी।

और वो मेरे गले में झुका कर ,पीछे से मेरे बड़े से नितंबों को मसल के मेरे कान मे बोला।

आदमी:: तू तो बिल्कुल घणा गरम मॉल से।( मेरे गुदाज़ नितंबों को सूट के ऊपर से मसल कर)

तेरा मरद नामर्द से के?( मुझे देख कर)

कोई ना। अब मैं सूं, तेरी जरूरत पूरी करन वास्ते।।( पीछे से मेरी पैंटी की साइड वाली लास्टिक से हाथ अंदर डाल कर)


मैं उसकी बाहों में, असहज महसूस करते हुए छटपटाने लगी। और उससे छोड़ देने को बोली।

लेकिन वो माना नहीं। क्योंकि उसको मेरे पति के आने का टाइम मालूम था वो रोज 6.30 बजे के बाद ही आते थे।

और फिर वो मेरे मुंह को ऊपर करके, मेरे होंठों को पहले देखा , और मुस्कुरा कर फिर चूसने लगा। मैं बस स्थिर रही। उसके मुंह से गुटके की बदबू भी आ रही थी। लेकिन क्या ही कर सकती थी।

और फिर वो मेरे होठों को चूसते हुए , अपना हाथ मेरे नीचे ले गया और सलवार के ऊपर से मेरी योनि को भींच लिया।

मैं छटपटा गई। और उसका हाथ पकड़ने लगी। लेकिन वो मेरे होंठो को जोर से चूसते हुए , मेरे सलवार के बाहर से ही मेरी काली चड्डी के साइड वाली लास्टिक से अंदर हाथ डाल दिया।

और खड़े खड़े मेरे योनि को मसलने लगा। और फिर एक दम से मेरी योनि के अंदर अपनी बड़ी अंगुली डाल दिया । जिससे मेरी सलवार भी उसके अंगुली के साथ ,अंदर चले गई।

तभी मुझे मेरे बेटे के रोने को आवाज आई।

तो मैने जैसे तैसे अपने होंठों को छुड़ाया। और उसका हाथ पकड़ के सिसक कर बोली।

रितिका: प्लीज मुझे जाने दो.. आह… मेरा.. बेटा….. सी… आई… उठ गया है।।( सिसकारियां लेते हुए ,उसका हाथ पकड़ के , परेशानी वाले चेहरे से)


लेकिन वो तो मानो सुनने के मूड में ही नहीं था और मेरी योनि को मसल के दांत भींच कर बोला।

आदमी:: कल दिन में 12 बजे आवूंगा। तू त्यार रह्यां। कल तेरे चूत का हलवा बनना सै।

और जितना हो सके मेरे योनि मे अपनी बड़ी अंगुली पूरा डाल दिया । मैं चिंहुक कर पंजे के बल खड़े हो गई। और गर्दन को न न करके हिला कर ,उसके हाथ को पकड़ने लगी।

और फिर वो मुझे छोड़ा। मैं सच में वही पर बैठ गई। मेरी सलवार अभी भी मेरे योनि मे थी।

वो मुझे नीचे बैठा देख कर,वो भी मेरे सामने उकडू बैठ गया और अपनी अंगुली को सूंघने लगा। और आंख बंद कर दिया।

मुझे सच में बहुत शर्म आ रही थी। मैं उठने ही वाली थी कि वो मुझे पकड़ कर वही पे लेटाने लगा।

मैं डर गई। क्योंकि हम लोग हमारे मुख्य दरवाजे के बिल्कुल पास ही थे। पति का कोई भरोसा नहीं था कब आ जाए।

वो उतावला हो कर मुझे अभी देने को बोला। और मेरी सलवार के नाडे को खोलने लगा।

मैं डर से आवाज दबा कर उसको मना करने लगी। और बोली।

रितिका: प्लीज अभी नहीं। मैं बर्बाद हो जाऊंगी। आप कल आ जाना । मैं मना नहीं करूंगी। प्लीज़ , देखिए मेरा बेटा रो रहा है।

मैं कह ही रही थी कि मेरा बेटा रोते हुए घुटने के बल बाहर आ गया।

वो मेरे बेटे को देखा और उठ गया और अपने कपड़े ठीक करते हुए बोला।

आदमी:: काल मैं आऊंगा। धोखा मत दिये, नहीं तो सोच ल्ये तू। ( मुझे घूर कर)

वो पता नहीं कैसे कंट्रोल किया होगा। मैं बस हां बोली और अपने बेटे को उठा ली।

और वो जाते हुए बोला।

आदमी: दरवज्जा बंद कर ले। यो माहौल ठीक कोन्या है। तेरे जईसी लुगाई के तै कई छोरे घूमते स।


मुझे अब उसकी भाषा समझ आ रही थी मैं दरवाजा बंद कर दी। और बेटे को दूध पिलाते हुए सोचने लगी।

उफ्फ कितनी बड़ी गलती की मैने , मयूर को बुला कर। कैसे भी यहां से घर चले जाती। एक बार भगवान यह से ले जा दे बस।

फिर कभी ये सब न
हीं करुंगीं । अगर इसने ,इसके पापा को बता दिया तो?

नहीं नहीं। जब तक यहां हूं। मुझे कैसे भी इसको , खुश करके रखना होगा।।

मेरा सिर बहुत भारी था। और बेटे को दूध पिलाते पिलाते मेरी आंख लग गई ।


जारी रहेगा।।
Ohhh Mayur ke sath Chapter ka dukhi ant hua
 

Alok

Well-Known Member
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Nice update...

Isliye kehte hai laalach buri blaa hai
 
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