भाग -११
मेरा बेटा फिर से दूध की जिद करने लगा तो मैं अपने ससुर जी से धीरे से बोली।
रि: बाबू जी , इसको मुझे दे दीजिए , सो जाएगा अब।( हाथ बढ़ा कर)
वो मेरे ओर को पलटे।
ससुर: हां, सुला दे। दूध पिला कर ( एक दम से मुझे दे कर)
मैंने थोड़ी देर पहले ही अपने बाएं स्तन से उसको दूध पिलाया था । तो अब मुझे दाएं साइड से पिलाना था। लेकिन दायां साइड मेरे ससुर जी बैठे हुए थे। तो मैं थोड़ा सा साइड को हो कर अपने बेटे के मुंह में अपना दायां निप्पल को डाल दी।
मैं खिड़की के साइड मुंह किए रही ताकी मेरे ससुर जी मुझे न देख पाए।
मेरे ससुर जी के मन में मानो वो जवान 20 साल की लड़की बस गई थी। वो बार बार तिरछी नजर से उसके हरकतों को देखने लगे।
फिर 15 मिनट तक दूध पिला कर, मैं अपने बेटे को सुला दी।
मुझे मेरे बेटे के साथ थोड़ा दिक्कत हो रही थी। वो बार बार नीचे को लटक जा रहा था।
तो मुझे थोड़ा परेशान देख कर मेरे ससुर जी मेरे तरफ़ मुंह करके बोले।
ससुर: परेशानी हो रही है?
रि: हां ये नीचे को चला जा रहा है।( अपने बेटे को ऊपर को करते हुए)
तो मेरे ससुर जी बोले।
ससुर: इसको मेरे तरफ को सुला। सीधा।
और मेरे तरफ को बैठ गए। और बोले।
ससुर: ला इधर को सिर कर इसका। साला पैसे ले लिया,सीट भी नहीं दिया अभी तक ।( खलासी को गाली देते हुए)
अब मैं और मेरे ससुर जी सट कर बैठ चुके थे। हम दोनों के जांघ आपस में सटे थे।
मेरा दायां हाथ उनके बाएं बाजू से टच होने लगा था। लेकिन मैं कोई ध्यान नहीं दी। मुझे तो मेरे बड़े ससुर जी याद आ रहे थे।
मैं बाहर को देख रही थी। वही मेरे ससुर जी उन दोनों प्रेमी युगल को। और तभी फिर बस की लाइट बंद हो गई। रात को मौसम ठंडा हुआ तो मुझे ,थोड़ी ठंड सी लगने लगी।
तो मैं धीरे से अपने ससुर जी से बोली।
रि: बाबू जी वो चादर निकल देंगे। इसको ठंडा लग जायेगा।( धीरे से अंधेरे में उनके तरफ देख कर)
मेरे ससुर जी हां बोल कर ,मेरे बेटे को। मुझे देने लगे, जिससे मेरी अंगुली उनके अंगुली से घर्षण कर दी। जिसने मेरे जिस्म में हलचल पैदा कर दी।
और वो उठे, और उस लड़की के तरफ देखने लगे। और उनके उठने से मैने जैसे ही उस लड़के लड़की को देखा मेरे होश उड़ गए।
क्योंकि अंदर नीली लाइट जल रही थी, और वो दोनों एक चादर में चिपके हुए थे। शायद लड़का उसके उरोज दबा रहा था। वो किस कर रहे थे।
मेरे ससुर जी मुझे चादर देते हुए भी उनकी तरफ देख रहे थे।।लेकिन इन दोनों को कोई फ़र्क नहीं पड़ा।
मैं शर्म से नज़र फेर ली।
ससुर जी ने मुझे चादर दी तो मैं अपने ऊपर चादर डाल दी। मेरा बेटा ओढ़ नहीं राह था तो मैं उसको डांटी तो वो रोने लगा। तो मेरे ससुर जी मेरे तरफ मुंह करके,उसको मेरे गोद से उठाए।
तो उनका बायां हाथ मेरे कटी प्रदेश से रगड़ खा गया। मैं एक दम से हिल कर सीधे बैठ गई। और मेरे ससुर जी को मानो कोई फर्क नहीं पड़ा।
वो मेरे बेटे को चुप करने में लगे थे।लेकिन मेरे दिमाग में सितार बज गए।
ससुर जी दारू पीने के बाद अलग ही व्यवहार करने लगे थे। वो लड़की को ऐसे देखना । मुझसे अब बात करना।और अभी हाथ रगड़ जाने पर भी कोई परवाह न करना।
मैं ये सब सोच के बाहर को देखने लगी। वही मेरे ससुर जी उन दोनों की रास लीला देख रहे थे।
मेरा तो शर्म से बुरा हाल था। उनको ये तक एहसास नहीं था कि मैं उनके साथ बैठे हूं । वो लगातार उन दोनों को ही देख रहे थे, मेरे बेटे को अपने गोद में लिए हुए।
वही उन दोनों युगल की हरकत देख कर तो मुझे ये लग रहा था कि काश अभी मेरे बड़े ससुर जी होते मेरे साथ।
ये सोच कर मैं अपनी जांघ चिपका दी आपस में।
और मैं चादर ओढ़े हुए, बाहर को देखते हुए , आज दिन की घटना को याद करने लगी।
और जैसे ही मुझे मेरे बड़े ससुर जी की ,वो अंगूली याद आई। मैने अपने दोनों पैर चिपका दिए।।
मेरे ससुर जी ने मुझे ऐसे करते हुए देखा।
और मुझे देखने लगे । मुझे बहुत शर्म आई और ठीक से बैठ गई।तभी मेरे ससुर जी बोले
ससुर: बहु !
मैं अपनी सोच से बाहर आई
रि: जी जी बाबू जी।( सिर पर पल्लू डाल कर सही से बैठ कर)
ससुर: इसको अपना दूध पिला । बहुत परेशान कर रहा है ।( थोड़ा चिढ़ने वाली आवाज से)
शायद मेरा बेटा उनको वो लाइव मूवी देखने से रोक रहा था।
तो क्योंकि मैं पहले ही, दूध पिला चुकी थी तो बोली।
रि: अब नहीं पियेगा बाबू जी। अभी तो पिलाया था।।इसको मेरी तरफ सीधा सुला दीजिए। हाथ लटक रहा है
( चादर हटा कर ,अपनी गोद को खुला करके)
तो मेरे ससुर जी मेरे तरफ झुके ,और मेरे बेटे को मेरे गोद में सुलाने लगे।
क्योंकि उनका बायां हाथ मेरे बेटे के सिर के पीछे था तो सुलाने टाइम, उनका हाथ मेरी बाई जांघ पे लग गया।
मेरे जिस्म में मानो बिजली सी दौड़ गई। मैं थोड़ा सा हिली और वो अपना हाथ मेरे बेटे के सिर के नीचे से निकाल दिए।
मैं तो शर्म से बाहर को देखने लगी, अपने बेटे को दाएं हाथ से उसके पसलियों के पास से पकड़ कर।
शायद मेरे ससुर जी को मेरी गुदाज़ जांघ का छूना पसंद आया और वो मुझे एक नज़र देखे। उनके मुंह से शराब की बदबू आ रही थी वो थोड़ा नशे में थे।
और मुझे देखते हुए ,बिल्कुल मुझसे सट के बैठ गए , और मेरे बेटे के पैर अपने पैरों के ऊपर रख दिए।
और खुद भी उस चादर को ढक लिए।
और मेरे ससुर जी फिर से ,उन दोनों युगल को देखने लगे। वो देखे कि वो लड़की के ओर लड़का बिल्कुल मुंह किए चिपका हुआ है।
मैने भी एक नज़र बहने से थोड़ा आगे हो कर देखा। मेरे होश उड़ गए। मुझे साफ दिख रहा था कि वो लड़का अपना हाथ से कुछ दबा रहा है।
मैं शर्म से बाहर को देखने लगी। वही मेरे ससुर जी का बुरा हाल हो गया।
ऐसे ही 15 मिनिट हुआ होगा, मुझे हल्के से झपकी आ गई।
तभी मेरी अचानक से नींद खुली।
मैने महसूस किया कि मेरे ससुर जी का पैर मेरे पैर के ऊपर था।
और उनकी बाईं तरफ की कोहनी मेरे दाएं उरोज से बार बार टकरा रही थी ।
मेरी हालत खराब हो गई। समझ नहीं आया कि अब मैं कैसे रिएक्ट करु।
क्या उठ जाऊ, या ऐसे ही सोने का नाटक करु।
मैने देखा, मेरे ससुर जी मेरे और को देखे, मैं हल्की सी आंख खोल कर उनको देखी। वो थोड़ा सा मेरे तरफ़ और खिसक गए। और सोए रहने का बहना करने लगे।
उफ्फ मेरे ससुर जी को मेरे तरफ़ आर्कषण है? ये सोच कर मेरे जिस्म में चींटी सी दौड़ने लगी। मुझे डर और उत्तेजना दोनों के मिश्रित भाव थे। डर ये था कि अगर में उनको न रोकी तो वो मेरे बारे में क्या सोचने।
और उत्तेजना इस बात की थी कि वो धीरे धीरे मुझे छू रहे थे , मुझे गरम कर रहे थे।
मैं तो दिन से ही गर्म थी। तो मुझे अब मेरे जिस्म में अलग सा महसूस होने लगा।
मैं खिड़की पर सिर रखे, सोने का नाटक कर रही थी। वही मेरे ससुर जी अब, मेरे उरोज से अपनी कोहनी बिल्कुल सटा दिए।
सांस लेने से , मेरे उरोज उनके कोहनी से दबने लगते। और वो धीरे धीरे नीचे मेरे पैर को सहलाने लगे।
मैं डर और उत्तेजना से अपने , लाल नाखून पॉलिश लगे हुए ,नाखूनों को मोड ली।
मेरे ससुर जी कभी उन दोनों को देखते कभी मुझे देखते। और अपने पैरों से पैरों को सहलाने लगते। और मेरे उरोज कोहनी से दबाने लगते।
मेरे निपल्स उनकी इस हरकत से टाइट होने लगे । ऐसा लग रहा था कि अब निप्पलों से दूध टपक जाएगा।
मैं भी बस नींद का बहना करते रही।और जो हो रहा था उसकी शाक्षी बने रही। तभी मैने महसूस किया कि उनके पैरों में कंपन है। फिर तभी वो अपना दायां हाथ मेरे बेटे के ऊपर रख दिए। और बाएं हाथ की कोहनी से मेरे दाएं फुले हुए निप्पल को सहला रहे हैं।
और हल्की आंख से मुझे देखने लगे, और धीरे धीरे, अब उनका दाया हाथ मेरे बेटे के ऊपर से हट कर मेरे सूट के बाहर मेरे पेट पर आने लगा।
मेरी दिल की धड़कन बढ़ने लगी ये सोच कर कि वो कहां पर रुकेंगे? लेकिन वो बढ़ने लगे और अपने दाएं हाथ को मुझे देखते हुए मेरे बेटे के कमर के नीचे से मेरे जांघों के जोड़ के तरफ डालने लगे ।
मैं अपनी स्थिति अभी बयान नहीं कर सकती। मैं डर से अपने पैरों की अंगुली को गोल गोल घूमने लगी थी।
वही मेरे ससुर जी इतना उत्तेजित हो गए थे मेरे चेहरे को देख कर कि वो मेरे टांगों के जोड़ पर हाथ डाल दिए । उस हल्की रोशनी में, मैं गजब लग भी रही थी।
और फिर मेरी योनि को धीरे से दबा दिए। उनकी सांस तेज़ थी और उनके हाथ कांप रहे थे।
मैं क्या करती , मेरे समझ नहीं आया कि अब करूं तो क्या करूं। बस आंखों को बंद किए हुए धीरे से अपनी जांघों को चिपका दी धीरे से ताकि वो हाथ पूरा न डाल पाएं
। मेरी सांस बहुत तेज थी सच में। एसी में पसीना आने लगा था।
तो वो मुझे देखे और मेरे निप्पल को कोहनी से दबने लगे। और मेरे चड्डी के साइड की लास्टिक को ढूंढने लगे।
अब मेरी हालत और भी खराब होने लगी। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरे योनि से तरल टपक रह है।
बस अपने स्पीड में थी और मेरे ससुर मेरे निजी अंगों से खेल रहे थे।बिना कोई संकोच और शर्म के।
और जैसे ही उनकी अंगुली मेरे नेट वाली चड्डी के साइड से मेरे योनि के छोटे छोटे बाल प लगी , मैं अंदर तक हिल गई। मुझसे अब सहन नहीं हुआ। और मैं अपनी जांघो को जोर से भींच के थोड़ा उठ गई।
शायद वो भी मेरे जांघो को चिपकने से वो होश में आए ।
वो अब एक दम से रुक गए और अपना हाथ खींच लिए।और अपने पैर को भी हटा दिया। शायद मेरे जांघों को चिपकने से उनको पता चल गया होगा कि में उठ गई हु।
वो नींद का बहना करते हुए थोड़ा सा मुझसे दूर भी हो कर बैठ गए।
शायद उनको याद आ गया होगा कि मैं उनकी बहु हूं। जो भी था। कही न कही मेरा दिल टूट गया। अपने पर गुस्सा भी आया कि मैं हिली क्यों?
मैं सोचने लगी थी कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। तो मैं थोड़ा उठ के बैठ गई। ,जिससे वो थोड़ा सा हैरान हो गए।
मेरे उठने से वो नींद का बहना करने लगे। और अपना मुंह सीधा करके , सीट पर लाधार ले कर सोने लगे और थोड़ी खुली आंख से मुझे देखने लगे।
अब हमारे बीच फासला बढ़ गया था । मैं अपने बाल से क्लेचर को खोली। और दोनों हाथ ऊपर करके , मुंह मैं क्लेचर को दबाए हुए बाल बांधने लगी बाहर को देखते हुए।
सच कहूं तो मैं बहुत परेशान हो गई थी। की अब पूरा सफर कैसे तय करूंगी।
बड़े ससुर की बात अलग थी। लेकिन ये तो मेरे पति के पिता हैं। लेकिन मैं अब उनके मन की बात जान गई थी। और कही न कही मुझे भी अभी एक मर्द की जरूरत थी एक संपूर्ण मर्द की।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि मैं अपने ससुर को अपना जिस्म सौंप दूं।
मैं बहुत उधेड़ बन में थी। कैसे ही सुबह होने का इंतजार कर रही थी। लेकिन मन के एक कोने पर वासना अपना सिर उठाने लगी थी।
वही वो मुझे तिरछी नजर से देख रहे थे। और मेरे बिना ढके उरोजो को, जिनको वो थोड़ी देर पहले अपने कोहनी से दबा रहे थे।
मैं उनको अनदेखा करते हुए, चादर को अपने बेटे के ऊपर डाल दी।
तो वो भी उठने का बहना करते हुए मुझे बोले।
ससुर: क्या हुआ?
मुझे समझ नहीं आया कि क्या बोलूं? वो बिल्कुल नॉर्मल तरह से बात कर रहे थे। जबकि मेरी धड़कन बढ़ी हुई थी।
रि: कुछ नहीं । इसने ओढ़ा नहीं था। एसी तेज़ चल रहा है।( अपने बेटे को और उनके तरफ चादर को करते हुए ,तेज़ सांसों से, अंजान बनते हुए)
वो मुझे देखते रहे जैसे ये पता लगाने की कोशिश में थे कि मुझे पता चला है कि नहीं। हम दोनों एक दूसरे से अंजान बन रहे थे।
( यहां रितिका के ससुर को समझ नहीं आ रहा था कि उसको , उसके जिस्म में हाथ लगने का पता है कि नहीं । बिना पल्लू के रितिका को देख कर उसके ससुर ,जो दारू पीए हुए थे, और कई दिनों से एक औरत के संपर्क में नहीं थे, थोड़ा अपने जिस्म में गर्माहट महसूस करने लगे थे, और वो उसके तरफ बिल्कुल सरक गए थे और उसकी जिस्म की खुशबू और गर्माहट से अपने आप को कंट्रोल नहीं कर पाए और हाथ उसके अंदरूनी जांघों पे डाल दिए थे।
और जब रितिका ने प्रतिक्रिया दी , तो दूर हट जाने का फैसला किया , क्योंकि उनको डर लगा कि कही बहु कुछ कह न दे।)
मैं बाहर को देखने लगी और सोचने लगी कि जो हुआ सही हुआ कि नहीं।
लेकिन थोड़ी देर बाद वो मेरी तरफ़ खिसक कर वो फिर से मुझसे लगभग पूरा सट गए। मैं भी कुछ न बोली , बस बाहर को मुंह किए , खिड़की पर सिर टिका कर , आंख को बंद कर ली। मेरा दिल किसी रेलगाड़ी के जैसे धक धक धक करने लगा था। मन में फिर से लालच आ गया एक मर्द की चाहत का।
तभी मेरा बेटा करवट लिया और नीचे को गिरने लगा, जिसको मैने पकड़ लिया ।
और वो भी जल्दी से अपना हाथ मेरे बेट को पकड़ने को आगे लाए, लेकिन इस बार उन्होंने मेरा हाथ टच नहीं किया और हटा दिया।
मैं अपने बेटे को सही से ऊपर को सुला दी।
लेकिन 3 मिनट बाद वो मेरे बेटे को पकड़ने के बहाने, अपना दायां हाथ, मेरे बेटे के पेट के ऊपर वहां पर रख दिए, जहां पर पहले से मेरा दायां हाथ था।
मेरा और उनका हाथ टच हुआ, लेकिन अब मैने हाथ हटाया नहीं, बस मुट्ठी भींच ली। वो मुझे हल्की खुली आंख से देखने लगे।
मैं अपने मन से हारने लगी थी। जो रहा था होने दे रही थी। लेकिन अंदर ही अंदर दिल मुझे रोक रहा था। लेकिन वासना का विचार इतना प्रबल था कि अब खुद को रोकना बहुत मुश्किल होने लगा था।
मैं बस हल्की सी आंख बंद किए ऐसे ही बैठे रही। ये देखने की कोशिश में की वो अब क्या करेंगे।
मैने महसूस किया कि वो अपना पैर फिर से मेरे पैर को छूने लगे थे। मेरे जिस्म में फिर से अजीब सी सनसनाहट दी महसूस होने लगी।
रात के 10 बज रहे होंगे। बस अपनी स्पीड से चल रही थी।
मेरे ससुर जी अब मेरे ओर को सिर रख कर, चादर के अंदर से मेरे मुट्ठी भींचे हुए हाथ को छूने लगे थे ।
मैं अपनी मुट्ठी टाइट करने लगी। अब मुझे बहुत अजीब होने लगा था, क्योंकि मेरे सुसर जी मेरे पैर को सहलाने लगे थे फिर से , लेकिन इस बार थोड़ा ज़ोर से मसल कर। उनको अब पता था कि मैं उठी हु और जो हो रहा है उसकी साक्षी भी हूं। शायद अब उनको ये विश्वास था कि मैं मना नहीं करूंगी।
वही मेरे समझ नहीं आया कि क्या करूं। दिल डर रहा था । लेकिन मेरे मन को बहुत मजा आने लगा था। वहीं ऐसा लग रहा था कि मेरे ससुर जी अपने पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं।
सोचा नहीं था खुद के ससुर जी, जो बोलते तक नहीं थे मुझसे सही से। आज उनके साथ , वो भी एक बस में।।।।।
मैं अपनी मुट्ठी नहीं खोली ।
वही मेरे ससुर जी जो शायद पूरे गरम थे, और थोड़ी मेरे हाथ को टच करने का बाद वो अपना दायां हाथ,सीधा मेरे पेट के तरफ ले जाने लगे। और ऐसे रिएक्ट करने लगे जैसे वो सोए है।
और धीरे धीरे अपने हाथ को मेरे पेट के तरफ ले जाने लगे।
और पूरे 3 मिनट लगाए।
और मेरे पेट के पास आ कर रख दिए अपना हाथ और 2 मिनट बाद जैसे ही वो मेरे पेट को सहलाए, मैं थोड़ा सा घबरा कर उठी। और एकदम से उठ गई। और उनको न देख कर इधर उधर लोगो को देखने लगी।
लेकिन वो पेट से हाथ नहीं हटाए। बस ऐसे दिखाने लगे जैसे वो सोए हुए हैं और उनका हाथ नींद में चला गया। और मैं भी वैसे ही पहले जैसे बैठ गई, अब मुझे समझ नहीं आया कि उनका हाथ हटाऊँ की नहीं, मैं एक नज़र उनके तरफ देखी वो सोने की एक्टिंग कर रहे थे आंख बंद किए हुए।
मैने सोचा शायद वो इतना ही आगे बढ़ पाएंगे । मैं बाहर को देख रही थी।
वो मुझे देखे कि में बाहर को देख रहीं हूं लेकिन वो रुके नहीं और तभी थोड़ी देर बाद मेरे ससुर जी फिर से मेरे पेट को सहला कर धीरे से मेरे सूट को ऊपर करने लगे, तो इस बार मेरे रोंगटे खड़े हो गए। और मैं अपने हाथ को ,अपने बेटे के पेट से हटा कर ससुर जी के हाथ को पकड़ ली टाइट से बाहर को देखते हुए।
और वैसे ही बाहर को देखते हुए बैठे रही। लेकिन मेरे ससुर जी जोर लगा कर मेरा सूट ऊपर कर ही दिए। मानो की अब वो खुल के मेरे जिस्म के साथ मन मानी करना चाहते थे।
मेरी डर और उत्तेजना से हालत खराब थी। मुझे डर था कि कोई हमको देख न ले।
वही मेरे ससुर जी मेरे सूट के अंदर हाथ डाल कर मेरे पेट को सहलाने लगे ,और मेरी नाभि को ढूंढने लगे अभी मध्यम अंगुली से।
मैं अपने ससुर जी की हरक़त से हैरान थी। वो तो बड़े ससुर जी से भी तेज़ निकले थे। उनको मानो अब मेरा डर नहीं था।
मेरी नाभि मेरे सलवार के नाडे से नीचे थी तो मेरे ससुर जी सीधा मेरे नाडे को खोलने लगे।
जिससे मैं हड़बड़ा गई। मैं इतना जल्दी उनको अपने सलवार के नाडे को खोलने नहीं दे सकती थी।
और मैं अपनी सीट से उठ गई, और ईधर उधर देख कर डरे हुए फेस से अपने ससुर जी को देखी। वो भी अब आंख खोल दिए और पहले बार हम दोनों की नज़र मिली।
वो ऐसा दिखा रहे थे ,जैसे कुछ हुआ न हो?
ससुर : क्या हुआ? ( थोड़ा उठ के मेरे बेटे को पकड़ कर जो मेरे उठने से गिरने वाला था)
तो फिर मैं बात को हलका करने को बोली।
रि: ये ऐसी बहुत तेज़ चल रहा है, कम कर दीजिए। हो नहीं रहा।( ऊपर को इशारा करते हुए)
तो वो एसी को कम कर दिए, और फिर में बैठ गई, और बाल सही करते हुए बाहर को देखने लगी।
जबकि मेरे ससुर जी मुझे देख रहे थे। वो मुझसे कुछ बोलने चाहते थे लेकिन बोल नहीं पा रहे थे।
तभी मेरा बेटा उठ कर रोने लगा तो मेरे ससुर जी मुझे धीरे से बोले।
ससुर: भूख तो नहीं लगी इसे? दूध पिला दे ।( मेरे तरफ देख कर)
तो मैं थोड़ा शर्म से बोली।
रि: नहीं ऐसे ही रो रहा होगा। ( उसको अपने तरफ लेते हुए)
मेरे ससुर जी मुझे देख रहे थे। और मैं उनको तिरछी नजर से।
मुझे ऐसा लग रहा था कि वो मेरे तरफ़ पूरे आकर्षित हो चुके हैं। मुझे अजीब भी लग रहा था और डर भी। शायद पता तो उनको भी था कि मुझे सब पता है जो वो कर रहे थे।
तो वो थोड़ा सही से बैठे और मेरे तरफ आ कर बोले।
ससुर: अगर यहां दिक्कत हो रही है तो ऊपर की सीट के लिए बोल कर आऊं? ( मेरे साइड फेस को देख कर)
तो मेरे मुंह से निकल गया।
रि: नहीं वहां कोई और होगा। ( बिना उनको देखे , बेटे को सही से सुला कर)
ससुर: नहीं पूरी सीट के लिए। आराम से लेट जाएंगे अब मेरे भी कमर में दर्द हो गया है। नहीं तो उतर जाते हैं कही, बस का सफ़र करने में परेशानी होती है।
मैं उनकी बात सुन कर दंग रह गई। वो बस से उतरने को कह रहे थे। मैं सोच रही थी कि इतने रात हम लोग कहां जाएंगे।
मुझे न जाने क्या हुआ और में बोली
रि: नही रहने दीजिए । पता नहीं देगा भी की नहीं। रात की ही बात है कट जाएगी।
मेरे ससुर जी मुझे कुछ न बोले। और मैं फिर से बाहर को देखते हुए सोचने लगी कि ससुर जी ऐसा क्यों किए? तभी फिर से लगभग 5 मिनट बाद फिर से हाथ सीधा मेरे पेट पर रख दिए।
मैं उठी हुई थी और बाहर को देख रही थी। वही मुझे कुछ न बोलते देख वो पहले बिना पूछे मेरे पीले रंग के सूट को ऊपर किए और अपना हाथ अंदर मेरे नग्न पेट पर डाल दिए।
मैं एक बार इधर उधर देखी। और फिर से बाहर को देखने लगी। और जैसे ही वो हाथ को मेरे उरोज के तरफ ले जाने लगे तो मैं धीरे से उनका हाथ को सूट और के बाहर से पकड़ ली। मेरे हाथ भी चादर के अंदर ही थे।
और फिर मैं इधर उधर देखने लगी। सब लगभग सोए थे। बगल वाले युगल भी शायद अपने चरम पे पहुंच के सो चुके थे। लेकिन मेरे ससुर जी आंख बंद किए , धीरे धीरे मेरे ब्रा के ऊपर हाथ ले आए।
मैं बस उनके हाथ पर हाथ रखी थी। वही नीचे , वो मेरी पायल में अपने पैरों की अंगुली को मिलाने लगे। मैं बस बाहर को देख रही थी।
तभी वो मेरे ब्रा के अंदर हाथ डालने लगे और एक दम से मेरे निप्पल को मसल दिए ,जो पहले से ही फुल चुका था और दबाते ही उस पर से दूध की धार फुट पड़ी। और मैं अपनी आंख जोर से बंद कर दी। और अपने ससुर जी का हाथ बाहर को खींचने लगी बिना उनको देखे अपने होंठों को दबाए हुए।
तभी वो खलासी आ गया। अंधेरे में वो कब आया पता नहीं चला।
मेरे ससुर जी मेरे उरोज को दबाना चालू कर दिए । और मैं मस्ती से होंठ दबा कर आंख बंद किए , ना ना ना में सिर हिलाने लगी।
तभी मेरी नजर उस खलासी पर पड़ी जो हम दोनों को देख रहा था। मैं एक दम से ससुर जी का हाथ खींच कर चादर मुंह में डाल कर धक ली।
मेरे ससुर जी भी थोड़ा हड़बड़ा गए तो वो मुस्कुरा कर बोला।
खलासी: अंकल जी आइए, शीट दिखा दु।( हंसी दबा कर)
मेरे तो हाथ पैर ठंडे पड़ गए थे, पता नहीं वो कब से हमको देख रहा होगा।
मेरे ससुर जी पता नहीं उससे क्या बात किए और थोड़ा देर बाद आए।
ससुर: चल वो उधर 4 नंबर की शीट खाली है। साला बताया भी नहीं । सब साले ऐसे ही है।( चादर और बैग लेते हुए)
मेरी गोद में मेरा बेटा था , मैं उठ नहीं पा रही थी। तभी मेरे ससुर जी वापस आए और बोले।
ससुर: अरे क्या हुआ?
ऐसा लग रहा था वो बहुत जल्दी में है। मैं उनके तरफ अपने बेटे को बढ़ाया। जिससे मेरा दुपट्टा भी उनके पास चला गया। और मेरे मोटे उरोज मेरे ससुर जी के सामने आ गए।
मैं जल्दी से नज़र बचा कर अपने दुपट्टे को डाल दी अपने ऊपर, और अपने ससुर जी के पीछे पीछे चलने लगी।
वही मैंने देखा वो प्रेमी युगल,एक दूसरे की बाहों में चैन की नींद ले रहा था।
तभी बस के मिडिल में ,एक ऊपर की शीट खाली थी, खलासी मेरे ससुर जी को बोला
खलासी: यही सो जाओ अंकल, आप दोनों के लिए हो जाएगी जगह।( अंदर की लाइट जला कर)
वो खलासी मुझे गौर से देख रहा था , मैं सच में उससे नज़र नहीं मिला पाई।
तभी मेरे ससुर मुझे बोले।
ससुर: तू ऊपर चढ़ , फिर उसको देता हु।
तो मैने सीढ़ी से ऊपर चढ़ी। मेरे ससुर एक हाथ से उस खलासी के सामने ही मेरे गुदाज़ कुल्हों को सहारा दिए और मैं ऊपर चढ़ गई।
वो एक बॉक्स सा था, फिर मेरे ससुर जी ने मेरे बेटे को मुझे दिया। मैं हाथ आगे करके अपने बेटे को ले ली।
और फिर मेरे ससुर जी मुझे बोले।
ससुर: सब सामान ले आई न। ( नीचे से मुझे देख कर)
रि: जी ले आई।( सिर पर पल्लू डाल कर)
फिर मेरे ससुर वही पर खड़े रहे। शायद ये सोच कर कि वो मेरे साथ सोए की नहीं। शायद अभी उनका फ्लो टूट चुका था। और यह सोना मतलब वो सारी रात मेरे जिस्म से खेलते।
मेरे समझ में नहीं आया कि मैं क्या बोलूं।तभी ससुर जी बोले।
ससुर: कोई परेशानी तो नहीं है ना।( आगे को मुंह करके)
रि: नहीं ठीक है। आप भी यही सो जाइए। क़मर दर्द होगी आपकी।( बेटे का डायपर बदलते हुए)
मानो आज उनकी मुराद पूरी हो गई हो, ससुर जी बिना यहां वहां देखे ऊपर चढ़ गए। मैं अपने बेटे को अपने ओर खिसका दी।
फिर मेरे ससुर जी उस बॉक्स का दरवाजा सरका दिए।
अब उस बॉक्स में , मैं, मेरे ससुर जी और मेरा बेटा थे।
मैं बैठे हुए सिर नीचे किए एक घुटने को मोड कर उस पर सिर रख कर बाहर को देख रही थी। और वो याद कर रही थी जो मेरे ससुर जी अभी कर रहे थे।
तभी मेरे ससुर जी बोले।
ससुर: तु सो जा बहु। खाली कहां बैठे रहेगी।
रि: नहीं अभी नींद नहीं आ रही।( बाहर को देख के शर्म से)
मैं अब उनके सामने कैसे सोती वो भी तब ,जब मुझे पता है कि वो मेरे जिस्म से खेलना चाहते हैं।
तभी वो बोले ।
ससुर : तुझे परेशानी हो रही है तो में नीचे बैठ जाता हूं तू सो जा।
( दरवाजा खोलते हुए)
तो मैं एक दम से बोली।
रि: नहीं नहीं।।बहुत जगह है। आप भी सो जाइए। ( अपने पैर नीचे को करके ,खिड़की के साइड सोते हुए)
और मैं अपने बेटे को बीच में सुला कर दूसरे तरफ करवट ले कर सोने लगी।
मेरे ससुर जी किसी अधेड़ बुन में थे। वो बार बार मुझे देखते , तो कभी मेरे पैरों को, और फिर धीरे से लेट गए। मेरे तरफ पीठ करके।
मुझे लगा कि शायद उस टाईम वो गलती से मुझे छू दिए होंगे। शायद वो भावनाओं में बह गए होंगे।
तभी वो सोए ही थे । और मेरा बेटा नींद में रोने लगा। तो मैं उसको चुप कराने लगी हाथ पीछे करते हुए
।
लेकिन वो जोर जोर से रोने लगा। मैं पलट गई ।
और उसको चुप कराते हुए, अपने ऊपर चादर डाल कर लेटे लेटे अपने सूट को ऊपर की और अपने ससुर जी के सामने उसको चादर से ढक के अपना दूध पिलाने लगी।
मेरा बेटा ऊं ऊं करते हुए , चप चप की आवाज से दूध पीने लगा।
वही मेरे ससुर जी पलटकर मुझे देखने लगे।।जबकि मैं शर्म से उनको नहीं देख रही थी।
तभी मुझे एहसास हुआ कि उनका एक पैर मेरे तरह को आ कर मेरे पैर से टच कर रहा है।
मैं धीरे से पैर पिछे को कर दी हल्का सा घुटने से मोड़ कर ।
मेरी धड़कन तेज़ होने लगी। शायद वो मुझसे ज़बरदस्ती भी करते तो इस बॉक्स में , मैं तो कुछ कर ही नहीं पाती।
तभी वो अपना पैर मुझे देख कर फिर से मेरे तरफ लाने लगे।
इस बार मैंने पैर और पीछे नहीं किए। बल्कि में अपने बेटे को थप थापा कर सुलाने लगी।
वो लगातार मुझे देख रहे थे।। मानो उनके अंदर कोई आग जल रही हो। लेकिन मैं उनको नहीं देख रही थी शर्म से।
जारी रहेगा।।