फिर से एक अप्रतिम अद्भुत और रोमांचक विस्मयकारी अपडेट हैं भाई मजा आ गया#175.
“पर कैसे? समुद्री घोड़ा तो अपना काम करके वापस झील में चला गया है।” सुयश ने कहा- “अब इतने बर्फ जैसे पानी में जाकर कौन उसे ढूंढ पायेगा?”
“मैं स्वयं जाऊंगी।” शैफाली ने दृढ़ता से कहा- “मैं इसके पहले भी पेंग्विन के पीछे बर्फ में गई थी, उस समय मुझ पर बर्फ की ठंडक का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था।”
यह सुनकर सुयश ने अपना सिर हिलाकर शैफाली को झील के अंदर जाने की इजाजत दे दी।
सुयश की इजाजत मिलते ही शैफाली ने अपने जूते बाहर उतारे और उसी रास्ते से झील के अंदर दाखिल हो गई, जिस रास्ते से वह समुद्री घोड़ा बाहर आया था।
सच में शैफाली को बर्फ से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, वह आसानी से इतने ठंडे पानी में तैर रही थी।
झील में प्रवेश करते ही शैफाली ने एक डुबकी मारी और पानी के अंदर अपनी नजरें घुमाना शुरु कर दिया। शैफाली को अब कुछ दूरी पर एक खूबसूरत परी की एक मूर्ति दिखाई दी।
यह मूर्ति पानी में एक स्थान पर खड़ी थी। यह मूर्ति देखने में बिल्कुल सजीव प्रतीत हो रही थी।
परी के शरीर पर बैंगनी रंग की एक बहुत ही खूबसूरत ड्रेस थी। उसने अपने हाथ में एक लंबा सा राजदंड भी पकड़ रखा था।
उस परी के चारो ओर कुछ जलपरियां, अपने हाथ में त्रिशूल लेकर घूम रहीं थीं।
ऐसा लग रहा था कि जैसे वह उस जलपरी की रक्षा कर रहीं हों या फिर उसकी परिक्रमा लगा रहीं हों। पर उन्होंने शैफाली से कुछ नहीं कहा।
“यह तो पानी के नीचे भी कोई तिलिस्म बना है?” शैफाली ने अपने मन में सोचा- “लगता है उस परी के हाथ में जो राजदण्ड है, उसमें अवश्य ही इस द्वार का कोई राज है, पर पहले मुझे वह कार्य कर लेना चाहिये, जिसके लिये मैं इस स्थान पर आयी हूं।”
अब शैफाली परी को छोड़कर उस समुद्री घोड़े को ढूंढने लगी। कुछ ही देर में शैफाली की निगाह में वह समुद्री घोड़ा आ गया, जो कि मिसगर्न मछली के बीच छिपकर पानी में तैर रहा था।
शैफाली उस समुद्री घोड़े की ओर बढ़ गयी। समुद्री घोड़े के पास पहुंचकर शैफाली ने उसे पकड़ने की कोशिश की, पर शैफाली के आगे बढ़ते ही वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो गया।
पहले प्रयास में शैफाली नाकाम रही। शैफाली ने फिर से पानी में आगे बढ़कर उस समुद्री घोड़े को पकड़ने की कोशिश की, पर इस बार भी वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो गया।
अब यह सिलसिला शुरु हो गया था, जब भी शैफाली आगे बढ़ती, वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो जाता।
यह देख शैफाली ने तेजी से अपना दिमाग लगाना शुरु कर दिया।
तभी शैफाली की नजर उस समुद्री घोड़े के आगे-पीछे घूम रही मिस गर्न मछली की ओर गई।
अब शैफाली के दिमाग में एक आइडिया आ गया था। शैफाली इस बार ध्यान से समुद्री घोड़े को देखती रही, जैसे ही एक मिसगर्न मछली, उस समुद्री घोड़े के ठीक पीछे पहुंची, शैफाली ने ठीक उसी समय पर, समुद्री घोड़े की ओर छलांग लगा दी।
हर बार की तरह इस बार भी समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे जाने के लिये बढ़ा, पर वह पीछे जा नहीं पाया और मिसगर्न मछली से टकराकर वहीं रह गया।
तभी शैफाली ने झपटते हुए उस समुद्री घोड़े को पकड़ लिया। अब शैफाली ने उसकी आँखों को देखा।
समुद्री घोड़े की दोनों आँखें 2 दिशा में थीं, जिसे शैफाली ने अपने हाथों से सही कर दिया और इसके बाद उस समुद्री घोड़े को वहीं झील के पानी में छोड़, वह झील की सतह की ओर चल दी।
झील की सतह पर सभी बेसब्री से शैफाली के आने का इंतजार कर रहे थे। पानी से शैफाली का चेहरा निकलते देख सभी खुश हो गये।
शैफाली ने अपना सिर हिलाकर सभी को काम पूरा होने की खबर दे दी।
शैफाली की बात सुन क्रिस्टी ने एक नजर ऐलेक्स की ओर डाली, ऐलेक्स अब अपने रुप में तो वापस आ गया था, पर वह अब भी बर्फ की
मूर्ति बना दिखाई दे रहा था।
“ये ऐलेक्स तो अब बर्फ का बन गया, अब इसे बर्फ से कैसे सही करें?” क्रिस्टी ने दुखी होते हुए कहा- “हो ना हो इस सेन्टौर में ही कोई चक्कर है, इसी की वजह से ऐलेक्स अभी तक सही नहीं हुआ है।” यह कहकर क्रिस्टी उस सेन्टौर के पास जाकर उसकी मूर्ति को जगह-जगह से हिलाकर देखने लगी।
क्रिस्टी से किसी को ऐसी आशा नहीं थी, इसलिये सभी उसे ऐसा करने से रोकने के लिये भागे।
सभी जानते थे कि क्रिस्टी की एक गलत हरकत उन्हें हमेशा के लिये इस तिलिस्म में कैद कर सकती है।
तभी क्रिस्टी के मूर्ति के हिलाने की वजह से सेन्टौर के हाथ में पकड़ा कंटक जमीन पर गिर गया और इसी के साथ सबके सामने एक मुसीबत और खड़ी हो गई।
सेन्टौर जीवित हो गया था और सबको खूनी नजरों से देख रहा था।
“हो गया काम तमाम, बड़ी मुश्किल से अभी उस समुद्री घोड़े से बचे थे, अब यह सेन्टौर जाग गया।” तौफीक ने क्रिस्टी पर नाराज होते हुए कहा।
क्रिस्टी एक पल में ही अपनी गलती को समझ गयी, पर अब क्या हो सकता था? तभी उस सेन्टौर ने अपने पैर को बर्फ की जमीन पर जोर से पटका, उसके ऐसा करने से एक जोर की आवाज हुई और इसी के साथ झील में मौजूद मिसगर्न मछलियां तेजी से गति करने लगीं।
यह देख शैफाली ने चीखकर सबको आगाह करते हुए कहा- “सब लोग सावधान हो जाओ, भूकंप आने वाला है।” तभी पूरी बर्फ की धरती हिलने लगी और बर्फ के उस हिस्से में मौजूद ऊंची चट्टानें गिरना शुरु हो गईं।
सभी किसी प्रकार उन चट्टानों से बचने की कोशिश कर रहे थे, तभी एक बड़ी चट्टान ऐलेक्स की ओर गिरने लगी, यह देख सभी के मुंह से चीख निकल गई।
इतने कम समय में कोई भी ऐलेक्स को बचा नहीं सकता था। जोर से गड़गड़ाती वह चट्टान ऐलेक्स के ऊपर आकर गिरी, पर तभी एक चमत्कार हुआ, वह भारी चट्टान ऐलेक्स के शरीर से टकराकर उसमें
समा गई।
“यह बर्फ की चट्टान ऐलेक्स के शरीर के अंदर कैसे चली गई।” जेनिथ ने आश्चर्य से ऐलेक्स की ओर देखते हुए कहा।
तभी एक और चट्टान ऐलेक्स के शरीर से टकराई, इसका हस्र भी पहले वाली चट्टान के जैसा हुआ, वह चट्टान भी ऐलेक्स के शरीर में समा गई।
यह देख सुयश ने सबसे चिल्लाकर कहा- “सभी लोग ऐलेक्स के शरीर की ओट में छिप जाओ, नहीं तो यह गिरती हुई चट्टानें हमें पीस देंगी।”
सुयश की बात सुन सभी ऐलेक्स की ओर भागे और उसके पीछे जाकर छिप गये।
ऐलेक्स के आसपास बहुत सी चट्टानें गिर रहीं थीं, परंतु समय पर सुयश का दिमाग काम करने की वजह से सभी सुरक्षित थे।
उधर जोर-जोर से सेन्टौर के पैर पटकने की वजह से झील की बहुत सी मछलियां उछलकर झील के बाहर आ गईं थीं।
“कैप्टेन, हमें जल्द से जल्द इस सेन्टौर का इलाज करना होगा, नहीं तो यह हमें चुटकियों में मसल देगा।” क्रिस्टी ने गुस्साये हुए सेन्टौर की ओर देखते हुए कहा।
तभी तौफीक की निगाह सेन्टौर के गिरे अस्त्र कंटक पर गई। उसे देखकर तौफीक बोला- “अगर सेन्टौर का यह अस्त्र भी हमारे हाथ लग जाये तो कुछ देर तक तो इससे बचा ही जा सकता है? पर वह भी कमबख्त बिल्कुल उसके बगल में ही गिरा पड़ा है।”
तौफीक की बात सुन शैफाली की आँखें सिकुड़ गईं- “कैप्टेन अंकल, कंटक तो सेन्टौर के बगल में ही गिरा पड़ा है, तो फिर यह सेन्टौर उसे उठा क्यों नहीं रहा? उसे उठाने के बाद तो यह और विनाश कर सकता है।”
“इसी कंटक के इसके हाथ से निकलने के बाद ही तो यह जिंदा हुआ था।” क्रिस्टी ने कहा।
“इसका मतलब यदि हम इस कंटक को दोबारा से इसके हाथ में पकड़ा दें, तो यह सेन्टौर फिर से बर्फ का बन सकता है।” शैफाली ने कहा।
शैफाली की बात सुन सुयश ने तौफीक की ओर देखते हुए कहा- “तौफीक, तुम इस सेन्टौर का ध्यान भटकाकर उसे दूसरी दिशा में ले जाओ, तब तक मैं इस कंटक को उठा लूंगा।”
सुयश की बात सुनकर तौफीक ने अपना सिर हिलाया और ऐलेक्स की ओ से बाहर निकल, सेन्टौर से कुछ दूरी पर जाकर दौड़ने लगा।
सामने तौफीक को दौड़ते देख सेन्टौर तौफीक की ओर चल दिया। जैसे ही सेन्टौर का चेहरा दूसरी ओर हुआ, सुयश तेजी से कंटक की ओर भागा।
एक पल में ही सुयश कंटक के पास पहुंच गया, मगर जैसे ही सुयश ने कंटक को उठाया, वह भी बर्फ की मूर्ति में परिवर्तित हो गया।
यह देख शैफाली और तौफीक दोनों ही आश्चर्य से भर उठे। अब दोनों के पास कोई और तरीका नहीं बचा था।
सूर्यपुत्र: (30 वर्ष पहले.....जनवरी,1972, प्रातः काल, अयोध्या, भारत)
“दादा जी, आप हमेशा बंदूक लेकर क्यों चलते हो?” नन्हें सुयश ने अपने दादा सूर्य नारायण सिंह को सम्बोधित करते हुए पूछा- “क्या आपको बहुत डर लगता है?”
सुयश की बात सुन सूर्य नारायण सिंह के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई।
“नहीं हमें डर नहीं लगता, यह हम अपने वंश की शान के लिये, अपने साथ लेकर चलते हैं। हम सूर्यवंशी राजपूत हैं, मेरे दादा जी तो हाथ में तलवार लेकर चलते थे। अंग्रेज भी उन्हें देख थर-थर कांपते थे, पर अब
समय बदलने के साथ तलवारों का चलन खत्म हो गया और तलवारों का स्थान इस अग्नि मारक बंदूक ने ले लिया।”
सुयश से बात करते-करते सूर्य नारायण सिंह, घर के आंगन में खड़ी एक खुली जीप में बैठ गये और सुयश को उन्होंने अपने बगल में बैठा लिया।
“मैं जब बड़ा होऊंगा, तो अपने हाथ में तलवार ही लेकर चलूंगा, बंदूक तो डाकू लोग चलाते हैं।” नन्हें सुयश ने अपने दिल के उद्गार प्रकट किये।
“अच्छा-अच्छा छोटे युवराज, आप तलवार लेकर ही चलना, पर वादा करो कि कुलदेवता के मंदिर में पूजा के समय, आज आप मुझे तंग नहीं करोगे।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के बालों में हाथ फेरते हुए कहा।
“ठीक है, मैं आपको नहीं परेशान करुंगा, पर आप भी वादा करो कि वापस आने के बाद आप मुझे कैम्पा कोला पिलाओगे।” सुयश ने अपनी जुबान से चटकारा लगाते हुए कहा।
“ठीक है, मैं वादा करता हूं।” सूर्य नारायण सिंह ने अपनी हथेली को सुयश की नन्हीं हथेली से टकराते हुए कहा।
तभी दूसरी जीप में कुछ महिलाएं पूजा की थाली और कुछ पूजा की सामग्री लेकर बैठने लगीं।
“अरे अभय, तुम अपनी जीप चलाओ, बाकी लोग पीछे से आते रहेंगे। अगर हम थोड़ा जल्दी भी मंदिर पहुंच गये, तो कोई परेशानी की बात नहीं।” सूर्य नारायण सिंह ने जीप के ड्राइवर से कहा।
“जी मालिक।” सूर्य नारायण सिंह की बात सुन ड्राइवर ने जीप स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।
“अच्छा दादा जी, आप ये बताओ कि आज आप रात को मुझे कौन सी कहानी सुनाओगे?” सुयश ने अपने दादा जी से पूछा।
“मैं....मैं आज तुम्हारी सबसे प्रिय यति और उड़ने वाले घोड़े की कहानी सुनाऊंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के गाल खींचते हुए कहा।
“नहीं दादा जी आज मुझे भगवान सूर्य की कहानी सुननी है।....वह कहानी सुने बहुत दिन बीत गये।” सुयश ने अपने दिमाग के कोनों को खंगालते हुए कहा।
“ठीक है, मैं आज तुम्हें अपने कुल -देवता भग…न सूर्य की ही कहानी सुनाऊंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
रास्ते भर सुयश ऐसे ही अपने दादा जी से कुछ ना कुछ पूछता रहा। आधा घंटे के ड्राइव के बाद आखिर कुलदेवता का मंदिर आ ही गया।
अभय ने जीप को मंदिर के प्रांगण के बाहर ही रोक दिया। सूर्य मंदिर एक पर्वत की चोटी पर बना था। सुयश अपने दादा जी के साथ मंदिर के प्रांगण में आ गया।
मंदिर के मुख्य द्वार पर 7 घोड़ों के रथ पर बैठे सूर्यदेव की मूर्ति लगी थी। शिखर पर सूर्य के मुख की ज्वाला उगलती आकृति बनी थी।
“अरे दादा जी यह आकृति तो बिल्कुल वैसी ही है, जैसी आपके दाहिने हाथ की कलाई पर बनी है।” सुयश ने आश्चर्य से दादा जी की कलाई देखते हुए कहा।
“हां बेटा, यह हमारे कुलदेवता का चिन्ह है, जिसे मैंने अपनी कलाई पर बनवा लिया था। क्या यह चिन्ह आपको पसंद है?” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश से पूछा।
“हां दादा जी मुझे यह चिन्ह बहुत पसंद है, मैं एक दिन यही चिन्ह अपनी पूरी पीठ पर बनवाऊंगा।” सुयश ने दादा जी के हाथ पर बने सूर्य चिन्ह को अपनी नन्हीं हथेली से सहलाते हुए कहा।
“ठीक है, जब तुम बड़े होकर कलेक्टर बन जाओगे, तो मैं यह सूर्य चिन्ह तुम्हारे पीठ पर बनवा दूंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने चारो ओर फैले पर्वतों को देखते हुए कहा।
“कलेक्टर? ये कलेक्टर क्या होता है दादा जी?” सुयश ने पूछा।
“कलेक्टर पूरे जिले का सबसे बड़ा ऑफिसर होता है।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश की ओर देखते हुए जवाब दिया।
“नहीं-नहीं दादा जी, मैं कलेक्टर नहीं बनूंगा, मैं तो एक बहुत बड़े से पानी के जहाज का कप्तान बनूंगा और समुद्र की विशाल लहरों में अपना जहाज लेकर घूमूंगा।” सुयश ने अपनी कल्पना को उड़ान देते हुए कहा।
“अरे वाह, छोटे युवराज, आपकी सोच तो कमाल की है।” यह कहकर सूर्य नारायण सिंह ने सुयश को अपनी गोद में उठा लिया और चलते हुए मंदिर के प्रांगण के किनारे आ गये।
उस स्थान से उगते हुए सूर्यदेव बिल्कुल साफ नजर आ रहे थे। सूर्य की लालिमा प्रकाश का रुप ले, संपूर्ण आभा मंडल को दैदीप्यमान कर रही थी।
तभी मंदिर का एक पंडित अपने हाथ में 2 तांबे के लोटे में, जल लेकर आ गया। एक तांबे का लोटा थोड़ा छोटा था, जो कि निश्चित ही सुयश के लिये था।
“चलो बेटा, अब सूर्य को अर्घ्य दो, पर ध्यान रहे, यह पात्र तुम्हारे दोनों हाथों में सिर से ऊपर की ऊंचाई पर होना चाहिये और जल की धार टूटनी नहीं चाहिये। इस प्रकार करने से सूर्य की पहली जीवन दायिनी किरण स्वच्छ जल को पारकर हमारे शरीर से टकराती है और हमें सभी प्रकार के रोग से मुक्त करती है।” यह कहकर सूर्य नारायण सिंह ने छोटा लोटा सुयश की ओर पकड़ा दिया और बड़े लोटे से स्वयं सूर्य को अर्घ्य देने लगे।
सुयश ने भी अपने दादा जी को देखते हुए ठीक उसी प्रकार से किया, जैसा कि दादा जी ने कहा था।
तभी दूसरी जीप भी आ गई। यह देखकर सूर्य नारायण सिंह ने सूर्य को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उन लोगों की ओर बढ़ गये।
सूर्य नारायण सिंह ने अभय को सुयश का ध्यान रखने के कार्य पर लगा दिया।
दादा जी के जाने के बाद नन्हें सुयश ने भगवान सूर्य को देखा, सूर्य की लालिमा सुयश को बहुत भली लग रही थी।
धीरे-धीरे सूर्य का प्रकाश बढ़ता जा रहा था, पर सुयश अभी भी अपनी नजरें सूर्य से नहीं हटा रहा था, ऐसा लग रहा था कि जैसे सूर्य से सुयश का कोई बहुत गहरा रिश्ता हो।
तभी अचानक सुयश को सूर्य, बैंगनी रंग का होता दिखाई दिया। यह देख सुयश अचकचा गया, पर तभी सुयश को अपनी नाक पर बैठी एक नीले रंग की खूबसूरत सी तितली दिखाई दी।
उसी तितली के पंखों की वजह से सुयश को सूर्य का रंग बदलता हुआ दिखा था।
सुयश ने अपने हाथों से उस तितली को पकड़ने की कोशिश की, पर वह तितली सुयश की नाक से उड़कर दूर चली गई।
उस तितली का रंग इतना प्यारा था, कि सुयश का ध्यान अब तितली की ओर आकृष्ट हो गया था।
सुयश अब मंदिर के प्रांगण में तितली के पीछे-पीछे भागकर उसे पकड़ने की कोशिश करने लगा।
उधर अभय को जीप में रखा एक पूजा का सामान याद आ गया, उसने एक बार सुयश को खेलते हुए देखा और फिर बाहर जीप में रखें सामान को लाने के लिये चला गया।
सुयश अभी भी तितली के पीछे-पीछे भाग रहा था। तितली कभी एक स्थान पर बैठती, तो कभी दूसरे स्थान पर।
इस बार तितली मंदिर के प्रांगण के किनारे लगे एक छोटे से पेड़ की शाख पर जा बैठी।
सुयश अपना हाथ बढ़कार तितली को पकड़ने की कोशिश करने लगा, पर वह पेड़ की डाल सुयश के नन्हें हाथों से थोड़ा दूर थी, इसलिये सुयश ने अपना एक पैर मंदिर के प्रांगण की रेलिंग से बाहर निकाल लिया।
पर इससे पहले कि सुयश उस नीले रंग की तितली को पकड़ पाता, उसका पैर फिसला और वह पहाड़ से नीचे की ओर गिरने लगा।
सुयश के मुंह से चीख निकल गई। तभी सूर्य की किरणों की चमक बढ़ गई और सुयश, बिना किसी सहारे के हवा में झूलने लगा।
उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे वह सूर्य की किरणों से बने झूले पर बैठा हो।
नन्हें सुयश को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। तभी सुयश को अपने सामने एक दिव्य प्रकाशपुंज स्वरुप एक पुरुष दिखाई दिया।
उसे देख सुयश ने पूछ ही लिया- “आप कौन हो?”
“मैं सूर्यदेव हूं।” सूर्यदेव ने कहा- “मैंने ही तुम्हें इस ऊंचे पर्वत से गिरने से बचाया है।”
“आपने मुझे क्यों बचाया?” सुयश के शब्दों में एक बालरस झलक रहा था।
“क्यों कि मैंने तुम्हें अपने पुत्र रुप में स्वीकार किया है, फिर भला मैं तुम्हें मरने कैसे देता?” सूर्यदेव ने कहा।
“आप इतनी जल्दी उतनी ऊंचाई से मेरे पास कैसे आ गये?” सुयश ने सूर्यदेव की ओर देखते हुए पूछा।
“क्यों कि मेरी किरणों से तेज चलने वाली चीज अभी इस ब्रह्मांड में नहीं है।....अपना ध्यान रखना सुयश।” सूर्यदेव ने कहा और सुयश को उठाकर, मंदिर के प्रांगण के बाहर लगी घनी झाड़ियों पर बैठा दिया। इसी के साथ सूर्यदेव हवा में कहीं गायब हो गये।
उधर अभय जैसे ही मंदिर के प्रांगण में पहुंचा, उसे सुयश कहीं दिखाई नहीं दिया। घबराकर अभय ने मंदिर के प्रांगण के किनारे जाकर नीचे की ओर देखा।
नीचे की ओर देखते ही अभय की जान सूख गई क्यों कि सुयश इस समय नीचे एक झाड़ी में फंसा दिखाई दे रहा था।
अभय ने घबरा कर अपने चारो ओर देखा, पर उसे आसपास कोई नजर नहीं आया, यह देख अभय ने जल्दी से नीचे लटककर, सुयश का एक हाथ पकड़ा और उसे ऊपर खींच लिया।
सुयश को सही सलामत देख अभय की जान में जान आयी, पर उसे यही डर था कि कहीं सुयश, सूर्य नारायण सिंह को यह सारी बात बता ना दे।
“देखो बेटा, तुम यह बात किसी को बताना नहीं, मैं तुम्हें ढेर सारी टॉफियां दूंगा।” अभय ने सुयश को फुसलाते हुए कहा।
टॉफियों की बात सुन सुयश तुरंत मान गया। 2 घंटे के बाद सभी पूजा करके वापस घर की ओर चल दिये।
“तुम्हें भगवान सूर्यदेव कैसे लगे सुयश?” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश को अपने से चिपटाते हुए पूछा।
“अच्छे लगे, पर जब उन्होंने मुझे गोद में उठाया, तो मुझे बहुत अच्छा लगा।” सुयश ने भोलेपन से कहा।
“अच्छा, तो भगवान सूर्य ने तुम्हें गोद में उठाकर क्या कहा?” सूर्य नारायण सिंह ने हंसते हुए पूछा।
“उन्होंने कहा कि वो मुझे ढेर सारी टॉफियां देंगे।.....नहीं-नहीं....ये तो अभय अंकल ने कहा था.....उन्होने कहा था.... उन्होने कहा था...... क्या दादा जी आपने तो सब भुलवा दिया?” सुयश ने कहा और दादा जी के सीने से चिपक गया।
“शैतान बच्चा, 2 मिनट में कहानियां बनाकर सुनाने लगता है।” सुयश की बात सुन सूर्य नारायण सिंह मुस्कुराए और फिर से सुयश के सिर पर हाथ फेरने लगे।
सुयश अब दादा जी से ऐसे चिपका था, जैसे कि वह सूर्य नारायण सिंह ना होकर साक्षात सूर्यदेव हों।
जारी रहेगा_____![]()

