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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

Dhakad boy

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#181.

नटखट हनुका:
(20,005 वर्ष पहले....... नीलमहल, माया लोक, हिमालय)

दिव्यशक्तियां प्राप्त करने के बाद माया ने 15 लोकों का निर्माण कार्य शुरु कर दिया था।

सबसे पहले माया ने माया लोक की स्थापना की। इस माया लोक को उसने, अपने और नीलाभ के निवास स्थान के रुप में चुना।

इस माया लोक में माया ने एक बहुत ही सुंदर नीलमहल की रचना की, जिसमें कि नीले रंग को सर्वोत्तम स्थान दिया गया था।

नीलमहल पूर्णरुप से सोने का बना था, जिसमें जगह-जगह पर नीलम रत्न जड़े हुए थे। महल के सभी पर्दे भी नीले रंग के ही थे। माया ने यह महल नीलाभ को समर्पित किया था।

हनुका अब 0x06x0 वर्ष का हो गया था। आज प्रातः काल का समय था। माया ने सुबह उठकर, बगल में सो रहे नन्हें हनुका को देखा और फिर स्नान करने चली गईं।

माया के जाते ही हनुका ने अपनी आँखें खोल दीं। आँखें खुलते ही प्रतिदिन की भांति, मस्तिष्क में शैतानियां कुलबुलाने लगीं।

अब वह उठकर बिस्तर से नीचे आ गया। हनुका की नजर अब सो रहे नीलाभ पर थी।

शांत भाव से सो रहे नीलाभ को देख हनुका से रहा ना गया, अब उसकी नजरें कमरे में चारो ओर घूमने लगीं।
तभी हनुका की नजर माया द्वारा बनाई गई, एक चित्रकारी की ओर गया, जिसमें माया ने कूची से प्रकृति के रंगों को दर्शाया था।

हनुका दबे पांव उस चित्र के पास गया और उसके बगल रखे, विभिन्न प्रकार के रंगों से भरी थाली को उठा लिया।

अब हनुका धीरे-धीरे नीलाभ के पास पहुंचा और अपने नन्हें हाथों से नीलाभ के चेहरे पर अपनी कला का प्रदर्शन करने लगा।

नीलाभ इस समय गहरी निद्रा में था, उसे पता भी ना चला, कि कब उसका चेहरा एक कला प्रदर्शनी की भांति, विविध रंगों से सज चुका है।
कुछ ही देर में हनुका अपने प्रदर्शन से संतुष्ट हो गया।

तभी हनुका को स्नान घर का द्वार खुलने का अहसास हुआ। हनुका इस आवाज को सुन तेजी से, पलंग के नीचे छिप गया।

माया स्नान करके निकली और पूजा घर की ओर चल दी, तभी उसका ध्यान नीलाभ के चेहरे की ओर गया।

नीलाभ का चेहरा देख, माया का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया। माया की तेज हंसी को सुन, नीलाभ भी नींद से जाग गया।

“क्या हुआ माया? आपको सुबह-सुबह इतनी हंसी क्यों आ रही है? आज कुछ विशेष है क्या?” नीलाभ ने पूछा।

"हां नीलाभ, आज बहुत विशेष दिन है। अगर आप दर्पण देखोगे, तो तुम्हें भी आज की विशेषता का आभास हो जायेगा।" माया ने हंसते हुए कहा।

माया की बात सुन, नीलाभ उछलकर पलंग से खड़ा हो गया और दर्पण की ओर लपका। पर दर्पण में चेहरा देखते ही नीलाभ की भी हंसी छूट गई।

हनुका की नन्हीं कूची ने, अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए, नीलाभ के चेहरे को किसी राक्षस से पूरा मिलाने की कोशिश की थी।

“कहां गया वो हनुका? आज तो वो मेरे हाथों से मार खाएगा।” नीलाभ ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा“ अच्छे भले चेहरे को राक्षस बना दिया।"

"हनुका, इतनी अच्छी चित्रकारी कर बाहर की ओर भाग गया है।" माया ने कहा- “आप स्नान घर में जाकर अपना चेहरा साफ कर लीजिये, तब तक मैं उसे ढूंढकर लाती हूं।"

माया के शब्द सुनकर नीलाभ मुस्कुराया और स्नान घर की ओर चल दिया।

नीलाभ के जाते ही माया ने पलंग के नीचे झांककर, हनुका को देखते हुए कहा- “अब पलंग के नीचे से बाहर आ जाओ हनुका, तुम्हारे पिता जी स्नान घर में चले गये हैं।”

“आप जानती थीं कि मैं पलंग के नीचे छिपा हूं?" हनुका ने पलंग के नीचे से निकलते हुए कहा।

“प्रत्येक माँ को अपने पुत्र के बारे में सब कुछ पता रहता है। वो तो मैंने आपके पिताजी को इसलिये नहीं बताया, कि कहीं सुबह-सुबह मेरे पुत्र को मार ना पड़ जाये?” माया ने हनुका को अपनी ओर खींचते हुए कहा“ वैसे तुम्हारी चित्रकारी मुझे बहुत पसंद आयी हनुका।”

“अच्छा! फिर कल मैं आपके चेहरे पर भी ऐसी ही चित्रकारी कर दूंगा।” हनुका ने भोलेपन से कहा।

“अरे नहीं-नहीं ! मुझे क्षमा करो पुत्र, तुम अपने पिताजी पर ही चित्रकारी करते रहो। मुझे अपने चेहरे पर चित्रकारी नहीं करवानी।" माया ने डरने का अभिनय करते हुए कहा।

“ठीक है माता, मैं आप पर चित्रकारी नहीं करूंगा, पर मुझे आपसे एक चीज पूछनी है माता?” हनुका ने माया को देखते हुए कहा- “आपके और पिता जी के शरीर पर तो ऐसे बाल नहीं हैं, फिर मेरे शरीर पर ऐसे बाल क्यों हैं? मैं आप दोनों की तरह क्यों नहीं दिखता माता?" हनुका अपने शरीर के बालों को दिखाते हुए बोला।

“तुम्हारे शरीर पर इसलिये इतने बाल हैं, कि तुम्हें हिमालय की बर्फ में ठंडक ना महसूस हो। महानदेव बालकों को ठंड से बचाने के लिये, उनके शरीर पर ऐसे बाल दे देते हैं।” माया ने नन्हें हनुका को समझाते हुए कहा।

"फिर महल के बाकी दास-दासियों के, पुत्रों के शरीर पर बाल क्यों नहीं हैं माता?” हनुका ने एक और प्रश्न कर दिया।

'क्यों कि देव, केवल युवराज के शरीर पर इतने बाल देते हैं और तुम तो हिमालय के युवराज हो ना? बस इसीलिये तुम्हारे शरीर पर इस प्रकार से बाल हैं।” माया ने कहा- “क्या तुम्हें ये बाल नहीं पसंद हैं हनुका?"

“नहीं माता, मुझे भी अन्य बालकों की तरह दिखना है।” हनुका ने अपना दर्द व्यक्त करते हुए कहा- “क्या मैं उनकी तरह नहीं बन सकता माता?"

“बन सकते हो, पर इसके लिये तुम्हें देवशक्तियों की आवश्यकता होगी।” माया ने हनुका को समझाते हुए कहा- “पर मुझे नहीं लगता कि तुम अन्य बालकों के समान बनकर प्रसन्न रह पाओगे?"


“आपको ऐसा क्यों लगता है माता?” हनुका के मस्तिष्क में घुमड़-घुमड़ कर नये प्रश्न आ रहे थे।

“क्यों कि हनुका, हम जैसे हैं हमें वैसी ही प्रवृति के लोग अच्छे लगते है। हो सकता है कि क्षणिक मात्र, हमारा हृदय किसी अन्य प्रवृति की कामना करे, पर कुछ देर के बाद ही, हम स्वयं पहले की ही तरह बनना चाहते हैं।" माया ने कहा।

“मैं आपके कहने का अभिप्राय नहीं समझा माता?" हनुका के चेहरे पर उलझन के भाव नजर आये।

“ठीक है, मैं तुम्हें सरल भाषा में समझाने के लिये एक छोटी सी कथा सुनाती हूं।” माया ने पलंग पर बैठते हुए हनुका को अपनी गोद में बैठा लिया।

"अरे वाह! कथा फिर तो बहुत मजा आयेगा। नन्हा हनुका खुश होते हुए बोला।

"तो सुनो, एक बार हिमालय की कंदराओं में एक ऋषि रहते थे, जो प्रतिदिन प्रातः काल, गंगा नदी के पानी में स्नान करते थे और सूर्यदेव को जल चढ़ाते थे। प्रति दिन की भांति एक दिन जब, वह नदी में स्नान कर, सूर्य को जल चढ़ाने के लिये अपनी अंजुली में पानी भर रहे थे, तभी उनकी अंजुली में एक नन्हीं सी चुहिया आ गई, जो कि शायद नदी की धारा में डूब रही थी। ऋषि ने उस चुहिया को कन्या बनाकर अपनी पुत्री के रुप में स्वीकार कर लिया। पुत्री जब बड़ी हुई तो ऋषि ने अपनी पुत्री से पूछा कि तुम्हें किस प्रकार का वर चाहिये? तो पुत्री ने कहा कि जो इस पूरे संसार में सर्वशक्तिमान हो, मुझे उससे विवाह करना है।

“ऋषि ने बहुत सोचने के बाद पुत्री को सूर्यदेव का प्रस्ताव दिया। ऋषि ने कहा कि सूर्यदेव ही इस पृथ्वी पर
सर्वशक्ति मान हैं। पर ऋषि पुत्री ने कहा कि सूर्यदेव से शक्तिशाली तो मेघ हैं, जो कि उन्हें पल भर में पूर्णतया ढक लेते हैं। तो ऋषि ने मेघों के देवता का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा, पर पुत्री ने उसे भी अस्वीकार कर दिया। पुत्री ने कहा कि मेघों के देवता से शक्तिशाली, तो पर्वतराज हिमालय हैं, जो मेघों को भी रोककर, उन्हें बरसने पर विवश कर देते हैं। यह सुनकर ऋषि ने इस बार हिमालय के विवाह का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा। तभी उस पुत्रि को हिमालय में छेद करता हुआ एक चूहा दिखाई दिया।

“उसे देख पुत्री ने कहा कि हिमालय से शक्तिशाली तो यह चूहा है, जो हिमालय में भी छेद कर सकता है, मैं तो इस चूहे से ही शादी करूंगी। फिर ऋषि समझ गये कि इस चुहिया को पूरी पृथ्वी पर, चूहा ही सबसे
शक्तिशाली दिखाई दिया, इसलिये ऋषि ने उस कन्या को फिर से चुहिया बना दिया और उसका विवाह खुशी-खुशी उस चूहे से कर दिया। तो इस कथा से यह पता चलता है हनुका कि जो जिस प्रकार है, उसे सदैव वैसी ही चीजें भाती हैं।' यह कहकर माया शांत हो गई और हनुका की ओर देखने लगी।

हनुका माया की कथा सुनकर कुछ सोच में पड़ गया। उसे सोचता देख माया ने पूछ लिया- “क्या सोच रहे हो हनुका?”

"तो फिर मेरा भी विवाह किसी बालों वाली कन्या के साथ ही होगा?" हनुका ने अपने चेहरा रोने सा बनाते हुए पूछा।

हनुका की बात सुन माया जोर से हंसते हुए बोली“अरे नहीं हनुका, तुम्हारा विवाह तो मैं पृथ्वी की सबसे सुंदर कन्या से करुंगी और तब तक तो तुम देवशक्ति प्राप्त कर, अपने भी शरीर के बाल हटा चुके होगे?"

“फिर ठीक है।" माया की बात सुन अब हनुका खुश हो गया।

“अच्छा, अब मैं महानदेव की पूजा करने जा रही हूं। पर इस बीच, तुम कोई और शरारत मत करना। ठीक है?” माया ने हनुका को पलंग पर बैठाते हुए कहा।

“जी माता, मैं आपके पूजा करने तक, चुपचाप पलंग पर बैठा रहूंगा, मैं कोई शरारत नहीं करूंगा। हनुका ने भोलेपन से कहा।

हनुका के वचन सुन माया ने हनुका के सिर पर धीरे से हाथ फेरा और पूजा स्थल की ओर बढ़ गई।

माया तो चली गई, पर हनुका अभी भी पलंग पर बैठा देवशक्ति के बारे में सोच रहा था- “माता ने कहा कि अगर मुझे देवशक्ति मिल जाये तो मैं भी दूसरे मनुष्यों की ही भांति, सुंदर दिखने लगूंगा, पर दूसरे कमरे में एक डिब्बे में बहुत सी देवशक्तियां रखी हैं, फिर माता, मुझे उन देवशक्तियों से सुंदर क्यों नहीं बना देती? शायद माता उन देवशक्तियों के बारे में भूल गई होंगी? एक काम करता हूं, मैं स्वयं उन देवशक्तियों से सुंदर बन जाता हूं और माता जब पूजा करके आयेगी, तो मैं उसे अपना सुंदर चेहरा दिखाकर, आश्चर्यचकित कर दूंगा हां-हां यही सही रहेगा।“ यह सोच नन्हा हनुका दूसरे कक्ष की ओर चल दिया, जहां देवशक्तियां रखीं थीं।

हनुका ने दूसरे कमरे में रखी अलमारी खोल ली, नीचे के दोनों खानों में वह सुनहरा डिब्बा नहीं था। अतः हनुका एक कुर्सी को खींचकर, अलमारी के पास ले आया और उस पर चढ़कर देखने लगा।

अब हनुका को अलमारी के तीसरे खाने में रखा, वह सुनहरा डिब्बा दिखाई दे गया। हनुका ने दोनों हाथ लगाकर उस सुनहरे डिब्बे को उठा लिया।

अब वह कुर्सी से उतरकर, वहीं कक्ष में जमीन पर ही बैठ गया। हनुका ने अब डिब्बे को खोल लिया।

रंग-बिरंगे रत्नों से हनुका की आँखें चमक उठीं। हनुका अब एक-एक रत्न को उठाकर देखने लगा, पर उसे समझ ना आया कि इन देवशक्तियों का प्रयोग करना कैसे है?

तभी हनुका को उस सुनहरे डिब्बे में एक छोटी सी डिबिया दिखाई दी। यह वहीं डिबिया थी, जिसे माया को महानदेव ने दिया था।

हनुका को इन सभी रत्नों के बीच, वह छोटी सी डिबिया का रखा होना, बहुत अजीब सा लगा, इसलिये हनुका ने उस डिबिया को खोल लिया।

“ये क्या बात हुई? इस डिबिया में तो जल की मात्र एक बूंद है?” हनुका ने सोचा- “कुछ सोच हनुका ने उस डिबिया को मुंह लगा कर, जल की उस बूंद को पी लिया।

“इससे तो प्यास भी नहीं बुझी। पता नहीं यह कैसी देवशक्ति थी ?” हनुका ने कहा।

तभी हनुका को कक्ष में किसी के आने की आहट सुनाई दी। वह आहट सुन हनुका डर कर तेजी से अलमारी के पीछे छिप गया।

सभी देवशक्तियां कमरे में वैसे ही बिखरी हुईं थीं। आने वाली आहट माया की थी, जो कि पूजा करके हनुका को ढूंढते हुए उधर ही आ गई थी- “हनुका !"

हनुका को पुकारते हुए, माया कक्ष में प्रविष्ठ हो गई, पर कक्ष में प्रविष्ठ होते ही माया के चेहरे पर हैरानी और क्रोध के भाव एक साथ आ गये। “हे मेरे ईश्वर, यह हनुका भी ना, पता नहीं क्या-क्या करता रहता है?"

माया ने घबराकर सभी देवशक्तियों को जमीन से उठाकर, वापस डिब्बे में रखना शुरु कर दिया। साथ ही साथ वह उन देवशक्तियों की गिनती भी करती जा रही थी। 14 देवशक्तियों की गिनती कर उन्हें डिब्बे में रखने के बाद, माया की नजर अब दूर पड़ी सुनहरी डिबिया पर गई।

माया ने उस डिबिया को खोलकर देखा, पर उसमें गंगा की पहली बूंद नहीं थी।

यह देखकर माया का कंठ सूख गया, पर इससे पहले कि वह हनुका को ढूंढकर, उसे कोई दण्ड दे पाती, माया की आँखों के सामने ही, हवा में एक बूंद प्रकट होकर, उस डिबिया के अंदर चली गई।

माया यह चमत्कार देख आश्चर्य में पड़ गई, तभी माया को अपने सामने महानदेव का ऊर्जा रुप दिखाई दिया।

यह देख माया ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया।

तभी वातावरण में देव की आवाज गूंजी “माया, तुम्हें देवशक्तियों को और ध्यान से रखना होगा, यह तुम्हारा कर्तव्य है, कि तुम इन देवशक्तियों को सदैव उचित व्यक्ति को ही दो। आज अंजाने में ही सही परंतु गुरुत्व शक्ति का प्रयोग हुआ है। परंतु तुम्हारे सद्भाग्य के कारण, वह गुरुत्व शक्ति सही पात्र के पास पहुंच गई है और यही कारण है कि तुम इस डिबिया की गुरुत्व शक्ति को दोबारा से देख पा रही हो। ध्यान रखना जब भी इस गुरुत्व शक्ति का वरण कोई सुपात्र करेगा, तो इसकी दूसरी बूंद इस डिबिया में आ जायेगी, परंतु यदि कभी इस बूंद का वरण किसी कुपात्र ने किया, तो यह बूंद कभी धरती पर प्रकट नहीं होगी और ऐसी स्थिति में, तुम्हें देवताओं के क्रोध का भी सामना करना पड़ सकता है। इसलिये तुम्हें इन देवशक्तियों को लेकर अत्यंत सावधान रहने की जरुरत है।"

“जी देव, मैं आगे से सदैव आपकी बात का ध्यान रखूगी। मैं आज ही हिमालय पर आपके एक शिव मंदिर का निर्माण कर, इस गुरुत्व शक्ति को उसमें रख दूंगी।" माया ने कहा- “वह शिव मंदिर इस गुरुत्व शक्ति को लेकर हिमालय के गर्भ में प्रवेश कर जायेगा और जब तक मुझे इस गुरुत्व शक्ति के लिये, कोई सुपात्र नहीं मिल जाता? तब तक मैं इसे वहीं रहने दूंगी। हां वह शिव मंदिर प्रत्येक वर्ष, आपकी पूजा-अर्चना के लिये हिमालय के गर्भ से एक बार बाहर आयेगा और संध्या वंदना के साथ, वापस हिमालय की गर्भ में समा जायेगा। अब रही बात इन बाकी की देवशक्ति यों की, तो इन्हें मैं ऐसे स्थान पर रखूगी, कि वहां तक कोई कुपात्र पहुंच कर, इन शक्तियों को प्राप्त ही नहीं कर पायेगा। आज की घटना ने मुझे अच्छा ज्ञान दिया है देव, अब मुझसे कभी भी इस प्रकार की त्रुटि नहीं होगी, ऐसा मैं आपको विश्वास दिलाती हूं।"

"कल्याण हो माया।" यह कहकर देव अंतर्ध्यान हो गये। अब माया ने जल्दी से गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी, अपने सुनहरे डिब्बे में रखा और पूरे डिब्बे को अपने हाथ में लेकर कोई मंत्र पढ़ने लगी।

कुछ ही देर में वह सुनहरा डिब्बा माया के हाथों से कहीं हवा में विलीन हो गया। अब माया की नजर हनुका को ढूंढने में लग गई।

"हनुका ऽऽऽऽऽ।” माया ने कमरे के एक-एक स्थान का सामान हटाकर, हनुका को ढूंढना शुरु कर दिया।

माया ने अलमारी के पीछे भी देखा, पर हनुका पूरे कमरे में कहीं दिखाई नहीं दिया। तभी माया को हनुका की हंसी सुनाई दी।

माया ने हंसी की आवाज का पीछा करते हुए, कक्ष की छत की ओर देखा, तो माया के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्यों कि हनुका इस समय पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण छोड़, कक्ष के छत की ओर, हवा में तैर रहा था।

एक पल में माया को समझ में आ गया कि देव किस सुपात्र की बात कर रहे थे। वह जान गई थी कि हनुका ने ही गुरुत्व शक्ति का वरण किया था।

माया ने हनुका को नीचे आने का इशारा किया, पर हनुका ने डरकर अपना सिर ना में हिलाया।

“आप मुझे मारोगी?” हनुका ने भोलेपन से कहा।

“नहीं मारुंगी, परंतु नीचे आओ।” माया ने हनुका को घूरते हुए कहा।

हनुका डरते-डरते नीचे आ गया। माया ने हनुका के कान पकड़े और उसे लेकर महल के अंदर की ओर चल दी- “चलो तुम्हें अपने हाथ के बने लड्डू खिलाती हूं।

“लड्डू! वाह, फिर तो आनन्द ही आ जायेगा। हनुका यह सुनकर खुश हो गया।

माया ने हनुका का हाथ पकड़ा और फिर उसे प्यार करते हुए महल के अंदर की ओर चल दी।

इस दृश्य को देखकर तो बस यही कहा जा सकता है कि माँ तो आखिर माँ ही होती है।


जारी रहेगा………✍️
Shandar update bhai
 

Iron Man

Try and fail. But never give up trying
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नटखट हनुका:
(20,005 वर्ष पहले....... नीलमहल, माया लोक, हिमालय)

दिव्यशक्तियां प्राप्त करने के बाद माया ने 15 लोकों का निर्माण कार्य शुरु कर दिया था।

सबसे पहले माया ने माया लोक की स्थापना की। इस माया लोक को उसने, अपने और नीलाभ के निवास स्थान के रुप में चुना।

इस माया लोक में माया ने एक बहुत ही सुंदर नीलमहल की रचना की, जिसमें कि नीले रंग को सर्वोत्तम स्थान दिया गया था।

नीलमहल पूर्णरुप से सोने का बना था, जिसमें जगह-जगह पर नीलम रत्न जड़े हुए थे। महल के सभी पर्दे भी नीले रंग के ही थे। माया ने यह महल नीलाभ को समर्पित किया था।

हनुका अब 0x06x0 वर्ष का हो गया था। आज प्रातः काल का समय था। माया ने सुबह उठकर, बगल में सो रहे नन्हें हनुका को देखा और फिर स्नान करने चली गईं।

माया के जाते ही हनुका ने अपनी आँखें खोल दीं। आँखें खुलते ही प्रतिदिन की भांति, मस्तिष्क में शैतानियां कुलबुलाने लगीं।

अब वह उठकर बिस्तर से नीचे आ गया। हनुका की नजर अब सो रहे नीलाभ पर थी।

शांत भाव से सो रहे नीलाभ को देख हनुका से रहा ना गया, अब उसकी नजरें कमरे में चारो ओर घूमने लगीं।
तभी हनुका की नजर माया द्वारा बनाई गई, एक चित्रकारी की ओर गया, जिसमें माया ने कूची से प्रकृति के रंगों को दर्शाया था।

हनुका दबे पांव उस चित्र के पास गया और उसके बगल रखे, विभिन्न प्रकार के रंगों से भरी थाली को उठा लिया।

अब हनुका धीरे-धीरे नीलाभ के पास पहुंचा और अपने नन्हें हाथों से नीलाभ के चेहरे पर अपनी कला का प्रदर्शन करने लगा।

नीलाभ इस समय गहरी निद्रा में था, उसे पता भी ना चला, कि कब उसका चेहरा एक कला प्रदर्शनी की भांति, विविध रंगों से सज चुका है।
कुछ ही देर में हनुका अपने प्रदर्शन से संतुष्ट हो गया।

तभी हनुका को स्नान घर का द्वार खुलने का अहसास हुआ। हनुका इस आवाज को सुन तेजी से, पलंग के नीचे छिप गया।

माया स्नान करके निकली और पूजा घर की ओर चल दी, तभी उसका ध्यान नीलाभ के चेहरे की ओर गया।

नीलाभ का चेहरा देख, माया का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया। माया की तेज हंसी को सुन, नीलाभ भी नींद से जाग गया।

“क्या हुआ माया? आपको सुबह-सुबह इतनी हंसी क्यों आ रही है? आज कुछ विशेष है क्या?” नीलाभ ने पूछा।

"हां नीलाभ, आज बहुत विशेष दिन है। अगर आप दर्पण देखोगे, तो तुम्हें भी आज की विशेषता का आभास हो जायेगा।" माया ने हंसते हुए कहा।

माया की बात सुन, नीलाभ उछलकर पलंग से खड़ा हो गया और दर्पण की ओर लपका। पर दर्पण में चेहरा देखते ही नीलाभ की भी हंसी छूट गई।

हनुका की नन्हीं कूची ने, अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए, नीलाभ के चेहरे को किसी राक्षस से पूरा मिलाने की कोशिश की थी।

“कहां गया वो हनुका? आज तो वो मेरे हाथों से मार खाएगा।” नीलाभ ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा“ अच्छे भले चेहरे को राक्षस बना दिया।"

"हनुका, इतनी अच्छी चित्रकारी कर बाहर की ओर भाग गया है।" माया ने कहा- “आप स्नान घर में जाकर अपना चेहरा साफ कर लीजिये, तब तक मैं उसे ढूंढकर लाती हूं।"

माया के शब्द सुनकर नीलाभ मुस्कुराया और स्नान घर की ओर चल दिया।

नीलाभ के जाते ही माया ने पलंग के नीचे झांककर, हनुका को देखते हुए कहा- “अब पलंग के नीचे से बाहर आ जाओ हनुका, तुम्हारे पिता जी स्नान घर में चले गये हैं।”

“आप जानती थीं कि मैं पलंग के नीचे छिपा हूं?" हनुका ने पलंग के नीचे से निकलते हुए कहा।

“प्रत्येक माँ को अपने पुत्र के बारे में सब कुछ पता रहता है। वो तो मैंने आपके पिताजी को इसलिये नहीं बताया, कि कहीं सुबह-सुबह मेरे पुत्र को मार ना पड़ जाये?” माया ने हनुका को अपनी ओर खींचते हुए कहा“ वैसे तुम्हारी चित्रकारी मुझे बहुत पसंद आयी हनुका।”

“अच्छा! फिर कल मैं आपके चेहरे पर भी ऐसी ही चित्रकारी कर दूंगा।” हनुका ने भोलेपन से कहा।

“अरे नहीं-नहीं ! मुझे क्षमा करो पुत्र, तुम अपने पिताजी पर ही चित्रकारी करते रहो। मुझे अपने चेहरे पर चित्रकारी नहीं करवानी।" माया ने डरने का अभिनय करते हुए कहा।

“ठीक है माता, मैं आप पर चित्रकारी नहीं करूंगा, पर मुझे आपसे एक चीज पूछनी है माता?” हनुका ने माया को देखते हुए कहा- “आपके और पिता जी के शरीर पर तो ऐसे बाल नहीं हैं, फिर मेरे शरीर पर ऐसे बाल क्यों हैं? मैं आप दोनों की तरह क्यों नहीं दिखता माता?" हनुका अपने शरीर के बालों को दिखाते हुए बोला।

“तुम्हारे शरीर पर इसलिये इतने बाल हैं, कि तुम्हें हिमालय की बर्फ में ठंडक ना महसूस हो। महानदेव बालकों को ठंड से बचाने के लिये, उनके शरीर पर ऐसे बाल दे देते हैं।” माया ने नन्हें हनुका को समझाते हुए कहा।

"फिर महल के बाकी दास-दासियों के, पुत्रों के शरीर पर बाल क्यों नहीं हैं माता?” हनुका ने एक और प्रश्न कर दिया।

'क्यों कि देव, केवल युवराज के शरीर पर इतने बाल देते हैं और तुम तो हिमालय के युवराज हो ना? बस इसीलिये तुम्हारे शरीर पर इस प्रकार से बाल हैं।” माया ने कहा- “क्या तुम्हें ये बाल नहीं पसंद हैं हनुका?"

“नहीं माता, मुझे भी अन्य बालकों की तरह दिखना है।” हनुका ने अपना दर्द व्यक्त करते हुए कहा- “क्या मैं उनकी तरह नहीं बन सकता माता?"

“बन सकते हो, पर इसके लिये तुम्हें देवशक्तियों की आवश्यकता होगी।” माया ने हनुका को समझाते हुए कहा- “पर मुझे नहीं लगता कि तुम अन्य बालकों के समान बनकर प्रसन्न रह पाओगे?"


“आपको ऐसा क्यों लगता है माता?” हनुका के मस्तिष्क में घुमड़-घुमड़ कर नये प्रश्न आ रहे थे।

“क्यों कि हनुका, हम जैसे हैं हमें वैसी ही प्रवृति के लोग अच्छे लगते है। हो सकता है कि क्षणिक मात्र, हमारा हृदय किसी अन्य प्रवृति की कामना करे, पर कुछ देर के बाद ही, हम स्वयं पहले की ही तरह बनना चाहते हैं।" माया ने कहा।

“मैं आपके कहने का अभिप्राय नहीं समझा माता?" हनुका के चेहरे पर उलझन के भाव नजर आये।

“ठीक है, मैं तुम्हें सरल भाषा में समझाने के लिये एक छोटी सी कथा सुनाती हूं।” माया ने पलंग पर बैठते हुए हनुका को अपनी गोद में बैठा लिया।

"अरे वाह! कथा फिर तो बहुत मजा आयेगा। नन्हा हनुका खुश होते हुए बोला।

"तो सुनो, एक बार हिमालय की कंदराओं में एक ऋषि रहते थे, जो प्रतिदिन प्रातः काल, गंगा नदी के पानी में स्नान करते थे और सूर्यदेव को जल चढ़ाते थे। प्रति दिन की भांति एक दिन जब, वह नदी में स्नान कर, सूर्य को जल चढ़ाने के लिये अपनी अंजुली में पानी भर रहे थे, तभी उनकी अंजुली में एक नन्हीं सी चुहिया आ गई, जो कि शायद नदी की धारा में डूब रही थी। ऋषि ने उस चुहिया को कन्या बनाकर अपनी पुत्री के रुप में स्वीकार कर लिया। पुत्री जब बड़ी हुई तो ऋषि ने अपनी पुत्री से पूछा कि तुम्हें किस प्रकार का वर चाहिये? तो पुत्री ने कहा कि जो इस पूरे संसार में सर्वशक्तिमान हो, मुझे उससे विवाह करना है।

“ऋषि ने बहुत सोचने के बाद पुत्री को सूर्यदेव का प्रस्ताव दिया। ऋषि ने कहा कि सूर्यदेव ही इस पृथ्वी पर
सर्वशक्ति मान हैं। पर ऋषि पुत्री ने कहा कि सूर्यदेव से शक्तिशाली तो मेघ हैं, जो कि उन्हें पल भर में पूर्णतया ढक लेते हैं। तो ऋषि ने मेघों के देवता का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा, पर पुत्री ने उसे भी अस्वीकार कर दिया। पुत्री ने कहा कि मेघों के देवता से शक्तिशाली, तो पर्वतराज हिमालय हैं, जो मेघों को भी रोककर, उन्हें बरसने पर विवश कर देते हैं। यह सुनकर ऋषि ने इस बार हिमालय के विवाह का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा। तभी उस पुत्रि को हिमालय में छेद करता हुआ एक चूहा दिखाई दिया।

“उसे देख पुत्री ने कहा कि हिमालय से शक्तिशाली तो यह चूहा है, जो हिमालय में भी छेद कर सकता है, मैं तो इस चूहे से ही शादी करूंगी। फिर ऋषि समझ गये कि इस चुहिया को पूरी पृथ्वी पर, चूहा ही सबसे
शक्तिशाली दिखाई दिया, इसलिये ऋषि ने उस कन्या को फिर से चुहिया बना दिया और उसका विवाह खुशी-खुशी उस चूहे से कर दिया। तो इस कथा से यह पता चलता है हनुका कि जो जिस प्रकार है, उसे सदैव वैसी ही चीजें भाती हैं।' यह कहकर माया शांत हो गई और हनुका की ओर देखने लगी।

हनुका माया की कथा सुनकर कुछ सोच में पड़ गया। उसे सोचता देख माया ने पूछ लिया- “क्या सोच रहे हो हनुका?”

"तो फिर मेरा भी विवाह किसी बालों वाली कन्या के साथ ही होगा?" हनुका ने अपने चेहरा रोने सा बनाते हुए पूछा।

हनुका की बात सुन माया जोर से हंसते हुए बोली“अरे नहीं हनुका, तुम्हारा विवाह तो मैं पृथ्वी की सबसे सुंदर कन्या से करुंगी और तब तक तो तुम देवशक्ति प्राप्त कर, अपने भी शरीर के बाल हटा चुके होगे?"

“फिर ठीक है।" माया की बात सुन अब हनुका खुश हो गया।

“अच्छा, अब मैं महानदेव की पूजा करने जा रही हूं। पर इस बीच, तुम कोई और शरारत मत करना। ठीक है?” माया ने हनुका को पलंग पर बैठाते हुए कहा।

“जी माता, मैं आपके पूजा करने तक, चुपचाप पलंग पर बैठा रहूंगा, मैं कोई शरारत नहीं करूंगा। हनुका ने भोलेपन से कहा।

हनुका के वचन सुन माया ने हनुका के सिर पर धीरे से हाथ फेरा और पूजा स्थल की ओर बढ़ गई।

माया तो चली गई, पर हनुका अभी भी पलंग पर बैठा देवशक्ति के बारे में सोच रहा था- “माता ने कहा कि अगर मुझे देवशक्ति मिल जाये तो मैं भी दूसरे मनुष्यों की ही भांति, सुंदर दिखने लगूंगा, पर दूसरे कमरे में एक डिब्बे में बहुत सी देवशक्तियां रखी हैं, फिर माता, मुझे उन देवशक्तियों से सुंदर क्यों नहीं बना देती? शायद माता उन देवशक्तियों के बारे में भूल गई होंगी? एक काम करता हूं, मैं स्वयं उन देवशक्तियों से सुंदर बन जाता हूं और माता जब पूजा करके आयेगी, तो मैं उसे अपना सुंदर चेहरा दिखाकर, आश्चर्यचकित कर दूंगा हां-हां यही सही रहेगा।“ यह सोच नन्हा हनुका दूसरे कक्ष की ओर चल दिया, जहां देवशक्तियां रखीं थीं।

हनुका ने दूसरे कमरे में रखी अलमारी खोल ली, नीचे के दोनों खानों में वह सुनहरा डिब्बा नहीं था। अतः हनुका एक कुर्सी को खींचकर, अलमारी के पास ले आया और उस पर चढ़कर देखने लगा।

अब हनुका को अलमारी के तीसरे खाने में रखा, वह सुनहरा डिब्बा दिखाई दे गया। हनुका ने दोनों हाथ लगाकर उस सुनहरे डिब्बे को उठा लिया।

अब वह कुर्सी से उतरकर, वहीं कक्ष में जमीन पर ही बैठ गया। हनुका ने अब डिब्बे को खोल लिया।

रंग-बिरंगे रत्नों से हनुका की आँखें चमक उठीं। हनुका अब एक-एक रत्न को उठाकर देखने लगा, पर उसे समझ ना आया कि इन देवशक्तियों का प्रयोग करना कैसे है?

तभी हनुका को उस सुनहरे डिब्बे में एक छोटी सी डिबिया दिखाई दी। यह वहीं डिबिया थी, जिसे माया को महानदेव ने दिया था।

हनुका को इन सभी रत्नों के बीच, वह छोटी सी डिबिया का रखा होना, बहुत अजीब सा लगा, इसलिये हनुका ने उस डिबिया को खोल लिया।

“ये क्या बात हुई? इस डिबिया में तो जल की मात्र एक बूंद है?” हनुका ने सोचा- “कुछ सोच हनुका ने उस डिबिया को मुंह लगा कर, जल की उस बूंद को पी लिया।

“इससे तो प्यास भी नहीं बुझी। पता नहीं यह कैसी देवशक्ति थी ?” हनुका ने कहा।

तभी हनुका को कक्ष में किसी के आने की आहट सुनाई दी। वह आहट सुन हनुका डर कर तेजी से अलमारी के पीछे छिप गया।

सभी देवशक्तियां कमरे में वैसे ही बिखरी हुईं थीं। आने वाली आहट माया की थी, जो कि पूजा करके हनुका को ढूंढते हुए उधर ही आ गई थी- “हनुका !"

हनुका को पुकारते हुए, माया कक्ष में प्रविष्ठ हो गई, पर कक्ष में प्रविष्ठ होते ही माया के चेहरे पर हैरानी और क्रोध के भाव एक साथ आ गये। “हे मेरे ईश्वर, यह हनुका भी ना, पता नहीं क्या-क्या करता रहता है?"

माया ने घबराकर सभी देवशक्तियों को जमीन से उठाकर, वापस डिब्बे में रखना शुरु कर दिया। साथ ही साथ वह उन देवशक्तियों की गिनती भी करती जा रही थी। 14 देवशक्तियों की गिनती कर उन्हें डिब्बे में रखने के बाद, माया की नजर अब दूर पड़ी सुनहरी डिबिया पर गई।

माया ने उस डिबिया को खोलकर देखा, पर उसमें गंगा की पहली बूंद नहीं थी।

यह देखकर माया का कंठ सूख गया, पर इससे पहले कि वह हनुका को ढूंढकर, उसे कोई दण्ड दे पाती, माया की आँखों के सामने ही, हवा में एक बूंद प्रकट होकर, उस डिबिया के अंदर चली गई।

माया यह चमत्कार देख आश्चर्य में पड़ गई, तभी माया को अपने सामने महानदेव का ऊर्जा रुप दिखाई दिया।

यह देख माया ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया।

तभी वातावरण में देव की आवाज गूंजी “माया, तुम्हें देवशक्तियों को और ध्यान से रखना होगा, यह तुम्हारा कर्तव्य है, कि तुम इन देवशक्तियों को सदैव उचित व्यक्ति को ही दो। आज अंजाने में ही सही परंतु गुरुत्व शक्ति का प्रयोग हुआ है। परंतु तुम्हारे सद्भाग्य के कारण, वह गुरुत्व शक्ति सही पात्र के पास पहुंच गई है और यही कारण है कि तुम इस डिबिया की गुरुत्व शक्ति को दोबारा से देख पा रही हो। ध्यान रखना जब भी इस गुरुत्व शक्ति का वरण कोई सुपात्र करेगा, तो इसकी दूसरी बूंद इस डिबिया में आ जायेगी, परंतु यदि कभी इस बूंद का वरण किसी कुपात्र ने किया, तो यह बूंद कभी धरती पर प्रकट नहीं होगी और ऐसी स्थिति में, तुम्हें देवताओं के क्रोध का भी सामना करना पड़ सकता है। इसलिये तुम्हें इन देवशक्तियों को लेकर अत्यंत सावधान रहने की जरुरत है।"

“जी देव, मैं आगे से सदैव आपकी बात का ध्यान रखूगी। मैं आज ही हिमालय पर आपके एक शिव मंदिर का निर्माण कर, इस गुरुत्व शक्ति को उसमें रख दूंगी।" माया ने कहा- “वह शिव मंदिर इस गुरुत्व शक्ति को लेकर हिमालय के गर्भ में प्रवेश कर जायेगा और जब तक मुझे इस गुरुत्व शक्ति के लिये, कोई सुपात्र नहीं मिल जाता? तब तक मैं इसे वहीं रहने दूंगी। हां वह शिव मंदिर प्रत्येक वर्ष, आपकी पूजा-अर्चना के लिये हिमालय के गर्भ से एक बार बाहर आयेगा और संध्या वंदना के साथ, वापस हिमालय की गर्भ में समा जायेगा। अब रही बात इन बाकी की देवशक्ति यों की, तो इन्हें मैं ऐसे स्थान पर रखूगी, कि वहां तक कोई कुपात्र पहुंच कर, इन शक्तियों को प्राप्त ही नहीं कर पायेगा। आज की घटना ने मुझे अच्छा ज्ञान दिया है देव, अब मुझसे कभी भी इस प्रकार की त्रुटि नहीं होगी, ऐसा मैं आपको विश्वास दिलाती हूं।"

"कल्याण हो माया।" यह कहकर देव अंतर्ध्यान हो गये। अब माया ने जल्दी से गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी, अपने सुनहरे डिब्बे में रखा और पूरे डिब्बे को अपने हाथ में लेकर कोई मंत्र पढ़ने लगी।

कुछ ही देर में वह सुनहरा डिब्बा माया के हाथों से कहीं हवा में विलीन हो गया। अब माया की नजर हनुका को ढूंढने में लग गई।

"हनुका ऽऽऽऽऽ।” माया ने कमरे के एक-एक स्थान का सामान हटाकर, हनुका को ढूंढना शुरु कर दिया।

माया ने अलमारी के पीछे भी देखा, पर हनुका पूरे कमरे में कहीं दिखाई नहीं दिया। तभी माया को हनुका की हंसी सुनाई दी।

माया ने हंसी की आवाज का पीछा करते हुए, कक्ष की छत की ओर देखा, तो माया के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्यों कि हनुका इस समय पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण छोड़, कक्ष के छत की ओर, हवा में तैर रहा था।

एक पल में माया को समझ में आ गया कि देव किस सुपात्र की बात कर रहे थे। वह जान गई थी कि हनुका ने ही गुरुत्व शक्ति का वरण किया था।

माया ने हनुका को नीचे आने का इशारा किया, पर हनुका ने डरकर अपना सिर ना में हिलाया।

“आप मुझे मारोगी?” हनुका ने भोलेपन से कहा।

“नहीं मारुंगी, परंतु नीचे आओ।” माया ने हनुका को घूरते हुए कहा।

हनुका डरते-डरते नीचे आ गया। माया ने हनुका के कान पकड़े और उसे लेकर महल के अंदर की ओर चल दी- “चलो तुम्हें अपने हाथ के बने लड्डू खिलाती हूं।

“लड्डू! वाह, फिर तो आनन्द ही आ जायेगा। हनुका यह सुनकर खुश हो गया।

माया ने हनुका का हाथ पकड़ा और फिर उसे प्यार करते हुए महल के अंदर की ओर चल दी।

इस दृश्य को देखकर तो बस यही कहा जा सकता है कि माँ तो आखिर माँ ही होती है।


जारी रहेगा………✍️
Shaandar update
 

Raj_sharma

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Bhut hi badhiya update Bhai
Sab purane sawalo ke jawab mil rahe hai
Har ek sawal ka jabaab milega :declare: Thanks for your valuable review and support bhai :thanks:
 

Raj_sharma

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Bhut hi jabardast update bhai
To ye thi sabhi devo ke dvara di gayi shaktiya
Bilkul bhai, aur inme se kuch ki jhalkiya to tum pahle bhi dekh hi chuke ho:dazed: Thanks for your valuable review bhai :thanks:
 

Raj_sharma

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dhparikh

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#181.

नटखट हनुका:
(20,005 वर्ष पहले....... नीलमहल, माया लोक, हिमालय)

दिव्यशक्तियां प्राप्त करने के बाद माया ने 15 लोकों का निर्माण कार्य शुरु कर दिया था।

सबसे पहले माया ने माया लोक की स्थापना की। इस माया लोक को उसने, अपने और नीलाभ के निवास स्थान के रुप में चुना।

इस माया लोक में माया ने एक बहुत ही सुंदर नीलमहल की रचना की, जिसमें कि नीले रंग को सर्वोत्तम स्थान दिया गया था।

नीलमहल पूर्णरुप से सोने का बना था, जिसमें जगह-जगह पर नीलम रत्न जड़े हुए थे। महल के सभी पर्दे भी नीले रंग के ही थे। माया ने यह महल नीलाभ को समर्पित किया था।

हनुका अब 0x06x0 वर्ष का हो गया था। आज प्रातः काल का समय था। माया ने सुबह उठकर, बगल में सो रहे नन्हें हनुका को देखा और फिर स्नान करने चली गईं।

माया के जाते ही हनुका ने अपनी आँखें खोल दीं। आँखें खुलते ही प्रतिदिन की भांति, मस्तिष्क में शैतानियां कुलबुलाने लगीं।

अब वह उठकर बिस्तर से नीचे आ गया। हनुका की नजर अब सो रहे नीलाभ पर थी।

शांत भाव से सो रहे नीलाभ को देख हनुका से रहा ना गया, अब उसकी नजरें कमरे में चारो ओर घूमने लगीं।
तभी हनुका की नजर माया द्वारा बनाई गई, एक चित्रकारी की ओर गया, जिसमें माया ने कूची से प्रकृति के रंगों को दर्शाया था।

हनुका दबे पांव उस चित्र के पास गया और उसके बगल रखे, विभिन्न प्रकार के रंगों से भरी थाली को उठा लिया।

अब हनुका धीरे-धीरे नीलाभ के पास पहुंचा और अपने नन्हें हाथों से नीलाभ के चेहरे पर अपनी कला का प्रदर्शन करने लगा।

नीलाभ इस समय गहरी निद्रा में था, उसे पता भी ना चला, कि कब उसका चेहरा एक कला प्रदर्शनी की भांति, विविध रंगों से सज चुका है।
कुछ ही देर में हनुका अपने प्रदर्शन से संतुष्ट हो गया।

तभी हनुका को स्नान घर का द्वार खुलने का अहसास हुआ। हनुका इस आवाज को सुन तेजी से, पलंग के नीचे छिप गया।

माया स्नान करके निकली और पूजा घर की ओर चल दी, तभी उसका ध्यान नीलाभ के चेहरे की ओर गया।

नीलाभ का चेहरा देख, माया का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया। माया की तेज हंसी को सुन, नीलाभ भी नींद से जाग गया।

“क्या हुआ माया? आपको सुबह-सुबह इतनी हंसी क्यों आ रही है? आज कुछ विशेष है क्या?” नीलाभ ने पूछा।

"हां नीलाभ, आज बहुत विशेष दिन है। अगर आप दर्पण देखोगे, तो तुम्हें भी आज की विशेषता का आभास हो जायेगा।" माया ने हंसते हुए कहा।

माया की बात सुन, नीलाभ उछलकर पलंग से खड़ा हो गया और दर्पण की ओर लपका। पर दर्पण में चेहरा देखते ही नीलाभ की भी हंसी छूट गई।

हनुका की नन्हीं कूची ने, अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए, नीलाभ के चेहरे को किसी राक्षस से पूरा मिलाने की कोशिश की थी।

“कहां गया वो हनुका? आज तो वो मेरे हाथों से मार खाएगा।” नीलाभ ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा“ अच्छे भले चेहरे को राक्षस बना दिया।"

"हनुका, इतनी अच्छी चित्रकारी कर बाहर की ओर भाग गया है।" माया ने कहा- “आप स्नान घर में जाकर अपना चेहरा साफ कर लीजिये, तब तक मैं उसे ढूंढकर लाती हूं।"

माया के शब्द सुनकर नीलाभ मुस्कुराया और स्नान घर की ओर चल दिया।

नीलाभ के जाते ही माया ने पलंग के नीचे झांककर, हनुका को देखते हुए कहा- “अब पलंग के नीचे से बाहर आ जाओ हनुका, तुम्हारे पिता जी स्नान घर में चले गये हैं।”

“आप जानती थीं कि मैं पलंग के नीचे छिपा हूं?" हनुका ने पलंग के नीचे से निकलते हुए कहा।

“प्रत्येक माँ को अपने पुत्र के बारे में सब कुछ पता रहता है। वो तो मैंने आपके पिताजी को इसलिये नहीं बताया, कि कहीं सुबह-सुबह मेरे पुत्र को मार ना पड़ जाये?” माया ने हनुका को अपनी ओर खींचते हुए कहा“ वैसे तुम्हारी चित्रकारी मुझे बहुत पसंद आयी हनुका।”

“अच्छा! फिर कल मैं आपके चेहरे पर भी ऐसी ही चित्रकारी कर दूंगा।” हनुका ने भोलेपन से कहा।

“अरे नहीं-नहीं ! मुझे क्षमा करो पुत्र, तुम अपने पिताजी पर ही चित्रकारी करते रहो। मुझे अपने चेहरे पर चित्रकारी नहीं करवानी।" माया ने डरने का अभिनय करते हुए कहा।

“ठीक है माता, मैं आप पर चित्रकारी नहीं करूंगा, पर मुझे आपसे एक चीज पूछनी है माता?” हनुका ने माया को देखते हुए कहा- “आपके और पिता जी के शरीर पर तो ऐसे बाल नहीं हैं, फिर मेरे शरीर पर ऐसे बाल क्यों हैं? मैं आप दोनों की तरह क्यों नहीं दिखता माता?" हनुका अपने शरीर के बालों को दिखाते हुए बोला।

“तुम्हारे शरीर पर इसलिये इतने बाल हैं, कि तुम्हें हिमालय की बर्फ में ठंडक ना महसूस हो। महानदेव बालकों को ठंड से बचाने के लिये, उनके शरीर पर ऐसे बाल दे देते हैं।” माया ने नन्हें हनुका को समझाते हुए कहा।

"फिर महल के बाकी दास-दासियों के, पुत्रों के शरीर पर बाल क्यों नहीं हैं माता?” हनुका ने एक और प्रश्न कर दिया।

'क्यों कि देव, केवल युवराज के शरीर पर इतने बाल देते हैं और तुम तो हिमालय के युवराज हो ना? बस इसीलिये तुम्हारे शरीर पर इस प्रकार से बाल हैं।” माया ने कहा- “क्या तुम्हें ये बाल नहीं पसंद हैं हनुका?"

“नहीं माता, मुझे भी अन्य बालकों की तरह दिखना है।” हनुका ने अपना दर्द व्यक्त करते हुए कहा- “क्या मैं उनकी तरह नहीं बन सकता माता?"

“बन सकते हो, पर इसके लिये तुम्हें देवशक्तियों की आवश्यकता होगी।” माया ने हनुका को समझाते हुए कहा- “पर मुझे नहीं लगता कि तुम अन्य बालकों के समान बनकर प्रसन्न रह पाओगे?"


“आपको ऐसा क्यों लगता है माता?” हनुका के मस्तिष्क में घुमड़-घुमड़ कर नये प्रश्न आ रहे थे।

“क्यों कि हनुका, हम जैसे हैं हमें वैसी ही प्रवृति के लोग अच्छे लगते है। हो सकता है कि क्षणिक मात्र, हमारा हृदय किसी अन्य प्रवृति की कामना करे, पर कुछ देर के बाद ही, हम स्वयं पहले की ही तरह बनना चाहते हैं।" माया ने कहा।

“मैं आपके कहने का अभिप्राय नहीं समझा माता?" हनुका के चेहरे पर उलझन के भाव नजर आये।

“ठीक है, मैं तुम्हें सरल भाषा में समझाने के लिये एक छोटी सी कथा सुनाती हूं।” माया ने पलंग पर बैठते हुए हनुका को अपनी गोद में बैठा लिया।

"अरे वाह! कथा फिर तो बहुत मजा आयेगा। नन्हा हनुका खुश होते हुए बोला।

"तो सुनो, एक बार हिमालय की कंदराओं में एक ऋषि रहते थे, जो प्रतिदिन प्रातः काल, गंगा नदी के पानी में स्नान करते थे और सूर्यदेव को जल चढ़ाते थे। प्रति दिन की भांति एक दिन जब, वह नदी में स्नान कर, सूर्य को जल चढ़ाने के लिये अपनी अंजुली में पानी भर रहे थे, तभी उनकी अंजुली में एक नन्हीं सी चुहिया आ गई, जो कि शायद नदी की धारा में डूब रही थी। ऋषि ने उस चुहिया को कन्या बनाकर अपनी पुत्री के रुप में स्वीकार कर लिया। पुत्री जब बड़ी हुई तो ऋषि ने अपनी पुत्री से पूछा कि तुम्हें किस प्रकार का वर चाहिये? तो पुत्री ने कहा कि जो इस पूरे संसार में सर्वशक्तिमान हो, मुझे उससे विवाह करना है।

“ऋषि ने बहुत सोचने के बाद पुत्री को सूर्यदेव का प्रस्ताव दिया। ऋषि ने कहा कि सूर्यदेव ही इस पृथ्वी पर
सर्वशक्ति मान हैं। पर ऋषि पुत्री ने कहा कि सूर्यदेव से शक्तिशाली तो मेघ हैं, जो कि उन्हें पल भर में पूर्णतया ढक लेते हैं। तो ऋषि ने मेघों के देवता का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा, पर पुत्री ने उसे भी अस्वीकार कर दिया। पुत्री ने कहा कि मेघों के देवता से शक्तिशाली, तो पर्वतराज हिमालय हैं, जो मेघों को भी रोककर, उन्हें बरसने पर विवश कर देते हैं। यह सुनकर ऋषि ने इस बार हिमालय के विवाह का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा। तभी उस पुत्रि को हिमालय में छेद करता हुआ एक चूहा दिखाई दिया।

“उसे देख पुत्री ने कहा कि हिमालय से शक्तिशाली तो यह चूहा है, जो हिमालय में भी छेद कर सकता है, मैं तो इस चूहे से ही शादी करूंगी। फिर ऋषि समझ गये कि इस चुहिया को पूरी पृथ्वी पर, चूहा ही सबसे
शक्तिशाली दिखाई दिया, इसलिये ऋषि ने उस कन्या को फिर से चुहिया बना दिया और उसका विवाह खुशी-खुशी उस चूहे से कर दिया। तो इस कथा से यह पता चलता है हनुका कि जो जिस प्रकार है, उसे सदैव वैसी ही चीजें भाती हैं।' यह कहकर माया शांत हो गई और हनुका की ओर देखने लगी।

हनुका माया की कथा सुनकर कुछ सोच में पड़ गया। उसे सोचता देख माया ने पूछ लिया- “क्या सोच रहे हो हनुका?”

"तो फिर मेरा भी विवाह किसी बालों वाली कन्या के साथ ही होगा?" हनुका ने अपने चेहरा रोने सा बनाते हुए पूछा।

हनुका की बात सुन माया जोर से हंसते हुए बोली“अरे नहीं हनुका, तुम्हारा विवाह तो मैं पृथ्वी की सबसे सुंदर कन्या से करुंगी और तब तक तो तुम देवशक्ति प्राप्त कर, अपने भी शरीर के बाल हटा चुके होगे?"

“फिर ठीक है।" माया की बात सुन अब हनुका खुश हो गया।

“अच्छा, अब मैं महानदेव की पूजा करने जा रही हूं। पर इस बीच, तुम कोई और शरारत मत करना। ठीक है?” माया ने हनुका को पलंग पर बैठाते हुए कहा।

“जी माता, मैं आपके पूजा करने तक, चुपचाप पलंग पर बैठा रहूंगा, मैं कोई शरारत नहीं करूंगा। हनुका ने भोलेपन से कहा।

हनुका के वचन सुन माया ने हनुका के सिर पर धीरे से हाथ फेरा और पूजा स्थल की ओर बढ़ गई।

माया तो चली गई, पर हनुका अभी भी पलंग पर बैठा देवशक्ति के बारे में सोच रहा था- “माता ने कहा कि अगर मुझे देवशक्ति मिल जाये तो मैं भी दूसरे मनुष्यों की ही भांति, सुंदर दिखने लगूंगा, पर दूसरे कमरे में एक डिब्बे में बहुत सी देवशक्तियां रखी हैं, फिर माता, मुझे उन देवशक्तियों से सुंदर क्यों नहीं बना देती? शायद माता उन देवशक्तियों के बारे में भूल गई होंगी? एक काम करता हूं, मैं स्वयं उन देवशक्तियों से सुंदर बन जाता हूं और माता जब पूजा करके आयेगी, तो मैं उसे अपना सुंदर चेहरा दिखाकर, आश्चर्यचकित कर दूंगा हां-हां यही सही रहेगा।“ यह सोच नन्हा हनुका दूसरे कक्ष की ओर चल दिया, जहां देवशक्तियां रखीं थीं।

हनुका ने दूसरे कमरे में रखी अलमारी खोल ली, नीचे के दोनों खानों में वह सुनहरा डिब्बा नहीं था। अतः हनुका एक कुर्सी को खींचकर, अलमारी के पास ले आया और उस पर चढ़कर देखने लगा।

अब हनुका को अलमारी के तीसरे खाने में रखा, वह सुनहरा डिब्बा दिखाई दे गया। हनुका ने दोनों हाथ लगाकर उस सुनहरे डिब्बे को उठा लिया।

अब वह कुर्सी से उतरकर, वहीं कक्ष में जमीन पर ही बैठ गया। हनुका ने अब डिब्बे को खोल लिया।

रंग-बिरंगे रत्नों से हनुका की आँखें चमक उठीं। हनुका अब एक-एक रत्न को उठाकर देखने लगा, पर उसे समझ ना आया कि इन देवशक्तियों का प्रयोग करना कैसे है?

तभी हनुका को उस सुनहरे डिब्बे में एक छोटी सी डिबिया दिखाई दी। यह वहीं डिबिया थी, जिसे माया को महानदेव ने दिया था।

हनुका को इन सभी रत्नों के बीच, वह छोटी सी डिबिया का रखा होना, बहुत अजीब सा लगा, इसलिये हनुका ने उस डिबिया को खोल लिया।

“ये क्या बात हुई? इस डिबिया में तो जल की मात्र एक बूंद है?” हनुका ने सोचा- “कुछ सोच हनुका ने उस डिबिया को मुंह लगा कर, जल की उस बूंद को पी लिया।

“इससे तो प्यास भी नहीं बुझी। पता नहीं यह कैसी देवशक्ति थी ?” हनुका ने कहा।

तभी हनुका को कक्ष में किसी के आने की आहट सुनाई दी। वह आहट सुन हनुका डर कर तेजी से अलमारी के पीछे छिप गया।

सभी देवशक्तियां कमरे में वैसे ही बिखरी हुईं थीं। आने वाली आहट माया की थी, जो कि पूजा करके हनुका को ढूंढते हुए उधर ही आ गई थी- “हनुका !"

हनुका को पुकारते हुए, माया कक्ष में प्रविष्ठ हो गई, पर कक्ष में प्रविष्ठ होते ही माया के चेहरे पर हैरानी और क्रोध के भाव एक साथ आ गये। “हे मेरे ईश्वर, यह हनुका भी ना, पता नहीं क्या-क्या करता रहता है?"

माया ने घबराकर सभी देवशक्तियों को जमीन से उठाकर, वापस डिब्बे में रखना शुरु कर दिया। साथ ही साथ वह उन देवशक्तियों की गिनती भी करती जा रही थी। 14 देवशक्तियों की गिनती कर उन्हें डिब्बे में रखने के बाद, माया की नजर अब दूर पड़ी सुनहरी डिबिया पर गई।

माया ने उस डिबिया को खोलकर देखा, पर उसमें गंगा की पहली बूंद नहीं थी।

यह देखकर माया का कंठ सूख गया, पर इससे पहले कि वह हनुका को ढूंढकर, उसे कोई दण्ड दे पाती, माया की आँखों के सामने ही, हवा में एक बूंद प्रकट होकर, उस डिबिया के अंदर चली गई।

माया यह चमत्कार देख आश्चर्य में पड़ गई, तभी माया को अपने सामने महानदेव का ऊर्जा रुप दिखाई दिया।

यह देख माया ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया।

तभी वातावरण में देव की आवाज गूंजी “माया, तुम्हें देवशक्तियों को और ध्यान से रखना होगा, यह तुम्हारा कर्तव्य है, कि तुम इन देवशक्तियों को सदैव उचित व्यक्ति को ही दो। आज अंजाने में ही सही परंतु गुरुत्व शक्ति का प्रयोग हुआ है। परंतु तुम्हारे सद्भाग्य के कारण, वह गुरुत्व शक्ति सही पात्र के पास पहुंच गई है और यही कारण है कि तुम इस डिबिया की गुरुत्व शक्ति को दोबारा से देख पा रही हो। ध्यान रखना जब भी इस गुरुत्व शक्ति का वरण कोई सुपात्र करेगा, तो इसकी दूसरी बूंद इस डिबिया में आ जायेगी, परंतु यदि कभी इस बूंद का वरण किसी कुपात्र ने किया, तो यह बूंद कभी धरती पर प्रकट नहीं होगी और ऐसी स्थिति में, तुम्हें देवताओं के क्रोध का भी सामना करना पड़ सकता है। इसलिये तुम्हें इन देवशक्तियों को लेकर अत्यंत सावधान रहने की जरुरत है।"

“जी देव, मैं आगे से सदैव आपकी बात का ध्यान रखूगी। मैं आज ही हिमालय पर आपके एक शिव मंदिर का निर्माण कर, इस गुरुत्व शक्ति को उसमें रख दूंगी।" माया ने कहा- “वह शिव मंदिर इस गुरुत्व शक्ति को लेकर हिमालय के गर्भ में प्रवेश कर जायेगा और जब तक मुझे इस गुरुत्व शक्ति के लिये, कोई सुपात्र नहीं मिल जाता? तब तक मैं इसे वहीं रहने दूंगी। हां वह शिव मंदिर प्रत्येक वर्ष, आपकी पूजा-अर्चना के लिये हिमालय के गर्भ से एक बार बाहर आयेगा और संध्या वंदना के साथ, वापस हिमालय की गर्भ में समा जायेगा। अब रही बात इन बाकी की देवशक्ति यों की, तो इन्हें मैं ऐसे स्थान पर रखूगी, कि वहां तक कोई कुपात्र पहुंच कर, इन शक्तियों को प्राप्त ही नहीं कर पायेगा। आज की घटना ने मुझे अच्छा ज्ञान दिया है देव, अब मुझसे कभी भी इस प्रकार की त्रुटि नहीं होगी, ऐसा मैं आपको विश्वास दिलाती हूं।"

"कल्याण हो माया।" यह कहकर देव अंतर्ध्यान हो गये। अब माया ने जल्दी से गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी, अपने सुनहरे डिब्बे में रखा और पूरे डिब्बे को अपने हाथ में लेकर कोई मंत्र पढ़ने लगी।

कुछ ही देर में वह सुनहरा डिब्बा माया के हाथों से कहीं हवा में विलीन हो गया। अब माया की नजर हनुका को ढूंढने में लग गई।

"हनुका ऽऽऽऽऽ।” माया ने कमरे के एक-एक स्थान का सामान हटाकर, हनुका को ढूंढना शुरु कर दिया।

माया ने अलमारी के पीछे भी देखा, पर हनुका पूरे कमरे में कहीं दिखाई नहीं दिया। तभी माया को हनुका की हंसी सुनाई दी।

माया ने हंसी की आवाज का पीछा करते हुए, कक्ष की छत की ओर देखा, तो माया के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्यों कि हनुका इस समय पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण छोड़, कक्ष के छत की ओर, हवा में तैर रहा था।

एक पल में माया को समझ में आ गया कि देव किस सुपात्र की बात कर रहे थे। वह जान गई थी कि हनुका ने ही गुरुत्व शक्ति का वरण किया था।

माया ने हनुका को नीचे आने का इशारा किया, पर हनुका ने डरकर अपना सिर ना में हिलाया।

“आप मुझे मारोगी?” हनुका ने भोलेपन से कहा।

“नहीं मारुंगी, परंतु नीचे आओ।” माया ने हनुका को घूरते हुए कहा।

हनुका डरते-डरते नीचे आ गया। माया ने हनुका के कान पकड़े और उसे लेकर महल के अंदर की ओर चल दी- “चलो तुम्हें अपने हाथ के बने लड्डू खिलाती हूं।

“लड्डू! वाह, फिर तो आनन्द ही आ जायेगा। हनुका यह सुनकर खुश हो गया।

माया ने हनुका का हाथ पकड़ा और फिर उसे प्यार करते हुए महल के अंदर की ओर चल दी।

इस दृश्य को देखकर तो बस यही कहा जा सकता है कि माँ तो आखिर माँ ही होती है।


जारी रहेगा………✍️
Nice update....
 
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