रेनू की नज़र अपने आप उसके लंड पर गई—अब आधा खड़ा था। पहले हमेशा पूरा खड़ा देखा था, ये नया था। ऊपर का मोटा, बालों वाला बदन—सामान्य तौर पर घिन होता। पर ये पहली बार था जब रेनू ने किसी मर्द को पूरा नंगा देखा था।
“तू पूरा नंगा है।” रेनू ने फुसफुसाते हुए कहा।
“हाँ। पास आऊँ?” बिना इंतज़ार के कुछ कदम आगे।
अब उसका आधा खड़ा लंड रेनू से कुछ इंच दूर। पास से बदन और अजीब लगा। जन्मचिह्न, चोट के निशान, बालों वाले निप्पल। रेनू कहती है उत्तेजना नहीं हुई क्योंकि बदसूरत था। पर मुझे पूरा यकीन है थोड़ी तो हुई ही होगी। लल्लू ने भी समझ लिया। उसने धीरे से खिड़की में हाथ डाला, रेनू का दायाँ हाथ पकड़ा। रेनू ने रोकने की कोशिश नहीं की। लल्लू ने हाथ नीचे लाकर अपने लंड पर रख दिया। रेनू ने उंगलियों से ढीली चमड़ी पर फेरा। पहले हमेशा पूरा टाइट होता था। वो सोच ही रही थी कि लल्लू ने पढ़ लिया।
“सोच रही है अभी पूरा खड़ा क्यों नहीं?”
रेनू ने सिर हिलाया।
“दो तरीके हैं। या तो तू खेल, या अपनी गांड दिखा दे।”
“क्या!!! पागल हो गए हो?” रेनू ने हाथ खींच लिया।
“बस बता रहा हूँ मर्द का कैसे खड़ा होता है।” लल्लू हँसा।
“मुझे परवाह नहीं वो खड़ा हो या नहीं।”
“झूठ। तू फिर मुझे मुठ मारते देखना चाहती है।”
“नहीं… चाहती…” रेनू रुक गई, आवाज़ में झूठ साफ़ था।
लल्लू चुप। दोनों खड़े रहे। रेनू नीचे देखती, कभी-कभी लंड पर नज़र डालती। लल्लू तनाव बढ़ा रहा था। और रेनू… रेनू अब तय नहीं कर पा रही थी कि खिड़की बंद कर सो जाए या कुछ और होने दे। कुछ और मिनट यूं ही ख़ामोशी में बीते। फिर अचानक लल्लू ने बिजली की तरह हाथ बढ़ाया। दोनों हाथों से रेनू के पायजामे की इलास्टिक पकड़ी और ज़ोर से नीचे खींच दिया!
पायजामा में नाड़ा नहीं था, इलास्टिक था, सो फट से नीचे सर...रेनू ने छोटी-सी चीख़ निकाली और पीछे हटने लगी, पर पायजामा घुटनों तक अटक गया। पैर उलझे और वो पीठ के बल गिरी, पर घुटने मोड़ लिए, सो ज़ोर की ठुकाई बची। बस गाँड के बल धम्म से ज़मीन पर जा बैठी।
पर गिरने की रफ़्तार से उसका शरीर पीछे झुका, सिर और कंधे फ़र्श पर टिके, पैर हवा में ऊपर उठ गए, जैसे योगा कर रही हो। उसी झटके में ढीला पायजामा दोनों टाँगों से फुर्र से उड़ गया। रेनू हड़बड़ाकर उठकर बैठी तो लल्लू हँसते हुए बोला,
“वाह! क्या नज़ारा है!”
अब वो सिर्फ़ पैंटी और टॉप में थी, टाँगें पूरी नंगी।
फटाफट उठी, पायजामा ढूँढने लगी। कहीं नहीं दिख रहा था।
“बिस्तर के नीचे है।” लल्लू अब भी हँस रहा था।
और सीधी-सादी रेनू सच में घुटनों-हाथों के बल झुककर बिस्तर के नीचे देखने लगी। दो सेकंड बाद लल्लू बोला,
“आह! मज़ा आ गया! देख, अब मेरा लौड़ा पूरा खड़ा होने लगा।”
रेनू की अक्ल ठिकाने आई। वो घोड़ी बनकर झुकी थी, पैंटी वाली गाँड सीधे लल्लू की तरफ़, जाँघें और आधी-आधी गांड की चीक्स साफ़ दिख रही थीं। झट से सीधी हुई और घुटनों पर बैठ गई।
“तुम बहुत कमीने हो!” गुस्से से बोली, “सच में बिस्तर के नीचे है?”
“हा हा हा! नहीं!” लल्लू और ज़ोर से हँसा।
“श्श! कोई सुन लेगा!” रेनू डरी, “बता कहाँ है?”
“बस यही इसका सोच, जो मेरे पास है।” लल्लू ने अपने लंड की तरफ़ इशारा किया।
रेनू ज़मीन पर बैठी थी, लंड नहीं दिख रहा था। उठी तो देखा—लल्लू का लंड अब पूरा खड़ा, गुस्से में लाल, ऊपर-नीचे झूल रहा था। पायजामा भूल गई, आँखें उस पर जमीं की जमीं। जैसे पतंगा शमा की तरफ़ खिंचा चला जाता है, रेनू खिड़की तक आ गई। पता भी नहीं चला कब उसके हाथ लल्लू के लंड पर लिपट गए। नीचे सिर्फ़ पैंटी थी, वो भी भूल गई। लल्लू ने धीरे से अपना हाथ उसके हाथ पर रखा। जब रेनू ने नहीं हटाया तो उंगलियों पर दबाव डाला, कसकर पकड़ने को कहा। फिर उसका हाथ पकड़कर आगे-पीछे करने लगा, मुठ मारना सिखाने लगा।
रेनू आज्ञाकारी बच्ची की तरह हाथ चलाने लगी। उसके मुलायम हाथों में गर्म, धड़कता लंड आगे-पीछे सरक रहा था। लंड के सिरे से पानी निकलने लगा था, चिपचिपाहट हाथ में लग रही थी। पहली बार ऐसा कुछ महसूस कर रही थी। एक मिनट बाद लल्लू ने हाथ छोड़ा। रेनू खुद ही मुठ मारने लगी।
लल्लू को लगा अब लड़की पूरी तरह खेल में है। उसने हाथ नीचे बढ़ाया, पैंटी पर। पर रेनू तैयार थी। ठंडी आवाज़ में बोली,
“हटाओ हाथ! ऐसी हिम्मत की तो तोड़ दूँगी।”
लल्लू जम गया। समझ गया कि मज़ाक नहीं है। वापस खड़ा रहा, रेनू मुठ मारती रही। पहली बार थी, टेक्नीक नहीं आती थी—कभी धीमे, कभी तेज़, कब कसना-कब ढीला करना, कुछ नहीं पता। कई मिनट बीत गए, लल्लू को झड़ने का नाम नहीं।
“हाथ दुख गया।” रेनू ने लंड छोड़ दिया।
लल्लू ने मायूस आवाज़ निकाली, पर फट से अपना हाथ लगाकर ज़ोर-ज़ोर से मुठ मारने लगा। रेनू दोनों हाथों से ग्रिल पकड़कर खड़ी हो गई, मुठ मारते हुए देखने लगी।
“तुम कितनी तेज़ी से करते हो!” आश्चर्य से बोली।
“यही तरीका है।” लल्लू साँसों में बोला।
फिर आँखों में आँखें डालकर दूसरा हाथ आगे बढ़ाया, रेनू के टॉप का ऊपरी बटन खोलने। रेनू ने झटके से हाथ मार दिया।
“प्लीज़ यार! भीख माँगता हूँ!” लल्लू बोला।
रेनू मुस्कुराई। धीरे-धीरे खुद बटन खोलने लगी। सारे बटन खुले तो लल्लू खुशी से उछला—अंदर ब्रा नहीं थी! रेनू ने थोड़ा हिचकिचाया, फिर टॉप उतारकर पीछे फेंक दिया। और वहाँ खड़ी थी—परफेक्ट कुँवारी जिस्म, शानदार चूचियाँ, सिर्फ़ पैंटी में। अधेढ़ नौकर के सामने।
ये नज़ारा लल्लू बर्दाश्त न कर सका। लंड और तेज़ी से हिलाने लगा, कराहने लगा। रेनू समझ गई, सख़्ती से बोली,
“इस बार मेरे बदन पर मत करना।”
लल्लू ने सिर हिलाया, लंड नीचे की तरफ़ मोड़ा। कुछ सेकंड में दीवार पर माल की बौछार। रेनू मंत्रमुग्ध देखती रही। लल्लू ने लंबी साँस छोड़ी, नरम होते लंड को हाथ में पकड़े रेनू को भूखी नज़रों से देखता रहा।
“अब… तेरी बारी है न?” उसने हिचकते हुए पूछा।
“क्या मतलब?”
“तूने मुझे झड़वाया। मैं भी तेरे लिए कर दूँ?” ऑफ़र किया।
“नहीं!” रेनू ने साफ़ मना कर दिया।
“कम से कम पूरा नंगा तो हो जा? तेरी बुर… मतलब प्राइवेट प्लेस तो दिखा दे?”
और “बुर” शब्द ने रेनू के अंदर कोई बटन दबा दिया। वो कुछ पल गुस्से से घूरती रही, फिर खिड़की ज़ोर से बंद कर दी। रेनू कहती है उस रात उसे बहुत गिल्ट और शर्मिंदगी हुई।
मैंने पूछा, “फिर मुठ मारी होगी न?”
वो भड़क गई—“बिल्कुल नहीं!”
पर मुझे पूरा यकीन है कि मारी होगी।
लल्लू ने कुछ देर खटखटाया, पर रेनू ने जवाब नहीं दिया। लल्लू समझ गया कि आज जितना मिला, उससे कहीं ज़्यादा था, सो चुपके से चला गया। इसके बाद रेनू ने जल्दी-जल्दी बाक़ी बताया—