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Adultery Housewife Ko Boldwife Banaya

RishuG

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अगली सुबह मम्मी ने दरवाज़ा पीटते हुए जगाया।

“रेनू! उठ! रेनूउउ!”

रेनू हड़बड़ा कर उठी। मम्मी की आवाज़ सुनकर सारी रात की यादें लौट आईं। सपना था या सच? मम्मी ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रही थीं। रेनू को लगा अबकी बार लल्लू ने सब बता दिया होगा। इज़्ज़त गई।

“आ रही हूँ!” चिल्लाकर दरवाज़ा खोला। मम्मी अंदर आईं, पर डाँट नहीं पड़ी।

“क्या बात है रेनू? 11 बज गए, अभी तक सो रही थी?”

“हाँ… मैं… पता नहीं…”

मम्मी ने माथा छुआ, “बुखार तो नहीं? चल नीचे आ, किचन में मदद कर।”

पूरे दिन रेनू डर के मारे काँपती रही। सच था या सपना? अगर सच था तो लल्लू ज़रूर किसी को बता देगा। पर दिन बीतता गया, कुछ नहीं हुआ। उस रात टखने में दर्द का बहाना बनाकर लिविंग रूम के सोफ़े पर सोई। अगले दो दिन भी यही बहाना। फिर मम्मी ने ज़ोर दिया कि अब तो सीढ़ियाँ चढ़ने की कोशिश कर। उस रात बारसाती में लेटी तो दिल ज़ोर-ज़ोर धड़क रहा था। लल्लू आएगा ही। पर वो नहीं आया। न अगले दिन, न उसके अगले दिन। पूरा हफ़्ता बीत गया, लल्लू कहीं दिखा तक नहीं। अब रेनू को पूरा यकीन हो गया कि सब सपना था। सिर्फ़ पहली रात उसने गलती से उसे अंडरवियर में देख लिया था, बाकी सब उसकी अकेली और उत्तेजित दिमाग की उपज थी।

अब पूरी तरह निश्चिंत होकर एक दिन मम्मी ने कहा, “जा, पड़ोस में अंकल-आंटी को खीर का कटोरा दे आ, अंकल को बहुत पसंद है।”

रेनू हँसते-गाते पड़ोस गई, डोरबेल बजाई।

दरवाज़ा लल्लू ने खोला। उसे देखकर मुस्कुराया। रेनू ने गौर से देखा— मुस्कान बिल्कुल मासूम और विनम्र थी, कोई गंदी नीयत नहीं। हाँ, सच में सब सपना था!

“जी मैडम?”

“मम्मी ने अंकल-आंटी के लिए खीर भेजी है।”

“अंदर आ जाइए, वो बेडरूम में हैं।”

रेनू अंदर गई। घर बड़ा था। लंबा गलियारा, दो कमरे पार करके लल्लू ने एक बंद दरवाज़े पर दस्तक दी।

“साहब, पड़ोस की रेनू मैडम आई हैं।”

“अरे अच्छा, अंदर लाओ।”

लल्लू अंदर ले गया और चला गया। अंकल-आंटी बिस्तर पर थे, दोनों को बुखार था। रेनू ने खीर दी, 10-15 मिनट बातें कीं, फिर चलने लगी।

गलियारे से गुज़र ही रही थी कि अचानक किसी ने पीछे से पकड़ा और एक खाली कमरे में खींच लिया। चीखने जा रही थी कि दूसरा हाथ मुँह पर पड़ गया। डर से आँखें फटी की फटीं— लल्लू था। उसने दरवाज़ा अंदर से बंद किया, एक हाथ अभी भी मुँह पर। रेनू हाथ-पैर चलाने लगी, पर लल्लू ने दूसरी बाँह से कसकर पकड़ लिया और दीवार से सटा दिया।

उसका भारी बदन रेनू पर दबा हुआ था, हिलना मुश्किल।

“श्श… डरो मत। कुछ नहीं करूँगा। बस बात करनी है।” लल्लू बोला।

रेनू फिर भी चीखने की कोशिश करने लगी।

“चीखोगी तो लोग सुन लेंगे, तेरी इज़्ज़त जाएगी समझी?”

फिर वही डर। रेनू चुप हो गई।

“अच्छी लड़की। अब मुँह से हाथ हटाता हूँ, चीखना मत, वादा?” रेनू ने सिर हिलाया।

लल्लू ने हाथ हटाया, पर बदन अभी भी पूरा सटा हुआ था।

“पागल हो गए हो?” रेनू फुसफुसाई।

“फुसफुसाने की ज़रूरत नहीं,” लल्लू अब गंदी हँसी के साथ बोला, “बूढ़े इतनी दूर हैं, उनको सुनाई नहीं देता।”

“पागल हो क्या? मुझे छोड़ो, दम घुट रहा है।”

“तुमने मुझे पागल कर दिया मैडम।” लल्लू और ज़ोर से रगड़ते हुए बोला। रेनू को उसकी छाती उसके बूब्स से रगड़ते महसूस हुई। “तुमने लंड देखने को कहा, छूने को कहा, मज़े लेकर छुआ और फिर ग़ायब?”

“झूठे!” रेनू चीखी, “मैंने कुछ नहीं कहा। तुमने ज़बरदस्ती करवाई। और हटो!”

“हा हा!” लल्लू जीत की हँसी हँसा, “देखा, तुमने ‘मज़े लेकर छुआ’ ये तो नहीं नकारा। मतलब मज़ा आया था!”

“बकवास बंद करो। हटो वरना चीखूँगी, जो होगा सो होगा।”

लल्लू डर गया और कुछ कदम पीछे हटा। रेनू ने अपना सलवार-कमीज़ ठीक किया।
 
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RishuG

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“तुम बहुत बेवकूफ हो।” लल्लू हाथ बाँधकर बोला।

“मैं बेवकूफ???”

“हाँ। खुद से झूठ बोल रही हो। उस रात तुझे मज़ा आया था, फिर भी भाग गई। मैंने कितनी देर खटखटाया, तूने दरवाज़ा नहीं खोला। फिर छत पर सोना ही बंद कर दिया।”

“बस दो-तीन दिन। अब फिर सो रही हूँ।” कहते ही रेनू ने जीभ काट ली। ये क्या बोल गई!

“ओहो! तो मैं ग़लत समझ रहा था। मतलब तू हर रात मेरा इंतज़ार कर रही है?” लल्लू हँस पड़ा।

“पागल मत बनो। मैं किसी का इंतज़ार नहीं कर रही। अब मुझे जाना है।”

“तो आज रात आऊँ?”

“नहीं! बिल्कुल नहीं! प्लीज़ मुझे तंग मत करो।”

“रेनू मैडम!” लल्लू ने नाटकीय ढंग से आश्चर्य जताया, “मैं तंग कर रहा हूँ? मैंने कभी तेरे गले पर छुरी नहीं रखी न? सब तेरी मर्ज़ी से हुआ। और अभी तूने खुद माना कि मज़ा आया था।”

“मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा!”

“देखा, फिर वही— कहा तो नहीं नकारा, पर हुआ ये नहीं नकारा।”

रेनू ने माथा पीट लिया। ये आदमी नामुमकिन था।

“सुनो लल्लू, मैं जा रही हूँ। अगर मैंने कुछ ग़लत किया तो सॉरी। पर अब बस। मैं अच्छे घर की सभ्य लड़की हूँ। प्लीज़ बंद करो ये सब।”

लल्लू बस घूरता रहा।

“मैं जा रही हूँ।” रेनू ने कहा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी।

“रुक!” लल्लू की आवाज़ इतनी सख़्त थी कि रेनू अपने आप रुक गई।

“तू सोचती है मैं तंग कर रहा हूँ। तूने मुझे छेड़ा है। मैं सालों से चुपचाप नौकरी कर रहा था। कभी तेरे सामने ग़लत बोला? तूने खिड़की खोलकर आधा नंगा होकर मुझे छेड़ा। फिर मेरी मुठ मारते झाँका। फिर खुद ही…”

लल्लू रुक गया और बहुत दुखी स्वर में बोला, “एक गरीब नौकर को यूँ छेड़कर मज़ा आता है?”

“नहीं लल्लू, ऐसा नहीं है…” रेनू को सच में बुरा लगने लगा।

“मेरी भी एक सुंदर बीवी थी। टीबी से मर गई।” लल्लू की आँखों से आँसू बहने लगे, “20 साल हो गए, मैंने दोबारा शादी नहीं की। और मैं कोई पैसे वाला तो हूँ नहीं तो तब से आज तक औरत की शक्ल तक नहीं देखी। सोचो कितना मुश्किल है मेरे लिए?”

रेनू चुप। उसने कभी मर्द को रोते नहीं देखा था। उसे पता ही नहीं था कि लल्लू एक्टिंग कर रहा है, उसे गिल्ट में डाल रहा है।

“जाना चाहती है तो जा।” लल्लू आँसू पोंछते हुए बोला, “मैंने तो सोचा था तू अच्छी लड़की है। पता नहीं कितनी क्रूर है।”

“मैं… मैं सॉरी लल्लू। मैं बुरी नहीं हूँ। मैंने जानबूझकर कुछ नहीं किया।”

“हाँ, ज़रूर।” लल्लू ने तंज कसा।

“सच में। मैं तेरी भरपाई करना चाहती हूँ। मेरे पास ये 500 रुपये हैं, ले ले, इससे अगर कुछ कर पाए तो।”

“क्या?” लल्लू और ज़्यादा दुखी दिखा, “अब तूने बता दिया मेरा असली दाम कितना है। पैसे से सब ख़रीद लोगी?”

“नहीं! मैं तो बस…” रेनू घबरा गई।

दोनों चुप। कुछ मिनट बाद लल्लू बोला,

“अगर सच में भरपाई करना चाहती है तो एक तरीका है…”

“क्या?”

“20 साल से मैं औरत के पास नहीं गया… सोच रहा था…”

“क्या!!! लल्लू!!! शर्म नहीं आती???” रेनू चीखी।

“नहीं-नहीं! ग़लत समझी! मैं तेरे साथ सोने को नहीं कह रहा!” लल्लू ने हाथ हिलाकर मना किया।

“फिर?”

“तू कुँवारी है, कुँवारी ही रहना चाहिए। मैं नौकर हूँ, इतना भी नहीं सोचता। बस… 20 साल में किसी औरत को पूरा नंगा तक नहीं देखा। अगर कभी… कभी… बस कुछ सेकंड के लिए अपनी चूचियाँ दिखा दे तो…?”

“क्या बकते हो???”

“बस एक बार। तुम अपने कमरे में रहना, मैं इधर छत पर रहूँगा। खिड़की खुली रखना, बस झलक दे देना। मेरे लिए बहुत बड़ी बात होगी। आख़िर तूने मेरा लंड देख भी लिया, छू भी लिया। तो थोड़ा सा बदला तो बनता है न? नहीं-नहीं, ज़बरदस्ती नहीं। बस रिक्वेस्ट है। तूने कहा था भरपाई करेगी। ये बहुत आसान तरीका है। 20 फुट दूर से, कुछ सेकंड। मैं ज़िंदगी भर उस याद को संजोकर रखूँगा।”

रेनू अवाक उसको देखती रही।

“ठीक है, समझ गया।” लल्लू कंधे झुकाकर बोला, “चल, तेरी मम्मी चिंता कर रही होंगी।

वो दरवाज़ा खोलकर खड़ा हो गया। रेनू बाहर निकली, सर झुकाए, दिमाग सुन्न। लल्लू बिना एक शब्द बोले उसे दरवाज़े तक छोड़ने आया और चुपचाप बंद कर दिया। उस दिन रेनू पूरे समय ज़ॉम्बी की तरह रही। बार-बार लल्लू की बातें दिमाग में घूमती रहीं। क्या सच में उसने उसे छेड़ा था? क्या ज़्यादा गुनाह उसका ही था? नहीं, पूरी तरह उसका नहीं। उसने ग़लतियाँ कीं, पर लल्लू ने भी ज़बरदस्ती की… या की थी? उसे याद नहीं आ रहा था कि लल्लू ने सच में ज़बरदस्ती की थी या सिर्फ़ धीरे-धीरे उकसाया था। और भले ही उसने ज़बरदस्ती की हो, क्या गुनाह सिर्फ़ उसका ही था?
 

RishuG

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लल्लू सही कह रहा था न? वो एक अकेला अधेढ़ नौकर था। अगर उसने लापरवाही से अपना आधा नंगा बदन उसे दिखा दिया था, तो क्या उसका आगे बढ़ना स्वाभाविक नहीं था? शायद बस वही कर दे जो वो चाहता है। कुछ सेकंड के लिए चूचियाँ दिखा दे और मामला खत्म। सब कुछ तो उसी खिड़की से फ्लैश होने से शुरू हुआ था, उसी से खत्म भी हो जाए। पर नहीं! एक साधारण नौकर को अपनी चूचियाँ कैसे दिखा दे?

जो कभी टाइट कपड़े तक नहीं पहनती थी कि कहीं सस्ती रंडी न लगे। नहीं-नहीं, ये नामुमकिन है। अगले कुछ रातें जैसे आँख मिचौनी का खेल बन गईं। हर रात रेनू ऊपर जाती, लल्लू ठीक 20 फुट दूर, खिड़की के सामने खड़ा होता। रेनू कमरे में जाती, अलमारी से कपड़े निकालती, फिर खिड़की बंद करने जाती। हर रात आँखें मिलतीं। लल्लू की आँखों में मिन्नत, जैसे कह रहा हो—“बस एक बार दिखा दे, प्लीज़।” रेनू बिना भाव के कुछ सेकंड देखती और खिड़की बंद कर देती।

लल्लू ने कुछ नहीं किया। न दरवाज़ा पीटा, न खिड़की पर खटखटाया, न अपना लंड निकालकर दिखाया। उसकी ये शालीनता ही रेनू को उलझन में डालने लगी। अगर वो ज़बरदस्ती करता तो मना करना आसान होता। पर वो तो बस खड़ा रहता, पप्पी जैसे आँखें करके।

हर बीतती रात रेनू सोचती—“शायद कर ही दूँ।” फिर ज़ोर से—“नहीं! मैं ऐसा नहीं कर सकती!” पर “नहीं” सोचने में जितना वक़्त लगता था, वो बढ़ता ही जा रहा था।

फिर एक दिन टीवी पर अमेरिकन ब्यूटी देखी। उसमे देखा की लड़की पड़ोसी के लिए टॉपलेस हो रही है। टीवी वर्ज़न था, चूचियाँ नहीं दिखीं, पर साफ़ था क्या हो रहा है। रात भर वो सीन दिमाग में घूमता रहा। रेनू खुद को हिरोइन की जगह, लल्लू को पड़ोसी की जगह रखकर देखने लगी। फिर छत पर वो सब होने की कल्पना करने लगी। चूत में गुदगुदी होने लगी। घंटों फैंटसी चलती। वो मानती थी कि सिर्फ़ फैंटसी है, हकीकत में कभी नहीं करेगी। पर हर फैंटसी उसकी हिम्मत को एक चम्मच चुराती जा रही थी। और लल्लू हर रात चुपचाप खड़ा रहता, दबाव बढ़ाता रहता।

रेनू को ठीक-ठीक याद नहीं कब फैसला लिया। शायद लिया भी नहीं, बस पल में बह गई। या जैसे मैंने कहा—वो करना चाहती थी, पर बाद में गिल्ट से बचने के लिए दिमाग ने बहाने बना दिए।

हम कभी नहीं जान पाएँगे कि आख़िर कैसे हुआ। पर हुआ ये कि रेनू ने कर दिया। उस रात भी वही शुरूआत। लल्लू 20 फुट दूर खड़ा। रेनू खिड़की पर गई, घूरा। इस बार खिड़की बंद नहीं की। कुछ मिनट बस देखती रही। शायद फैंटसी चल रही थी। उस दिन साड़ी पहनी थी। उसका दायाँ हाथ खुद-ब-खुद उठा, पल्ला कंधे से सरका दिया, नीचे गिरने दिया।

अब सिर्फ़ ब्लाउज़ में थी, क्लीवेज और पेट नंगा। लल्लू ने समझ लिया कि आज कुछ अलग है। पर हिला तक नहीं, जैसे कोई दुर्लभ चिड़िया देखकर बर्डवॉचर भी साँस रोक लेता है।

रेनू ऐसे ही खड़ी रही। शायद एक मिनट, शायद दस। फिर धीरे-धीरे ब्लाउज़ के बटन खोलने लगी। हर बटन के साथ ब्रा और क्लीवेज ज़्यादा दिखता गया। आख़िर सारे बटन खुले, ब्लाउज़ दो हिस्सों में लटक गया। कुछ देर वैसे ही खड़ी रही। फिर ब्रा उतारी और फर्श पर गिरा दी। अब ऊपर से पूरी नंगी। जब तक चूचियाँ नहीं दिखीं, लल्लू बुत बना खड़ा था। जैसे ही दिखीं—जवान, रसीली, परफेक्ट—लल्लू का सब्र टूट गया। उसने पायजामे की गांठ खोली, पायजामा-चड्डी नीचे, लंड पूरा खड़ा। और वहीं खड़े-खड़े मुठ मारने लगा, आँखें रेनू की चूचियों पर जमीं।

लल्लू ने सिर्फ़ झलक माँगी थी, पर रेनू हिल ही नहीं पाई। उसकी नज़र लल्लू के लंड पर अटक गई। लल्लू ने देख लिया, हिम्मत बढ़ी। उसने पायजामा-चड्डी पैर से झटका, कमर के नीचे पूरा नंगा, दीवार फाँदी और इस तरफ़ कूद आया। सेकंडों में वो खिड़की के इस पार, रेनू से चंद इंच दूर। रेनू ऊपर से नंगी, लल्लू नीचे से। दोनों एक-दूसरे के नंगे हिस्सों को घूर रहे थे।

“छू लूँ?” लल्लू ने भारी आवाज़ में पूछा, “प्लीज़?”

रेनू ने सख़्ती से सिर हिलाया—नहीं। पल में बह गई थी, पर अभी भी इतना अक्ल बाकी था कि ज़्यादा दूर न जाए। लल्लू ने दो-तीन बार और पूछा, हर बार मना।

आख़िर उसने हार मान ली, अच्छी चीज़ को बिगाड़ने का रिस्क नहीं लिया। बस खड़ा रहा, मुठ मारता रहा।

दो मिनट में झड़ने वाला था। “उफ्फ्फ… अब आने वाला है। यहीं? ऐसे ही?” उसने लंड ऊपर की तरफ़ तानते हुए कहा, जैसे तोप रेनू की चूचियों पर तान रहा हो। रेनू को समझ नहीं आया वो क्या पूछ रहा है। उसे लगा बस इजाज़त माँग रहा है झड़ने की। कोई ऐतराज़ नहीं था, पास से देखने की उत्सुकता थी। सिर हिला दिया—हाँ। और फिर सचमुच हुआ।

लल्लू का माल फव्वारा बनकर उछला, रेनू की चूचियों पर, पेट पर, कुछ ग्रिल पर भी। तब रेनू को समझ आया कि वो यही इजाज़त माँग रहा था—उसके बदन पर छोड़ने की। वो नीचे देखने लगी—उसकी चूचियाँ लल्लू के वीर्य से सन चुकी थीं। दिमाग चीख रहा था—“ये तो बहुत ज़्यादा हो गया!” पर बदन जादू में था, उस सफ़ेद चिपचिपे अनजान पदार्थ को महसूस कर रहा था।

कुछ सेकंड बाद लल्लू ने लंबी साँस छोड़ी। उसकी साँस ने रेनू को हकीकत में वापस लाया।




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“हे भगवान!!!” वो चीखी, “मैंने क्या कर दिया?”

लल्लू हैरान, जो औरत अभी तक सब मर्ज़ी से कर रही थी, अचानक नाराज़ क्यों?

रेनू की आँखों में आँसू। वो धीरे-धीरे पीछे हटी, कुर्सी से टाँगें टकराईं।

“भागो यहाँ से!!!” चीखी और खिड़की ज़ोरा से बंद कर दी। अंदर अकेली, चिपचिपा माल चूचियों-पेट पर बह रहा था। हाथों से पोंछने की कोशिश की तो और फैल गया। फटाफट अलमारी से तौलिया निकाला, पूरा साफ़ किया। फिर प्लास्टिक में बाँधकर डस्टबिन में फेंक दिया। सबूत मिटाने के बाद फिर रोने लगी। शर्मिंदगी, गिल्ट। एक साधारण नौकर को चूचियाँ दिखाईं, उसका माल बदन पर लिया। कितनी गंदी और बेशर्म हो गई थी वो।

उस रात रोते-रोते सो गई। सुबह सूरज भी उदास लग रहा था। पूरे दिन खुद को कोसती रही। एक बार मम्मी को सब बताने का भी सोचा, पर पापा को पता चलने का डर। पर दिन बीतते गए, डर कम हुआ। लल्लू वादा निभा रहा था—अब छत पर नहीं आता था। मोहल्ले में मिले तो नज़रें झुका लेता। रेनू ने इसी अच्छे नतीजे पर फोकस किया, गिल्ट कम हुआ। एक महीने बाद तो वो रात याद करके उत्तेजित होने लगी।
 
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एक दोपहर कुछ सामान लेने ऊपर गई तो लल्लू झाड़ू लगा रहा था। उसे देखकर मुस्कुराया और झाड़ू लगाने लगा।

रेनू मुस्कुराई, कमरे में गई-आई, जाने से पहले रुक गई। उम्मीद थी कुछ बोलेगा या घूरेगा। पर वो अनदेखा करता रहा। ये अनदेखा करना रेनू को चिढ़ाने लगा। वो छत पर रुक गई, गमलों को देखने का नाटक करने लगी। आख़िर उसने चूचियाँ दिखाई थीं, उसका माल बदन पर लिया था—कुछ तो बोले! चिढ़ और पुरानी उत्तेजना मिलकर कुछ कर गईं।

नीचे गई, मम्मी से कहा—“ऊपर सोने जा रही हूँ, बाद में काम कर लूँगी।”

वापस ऊपर गई, लल्लू अभी भी झाड़ू लगा रहा था। रेनू ने दरवाज़ा बंद किया, भीतर से किवाड़ चढ़ाया। दरवाज़े से पीठ टिकाकर सोचा—ये पागलपन है। पर खुद को समझाया—“बस सबक सिखाने के लिए।” खिड़की खोली। तेज़ धूप कमरे में घुस आई। रात में जो काम आसान लगता है, दिन में गंदा लगता है। रेनू लगभग पीछे हट गई। पर लल्लू ने खिड़की की तरफ़ देखा और फिर झाड़ू लगाने लगा—ये देखकर फिर हिम्मत आई। उस दिन सलवार-कमीज़ और दुपट्टा था। खिड़की पर खड़ी रही, धीरे से दुपट्टा उतारा और पीछे फेंका।

लल्लू कोने से देख रहा था। दुपट्टा गिरते ही रुक गया, घूरने लगा। रेनू भी घूर रही थी। दोनों बुत बने खड़े। कुछ देर बाद लल्लू समझ गया—अनदेखा करने से काम बन रहा है। फिर झाड़ू लगाने लगा। रेनू चिढ़ी। सोचा था दुपट्टा उतारेगी तो लल्लू दौड़ा चला आएगा। फिर वो हँसेगी और खिड़की बंद। पर लल्लू ने फिर अनदेखा कर दिया। रेनू को और चिढ़ आई। कमीज़ नीचे से पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर खींचने लगी। लल्लू रुक गया। रेनू ने कमर तक खींचा, रुक गई। लल्लू घूर रहा था। एक मिनट बाद फिर ऊपर—पेट नंगा। फिर रुक गई। लल्लू फिर झाड़ू लगाने लगा।

रेनू को गुस्सा आ गया। कमीज नीचे की और खिड़की बंद। प्लान फेल। उसका इरादा था लल्लू को छेड़ना, बीच में छोड़कर हँसना। पर उल्टा वो चिढ़ गई। कुछ देर गुस्सा, फिर फिर खिड़की खोली। लल्लू झाड़ू खत्म करके दूर खड़ा सिगरेट पी रहा था। खिड़की खुली तो एक नज़र देखा और मुँह फेर लिया। रेनू को और गुस्सा। अब कुछ बड़ा करना पड़ेगा। पीठ खिड़की की तरफ़ की, पीछे से कमीज के बटन खोले, उतार फेंका। सिर घुमाकर देखा—लल्लू घूर रहा था। रेनू मुस्कुराई, फिर सीधा हो गई—पीठ नंगी, सिर्फ़ ब्रा की डोरी।

एक मिनट खड़ी रही। फिर सिर घुमाया—लल्लू फिर अनदेखा कर रहा था। अब गुस्सा आग बन गया। गुस्से में ब्रा का हुक खोला, ब्रा उतारी। अब पूरी नंगी पीठ। अब तो बोलेगा, घूमने को कहेगा। पर दो मिनट बीते, कुछ नहीं। रेनू घूमी—चूचियाँ हिलीं, फिर स्थिर। और देखा—लल्लू ग़ायब! खून खौल गया। चारों तरफ़ देखा—कहीं नहीं।

दरवाज़ा थोड़ा खोला, झाँका—नहीं। नीचे चला गया था। रेनू ने दरवाज़ा-खिड़की बंद की, बिस्तर पर बैठी—सिर्फ़ सलवार में, ऊपर से नंगी। गुस्सा, शर्म, उत्तेजना सब मिला हुआ। सोचा था थोड़ा छेड़ेगी, अब पूरी टॉपलेस हो गई और वो चला गया। ब्रा-कमीज़ वापस पहना और सच में सोने चली गई।

नींद पूरी हुई, नीचे मम्मी की मदद की। रात में फिर बारसाती में, पायजामा पहना, सो गई। रात 2 बजे खटखटाहट से नींद खुली। “कौन?”

“मैं।” लल्लू की शांत आवाज़।

“क्या चाहिए?”

“बात करनी है।”

“बोलो…”

“ऐसे नहीं, आमने-सामने।”

“दरवाज़ा नहीं खोल रही।”

“खिड़की खोलो, वैसे ही बात करेंगे।”

रेनू उठी, सोचा, फिर खिड़की खोली। लल्लू सामने।

“हाँ, बोलो।”

“तू बेवकूफ लड़की है! आज वो क्या तमाशा था?” लल्लू मुस्कुराते हुए।

“तमाशा मैं कर रही थी?”

“हाँ, यही तो पूछ रहा हूँ। दिन में कमीज उतारना, क्या था वो?”

“मुझे नहीं पता तुम क्या बोल रहे हो।”

“सच में? तूने कमीज उतारी थी। मुझे लगता है मुझे पता है क्यों।”

“क्यों?”

“मेरा लंड फिर देखना चाहती थी। सोचा कुछ दिखाएगी तो मैं भी दिखाऊँगा।”

“बकवास! मुझे तेरी… वो चीज़ फिर देखनी नहीं।”

“फिर वो सारा ड्रामा क्यों?”

रेनू चुप।

“क्या तुझे मेरे लिए कपड़े उतारने में मज़ा आता है?”

“नहीं… मतलब… तुम देख भी नहीं रहे थे, कुछ बोल भी नहीं रहे थे तो मैंने सोचा…”

“तो सोचा ध्यान खींचूँगी? हा हा!”

“तुम इतने मुश्किल क्यों हो? इतनी बुरी-बुरी बातें करते हो?”

“क्या? हफ़्तों से तो बात ही नहीं की!”

“और की ही क्यों नहीं? उस रात जो हुआ… तुम कभी… सोचते भी हो?” रेनू शरमाते हुए।

“किस बारे में सोचूँ?”

“क्या मतलब? ज़िंदगी में पहली बार किसी को अपना बदन दिखाया और तुम…”

“पूरा नहीं दिखाया।” लल्लू ने बीच में काटा।

“क्या?”

“तूने कहा अपना बदन दिखाया। पर सिर्फ़ चूचियाँ दिखाईं।”

“तो?”

“तो… पूरा क्यों नहीं दिखाती? शायद ज़्यादा सोचूँ।”

“हा हा! बहुत मज़ाकिया हो!”

“क्या बड़ी बात है? आधा नंगा तो कई बार दिखा चुकी। अगला स्टेप पूरा नंगा। बोल?”

“नहीं!” रेनू रुक गई, फिर बोली, “और तूने मुझे ‘कई बार’ आधा नंगा नहीं देखा। सिर्फ़ एक बार।”

“अरे वो रात, फिर आज का तमाशा, और सबसे पहली रात जब ब्रा-पैंटी में देखा था। वो भी मस्त सीन था।” लल्लू जीत गया।

“तो भी सिर्फ़ तीन बार।”

“ओहो! तीन बार ‘सिर्फ़’ है? तो तेरे हिसाब से बहुत कितना है? 50 बार दिखाए तब बहुत होगा?”

“चुप!” रेनू हार गई।

लल्लू मुस्कुराया। उसने रेनू का लाल चेहरा देखा और बोला,

“बस बातें बंद। नंगी होगी या नहीं?”

“नहीं!!!”

“तो पहले मैं नंगा हो जाऊँ फिर तो तू होगी न?”

“नहीं-नहीं रु…”

पर लल्लू ने कुर्ता झटके में उतारा, पायजामा-चड्डी नीचे। पूरी तरह नंगा।

“खुश?” हाथ फैलाकर बोला।
 

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रेनू की नज़र अपने आप उसके लंड पर गई—अब आधा खड़ा था। पहले हमेशा पूरा खड़ा देखा था, ये नया था। ऊपर का मोटा, बालों वाला बदन—सामान्य तौर पर घिन होता। पर ये पहली बार था जब रेनू ने किसी मर्द को पूरा नंगा देखा था।

“तू पूरा नंगा है।” रेनू ने फुसफुसाते हुए कहा।

“हाँ। पास आऊँ?” बिना इंतज़ार के कुछ कदम आगे।

अब उसका आधा खड़ा लंड रेनू से कुछ इंच दूर। पास से बदन और अजीब लगा। जन्मचिह्न, चोट के निशान, बालों वाले निप्पल। रेनू कहती है उत्तेजना नहीं हुई क्योंकि बदसूरत था। पर मुझे पूरा यकीन है थोड़ी तो हुई ही होगी। लल्लू ने भी समझ लिया। उसने धीरे से खिड़की में हाथ डाला, रेनू का दायाँ हाथ पकड़ा। रेनू ने रोकने की कोशिश नहीं की। लल्लू ने हाथ नीचे लाकर अपने लंड पर रख दिया। रेनू ने उंगलियों से ढीली चमड़ी पर फेरा। पहले हमेशा पूरा टाइट होता था। वो सोच ही रही थी कि लल्लू ने पढ़ लिया।

“सोच रही है अभी पूरा खड़ा क्यों नहीं?”

रेनू ने सिर हिलाया।

“दो तरीके हैं। या तो तू खेल, या अपनी गांड दिखा दे।”

“क्या!!! पागल हो गए हो?” रेनू ने हाथ खींच लिया।

“बस बता रहा हूँ मर्द का कैसे खड़ा होता है।” लल्लू हँसा।

“मुझे परवाह नहीं वो खड़ा हो या नहीं।”

“झूठ। तू फिर मुझे मुठ मारते देखना चाहती है।”

“नहीं… चाहती…” रेनू रुक गई, आवाज़ में झूठ साफ़ था।

लल्लू चुप। दोनों खड़े रहे। रेनू नीचे देखती, कभी-कभी लंड पर नज़र डालती। लल्लू तनाव बढ़ा रहा था। और रेनू… रेनू अब तय नहीं कर पा रही थी कि खिड़की बंद कर सो जाए या कुछ और होने दे। कुछ और मिनट यूं ही ख़ामोशी में बीते। फिर अचानक लल्लू ने बिजली की तरह हाथ बढ़ाया। दोनों हाथों से रेनू के पायजामे की इलास्टिक पकड़ी और ज़ोर से नीचे खींच दिया!

पायजामा में नाड़ा नहीं था, इलास्टिक था, सो फट से नीचे सर...रेनू ने छोटी-सी चीख़ निकाली और पीछे हटने लगी, पर पायजामा घुटनों तक अटक गया। पैर उलझे और वो पीठ के बल गिरी, पर घुटने मोड़ लिए, सो ज़ोर की ठुकाई बची। बस गाँड के बल धम्म से ज़मीन पर जा बैठी।

पर गिरने की रफ़्तार से उसका शरीर पीछे झुका, सिर और कंधे फ़र्श पर टिके, पैर हवा में ऊपर उठ गए, जैसे योगा कर रही हो। उसी झटके में ढीला पायजामा दोनों टाँगों से फुर्र से उड़ गया। रेनू हड़बड़ाकर उठकर बैठी तो लल्लू हँसते हुए बोला,

“वाह! क्या नज़ारा है!”

अब वो सिर्फ़ पैंटी और टॉप में थी, टाँगें पूरी नंगी।

फटाफट उठी, पायजामा ढूँढने लगी। कहीं नहीं दिख रहा था।

“बिस्तर के नीचे है।” लल्लू अब भी हँस रहा था।

और सीधी-सादी रेनू सच में घुटनों-हाथों के बल झुककर बिस्तर के नीचे देखने लगी। दो सेकंड बाद लल्लू बोला,

“आह! मज़ा आ गया! देख, अब मेरा लौड़ा पूरा खड़ा होने लगा।”

रेनू की अक्ल ठिकाने आई। वो घोड़ी बनकर झुकी थी, पैंटी वाली गाँड सीधे लल्लू की तरफ़, जाँघें और आधी-आधी गांड की चीक्स साफ़ दिख रही थीं। झट से सीधी हुई और घुटनों पर बैठ गई।

“तुम बहुत कमीने हो!” गुस्से से बोली, “सच में बिस्तर के नीचे है?”

“हा हा हा! नहीं!” लल्लू और ज़ोर से हँसा।

“श्श! कोई सुन लेगा!” रेनू डरी, “बता कहाँ है?”

“बस यही इसका सोच, जो मेरे पास है।” लल्लू ने अपने लंड की तरफ़ इशारा किया।

रेनू ज़मीन पर बैठी थी, लंड नहीं दिख रहा था। उठी तो देखा—लल्लू का लंड अब पूरा खड़ा, गुस्से में लाल, ऊपर-नीचे झूल रहा था। पायजामा भूल गई, आँखें उस पर जमीं की जमीं। जैसे पतंगा शमा की तरफ़ खिंचा चला जाता है, रेनू खिड़की तक आ गई। पता भी नहीं चला कब उसके हाथ लल्लू के लंड पर लिपट गए। नीचे सिर्फ़ पैंटी थी, वो भी भूल गई। लल्लू ने धीरे से अपना हाथ उसके हाथ पर रखा। जब रेनू ने नहीं हटाया तो उंगलियों पर दबाव डाला, कसकर पकड़ने को कहा। फिर उसका हाथ पकड़कर आगे-पीछे करने लगा, मुठ मारना सिखाने लगा।

रेनू आज्ञाकारी बच्ची की तरह हाथ चलाने लगी। उसके मुलायम हाथों में गर्म, धड़कता लंड आगे-पीछे सरक रहा था। लंड के सिरे से पानी निकलने लगा था, चिपचिपाहट हाथ में लग रही थी। पहली बार ऐसा कुछ महसूस कर रही थी। एक मिनट बाद लल्लू ने हाथ छोड़ा। रेनू खुद ही मुठ मारने लगी।

लल्लू को लगा अब लड़की पूरी तरह खेल में है। उसने हाथ नीचे बढ़ाया, पैंटी पर। पर रेनू तैयार थी। ठंडी आवाज़ में बोली,

“हटाओ हाथ! ऐसी हिम्मत की तो तोड़ दूँगी।”

लल्लू जम गया। समझ गया कि मज़ाक नहीं है। वापस खड़ा रहा, रेनू मुठ मारती रही। पहली बार थी, टेक्नीक नहीं आती थी—कभी धीमे, कभी तेज़, कब कसना-कब ढीला करना, कुछ नहीं पता। कई मिनट बीत गए, लल्लू को झड़ने का नाम नहीं।

“हाथ दुख गया।” रेनू ने लंड छोड़ दिया।

लल्लू ने मायूस आवाज़ निकाली, पर फट से अपना हाथ लगाकर ज़ोर-ज़ोर से मुठ मारने लगा। रेनू दोनों हाथों से ग्रिल पकड़कर खड़ी हो गई, मुठ मारते हुए देखने लगी।

“तुम कितनी तेज़ी से करते हो!” आश्चर्य से बोली।

“यही तरीका है।” लल्लू साँसों में बोला।

फिर आँखों में आँखें डालकर दूसरा हाथ आगे बढ़ाया, रेनू के टॉप का ऊपरी बटन खोलने। रेनू ने झटके से हाथ मार दिया।

“प्लीज़ यार! भीख माँगता हूँ!” लल्लू बोला।

रेनू मुस्कुराई। धीरे-धीरे खुद बटन खोलने लगी। सारे बटन खुले तो लल्लू खुशी से उछला—अंदर ब्रा नहीं थी! रेनू ने थोड़ा हिचकिचाया, फिर टॉप उतारकर पीछे फेंक दिया। और वहाँ खड़ी थी—परफेक्ट कुँवारी जिस्म, शानदार चूचियाँ, सिर्फ़ पैंटी में। अधेढ़ नौकर के सामने।

ये नज़ारा लल्लू बर्दाश्त न कर सका। लंड और तेज़ी से हिलाने लगा, कराहने लगा। रेनू समझ गई, सख़्ती से बोली,

“इस बार मेरे बदन पर मत करना।”

लल्लू ने सिर हिलाया, लंड नीचे की तरफ़ मोड़ा। कुछ सेकंड में दीवार पर माल की बौछार। रेनू मंत्रमुग्ध देखती रही। लल्लू ने लंबी साँस छोड़ी, नरम होते लंड को हाथ में पकड़े रेनू को भूखी नज़रों से देखता रहा।

“अब… तेरी बारी है न?” उसने हिचकते हुए पूछा।

“क्या मतलब?”

“तूने मुझे झड़वाया। मैं भी तेरे लिए कर दूँ?” ऑफ़र किया।

“नहीं!” रेनू ने साफ़ मना कर दिया।

“कम से कम पूरा नंगा तो हो जा? तेरी बुर… मतलब प्राइवेट प्लेस तो दिखा दे?”

और “बुर” शब्द ने रेनू के अंदर कोई बटन दबा दिया। वो कुछ पल गुस्से से घूरती रही, फिर खिड़की ज़ोर से बंद कर दी। रेनू कहती है उस रात उसे बहुत गिल्ट और शर्मिंदगी हुई।

मैंने पूछा, “फिर मुठ मारी होगी न?”

वो भड़क गई—“बिल्कुल नहीं!”

पर मुझे पूरा यकीन है कि मारी होगी।

लल्लू ने कुछ देर खटखटाया, पर रेनू ने जवाब नहीं दिया। लल्लू समझ गया कि आज जितना मिला, उससे कहीं ज़्यादा था, सो चुपके से चला गया। इसके बाद रेनू ने जल्दी-जल्दी बाक़ी बताया—
 
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