फिर बेडरूम के दरवाज़े पर जाकर धीरे-धीरे दस्तक दी। कुछ बोला, मैं सुन नहीं सका। आख़िर रेनू ने दरवाज़ा खोला, अभी भी पूरी नंगी, आँखें सूजी हुईं। दोनों ने दो-तीन मिनट धीरे-धीरे बात की। मुझे लगा, रेनू माफ़ी माँग रही थी, और शाद भी शायद। उसने ज़बरदस्ती नहीं की, ये मुझे बहुत अच्छा लगा। फिर शाद कंधे झुकाए काम पूरा करने चला गया। रेनू ने दरवाज़ा बंद किया।
मैं सोच रहा था कि अब बस, खेल ख़त्म। 20 मिनट बीते। मैं जाने ही वाला था कि बेडरूम का दरवाज़ा खुला। रेनू बाहर आई, अभी भी पूरी नंगी। बाल बिखरे, आँखें लाल। उसने बाईं तरफ़ देखा, शाद की तरफ़, कुछ बोली। फिर किचन की तरफ़ चल दी।
मैं किचन की खिड़की पर जाने ही वाला था कि जेब में फ़ोन वाइब्रेट हुआ। मैं पीछे की दीवार तक दौड़ा और फ़ोन उठाया। “हैलो…?” मेरी अपनी साँसें तेज़ थीं। मैंने फ़ोन कान से लगाया।
“हैलो…”
“मनीष… जल्दी घर आ जाओ प्लीज़…” रेनू की आवाज़ इतनी उदास थी जैसे कोई मर गया हो।
“क्या हुआ रेनू?”
“बस आ जाओ। फ़ोन पर नहीं बता सकती। मैंने बहुत गंदा काम किया है… और अगर तुम मुझे तलाक़ भी दे दो तो मुझे कोई ऐतराज़ नहीं होगा।”
मेरा दिल धम्म से बैठ गया। अचानक सारी मस्ती उड़न-छू हो गई। ये सब मैंने ही तो प्लान किया था। अगर मैं घर पर ही रहता तो कुछ नहीं होता। बस अपनी किंकी ख़ुशी के लिए बीवी को इतना बड़ा गिल्ट दे दिया। घबराहट में मैं दीवार के पीछे से निकल आया और मेरे मुंह से निकला
“अरे पागल, ऐसा मत सोचो। मैंने सब देखा है, तुमने कुछ नहीं किया। बाहर ही हूँ, बस पांच मिनट में आता हूँ।”
"तुमने देखा? बाहर हो?” ये कहकर रेनू किचन की खिड़की पर आ गयी और उसकी नजर मुझ पर पड़ी। हमारी आँखे मिली और एक पल के लिए मुझे लगा की उसकी नजर में मेरे लिए एक अजीब सा गुस्सा या नफरत है पर वो शांत आवाज में बोली, “सुनो अब घर आने की जरूरत नहीं है" कहकर रेनू ने फ़ोन काट दिया।
मैंने सोचा की अब रेनू क्या करेगी , ये देखने मैं जल्दी से घर की तरफ भागा की रास्ते में किचन की खिड़की खुली थी, मैंने सावधानी से अन्दर झाँका। किचन ख़ाली थी।
पर लिविंग रूम के उस कोने में, जहाँ पहली बार रेनू ने शाद की छाती चाटी थी, शाद ज़मीन पर बैठा केबल जोड़ रहा था। और रेनू बिल्कुल नंगी उसके पास खड़ी थी, कुछ बोल रही थी। वो कभी-कभी सिर हिलाता, एक-दो शब्द जवाब देता। लग रहा था रेनू अभी भी माफ़ी माँग रही है पर कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, सोचा अन्दर चलता हूँ लेकिन रेनू ने जिस ठंडी और सर्द आवाज में मुझे घर आने को मना किया था, हिम्मत नहीं हुई।
पाँच मिनट तक यही चलता रहा। फिर रेनू उसके पास झुकी, माथे पर हल्का-सा किस किया। फिर मुट्ठी बाँधकर उसकी हथेली में कुछ रखा। पहली नज़र में मुझे लगा पैसे हैं। मेरी बीवी गिल्ट में डूबकर इसको टिप दे रही थी।
शाद दो मिनट उदास बैठा रहा। फिर अचानक मुँह पर मुस्कान, मुट्ठी हवा में लहराई जैसे टेनिस प्लेयर जीत के बाद करता है। फिर जो हुआ, मेरी आँखें फट गईं। उसने शर्ट उतारी, पैंट-अंडरवियर एक झटके में नीचे। लंड फिर से तना हुआ।
मैंने सोचा—अब ज़बरदस्ती करेगा। मैं दौड़कर दरवाज़ा पीटने ही वाला था कि उसने मुट्ठी खोली। और 40 फ़ुट दूर से भी साफ़ दिख गया— पैसे नहीं, कंडोम का पैकेट था।
शाद ने कंडोम निकाला, रैपर फाड़ा और अपने तने हुए लंड पर खोलकर चढ़ा लिया। फिर कुछ चिल्लाया और बेडरूम का दरवाज़ा खटखटाया। दरवाज़ा खुला। सिर्फ़ रेनू का दायाँ हाथ बाहर आया। उसने शाद की छाती पर उंगलियाँ फिराईं, नीचे तक लाया, कंडोम चढ़े लंड को पकड़ा, और खींचकर उसे अंदर ले गई। दरवाज़ा धम्म से बंद।

मैं सोच रहा था कि अब बस, खेल ख़त्म। 20 मिनट बीते। मैं जाने ही वाला था कि बेडरूम का दरवाज़ा खुला। रेनू बाहर आई, अभी भी पूरी नंगी। बाल बिखरे, आँखें लाल। उसने बाईं तरफ़ देखा, शाद की तरफ़, कुछ बोली। फिर किचन की तरफ़ चल दी।
मैं किचन की खिड़की पर जाने ही वाला था कि जेब में फ़ोन वाइब्रेट हुआ। मैं पीछे की दीवार तक दौड़ा और फ़ोन उठाया। “हैलो…?” मेरी अपनी साँसें तेज़ थीं। मैंने फ़ोन कान से लगाया।
“हैलो…”
“मनीष… जल्दी घर आ जाओ प्लीज़…” रेनू की आवाज़ इतनी उदास थी जैसे कोई मर गया हो।
“क्या हुआ रेनू?”
“बस आ जाओ। फ़ोन पर नहीं बता सकती। मैंने बहुत गंदा काम किया है… और अगर तुम मुझे तलाक़ भी दे दो तो मुझे कोई ऐतराज़ नहीं होगा।”
मेरा दिल धम्म से बैठ गया। अचानक सारी मस्ती उड़न-छू हो गई। ये सब मैंने ही तो प्लान किया था। अगर मैं घर पर ही रहता तो कुछ नहीं होता। बस अपनी किंकी ख़ुशी के लिए बीवी को इतना बड़ा गिल्ट दे दिया। घबराहट में मैं दीवार के पीछे से निकल आया और मेरे मुंह से निकला
“अरे पागल, ऐसा मत सोचो। मैंने सब देखा है, तुमने कुछ नहीं किया। बाहर ही हूँ, बस पांच मिनट में आता हूँ।”
"तुमने देखा? बाहर हो?” ये कहकर रेनू किचन की खिड़की पर आ गयी और उसकी नजर मुझ पर पड़ी। हमारी आँखे मिली और एक पल के लिए मुझे लगा की उसकी नजर में मेरे लिए एक अजीब सा गुस्सा या नफरत है पर वो शांत आवाज में बोली, “सुनो अब घर आने की जरूरत नहीं है" कहकर रेनू ने फ़ोन काट दिया।
मैंने सोचा की अब रेनू क्या करेगी , ये देखने मैं जल्दी से घर की तरफ भागा की रास्ते में किचन की खिड़की खुली थी, मैंने सावधानी से अन्दर झाँका। किचन ख़ाली थी।
पर लिविंग रूम के उस कोने में, जहाँ पहली बार रेनू ने शाद की छाती चाटी थी, शाद ज़मीन पर बैठा केबल जोड़ रहा था। और रेनू बिल्कुल नंगी उसके पास खड़ी थी, कुछ बोल रही थी। वो कभी-कभी सिर हिलाता, एक-दो शब्द जवाब देता। लग रहा था रेनू अभी भी माफ़ी माँग रही है पर कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, सोचा अन्दर चलता हूँ लेकिन रेनू ने जिस ठंडी और सर्द आवाज में मुझे घर आने को मना किया था, हिम्मत नहीं हुई।
पाँच मिनट तक यही चलता रहा। फिर रेनू उसके पास झुकी, माथे पर हल्का-सा किस किया। फिर मुट्ठी बाँधकर उसकी हथेली में कुछ रखा। पहली नज़र में मुझे लगा पैसे हैं। मेरी बीवी गिल्ट में डूबकर इसको टिप दे रही थी।
शाद दो मिनट उदास बैठा रहा। फिर अचानक मुँह पर मुस्कान, मुट्ठी हवा में लहराई जैसे टेनिस प्लेयर जीत के बाद करता है। फिर जो हुआ, मेरी आँखें फट गईं। उसने शर्ट उतारी, पैंट-अंडरवियर एक झटके में नीचे। लंड फिर से तना हुआ।
मैंने सोचा—अब ज़बरदस्ती करेगा। मैं दौड़कर दरवाज़ा पीटने ही वाला था कि उसने मुट्ठी खोली। और 40 फ़ुट दूर से भी साफ़ दिख गया— पैसे नहीं, कंडोम का पैकेट था।
शाद ने कंडोम निकाला, रैपर फाड़ा और अपने तने हुए लंड पर खोलकर चढ़ा लिया। फिर कुछ चिल्लाया और बेडरूम का दरवाज़ा खटखटाया। दरवाज़ा खुला। सिर्फ़ रेनू का दायाँ हाथ बाहर आया। उसने शाद की छाती पर उंगलियाँ फिराईं, नीचे तक लाया, कंडोम चढ़े लंड को पकड़ा, और खींचकर उसे अंदर ले गई। दरवाज़ा धम्म से बंद।





