• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Incest Ek Chaat Ke Niche (Family Saga)

Ankit 887427

Member
123
420
79
STORY HUB


Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 29
Chapter 30
Chapter 31
Chapter 32
Next ....Next....

🗓️ Last Update On 14/12/2025
 
Last edited:

Ankit 887427

Member
123
420
79
DISCLAIMER

Guys, ये कहानी Punjabiboyy ने पंजाबी में लिखी है। इसका ओरिजिनल टाइटल था "Pariwar Da Pyar", लेकिन मैं इसे हिंदी में "Ek Chhat Ke Niche" नाम से रीनेम कर रहा हूँ 💫

मैंने ये स्टोरी पढ़ी थी और सच बोलूँ तो अच्छी लगी 🤯 तो सोचा अपने हिंदी ग्रुप वालों को भी इसका मज़ा लेना चाहिए। इसलिए खुद ही ट्रांसलेट कर रहा हूँ — थोड़ा Google Translate + थोड़ा मेरा दिमाग (Human Fixation 😅)।

अब हाँ, हर चैप्टर में ट्रांसलेशन क्वालिटी थोड़ी ऊपर-नीचे दिखेगी क्योंकि कुछ मैंने पिछले साल किए थे, कुछ अभी कर रहा हूँ, तो vibe और words थोड़े अलग लग सकते हैं।

बस याद रखना — पूरी तारीफ़ और क्रेडिट असली राइटर Punjabiboyy को ही जाता है 🙌

हर हप्ते मैं ९ से १० चैप्टर डालूंगा, और जब सब पूरे हो जाएंगे तो इसका EPUB वर्ज़न भी अपलोड कर दूँगा ताकि ऑफलाईन आसानी से पढ़ सको 📖
अगर किसी को original पंजाबी वर्ज़न पढ़ना है, तो वो [यहाँ] मिल जाएगा.

और जो जल्दी offend हो जाते हैं — chill करो 😌 author की permission मेरे पास है, सब legit है ✌️
 
Last edited:

Ankit 887427

Member
123
420
79

⚠️ Warning ⚠️

मेरे प्यारे और थोड़े से बिगड़े हुए पाठकों, आगे बढ़ने से पहले इस चेतावनी को एक बार ध्यान से पढ़ लें। यह महज़ एक कहानी नहीं, यह वर्जित और सीमाहीन वासना का खुला निमंत्रण है।

साफ़-साफ़ कह दें: इस कहानी का plot पारिवारिक रिश्तों की मर्यादा को भंग करता है। यह उन विषयों की गहराई में उतरती है जिन्हें समाज Taboo मानता है। यदि आप नैतिक या सामाजिक झिझक रखते हैं, या ऐसी सामग्री से आपको परेशानी होती है, तो कृपया यहाँ से वापस चले जाएँ।

Tags से आपको अंदाज़ा मिल ही गया होगा: यह कहानी Incest और Adultery के अंधेरे रंगों से सराबोर है। हमारा मुख्य पात्र भले ही दिलराज है, लेकिन कहानी की महिला पात्र एक से अधिक लोगों के साथ संबंध और दृश्य साझा करेंगी। किसी भी तरह की नैतिक पाबंदी या वफ़ादारी की उम्मीद लेकर इस कहानी में प्रवेश न करें।

और हाँ! जो पाठक सब कुछ झेलने को तैयार हैं—आगे के कुछ chapters में आपको little bit Gay content के कुछ तीव्र रंग भी देखने को मिलेंगे। यह कहानी किसी भी बंधन या सीमा को नहीं मानती। इसलिए, यदि आप सचमुच निडर हैं, तो ही अंदर आएँ और इस अराजक प्रेम का आनंद लें। इसे सहने के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह डूब जाने के लिए तैयार रहें।
 
Last edited:

Ankit 887427

Member
123
420
79
Character Introduction

यह कहानी है एक घर की, जो पंजाब के किसी गाँव में अपनी जड़ें जमाए हुए है; बाहर से दिखने में जितना शांत और साधारण, भीतर से उतना ही उलझा हुआ और रहस्य से भरा है। यह मेरा अपना किस्सा है, दिलराज सिंह का, और ये मेरे अपने लोग हैं।

बलदेव सिंह (पिता)
हमारे पिताजी, बलदेव सिंह। वह एक मज़बूत, मर्दाना शख़्सियत हैं, लेकिन उनका ज़्यादातर समय कनाडा (Canada) में ही गुज़रता है, जहाँ वह नौकरी करते हैं। गाँव आना-जाना कोई एक-दो साल में एक बार ही हो पाता है। हम सब बच्चों और माँ के साथ उनका रिश्ता ज़्यादातर सिर्फ़ फ़ोन की डोर पर ही सिमटा हुआ है, जैसे वह उस दूर देश में अपनी कमाई के साथ-साथ अपनी ज़िम्मेदारियाँ भी छोड़ आए हों।

मनजीत कौर (माँ)
हमारी माँ, मनजीत कौर, ही इस घर की असली धुरी है, प्राणशक्ति। नाम की तो वह पक्की गृहणी है, लेकिन फ़िज़ूल बैठने की आदत नहीं है, इसलिए घर पर कभी-कभार सिलाई-कढ़ाई का काम भी पकड़ लेती है। उम्र भले ही चालीस के पार चली गई हो और चार-चार बच्चों को जन्म दे चुकी हो, लेकिन उसका शरीर ऐसा है कि गाँव की जवान लड़कियाँ भी उनके सामने पानी भरें।
माँ को अपनी सेहत का पूरा ख़याल है। रोज़ सुबह-सुबह दो-तीन किलोमीटर की सैर उनकी दिनचर्या का एक ज़रूरी हिस्सा है। इसी लगातार कसरत ने उनके जिस्म को गदराया हुआ और कसी हुई मूरत जैसा बना रखा है। शरीर पूरा भरा-पूरा और मांसल है, पर कहीं से भी ढीला नहीं। जब वह सुबह सैर के लिए निकलती है, तो उसके बदन पर अक्सर एक टाइट, कसा हुआ सूती सूट होता है। इस सूती कपड़े की पतली परत उनके सीने की उभार को बड़ी मुश्किल से थामे रखती है—उसके मोटे, तने हुए मम्मे सूट से ऐसे बाहर निकलने को बेताब रहते हैं, मानो वह कपड़े की क़ैद से आज़ाद होना चाहते हों।
उसकी चाल में एक अजीब-सी मदहोशी और मस्ती होती है, और जब वह आगे बढ़ती है, तो पीछे से उसकी मटकती, कसी हुई गांड को देखकर गाँव के बुज़ुर्गों का भी लंड खड़ा हुए बिना नहीं रहता। वह इस गाँव की एक जानी मानी, रसीली औरत है, जिसे हर कोई एक बार पलटकर देखता जरूर है।
माँ और पिताजी दोनों की कनाडा की PR (Residency) पक्की है, और माँ एक बार पिताजी के साथ वहाँ घूम भी आई है। लेकिन अब पिताजी अकेले ही वहाँ कमाते हैं, और माँ हम बच्चों के साथ इस बड़ी सी कोठी में अकेली रानी की तरह रहती है।

कमलप्रीत कौर (बड़ी बहन)
मेरी बड़ी बहन, कमल। हम सब उसे कमल दीदी कहते हैं। उसकी शादी को दो साल पूरे हो गए हैं, लेकिन अभी तक कोई बच्चा नहीं हुआ है। कभी कभार वह अपने मायके का चक्कर लगा लेती है और दो-तीन दिन हमारे साथ रह जाती है।
शादी से पहले भी वह क़यामत थी, लेकिन विवाह के बाद तो जैसे उसके हुस्न में और भी निखार आ गया है। उसका पति एक बड़ा व्यापारी है और काफ़ी खुले विचारों का आदमी है। कमल को पूरी आज़ादी मिली हुई है; वह पूरी ठाठ और आत्मविश्वास से रहती है, जैसी मर्ज़ी वैसे कपड़े पहनती है। उसका पति कभी उसे कपड़ों को लेकर टोकता नहीं, कहता है 'जो तेरा दिल करे वो पहन।' इसलिए जब वह गाँव आती है, तो उसके बिंदास और मॉडर्न पहनावे को सब देखते ही रह जाते हैं.

हरलीन कौर (छोटी बहन)
यह हमारी छोटी बहन है, हरलीन। उम्र चौबीस साल है, और वह ग्रेजुएशन के आखरी साल में है। हम सब एक ही कॉलेज में हैं, बस वह हमसे एक साल सीनियर है। आजकल के कॉलेज के बच्चे और उनके बॉयफ्रेंड... ये सब तो बहुत आम बात है। तो हाँ, उसका भी एक चक्कर चल रहा है.
लेकिन हरलीन की असली दीवानगी तो जिम है। उसने घर पर ही काफ़ी कसरत का सामान रखा हुआ है। वह अपनी कसरत पर पूरा-पूरा ध्यान देती है, और इसी मेहनत ने उसके जिस्म को सचमुच आग बना दिया है। उसका शरीर पूरा तराशा हुआ है, कहीं कोई फ़ालतू चर्बी नहीं।
ख़ासकर उसकी गांड... जिम कर-करके उसने अपने चूतड़ों को इतना गोल और बाहर की ओर उभरा दिया है कि जब वह उन पर टाइट लैगिंग पहनकर निकलती है, जो उसकी हर नस, हर उभार को कसकर उजागर करती है, तो उसे देखने वालों का पानी वैसे ही निकल जाता है। उसकी चाल में एक गठीला, सख़्त उछाल है जो लोगों की साँसें थाम देता है।

युवराज सिंह और दिलराज सिंह (मैं)
और आख़िर में, हम दोनों भाई। मैं दिलराज और मेरा जुड़वाँ भाई युवराज। हम दोनों बाईस साल के हैं और अपनी बहन हरलीन के ही कॉलेज में ग्रेजुएशन के दूसरे साल में हैं।
हम दोनों भाइयों की कद-काठी छह फुट है और हमने भी जिम कर-करके बढ़िया, कसी हुई बॉडी बना रखी है। हम दोनों सिर्फ़ भाई नहीं हैं, बल्कि जिगरी दोस्त हैं। कॉलेज से घर तक, हर जगह ज़्यादातर साथ ही रहते हैं। हमारे बीच कोई पर्दा नहीं है; हम एक दूसरे से अपने सारे राज़, चाहे वह कितने भी गहरे और निजी क्यों न हों, आसानी से खोल लेते हैं।

बाकी के किरदार और उनकी जानकारी... वह तो कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, पता चलती जाएगी।
 
Last edited:

Ankit 887427

Member
123
420
79

Chapter 1


अब आते हैं असली कहानी पर, वह कहानी जो इस घर की दीवारों के पीछे साँस ले रही थी।
बड़ी बहन (कमलप्रीत) की शादी हो जाने के बाद डैड विदेश चले गए और घर पर ज़िंदगी ऊपर-ऊपर से एकदम सामान्य तरीके से चलने लगी। घर में अब बस मम्मी (मनजीत कौर), हमारी बहन (हरलीन, जो हम दोनों भाइयों से एक साल बड़ी थी), और हम दोनों भाई (मैं, दिलराज और युवराज) ही रहते थे।

कॉलेज में हमारे दिन आम तौर पर गुज़र रहे थे। हरलीन भी हमारे ही कॉलेज में थी। हम सबका एक नॉर्मल सा फ्रेंड ग्रुप था, हम सब मिलकर पुरे मजे करते थे, और शाम होते ही अपने-अपने घर वापस लौट आते थे। हम दोनों भाई एक ही मोटर-साईकिल पर कॉलेज जाते थे, और हरलीन अपनी स्कूटी पर आती-जाती थी।
कॉलेज से निकाल कर, घर की तरफ़ जाने से पहले, हम दोनों भाई बाज़ार में एक-दो चक्कर लगा लेते थे। हमारा शौक़ था वहाँ थोड़ी लड़कियों को निहारते, कुछ छेड़खानी करते, और फिर घर का रुख़ करते। रोज़ का यही गर्मी भरा रूटीन चलता रहा।

एक दिन बाज़ार में ऐसे ही चक्कर लगाते हुए हमारी नज़र एक ग़ज़ब की चीज़ पर पड़ी। वह हमारी बाइक के आगे-आगे पैदल चली जा रही थी। पीछे से देखने पर वह पूरी टॉप क्लास रसीली औरत लग रही थी। उसकी गांड पूरी मटकती हुई थी, कसरत से उभरी हुई, बाहर को निकली हुई। हाथ में उसकी खनकती चूड़ियाँ थीं... साफ़ ज़ाहिर था कि कोई नई-नवेली, सेक्सी शादीशुदा भाभी है।

हमने उसके पीछे अपनी बाइक के एक-दो चक्कर और काटे, नज़दीक से उसे घूरते रहे। वह भी पलटकर हमें हल्का-फुल्का रिस्पॉन्स देने लगी। हम दोनों भाई यह देखकर ख़ुशी से पागल हो गए l

फिर हमने तय किया कि आख़िर पहल कौन करेगा। बात तो दोनों करना चाहते थे, पर पर्ची निकालने पर मौक़ा युवराज के हिस्से आया। युवराज ने ही अपना फ़ोन नंबर एक काग़ज़ पर लिखकर, थोड़ा शारीरिक इशारा मारकर, तेज़ी से उसकी तरफ़ उछाला। आगे से उस भाभी ने भी बिना किसी शर्म के वह पर्ची झट से उठा ली।
हम उसे देखते-देखते घर की तरफ़ चल पड़े। रास्ते भर हम आपस में उसी की बातें करते रहे कि यार, क्या ग़ज़ब की सेक्सी भाभी थी!
युवराज: "हाँ यार, बहुत सेक्सी थी। बस अब उसका फ़ोन या मैसेज आ जाए, फिर देखना, साला कितना रस टपकाती है!"
ऐसी ही मसालेदार बातें करते-करते हम घर पहुँच गए।

हरलीन भी कॉलेज से आ गई थी। रात का खाना खाकर हम सब अपने-अपने कमरों में चले गए। हम दोनों भाई एक ही कमरे में सोते थे, जबकि मम्मी और हरलीन के कमरे अलग-अलग थे। हम दोनों का कमरा ऊपर (पहली मंज़िल) पर था।

ऊपर जाकर हम दोनों भाई अपने-अपने बिस्तर पर लेट गए और फ़ोन चलाने लगे। इतने में युवराज के फ़ोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया। युवराज के चेहरे की रौनक देखने लायक थी।
हमें समझते देर नहीं लगी कि मैसेज उसी भाभी का आया है, जिसे आज हम नंबर देकर आए थे। युवराज उससे नॉर्मल बातें करता रहा जैसे हाल-चाल, परिचय, वग़ैरह-वग़ैरह।

युवराज फ़ोन पर बातचीत और चैट में व्यस्त हो गया, और मैं भी साइड में होकर अपना फ़ोन चलाने लगा। ऐसे ही तीन-चार दिन निकल गए। युवराज रोज़ उस भाभी से घंटों गपशप मारता रहता। जब मैंने उससे ज़ोर देकर पूछा, तो युवराज ने बड़े गर्व से बताया कि उसने भाभी से बातों-बातों में सब कुछ खुलवा दिया है... यहाँ तक कि चैट पर ही उसे नंगा भी कर लिया था।

और जब उसने मुझे भाभी की नंगी तस्वीर दिखाई, तो उसे देखकर मेरा भी दिमाग़ हिल गया। क्या सेक्सी, कसा हुआ शरीर था भाभी का! और उसकी चूत पर एक भी बाल नहीं था, एकदम चिकनी और साफ़-सुथरी, गुलाबी।

युवराज एक तरफ़ होकर उससे दोबारा चैट करने लग गया। दस मिनट चैट करने के बाद युवराज अचानक उठकर बाथरूम में चला गया। मुझे तुरंत पता लग गया कि वह मुठ मारने गया है। भाभी की वह तस्वीर देखकर मेरा भी मन बेकाबू होने लगा था, पर मैंने किसी तरह खुद को कंट्रोल किया।

मुझे प्यास लगी, तो मैं उठकर पानी पीने के लिए नीचे किचन में चला गया। ऊपर जाने की सीढ़ियाँ घर के अंदर से ही थीं।

पानी पीकर मैं किचन से निकला, तो देखा कि मम्मी के कमरे की लाइट जल रही थी। मैं देखने के लिए उस तरफ़ बढ़ा। दरवाज़ा तो अंदर से बंद था, पर साइड में लगी एक खिड़की थोड़ी-सी खुली थी। और उस खिड़की से अंदर जो नज़ारा मैंने देखा, उसे देखकर मैं हक्का-बक्का रह गया।

अंदर मम्मी बिस्तर पर सोई हुई थीं। उन्होंने सिर्फ़ ऊपर एक ढीला सा कुर्ता पहना हुआ था... मगर नीचे से वह बिल्कुल नंगी पड़ी थीं। वह गहरी नींद में सोई हुई थीं। पीछे की तरफ़ उनकी गोरी, नंगी गांड मुझे खिड़की के फ़्रेम से बिल्कुल साफ़ दिख रही थी—दूधिया सफ़ेद और भरी हुई।

उन्हें इस हालत में देखकर पहले तो मुझे एक अजीब शर्म महसूस हुई, पर जब मेरी नज़र अपने पजामे पर पड़ी... मेरा लंड बेकाबू होकर फटने को हो रहा था। मेरा मूड पहले ही भाभी की तस्वीर देखकर बना हुआ था, अब मम्मी की गोरी, नंगी गांड देखकर मेरा काम-भाव और ज़्यादा बढ़ गया।

मैंने जैसे-तैसे खुद को शांत किया और चुपचाप ऊपर अपने कमरे की तरफ़ चल दिया।
युवराज भी तब तक मुठ मारकर बाथरूम से आ गया था और आकर लेट गया था। मैं भी अपने बिस्तर पर आकर लेट गया। उस रात मुझे बड़ी मुश्किल से नींद आई...

अगला दिन भी ऐसे ही गुज़र गया।
रात को युवराज फिर से अपनी उस भाभी के साथ चैट पर लगा हुआ था। मुझे पता नहीं क्या सूझा, मैं एक अज्ञात आकर्षण के वशीभूत होकर फिर से उठकर नीचे चला गया।
मम्मी के कमरे की लाइट आज भी जल रही थी। दरवाज़ा बंद था। मैंने साइड वाली खिड़की के पास जाकर अंदर झाँका...

मम्मी आज भी लगभग कल वाली स्थिति में ही लेटी थीं, पर आज वो जाग रही थीं। वह फ़ोन पर किसी से बात कर रही थीं।
मम्मी: "पता नहीं तुम कब आओगे... मेरा तो यहाँ बुरा हाल हुआ पड़ा है। चूत में आग लगी पड़ी है... रात को तो सलवार पहनने का भी दिल नहीं करता।"

मुझे सिर्फ़ मम्मी की धीमी, दबी हुई आवाज़ ही सुन रही थी।
मम्मी: "हाँ हाँ, सब सो गए हैं। लड़के भी सो गए हैं और लड़की भी। पर उनकी माँ को चैन नहीं मिल रहा... और एक तुम हो, जो इतनी दूर बैठे हो! अपनी बीवी का कोई ख़्याल नहीं है तुम्हें!"
फिर मम्मी दो मिनट के लिए चुप हो गईं, और फिर सीधी लेटकर, शायद अपनी चूत में उँगली सहलाने लगीं...

"आआहहम्म्म... आआह्ह..." उनकी आवाज़ में अब एक काम-जनित कराह थी।

मम्मी: "तुम्हारा तो वहाँ सब चल ही जाता होगा। वहाँ रोज़ नई-नई गोरी को घोड़ी बनाते होगे तुम... और यहाँ तुम्हारी बीवी प्यासी बैठी उँगलियों से काम चला रही है!"

यह तो अब पक्का हो गया था कि मम्मी पिताजी से ही फ़ोन पर लगी हुई हैं। पर इतनी खुलकर, ऐसी गंदी, रसीली बातें करते हुए मैंने मम्मी को पहली बार सुना था।

मेरे पजामे में फिर से तम्बू तन गया था। मैंने झट से एक हाथ पजामे में डालकर अपना लंड ज़ोर से हिलाना शुरू कर दिया और मम्मी की बातें सुनने लगा।

मम्मी: "सच कहूँ, अब तो दिल करता है किसी के आगे घोड़ी हो जाऊँ... इंडिया में भी अपना ख़ाता खोल लूँ..." (वह थोड़ा हँसकर बोलीं, आवाज़ में अजीब सी ख़ुमारी थी)। "लो और सुनो! वहाँ तो तुमने ख़ुद मुझे एक गोरे के आगे घोड़ी करवा दिया था, अब क्यों मना कर रहे हो?"
वह एक मिनट के लिए चुप हो गईं...

मम्मी: "हाँजी, वो तो है, यहाँ ख़तरा तो है... किसी के मन का पता नहीं होता न कि कौन कैसा है।"

फिर उन्होंने शायद अपनी चूत में दो उँगलियाँ और गहराई तक डाल लीं...

मम्मी: "आआह्ह्ह... तुम कब आकर डालोगे मेरी चूत में... आआह्ह्ह... हाय... तुम्हारी मनजीत बहुत प्यासी है, सरदारा... आआह्ह्ह... उफ्फ... निकल गया मेरा पानी..."

इधर मम्मी की कामुक आवाज़ें सुनकर, मेरी फुर्र फुर्र करती हथेली के नीचे मेरा भी पजामा पूरी तरह गीला हो चुका था। उनकी चूत तो मुझे ठीक से दिखी नहीं... वह सीधी लेटी थीं, इसलिए वह उनकी भरी हुई जाँघों के बीच छुपी हुई थी।

मम्मी: "चलो अच्छा, अब सो जाती हूँ, सुबह उठना भी है। ... गुड नाईट मेरे सरदारा, और उस गोरी की तसल्ली करवा देना जिसे घोड़ी किया हुआ है..." (उन्होंने फिर शरारती ढंग से हँसकर कहा)। "म्म्म्मुआआहह... बाय मेरी जान।"
और मम्मी ने फ़ोन काट दिया।

मैं भी हड़बड़ी में चुपके से ऊपर अपने कमरे में चला गया। युवराज तब तक गहरी नींद में सो चुका था। मैंने अपना गीला पजामा बदला और आकर लेट गया।

मैं बस यही सोच रहा था... मम्मी-डैडी इतने खुले विचार के हैं! डैडी ने मम्मी की चूत एक गोरे को दिलवाई थी! मेरे दिमाग़ में बस यही घूम रहा था कि उस गोरे ने मम्मी की कैसे ली होगी...

ये सोचते-सोचते कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला।
 

Ankit 887427

Member
123
420
79

Chapter 2


अगली सुबह मैं उठा। मम्मी अपनी सैर से लौटकर किचन में काम करने लगी हुई थीं। तभी हमारी बहन हरलीन सुबह-सुबह जिम करके अपने कमरे से बाहर निकली। वह गर्मी से पसीने में भीगी हुई थी।

हरलीन ने एक हल्की टी-शर्ट और पजामा पहना हुआ था, जो पसीने की नमी से उसके जिस्म से पूरी तरह चिपक गया था। टी-शर्ट के नीचे उसके स्तन और पजामे में उसकी कसकर गढ़ी हुई गांड बड़ी सेक्सी लग रही थी। उस चिपकते कपड़े में उसका शरीर ज़रा-सा भी छिपा नहीं था। वह नहाने के लिए अपने कमरे में चली गई। सभी के कमरों के साथ बाथरूम जुड़े हुए थे। घर के अंदर एक कॉमन बाथरूम भी था, जो शायद ही कभी इस्तेमाल होता था।

मैं बाहर सोफ़े पर बैठा था और युवराज अभी तक सोया हुआ था।
रसोई से मम्मी की मधुर आवाज़ आई, "पुत्तर, आकर चाय पकड़ ले।"

मैं उठकर रसोई में गया। मम्मी अंदर रोटी सेंक रही थीं; उन्होंने चटक पीले रंग का एक सूट-सलवार पहना हुआ था। रोटी बनाने के लिए झुकने पर मम्मी की भरी हुई गांड और ज़्यादा बाहर को उभर रही थी।

मुझे तुरंत रात वाला नंगा सीन याद आ गया। मैं मम्मी से चाय लेकर बाहर आकर बैठ गया। मेरे दिमाग में अब सिर्फ़ मम्मी की गोरी, नंगी गांड ही घूम रही थी।

थोड़ी देर में हरलीन नहाकर आई। उसने बाल धोए हुए थे; गीले-गीले बालों में वह बहुत सुंदर लग रही थी। नहाकर उसने एक टाइट जीन्स और काली शर्ट पहन ली थी, और अपने गीले बाल सुखा रही थी। हरलीन ने रसोई में जाकर मम्मी से चाय ली और मेरे पास आकर बैठ गई।

हरलीन: "दिलराज, तुम लोगों को कॉलेज नहीं जाना?"

मैं: "जाना है, पर थोड़ा देर से। आज हमारे पहले दो लेक्चर ख़ाली हैं, इसलिए देर से जाएँगे।"

हरलीन: "ठीक है, चलो मैं चलती हूँ।"

हरलीन ने बाल सँवारे, अपने आपको पूरी तरह संवारा और कॉलेज के लिए निकल गई। आज जीन्स में हरलीन ख़ासकर सेक्सी लग रही थी। डेनिम उसके नितंबों पर कसकर लिपटा था, उसकी गांड पूरी बाहर को उभरी हुई थी, और उसके गोल मम्मे भी मोटे थे...


उसे देखकर साफ़ पता लग रहा था कि किसी अनजान मर्द ने उस पर अपनी सवारी की हुई है, वह अब पूरी तरह से खिली हुई है।
इतने में युवराज भी नीचे आ गया। आकर वह अपने कमरे में जिम करने चला गया। पहले तो हम ज़्यादातर शाम को ही जिम करते थे, पता नहीं आज वह सुबह-सुबह क्यों कसरत करने लगा।

मैं अभी सोफ़े पर ही बैठा था। मम्मी किचन से निकलीं, गर्मी और मेहनत से वह पसीने में पूरी तरह भीग चुकी थीं।

मम्मी: "दिल, कॉलेज नहीं जाना तुम लोगों ने? युवराज उठा नहीं अभी तक?"

मैं: "जाना है मम्मी, पर देर से। हमारे पहले दो लेक्चर मुफ़्त हैं। युवराज उठ गया है, वह कमरे में जिम करने लगा है।"

मम्मी: "अच्छा, ठीक है। मैं तो ख़ुद मोटी होती जा रही हूँ, सोचती हूँ मैं भी तेरी बहन के साथ कसरत शुरू कर दूँ।"

मैं: "मोटी तो नहीं लगतीं मम्मी, आप तो दमदार लगती हैं। हाँ, जिम लगा लिया करो, वैसे भी शरीर चुस्त रहता है।"

मम्मी: "हाँ, देखती हूँ। कहती हूँ हरलीन को, मुझे भी आवाज़ मार लिया करे जब कसरत करती है। चल, मैं अब घर की सफ़ाई कर लूँ, फिर रोटी खाते हैं।"

मैं सोफ़े पर बैठा मोबाइल में व्यस्त हो गया।
मम्मी झाड़ू लगाने लगीं। मेरा ध्यान उन पर अटक गया... पीछे से उनकी कमीज़ उनकी गांड के खाँचे में फँसी हुई थी, और उनके गोल चूतड़ों की पूरी कसी हुई शेप बनी हुई थी। मेरे दिमाग़ में फिर से उनकी नंगी गांड घूमने लग गई।

मम्मी मेरे सामने आकर झाड़ू मारने लगीं और बाद में पोछा लगाने के लिए नीचे ज़मीन पर बैठ गईं। जैसे ही वह उकड़ू बैठीं, उनके मोटे-मोटे, भारी स्तन एकदम कुर्ते के गले से बाहर को निकल आए। उनके दोनों घुटने उनके मम्मो से दब रहे थे, जिससे स्तन और ज़्यादा उभरकर सामने आ गए थे।

आज पहली बार मैंने मम्मी के मम्मे इस तरह से उछले हुए देखे थे। मेरा लंड पजामे में दर्दनाक तरीक़े से फटने को हो रहा था।
इतने में मम्मी बोल पड़ीं।

मम्मी: "काम करना भी मुश्किल ही है। कामवाली एक दिन न आए, तो मुश्किल हो जाती है।"

मैं: "क्या हुआ कामवाली को?"

मम्मी: "बीमार है पुत्तर वो, इसलिए मुझे करना पड़ रहा है काम। चल कोई नहीं, एक-दो दिन की बात है।"

मैं चुपचाप उठकर स्नानघर में चला गया। अंदर जाकर नंगा हो गया और अपना लंड पकड़कर उन्मत्त होकर हिलाने लगा।
"आआहम्म... आआह्ह... इतने बड़े मम्मे मम्मी... हाय तेरी गांड... आआह्ह... उस गोरे का लंड लेती थी बाहर... आआह्ह... यहाँ भी लंड ढूँढ रही है... हाय मेरा ले ले... तेरा पुत्तर बुझा देगा प्यास तेरी... आआहम्म... हाय..."

ऐसे ही गर्म ख़याल ज़ुबान से निकालते हुए मेरा पानी निकल गया और मैं शांत हो गया।

नहाकर बाहर आया और तैयार होने लगा। युवराज भी आ गया, वह भी नहाकर तैयार होने लगा। तैयार होकर, हमने रोटी खाई और हम दोनों कॉलेज निकल गए।

कॉलेज पहुँचकर हम अपने यार-दोस्तों से मिले और कैंटीन में बैठ गए। तभी रवनीत आया। वह हमारे बैच का ही था, पर उसकी स्ट्रीम अलग थी। हम दोनों भाइयों की उसके साथ अच्छी बनती थी। वह हम दोनों का अच्छा दोस्त था। और... हमारी बहन हरलीन का चक्कर भी रवनीत के साथ ही चलता था।
यह बात हमारे बीच खुली हुई थी। अफ़ेयर शुरू होने के बाद ही हरलीन ने रवनीत को विश्वास में लेकर हमसे मिलवाया था। कॉलेज में और किसी को नहीं पता था कि हमारी बहन का चक्कर रवनीत के साथ है। वैसे भी हरलीन सीनियर थी, उसे इस बार पास-आउट हो जाना था, तो ज़्यादा कोई तनाव नहीं था।

रवनीत ने नमस्ते की और पास बैठ गया। हम इधर-उधर की बातें करते रहे। कॉलेज का आधा दिन गुज़र गया था। युवराज मेरे पास आकर खड़ा हुआ।

युवराज: "यार दिलराज, मैंने आज उस भाभी से मिलने जाना है। तुझे घर अकेले ही जाना पड़ेगा।"

मैं: "भोसड़ी के, सुबह नहीं बताया?"

युवराज: "यार, मुझे लगा तुझे अभी बता दूँगा। क्या हुआ? कोई बात है तो रहने देता हूँ, नहीं जाता।"

मैं: "चल साले, कोई बात नहीं है। मिल आ जाकर। मैं चला जाऊँगा किसी के साथ बैठकर घर।"

इतने में हरलीन हमारी तरफ़ आती दिखी।
मैं: "तू यहाँ हमारे पास क्या कर रही है?"

हरलीन: "तुम दोनों से काम था। मैंने रवनीत के साथ कहीं जाना था। मेरी स्कूटी तुम लोग घर ले जाना।"

युवराज कुछ बोलने लगा था, पर मैं बीच में ही बोल पड़ा, "बहनचोद, सबने आज ही जाना था?"

हरलीन: (थोड़ा हैरान होकर) "और कौन चला है?"

मैं युवराज की तरफ़ देखने लगा। दीदी समझ गई।
हरलीन: "तू किसे मिलने जा रहा है युवराज?"

युवराज: "एक दोस्त है दीदी, उसके पास जाना है।"

हरलीन: "अच्छा जी, कौन-से डिपार्टमेंट की है?" (दीदी को लगा कोई लड़की होगी अपने कॉलेज की।)

मैं: "कॉलेज की नहीं है दीदी, बाहर की है।"

हरलीन: "अच्छा। चल ठीक है, तू ले जइयो स्कूटी मेरी। और मम्मी को कह देना मैं रमन के साथ आऊँगी। (रमन हरलीन की पक्की सहेली है और रवनीत की सगी बड़ी बहन है)। पर रवनीत छोड़ जाएगा मुझे अपने आप।"

यह कहते हुए युवराज और हरलीन, दोनों ग़ायब हो गए।
फिर मैं सोचने लगा... युवराज ने आज सुबह जिम इसीलिए लगाया था, ताकि वह शाम को फ़्री रहे, और हरलीन भी इतनी सेक्सी बनकर इसीलिए आई थी, ताकि रवनीत को लुभा सके।

मैंने भी दीदी की स्कूटी उठाई और घर की तरफ़ निकल गया। अकेला कॉलेज में बोर हो रहा था।

घर पहुँचा तो गेट पर ताला लगा हुआ था।
मैंने बाहर स्कूटी खड़ी की और दीवार फांदकर अंदर चला गया। अंदर वाला दरवाज़ा खुला था। पहले तो मैं डर गया कि कहीं कोई चोरी करने न आया हो। फिर अंदर किचन से कुछ हलचल की आवाज़ आई, और मैं दबे पाँव अंदर गया।
अंदर वाला सीन देखकर मेरे होश उड़ गए।

मम्मी बिल्कुल नंगी किचन में खड़ी थीं... और हाथ में तेल की बोतल लेकर अपने कमरे में चली गईं।

मैं धीरे-धीरे मम्मी के पीछे गया। मम्मी अपने मोटे-मोटे चूतड़ों को मस्ती से हिलाती हुई कमरे में घुस गईं। मैंने खिड़की के पास खड़े होकर अंदर देखा, और मेरे पैरों तले ज़मीन निकल गई।

अंदर अनमोल नंगा बेड पर बैठा था। (अनमोल मेरे ताऊ का लड़का है, हमारे घर के बाजू में ही रहता है)। मम्मी तेल की बोतल लेकर अंदर गईं।

अनमोल: "ले आई चाची तेल? आजा, बैठ जा।" (उसने अपनी जांघ पर ज़ोर से थपकी दी) "आजा, मेरी जांघ पर बैठ जा। हाय चाची, तेरा शरीर तो आग लगाता है पूरी।"

मम्मी: "अच्छा? तेरा औज़ार भी कौन-सा छोटा है, ज़ालिम!"
अनमोल ने मम्मी को खड़ा किया और ख़ुद भी खड़ा हो गया और उनके होंठ चूसने लगा।

अनमोल: "उम्म्म्म्हाआ... आआह्हम्म... चाची, तेरे होंठ... दिल करता है खा जाऊँ।"

मम्मी: "आआह्हम्म... खा जा ना, कौन-सा मना किया है तुझे।"
अनमोल ने मम्मी के भारी स्तनों को हाथ से मसलते हुए कहा, "आआह्हम्म... चाची, मम्मे बड़े मोटे हैं, चाचे ने किए हैं या कोई और रस चूस गया इनका?"

मम्मी: "और किसी को तो नज़दीक भी नहीं आने दिया इस जट्टी ने। तू पहला है।" (झूठ बोलते हुए उन्होंने अदा से कहा)।

अनमोल उनके पैरों के बीच बैठ गया, उनकी टाँगें फैलाईं और अपनी जीभ उनकी चूत पर रख दी।

अनमोल: "आआह्हम्म्म... उम्म्म... तेरी चूत चाची, पूरी गीली हुई पड़ी है। शहद टपक रहा है।"

वह उन्हें बेड पर ले गया, सीधा लिटाया और उनकी चूत को पागलों की तरह चूसने लगा। "आआह्हम्म्म... उम्म्म्म्... चाची तेरी चूत... हाय..."

मम्मी: (हाथ से उसका मुँह अपनी गीली चूत पर ज़ोर से दबाते हुए) "आआह्ह्ह... चूस ले... चूस ले फुद्दी अपनी चाची की... आआह्ह्ह... मैं मर गई... बड़े दिन से प्यासी थी।"

मैं बाहर खिड़की पर खड़ा यह सब देख और सुन रहा था। मुझसे संयम नहीं हो रहा था। मेरा लंड फ़टने वाला था। मैंने अपने कपड़े उतार दिए और बाहर नंगा खड़ा होकर अपना लंड तेज़ी से हिलाने लगा।

अंदर, अनमोल माँ के ऊपर लेट गया, उन्हें होठों पर चूमने लगा और दो उँगलियाँ उनकी गर्म चूत में डाल दीं।

मम्मी: "आआह्ह्ह्ह... अनमोल... डाल दे अब... और न तड़पा... हाय..."

अनमोल: "क्या डाल दूँ चाची? बोल?"

मम्मी: "हाय वे... लंड डाल दे अपना... बड़ी प्यासी हूँ..."

अनमोल उठा, तेल अपने तनकर खड़े लंड पर लगाया और उसे मम्मी की चूत पर रगड़ने लगा।

अनमोल: "आआह्ह्ह... बड़ी गीली हुई पड़ी है चूत तेरी चाची... आआह्ह... तेल की ज़रूरत ही नहीं पड़नी थी। आआह्ह..."
उसने लंड चूत के मुहाने पर रखा और एक ही ज़ोरदार झटके में सारा लंड अंदर धकेल दिया।

अनमोल: "आआआआह्ह्ह्ह्ह... चाची... आया मज़ा? आआह्ह... आआहम्म..."

मम्मी: "आआह्ह... हाय वे... मार डाला... धीरे धकेलता वे कंजर... आआआह्ह्ह... हाय... चोद मुझे... चोद अच्छी तरह... आआह्ह... दो बार पानी निकल गया था मेरा।"

अनमोल "आआह्ह्ह... उम्म्म..." करता हुआ पूरा आधा घंटा मम्मी की टाँगें उठाकर उनकी चूत मारता रहा। फिर उन्हें घोड़ी बनाकर माँ की अच्छी-खासी ठुकाई की।

मैं बाहर खड़ा अपनी उत्तेजना के साथ यह सब देखता रहा। लगभग एक घंटे तक यह ज़बरदस्त चुदाई चलती रही। अनमोल ने मम्मी की अच्छी रेल बनाई।

जब दोनों का काम हो गया (दोनों झड़ गए), तो वे बेड पर लम्बे लेट गए।
अनमोल: "चाची, मज़ा आया? मेरे लंड की सवारी करके?"

मम्मी: "हाँ, बहुत। बड़ी प्यासी थी मेरी चूत, आज सुकून आया। चल, अब उठ और कपड़े पहन और जा। बच्चे कॉलेज से आते ही होंगे।"

मैं भी चुपके से अपने कमरे में चला गया। मैंने बाहर खड़े-खड़े ही दो बार मुठ मार ली थी और सारा माल अपनी अंडरवियर से साफ़ कर लिया था। मैं कमरे में आकर नंगा ही बेड पर लेट गया और मुझे गहरी नींद आ गई।

मम्मी और अनमोल कमरे से बाहर आए।
मम्मी: "ये ले चाबी, बाहर से गेट का ताला खोल दे, अपने घर की तरफ़ से जाकर।"

अनमोल ऊपर गया और दीवार फांदकर अपने घर चला गया। मम्मी ने बाहर से गेट खोला और अंदर आ गईं।
मम्मी इस बात से पूरी तरह अनजान थीं कि मैं अपने कमरे में सोया हुआ हूँ।

मुझे सोए हुए एक घंटा हो गया था। हमारा कॉलेज से घर आने का समय भी हो गया था। घर के बाहर घंटी बजी, कोई माँगने वाला आया था। मम्मी आटा डालने गईं और घर के बाहर उसे आटा दे दिया।

तभी मम्मी ने बाहर खड़ी स्कूटी देखी और सोचने लगीं, "यह तो हरलीन की स्कूटी है।" फिर वो जल्दी से हरलीन के कमरे में गईं, वहाँ कोई नहीं था। मम्मी सोचने लगीं, "स्कूटी तो हरलीन की है, फिर हरलीन कहाँ है?"

मम्मी सोचते-सोचते ऊपर (मेरे कमरे की तरफ़) आ गईं और कमरे में मुझे देखकर हैरान हो गईं कि मैं कब आया। ...और मैं बेड पर नंगा सोया पड़ा था। मेरा लंड भी इस समय सोया पड़ा था।
मम्मी अंदर आकर आवाज़ देने लगीं।

मम्मी: "दिलराज! उठ पुत्तर... दिल, उठ!"
मैं एकदम से उठकर बैठ गया।

मैं: "क्या हुआ मम्मी?"

मम्मी: "हुआ तो कुछ नहीं, तू कॉलेज से कब आया?"

मैं चुप रहा और अपने दोनों हाथों से सिर पर खुजली करने लगा, जैसे अभी भी अधूरी नींद में हूँ।

मम्मी: "और... नंगा क्यों सोया पड़ा है? शर्म है कोई तुझे या नहीं?"
मुझे याद आया कि मैं नंगा ही सो गया था। मैं फिर कुछ नहीं बोला।

मम्मी: "बोलता क्यों नहीं बेशरम?"

मैं: "गर्मी लग रही थी, कपड़े उतार दिए थे। आप भी तो अनमोल के ऊपर अपने कमरे में उतार कर बैठी थीं।"

मैं इतनी बात कहकर चुप हो गया।
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया।

हम दोनों, माँ-बेटा, चुप थे, और मम्मी निस्तब्ध होकर मेरे पास आकर बेड पर धीरे से बैठ गईं...
 
Last edited:
Top