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सैंडी ने मुझे पैर से धक्का दिया—एक जोरदार, ठंडा धक्का।
उसका पैर मेरी छाती पर पड़ा—अंगूठा और तर्जनी ने मेरी स्किन पिंच की, फिर पूरी ताकत से धकेला।
मैं पीछे की दीवार से टकराया—पीठ दीवार पर, लुंड अभी भी बाहर, हार्ड, लेकिन अब बेजान लग रहा था।
वो धक्का... किसी भिखारी को भगाने जैसा था।
जैसे कोई अमीर बच्चा भिखारी को भगा रहा हो—नफरत से, हिकारत से।
मुझे भी भिखारी की तरह फील हो रहा था
सैंडी बिस्तर पर लेटी रही—जांघें अभी भी खुली, चूत लाल, सूजी हुई, रस बहता हुआ।
उसने मुझे देखा।
उसके चेहरे पर मुस्कान थी—वही मुस्कान जो कल रात थी, जो बालकनी में थी।
लेकिन अब... वो मुस्कान अलग थी।
अब उसमें कोई शरारत नहीं थी।
कोई खेल नहीं।
बस... एक ठंडी, घमंडी, तिरस्कार भरी मुस्कान।
वो उठी—धीरे से, लेकिन ग्रेस से।
उसकी शर्ट अभी भी कंधों पर लटकी हुई थी—बटन फटे हुए, स्तन आधे बाहर।
"चूत का भिखारी..."
कल रात वो मेरे पास आई थी। .. अपने आप से। .. जब वेटर ने उससे चाटा था। .. मगर अब
उसकी मुस्कान अब और गहरी हो गई।
मेरी हालत जैसे ... अमीर बच्चा महंगा खिलौना दिखाता है... फिर कहता है—तू अच्छा नहीं है... ये तेरे लिए नहीं।"
मैं खड़ा रहा।
मेरा लुंड हार्ड था
मेरा दिल धड़क रहा था—शर्म से, अपमान से।
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस... खड़ा रहा।
मैं खड़ा रहा—दीवार से टिका हुआ
अपमान... मेरे अंदर घुस चुका था।
एक गहरा, चुभता हुआ अपमान।
37 साल का आदमी हूँ—शादीशुदा, नेहा जैसी औरत के साथ, जो मुझ पर जान छिड़कती है।
फिर भी... आज... मैं एक भिखारी जैसा महसूस कर रहा था।
मुझे रोना आ रहा था।
नहीं... रोया नहीं।
लेकिन आँखें जल रही थीं।
गला रुँध रहा था।
मैंने सोचा—बस... चल पड़ूँ।
फिर भी... मैं हिला नहीं।
मैं जानता था—ये अपमान... ये 10-15 मिनट का अपमान... मुझे सैंडी को छूने का मौका देगा।
उसके बदन को महसूस करने का।
उसकी गर्मी को।
उसकी चूत की गर्मी को।
ये... इस पल में... मेरे लिए सेल्फ रिस्पेक्ट से ज़्यादा कीमती लग रहा था।
सैंडी ने बिस्तर पर बैठ गई।
उसके पैर ज़मीन पर थे—जांघें हल्की सी खुली हुईं।
उसकी चूत साफ़ दिख रही थी—लाइन साफ़, गीली, चमकती हुई।
उसका बदन पसीने से तर था—स्तन लटकते हुए, निप्पल्स लाल, सख्त।
शर्ट अभी भी कंधों पर लटकी हुई—बटन फटे हुए, आधा खुला।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सिर्फ़ साँसों की हल्की-हल्की आवाज़
वो मेरी तरफ देख रही थी।
फिर... धीरे से... उसने अपनी तर्जनी उँगली उठाई।
मेरी तरफ इशारा किया—एक छोटा, लेकिन साफ़ आदेश।
"इधर आ।"
उसके चेहरे पर मुस्कान थी—वही घमंडी, ठंडी मुस्कान।
मैंने कुछ नहीं कहा।
मेरा दिमाग खाली था।
मेरा दिल धड़क रहा था।
मैं... जैसे कोई जादू में फँसा हुआ... उसके पास चला गया।
धीरे-धीरे।
उसके बाईं तरफ खड़ा हो गया।
अलोक दाईं तरफ था—अभी भी हार्ड, लुंड बाहर, चमकता हुआ।
सैंडी ने अपना बायाँ हाथ बढ़ाया।
मेरी क्रॉच की तरफ।
उसकी उँगलियाँ मेरे लुंड पर गईं—अंगूठा और तर्जनी के बीच में पकड़ लिया।
हल्का सा—जैसे कोई छोटी चीज़ हो।
फिर... हल्की सी हँसी निकली—एक छोटी, ठंडी, गुदगुदी वाली हँसी।
उसने अपना दायाँ हाथ बढ़ाया।
अलोक की तरफ।
उसका लुंड—मोटा, भारी—उसकी पूरी मुट्ठी में आ गया।
कसकर पकड़ा।
अंगूठा ऊपर से दबाव देता हुआ।
वो हमें दोनों तरफ से पकड़े हुए थी।
मेरा लुंड—उसकी दो उँगलियों में।
छोटा, हल्का, फड़कता हुआ।
अलोक का लुंड—उसकी पूरी मुट्ठी में।
मोटा, भारी, गहरा।
वो हमें करीब लाई।
मैं और अलोक—दोनों उसके इतने करीब कि हमारी साँसें एक-दूसरे से मिल रही थीं।
वो हमें देख रही थी—एक-एक करके।
मेरा लुंड... अलोक का लुंड।
तुलना कर रही थी।
उसकी मुस्कान गहरी हो गई।
उसने धीरे से कहा—आवाज़ में अब कोई ठंडक नहीं, बस... एक हल्की सी सच्चाई।
जैसे "देख... कितना फर्क है।
"कितना छोटा है.. " उसने धीरे से कहा—आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं, बस... एक ठंडी, घमंडी सच्चाई।
सैंडी ने दोनों लुंड पकड़े हुए थे—अलोक का पूरी मुट्ठी में, मेरी दो उँगलियों में।
वो धीरे-धीरे स्ट्रोक कर रही थी—अलोक के लुंड पर पूरी हथेली से, ऊपर-नीचे, गहरा दबाव, जैसे कोई भारी चीज़ को संभाल रही हो।
मेरे लुंड पर... बस अंगूठा और तर्जनी—हल्का सा, जैसे कोई छोटी चीज़ को छू रही हो।
उसकी उँगलियाँ मेरे लुंड पर सरक रही थीं—धीमे, लेकिन जानबूझकर।
फिर... उसने अलोक के फोरस्किन को पीछे धकेला।
उसका हेड बाहर आया—गहरा गुलाबी, मोटा, भारी, चमकता हुआ।
प्रीकम की एक मोटी बूँद टिप पर लटक रही थी—गाढ़ी, सफेद।
उसने मुझे दिखाया—उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी हुईं, बिना पलक झपकाए।
"देख... कितना बड़ा... कितना गहरा।"
फिर... उसने मेरे फोरस्किन को पीछे सरकाया।
मेरा हेड बाहर आया—हल्का भूरा, छोटा, पिंक।
वो मुस्कुराई—एक छोटी, ठंडी मुस्कान।
दोनों लुंड अब प्रीकम से चमक रहे थे—अलोक का पी हॉल गहरा, मोटा, जैसे कोई गड्ढा।
मेरा... छोटा, मुश्किल से दिखता हुआ।
सैंडी ने झुककर अलोक के लुंड की तरफ मुँह ले जाया—उसकी आँखें अभी भी मेरी आँखों में टिकी हुईं, बिना पलक झपकाए।
उसने जीभ निकाली—धीरे से, अलोक के हेड पर प्रीकम को चाटा।
फिर जीभ की नोक से उसके पी हॉल को रगड़ा—साफ करते हुए, गहराई से।
उसकी जीभ अंदर तक गई—एक छोटा सा चूसने जैसा।
अलोक की साँस भारी हो गई।
फिर... वो मेरी तरफ मुड़ी।
उसने मेरे लुंड को मेरी शर्ट के किनारे से रगड़ा—प्रीकम साफ करने के लिए।
उसकी उँगली पर लगी बूँद शर्ट पर फैल गई।
उसकी आँखें मेरी तरफ टिकी हुई थीं—ठंडी, घमंडी, लेकिन अब एक गहरी, जानबूझकर वाली क्रूरता के साथ।
कल रात... मैंने उसके चेहरे पर कम किया था।
मेरा सफेद, गाढ़ा कम उसके गालों पर, होंठों पर, नाक पर फैला था।
वो खुश थी—उसने जीभ निकालकर चाटा था, मुस्कुराई थी, "आह्ह... कितना गर्म... कितना ज़्यादा..." कहा था।
उसने मेरे कम को अपने चेहरे पर मल लिया था—जैसे कोई ट्रॉफी हो।
उसकी आँखें चमक रही थीं—खुशी से, मज़े से।
और आज... वो मेरे लुंड को छूने से भी इनकार कर रही थी।
उसने मेरे लुंड को दो उँगलियों से पकड़ा था—बस इतना कि मैं महसूस करूँ कि वो छू रही है।
फिर... हल्के से छोड़ दिया।
उसकी उँगली पर मेरा प्रीकम लगा था—एक पतली, लगभग अदृश्य बूँद।
उसने अपनी शर्ट के किनारे से रगड़कर साफ किया
मे जानत थी—वो मुझे अपमानित करना चाहती थी।
और अलोक... वो चाहता था कि मैं यहाँ आऊँ।
वो चाहता था कि मैं ये सब देखूँ—उसका "माल" कैसे यूज़ होता है, कैसे वो उसे बेरहमी से लेता है, कैसे वो उसे कंट्रोल करता है।
और मैं... मैं आ गया था।
खुद-ब-खुद।
जैसे कोई मक्खी शहद की तरफ खिंची चली आती है।
मेरा लुंड... अभी भी हार्ड था।
मुझे अपमान से जलन हो रही थी—एक गहरी, चुभती हुई जलन।
फिर भी... मैं हिला नहीं।
मैं कमरे से बाहर नहीं गया।
उसका पैर मेरी छाती पर पड़ा—अंगूठा और तर्जनी ने मेरी स्किन पिंच की, फिर पूरी ताकत से धकेला।
मैं पीछे की दीवार से टकराया—पीठ दीवार पर, लुंड अभी भी बाहर, हार्ड, लेकिन अब बेजान लग रहा था।
वो धक्का... किसी भिखारी को भगाने जैसा था।
जैसे कोई अमीर बच्चा भिखारी को भगा रहा हो—नफरत से, हिकारत से।
मुझे भी भिखारी की तरह फील हो रहा था
सैंडी बिस्तर पर लेटी रही—जांघें अभी भी खुली, चूत लाल, सूजी हुई, रस बहता हुआ।
उसने मुझे देखा।
उसके चेहरे पर मुस्कान थी—वही मुस्कान जो कल रात थी, जो बालकनी में थी।
लेकिन अब... वो मुस्कान अलग थी।
अब उसमें कोई शरारत नहीं थी।
कोई खेल नहीं।
बस... एक ठंडी, घमंडी, तिरस्कार भरी मुस्कान।
वो उठी—धीरे से, लेकिन ग्रेस से।
उसकी शर्ट अभी भी कंधों पर लटकी हुई थी—बटन फटे हुए, स्तन आधे बाहर।
"चूत का भिखारी..."
कल रात वो मेरे पास आई थी। .. अपने आप से। .. जब वेटर ने उससे चाटा था। .. मगर अब
उसकी मुस्कान अब और गहरी हो गई।
मेरी हालत जैसे ... अमीर बच्चा महंगा खिलौना दिखाता है... फिर कहता है—तू अच्छा नहीं है... ये तेरे लिए नहीं।"
मैं खड़ा रहा।
मेरा लुंड हार्ड था
मेरा दिल धड़क रहा था—शर्म से, अपमान से।
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस... खड़ा रहा।
मैं खड़ा रहा—दीवार से टिका हुआ
अपमान... मेरे अंदर घुस चुका था।
एक गहरा, चुभता हुआ अपमान।
37 साल का आदमी हूँ—शादीशुदा, नेहा जैसी औरत के साथ, जो मुझ पर जान छिड़कती है।
फिर भी... आज... मैं एक भिखारी जैसा महसूस कर रहा था।
मुझे रोना आ रहा था।
नहीं... रोया नहीं।
लेकिन आँखें जल रही थीं।
गला रुँध रहा था।
मैंने सोचा—बस... चल पड़ूँ।
फिर भी... मैं हिला नहीं।
मैं जानता था—ये अपमान... ये 10-15 मिनट का अपमान... मुझे सैंडी को छूने का मौका देगा।
उसके बदन को महसूस करने का।
उसकी गर्मी को।
उसकी चूत की गर्मी को।
ये... इस पल में... मेरे लिए सेल्फ रिस्पेक्ट से ज़्यादा कीमती लग रहा था।
सैंडी ने बिस्तर पर बैठ गई।
उसके पैर ज़मीन पर थे—जांघें हल्की सी खुली हुईं।
उसकी चूत साफ़ दिख रही थी—लाइन साफ़, गीली, चमकती हुई।
उसका बदन पसीने से तर था—स्तन लटकते हुए, निप्पल्स लाल, सख्त।
शर्ट अभी भी कंधों पर लटकी हुई—बटन फटे हुए, आधा खुला।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सिर्फ़ साँसों की हल्की-हल्की आवाज़
वो मेरी तरफ देख रही थी।
फिर... धीरे से... उसने अपनी तर्जनी उँगली उठाई।
मेरी तरफ इशारा किया—एक छोटा, लेकिन साफ़ आदेश।
"इधर आ।"
उसके चेहरे पर मुस्कान थी—वही घमंडी, ठंडी मुस्कान।
मैंने कुछ नहीं कहा।
मेरा दिमाग खाली था।
मेरा दिल धड़क रहा था।
मैं... जैसे कोई जादू में फँसा हुआ... उसके पास चला गया।
धीरे-धीरे।
उसके बाईं तरफ खड़ा हो गया।
अलोक दाईं तरफ था—अभी भी हार्ड, लुंड बाहर, चमकता हुआ।
सैंडी ने अपना बायाँ हाथ बढ़ाया।
मेरी क्रॉच की तरफ।
उसकी उँगलियाँ मेरे लुंड पर गईं—अंगूठा और तर्जनी के बीच में पकड़ लिया।
हल्का सा—जैसे कोई छोटी चीज़ हो।
फिर... हल्की सी हँसी निकली—एक छोटी, ठंडी, गुदगुदी वाली हँसी।
उसने अपना दायाँ हाथ बढ़ाया।
अलोक की तरफ।
उसका लुंड—मोटा, भारी—उसकी पूरी मुट्ठी में आ गया।
कसकर पकड़ा।
अंगूठा ऊपर से दबाव देता हुआ।
वो हमें दोनों तरफ से पकड़े हुए थी।
मेरा लुंड—उसकी दो उँगलियों में।
छोटा, हल्का, फड़कता हुआ।
अलोक का लुंड—उसकी पूरी मुट्ठी में।
मोटा, भारी, गहरा।
वो हमें करीब लाई।
मैं और अलोक—दोनों उसके इतने करीब कि हमारी साँसें एक-दूसरे से मिल रही थीं।
वो हमें देख रही थी—एक-एक करके।
मेरा लुंड... अलोक का लुंड।
तुलना कर रही थी।
उसकी मुस्कान गहरी हो गई।
उसने धीरे से कहा—आवाज़ में अब कोई ठंडक नहीं, बस... एक हल्की सी सच्चाई।
जैसे "देख... कितना फर्क है।
"कितना छोटा है.. " उसने धीरे से कहा—आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं, बस... एक ठंडी, घमंडी सच्चाई।
सैंडी ने दोनों लुंड पकड़े हुए थे—अलोक का पूरी मुट्ठी में, मेरी दो उँगलियों में।
वो धीरे-धीरे स्ट्रोक कर रही थी—अलोक के लुंड पर पूरी हथेली से, ऊपर-नीचे, गहरा दबाव, जैसे कोई भारी चीज़ को संभाल रही हो।
मेरे लुंड पर... बस अंगूठा और तर्जनी—हल्का सा, जैसे कोई छोटी चीज़ को छू रही हो।
उसकी उँगलियाँ मेरे लुंड पर सरक रही थीं—धीमे, लेकिन जानबूझकर।
फिर... उसने अलोक के फोरस्किन को पीछे धकेला।
उसका हेड बाहर आया—गहरा गुलाबी, मोटा, भारी, चमकता हुआ।
प्रीकम की एक मोटी बूँद टिप पर लटक रही थी—गाढ़ी, सफेद।
उसने मुझे दिखाया—उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी हुईं, बिना पलक झपकाए।
"देख... कितना बड़ा... कितना गहरा।"
फिर... उसने मेरे फोरस्किन को पीछे सरकाया।
मेरा हेड बाहर आया—हल्का भूरा, छोटा, पिंक।
वो मुस्कुराई—एक छोटी, ठंडी मुस्कान।
दोनों लुंड अब प्रीकम से चमक रहे थे—अलोक का पी हॉल गहरा, मोटा, जैसे कोई गड्ढा।
मेरा... छोटा, मुश्किल से दिखता हुआ।
सैंडी ने झुककर अलोक के लुंड की तरफ मुँह ले जाया—उसकी आँखें अभी भी मेरी आँखों में टिकी हुईं, बिना पलक झपकाए।
उसने जीभ निकाली—धीरे से, अलोक के हेड पर प्रीकम को चाटा।
फिर जीभ की नोक से उसके पी हॉल को रगड़ा—साफ करते हुए, गहराई से।
उसकी जीभ अंदर तक गई—एक छोटा सा चूसने जैसा।
अलोक की साँस भारी हो गई।
फिर... वो मेरी तरफ मुड़ी।
उसने मेरे लुंड को मेरी शर्ट के किनारे से रगड़ा—प्रीकम साफ करने के लिए।
उसकी उँगली पर लगी बूँद शर्ट पर फैल गई।
उसकी आँखें मेरी तरफ टिकी हुई थीं—ठंडी, घमंडी, लेकिन अब एक गहरी, जानबूझकर वाली क्रूरता के साथ।
कल रात... मैंने उसके चेहरे पर कम किया था।
मेरा सफेद, गाढ़ा कम उसके गालों पर, होंठों पर, नाक पर फैला था।
वो खुश थी—उसने जीभ निकालकर चाटा था, मुस्कुराई थी, "आह्ह... कितना गर्म... कितना ज़्यादा..." कहा था।
उसने मेरे कम को अपने चेहरे पर मल लिया था—जैसे कोई ट्रॉफी हो।
उसकी आँखें चमक रही थीं—खुशी से, मज़े से।
और आज... वो मेरे लुंड को छूने से भी इनकार कर रही थी।
उसने मेरे लुंड को दो उँगलियों से पकड़ा था—बस इतना कि मैं महसूस करूँ कि वो छू रही है।
फिर... हल्के से छोड़ दिया।
उसकी उँगली पर मेरा प्रीकम लगा था—एक पतली, लगभग अदृश्य बूँद।
उसने अपनी शर्ट के किनारे से रगड़कर साफ किया
मे जानत थी—वो मुझे अपमानित करना चाहती थी।
और अलोक... वो चाहता था कि मैं यहाँ आऊँ।
वो चाहता था कि मैं ये सब देखूँ—उसका "माल" कैसे यूज़ होता है, कैसे वो उसे बेरहमी से लेता है, कैसे वो उसे कंट्रोल करता है।
और मैं... मैं आ गया था।
खुद-ब-खुद।
जैसे कोई मक्खी शहद की तरफ खिंची चली आती है।
मेरा लुंड... अभी भी हार्ड था।
मुझे अपमान से जलन हो रही थी—एक गहरी, चुभती हुई जलन।
फिर भी... मैं हिला नहीं।
मैं कमरे से बाहर नहीं गया।