थोड़े से गहमा गहमी और बातों के दौरान हम मंदिर प्रांगण में दाखिल हो चुके थे। मैंने समय देखा और भागकर मंदिर में गई। सुबह की आराधना का वक़्त हो रहा था, और मै, फूल और बेलपत्र चढ़ने से लेकर धूप जलने तक की सारे शुरवाति चीजों को छोड़ना नहीं चाहती थी। मै भागकर गई और सबसे आगे जाकर खड़ी हो गई।
आह ! मंदिर से ताजा आते फूलों की खुशबू और वहां जलने वाले धूप दीप, मन को अति प्रसन्न कर रहे। यहां के इस मनमोहक माहौल में तभी हरी शंकर जी की मधुर वाणी सुनाई देने लगी। अच्छा हुआ आज दिखे नहीं, वरना मुझे फिर से आज कुछ कुछ होने लगता।
कंठ से जैसे स्वयं स्वरावती जी वाश रही हो। उनकी आराधना सुनकर वहां मौजूद हर कोई भाव विभोर हो उठा। मंदिर लगभग भरा हुआ था और वहां ऐसा एक भी नहीं था, जो आखें मूंदे हरी शंकर जी के मधुर रस वाणी में खोया हुआ ना हो। आराधना समाप्त हो चुकी थी और भक्त अपने प्रसाद लेकर जा रहे थे।
आराधना होने के बाद मैंने भी फुल अर्पण किया और प्रसाद लेकर जैसे ही जाने को हुई, पुजारी जी ने टोक दिय… "मेनका सुनो जरा बेटा।"..
मै:- जी बाबा…
पुजारी जी अपने पास रखा एक छोटा सा बैग मुझे देते… "इसे संभाल कर ले जाना और सिर्फ अपने पिताजी के हाथ में ही देना।"
मै:- बाबा, मेरे साथ भाभी, वंशी चाचा, और मुरली भईया आए है।
पुजारी:- तुम्हारे घर का एक नौकर तो मुझे दिखा था, मुझे लगा तुम उसी के साथ आयी होगी। लेकिन तुम्हारी भाभी और मुरली आया है, शायद देख नहीं पाया मै।
पुजारी जी की बातें थोड़ी हैरान करने वाली थी। वंशी चाचा यहां था, फिर मेरी भाभी और मुरली कहां गया। कहीं उस मुरली ने तो…. सुबह भाभी ने उसे डांट दिया था, और धमकाया था सो अलग… मेरे चेहरे पर हल्का खिंचाव आने लगा, जिसे पुजारी जी भांपते हुए पूछने लगे…. "क्या हुआ बेटा।"..
मै:- कुछ नहीं बाबा बस आपकी बातो को सोच रही थी। केवल पापा को देना है तो मै भाभी और बाकियों से क्या कहूंगी।
पुजारी जी:- ये लो हो गया काम। इसमें मैंने रामचरित्र मानस, भगवता गीता, विष्णु पुराण, और ऐसे ही 4-5 पुस्तकें डाल दी है, कोई पूछे तो कहना बाबा से मांगे थे किताब और उन्होंने दिए है। हां, लेकिन किताब को पूजा घर या किसी सुद्घ स्थान पर रखना… तुम बच्चे लोग अपने ऊपर तो पुरा ध्यान देते हो, लेकिन ये सब छोटी-छोटी बातें भुल जाते हो।
मै:- मै बिल्कुल नहीं भूलूंगी, आप निश्चित रहिए और ये झोला केवल पापा के हाथ में जाएगी, मै अपनी मां को भी नहीं दे सकती, और कोई बात बाबा।
पुजारी जी हंसते हुए मुझे आशीर्वाद दिए और मै भागकर नीचे मंदिर में प्रांगण में आ गई। मै अपने सैंडिल भी पहन रही थी और चिंता से चारो ओर नजर भी दौड़ा रही थी। मेरी चिंता मेरे चेहरे से साफ पढ़ी जा सकती थी।
मुरली था तो एक नंबर का दबंग, जिसका सिक्का कई टोलों पर चलता था। अगर रास्ते की बात का गुस्से में उसने कहीं भाभी के साथ कुछ उल्टा सीधा कर दिया तो यहां बस इज्जत देखी जाती है। चुपचाप भाभी और मुरली का कत्ल करवा देते और उसे ऐक्सिडेंट का शक्ल दे देते। ताकि दिल की आग भी शांत हो जाए और इज्जत भी बच जाए।
इन्हीं सब उधेड़बुन में मै अपने सैंडल पहनकर एक बार और चारो ओर देख ली, लेकिन भाभी का कहीं कोई पता नहीं था। गाड़ी के पास मुझे दूर से ही वंशी चाचा दिख रहे थे, जो बाहर खड़े थे। दिमाग में हजार धारणाएं बनने लगी थी और घबराहट के कारन मेरे पाऊं थोड़े-थोड़े कांप रहे थे।
मै रोना चाह रही थी, चींख-चींख कर भाभी पुकारना चाह रही थी, लेकिन मै ऐसा कर नहीं सकती थी। किसी तरह हिम्मत करके मै बांस वाले जंगल के ओर चल दी, जहां लगभग कोई नहीं जाता। मन में हजार सवाल और मै चारो ओर देखते धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी….