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Thriller 100 - Encounter !!!! Journey Of An Innocent Girl (Completed)

nain11ster

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1. प्रारंभिक जीवन





जिसकी हाथ कि सफाई पकड़ी गई वो चोर और जो बच गया वो कलाकार। शायद हर जगह की बस यही कहानी चल रही है। जिंदगी की शुरवात दौड़ की कहानी शुरू करने से पहले मै अपना परिचय दे दूं। जब मै पैदा हुई तब मेरे मामा ने मेरा नाम मेनका रख दिया।


हां आप सही सोच रहे है, इतिहास में मेनका का अहम स्थान है, जिसने अपने रूप और कौमार्य से विश्वमित्रा की तप को भंग किया था और दोनो के मिलन से जो बच्चा पैदा हुआ उसने तत्काल आर्यावर्त साम्राज्य का गठन किया था। लेकिन मेरा नाम इन तथ्यों को ध्यान में रखकर नहीं रखा गया था, बल्कि मेरे सबसे बड़े वाले भईया का नाम महेश और उससे छोटे वाले भईया का नाम मनीष था, इसलिए मेरा नाम "म" अक्षर से रख दिया गया। महेश, मनीष और मेनका।


मै भी एक मेनका ही थी। रूपवान, गुणवान, 2 भाइयों की इकलौती बहन और अपने घर की सबसे नटखट सदस्य। मेरे पैदा होने के 10 साल बाद मेरे सबसे बड़े भाई महेश की शादी हो गई।


मेरी बड़ी भाभी सोभा जबसे ब्याह कर आयी, घर में गृह क्लेश शुरू हो गया। देखने में तो काफी खूबसूरत थी, शायद इसी बात का घमंड था और चेहरे पर कभी हंसी नहीं रही। दूर से ही देखकर कोई भी उसे चंठ समझ ले।


खैर धीरे-धीरे हम सब भी उसकी आदतों में रम गए। जब तक घर में उसकी किट-किट ना शुरू हो, तबतक ऐसा लगता था कि आज दिन शुरू ही नहीं हुआ। जब वो मायके जाती थी, तो ऐसा लगता था घर में केवल चिड़िया ही चहक रहे है और किसी इंसान की आवाज ही नहीं आ रही।


उसके 2 सालो बाद मेरे मनीष भईया की भी शादी हो गई। रूपा भाभी जब शुरू-शुरू घर में आयी थी, तब वो काफी अच्छी थी। संस्कारी और आज्ञाकारी बहू की परिभाषा। लेकिन कहते है ना खरबूज को देखकर खरबूज अपना रंग बदल लेता है, वहीं किस्सा मेरे घर में भी हो गया।


फिर तो देवरानी और जेठानी का रिश्ता ने ऐसा रंग जमाया की पूरे गांव वाले आए दिन तमाशा देखा करते थे। भिड़ कान लगाए दोनो के द्वंद को सुनती और मेरे पिताजी अनूप मिश्रा के बहुओं की चर्चा पूरे गांव का हॉट टॉपिक बनकर रह जाता।


जब दोनो भाइयों में झगड़े बढ़ने लगे तब पिताजी ने खेत और पैसे देकर बड़े भईया को घर के लिए नहर के पास वाली जमीन दे दिया, और हम सब छोटे भईया के साथ यहीं अपने पहले के मकान में रहने लगे। लेकिन वो कहते है ना विवाद जब किसी स्त्री का लगाया हो तो कभी थमता ही नहीं।


मेरी भाभी सोभा अक्सर मेरे बड़े भैया महेश को उकसाया करती थे और वो आकर यहां कभी-कभी पिताजी और छोटे भईया से जमीन के लिए झगड़ा किया करते थे। मेरे पिताजी एक सुलझे हुए व्यक्ति थे। ना जाने कितने लोगो ने उनकी सलाह से अपनी जिंदगी सवार ली, लेकिन पिताजी खुद के ही चिरागों को समझा नहीं पाए।


जब बंटवारा हो रहा था तब उन्होंने जमीन के 4 हिस्से कर दिया था। सबसे बड़ा भू भाग मिला था मेरे छोटे भैया को। तकरीबन 40 एकड़ जमीन और 8 आम के बगीचे। वो इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने घर की जिम्मेदारी उठाई थी। वहीं मेरे बड़े भैया को 30 एकड़ जमीन और 8 बगीचे उन्हें भी मिले थे।


5 एकड़ की जमीन पिताजी ने खुद अपने पास रखा था और हाईवे से लगा हुआ 10 एकड़ की जमीन मेरे शादी के लिए अलग कर लिया था। शादी के वक़्त जो भाई खर्च उठाएगा, उसे वो जमीन मिलेगी। वरना वो जमीन बेचकर मेरी शादी की जानी थी। बस इसी बात को लेकर महीने, 2 महीने में विवाद हो जाया करता था।


खैर ये सब कहानी घर-घर की चलती ही रहती है, लेकिन इन सब में मेरी कहानी भी आगे बढ़ रही थी। पारिवारिक क्लेश को मुझसे लगभग दूर ही रखा जाता था और घर में एक बेटी हो ऐसी सभी की वर्षों कि ख्वाहिश थी, इसलिए मुझे लाड़-प्यार भी सबसे उतना ही मिलता रहा।


लेकिन उफ्फ ये बंदिशे, भाभी के भाइयों से हंसकर बात करने पर भाव्हें तन जाती थी। अकेले अपने सड़क के मोड़ के आगे गई तो सवाल खड़े हो जाया करते थे। एक स्कूल था तो वहां भी मेरे साथ गांव के कई चचरे भाई हुआ करते थे, जिनके रहते किसी कि हिम्मत नहीं होती मुझसे बात करने की।


कुल मिलाकर जो भी हंसना खेलना और बोलना है, वो अपने परिवार के बीच ही। धीरे-धीरे उम्र भी बढ़ने लगी और दुनियादारी की कुछ-कुछ बातो का अल्प ज्ञान भी शुरू होने लगा। वैसे तो मै ज्यादातर अपने कमरे के बाहर तक नहीं निकलती थी, लेकिन कभी- जब मेरी रातों की नींद खुलती और मै पानी पीने के लिए अंधेरे में किचेन के ओर जाती, तो कभी-कभी मुझे चूड़ियों के जोड़-जोड़ से खन-खन कि आवाज़ आया करती थी।


मै डर के मारे वापस अपने बिस्तर में घुस जाती और सुबह जब मै ये बात अपनी भाभी को बताती की हमारे घर में चुड़ैल है और उसके चूड़ियों के खनकने की आवाज मैंने अपने कानो से सुनी, तो वो जोड़-जोड़ से हसने लगती थी।


खैर जिंदगी मासूमियत में कट रही, थी जिसमे बहुत से बातो का तो मुझे ज्ञान भी नहीं था। दसवीं की परीक्षा हो गई थी और आगे कि पढ़ाई के लिए हमे हमे गांव से 8-10 किलोमीटर दूर, एक छोटे से बाजार के पास जाना था। मै बहुत खुश थी क्योंकि मेरे सारे बॉडीगार्ड भाई, सहर पढ़ने निकल गए थे। केवल नकुल बचा था जो मेरे फिफ्थ जेनरेशन कजिन का बेटा था और गांव के रिश्ते में मेरा भतीजा लगाता, पर हम दोनों एक ही उम्र के थे। चूंकि हम दोनों बिल्कुल पड़ोसी थे इसलिए काफी क्लोज थे।


गांव में अक्सर ऐसा उम्र का गैप हो जाते है,, जो 3-4 पीढ़ी नीचे आने के बाद चाचा-भतीजे के उम्र एक समान होती है। अब मुझे ही देख लीजिए, मै अपने बड़े भाई से 12 साल की छोटी हूं और दूसरे भाई से 8 साल की।


मेरे बड़े भाई के बच्चे जब तक जवान होंगे तबतक मेरा बच्चा मेरे गोद में होगा। और मेरे भाई के पोते पोती और मेरे बच्चे की उम्र में बहुत ज्यादा होगा तो 5 साल का अंतर। सहर की बात अलग होती है, जहां 2 जेनरेशन बाद तो किसी को पता भी नहीं होता कि कौन किसके रिश्ते में क्या लगता है और चौथा जेनरेशन आने तक तो शायद आपस मै शादियां भी हो जाएं। लेकिन गांव की बात अलग होती है। पीढ़ी दर पीढ़ी सब एक ही जगह रह जाते है।


खैर हमे कॉलेज के लिए घर से 6-7 किलोमीटर दूर जाना था। मै और नकुल दोनो तैयार थे कॉलेज जाने के लिए, वो घर में आते ही चिल्लाने लगा.. "मेनका दीदी, जल्दी करो।".. हालांकि बाहर वो मुझे दीदी नहीं कहता था लेकिन यदि सबके सामने मुझे दीदी ना कहे तो उसे जूते परते।


आज मै नकुल के साथ अपने नए कॉलेज में जा रही थी, एक नई जिंदगी की शुरवात करने। गांव के पास का कॉलेज था तो लगभग हर कोई हमारे परिवार के लोगों को जनता था। ऐसा हो भी क्यों ना, आखिर कॉलेज के पास की सारी जमीन हमारी ही फरिक (फरिक यही पीढ़ियों में अलग हुए किसी ना किसी परिवार की) की थी, जिसे किसी ने आज तक बेचा नहीं था।


कॉलेज का पहला दिन और मै पहली बार गंदी नजरो का सामना कर रही थी। आज तक कभी ऐसे माहौल में नहीं रही और ना ही कभी घर के बाहर अकेली गई, इसलिए नजरो का ऐसा घिनौनापन कभी मुझे नजर ही नहीं आया। मेरी नजरो से बस 1, 2 नजरे टकराई और मै नकुल का हाथ जोड़ से पकड़ कर नीचे जमीन में देखकर चलने लगी।


नकुल को भी आस-पास के माहौल का इल्म था, इसलिए वो भी चुप चाप मेरे साथ चल रहा था। हम दोनों क्लास का पता करने के लिए ऑफिस आ गए। वहां का किरानी, चपरासी और ऑफिस में कई क्रमचारी हमे पहचानते थे। त्योहार में हमारे घर कई बार तो कुछ लोग आ भी चुके थे। उसी में से एक चपरासी थे मुन्ना काका, जो पिछला टोला में रहते थे।


मुन्ना काका हमे देखकर खुश होते हुए कहने लगे… "बाबू साहब का फोन आ गया था। मेनका बिटिया तुम्हारा क्लास उधर बाएं ओर से है, तुम रुको यही मेरे साथ चलना। नकुल बिटवा तुम्हारा विज्ञान कि सखा उधर दाएं ओर है। तुम उधर चले तो जाओगे ना।"


नकुल "हां" में सर हिलाते हुए कहने लगा… "मुन्ना काका इसके क्लास के लड़को को अच्छे से समझा देना, वरना हम जब समझाने पर आएंगे तब क्लास में केवल लड़कियां ही बचेगी।"


मुन्ना:- हा हम समझा देंगे आप चिंता मत करो, इसलिए तो मेनका बिटिया को अपने साथ लिए जा रहे है।


इन सब बातो में मेरी कोई प्रतिक्रिया नहीं थी, मै तो बस केवल जमीन को ताक रही थी। एक बड़े से लंबे धमकी के बाद मुन्ना मेरे क्लास से चला गया और मै एक बेंच पर बैठ गई। मेरे पड़ोस वाली लड़की मुझे घूरती हुई पूछने लगी… "ऐ तेरे पापा जमींदार है क्या, जो ये इतना बोलकर गया।"


मै बस हां में अपना सर हिला दी। वो मेरे ओर हंस कर देखती हुई कहने लगी, "तेरे जवानी पर तो ताला लग गया है।"… कुछ अजीब सी बातें थी, जिसे सुनकर मै उसे सवालिया नजरो से देखने लगी।


वो मुझे देखकर हंसती हुई कहने लगी… "मेरा नाम नीतू है, और तुम्हारा नाम।"..


"मेनका".. धीमे से मैंने बोल दिया.. वो फिर से पूछने लगी। इस बार थोड़ी ऊंची आवाज में मैंने अपना नाम बता दिया। चलती क्लास के बीच धीमे-धीमे पता नही वो कैसी-कैसी बातें कर रही थी। नीतू की बातें सुनने में मुझे काफी अजीब लग रही थी और पहली क्लास के बाद ही मैंने तय किया कि इसके पास नहीं बैठना।


मैं सोच तो ली लेकिन डर ये भी था कि कहीं इसके जैसे सब हो गए तो। मै बस इसी उधेड़बुन में थी कि दूसरी क्लास शुरू हो गई और धीमे-धीमे उसकी बातें भी। मै बिना कोई प्रतिक्रिया दिए बस "हां हूं" कर रही थी और सोच रही थी… "इससे कहीं बेहतर तो मेरे स्कूल का माहौल था। सब भाई बहन के बीच कम से कम खुलकर हंस बोल सकती थी। यहां तो लग रहा था कि अनजानों के बीच मेरे मुंह पर ताला ही लग गया है।"
 
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घटनाओं का जाल… गांव और कॉलेज

पहली घटना…. भाग 1




अच्छा या बुरा कॉलेज में अब दिन कटने लगे थे। मेरी किस्मत में शायद नीतू का ही साथ लिखा था, मै जितना पीछा छुड़ाने की कोशिश की, वो उतने ही मेरे गले से बांधती चली गई। हार कर मैंने भी मान लिया कि मेरी किस्मत में यही एक सहेली है।


बेवाक अंदाज और अपने अदाओं से हर वक़्त लड़को को टीज किया करती थी। जीन्स टॉप का कल्चर नहीं था, इसलिए लगभग सभी लड़कियां सलवार कुर्ता पहन ही आया करती थी। लेकिन नीतू के कपड़े पहनने का अंदाज ही अपना था। एक तो उसकी छातियां उम्र से ज्यादा बड़ी थी, लगभग 32 की होगी, जिसपर हर लड़के की नजर लगभग टिकी रहती थी। चेहरा भी उसका कम आकर्षक नहीं था और यही वजह था की वो क्लास के अंदर सबसे मशहूर लड़की थी।


उसके साथ होने का खामियाजा अक्सर मुझे ही भुगतना पड़ता था।। जब भी किसी मनचलों के पास से गुजर जाओ, उनके अभद्र टिप्पणियां ही सुनने को मिलता था। उसपर तो कमेंट करते ही थे, साथ में जो मुझे नहीं जानते थे, कभी-कभी मुझे भी लपेट लिया करते थे।


नीतू भी किसी से कम नहीं थी। लड़को को टीज करने के लिए वो बड़े गले का कुर्ता पहनकर आती थी जिसमे उसका सीने कि गहराई का माप कर कोई लिया करता था। लगभग महीना दिन बीतने के बाद, अब यहां की बातें लगभग सामान्य हो चुकी थी। पहले बहुत सी चीजें नहीं समझ में आती थी, लेकिन अब बहुत सी बातें साफ हो गई थी।


खैर कॉलेज के रूटीन में थोड़ी बहुत फेर बदल होने के कारन मेरा तो भला हो चुका था। पहले जहां मेरे और नकुल के अलग-अलग वक़्त पर खाली पीरियड्स होते थे, वहीं अब एक साथ होने लगे थे। मै बहुत खुश थी। खाली पीरियड्स होते ही मै नकुल के पास जाने लगी, तभी पीछे से नीतू भी आ गई… "क्यूं मेनका आज भतीजा फ्री है, तो दोस्त को भुल गई।"..


मै, बुझे मन से मुस्कुराती हुई… "नहीं नीतू ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे लगा तुम्हारा परिचय मै किसी अनजान लड़के से कैसे करवाऊं, इसलिए मै अकेली ही चली आयी।"..


नीतू झटक कर मेरे साथ आती… "तू चिंता मत कर एक बार परिचय हो जाए उसके बाद अनजान नहीं रहेंगे।"..


मै, उसकी बात पर मुस्कुराकर फीकी प्रतिक्रिया देने लगी और दोनो साथ चल रहे थे… "हाय रे मोहन इसके आम तो आज कहर ढा रहे है, दिल कर रहा है दोनो हाथ से दबा दबा कर चूस लूं।"… "मुझे तो वो टिकोला ही मस्त लगती है, अपनी मेहनत से पुरा आम बनाकर चुसुंगा।"..


दोनो कमिने की फिर से वहीं फुहर कमेंट। मै गुस्से में झटक कर तेजी से चलने लगी और नीतू के मुंह से फिर से वही धीमी "हिहिहिहि" की आवाज। उसका मुंह छिपाकर दबी से आवाज़ में हंसना, एक बार फिर मुझे गुस्सा दिला गई। मै कुछ नीतू को रखकर सुनाती, उससे पहले ही सामने से 10 कदम पर नकुल कुछ लड़को के साथ खड़ा था।


मैंने अपने चेहरे के भाव ठीक किए और उसके पास पहुंच गई। नकुल के सभी दोस्त मुझे जानते थे इसलिए मेरे वहां पहुंचते ही सबने "क्लास में मिलते है।".. ऐसा कहकर चले गए।… "किसी खास विषय पर डिस्कशन कर रहे थे क्या नकुल।".. मैंने आते ही पूछा।


"नहीं, बस ऐसे ही खड़े होकर बात कर रहे थे।"… नकुल ने मुझे जवाब देते हुए कहा लेकिन उसकी नजरें तो कहीं और थी। मुझे समझते देर नहीं लगी कि ये भी एक लड़का ही है। मुझे एक छोटी सी शरारत सूझी। नकुल को घूरती हुई मै पूछने लगी… "मै यहां खड़ी हूं, तू कहां देख रहा है। भाभी (नकुल की मां) से तुम्हारी शिकायत करनी होगी मुझे।"


ऐसा लगा जैसे मैंने किसी भवरे को फूल पर मंडराने से रोक दिया हो। उसका ध्यान टूटा और वो हड़बड़ा कर… "मां से क्या शिकायत करोगी।"..



नीतू:- यही की कैसे मेनका ने एक लड़की को नजरंदाज करके पीछे पुतले की तरह खड़ा कर दिया।


"ओह सॉरी, मै तो भुल ही गई। नकुल ये है मेरी दोस्त मेनका। मेनका ये है नकुल।"… नीतू की बात से याद आया कि इसका परिचय करवाना तो भुल ही गई। वैसे नीतू इसी के वजह से ही तो पता चला कि नकुल भी एक लड़का है। मै अंदर ही अंदर हंसी और जबतक अपनी बातो में खोई थी, यहां इन दोनों की मुस्कुराकर बातें भी शुरू हो गई।


मै समझ चुकी थी कि कच्ची उम्र के आकर्षण का खेल शुरू हो चुका था। वैसे भी नीतू भले ही कितने लड़को को टीज क्यों ना कर ले, ये बात वो भी अच्छे से जानती थी कि किसी अनजान लड़के से बात करके उसे भाव देने का मतलब होगा पूरे कॉलेज के चर्चा का विषय होना। इसलिए आज जब टीज करने के साथ साथ सेफली बात करने का मौका मिल रहा था तो नीतू उसका लाभ अपने दोनों हाथ से उठा रही थी।


उस वक़्त तो ऐसा लगा जैसे मै ही इन दोनों से अनजान हूं। तभी मैंने नीतू की वो अदा भी देखी जिससे नकुल पुरा सिहर सा गया। नकुल की नजर उसके खुली हुई कुर्ती के बटन पर थी, ये हम दोनों को पता था। तभी नीतू ने अनजान बनते हुए एक छोटी से अंगड़ाई लेकर आना पुरा सिना खोल दी, और दबी आखों से नकुल को देखने लगी।


नकुल इस प्रकार से घुर रहा था मानो आखों से ही नीतू के कपड़े फाड़कर उसके गोल सुडौल बिल्कुल नए विकसित हुए चूची को नंगा देखना चाह रहा हो। लेकिन उसे शायद ध्यान आया हो की मै भी यहीं खड़ी हूं, इसलिए अपनी हरकतों पर वो विराम लगाते हुए सीधा खड़ा हो गया।


थोड़ी देर तक हम… नही, वो दोनो बातें करते रहे और मै तमाशा देखती रही। अगली सुबह तो और भी ज्यादा झटका लगा मुझे। हमारा घर से करीब 4 किलोमीटर पीछे जाने के लिए हमारी बोलेरो चल रही थी… "नकुल गाड़ी पीछे क्यों ले रहा है। हमे कॉलेज जाना है।"..


नकुल:- मेनका तुमने बताया नहीं कभी की तुम्हारी सहेली नीतू 2 किलोमीटर पैदल चलकर गांव के चौपाल पर आती है, और वहां से तांगे में रोज कॉलेज जाती है।


मै समझ गई की नीतू ने कौन सा जाल कल फेका था। क्यों वो पहली मुलाकात में ही उसे अपने यौवन के खुले दर्शन करवा गई थी। मुझे उसके अक्ल पर हसी और इस भोंदू के दिमाग पर गुस्सा सा आ गया। मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। कुछ ही देर में हमारी बोलेरो उसके घर के आगे खड़ी थी और गांव के लोग बोलेरो के दाएं बाएं ऐसे घेर खड़े थे कि, ये कौन आ गया।


एक मन तो हुआ कि इस भोंदू को ही नीचे जाने देती हूं, लोग जब घेर कर पूछेंगे की क्या काम है, तब पता चलेगा। मै यही सब सोच रही थी तभी नकुल कहने लगा… "मेनका जाओ ना अपनी दोस्त को ले आओ।"..


मै:- चल नीचे उतर, वरना लोग समझेंगे की तू ड्राइवर है।


हम दोनों साथ ही गाड़ी से नीचे उतरे, तभी एक बुढ़िया हमसे हमारा परिचय पूछ ली। उन्हें लगा सहर से कोई आया है। फिर जब हमने अपने परिवार का परिचय दिया तो लोग हमे घूरने लगे और आव भगत में लग गए। हम दोनों ने वहां मौजूद सबको मना करते हुए नीतू के घर में चले गए।


नीतू गांव के माध्यम वर्गीय परिवार से थी। पिताजी फौज में थे। घर में उसके दादा, दादी, मां, 2 छोटे भाई और वो घर की सबसे बड़ी लड़की। 6 कमरे का उनका पक्का के मकान और बड़ा सा आंगन था। आंगन में बैठकर उसकी मां और दादी खाना पका रही थी और नीतू अपने कमरे में तैयार हो रही थी।


उन लोगो ने भी हमारा परिचय पूछा। उन्हें हमने आने का कारन बता दिया। उसकी मां और दादी दोनो खुश हो गए। तांगे की सवारी में रोज कॉलेज जाना भी उनके लिए एक चिंता का विषय बना हुआ था, इसलिए हमारे साथ जाने से वो काफी ज्यादा खुश नजर आ रहे थे।


थोड़ी ही देर में नीतू को लेकर हमारी गाड़ी कॉलेज के ओर चल परी थी। मै नकुल के साथ आगे ही बैठी हुई थी और नीतू आराम से पीछे की सीट पर। गाड़ी जैसे ही थोड़ी दूर आगे बढ़ी, नकुल मिरर को थोड़ा सा एडजस्ट कर लिया। वो इतनी सफाई से यह काम किया की मै समझ नहीं पाई। मेरे ओर से उस मिरर से केवल साइड विंडो नजर आ रहा था, लेकिन मै साफ देख सकती थी कि नकुल का ध्यान बार-बार मिरर पर ही जा रहा था।


मैंने सोचा इसका ध्यान तो मिरर पर है, मै ही पीछे मुड़कर देख लेती हूं, चल क्या रहा है। मै जैसे ही मुड़ी, पूरी आवक रह गई। उसका दुपट्टा नीचे सीट पर रखा हुआ था। नीतू के कुर्ते के ऊपर 4 बटन लगे थे, जिसमे से 3 बटन खुले हुए थे। टाइट ब्रा से उभरती हुई उसकी चूची दिख रही थी और दोनो चूची के बीच की पूरी गहराई भी।


मै समझ नहीं पा रही थी कि वो तो लड़का है, ऐसे ही देखता रहेगा। लेकिन इस लड़की को क्या हुआ जो खुला निमंत्रण दे रही है। मै ये सब सोच ही रही थी कि तभी नीतू ने अपने क्लीवेज के बीच से एक चिंटा निकालकर नीचे फेकी और जल्दी से दो बटन लगाकर साइड से दुपट्टा ओढ़ लिया।


मै भी ना, खुद पर ही गुस्सा आ रहा था। इन्हीं सब उधेड़बुन में हम कॉलेज पहुंच गये। जैसे ही कॉलेज में मै पहुंची, नीतू मेरा हाथ खींचती हुई क्लास के किनारे ले गई… "वो मेरे कुर्ते में पता नहीं चिंटा कहां से आ गया, इसलिए मुझे मजबूरी में वो सब करना पड़ा। मुझे लगा नकुल का ध्यान सामने होगा लेकिन…."


"तुझे अक्ल नहीं की ऐसे मोमेंट पर किसी लड़के का ध्यान कहां होगा। वैसे मुझे आज इतनी सफाई क्यों दे रही है।"… मैं थोड़ा उखड़ी हुई आवाज में कहने लगी।


नीतू मेरी बात सुनकर गुमसुम हो गई और हम दोनों जाकर साथ बैठ गए। मेरी बात का शायद बुरा लगा होगा उसे। वो अगले तीन चार दिन तक ख़ामोश और लगभग गुमसुम ही रही। पांचवे दिन मैंने है अपनी चुप्पी तोड़ दी, और उसे घूरती हुई पूछने लगी… "क्या हुआ आज कल तेरे वायवाहर में ऐसा बदलाव क्यों।"..


फीकी सी मुस्कान अपने चेहरे पर लाती… "तू भी ना कुछ भी सोच लेती है। अच्छी हूं मै।"..


मैं:- उस दिन के उखड़े बर्ताव के लिए मुझे माफ़ कर दे। तू तो जानती है कि तू मेरे साथ रहती है, अब ऐसे में कोई अफवाह तेरे लिए उठे तो उसमें सीधा-सीधा मै भी लपेटे में आ जाऊंगी। फिर घर का माहौल ऐसा है कि तू भी पुरा दिन अपने घर में रहेगी और मै भी। जो भी बाहर निकलने का मौका मिलता है वो भी बंद।


नीतू:- मै बेवकूफ नहीं हूं मेनका, बस तू भोली है। कभी गांव कि गंदगी तूने देखी नहीं ना इसलिए ऐसा सोचती है। मै भुगत चुकी हूं इसलिए खुद को बचाए रखने का तरीका मैंने सीख लिया है।


मै:- तेरे कहने का क्या मतलब है नीतू।


नीतू:- कुछ बातें समझाने से समझ में नहीं आती, जब हालात से सामना होगा तो समझ जाओगी। वैसे एक बात मै बताऊं नकुल ने मुझे प्रेम पत्र दिया है।


मै, अपनी आखें बड़ी करती… "अभी तो उसके चेहरे पर रोएं ही आए है, ठीक से मूंछ भी नहीं उगी। दिखने में बच्चा लगता है, और तुम्हे प्रेम पत्र दे दिया। रुक इसकी खबर मै लेती हूं।


नीतू:- गांव की कोई भी लड़की या औरत, तुम्हे अपने प्रेम संबंधों के बारे में नहीं बताएगी, मैंने भरोसा किया है तुम पर मेनका।


उसकी बात सुनकर मेरा गुस्सा हवा हो गया। मै सोच में पर गई। कुछ देर मौन रहने के बाद… "अब क्या करेगी।"..


नीतू:- 4 लड़के की आवारागर्दी सहने से अच्छा है एक के साथ चली जाऊं, कम से कम उन 4 से तो बची रहूंगी।


मै:- क्या मतलब..


नीतू अपनी शरारती मुस्कान अपने होटों पर लाती… "कल तू खुद समझ जाएगी मेरी बातों का मतलब।"..


नीतू की बातें पहेली सी थी लेकिन अगले दिन मुझे सब कुछ साफ़ समझ में आ गया, कि वो क्या कहना चाह रही थी, और 4 दिन से किस दुविधा में थी। अगले दिन कॉलेज का माहौल काफी गरम था। नकुल और उसके साथ हमारे 20 लठैत, साथ में नकुल के 8-10 दोस्त, सब मोहन और राकेश, वहीं 2 लड़के जो हम पर अभद्र टिप्पणी किया करते थे और जिसकी बात पर नीतू, अपना मुंह छिपाकर खी खी कर दिया करती थी। उन्हें और उसके साथ उसके 2 और साथी उमाशंकर और प्रभात को भी दौरा-दौरा कर मार रहे थे।


थोड़े बहुत धुलाई के बाद चारो को मैदान के बीच में लाया गया। नकुल का गुस्सा अब भी कम नहीं हुआ था सायद, वो लगातार थप्पड़ मारे जा रहा था और उसे थप्पड़ मारते देख उसके दोस्त भी बाकियों पर हाथ साफ कर रहे थे। चारो को मैदान के बीच में लाकर बांध दिया गया।


प्रिंसिपल और अन्य लोग गांव के झगड़े में कभी अपना नाक नहीं घुसेड़ते थे। उन्हें पता था कि रहना यहीं है और इनसे बैर नही पाला जा सकता। अलबत्ता सभी कॉलेज स्टाफ मौजूद थे लेकिन सब चुप्पी साधे। लठैत ने हम दोनों के ओर इशारा करते हुए कहने लगा…
 
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पहली घटना… भाग 2






"बाबू साहब की बिटिया और उसकी सहेली को किसी ने चू शब्द भी बोला तो उस चूतिए को उसकी अम्मा के चूत में घुसा के ऐसा पेलेंगे, फिर कभी जवानी बाहर नहीं आएगी। सिकायात नकुल बिटवा ने कि थी इसलिए केवल वार्निग देकर छोड़ रहे है। सीकायत यदि बाबू साहेब की बिटिया मेनका ने कि होती, तो गायब कर देते। पढ़ने आए हो तो पढ़ाई करो, बाकी छिनरपन करोगे तो कूट देंगे मदरचोद, कान खोलकर सुन लेना।"..


त्रिभुवन काका पूरे गुस्से में उन लड़कों को वार्निग देकर वहां से निकल गए। नीतू की बात का मतलब मुझे आज समझ में आया था। उसकी बात जैसे ही समझ में आयी, मै हंसे बिना नहीं रह पाई। अंदर ही अंदर जैसे कुछ उमंग सा मच रहा हो और दिल से यही निकल रहा था… "मान गई तुझे नीतू। क्या दिमाग लगाया है।"..


कॉलेज से लौटकर जब मै घर पहुंची। मां, अपने दोनो पोते को लेकर मामा के घर जाने की तैयारी कर रही थी। शायद वहां भी कोई जमीनी मसला था इसलिए मां और पिताजी को जाना पर गया। मनीष भईया पहले से ही सहर गए हुए थे। सहर में हमारी कोठी का काम चल रहा था उसी को देखने। पापा ने वंशी चाचा और मुरली भईया को रात में बाहर बरामदे पर ही सोने और घर की देखभाल करने के लिए कह गए थे।


दोनो हमारे पुराने मुलाजिम थे जो खेत का पूरा काम देखते थे, हां लेकिन दोनो में से किसी को बिना बुलाए अंदर आने की इजाजत नहीं थी। इन लोगो के बैठने और मेरे पापा के गप्पे लड़ाने के लिए बाहर एक बड़ा सा बरामदा बाना हुआ था, जिसमे हमेशा 20-30 कुर्सियां। एक साफ सुथरा बिस्तर, और रात में लोगों के सोने के लिए एक्स्ट्रा चादर, गद्दे, तकिए और मच्छरदानी रखे हुए रहते थे।


इन सब बातो में एक बात अच्छी हो गई, पापा ने जाने से पहले मुझे भी एक मोबाइल देते हुए चले गए। मेरे कई दिनों की ख्वाइश थी कि मेरे पास भी एक मोबाइल हो, लेकिन दिल तब छोटा हो गया जब उन्होंने बटन वाला मोबाइल पकड़ा दिया, जबकि मुझे भी भाभी जैसा स्मार्ट फोन चाहिए था।


खैर, जो मिले उसी में संतुष्ट रहना चाहिए। मैं भी मन मार कर रह गई। अगले 4-5 दिनों तक मेरे कॉलेज की छुट्टी थी। आज बहुत दिनों बाद मै सुबह-सुबह मुस्कुराती हुई जागी। मन में बस यही ख्याल आ रहा था कि दिल जीत लिया नीतू। हालांकि इन सबसे ज्यादा मन में ये चल रहा था कि नीतू ने नकुल के प्रेम पत्र का क्या जवाब दिया होगा।


बिस्तर पर बैठकर यही सब मै सोच रही थी कि तभी… "आह्हःहहहहह.. भाआआआआ.. भीईईईईईईई" … मेरे चेहरे पर दर्द की सिकन पड़ चुकी थी और मै लगभग छटपटा सी गई। मै जब अपनी ख्यालों में खोई हुई थी, तब भाभी दबे पाऊं मेरे कमरे में कब आ गई पता ही नहीं चला। और आते ही उन्होंने मेरे छाती पर हाथ डालकर, छाती से थोड़ा सा उभरे मेरे स्तन के ऊपर, दोनो निप्पल को पकड़ कर पूरी ताकत से मरोर दी।


मेरी तो जान ही निकाल दी। मै गुस्से से उन्हें घूरने लगी, मेरी आखें हल्की पनिया गई थी और जी कर रहा था मै उनका मुंह नोच लू। अभी यदि हाथ में कोई चाकू होता तो खाचक-खाचक उनके पेट में घुसा देती। लेकिन कर भी क्या सकती हूं, वो बिल्कुल भारी-पूरी बदन कि 30 साल की औरत और मै कहां दुबली पतली सी 11th में पढ़ने वाली एक छोटी सी लड़की। भाभी के छाती के पीछे तो मै आधी ढक जाऊं।


कभी-कभी ना मै भाभी को देखती हूं, तो मन में बड़ी जिज्ञासा सी होती है कि काश मै भी थोड़ी और हेल्दी होती, तो इन्हे एक बार पटकने की कोशिश जरूर करती। मेरे सामने भाभी बैठे हुए हंस रही थी और मै रोनी सी सूरत लिए बस उन्हें घुरे जा रही थी।..


"क्या हुआ मेमनी (भाभी मेरे दुबले पतले शरीर को देखकर अक्सर मुझे मेमनी पुकारा करती थी, बकरी का छोटा बच्चा जो पैदा लेते ही फुदकते रहता है वहीं)"


भाभी की बात सुनकर मै गुस्से से चिढ़ती हुई कहने लग गई… "क्या मिलता है ऐसे ये सब करके, आपको रुलाने में मज़ा आता है ना।"..


भाभी:- पागल, तेरे यौवन को निखार रही हूं। चूची थोड़ी बड़ी दिखेगी तब ना तू और भी सुंदर दिखेगी। भगवान ने तुझे इतना प्यार चेहरा दिया, गोरा रंग है, पतली कमर है। बदन की पूरी बनावट पर बस तेरी ये समतल छाती तुझे मात दे देती है।


भाभी की बातें बहुत ही अजीब थी। हालांकि वो पहली बार ऐसी बातें नहीं कर रही थी, लेकिन वो जब भी मुझसे ऐसी बातें करती, मुझे बहुत ही बेकार लगता सुनने में। फिर कौन कीचड़ में ढेला फेके और खुद अपने ऊपर कीचड़ उछाले, इसलिए मै ही चुपचाप उठा गई और उसकी बातो पर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए अपने बाथरूम में घुस गई।


कुछ देर बाद जब नहाने के लिए मै बैठी, तब अपने कपड़े उतारकर, अपने छोटे छोटे स्तन को देखने लगी। भाभी ने इतना कसकर मरोरा था मेरे निप्पल को, की अब भी उनमें दर्द उठ रहा था। मै धीरे-धीरे अपने हाथ से उसे प्यार से सहलाने लगी। मेरे अपने हल्के हाथों से स्तन में उठ रहे दर्द को सहलाने लगी। दर्द से हल्की टीस भी उठ रही थी, जो हौले हथों से हाथ फेरने पर बड़ा सुख दे रही थी।


मै इतना आनंदित हो उठी की धीरे-धीरे मेरी श्वांस बिखरने लगी। तभी बाथरूम के दरवाजे पर भाभी खड़ी होकर चिल्लाने लगी… "ओ मेमनी, निकल बाहर और कितना नहाएगी।"..


मै खुद को किसी तरह सामान्य करती… "क्या है भाभी, अब नहाने भी नहीं दोगी क्या?"..


भाभी:- अरे तेरा नहाना नहीं हुआ तो दरवाजा खोल मै तुझे रगड़ रगड़ के नहला देती हूं।


मै:- पागल हो गई है आप। मां रहती है फिर तो आवाज़ नहीं निकलती और अभी मां नहीं है तो बेशर्मों की तरह कुछ भी बोल रही।


भाभी:- शादी के बाद तू भी मेरी जैसी ही हो जाएगी। जल्दी बाहर निकल हम मंदिर जा रहे है।


मै:- मंदिर ? लेकिन ऐसा तो कोई प्लान नहीं था।


भाभी:- अब क्या मंदिर जाने के लिए भी प्लान करना होता है।


मै:- ठीक है आप जाओ, मै थोड़ी देर से तैयार होकर आती हूं।


स्नान ध्यान करके मैंने अपने गीले बालों में बाहर आ गई और सीधा अपने देवता घर में घुस गई… "ये सब क्या है भाभी, आप नहाकर आज पूजा भी नहीं की है क्या? कल वाले फूल भगवान के सामने ऐसे ही है, और ये आज का फूल कहां है।"..


भाभी झटपट अपने कमरे से दौड़ती हुई अाई। थोड़ा सा अफ़सोस करती मुझसे उन्होने माफी मांगा, और फुल लाकर मुझे दे दी। पूजा समाप्त करके मै तैयार होने चल दी। तकरीबन 15 मिनट बाद जब मै तैयार होकर आयी, भाभी आंगन में ही मेरा इंतजार कर रही थी।


पूजा करने के कारन तब शायद मैंने ध्यान नहीं दिया था लेकिन अभी जब उन पर नजर गई, मै तो उन्हें देखती ही रह गई। बिल्कुल लाल जोड़े में किसी नई नवेली दुल्हन की तरह श्रृंगार की हुई थी भाभी। चेहरे का पानी और भड़े पूरे शरीर पर ये लाल जोड़ा काफी जच रहा था उन पर… "क्या बात है भाभी, आज तो बिल्कुल आपने रिकॉर्ड तोड रखा है। कहीं कोई भाई तो नहीं आने वाला, जिसे लुभाने के लिए इतना सज सवर कर निकल रही।".... ताने देते मैंने भाभी से कहा और हसने लगी


"अच्छा जी, इसका मतलब तू जब भी सुबह तैयार होती है, अपने भाई को दिखने के लिए तैयार होती है क्या?"… भाभी मुझे प्रति उत्तर में कहने लगी।


"पर मै तो कभी तैयार ही नहीं होती भाभी… हीहीहीही"… हंसते हुए मैंने उनके दोनो गाल कसके खींच लिए और आज सुबह का बदला भी ले लिया। भाभी "आव" करती हुई थोड़ा चीखी और फिर हसने लगी। घर के बाहर हमारी गाड़ी पहले से तैयार थी। मै और भाभी पीछे बैठ गई और वो दोनो आगे बैठे गाड़ी को मंदिर के ओर ले लिया।


घर से तकरीबन 9 किलोमीटर अंदर गांव के एक भाव्या सा मंदिर बना हुआ है, जिसकी सोभा सुंदर और सजावट काफी दूर-दूर तक मशहूर है। इस मंदिर को और भी सबसे ज्यादा खास बनता है यहां के पुजारी का बेटा। सांवला सुंदर बदन, कमल के समान उसके नयन, रूप ऐसा की मन मोह ले। मंदिर में जब भी उसे देखा गेरूवा रंग की धोती पहने, कांधे पर लाल गमछा, बदन पर जेनाव धारण किए, ललाट पर तिलक।


इतने आकर्षक रूप पर उसकी मधुर आवाज। सुबह की आराधना और शाम की आरती वहीं किया करते थे, जिसे एक बार सुन लो तो मन बिल्कुल शांत और चेहरा खिल जया करता था। मै जब 12 साल की थी तब यहां आयी हुई थी, मुझसे वो 1-2 साल ही बड़े होंगे। तब शायद घर में रहने की वजह से मुझमे इतनी समझदारी नहीं थी और उस वक़्त मेरे छोटे भईया की नई-नई शादी हुई थी।


पहले तो मै उनके रूप पर मोह गई फिर जब सुबह की आराधना और शाम की आरती सुनी तो पूरे परिवार के बीच, मै अपने पापा से कहने लगी… "पिताजी मुझे इनसे शादी करवा दो, ये मुझे बहुत पसंद है।" .. मेरी बात सुनकर सब हसने लगे। बहुत पुरानी बात ही गई, लेकिन जब भी मै उनके समक्ष होती हूं, लगता है अभी चंद मिनट पहले ही तो मैंने अपनी बात कही थी।


मै जब भी उनको देखती तो बस उन्हीं में खो जाती और जब भी उनकी नजर मुझ पर पड़ती तो मै हड़बड़ी में अपना नजर फेर लेती। हरी शंकर मिश्र सुनने में बड़ा प्यारा लगता था ये नाम। गाड़ी तेजी से आगे बढ़ रही थी, तभी भाभी मेरे कंधे को हिलाती हुई कहने लगी… "क्या हुआ, ससुराल जाने की खुशी है क्या?"..

मुस्कुरा तो मै पहले से रही थी, भाभी की बात सुनकर मै शर्मा गई और बिना कोई जवाब दिए सीसे के बाहर देखती हुई पूछने लगी… "भाभी ये अपने खेत है ना।"..


भाभी, उन खेतों को देखती… "मुरली भईया ये खेत अपने है ना।"..


मुरली:- हां भाभी जी..


मै:- मुरली भईया फिर यहां फसल क्यों नहीं लगाई है?


मुरली, थोड़ा चिढ़ते हुए… "अभी बच्ची हो, बरों जैसी बातें मत करो।"


भाभी:- जुबान संभाल कर मुरली, तुम्हे भईया कहते है इसका ये मतलब नहीं कि तुम बच्ची के साथ ऐसे चिढ़कर बात करो और उसे डांटो। कोई गलत सवाल नहीं की थी।


वंशी:- माफ कर दो इसे छोटी बहू, आज कल इसकी बहुरिया (पत्नी) नहीं है तो थोड़ा खिस्याया रहता है।


भाभी वंशी चाचा की बात पर थोड़ा सा हंस दी। फिर थोड़ा शांत लहजे में कहने लगी… "मुरली भईया आइंदा ध्यान रहे, मेनका ने आज तक कोई ऐसा काम नहीं किया है जिससे की किसी को उसपर चिल्लाना भी परा हो। दोबारा यदि मैंने चिढ़ते हुए तो क्या, इसके सवाल को मना करके या बात टालते हुए भी सुन लिया तो आप अपने घर रहिए, हम अपने घर खुश है। हिसाब किताब समेट कर बात खत्म करेंगे।


मुरली:- भाभी माफ कर दीजिए, मेनका तुम भी माफ कर दो। मै थोड़ा पारिवारिक उलझन में था इसलिए चिढ़ गया।


भाभी:- जी आप की सारी बातें जायज है लेकिन इसमें हमारी मेनका का कोई दोष तो नहीं। खैर आप बताइए उस खेत में फसल क्यों नहीं लगाई इस बार।


मुरली:- भाभी जी वहां पान और केले की खेती के लिए जमीन को प्रति छोड़ा गया है।


थोड़े से गहमा गहमी और बातों के दौरान हम मंदिर प्रांगण में दाखिल हो चुके थे। मैंने समय देखा और भागकर मंदिर में गई। सुबह की आराधना का वक़्त हो रहा था, और मै, फूल और बेलपत्र चढ़ने से लेकर धूप जलने तक की सारे शुरवाति चीजों को छोड़ना नहीं चाहती थी। मै भागकर गई और सबसे आगे जाकर खड़ी हो गई।


आह ! मंदिर से ताजा आते फूलों की खुशबू और वहां जलने वाले धूप दीप, मन को अति प्रसन्न कर रहे। यहां के इस मनमोहक माहौल में तभी हरी शंकर जी की मधुर वाणी सुनाई देने लगी। अच्छा हुआ आज दिखे नहीं, वरना मुझे फिर से आज कुछ कुछ होने लगता।


कंठ से जैसे स्वयं स्वरावती जी वाश रही हो। उनकी आराधना सुनकर वहां मौजूद हर कोई भाव विभोर हो उठा। मंदिर लगभग भरा हुआ था और वहां ऐसा एक भी नहीं था, जो आखें मूंदे हरी शंकर जी के मधुर रस वाणी में खोया हुआ ना हो। आराधना समाप्त हो चुकी थी और भक्त अपने प्रसाद लेकर जा रहे थे।


आराधना होने के बाद मैंने भी फुल अर्पण किया और प्रसाद लेकर जैसे ही जाने को हुई, पुजारी जी ने टोक दिय… "मेनका सुनो जरा बेटा।"..


मै:- जी बाबा…


पुजारी जी अपने पास रखा एक छोटा सा बैग मुझे देते… "इसे संभाल कर ले जाना और सिर्फ अपने पिताजी के हाथ में ही देना।"


मै:- बाबा, मेरे साथ भाभी, वंशी चाचा, और मुरली भईया आए है।


पुजारी:- तुम्हारे घर का एक नौकर तो मुझे दिखा था, मुझे लगा तुम उसी के साथ आयी होगी। लेकिन तुम्हारी भाभी और मुरली आया है, शायद देख नहीं पाया मै।


पुजारी जी की बातें थोड़ी हैरान करने वाली थी। वंशी चाचा यहां था, फिर मेरी भाभी और मुरली कहां गया। कहीं उस मुरली ने तो…. सुबह भाभी ने उसे डांट दिया था, और धमकाया था सो अलग… मेरे चेहरे पर हल्का खिंचाव आने लगा, जिसे पुजारी जी भांपते हुए पूछने लगे…. "क्या हुआ बेटा।"..


मै:- कुछ नहीं बाबा बस आपकी बातो को सोच रही थी। केवल पापा को देना है तो मै भाभी और बाकियों से क्या कहूंगी।


पुजारी जी:- ये लो हो गया काम। इसमें मैंने रामचरित्र मानस, भगवता गीता, विष्णु पुराण, और ऐसे ही 4-5 पुस्तकें डाल दी है, कोई पूछे तो कहना बाबा से मांगे थे किताब और उन्होंने दिए है। हां, लेकिन किताब को पूजा घर या किसी सुद्घ स्थान पर रखना… तुम बच्चे लोग अपने ऊपर तो पुरा ध्यान देते हो, लेकिन ये सब छोटी-छोटी बातें भुल जाते हो।


मै:- मै बिल्कुल नहीं भूलूंगी, आप निश्चित रहिए और ये झोला केवल पापा के हाथ में जाएगी, मै अपनी मां को भी नहीं दे सकती, और कोई बात बाबा।


पुजारी जी हंसते हुए मुझे आशीर्वाद दिए और मै भागकर नीचे मंदिर में प्रांगण में आ गई। मै अपने सैंडिल भी पहन रही थी और चिंता से चारो ओर नजर भी दौड़ा रही थी। मेरी चिंता मेरे चेहरे से साफ पढ़ी जा सकती थी।


मुरली था तो एक नंबर का दबंग, जिसका सिक्का कई टोलों पर चलता था। अगर रास्ते की बात का गुस्से में उसने कहीं भाभी के साथ कुछ उल्टा सीधा कर दिया तो यहां बस इज्जत देखी जाती है। चुपचाप भाभी और मुरली का कत्ल करवा देते और उसे ऐक्सिडेंट का शक्ल दे देते। ताकि दिल की आग भी शांत हो जाए और इज्जत भी बच जाए।


इन्हीं सब उधेड़बुन में मै अपने सैंडल पहनकर एक बार और चारो ओर देख ली, लेकिन भाभी का कहीं कोई पता नहीं था। गाड़ी के पास मुझे दूर से ही वंशी चाचा दिख रहे थे, जो बाहर खड़े थे। दिमाग में हजार धारणाएं बनने लगी थी और घबराहट के कारन मेरे पाऊं थोड़े-थोड़े कांप रहे थे।


मै रोना चाह रही थी, चींख-चींख कर भाभी पुकारना चाह रही थी, लेकिन मै ऐसा कर नहीं सकती थी। किसी तरह हिम्मत करके मै बांस वाले जंगल के ओर चल दी, जहां लगभग कोई नहीं जाता। मन में हजार सवाल और मै चारो ओर देखते धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी….
 
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Naina

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1. प्रारंभिक जीवन





जिसकी हाथ कि सफाई पकड़ी गई वो चोर और जो बच गया वो कलाकार। शायद हर जगह की बस यही कहानी चल रही है। जिंदगी की शुरवात दौड़ की कहानी शुरू करने से पहले मै अपना परिचय दे दूं। जब मै पैदा हुई तब मेरे मामा ने मेरा नाम मेनका रख दिया।


हां आप सही सोच रहे है, इतिहास में मेनका का अहम स्थान है, जिसने अपने रूप और कौमार्य से विश्वमित्रा की तप को भंग किया था और दोनो के मिलन से जो बच्चा पैदा हुआ उसने तत्काल आर्यावर्त साम्राज्य का गठन किया था। लेकिन मेरा नाम इन तथ्यों को ध्यान में रखकर नहीं रखा गया था, बल्कि मेरे सबसे बड़े वाले भईया का नाम महेश और उससे छोटे वाले भईया का नाम मनीष था, इसलिए मेरा नाम "म" अक्षर से रख दिया गया। महेश, मनीष और मेनका।


मै भी एक मेनका ही थी। रूपवान, गुणवान, 2 भाइयों की इकलौती बहन और अपने घर की सबसे नटखट सदस्य। मेरे पैदा होने के 10 साल बाद मेरे सबसे बड़े भाई महेश की शादी हो गई।


मेरी बड़ी भाभी सोभा जबसे ब्याह कर आयी, घर में गृह क्लेश शुरू हो गया। देखने में तो काफी खूबसूरत थी, शायद इसी बात का घमंड था और चेहरे पर कभी हंसी नहीं रही। दूर से ही देखकर कोई भी उसे चंठ समझ ले।


खैर धीरे-धीरे हम सब भी उसकी आदतों में रम गए। जब तक घर में उसकी किट-किट ना शुरू हो, तबतक ऐसा लगता था कि आज दिन शुरू ही नहीं हुआ। जब वो मायके जाती थी, तो ऐसा लगता था घर में केवल चिड़िया ही चहक रहे है और किसी इंसान की आवाज ही नहीं आ रही।


उसके 2 सालो बाद मेरे मनीष भईया की भी शादी हो गई। रूपा भाभी जब शुरू-शुरू घर में आयी थी, तब वो काफी अच्छी थी। संस्कारी और आज्ञाकारी बहू की परिभाषा। लेकिन कहते है ना खरबूज को देखकर खरबूज अपना रंग बदल लेता है, वहीं किस्सा मेरे घर में भी हो गया।


फिर तो देवरानी और जेठानी का रिश्ता ने ऐसा रंग जमाया की पूरे गांव वाले आए दिन तमाशा देखा करते थे। भिड़ कान लगाए दोनो के द्वंद को सुनती और मेरे पिताजी अनूप मिश्रा के बहुओं की चर्चा पूरे गांव का हॉट टॉपिक बनकर रह जाता।


जब दोनो भाइयों में झगड़े बढ़ने लगे तब पिताजी ने खेत और पैसे देकर बड़े भईया को घर के लिए नहर के पास वाली जमीन दे दिया, और हम सब छोटे भईया के साथ यहीं अपने पहले के मकान में रहने लगे। लेकिन वो कहते है ना विवाद जब किसी स्त्री का लगाया हो तो कभी थमता ही नहीं।


मेरी भाभी सोभा अक्सर मेरे बड़े भैया महेश को उकसाया करती थे और वो आकर यहां कभी-कभी पिताजी और छोटे भईया से जमीन के लिए झगड़ा किया करते थे। मेरे पिताजी एक सुलझे हुए व्यक्ति थे। ना जाने कितने लोगो ने उनकी सलाह से अपनी जिंदगी सवार ली, लेकिन पिताजी खुद के ही चिरागों को समझा नहीं पाए।


जब बंटवारा हो रहा था तब उन्होंने जमीन के 4 हिस्से कर दिया था। सबसे बड़ा भू भाग मिला था मेरे छोटे भैया को। तकरीबन 40 एकड़ जमीन और 8 आम के बगीचे। वो इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने घर की जिम्मेदारी उठाई थी। वहीं मेरे बड़े भैया को 30 एकड़ जमीन और 8 बगीचे उन्हें भी मिले थे।


5 एकड़ की जमीन पिताजी ने खुद अपने पास रखा था और हाईवे से लगा हुआ 10 एकड़ की जमीन मेरे शादी के लिए अलग कर लिया था। शादी के वक़्त जो भाई खर्च उठाएगा, उसे वो जमीन मिलेगी। वरना वो जमीन बेचकर मेरी शादी की जानी थी। बस इसी बात को लेकर महीने, 2 महीने में विवाद हो जाया करता था।


खैर ये सब कहानी घर-घर की चलती ही रहती है, लेकिन इन सब में मेरी कहानी भी आगे बढ़ रही थी। पारिवारिक क्लेश को मुझसे लगभग दूर ही रखा जाता था और घर में एक बेटी हो ऐसी सभी की वर्षों कि ख्वाहिश थी, इसलिए मुझे लाड़-प्यार भी सबसे उतना ही मिलता रहा।


लेकिन उफ्फ ये बंदिशे, भाभी के भाइयों से हंसकर बात करने पर भाव्हें तन जाती थी। अकेले अपने सड़क के मोड़ के आगे गई तो सवाल खड़े हो जाया करते थे। एक स्कूल था तो वहां भी मेरे साथ गांव के कई चचरे भाई हुआ करते थे, जिनके रहते किसी कि हिम्मत नहीं होती मुझसे बात करने की।


कुल मिलाकर जो भी हंसना खेलना और बोलना है, वो अपने परिवार के बीच ही। धीरे-धीरे उम्र भी बढ़ने लगी और दुनियादारी की कुछ-कुछ बातो का अल्प ज्ञान भी शुरू होने लगा। वैसे तो मै ज्यादातर अपने कमरे के बाहर तक नहीं निकलती थी, लेकिन कभी- जब मेरी रातों की नींद खुलती और मै पानी पीने के लिए अंधेरे में किचेन के ओर जाती, तो कभी-कभी मुझे चूड़ियों के जोड़-जोड़ से खन-खन कि आवाज़ आया करती थी।


मै डर के मारे वापस अपने बिस्तर में घुस जाती और सुबह जब मै ये बात अपनी भाभी को बताती की हमारे घर में चुड़ैल है और उसके चूड़ियों के खनकने की आवाज मैंने अपने कानो से सुनी, तो वो जोड़-जोड़ से हसने लगती थी।


खैर जिंदगी मासूमियत में कट रही, थी जिसमे बहुत से बातो का तो मुझे ज्ञान भी नहीं था। दसवीं की परीक्षा हो गई थी और आगे कि पढ़ाई के लिए हमे हमे गांव से 8-10 किलोमीटर दूर, एक छोटे से बाजार के पास जाना था। मै बहुत खुश थी क्योंकि मेरे सारे बॉडीगार्ड भाई, सहर पढ़ने निकल गए थे। केवल नकुल बचा था जो मेरे थर्ड कजिन का बेटा था और रिश्ते में मेरा भतीजा लगाता, पर हम दोनों एक ही उम्र के थे।


गांव में अक्सर ऐसा उम्र का गैप हो जाते है,, जो 3-4 पीढ़ी नीचे आने के बाद चाचा-भतीजे के उम्र एक समान होती है। अब मुझे ही देख लीजिए, मै अपने बड़े भाई से 12 साल की छोटी हूं और दूसरे भाई से 8 साल की।


मेरे बड़े भाई के बच्चे जब तक जवान होंगे तबतक मेरा बच्चा मेरे गोद में होगा। और मेरे भाई के पोते पोती और मेरे बच्चे की उम्र में बहुत ज्यादा होगा तो 5 साल का अंतर। सहर की बात अलग होती है, जहां 2 जेनरेशन बाद तो किसी को पता भी नहीं होता कि कौन किसके रिश्ते में क्या लगता है और चौथा जेनरेशन आने तक तो शायद आपस मै शादियां भी हो जाएं। लेकिन गांव की बात अलग होती है। पीढ़ी दर पीढ़ी सब एक ही जगह रह जाते है।


खैर हमे कॉलेज के लिए घर से 6-7 किलोमीटर दूर जाना था। मै और नकुल दोनो तैयार थे कॉलेज जाने के लिए, वो घर में आते ही चिल्लाने लगा.. "मेनका दीदी, जल्दी करो।".. हालांकि बाहर वो मुझे दीदी नहीं कहता था लेकिन यदि सबके सामने मुझे दीदी ना कहे तो उसे जूते परते।


आज मै नकुल के साथ अपने नए कॉलेज में जा रही थी, एक नई जिंदगी की शुरवात करने। गांव के पास का कॉलेज था तो लगभग हर कोई हमारे परिवार के लोगों को जनता था। ऐसा हो भी क्यों ना, आखिर कॉलेज के पास की सारी जमीन हमारी ही फरिक (फरिक यही पीढ़ियों में अलग हुए किसी ना किसी परिवार की) की थी, जिसे किसी ने आज तक बेचा नहीं था।


कॉलेज का पहला दिन और मै पहली बार गंदी नजरो का सामना कर रही थी। आज तक कभी ऐसे माहौल में नहीं रही और ना ही कभी घर के बाहर अकेली गई, इसलिए नजरो का ऐसा घिनौनापन कभी मुझे नजर ही नहीं आया। मेरी नजरो से बस 1, 2 नजरे टकराई और मै नकुल का हाथ जोड़ से पकड़ कर नीचे जमीन में देखकर चलने लगी।


नकुल को भी आस-पास के माहौल का इल्म था, इसलिए वो भी चुप चाप मेरे साथ चल रहा था। हम दोनों क्लास का पता करने के लिए ऑफिस आ गए। वहां का किरानी, चपरासी और ऑफिस में कई क्रमचारी हमे पहचानते थे। त्योहार में हमारे घर कई बार तो कुछ लोग आ भी चुके थे। उसी में से एक चपरासी थे मुन्ना काका, जो पिछला टोला में रहते थे।


मुन्ना काका हमे देखकर खुश होते हुए कहने लगे… "बाबू साहब का फोन आ गया था। मेनका बिटिया तुम्हारा क्लास उधर बाएं ओर से है, तुम रुको यही मेरे साथ चलना। नकुल बिटवा तुम्हारा विज्ञान कि सखा उधर दाएं ओर है। तुम उधर चले तो जाओगे ना।"


नकुल "हां" में सर हिलाते हुए कहने लगा… "मुन्ना काका इसके क्लास के लड़को को अच्छे से समझा देना, वरना हम जब समझाने पर आएंगे तब क्लास में केवल लड़कियां ही बचेगी।"


मुन्ना:- हा हम समझा देंगे आप चिंता मत करो, इसलिए तो मेनका बिटिया को अपने साथ लिए जा रहे है।


इन सब बातो में मेरी कोई प्रतिक्रिया नहीं थी, मै तो बस केवल जमीन को ताक रही थी। एक बड़े से लंबे धमकी के बाद मुन्ना मेरे क्लास से चला गया और मै एक बेंच पर बैठ गई। मेरे पड़ोस वाली लड़की मुझे घूरती हुई पूछने लगी… "ऐ तेरे पापा जमींदार है क्या, जो ये इतना बोलकर गया।"


मै बस हां में अपना सर हिला दी। वो मेरे ओर हंस कर देखती हुई कहने लगी, "तेरे जवानी पर तो ताला लग गया है।"… कुछ अजीब सी बातें थी, जिसे सुनकर मै उसे सवालिया नजरो से देखने लगी।


वो मुझे देखकर हंसती हुई कहने लगी… "मेरा नाम नीतू है, और तुम्हारा नाम।"..


"मेनका".. धीमे से मैंने बोल दिया.. वो फिर से पूछने लगी। इस बार थोड़ी ऊंची आवाज में मैंने अपना नाम बता दिया। चलती क्लास के बीच धीमे-धीमे पता नही वो कैसी-कैसी बातें कर रही थी। नीतू की बातें सुनने में मुझे काफी अजीब लग रही थी और पहली क्लास के बाद ही मैंने तय किया कि इसके पास नहीं बैठना।


मैं सोच तो ली लेकिन डर ये भी था कि कहीं इसके जैसे सब हो गए तो। मै बस इसी उधेड़बुन में थी कि दूसरी क्लास शुरू हो गई और धीमे-धीमे उसकी बातें भी। मै बिना कोई प्रतिक्रिया दिए बस "हां हूं" कर रही थी और सोच रही थी… "इससे कहीं बेहतर तो मेरे स्कूल का माहौल था। सब भाई बहन के बीच कम से कम खुलकर हंस बोल सकती थी। यहां तो लग रहा था कि अनजानों के बीच मेरे मुंह पर ताला ही लग गया है।"
matlab bhabhiya ek number ki kamini, lalchi, chuglibaaz kahi ki... aur unki haan mein haan milaye unke chutiye pati :D
waise vibad hone diya hi kyun menka ne chaaro ko maar daalti... kissa hi khatam kar deni thi jahar deke khane mein... koun yeh roz roz ki jameen ko leke vaad vibaad mein dimag kharab kare :D.. phir toh jameen bhi uski, aur jaydaad bhi uski... bas ek chatra raaj karti bilkul raaniyo ki tarah :D
hmm....... toh college mein..... rukiye zara... wait minute... haan toh phir se masoom menka (saachi) fanshi bold nd chaalu nitu (imli) ki chungul mein...
Akhir kab aise hi masoomo ki bhet chadhti rahegi... akhir kab tak :protest:
Khair let's see what happens next
Brilliant update with awesome writing skill :yourock: :yourock:
 

Naina

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घटनाओं का जाल… गांव और कॉलेज

पहली घटना…. भाग 1




अच्छा या बुरा कॉलेज में अब दिन कटने लगे थे। मेरी किस्मत में शायद नीतू का ही साथ लिखा था, मै जितना पीछा छुड़ाने की कोशिश की, वो उतने ही मेरे गले से बांधती चली गई। हार कर मैंने भी मान लिया कि मेरी किस्मत में यही एक सहेली है।


बेवाक अंदाज और अपने अदाओं से हर वक़्त लड़को को टीज किया करती थी। जीन्स टॉप का कल्चर नहीं था, इसलिए लगभग सभी लड़कियां सलवार कुर्ता पहन ही आया करती थी। लेकिन नीतू के कपड़े पहनने का अंदाज ही अपना था। एक तो उसकी छातियां उम्र से ज्यादा बड़ी थी, लगभग 32 की होगी, जिसपर हर लड़के की नजर लगभग टिकी रहती थी। चेहरा भी उसका कम आकर्षक नहीं था और यही वजह था की वो क्लास के अंदर सबसे मशहूर लड़की थी।


उसके साथ होने का खामियाजा अक्सर मुझे ही भुगतना पड़ता था।। जब भी किसी मनचलों के पास से गुजर जाओ, उनके अभद्र टिप्पणियां ही सुनने को मिलता था। उसपर तो कमेंट करते ही थे, साथ में जो मुझे नहीं जानते थे, कभी-कभी मुझे भी लपेट लिया करते थे।


नीतू भी किसी से कम नहीं थी। लड़को को टीज करने के लिए वो बड़े गले का कुर्ता पहनकर आती थी जिसमे उसका सीने कि गहराई का माप कर कोई लिया करता था। लगभग महीना दिन बीतने के बाद, अब यहां की बातें लगभग सामान्य हो चुकी थी। पहले बहुत सी चीजें नहीं समझ में आती थी, लेकिन अब बहुत सी बातें साफ हो गई थी।


खैर कॉलेज के रूटीन में थोड़ी बहुत फेर बदल होने के कारन मेरा तो भला हो चुका था। पहले जहां मेरे और नकुल के अलग-अलग वक़्त पर खाली पीरियड्स होते थे, वहीं अब एक साथ होने लगे थे। मै बहुत खुश थी। खाली पीरियड्स होते ही मै नकुल के पास जाने लगी, तभी पीछे से नीतू भी आ गई… "क्यूं मेनका आज भतीजा फ्री है, तो दोस्त को भुल गई।"..


मै, बुझे मन से मुस्कुराती हुई… "नहीं नीतू ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे लगा तुम्हारा परिचय मै किसी अनजान लड़के से कैसे करवाऊं, इसलिए मै अकेली ही चली आयी।"..


नीतू झटक कर मेरे साथ आती… "तू चिंता मत कर एक बार परिचय हो जाए उसके बाद अनजान नहीं रहेंगे।"..


मै, उसकी बात पर मुस्कुराकर फीकी प्रतिक्रिया देने लगी और दोनो साथ चल रहे थे… "हाय रे मोहन इसके आम तो आज कहर ढा रहे है, दिल कर रहा है दोनो हाथ से दबा दबा कर चूस लूं।"… "मुझे तो वो टिकोला ही मस्त लगती है, अपनी मेहनत से पुरा आम बनाकर चुसुंगा।"..


दोनो कमिने की फिर से वहीं फुहर कमेंट। मै गुस्से में झटक कर तेजी से चलने लगी और नीतू के मुंह से फिर से वही धीमी "हिहिहिहि" की आवाज। उसका मुंह छिपाकर दबी से आवाज़ में हंसना, एक बार फिर मुझे गुस्सा दिला गई। मै कुछ नीतू को रखकर सुनाती, उससे पहले ही सामने से 10 कदम पर नकुल कुछ लड़को के साथ खड़ा था।


मैंने अपने चेहरे के भाव ठीक किए और उसके पास पहुंच गई। नकुल के सभी दोस्त मुझे जानते थे इसलिए मेरे वहां पहुंचते ही सबने "क्लास में मिलते है।".. ऐसा कहकर चले गए।… "किसी खास विषय पर डिस्कशन कर रहे थे क्या नकुल।".. मैंने आते ही पूछा।


"नहीं, बस ऐसे ही खड़े होकर बात कर रहे थे।"… नकुल ने मुझे जवाब देते हुए कहा लेकिन उसकी नजरें तो कहीं और थी। मुझे समझते देर नहीं लगी कि ये भी एक लड़का ही है। मुझे एक छोटी सी शरारत सूझी। नकुल को घूरती हुई मै पूछने लगी… "मै यहां खड़ी हूं, तू कहां देख रहा है। भाभी (नकुल की मां) से तुम्हारी शिकायत करनी होगी मुझे।"


ऐसा लगा जैसे मैंने किसी भवरे को फूल पर मंडराने से रोक दिया हो। उसका ध्यान टूटा और वो हड़बड़ा कर… "मां से क्या शिकायत करोगी।"..



नीतू:- यही की कैसे मेनका ने एक लड़की को नजरंदाज करके पीछे पुतले की तरह खड़ा कर दिया।


"ओह सॉरी, मै तो भुल ही गई। नकुल ये है मेरी दोस्त मेनका। मेनका ये है नकुल।"… नीतू की बात से याद आया कि इसका परिचय करवाना तो भुल ही गई। वैसे नीतू इसी के वजह से ही तो पता चला कि नकुल भी एक लड़का है। मै अंदर ही अंदर हंसी और जबतक अपनी बातो में खोई थी, यहां इन दोनों की मुस्कुराकर बातें भी शुरू हो गई।


मै समझ चुकी थी कि कच्ची उम्र के आकर्षण का खेल शुरू हो चुका था। वैसे भी नीतू भले ही कितने लड़को को टीज क्यों ना कर ले, ये बात वो भी अच्छे से जानती थी कि किसी अनजान लड़के से बात करके उसे भाव देने का मतलब होगा पूरे कॉलेज के चर्चा का विषय होना। इसलिए आज जब टीज करने के साथ साथ सेफली बात करने का मौका मिल रहा था तो नीतू उसका लाभ अपने दोनों हाथ से उठा रही थी।


उस वक़्त तो ऐसा लगा जैसे मै ही इन दोनों से अनजान हूं। तभी मैंने नीतू की वो अदा भी देखी जिससे नकुल पुरा सिहर सा गया। नकुल की नजर उसके खुली हुई कुर्ती के बटन पर थी, ये हम दोनों को पता था। तभी नीतू ने अनजान बनते हुए एक छोटी से अंगड़ाई लेकर आना पुरा सिना खोल दी, और दबी आखों से नकुल को देखने लगी।


नकुल इस प्रकार से घुर रहा था मानो आखों से ही नीतू के कपड़े फाड़कर उसके गोल सुडौल बिल्कुल नए विकसित हुए चूची को नंगा देखना चाह रहा हो। लेकिन उसे शायद ध्यान आया हो की मै भी यहीं खड़ी हूं, इसलिए अपनी हरकतों पर वो विराम लगाते हुए सीधा खड़ा हो गया।


थोड़ी देर तक हम… नही, वो दोनो बातें करते रहे और मै तमाशा देखती रही। अगली सुबह तो और भी ज्यादा झटका लगा मुझे। हमारा घर से करीब 4 किलोमीटर पीछे जाने के लिए हमारी बोलेरो चल रही थी… "नकुल गाड़ी पीछे क्यों ले रहा है। हमे कॉलेज जाना है।"..


नकुल:- मेनका तुमने बताया नहीं कभी की तुम्हारी सहेली नीतू 2 किलोमीटर पैदल चलकर गांव के चौपाल पर आती है, और वहां से तांगे में रोज कॉलेज जाती है।


मै समझ गई की नीतू ने कौन सा जाल कल फेका था। क्यों वो पहली मुलाकात में ही उसे अपने यौवन के खुले दर्शन करवा गई थी। मुझे उसके अक्ल पर हसी और इस भोंदू के दिमाग पर गुस्सा सा आ गया। मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। कुछ ही देर में हमारी बोलेरो उसके घर के आगे खड़ी थी और गांव के लोग बोलेरो के दाएं बाएं ऐसे घेर खड़े थे कि, ये कौन आ गया।


एक मन तो हुआ कि इस भोंदू को ही नीचे जाने देती हूं, लोग जब घेर कर पूछेंगे की क्या काम है, तब पता चलेगा। मै यही सब सोच रही थी तभी नकुल कहने लगा… "मेनका जाओ ना अपनी दोस्त को ले आओ।"..


मै:- चल नीचे उतर, वरना लोग समझेंगे की तू ड्राइवर है।


हम दोनों साथ ही गाड़ी से नीचे उतरे, तभी एक बुढ़िया हमसे हमारा परिचय पूछ ली। उन्हें लगा सहर से कोई आया है। फिर जब हमने अपने परिवार का परिचय दिया तो लोग हमे घूरने लगे और आव भगत में लग गए। हम दोनों ने वहां मौजूद सबको मना करते हुए नीतू के घर में चले गए।


नीतू गांव के माध्यम वर्गीय परिवार से थी। पिताजी फौज में थे। घर में उसके दादा, दादी, मां, 2 छोटे भाई और वो घर की सबसे बड़ी लड़की। 6 कमरे का उनका पक्का के मकान और बड़ा सा आंगन था। आंगन में बैठकर उसकी मां और दादी खाना पका रही थी और नीतू अपने कमरे में तैयार हो रही थी।


उन लोगो ने भी हमारा परिचय पूछा। उन्हें हमने आने का कारन बता दिया। उसकी मां और दादी दोनो खुश हो गए। तांगे की सवारी में रोज कॉलेज जाना भी उनके लिए एक चिंता का विषय बना हुआ था, इसलिए हमारे साथ जाने से वो काफी ज्यादा खुश नजर आ रहे थे।


थोड़ी ही देर में नीतू को लेकर हमारी गाड़ी कॉलेज के ओर चल परी थी। मै नकुल के साथ आगे ही बैठी हुई थी और नीतू आराम से पीछे की सीट पर। गाड़ी जैसे ही थोड़ी दूर आगे बढ़ी, नकुल मिरर को थोड़ा सा एडजस्ट कर लिया। वो इतनी सफाई से यह काम किया की मै समझ नहीं पाई। मेरे ओर से उस मिरर से केवल साइड विंडो नजर आ रहा था, लेकिन मै साफ देख सकती थी कि नकुल का ध्यान बार-बार मिरर पर ही जा रहा था।


मैंने सोचा इसका ध्यान तो मिरर पर है, मै ही पीछे मुड़कर देख लेती हूं, चल क्या रहा है। मै जैसे ही मुड़ी, पूरी आवक रह गई। उसका दुपट्टा नीचे सीट पर रखा हुआ था। नीतू के कुर्ते के ऊपर 4 बटन लगे थे, जिसमे से 3 बटन खुले हुए थे। टाइट ब्रा से उभरती हुई उसकी चूची दिख रही थी और दोनो चूची के बीच की पूरी गहराई भी।


मै समझ नहीं पा रही थी कि वो तो लड़का है, ऐसे ही देखता रहेगा। लेकिन इस लड़की को क्या हुआ जो खुला निमंत्रण दे रही है। मै ये सब सोच ही रही थी कि तभी नीतू ने अपने क्लीवेज के बीच से एक चिंटा निकालकर नीचे फेकी और जल्दी से दो बटन लगाकर साइड से दुपट्टा ओढ़ लिया।


मै भी ना, खुद पर ही गुस्सा आ रहा था। इन्हीं सब उधेड़बुन में हम कॉलेज पहुंच गये। जैसे ही कॉलेज में मै पहुंची, नीतू मेरा हाथ खींचती हुई क्लास के किनारे ले गई… "वो मेरे कुर्ते में पता नहीं चिंटा कहां से आ गया, इसलिए मुझे मजबूरी में वो सब करना पड़ा। मुझे लगा नकुल का ध्यान सामने होगा लेकिन…."


"तुझे अक्ल नहीं की ऐसे मोमेंट पर किसी लड़के का ध्यान कहां होगा। वैसे मुझे आज इतनी सफाई क्यों दे रही है।"… मैं थोड़ा उखड़ी हुई आवाज में कहने लगी।


नीतू मेरी बात सुनकर गुमसुम हो गई और हम दोनों जाकर साथ बैठ गए। मेरी बात का शायद बुरा लगा होगा उसे। वो अगले तीन चार दिन तक ख़ामोश और लगभग गुमसुम ही रही। पांचवे दिन मैंने है अपनी चुप्पी तोड़ दी, और उसे घूरती हुई पूछने लगी… "क्या हुआ आज कल तेरे वायवाहर में ऐसा बदलाव क्यों।"..


फीकी सी मुस्कान अपने चेहरे पर लाती… "तू भी ना कुछ भी सोच लेती है। अच्छी हूं मै।"..


मैं:- उस दिन के उखड़े बर्ताव के लिए मुझे माफ़ कर दे। तू तो जानती है कि तू मेरे साथ रहती है, अब ऐसे में कोई अफवाह तेरे लिए उठे तो उसमें सीधा-सीधा मै भी लपेटे में आ जाऊंगी। फिर घर का माहौल ऐसा है कि तू भी पुरा दिन अपने घर में रहेगी और मै भी। जो भी बाहर निकलने का मौका मिलता है वो भी बंद।


नीतू:- मै बेवकूफ नहीं हूं मेनका, बस तू भोली है। कभी गांव कि गंदगी तूने देखी नहीं ना इसलिए ऐसा सोचती है। मै भुगत चुकी हूं इसलिए खुद को बचाए रखने का तरीका मैंने सीख लिया है।


मै:- तेरे कहने का क्या मतलब है नीतू।


नीतू:- कुछ बातें समझाने से समझ में नहीं आती, जब हालात से सामना होगा तो समझ जाओगी। वैसे एक बात मै बताऊं नकुल ने मुझे प्रेम पत्र दिया है।


मै, अपनी आखें बड़ी करती… "अभी तो उसके चेहरे पर रोएं ही आए है, ठीक से मूंछ भी नहीं उगी। दिखने में बच्चा लगता है, और तुम्हे प्रेम पत्र दे दिया। रुक इसकी खबर मै लेती हूं।


नीतू:- गांव की कोई भी लड़की या औरत, तुम्हे अपने प्रेम संबंधों के बारे में नहीं बताएगी, मैंने भरोसा किया है तुम पर मेनका।


उसकी बात सुनकर मेरा गुस्सा हवा हो गया। मै सोच में पर गई। कुछ देर मौन रहने के बाद… "अब क्या करेगी।"..


नीतू:- 4 लड़के की आवारागर्दी सहने से अच्छा है एक के साथ चली जाऊं, कम से कम उन 4 से तो बची रहूंगी।


मै:- क्या मतलब..


नीतू अपनी शरारती मुस्कान अपने होटों पर लाती… "कल तू खुद समझ जाएगी मेरी बातों का मतलब।"..


नीतू की बातें पहेली सी थी लेकिन अगले दिन मुझे सब कुछ साफ़ समझ में आ गया, कि वो क्या कहना चाह रही थी, और 4 दिन से किस दुविधा में थी। अगले दिन कॉलेज का माहौल काफी गरम था। नकुल और उसके साथ हमारे 20 लठैत, साथ में नकुल के 8-10 दोस्त, सब मोहन और राकेश, वहीं 2 लड़के जो हम पर अभद्र टिप्पणी किया करते थे और जिसकी बात पर नीतू, अपना मुंह छिपाकर खी खी कर दिया करती थी। उन्हें और उसके साथ उसके 2 और साथी उमाशंकर और प्रभात को भी दौरा-दौरा कर मार रहे थे।


थोड़े बहुत धुलाई के बाद चारो को मैदान के बीच में लाया गया। नकुल का गुस्सा अब भी कम नहीं हुआ था सायद, वो लगातार थप्पड़ मारे जा रहा था और उसे थप्पड़ मारते देख उसके दोस्त भी बाकियों पर हाथ साफ कर रहे थे। चारो को मैदान के बीच में लाकर बांध दिया गया।


प्रिंसिपल और अन्य लोग गांव के झगड़े में कभी अपना नाक नहीं घुसेड़ते थे। उन्हें पता था कि रहना यहीं है और इनसे बैर नही पाला जा सकता। अलबत्ता सभी कॉलेज स्टाफ मौजूद थे लेकिन सब चुप्पी साधे। लठैत ने हम दोनों के ओर इशारा करते हुए कहने लगा…
Oh teri nitu toh sahi khel gayi... ek taraf jameedaar ki beti se pakki dosti upor se unke hi Khandaan ke bete ko pata liya.... ishe kahte hai perfect planning..
Alexa ju kya kahti ho..
Alexa :- Stfu naina... akeli ladki hai.. khud ko safe rakhne ke liye kar rahi hai.:slap:
Khair let's see what happens next
Brilliant update with awesome writing skill nainu ji :yourock: :yourock:
 

Naina

Nain11ster creation... a monter in me
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पहली घटना… भाग 2






"बाबू साहब की बिटिया और उसकी सहेली को किसी ने चू शब्द भी बोला तो उस चूतिए को उसकी अम्मा के चूत में घुसा के ऐसा पेलेंगे, फिर कभी जवानी बाहर नहीं आएगी। सिकायात नकुल बिटवा ने कि थी इसलिए केवल वार्निग देकर छोड़ रहे है। सीकायत यदि बाबू साहेब की बिटिया मेनका ने कि होती, तो गायब कर देते। पढ़ने आए हो तो पढ़ाई करो, बाकी छिनरपन करोगे तो कूट देंगे मदरचोद, कान खोलकर सुन लेना।"..


त्रिभुवन काका पूरे गुस्से में उन लड़कों को वार्निग देकर वहां से निकल गए। नीतू की बात का मतलब मुझे आज समझ में आया था। उसकी बात जैसे ही समझ में आयी, मै हंसे बिना नहीं रह पाई। अंदर ही अंदर जैसे कुछ उमंग सा मच रहा हो और दिल से यही निकल रहा था… "मान गई तुझे नीतू। क्या दिमाग लगाया है।"..


कॉलेज से लौटकर जब मै घर पहुंची। मां, अपने दोनो पोते को लेकर मामा के घर जाने की तैयारी कर रही थी। शायद वहां भी कोई जमीनी मसला था इसलिए मां और पिताजी को जाना पर गया। मनीष भईया पहले से ही सहर गए हुए थे। सहर में हमारी कोठी का काम चल रहा था उसी को देखने। पापा ने वंशी चाचा और मुरली भईया को रात में बाहर बरामदे पर ही सोने और घर की देखभाल करने के लिए कह गए थे।


दोनो हमारे पुराने मुलाजिम थे जो खेत का पूरा काम देखते थे, हां लेकिन दोनो में से किसी को बिना बुलाए अंदर आने की इजाजत नहीं थी। इन लोगो के बैठने और मेरे पापा के गप्पे लड़ाने के लिए बाहर एक बड़ा सा बरामदा बाना हुआ था, जिसमे हमेशा 20-30 कुर्सियां। एक साफ सुथरा बिस्तर, और रात में लोगों के सोने के लिए एक्स्ट्रा चादर, गद्दे, तकिए और मच्छरदानी रखे हुए रहते थे।


इन सब बातो में एक बात अच्छी हो गई, पापा ने जाने से पहले मुझे भी एक मोबाइल देते हुए चले गए। मेरे कई दिनों की ख्वाइश थी कि मेरे पास भी एक मोबाइल हो, लेकिन दिल तब छोटा हो गया जब उन्होंने बटन वाला मोबाइल पकड़ा दिया, जबकि मुझे भी भाभी जैसा स्मार्ट फोन चाहिए था।


खैर, जो मिले उसी में संतुष्ट रहना चाहिए। मैं भी मन मार कर रह गई। अगले 4-5 दिनों तक मेरे कॉलेज की छुट्टी थी। आज बहुत दिनों बाद मै सुबह-सुबह मुस्कुराती हुई जागी। मन में बस यही ख्याल आ रहा था कि दिल जीत लिया नीतू। हालांकि इन सबसे ज्यादा मन में ये चल रहा था कि नीतू ने नकुल के प्रेम पत्र का क्या जवाब दिया होगा।

sach mein nitu kaafi chaalak hai... sahi waqt pe sahi waar :D


बिस्तर पर बैठकर यही सब मै सोच रही थी कि तभी… "आह्हःहहहहह.. भाआआआआ.. भीईईईईईईई" … मेरे चेहरे पर दर्द की सिकन पड़ चुकी थी और मै लगभग छटपटा सी गई। मै जब अपनी ख्यालों में खोई हुई थी, तब भाभी दबे पाऊं मेरे कमरे में कब आ गई पता ही नहीं चला। और आते ही उन्होंने मेरे छाती पर हाथ डालकर, छाती से थोड़ा सा उभरे मेरे स्तन के ऊपर, दोनो निप्पल को पकड़ कर पूरी ताकत से मरोर दी।


मेरी तो जान ही निकाल दी। मै गुस्से से उन्हें घूरने लगी, मेरी आखें हल्की पनिया गई थी और जी कर रहा था मै उनका मुंह नोच लू। अभी यदि हाथ में कोई चाकू होता तो खाचक-खाचक उनके पेट में घुसा देती। लेकिन कर भी क्या सकती हूं, वो बिल्कुल भारी-पूरी बदन कि 30 साल की औरत और मै कहां दुबली पतली सी 11th में पढ़ने वाली एक छोटी सी लड़की। भाभी के छाती के पीछे तो मै आधी ढक जाऊं।


कभी-कभी ना मै भाभी को देखती हूं, तो मन में बड़ी जिज्ञासा सी होती है कि काश मै भी थोड़ी और हेल्दी होती, तो इन्हे एक बार पटकने की कोशिश जरूर करती। मेरे सामने भाभी बैठे हुए हंस रही थी और मै रोनी सी सूरत लिए बस उन्हें घुरे जा रही थी।..


"क्या हुआ मेमनी (भाभी मेरे दुबले पतले शरीर को देखकर अक्सर मुझे मेमनी पुकारा करती थी, बकरी का छोटा बच्चा जो पैदा लेते ही फुदकते रहता है वहीं)"


भाभी की बात सुनकर मै गुस्से से चिढ़ती हुई कहने लग गई… "क्या मिलता है ऐसे ये सब करके, आपको रुलाने में मज़ा आता है ना।"..


भाभी:- पागल, तेरे यौवन को निखार रही हूं। चूची थोड़ी बड़ी दिखेगी तब ना तू और भी सुंदर दिखेगी। भगवान ने तुझे इतना प्यार चेहरा दिया, गोरा रंग है, पतली कमर है। बदन की पूरी बनावट पर बस तेरी ये समतल छाती तुझे मात दे देती है।


भाभी की बातें बहुत ही अजीब थी। हालांकि वो पहली बार ऐसी बातें नहीं कर रही थी, लेकिन वो जब भी मुझसे ऐसी बातें करती, मुझे बहुत ही बेकार लगता सुनने में। फिर कौन कीचड़ में ढेला फेके और खुद अपने ऊपर कीचड़ उछाले, इसलिए मै ही चुपचाप उठा गई और उसकी बातो पर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए अपने बाथरूम में घुस गई।


कुछ देर बाद जब नहाने के लिए मै बैठी, तब अपने कपड़े उतारकर, अपने छोटे छोटे स्तन को देखने लगी। भाभी ने इतना कसकर मरोरा था मेरे निप्पल को, की अब भी उनमें दर्द उठ रहा था। मै धीरे-धीरे अपने हाथ से उसे प्यार से सहलाने लगी। मेरे अपने हल्के हाथों से स्तन में उठ रहे दर्द को सहलाने लगी। दर्द से हल्की टीस भी उठ रही थी, जो हौले हथों से हाथ फेरने पर बड़ा सुख दे रही थी।


मै इतना आनंदित हो उठी की धीरे-धीरे मेरी श्वांस बिखरने लगी। तभी बाथरूम के दरवाजे पर भाभी खड़ी होकर चिल्लाने लगी… "ओ मेमनी, निकल बाहर और कितना नहाएगी।"..


मै खुद को किसी तरह सामान्य करती… "क्या है भाभी, अब नहाने भी नहीं दोगी क्या?"..


भाभी:- अरे तेरा नहाना नहीं हुआ तो दरवाजा खोल मै तुझे रगड़ रगड़ के नहला देती हूं।


मै:- पागल हो गई है आप। मां रहती है फिर तो आवाज़ नहीं निकलती और अभी मां नहीं है तो बेशर्मों की तरह कुछ भी बोल रही।


भाभी:- शादी के बाद तू भी मेरी जैसी ही हो जाएगी। जल्दी बाहर निकल हम मंदिर जा रहे है।
is bhabhi pe doubt ho rahi hai kahi yeh lesbo toh nahi :laughing:

मै:- मंदिर ? लेकिन ऐसा तो कोई प्लान नहीं था।


भाभी:- अब क्या मंदिर जाने के लिए भी प्लान करना होता है।


मै:- ठीक है आप जाओ, मै थोड़ी देर से तैयार होकर आती हूं।


स्नान ध्यान करके मैंने अपने गीले बालों में बाहर आ गई और सीधा अपने देवता घर में घुस गई… "ये सब क्या है भाभी, आप नहाकर आज पूजा भी नहीं की है क्या? कल वाले फूल भगवान के सामने ऐसे ही है, और ये आज का फूल कहां है।"..


भाभी झटपट अपने कमरे से दौड़ती हुई अाई। थोड़ा सा अफ़सोस करती मुझसे उन्होने माफी मांगा, और फुल लाकर मुझे दे दी। पूजा समाप्त करके मै तैयार होने चल दी। तकरीबन 15 मिनट बाद जब मै तैयार होकर आयी, भाभी आंगन में ही मेरा इंतजार कर रही थी।


पूजा करने के कारन तब शायद मैंने ध्यान नहीं दिया था लेकिन अभी जब उन पर नजर गई, मै तो उन्हें देखती ही रह गई। बिल्कुल लाल जोड़े में किसी नई नवेली दुल्हन की तरह श्रृंगार की हुई थी भाभी। चेहरे का पानी और भड़े पूरे शरीर पर ये लाल जोड़ा काफी जच रहा था उन पर… "क्या बात है भाभी, आज तो बिल्कुल आपने रिकॉर्ड तोड रखा है। कहीं कोई भाई तो नहीं आने वाला, जिसे लुभाने के लिए इतना सज सवर कर निकल रही।".... ताने देते मैंने भाभी से कहा और हसने लगी


"अच्छा जी, इसका मतलब तू जब भी सुबह तैयार होती है, अपने भाई को दिखने के लिए तैयार होती है क्या?"… भाभी मुझे प्रति उत्तर में कहने लगी।


"पर मै तो कभी तैयार ही नहीं होती भाभी… हीहीहीही"… हंसते हुए मैंने उनके दोनो गाल कसके खींच लिए और आज सुबह का बदला भी ले लिया। भाभी "आव" करती हुई थोड़ा चीखी और फिर हसने लगी। घर के बाहर हमारी गाड़ी पहले से तैयार थी। मै और भाभी पीछे बैठ गई और वो दोनो आगे बैठे गाड़ी को मंदिर के ओर ले लिया।


घर से तकरीबन 9 किलोमीटर अंदर गांव के एक भाव्या सा मंदिर बना हुआ है, जिसकी सोभा सुंदर और सजावट काफी दूर-दूर तक मशहूर है। इस मंदिर को और भी सबसे ज्यादा खास बनता है यहां के पुजारी का बेटा। सांवला सुंदर बदन, कमल के समान उसके नयन, रूप ऐसा की मन मोह ले। मंदिर में जब भी उसे देखा गेरूवा रंग की धोती पहने, कांधे पर लाल गमछा, बदन पर जेनाव धारण किए, ललाट पर तिलक।


इतने आकर्षक रूप पर उसकी मधुर आवाज। सुबह की आराधना और शाम की आरती वहीं किया करते थे, जिसे एक बार सुन लो तो मन बिल्कुल शांत और चेहरा खिल जया करता था। मै जब 12 साल की थी तब यहां आयी हुई थी, मुझसे वो 1-2 साल ही बड़े होंगे। तब शायद घर में रहने की वजह से मुझमे इतनी समझदारी नहीं थी और उस वक़्त मेरे छोटे भईया की नई-नई शादी हुई थी।


पहले तो मै उनके रूप पर मोह गई फिर जब सुबह की आराधना और शाम की आरती सुनी तो पूरे परिवार के बीच, मै अपने पापा से कहने लगी… "पिताजी मुझे इनसे शादी करवा दो, ये मुझे बहुत पसंद है।" .. मेरी बात सुनकर सब हसने लगे। बहुत पुरानी बात ही गई, लेकिन जब भी मै उनके समक्ष होती हूं, लगता है अभी चंद मिनट पहले ही तो मैंने अपनी बात कही थी।


मै जब भी उनको देखती तो बस उन्हीं में खो जाती और जब भी उनकी नजर मुझ पर पड़ती तो मै हड़बड़ी में अपना नजर फेर लेती। हरी शंकर मिश्र सुनने में बड़ा प्यारा लगता था ये नाम। गाड़ी तेजी से आगे बढ़ रही थी, तभी भाभी मेरे कंधे को हिलाती हुई कहने लगी… "क्या हुआ, ससुराल जाने की खुशी है क्या?"..
toh chhori giri pandit ke bete ke pyaar mein... :D

मुस्कुरा तो मै पहले से रही थी, भाभी की बात सुनकर मै शर्मा गई और बिना कोई जवाब दिए सीसे के बाहर देखती हुई पूछने लगी… "भाभी ये अपने खेत है ना।"..


भाभी, उन खेतों को देखती… "मुरली भईया ये खेत अपने है ना।"..


मुरली:- हां भाभी जी..


मै:- मुरली भईया फिर यहां फसल क्यों नहीं लगाई है?


मुरली, थोड़ा चिढ़ते हुए… "अभी बच्ची हो, बरों जैसी बातें मत करो।"


भाभी:- जुबान संभाल कर मुरली, तुम्हे भईया कहते है इसका ये मतलब नहीं कि तुम बच्ची के साथ ऐसे चिढ़कर बात करो और उसे डांटो। कोई गलत सवाल नहीं की थी।


वंशी:- माफ कर दो इसे छोटी बहू, आज कल इसकी बहुरिया (पत्नी) नहीं है तो थोड़ा खिस्याया रहता है।


भाभी वंशी चाचा की बात पर थोड़ा सा हंस दी। फिर थोड़ा शांत लहजे में कहने लगी… "मुरली भईया आइंदा ध्यान रहे, मेनका ने आज तक कोई ऐसा काम नहीं किया है जिससे की किसी को उसपर चिल्लाना भी परा हो। दोबारा यदि मैंने चिढ़ते हुए तो क्या, इसके सवाल को मना करके या बात टालते हुए भी सुन लिया तो आप अपने घर रहिए, हम अपने घर खुश है। हिसाब किताब समेट कर बात खत्म करेंगे।


मुरली:- भाभी माफ कर दीजिए, मेनका तुम भी माफ कर दो। मै थोड़ा पारिवारिक उलझन में था इसलिए चिढ़ गया।


भाभी:- जी आप की सारी बातें जायज है लेकिन इसमें हमारी मेनका का कोई दोष तो नहीं। खैर आप बताइए उस खेत में फसल क्यों नहीं लगाई इस बार।


मुरली:- भाभी जी वहां पान और केले की खेती के लिए जमीन को प्रति छोड़ा गया है।
Oh toh pyaar hai apni nanad ke liye aur fikar bhi.. dekho kaise bhid gayi usse... par kya sach mein ya fir yeh bach ek dikhawa hai :D


थोड़े से गहमा गहमी और बातों के दौरान हम मंदिर प्रांगण में दाखिल हो चुके थे। मैंने समय देखा और भागकर मंदिर में गई। सुबह की आराधना का वक़्त हो रहा था, और मै, फूल और बेलपत्र चढ़ने से लेकर धूप जलने तक की सारे शुरवाति चीजों को छोड़ना नहीं चाहती थी। मै भागकर गई और सबसे आगे जाकर खड़ी हो गई।


आह ! मंदिर से ताजा आते फूलों की खुशबू और वहां जलने वाले धूप दीप, मन को अति प्रसन्न कर रहे। यहां के इस मनमोहक माहौल में तभी हरी शंकर जी की मधुर वाणी सुनाई देने लगी। अच्छा हुआ आज दिखे नहीं, वरना मुझे फिर से आज कुछ कुछ होने लगता।


कंठ से जैसे स्वयं स्वरावती जी वाश रही हो। उनकी आराधना सुनकर वहां मौजूद हर कोई भाव विभोर हो उठा। मंदिर लगभग भरा हुआ था और वहां ऐसा एक भी नहीं था, जो आखें मूंदे हरी शंकर जी के मधुर रस वाणी में खोया हुआ ना हो। आराधना समाप्त हो चुकी थी और भक्त अपने प्रसाद लेकर जा रहे थे।


आराधना होने के बाद मैंने भी फुल अर्पण किया और प्रसाद लेकर जैसे ही जाने को हुई, पुजारी जी ने टोक दिय… "मेनका सुनो जरा बेटा।"..


मै:- जी बाबा…


पुजारी जी अपने पास रखा एक छोटा सा बैग मुझे देते… "इसे संभाल कर ले जाना और सिर्फ अपने पिताजी के हाथ में ही देना।"


मै:- बाबा, मेरे साथ भाभी, वंशी चाचा, और मुरली भईया आए है।


पुजारी:- तुम्हारे घर का एक नौकर तो मुझे दिखा था, मुझे लगा तुम उसी के साथ आयी होगी। लेकिन तुम्हारी भाभी और मुरली आया है, शायद देख नहीं पाया मै।


पुजारी जी की बातें थोड़ी हैरान करने वाली थी। वंशी चाचा यहां था, फिर मेरी भाभी और मुरली कहां गया। कहीं उस मुरली ने तो…. सुबह भाभी ने उसे डांट दिया था, और धमकाया था सो अलग… मेरे चेहरे पर हल्का खिंचाव आने लगा, जिसे पुजारी जी भांपते हुए पूछने लगे…. "क्या हुआ बेटा।"..


मै:- कुछ नहीं बाबा बस आपकी बातो को सोच रही थी। केवल पापा को देना है तो मै भाभी और बाकियों से क्या कहूंगी।


पुजारी जी:- ये लो हो गया काम। इसमें मैंने रामचरित्र मानस, भगवता गीता, विष्णु पुराण, और ऐसे ही 4-5 पुस्तकें डाल दी है, कोई पूछे तो कहना बाबा से मांगे थे किताब और उन्होंने दिए है। हां, लेकिन किताब को पूजा घर या किसी सुद्घ स्थान पर रखना… तुम बच्चे लोग अपने ऊपर तो पुरा ध्यान देते हो, लेकिन ये सब छोटी-छोटी बातें भुल जाते हो।


मै:- मै बिल्कुल नहीं भूलूंगी, आप निश्चित रहिए और ये झोला केवल पापा के हाथ में जाएगी, मै अपनी मां को भी नहीं दे सकती, और कोई बात बाबा।


पुजारी जी हंसते हुए मुझे आशीर्वाद दिए और मै भागकर नीचे मंदिर में प्रांगण में आ गई। मै अपने सैंडिल भी पहन रही थी और चिंता से चारो ओर नजर भी दौड़ा रही थी। मेरी चिंता मेरे चेहरे से साफ पढ़ी जा सकती थी।


मुरली था तो एक नंबर का दबंग, जिसका सिक्का कई टोलों पर चलता था। अगर रास्ते की बात का गुस्से में उसने कहीं भाभी के साथ कुछ उल्टा सीधा कर दिया तो यहां बस इज्जत देखी जाती है। चुपचाप भाभी और मुरली का कत्ल करवा देते और उसे ऐक्सिडेंट का शक्ल दे देते। ताकि दिल की आग भी शांत हो जाए और इज्जत भी बच जाए।


इन्हीं सब उधेड़बुन में मै अपने सैंडल पहनकर एक बार और चारो ओर देख ली, लेकिन भाभी का कहीं कोई पता नहीं था। गाड़ी के पास मुझे दूर से ही वंशी चाचा दिख रहे थे, जो बाहर खड़े थे। दिमाग में हजार धारणाएं बनने लगी थी और घबराहट के कारन मेरे पाऊं थोड़े-थोड़े कांप रहे थे।


मै रोना चाह रही थी, चींख-चींख कर भाभी पुकारना चाह रही थी, लेकिन मै ऐसा कर नहीं सकती थी। किसी तरह हिम्मत करके मै बांस वाले जंगल के ओर चल दी, जहां लगभग कोई नहीं जाता। मन में हजार सवाल और मै चारो ओर देखते धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी….
ya toh murli ne bhabhi ke sath jabardasti kabaddi khel liya... ya phir bhabhi ka purana yaar ho murli :D dono hi koi na hone ka pura faida uthake jungle mein mangal kar rahe ho :roflol:
shayad banshee bhi jaanta ho yeh baat..
Ya phir woh bhi karta hoga bhabhi k saath :roflol:...
Let's see what happens next
Brilliant update with awesome writing skill nainu ji :applause: :applause:
 
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