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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

Napster

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#174.

दिव्य पुरुष:
(17.01.02, गुरुवार,10:40, हिमालय का गर्भग्रह, रुद्रलोक)

हिमालय पर हर ओर श्वेत, स्निग्ध सी बर्फ फैली हुई थी, इसी बर्फ पर हनुका चला जा रहा था।

बड़ा ही घुमावदार और दुर्गम रास्ता था। कुछ दूर जाने के लिये भी एक लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा था।

हनुका ने जबसे अराका द्वीप पर माया का बना सुरक्षा कवच देखा था, तब से ही वह बहुत व्यग्र रह रहा था।

वह चाहता था कि महागुरु नीलाभ से माता के बारे में सबकुछ बता दे, पर महागुरु तो हजारों वर्षों से किसी से मिल ही नहीं रहे थे।

यहां तक कि हनुका के सिवा कोई जानता भी नहीं था कि नीलाभ आखिर है कहां पर? और वह पूरी दुनिया से छिप क्यों रहे हैं?

पर आज हनुका का दिल बहुत बेचैन लग रहा था, इसलिये वह महागुरु से मिलने रुद्रलोक की ओर चल दिया था।

उसे पता था कि महागुरु हिमालय के गर्भगृह में स्थित, रुद्रलोक के रुद्रदेव मंदि.र में हैं, पर वह रुद्रलोक में सीधे रास्ते से नहीं जा सकता था, नहीं तो सभी को महागुरु के वहां होने का पता चल जाता।

इसलिये हनुका ने महागुरु से मिलने के लिये रुद्रलोक का गुप्त द्वार चुना था, जो कि ‘सागरमाथा’ पर्वत से होकर जाता था। (एवरेस्ट पर्वत का प्राचीन नाम सागरमाथा है)

कुछ ही देर में उछलते-कूदते हनुका सागरमाथा पर्वत के एक शिखर पर पहुंच गया।

हनुका ने अब अपने चारो ओर देखा और फिर उस पर्वतशिखर के एक स्थान की बर्फ अपने हाथों से साफ करने लगा।

कुछ ही देर में उस बर्फ के नीचे म…देव का एक चित्र उभर आया, जो कि शायद बहुत प्राचीन काल में ही किसी ने वहां पर बनाया था।

हनुका ध्यान से देव के उस चित्र को देखने लगा। कुछ ही देर में हनुका की निगाह चित्र में बने देव की तीसरी आँख पर गई।

देव की उस आँख के स्थान पर एक बहुत छोटा सा छिद्र नजर आ रहा था।

अब हनुका ने ‘ऊँ नमः शि…य’ का जाप किया और अपने शरीर को इतना छोटा कर लिया, कि वह शरीर उस छोटे से छिद्र के पार आसानी से चला जाता।

हनुका उस छिद्र के पार चला गया। दूसरी ओर पहाड़ में एक छोटा सा प्लेटफार्म बना था, हनुका उसी
पर जा गिरा।

अब हनुका ने अपने शरीर को पुनः पहले के आकार में कर लिया और उस छिद्र से मुंह लगा कर अपनी साँस को जोर से खींचा।
हनुका के ऐसा करते ही पर्वत शिखर पर मौजूद बर्फ ने वापस उस चित्र को ढक लिया।

अब हनुका ने अपने आसपास देखा, वह इस समय एक प्लेटफार्म पर, पर्वत के सबसे ऊंचे स्थान पर खड़ा था। हनुका के नीचे की ओर, कुछ दूरी पर एक 200 फुट ऊंची देव की विशाल प्रतिमा बनी थी।

वह प्रतिमा सिर्फ कमर तक ही थी। प्रतिमा की जटाओं से गंगा की एक धार निकलकर, नीचे स्थित एक छोटी सी झील में गिर रही थी।

झील का पानी इतना साफ था कि झील के पानी में देव की प्रतिमा की छाया बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।

देव की प्रतिमा से निकली गंगा की धारा, पानी में स्थित प्रतिमा की छाया से बने, देव के तीसरे नेत्र के स्थान पर गिर रही थी। जहां पर गंगा की धारा गिर रही थी, वहां पानी में नीले रंग का एक गोल छल्ला बन गया था।

हनुका को पता था कि उस नीले गोल छल्ले से होकर ही रुद्रलोक जाया जा सकता है, पर वह नीला गोल छल्ला गंगा की धारा के सिवा, किसी को भी अपने अंदर से जाने नहीं देता।

अगर हनुका भी बिना गंगा की धारा के उस गोल छल्ले से निकलने की कोशिश करता, तो वह छल्ला उसे पीस देता।

अतः हनुका ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया और ऊंचाई से, प्रतिमा से निकल रही गंगा की धारा में छलांग लगा दी।

“जय माँ गंगे।”

हनुका का शरीर जैसे ही गंगा की धारा से टकराया, धारा ने हनुका के शरीर के चारो ओर, एक सफेद रंग का कवच सा बना दिया।

हनुका का शरीर अब वेग से नीचे गिरने की जगह, गंगा की धारा के साथ उस झील के पानी की ओर बढ़ा।

जैसे ही हनुका का शरीर झील की सतह के पास पहुंचा, वह नीला छल्ला स्वतः ही आकार में बड़ा हो गया और हनुका का शरीर उस छल्ले को पार करता हुआ, झील के पानी में जा गिरा।

पानी में गिरते ही हनुका तेजी से पानी की तली की ओर तैरने लगा। झील की तली में हनुका को एक विशाल त्रिशूल दिखाई दिया, जिस पर एक डमरु लटक रहा था।

हनुका ने त्रिशूल को प्रणाम कर उसे तेजी से घुमा दिया। त्रिशूल के घूमते ही डमरु की आवाज उस झील की तली में गूंज उठी।

इसी के साथ झील की तली में एक द्वार नजर आने लगा। हनुका उस द्वार में प्रवेश कर गया।

वह द्वार एक विशाल मैदान में खुला, जहां एक बहुत ही विशाल संगमरमर के पत्थरों से निर्मित शिव मंदिर बना था, जिसका आकार, बैठे हुए नंदी के समान था।

नंदी के मस्तक पर एक सोने का मुकुट जड़ा था, जिस पर एक नारंगी रंग की पताका (झंडा ) लहरा रही थी।

उस पताका पर एक सुनहरे रंग का त्रिशूल बना था, जिसके नीचे ‘ऊँ’ लिखा था। नंदी का मुख खुला हुआ था और उस खुले मुख से होकर ही मंदि..र का रास्ता जा रहा था।

हनुका नंदी के खुले मुख से, मंदि..र के अंदर की ओर प्रवेश कर गया। मंदि..र के अंदर पहले 12 मंडप थे, हर एक मंडप में देव की एक ज्यो ....तिर्लिंग की प्रतिकृति विराजमान थी।

इसके बाद मंदि..र का गर्भगृह था, जहां बीचो बीच में देव का एक विशाल ज्यो..तिर्लिंग उपस्थित था। उस ज्यो..तिर्लिंग के दूसरी ओर सैकड़ों त्रिशूल जमीन में धंसे थे।

उन त्रिशूलों के ऊपर, एक मानव शरीर नंगे पैर, तांडव की मुद्रा में नृत्य कर रहा था। यह और कोई नहीं, बल्कि नीलाभ था। देव का परम भक्त नीलाभ।

हलाहल से प्रकट हुआ दिव्यपुरुष नीलाभ। जिसके जीवन का उद्देश्य ही मनुष्यों को वेदों का ज्ञान देना था।

हनुका ने पहले देव को और फिर नीलाभ को प्रणाम किया और चुपचाप वहीं देव की मूर्ति के पास बैठकर नीलाभ की साधना पूर्ण होने की प्रतीक्षा करने लगा।

कुछ देर बाद नीलाभ की साधना पूर्ण हो गई और वह उन्हीं त्रिशूलों पर आसन की मुद्रा में बैठ गया।

“बताओ हनुका, कैसे आना हुआ तुम्हारा?” नीलाभ ने हनुका को देखते हुए पूछा।

“महागुरु, कुछ दिन पहले मैंने पश्चिम दिशा में स्थित एक छोटे से द्वीप पर माता की शक्तियों से बना कवच देखा। शायद माता उस स्थान के ही आसपास कहीं हैं? मैं यह समाचार देने ही आपके पास आया हूं।” हनुका ने कहा।

“तुम उस स्थान पर जाकर माया को ढूंढने की कोशिश करो हनुका, इधर मेरी भी साधना पूर्ण होने वाली है। साधना पूर्ण होने के बाद मैं भी सभी के समक्ष प्रकट हो जाऊंगा।” नीलाभ ने कहा।

“यह किस प्रकार की साधना है महागुरु? जो कि 5,000 वर्षों से अनवरत् चलती ही जा रही है।” हनुका ने अपनी जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा।

“पृथ्वी पर एक घोर संकट आने वाला है हनुका, जिसे सभी महा -शक्तियां मिलकर भी नहीं समाप्त कर सकती हैं। इसी लिये ईश्वर चाहते हैं कि मैं कुछ क्षणों के लिये देव की कुछ शक्तियों को अपने शरीर पर धारण करुं। इसी लिये 5,000 वर्षों से मैं अपने शरीर को उस योग्य बनाने के लिये प्रयास रत हूं।"

"अब तुम जाओ हनुका...और अपनी माता को ढूंढने की कोशिश करो। हां जाने से पहले शि...वलिंग के पास रखी, रक्त भैरवी की वह डिबिया भी लेते जाओ, कुछ ही दिन में वह तुम्हारे काम आने वाली है।... तुम्हें पता है कि उसका प्रयोग कैसे करना है?” इतना कहकर नीलाभ वापस अपनी साधना में लीन हो गया।

पर हनुका आवाक सा खड़ा, कभी नीलाभ को तो कभी ज्यो..तिर्लिंग के पास रखी रक्त भैरवी की डिबिया को देख रहा था।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि खतरा कितना बड़ा है? जो रक्त भैरवी की डिबिया का प्रयोग करने की जरुरत आ पड़ी।

हनुका ने एक गहरी साँस भरी और रक्त भैरवी की डिबिया उठाकर अपने वस्त्रों में छिपा ली।

हनुका अब मंदिर के बाहर की ओर चल पड़ा, पर अब वह मानसिक तौर पर महायुद्ध के लिये तैयार था।


चैपटर-13

शीत ऋतु-1:
(तिलिस्मा 4.3)

सुयश के साथ सभी अगले द्वार न्यूजीलैंड में प्रवेश कर गये। पर वहां का नजारा देखकर सभी हैरान रह गये। जहां तक नजर जा रही थी, उन्हें बर्फ ही बर्फ दिखाई दे रही थी।

“यह क्या? यह तो ऐसा लग रहा है कि जैसे हम अंटार्कटिका में आ गये हों।” जेनिथ ने चारो ओर देखते हुए कहा।

“न्यूजीलैंड भी काफी ठंडी जगह है और वैसे भी हम यहां शीत ऋतु का सामना करने आये हैं, तो बर्फ तो नजर आयेगी ही।” सुयश ने कहा।

तभी उनकी नजर उस बर्फ के मैदान के बीचो बीच खड़ी एक मूर्ति पर गई। मूर्ति देख सब उसी दिशा की ओर चल दिये।

वह एक 10 फुट ऊंची अश्वमानव की बर्फ की प्रतिमा थी, जिसका कमर के नीचे का शरीर घोड़े का और कमर से ऊपर का शरीर एक इंसान का था।

वह अश्वमानव किसी योद्धा के समान शक्तिशाली लग रहा था, उसके हाथ में विचित्र सा अस्त्र था।

उस अस्त्र की मूठ अश्वमानव के हाथ में थी, उस मूठ से एक जंजीर के द्वारा बंधा काँटे जैसा गदा हवा में झूल रहा था। यह अस्त्र बर्फ का नहीं बल्कि किसी धातु का बना दिखाई दे रहा था।

सभी ध्यान से उस अश्वमानव को देखने लगे।

“कैप्टेन, यह रोमन साम्राज्य का योद्धा ‘सेन्टौर’ है।” क्रिस्टी ने कहा- “और इसने अपने हाथ में जो अस्त्र पकड़ रखा है, उसे ‘कंटक’ कहते हैं।”

“पर कैप्टेन, एक बात आपने ध्यान दी, कि इस सेन्टौर का पूरा शरीर तो बर्फ का बना है परंतु इसकी आँख और पूंछ के बाल असली जैसे लग रहे है।” ऐलेक्स ने कहा।

“हो सकता है कि इसकी पूंछ और आँखों में ही कोई रहस्य छिपा हो?” सुयश ने सेन्टौर को देखते हुए कहा।

“लेकिन इस जगह पर सेन्टौर की मूर्ति के सिवा और कुछ तो है ही नहीं, फिर हमें यहां करना क्या है?” जेनिथ ने कहा।

“है जेनिथ दीदी, यहां पर और भी चीजें हैं, पर आप लोगों ने अभी तक उस पर ध्यान ही नहीं दिया है।” यह कहकर शैफाली ने सभी का ध्यान जमीन के नीचे बनी बर्फ की झील की ओर कर दिया- “नीचे जमीन की ओर देखिये, जमीन के नीचे एक विशाल बर्फ की झील मौजूद है, जिसमें कुछ मछलियां और समुद्री घोड़ा तैर रहा है।”

शैफाली की बात सुनकर सभी ने नीचे की ओर देखा, शैफाली सही कह रही थी, नीचे एक झील मौजूद थी।

“पर कैप्टेन, मेरी जानकारी के हिसाब से समुद्री घोड़ा ना तो झील के पानी में पाया जाता है और ना ही इतने ठंडे पानी में वह रह सकता है।” तौफीक ने सुयश की ओर देखते हुए कहा।

“यह तिलिस्म है, यहां पर कुछ भी संभव हो सकता है?” सुयश ने कहा।

तभी शैफाली बैठकर पानी के नीचे तैर रही, उन मछलियों को ध्यान से देखने लगी। वह मछलियां साधारण मछलियों के हिसाब से बहुत धीरे तैर रहीं थीं।

“कैप्टेन अंकल, ये ऑस्ट्रेलिया में पायी जाने वाली मिसगर्न नाम की मछली है, इंसान इस मछली का प्रयोग भूकंप का पता लगाने के लिये करता है। वैसे प्रायः यह मछलियां बहुत सुस्त होतीं हैं, पर जब भी भूकंप आने वाला होता है, यह बहुत तेजी से इधर-उधर भागने लगती हैं। दरअसल यह मछलियां पृथ्वी की भूगर्भीय हलचल को कुछ समय पहले ही पहचान जातीं हैं, जिससे यह घबराकर तेज गति से तैरने लगती हैं।” शैफाली ने कहा।

“इसका मतलब हमें इस द्वार में भूकंप का सामना करना पड़ेगा क्यों कि कैश्वर इस मिसगर्न मछली को यूं ही तो नहीं रखा होगा यहां पर?” जेनिथ ने कहा।

जेनिथ की बात सभी को सही लगी।

“तो कैप्टेन हमें कहीं ना कहीं से तो इस तिलिस्म की शुरुआत करनी ही पड़ेगी, तो आप कृपया बताइये कि हमें कहां से शुरु करना सही रहेगा?” क्रिस्टी ने सुयश से पूछा।

“देखो, यहां 3 चीजें ही हैं, पहला वह सेन्टौर, दूसरा समुद्री घोड़ा और तीसरा मिसगर्न मछली। अब 2 चीजें तो पानी के अंदर हैं, तो फिर हमें इस सेन्टौर से ही शुरु करना होगा।” सुयश ने कहा। यह सुन सभी सेन्टौर के पास आकर खड़े हो गये।

“इस सेन्टौर के शरीर में पूंछ और आँखें ही असली लग रहीं हैं, इस लिये इन दोनों में ही कोई ना कोई रहस्य होगा? तो ऐसा करो कि 3 लोग इसके अगले भाग में रहकर, इसकी आँखों पर नजर रखो और बाकी बचे 3 लोग पीछे की ओर जाकर इसकी पूंछ को छुओ और देखो कि इस सेन्टौर में क्या परिवर्तन हो रहें हैं?”

सुयश के यह कहते ही क्रिस्टी और जेनिथ सुयश के साथ सेन्टौर के पिछले हिस्से की ओर खड़े हो गये और तौफीक, ऐलेक्स और शैफाली सेन्टौर के अगले भाग में खड़े होकर सेन्टौर की आँखों की ओर देखने लगे।

अब क्रिस्टी ने सेन्टौर की पूंछ को धीरे से उमेठ दिया।

क्रिस्टी के पूंछ को उमेठते ही सेन्टौर की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देखने लगीं।

“कैप्टेन, क्रिस्टी के पूंछ के छूते ही सेन्टौर की दोनों आँखें पता नहीं कैसे 2 दिशाओ में देखने लगी हैं।” ऐलेक्स ने कहा- “पर इससे हमारे आसपास कोई परिवर्तन तो नहीं आया?”

“तभी पानी के नीचे घूम रहा समुद्री घोड़ा एक स्थान से बर्फ को तोड़कर बाहर आ गया। झील के पानी से बाहर निकलते ही समुद्री घोड़े का आकार 10 इंच से बढ़कर 6 फुट का हो गया।

सभी आश्चर्य से बढ़ते हुए उस समुद्री घोड़े को देख रहे थे, परंतु सभी किसी भी खतरे से बचने के लिये सावधान थे।

तभी समुद्री घोड़े का बढ़ना रुक गया। अब वह झील के ठंडे पानी को अपने मुंह में भरने लगा।

बहुत सारा पानी अपने मुंह में भरने के बाद, समुद्री घोड़े ने अपना मुंह ऊपर आसमान की ओर उठाकर, सारा पानी हवा में फूंक मार कर उड़ा दिया।

सभी आश्चर्य से ऊपर आसमान की ओर देखने लगे, किसी को समझ नहीं आया कि उस समुद्री घोड़े ने ऐसा क्यों किया?

“तभी शैफाली ने चिल्लाकर कहा- “भागो , झील का वह पानी ओले बनकर ऊपर आसमान से गिरने वाला है।”

शैफाली की चीख सुनकर सभी सेन्टौर की ओर भागे, क्यों कि उनके बचने की वही एक सुरक्षित जगह थी।

तभी एक ओले का टुकड़ा आकर ऐलेक्स से टकरा गया और सबके देखते ही देखते ऐलेक्स भी एक समुद्री घोड़े में बदल गया।

बाकी सभी लोग बचकर सेन्टौर के नीचे पहुंचने में सफल हो गये, पर अब उधर 2 समुद्री घोड़े हो गये थे।
दोनों समुद्री घोड़े एक दूसरे के पास पहुंचकर तेजी से नाचने लगे।

अब यह पहचानना बहुत ही मुश्किल हो गया कि उनमें से असली समुद्री घोड़ा कौन है और ऐलेक्स कौन है? अब दोनों समुद्री घोड़े झील से अपने मुंह में पानी भरकर, आसमान की ओर उछालने लगे।

ऐलेक्स को समुद्री घोड़ा बनते देख, क्रिस्टी इस बार ज्यादा परेशान नहीं हुई क्यों कि अब उसे तिलिस्मा के बारे में पता चल गया था। वह जानती थी कि इस द्वार को पार करते ही ऐलेक्स स्वतः ही सही हो जायेगा।

बहरहाल अब ओलों की ताकत सभी जान गये थे, इसलिये कोई भी सेन्टौर के नीचे से निकलने को नही तैयार था।

एक फायदा यह था कि दोनों समुद्री घोड़ों में से कोई भी उनके पास आने की कोशिश नहीं कर रहा था।

“मेरे हिसाब से यह परेशानी इस सेन्टौर की पूंछ उमेठने से आयी थी, तो अगर हम वापस इसकी पूंछ को सही कर दें, तो शायद ऐलेक्स भी सही हो जाये और यह असली समुद्री घोड़ा भी वापस झील में चला जाये।” जेनिथ ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा।

सेन्टौर की पूंछ उमेठने के लिये किसी को बाहर जाने की जरुरत नहीं थी।

क्रिस्टी धीरे से सेन्टौर के पूंछ वाले हिस्से की ओर आ गई और उसने सेन्टौर की पूंछ को पहली वाली स्थिति में कर दिया, पर फिर भी दोनों समुद्री घोड़ों का ओले बनाने का कार्य जारी रहा। यह देख क्रिस्टी वापस आ गई।

“कैप्टेन अब सेन्टौर की पूंछ पहले जैसे करने पर भी कुछ नहीं हो रहा?” क्रिस्टी ने कहा।

“मुझे लगता है कि इस समस्या का हल सेन्टौर की पूंछ में नहीं बल्कि उसकी आँख में छिपा है।” शैफाली ने कहा- “कैप्टेन, समुद्र घोड़े की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देख सकती हैं, पर जमीन पर चलने वाला घोड़ा ऐसा नहीं कर सकता। तो फिर हो ना हो इस सेन्टौर की आँखें 2 दिशाओं में हो जाने की वजह से, वह समुद्री घोड़ा जागा था। और अगर ऐसा है तो हम सेन्टौर की आँखों को सही कर समुद्री घोड़े को रोक सकते हैं।”

शैफाली की बात सुनकर तौफीक सेन्टौर के नीचे से निकला और सेन्टौर की आँखों को अपने हाथ से एडजेस्ट कर सही कर दिया।

तौफीक के ऐसा करते ही बाहर मौजूद दोनों समुद्री घोड़े अचानक से रुक गये।

अब एक घोड़े का आकार फिर से छोटा होने लगा। कुछ ही देर में वह समुद्री घोड़ा वापस 10 इंच का हो गया और झील में कूदकर गायब हो गया।

“चलो 2 मुसीबत से पीछा छूटा।” जेनिथ ने कहा- “एक तो आसमान से ओले गिरना बंद हो गया और दूसरा वह समुद्री घोड़ा वापस झील में चला गया।”

“पर यह ऐलेक्स अभी तक अपने रुप में क्यों नहीं आया?” क्रिस्टी ने घबराते हुए कहा- “कहीं यह हमेशा के लिये समुद्री घोड़ा तो नहीं बन गया?”

“अरे नहीं-नहीं क्रिस्टी दीदी, ऐलेक्स भैया जल्दी ही सहीं हो जायेंगे।” शैफाली ने क्रिस्टी को सांत्वना देते हुए कहा- “रुकिये, मुझे सोचने दीजिये कि ऐलेक्स भैया सही क्यों नहीं हुए?....समुद्री घोड़ा, सेन्टौर की वजह से जागा था, इसलिये सेन्टौर की आँखें सही करने पर वह सही हो गया, परंतु ऐलेक्स भैया,..... वह तो ओले की वजह से समुद्री घोड़ा बने थे, इसलिये अवश्य ही ऐलेक्स भैया को सही करने के लिये समुद्री घोड़े की आँख को सही करना पड़ेगा? और मेरे सोच को तर्क देने के लिये हमें समुद्री घोड़े की आँख एक बार देखनी ही होगी?”


जारी रहेगा
_______:writing:
एक अत्यंत रोमांचकारी धमाकेदार और अद्भुत अविस्मरणीय मनमोहक अपडेट हैं भाई मजा आ गया
 

dhparikh

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#180.

“राक्षसलोक?" इंद्र यह सुनकर डर गये- “इन नामों में तो राक्षसलोक भी है। तो क्या राक्षसों के पास अद्भुत शक्तियां रखी जायेंगी? अगर उन राक्षसों ने उन शक्तियों को हमारे विरुद्ध ही प्रयोग करना शुरु कर दिया तो?"

“आप व्यर्थ ही चिंता कर रहें हैं देवराज।” महानदेव ने कहा- “आपने अभी कुछ दिन पहले ही महा दानव वृत्रा का वद्ध किया था, आपको तो पता ही है कि कोई भी राक्षस अभी आपसे बहुत दिनों तक युद्ध करने नहीं आयेगा। वैसे भी अब आपके पास वृत्रा की मायावी तलवार और ढाल तो है ही। फिर आप अकारण ही चितिंत हो रहे हैं?"

देव की बात सुन इंद्र शांत हो कर बैठ गये। अब वह महानदेव को कैसे बताते? कि वृत्रा की तलवार और ढाल तो कब की, उनके पास से गायब हो गई है। वह तो स्वयं उसे ढूंढने में लगे हैं।

“मुझे, बस एक चीज की और चिंता है देव। इंद्र ने पुनः बोलते हुए कहा- “माया तो स्वयं दैत्यराज मयासुर की पुत्री हैं, ऐसे में उनके सुपुर्द सभी देवशक्तियों को करना क्या उचित निर्णय होगा?" यह कहकर इंद्र ने अपना दाँव खेलने की कोशिश की।

यह सुनकर महानदेव मुस्कुराते हुए बोले- “क्या आपको पता भी है इंद्रदेव? कि माया वास्तव में कौन है?... कोई बात नहीं? यह तो एक ऐसा रहस्य है, जिसका रहस्योद्घाटन अभी करने का उचित समय नहीं है। समय आने पर आप स्वयं इस रहस्य को जान जायेंगे। लेकिन तब तक आपकी दुविधा के लिये, मैं आपको वचन देता हूं कि माया से इस प्रकार की कोई गलती नहीं होगी।"

देव के शब्द सुन इंद्र के चेहरे पर गहरी सोच के भाव उभर आये। अब इंद्र के दिमाग में शक का कीड़ा घुस चुका था और वह यह सभा समाप्त होते ही, माया के बारे में पता लगाने के लिये पूर्ण तत्पर हो चुके थे।

“किसी को और कुछ पूछना है? या फिर अब हम शक्तियों की बात करें।” ब्रह्म… ने सभी देवताओं की ओर देखते हुए पूछा।

पर इस बार किसी और ने कुछ ना पूछा। अब भला त्3देवों की योजना पर प्रश्नचिंह कोई कैसे उठा सकता था ?

"तो फिर ठीक है, अब हम देखते हैं कि प्रत्येक देवता अपनी कौन सी देवशक्ति माया और नीलाभ को देना चाहते हैं?" ब्र..देव ने कहा- “सबसे पहले मैं सूर्यदेव से आग्रह करूंगा कि वह अपनी कोई देवशक्ति माया और नीलाभ को प्रदान करें।'

ब्र..देव के वचनों को सुनकर सूर्यदेव अपने स्थान से खड़े हो गये और उन्होंने अपनी आँख बंदकर किसी मंत्र का आहवान किया। इसी के साथ एक सुनहरे रंग का रत्न सूर्यदेव के हाथ में चमकने लगा।

“यह सूर्यशक्ति है माया।” सूर्यदेव ने सूर्यशक्ति को माया को देते हुए कहा- “यह जिसके पास रहेगी, उसे सूर्य का तेज और उसकी ज्वाला प्रदान करेगी। सूर्य का तेज उस व्यक्ति के भाव को पराक्रम से भर देगा और सदैव उसकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहेगा " यह कहकर सूर्यदेव ने, सूर्यशक्ति माया को प्रदान कर दिया।

माया ने सूर्यशक्ति को लेकर उसे अपने मस्तक से लगाया और उसे अपने हाथ में पकड़े, एक सुनहरे रंग के धातु के डिब्बे में रख लिया।

सूर्यशक्ति मिलने के बाद अब ब्र..देव ने अग्निदेव की ओर इशारा किया। इशारा पाकर अग्निदेव अपने स्थान से खड़े हो गए।

उन्होंने भी आँख बंदकर को ई मंत्र पढ़ा, उनके हाथ में अब बैंगनी रंग का एक चमकता हुआ रत्न प्रकट हुआ।

“ये अग्नि शक्ति है माया, यह शक्ति जो भी मनुष्य धारण करेगा, उसके पास अग्नि की समस्त शक्तियां आ जायेंगीं और अग्नि की शक्ति, उस मनुष्य को धैर्यता और दिव्यता प्रदान करेगी।" यह कहकर अग्नि देव ने भी अपनी अग्नि शक्ति को माया के सुपुर्द कर दिया।

माया ने अग्नि शक्ति को भी अपने मस्तक से लगाकर उसी सुनहरे डिब्बे में रख लिया।

इस बार ब्देव को इशारा करने की कोई जरुरत नहीं पड़ी, वरुणदेव स्वयं ही अपने स्थान से खड़े हो गये।

वरुणदेव ने नीले रंग के रत्न को माया को देते हुए कहा- “यह जलशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे जल की समस्त शक्तियां प्राप्त होंगी और यह जलशक्ति उस मनुष्य को गंभीरता प्रदान करते हुए, उसे सभी समावेशों में रहने की अद्भुत शक्ति देगी।"

इसके पश्चात् पवनदेव ने माया को गाढ़े नीले रंग का रत्न प्रदान करते हुए कहा- “यह वायुशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे वायु की सभी शक्तियां प्राप्त हो जायेंगी और यह वायु शक्ति उस मनुष्य को चंचल बनाते हुए, उसे विज्ञान की अद्भुत समझ प्रदान करेगी।"

अब बारी हनुरमान की थी। सभी को अपनी तरफ देखते पाकर ह..मान अपने स्थान से खड़े हुए और बोले“ मेरे पास स्वयं की ऐसी कोई विशेष शक्ति नहीं है, मैं तो सदैव से ही, धरती पर रहकर ईश्वर की आराधना करता आया हूं। परंतु इस विशेष पर्व पर, मैं भूदेवी की दी हुई धरा शक्ति को प्रदान करना चाहूंगा, जिसकी शक्ति से मैं पृथ्वी पर रहते हुए, स्वयं ऊर्जा ग्रहण करता हूं। यह धरा शक्ति जिसके पास रहेगी, उसे धरा के कणों को नियंत्रित करने का अधिकार होगा। यह धरा शक्ति उस मनुष्य को चट्टान सा कठोर बनायेगी, जिससे उसका अपनी प्रत्येक भावना पर नियंत्रण होगा। यह कहकर हनु ने एक हरे रंग का रत्न माया को प्रदान कर दिया।

इसके बाद शनि देव ने खड़े होकर माया को एक नीले रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह मानस शक्ति है माता, यह जिसके पास रहेगी, उसके पास विचित्र मानस शक्तियां आ जायेंगी। वह इन मानस शक्तियों से अपने हाथों से मानस तरंगें छोड़कर, उसे किसी भी वस्तु में परिवर्तित कर सकेगा। यह मानस शक्तियां सदैव मस्तिष्क को दृढ़ बनाती हैं।
माया ने शनिदव की मानस शक्ति को भी उसी सुनहरे डिब्बे में डाल दिया।

फिर शेषनाग ने उठकर माया को नागशक्ति प्रदान की। वह नाग शक्ति एक काले रंग के रत्न के अंदर थी।

"यह नागशक्ति है माया।” शेषनाग ने कहा- "इस शक्ति में सभी नागों, सर्पो को नियंत्रित करने की शक्ति है। इसको धारण करने वाले मनुष्य पर, किसी भी प्रकार का विष का प्रभाव नहीं होगा और सभी नाग जाति इस नागशक्ति के प्रभाव से, धारक का कहना मानेंगे। साथ ही साथ यह नागशक्ति धारक को, जल में साँस लेने के योग्य भी बना देगी।"

शेषनाग के पश्चात कार्ति..य खड़े हो गये- “मैं माता माया को हिमशक्ति प्रदान करता हूं, यह हिमशक्ति, धारण करने वाले मनुष्य को, हिम की शक्तियों से सुशोभित करेगी और उसमें हिम के समान स्थायित्व और सुंदरता सदा ही शोभायमान रहेगी।"यह कहकर उन्होंने ने एक सफेद रंग का रत्न माया के हाथों पर रख दिया। माया ने आशीष के तौर पर अपना हाथ उन्होंने के सिर पर रख दिया।

अब बारी थी यम की। यम ने गाढ़े लाल रंग का रत्न माया को देते हुए कहा- “यह जीव शक्ति है माता, यह जीव शक्ति जिसके पास रहेगी, वह सभी जीवों की बात को भलि-भांति समझ सकेगा और किसी भी जीव का आकार ग्रहण कर सकेगा।"

इसके बाद गुरु बृहस्पति का नंबर था। उन्होंने ने माया को हल्के हरे रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह वृक्षशक्ति है पुत्री, इसको धारण करने वाले के पास, सभी वृक्षों की भावनाओं को समझने की अद्भुत शक्ति आ जायेगी। वह इस शक्ति के माध्यम से वृक्षों से बात भी कर सकेगा और उनके खुशी व दर्द को महसूस भी कर सकेगा।”

माया ने श्रद्धा स्वरुप यह भेंट भी स्वीकार कर ली। गुरु माया को वह रत्न देकर वापस अपने स्थान पर बैठ गये।

अब ..णेश अपने स्थान से उठे और अपनी आँखें मटकाते हुए माया के पास आ गये। ..णेश को देखते ही माया के चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान आ गयी।

"हमें आपसे रत्न की जगह आपका मूषक चाहिये। कहां है वह? कहीं दिखाई नहीं दे रहा?" माया ने हास्य भरे शब्दों में ..णेश का कान पकड़ते हुए कहा।


“मूषक को डर था, कि आप उन्हें मांग सकती हो, इसलिये वह डर के कारण आये ही नहीं।" उन्होंने अपना कान छुड़ाते हुए कहा- “और माता, आप ये हर समय मेरे कान खींचकर और लंबा क्यों करना चा हती हैं?”

"जिससे आपके कान और बड़े हो जायें, फिर आप बड़े कान की सहायता से आसमान में उड़ भी सको। ऐसी स्थिति में आपको आपके मूषक की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी।" माया ने मुस्कुराते हुए कहा।

सभी देवता गण माया और ..णेश के इस परिहास को देख पूर्ण आनन्दित हो रहे थे।

“मैं अपने कान से उड़ सकूँगा। अरे वाह कितना अच्छा लगेगा आसमान में उड़कर।" गमणेश ने भी खुशी भरे स्वर में कहा- “ठीक है माता, जब ये सभा पूर्ण हो जायेगी, तो मैं रोज आपके पास, अपने कान खिंचवाने आया करूंगा।

माया ने भी गमणेश की भोली बातें सुन अपना सिर हिला दिया। अब गणेश ने भी अपनी आँखें बंदकर, माता पा…र्वत का ध्यान किया। अब उनके हाथ में एक लाल रंग का रत्न चमकने लगा, जिससे तीव्र प्रकाश उत्पन्न हो रहा था।

“माता, यह प्रकाश शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य के पास, ब्रह्मांड के हर प्रकार के प्रकाश को उत्सर्जित एवं परा वर्तित करने की क्षमता आ जायेगी। इसे धारण करने वाले मनुष्य के मस्तिष्क में, असीम ज्ञान का संचार होगा और इस ज्ञान से वह पृथ्वी की दशा और दिशा दोनों ही परिवर्तित कर सकेगा। यह शांति का भंडार भी है और रचनाओं का संसार भी।" यह कहकर उन्होंने उस रत्न को माया के सुपुर्द कर दिया।

सभी देवताओं के बाद इंद्र अपने सिंहासन से खड़े हो गये। इंद्र ने भी मंत्र पढ़कर, हवा से एक हल्के बैंगनी रंग के रत्न को उत्पन्न किया और उसे माया को देते हुए बोला-

“देवी माया, यह वशीन्द्रिय शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य का, अपनी सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण हो जायेगा। वह एक साधारण मनुष्य से बढ़कर, देवताओं की तरह व्यवहार करने लगेगा। एक बार इसका वरण करने के बाद, इसके प्रभाव को कम तो किया जा सकता है, परंतु पूर्णतया समाप्त नहीं किया जा सकता। यह अपने धारक में मेरी ही भांति देवगुण उत्पन्न कर देगा।"

अब देवसभा में बैठे सभी देवगणों ने अपनी कोई ना कोई शक्ति माया को दे दी थी। माया ने अपने हाथ में पकड़े सुनहरे डिब्बे को देखा, जिसमें अब 12 अलग-अलग रंगों के रत्न चमक रहे थे।

“अब हमारी बारी है। "ब्र…देव ने कहा और अपनी आँख बंदकर उन्होंने भी एक शक्ति का आहवान किया। कुछ ही देर में ब्रह्देव के हाथ में भी, एक पीले रंग का रत्न दिखाई देने लगा।


“यह ब्रह्मशक्ति है पुत्री, यह जिसके पास भी रहेगा, उसके पास तुम्हारे समान, शक्तिशाली निर्माण शक्ति आ जायेगी। उस निर्माण शक्ति से वह कल्पना के माध्यम से, किसी भी चीज का निर्माण कर सकेगा। ब्रह्मशक्ति जिसके पास भी रहेगी, वह ब्रह्मांड के हर रहस्य को समझने में सक्षम होगा। उसके निर्माण के समान पृथ्वी पर कोई भी निर्माण कर्ता नहीं होगा।" यह कहकर उन्होंने ब्रह्मशक्ति को भी माया के सुपुर्द कर दिया।

अब भगवान ..ष्णु आगे आये। उन्होंने अपने हाथ में पकड़े पांचजन्य शंख से एक नारंगी रंग के रत्न को निकालकर माया को देते हुए कहा- “यह ध्वनि शक्ति है माया, यह जिसके पास भी रहेगी, उसके पास हर प्रकार की ध्वनि को उत्पन्न करने और उसे नियंत्रित करने की शक्ति होगी। वह किसी भी पुरानी ध्वनि को भी सुनने में सक्षम होगा और वह सदैव ईश्वरीय शक्ति के सानिध्य में रहेगा।"

अब सभी की निगाह महानदेव की ओर थी ।
उन्होंने माया को एक छोटी सी डिबिया पकड़ाते हुए कहा“ इस डिबिया में देवी गंगा की पहली बूंद है माया, जिसे मैंने गुरुत्व शक्ति से बांध रखा है, यह बूंद जिसके भी सिर पर गिरेगी, उसे वह गुरुत्व शक्ति प्राप्त हो जायेगी। जिस मनुष्य के पास ये गुरुत्व शक्ति रहेगी, वह ब्रह्मांड के किसी भी ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण को नियंत्रित कर सकता है। उस मनुष्य में उड़ने की शक्ति स्वतः आ जायेगी और वह बहुत सी शक्तियों को अपने शरीर पर रोकने में सक्षम हो जायेगा।

माया ने गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी अपने सुनहरे डिब्बे में रख लिया। अब माया के पास कुल 15 शक्तियां एकत्रित हो गईं थीं।

“माया और नीलाभ, अब इन शक्तियों को उचित पात्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी तुम दोनों के कंधों पर है।” देव ने कहा- “अब तुम दोनों मिलकर 15 लोकों का निर्माण करो, जब निर्माण कार्य पूर्ण हो जायेगा, तो हम तुम दोनों को बता देंगे कि कौन सी 30 अद्भुत शक्तियां, उन 15 लोकों में छिपाना है।... हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम दोनों अपेक्षाओं पर खरा उतरोगे।" यह कहकर उन्होंने अपने हाथ को हवा में उठाया, जो कि इस बात का प्रमाण था कि यह सभा अब समाप्त हो चुकी है।

सभी देव अब अपने स्थान से खड़े हो गये। कुछ ही देर में त्र..देव, माया और नीलाभ के संग वहां से चले गये। अब सभी देवता भी एक-एक कर सभा से जाने लगे।

इंद्र ने हाथ जोड़कर सभी को विदाई दी, पर इस समय इंद्र का मस्तिष्क बहुत तेजी से चलायमान था, वह कुछ ना कुछ तो ऐसा सोच रहे थे, जो आगे जा कर एक बड़ी समस्या खड़ी करने वाला था।


जारी रहेगा_____✍️
Nice update.....
 
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Raj_sharma

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बहुत ही शानदार लाजवाब और रोमांच से भरपूर अद्भुत रमणिय अपडेट है भाई मजा आ गया
सुयश और टीम अपनी सुझबुज और एकता के साथ धीरे धीरे ही सही पर तिलिस्मा के एक एक कठीनाईयाॅं पार करतें हुए आगे बढ रहें हैं
खैर देखते हैं आगे क्या होता है
Badh to rahe hai lekin dekhna ye hai ki kya wo pohoch payenge last tak sahi salamat:?:
Thank you very much for your valuable review and support bhai :hug:
 
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बहुत ही अद्भुत मनमोहक अकल्पनीय अप्रतिम रोमांचक अपडेट है भाई मजा आ गया
Thank you very much bhai :thanks:
 
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एक अत्यंत रोमांचकारी धमाकेदार और अद्भुत अविस्मरणीय मनमोहक अपडेट हैं भाई मजा आ गया
Thank you very much for your valuable review, sath bane rahiye, maja aata rahega :D
 
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SHADOW KING

Supreme
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#179.

शक्ति
- एक ऐसा शब्द जिसे प्राप्त करने के लिये, मनुष्य, देवता, दैत्य ही नहीं अपितु अंतरिक्ष के जीव भी सदैव लालायित रहते हैं।

शक्ति का पर्याय स्वामित्व से जुड़ता है, इसलिये ब्रह्मांड के सभी जीव शक्ति को प्राप्त कर, स्वयं को श्रेष्ठ दिखाना चाहते हैं।

वन में मौजूद एक सिंह भी, अन्य वन्य प्राणियों के समक्ष अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने से नहीं चूकता। ठीक उसी प्रकार कुछ देवता भी मनुष्यों के समक्ष, अपना शक्ति प्रदर्शन कर, उनमें भय की भावना उत्पन्न करते रहते हैं।

जैसे देवराज इंद्र के द्वारा जलप्रलय लाना या सूर्यदेव के द्वारा सूखे की स्थिति उत्पन्न कर देना। यह सब भी शक्ति प्रदर्शन के अद्वितीय उदाहरण हैं।

दैत्यों ने हमेशा त्रिदेवों से ही शक्ति प्राप्त कर, उनका प्रयोग देवताओं के ही विरुद्ध किया है। इन शक्तियों को प्राप्त करने के लिये, मनुष्यों ने भी घोर तप किये हैं।

कुछ ऐसी ही देवशक्तियों को, पृथ्वी की सुरक्षा के लिये, देवताओं ने पृथ्वी के अलग-अलग भागों में छिपा दिया, जिससे समय आने पर कुछ दिव्य मानव, उन देव शक्तियों को धारण कर, पृथ्वी की सुरक्षा का भार उठा सकें।

ऐसे ही देवशक्ति धारक कुछ विलक्षण मनुष्य बाद में ब्रह्मांड रक्षक कहलाये।

समयचक्र- डेल्फानो ग्रह समाप्त होने के बाद, वहां के राजा गिरोट ने अपनी सबसे अद्वितीय रचना समयचक्र को पृथ्वी पर फेंक दिया, जो कि ब्लैक होल के सिद्धांतों पर कार्य करती थी।

यह समयचक्र पृथ्वी पर आने के 20 वर्षों तक सुप्तावस्था में रहा। एक दिन अचानक ही यह समयचक्र अपनी शक्तियों से, समय के कई आयामों को बांधने की कोशिश करने लगा।

इस समयचक्र के पास समय और ब्रह्मांड में यात्रा करने की अद्भुत शक्तियां थीं, पर इसी अद्भुत
शक्तियों को प्राप्त करने के लिये कुछ अंतरिक्ष के जीव भी पृथ्वी पर आ गये।

उन जीवों के पास दूसरी आकाशगंगा की अनोखी शक्तियां थीं, जो हमारे विज्ञान की कल्पनाओं से भी परे थीं।

इसी के साथ शुरु हुआ एक अनोखा टकराव, जिससे अनगिनत प्रश्नों की एक श्रृंखला खड़ी हो गई.

1) क्या व्योम और त्रिकाली, विद्युम्ना की जलशक्ति से बने मायाजाल में, देवराज इंद्र के वज्र से बच सके?

2) क्या हुआ जब कालकूट विष से बने नीलाभ को ब्रह्मांड में, महा..देव के पंचमुखी दर्शन हुए?

3) क्या हुआ जब ओरस, स्वयं अपने ही समयचक्र के जाल में फंसकर समययात्रा कर बैठा?

4) क्या सुयश अपने साथियों के साथ तिलिस्मा के मायाजाल में घूम रही पांचों इन्द्रियों को परास्त कर सका?

5) कौन था अष्टकोण में छिपा वह दिव्य बालक, जिसके बारे में कोई नहीं जानता था?

6) क्या हुआ जब देवशक्ति धारक माया का टकराव, ग्रीक देवताओं से हुआ?

7) क्या था महा..देव की अमरकथा का रहस्य, जिसे देव ने देवी पा..ती को सुनाया था?

8) वी…भद्र और भद्रक..ली ने किस प्रकार से नीलाभ की परीक्षा ली?

9) क्या धनवंतरी के आयुर्वेद में सभी रोगों का निदान छिपा था?

10) क्या देवशक्ति धारक योद्धा, डार्क मैटर, नेबुला, ब्लैक होल जैसी शक्तियों से पृथ्वी की रक्षा कर पाये?

तो आइये दोस्तों कुछ ऐसे ही सवालों का जवाब जानने के लिये पढ़ते हैं, विज्ञान और ईश्वरीय शक्ति के मध्य, रहस्य के ताने-बाने से बुना एक ऐसा अविस्मरणीय कथानक, जो आपको मानव शरीर और इन्द्रियों का अद्भुत ज्ञान देगा, जिसका नाम है "अद्भुत दिव्यास्त्र"

चैपटर-1
इंद्रसभा:
(20,005 वर्ष पहले.......) देवराज इंद्र का दरबार, स्वर्गलोक

स्वर्गलोक- एक ऐसा स्थान, जहां जीवित रहते कोई भी मनुष्य नहीं जाना चाहता, पर मृत्यु के उपरांत हर मनुष्य वहीं रहने की कामना करता है।

स्वर्गलोक- पृथ्वी का एक ऐसा भूभाग, जिसके बारे में कोई नहीं जानता, कि वह कहां पर है? एक ऐसा स्थान, जहां देवताओं का निवास है। वह देवता जिन्हें आदित्य भी कहते हैं।

त्रिदेवों ने देओं का राजा इंद्र को चुना था। सूर्य, अग्नि, पवन, वरुण, यम आदि सभी देव इंद्र के साथ मिलकर मनुष्यों की सहायता करते हैं।

इस समय स्वर्गलोक में इंद्र की सभा लगी हुई थी। सभी देव, सिंहासनों पर बैठे हुए थे, पर किसी को यह नहीं पता था कि उन्हें आज यहां किसलिये बुलाया गया है? बस उन्हें इतना बता या गया था, कि यह सभा त्रि..देवों के कहने पर बुलाई गई है, इसलिये सभी धीरे-धीरे आपस में बातें कर रहे थे।

इंद्र भी सभा के मध्य, अपने सिंहासन पर बैठे हुए थे। पर इस समय इंद्र के चेहरे की बेचैनी, ये साफ बता रही थी, कि इस सभा का उद्देश्य उन्हें भी नहीं पता है। सभी के चेहरे पर बेचैनी एवं असमंजस के भाव थे।

आखिरकार गमणेश से रहा नहीं गया और उसने इंद्र से पूछ लिया- “देवराज, हमें यहां बैठे बहुत समय बीत गया है, पर आप तो कुछ बता ही नहीं रहे, कि आपने हम सभी को यहां किसलिये बुलाया है?"

गणे.. के शब्द सुन इंद्र डर गये। अब वो ये भी नहीं कह सकते थे कि उन्हें भी नहीं पता, नहीं तो सभी देवताओं के सामने उनका अपमान हो जाता।

अतः इंद्र ने अपने मस्तिष्क का प्रयोग करते हुए कहा- “कुछ देर और प्रतीक्षा करो गमणेश, त्रि..वों ने हमें कुछ भी बताने से मना किया है, बस वह अब आते ही होंगे। उनके आते ही हम आपको सब कुछ बता देंगे।

इंद्र की बात सुन कार्तिकय जोर से हंस दिया, वो इंद्र का चेहरा देखकर ही जान गया था, कि इंद्र को कुछ नहीं पता?

तभी सभा में एक तीव्र प्रकाशपुंज उत्पन्न हुआ और उस प्रकाशपुंज से त्रि..मदेव प्रकट हो गये।
उन्के आगमन से, सभी के वार्तालापों का भ्रमरगुंजन स्वतः ही समाप्त हो गया। सभी उनके सम्मान में अपने-अपने सिंहासन से खड़े हो गये।

त्रि.देवों के साथ नीलाभ और माया भी थे। गमणेश ने माया को देखकर, अपनी पलकें जोर से झपकाईं।

यह एक प्रकार का शरारत भरा अभिवादन था। माया ने भी मुस्कुराते हुए अपनी पलकें झपका कर गणे.. का अभिवादन स्वीकार कर लिया।

माया को देखकर हनुरमान.. को भी वह नन्हा यति याद आ गया। नन्हें यति को यादकर वह एक पल को सिहर उठे।

त्देवों के साथ नीलाभ और माया को देखकर, इंद्र के चेहरे पर आश्चर्य के भाव आ गये, वह समझ गये कि अवश्य ही कोई अत्यंत महत्वपूर्ण बात है, क्यों कि त्रि..देव आज तक किसी को भी लेकर इंद्रसभा में नहीं आये थे? कुछ ही देर में सभी ने आसन ग्रहण कर लिया।

अब सभी देवताओं की नजर त्र..देवों पर थी, सभी साँस रोके बस उन्हें ही देखे जा रहे थे। भगवान व…ष्णु ने महानदेव को बोलने का इशारा किया।

“देवों आप सभी को भली-भांति पता है, कि पृथ्वी पर युगों को 4 भागों में बांटा गया है- सतयुग, त्रेता युग, द्वापरयुग एवं कलयुग।” महानदेव ने कहा - “पहले 3 युगों में मनुष्य हमारे अस्तित्व को स्वीकार करता है, वह वेद के माध्यम से देवताओं की आराधना करता है, जिसके फलस्वरुप देवता उसे आशीर्वाद देते हैं और उसे असुरों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। परंतु कलयुग में मनुष्य हमारे अस्तित्व को नकार देता है। हम स्वयं भी इन्हीं कारणों से मनुष्यों से दूरी बना लेते हैं, परंतु फिर भी हमें उनकी सुरक्षा का दायित्व लेना पड़ता है।

“कलयुग में मनुष्यों की तकनीक इतनी ज्यादा उन्नत हो जाती है कि वह ब्रह्मांड के अन्य ग्रहों की ओर भी झांकना शुरु कर देते हैं और मनुष्यों की यह क्रिया, प्रत्येक बार उनके विनाश का कारण बनती है। ऐसे समय में हम स्वयं भी, उन मनुष्यों की किसी भी प्रकार से सुरक्षा नहीं कर पाते। इसलिये हमने कलयुग में भी मनुष्यों की रक्षा के लिये एक अनूठा उपाय सोचा है। हम चाहते हैं कि हम सभी देव, अपनी एक देवशक्ति को किसी ऐसे मनुष्य को प्रदान करें, जो कि ब्रह्मांड रक्षक बनकर कलयुग में, हमारी अनुपस्थिति में भी, मनुष्यों की रक्षा कर सके।" यह कहकर महानदेव शांत हो गये।

“पर ..देव, हम ऐसे मनुष्यों का चयन कैसे करेंगे? जो हमारी शक्ति को धारण कर ब्रह्मांड रक्षक का कार्य भली-भांति कर सके।” इंद्र ने परेशान होते हुए कहा।

“और ..देव ऐसे मनुष्यों के चयन में तो हजारों वर्ष लग सकते हैं और फिर हम उनकी परीक्षा कैसे लेंगे? कि वह देवशक्ति को धारण करने योग्य हैं कि नहीं?” सूर्य ने कहा।

"हमें पता है कि यह कार्य इतना आसान नहीं है। ब्रह्म.. ने कहा- “पर इसका भी उपाय हमारे पास है।... आप में से कोई यह बताये कि हमारे पास ऐसा कौन सा ज्ञान का भंडार है? जो कभी खाली नहीं होगा और वह हमेशा सभी मनुष्यों को उचित मार्ग दिखायेगा।"

“वेदों का ज्ञान।” गमणेश ने हाथ उठाते हुए कहा “वही एक ऐसा ज्ञान है, जो कलयुग में भी सभी को उचित मार्ग दिखा सकता है।'

"बिल्कुल सही कहा ..गमणेश ने।” ब्रह..देव ने अपने एक हाथ में पकड़े वेद को सभी को दिखाते हुए कहा "वह वेदों का ज्ञान ही होगा, जिसके द्वारा हम उचित मनुष्य का चुनाव कर सकते हैं और वेदों के ज्ञानार्जन के बाद, वह मनुष्य कभी भी, कलयुग में भी, अपने मार्ग से विमुख नहीं होगा।”

“परंतु ब्रह्म.., इस वेद को समझना मनुष्य के मस्तिष्क से परे होगा।” कार्तिक... ने कहा- “यह तो अत्यंत जटिल भाषा में है, इसे तो मैं स्वयं भी अभी समझने की कोशिश कर रहा हूं।"


“भ्राता श्री, ये मैं आपको अच्छे से समझा दूंगा। मुझे यह बहुत अच्छे से आ गया है।" गमणेश ने अपनी भोली सी भाषा में कहा।

“मुझे तुमसे ज्ञान लेने की जरुरत नहीं है, मैं इसे स्वयं समझ लूंगा।” कर्तिके.. को उनकी बात सुनकर बहुत बुरा लगा। वह अपने छोटे भाई से किसी भी प्रकार का ज्ञान नहीं लेना चाहते थे।

ब्रह्म… ने कार्तिके.. की बात पर ध्यान नहीं दिया और वह पुनः बोले- “तुम सही कह रहे हो, इसकी भाषा अत्यंत जटिल है, परंतु आज से हजारों वर्षों के बाद, जब कलयुग का पृथ्वी पर प्रवेश होने वाला होगा, तो पृथ्वी पर एक ऋषि कृष्ण द्वैपायन का जन्म होगा। वही ऋषि इस 1 वेद को 4 भागों में विभक्त कर, इसे नया आकार देंगे और वेदों के इसी विभाजन के कारण उन्हें महर्षि वेदव्यास के नाम पर जाना जायेगा। वेद व्यास का अभिप्राय ही होगा, वेदों का विभाजन करने वाला। अब रही बात वेदों के इस विभाजन को सरलता देने की, तो मुझे लगता है कि यह कार्य गणे… बहुत आसानी से कर लेंगे। क्यों गमणेश हमने उचित कहा ना?"

“जी देव, आपकी आज्ञा का अक्षरशः पालन होगा।” गणे.. ने सिर झुकाते हुए कहा।

"तो अब बचता है कार्य, मनुष्यों के चयन और उन्हें वेदों का ज्ञान देने का।” तो इसके लिये हम अपने साथ, यहां नीलाभ और माया को लेकर आये हैं। माया निर्माण शक्ति में पूर्ण निपुण है और निर्माण शक्ति के ही माध्यम से, माया पृथ्वी पर अलग-अलग जगहों पर, 15 लोकों का निर्माण करेगी। यह लोक पूर्णतया, एक भव्य नगर की भांति होंगे। इन 15 लोकों में हम 30 अद्भुत शक्तियों को छिपा देंगे और जो मनुष्य वेदों का ज्ञान अर्जित कर, इन 30 शक्तियों को प्राप्त करेगा, उसे ही हम अपनी देवशक्तियां देंगे। अब इसके लिये माया को हिमालय पर, एक विद्यालय 'वेदालय' की रचना भी करनी होगी। जहां पर कुछ चुने हुए मनुष्यों के बालकों को, नीलाभ वेदों के माध्यम से शिक्षा देंगे और उन बालकों को इतना निपुण बनायेंगे कि वह देवशक्ति धारण करने योग्य हो जायें।"

"बालको के हाथ में देवशक्ति देना क्या उचित होगा देव?” पवन ने कहा।

"क्यों नहीं पवनदेव।” ब्रह्म… ने कहा- “वेदालय की प्रतियोगिताएं इतनी दुष्कर होंगी कि आप भी उन्हें सरलता से पूर्ण नहीं कर पायेंगे और अगर वह बालक उसे पूर्ण कर लेते हैं, तो उन्हें देवशक्ति देने में दुविधा ही क्या है?”

“परंतु देव, वह बालक जब तक उन देवशक्तियों का प्रयोग सही से सीखेंगे, तब तक तो वह बूढ़े हो जायेंगे। मनुष्यों की आयु आखिर होती ही कितनी है?" वरुण ने कहा।

"हां, यह बात आपने सही कही वरुणदेव।" ब्रह्म.. ने कहा- “इसी के लिये विद्यालय की पढ़ाई समाप्त होने के पश्चात्, हम उन्हें अमृतपान करायेंगे, जिससे वह भी आप लोगों की तरह, अमृत्व को प्राप्त कर लेंगे और युगों युगों तक निष्पक्ष भाव से ब्रह्मांड रक्षक का कार्य करते रहेंगे।

यह बात सुन कर इंद्र का हृदय कांप गया। वह सोचने लगे कि कहीं वह मनुष्य आगे चलकर, देवशक्तियों की शक्ति से, उनका ही सिंहासन ना छीन लें? परंतु इंद्र जानते थे कि इस समय त्रि..देवों के सामने कुछ भी बोलना सही नहीं है? अन्यथा वह कहीं अभी ही सिंहासन से ना हटा दिये जायें?

यह सोच इंद्र ने वापस देवों की ओर देखना शुरु कर दिया। पर जैसे ही इंद्र की नजरें भगवान वहिष्णु से टकराईं, वह एकाएक सटपटा गये, क्यों कि भगवान ..ष्णु मुस्कुराते हुए उन्हें ही देख रहे थे।

इंद्र को लगा कि जैसे उनकी चोरी पकड़ ली गई हो, इसलिये वह जल्दी से इधर-उधर देखने लगे।

“चलिये अमृतपान भी ठीक है, पर वह विवाह तो करेंगे ना? फिर विवाहोपरांत वह अपने मार्ग से भ्रमित भी हो सकते हैं? उन्हें अपने परिवार की सुरक्षा का भार सर्वोपरि लगने लगेगा। फिर वह ब्रह्मांड रक्षक का भार अपने कंधों पर कैसे उठा पायेंगे?” गुरु बृहस्पति ने कहा।

"नहीं, वह तब तक विवाह नहीं करेंगे, जब तक कि उन्हें स्वयं के समान कोई दूसरा मनुष्य नहीं मिल जाता? जब उन्हें दूसरा मनुष्य मिल जायेगा, तो वह अपनी शक्तियों के साथ, अपना अमरत्व भी दूसरे मनुष्य को दे देंगे और स्वयं विवाह कर, एक साधारण मनुष्य की जिंदगी जी सकेंगे।" ब्रह्देव ने कहा।

"क्या हम उन लोकों के नाम जान सकते हैं ब्देव?” शेषनाग ने कहा।

“अवश्य।” यह कह देव ने उन लोकों के नाम बताना शुरु कर दिया- “देवलोक, शक्ति लोक, राक्षसलोक, ब्रह्म…लोक, नागलोक, माया लोक, हिमलोक, नक्षत्रलोक, पाताललोक, भूलोक, सिंहलोक, रुद्रलोक, यक्षलोक, प्रेतलोक और मत्स्यलोक।"

शेषनाग, नागलोक का नाम सुनकर ही प्रसन्न हो गये।

Jaaari rahega……
Lovely update.tridevo ne manushya ki raksha ke liye bahut pehle se soch rakha hai ,kaise kalyug me manushya apne ko powerful bananewala hai ..
Nilabh aur maya ko vedalay me chune huye bachcho ko Shiksha d ni hogi .aur wo bachche hi gyan prapt kar kathin pariksha dene ke baad prithvi ke rakshak banenge .

Sabkuch ekdam mast likha hai ki padhte ho raho aisa lagta hai .indra ki to ek baar hawa hi tight ho gayi jab uske mann me aaya ki amaratv prapt karnewala uska singlhasan hi na cheen le .
 

dil_he_dil_main

Royal 🤴
554
1,105
123
#176.

आर्केडिया:
(17.01.02, गुरुवार, 12:30, ट्रांस अंटार्कटिक माउन्टेन, अंटार्कटिका)

शलाका वेदांत रहस्यम् पढ़कर इतना ज्यादा विचलित हो गई, कि 2 दिन तक तो वो अपने कमरे से बाहर भी नहीं आई, पर उसने अब दृढ़ निश्चय कर लिया था, और वह निश्चय था आर्यन और आकृति के पुत्र को ढूंढने का।

तभी शलाका को जेम्स का ध्यान आया। जेम्स को उसने अपने पास तो रख लिया था, पर 2 दिन से शलाका उससे मिली नहीं थी। यह सोच शलाका अपने कमरे से निकली और जेम्स के कमरे की ओर आ गई।

जेम्स अभी भी उसी कमरे में था, जिसमें वह पहले विल्मर के साथ रह रहा था।

शलाका को आता देख जेम्स उठकर खड़ा होने लगा। शलाका ने जेम्स को बैठने का इशारा किया और स्वयं एक कुर्सी लेकर उस पर बैठ गई।

“हां जेम्स, आज से तुम्हारा काम शुरु, पर तुम पहले अगर कुछ जानना चाहते हो, तो वह बता दो, फिर मैं तुम्हें समझाती हूं कि तुम्हें यहां पर अब काम क्या करना है?” शलाका ने जेम्स की ओर देखते हए कहा।

“मैं सबसे पहले आपके और आपके भाईयों के बारे में सब कुछ जानना चाहता हूं।” जेम्स ने कहा।

“ठीक है, तो मैं शुरु से बताती हूं।” शलाका ने कहा- “एक बार ग्रीक देवता पोसाईडन ने धरती पर स्वर्ग बनाने की कल्पना की और एक खूबसूरत लड़की क्लीटो से शादी कर ली। पोसाइडन ने क्लीटो को
अटलांटिस के निर्माण के लिये काला मोती और एक तिलिस्मी अंगूठी दी। काला मोती ब्रह्मांड के सप्त तत्वों पर भी नियंत्रण कर सकता था। परंतु उस काले मोती को सिर्फ वही नियंत्रित कर सकता था, जिसके पास पोसाइडन की दी हुई तिलिस्मी अंगूठी हो। क्लीटो ने उस तिलिस्मी अंगूठी की सहायता से काले मोती को नियंत्रित कर, अटलांटिस का निर्माण किया। धीरे-धीरे क्लीटो ने 10 पुत्रों को जन्म दिया।

“समय आने पर क्लीटो ने अपने सबसे बड़े पुत्र ‘एटलस‘ को अटलांटिस का राजा बना दिया। एक बार पोसाइडन को किसी बात पर क्लीटो के चरित्र पर शक हो गया। उसने क्रोधित हो कर क्लीटो से अपनी तिलिस्मी अंगूठी छीन ली। क्लीटो ने बिना तिलिस्मी अंगूठी के जैसे ही काला मोती को अपने हाथ में उठाया, वह पत्थर की बन गई। इसके बाद पोसाइडन ने एक कृत्रिम द्वीप अराका का निर्माण करवा कर पत्थर बनी क्लीटो को काला मोती सहित एक तिलिस्म में डाल दिया। पोसाईडन ने तिलिस्म का निर्माण इस प्रकार करवाया था कि उस तिलिस्म को कोई देवपुत्री ही तोड़ सकती थी।

“पोसाइडन को पता था कि एटलस की अगली सात पीढ़ियों में अभी कोई पुत्री जन्म नहीं लेने वाली। पोसाईडन ने अटलांटिस को भी समुद्र में डुबो दिया। अब उस परिवार की केवल एक सदस्य ही बची थी और वह थी एटलस की पत्नी ‘लीडिया‘, जो कि गर्भवती होने के कारण अपने माँ के घर ‘एरियन आकाशगंगा ‘ पर मौजूद थी। सब कुछ खत्म होने के बाद जब लीडिया अटलांटिस पहुंची तो वहां सिर्फ सामरा और सीनोर जाति के कुछ योद्वा ही बचे थे और बचा था तो बस अराका द्वीप....जो पानी पर तैरने की वजह से इस खतरनाक दुर्घटना से बच गया था।

“लीडिया अब सामरा और सीनोर के साथ अराका पर रहने लगी। हजारों साल बाद एटलस के परिवार में
एक लड़की का जन्म हुआ। जिसका नाम ‘ऐलेना‘ रखा गया। बड़ी होने पर ऐलेना की शादी ‘एरियन आकाशगंगा‘ के एक महान योद्वा ‘आर्गस‘ के साथ हुई। अब फिर सभी तिलस्मी अंगूठी को ढूंढने लगे। समय धीरे-धीरे बीतता गया पर ऐलेना को तिलिस्मी अंगूठी नहीं मिली। कुछ समय बाद ऐलेना ने भी एक-एक कर 8 बच्चों को जन्म दिया। जिनमें 7 लड़के थे और एक आखिरी सबसे छोटी लड़की थी, जो कि मैं थी। मेरी माँ ने सभी को बताया कि उनके 7 पुत्रों के पास देवताओं की सप्त शक्ति है”

“तो आपके भाइयों के पास देवताओं की सप्त शक्ति है।” जेम्स ने पूछा।

“नहीं, मेरे भाइयों के पास असल में कोई शक्ति नहीं है। यह झूठ मेरी माँ ऐलेना के द्वारा फैलाया गया था। उन्होंने ऐसा इसलिये किया था कि कहीं उनके पुत्रों को शक्ति हीन जानकर सामरा और सीनोर राज्य के लोग उनके विरुद्ध ना हो जायें और इसी भ्रम को बनाये रखने के लिये उन्होंने अराका पर जगह-जगह मेरे भाइयों की वीरता की कहानियां, चित्रों के माध्यम से सभी ओर बनवा दी थीं। अगर सामरा व सीनोर राज्य उनके विरुद्ध हो जाते तो उनके पास रहने को भी जगह ना बचती।” शलाका ने कहा।

“क्यों----?....वह अपने पति आर्गस के घर ‘एरियन आकाशगंगा’ में जा सकती थीं।” जेम्स ने कहा।

“नहीं जा सकती थीं। मेरे पिता हमेशा से चाहते थे, कि मेरी माँ अपने सभी बच्चों के साथ एरियन आकाशगंगा में चल कर रहें। पर मेरी माँ मेरे जन्म के बाद भी, मेरी नानी लीडिया को छोड़कर नहीं जाना चाहती थीं। इसी लिये मेरे पिता आर्गस ने हम सभी से, सभी प्रकार के सम्पर्क तोड़ लिये थे। अब हमारे पास अपने पिता की याद के लिये, इस आर्केडिया यान के अलावा कुछ नहीं था।” शलाका ने कहा।

“क्याऽऽऽऽ? यह एक अंतरिक्ष यान है?” जेम्स ने आश्चर्य से भरते हुए कहा।

“हां, यह एक अंतरिक्ष यान है, इसका नाम आर्केडिया है, यह हमारे पिता की आखिरी निशानी है।” शलाका ने उदास होते हुए कहा।

“मेरे पिता के जाने के बाद जब मैं 10 वर्ष की हो गई, तो मेरी माँ ने मुझे वेदालय जाकर पढ़ाई करने को कहा। वेदालय उस समय पृथ्वी का सबसे रहस्यमयी विद्यालय था, जिसमें अनेकों देव शक्तियां भरीं थीं। मेरी माँ ने मुझे इसलिये वहां भेजा, जिससे कि मैं सप्त शक्तियों का ज्ञान अर्जित कर क्लीटो को आजाद करा सकूं। पर वेदालय में पढ़ाई करते समय मुझे आर्यन से प्यार हो गया। मैंने अपनी माँ को बिना बताए आर्यन से विवाह कर लिया।” शलाका ने कहा।

“वेदालय में और कौन-कौन थे? और वह कैसा विद्यालय था?” जेम्स ने पूछा।

जेम्स की बात सुन शलाका ने जेम्स को जल्दी-जल्दी वेदालय की थोड़ी सी जानकारी दे दी।

“तो क्या पढ़ाई पूरी करने के बाद आपको कोई शक्ति मिली?” जेम्स ने उत्सुकता वश पूछ लिया।

“हां, जब शक्तियों का चयन करने की बात आयी, तो थोड़ी सी परेशानी हुई। क्यों कि मेरी माँ चाहती थीं कि मैं जल शक्ति का चुनाव करुं, और उस जलशक्ति से फिर से अटलांटिस का निर्माण करुं। पर मुझे पूरी जिंदगी आर्यन के साथ रहना था और चूंकि आर्यन ने सूर्य शक्ति का चुनाव किया था, इसलिये मैंने अग्नि शक्ति का चुनाव किया।”

“अगर वेदालय की पढ़ाई पूर्ण करने के बाद सभी को शक्तियां मिलीं, तो फिर आकृति को क्यों नहीं मिलीं ?” जेम्स ने कहा।

“पढ़ाई खत्म होने के बाद बाकी के 5 जोड़ों को एक ही तरह की शक्ति दी गई। पर पूरे 10 वर्षों के दौरान सर्वश्रेष्ठ प्रतियोगिताएं जीतने वाले जोड़े को 2 शक्तियां मिलनी थीं। अंत में सर्वश्रेष्ठ विजेता आर्यन के साथ मैं और आकृति दोनों खड़े थे, पर अपने जोड़े के चुनाव का अधिकार आर्यन के पास था। इसलिये आर्यन में मुझे अपने जोड़े के तौर पर चुना। आकृति को ना चुने जाने की वजह से उसे कोई देवशक्ति नहीं मिली। इसलिये वह नाराज होकर वहां से चली गई। इसके बाद सभी को अमृतपान करने का अवसर मिला, पर मेरे और आर्यन के विवाह की बात सुन हमें अमृतपान नहीं कराया गया।

“इसलिये वेदालय से निकलने के बाद आर्यन हम दोनों के लिये ब्रह्मलोक से अमृत लाने चला गया। जब वह अमृत लेकर लौटा, तो आकृति ने मेरा वेश धारण कर आर्यन को धोखा दिया और अमृत की एक बूंद भी पीली। जिससे क्रोधित होकर आर्यन ने अपने और आकृति के बच्चे को एक काँच के अष्टकोण में बंद कर, कहीं धरती में छिपा दिया और स्वयं अपनी मृत्यु का वरण कर लिया। जिस समय आर्यन ने मृत्यु का वरण किया, ठीक उससे कुछ पहले मेरी माँ की मृत्यु हो जाने की वजह से मैं आर्यन से कुछ दिनों के लिये दूर चली गई थी जिसका अर्थ आर्यन ने यह निकाला कि मैं उसे छोड़कर कहीं चली गई। जब मैं लौटकर आयी, तो आर्यन मुझे कहीं नहीं मिला।

“मैंने महागुरु नीलाभ से जब उसका कारण पूछा, तो उन्होंने बताया कि आर्यन अब मर चुका है और वह 5,000 वर्षों के बाद दूसरा जन्म लेकर फिर से आयेगा। अब मेरी आयु मात्र 2000 वर्ष की ही थी, तो भला मैं आर्यन का 5,000 वर्ष तक इंतजार कैसे करती। अतः मैंने अपने भाइयों के साथ 5,000 वर्ष की शीतनिद्रा का विचार बनाया और अपने यान आर्केडिया में आकर सो गई। मुझे पता था कि पृथ्वी के कुछ लोगों के पास ऐसी दिव्यशक्ति है कि वह जमीन पर मौजूद किसी भी जीव को ढूंढ सकते हैं इसलिये मैंने अपने आर्केडिया को बर्फ के नीचे दबा दिया। मुझे पता था कि अंटार्कटिका में कोई नहीं रहता, इसलिये यह जगह मेरे यान के लिये सबसे सुरक्षित थी।”

इतना कहकर शलाका चुप हो गई, पर उसकी आँखों में अब लाल डोरे तैरने लगे थे।

यह देख जेम्स ने तुरंत टॉपिक को बदलते हुए कहा।
“आप मुझे कुछ काम बताने वालीं थीं?”

“अरे हां...आओ मेरे साथ।” यह कहकर शलाका जेम्स को लेकर एक दिशा की ओर चल दी।

कुछ आगे जाने के बाद शलाका ने आर्केडिया का एक द्वार खोला, जो कि शायद उस यान का कंट्रोल रुम था।

“घबराओ नहीं, यह आर्केडिया का असली कंट्रोल रुम नहीं है, यहां सिर्फ एक वीडियो गेम की तरह आर्केडिया को चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है।” यह कहकर शलाका ने एक स्क्रीन को ऑन कर दिया और ऊपर लगी एक अलमारी खोल, एक किताब निकालकर जेम्स के हाथों में पकड़ा दी।

“यह है आर्केडिया को चलाने के कंट्रोल्स की किताब। तुम पहले इसे पढ़कर वीडियो गेम पर ट्रेनिंग लो। जब तुम यह चलाना सीख जाओ, तो मुझे बताना। तब मैं तुम्हें दूसरा कार्य दूंगी।”

“मतलब कि एक दिन मुझे सच का अंतरिक्ष यान उड़ाने को मिलेगा?” जेम्स ने खुश होते हुए कहा।

“पहले सीख जाओ, फिर सोचेंगे... अच्छा अब मैं चलती हूं...और हां, यह एक छोटा सा यंत्र है, जिसके द्वारा तुम कभी भी मुझसे संम्पर्क कर सकते हो।”

यह कहकर शलाका ने एक छोटा सा बटन जैसा लाल रंग का यंत्र जेम्स के हवाले किया और वहां से निकलकर चली गई।

जेम्स अब काफी उत्तेजित दिख रहा था, वह अब बटनों से खेलने लगा।

चैपटर-14
शीत ऋतु-2:
(तिलिस्मा 4.3)

तौफीक सेन्टौर से लगातार बचने की कोशिश कर रहा था। क्रिस्टी, शैफाली और जेनिथ, ऐलेक्स की बर्फ की मूर्ति के पीछे छिपे भागते हुए तौफीक को देख रहे थे।

सुयश भी कंटक को हाथ में पकड़े बर्फ की मूर्ति बन चुका था। इसलिये किसी और की कंटक उठाने की इच्छा नहीं थी और बिना कंटक इस दैत्याकार सेन्टौर को हराना मुश्किल लग रहा था।

तौफीक अब थकना शुरु हो गया था, यह देख अब क्रिस्टी मैदान में आ गई, वह सेन्टौर के पास जाकर उसका ध्यान भटकाने की कोशिश करने लगी।

ऐसा पहली बार हुआ था कि इन्हें तिलिस्मा में गाइड करने के लिये कप्तान ही नहीं था।

तभी शैफाली को बर्फ पर कुछ दूरी पर पड़ी 1 मिसगर्न मछली दिखाई दी, जो पानी के वजह से मर गई थी।


शैफाली ने दौड़कर उस मछली को उठा लिया और तौफीक की ओर देखकर चीख कर कहा- “तौफीक अंकल, जरा अपना चाकू मेरी ओर फेंकिये।”

तौफीक ने शैफाली की आवाज सुन अपनी जेब से चाकू निकाला और शैफाली की ओर उछाल दिया।
शैफाली ने जमीन पर गिरे चाकू को उठाकर, उससे मिसगर्न मछली को बीच से फाड़ डाला।

उसके बाद उस मछली की खाल अलगकर, जैसे ही अपने हाथ के पास ले गई, वह मछली की खाल शैफाली के हाथों में किसी दस्ताने की तरह से फिट हो गई।

यह देख शैफाली और जेनिथ के चेहरे पर मुस्कान आ गई। शैफाली ने अब आगे बढ़कर कंटक को सुयश के हाथ से ले लिया।

मछली की खाल से बने दस्ताने की वजह से, शैफाली सफलता पूर्वक कंटक को उठाने में सफल हो गई, उधर सुयश के हाथ से कंटक निकलते ही, वह भी अपने असली रुप में आ गया।

सुयश ने पहले शैफाली के हाथ में पहने दस्ताने को देखा और फिर उसके हाथ में पकड़े कंटक को।

एक पल में ही सुयश सारी कहानी समझ गया।

उधर अब शैफाली ने ध्यान से सेन्टौर की ओर देखा और फिर कंटक को लेकर उसकी ओर चल दी।

सेन्टौर से कुछ दूर पहले ही शैफाली रुक गई।

शैफाली ने सेन्टौर पर चिल्लाते हुए एक बर्फ का छोटा सा टुकड़ा उसके चेहरे पर फेंक कर मारा।

उस छोटे टुकड़े से सेन्टौर का कुछ नहीं हुआ, पर अब उसका ध्यान शैफाली की ओर हो गया था।

शैफाली ने अब एक पत्थर का टुकड़ा उठा कर सेन्टौर की ओर फेंका। सेन्टौर ने हंसते हुए पत्थर के टुकड़े को रास्तें में ही, हाथ से पकड़कर दूर फेंक दिया।

अब शैफाली ने पास पड़ी एक मृत, मिसगर्न मछली को सेन्टौर की ओर फेंक दिया।

सेन्टौर ने फिर पुनरावृति करते हुए, उस मछली को भी हाथ से पकड़कर दूर फेंक दिया।

अब सेन्टौर चलता हुआ शैफाली के पास पहुंच गया। सभी साँस रोके शैफाली और सेन्टौर को देख रहे थे।

तभी शैफाली ने इस बार कंटक को सेन्टौर की ओर उछाल दिया और इसी के साथ सेन्टौर शैफाली के बिछाये जाल में फंस गया।

कंटक को हाथ से पकड़ते ही सेन्टौर फिर से बर्फ में बदल गया। यह देख सभी खुश हो गये।

“चलो, यह मुसीबत तो खत्म हो गई, पर अभी ऐलेक्स का क्या करना है? और तिलिस्मा के इस स्थान से निकलने का द्वार किधर है?” क्रिस्टी ने शैफाली की ओर देखते हुए कहा।

“इस द्वार का कुछ भाग नीचे झील में भी है, मुझे लगता है कि झील में मौजूद, परी के हाथ में पकड़े राजदण्ड से ही ऐलेक्स सही होगा।” शैफाली ने कहा- “पर इस द्वार का वो हिस्सा मुझे अकेले ही पार करना होगा क्यों कि झील के पानी में हममें से और कोई ज्यादा देर तक नहीं रह सकता।” यह कहकर शैफाली ने सभी को झील के नीचे मौजूद, तिलिस्मा के उस भाग के बारे में बता दिया जो कि उसने कुछ देर पहले ही देखा था।

इसके बाद शैफाली समय को बचाते हुए, तुरंत ही उस झील के जल में कूद गई। एक छोटी सी डाइव के बाद शैफाली उस स्थान पर पहुंच गई, जहां वह परी की मूर्ति खड़ी थी।

पर जैसे ही शैफाली ने मूर्ति की ओर बढ़ने की कोशिश की, त्रिशूल वाली जलपरियों ने शैफाली पर हमला कर दिया। यह देख शैफाली परी की मूर्ति से दूर हट गई।

“बिना किसी अस्त्र के मैं इन जलपरियों का मुकाबला नहीं कर सकती। मुझे कुछ और ही सोचना पड़ेगा?” यह सोच शैफाली ने अपनी नजरें चारो ओर दौड़ाईं, पर उसे आसपास लगे कुछ लाल रंग के फूलों के सिवा कुछ नजर नहीं आया।

अब शैफाली परेशान होकर आसपास तैरने लगी। तभी शैफाली को झील की तली में एक मूंगे की दीवार के पीछे लिखे कुछ शब्द दिखाई दिये।

शैफाली ने उत्सुकता वश मूंगे की दीवार को अपने हाथों से साफ कर दिया।

अब वहां लिखे शब्द बिल्कुल साफ दिखाई दे रहे थे-
“भौंरा जब बन जाये भंवर,
थिरक उठेंगे हिम के स्वर”

“ये कैसी पहेली है?” इस पानी में भौंरा कहां से आयेगा?” अब शैफाली अपनी नजरें चारो ओर घुमाने लगी।

तभी उसकी नजरें उन फूलों पर जाकर टिक गई, जिनका रंग और आकार पानी से मैच नहीं कर रहा था।

“भौंरा तो फूलों के पास ही पाया जाता है, अब अगर फूल यहां हैं, तो अवश्य ही भौंरा भी कहीं ना कहीं होगा ?” अब शैफाली एक-एक फूलों को ध्यान से देखने लगी।

“यह क्या? यहां लगे सभी फूल खिले हुए हैं, जबकि उसी के आकार के एक फूल ने अपनी पंखुड़ियों को बंद कर रखा है।”

शैफाली ने अब उस बंद फूल की पंखुड़ियों को अपने हाथों से खोलना शुरु कर दिया।

अभी शैफाली ने 5 से 6 पंखुड़ियां ही खोली थीं कि तभी उन पंखुड़ियों के बीच से एक काले रंग का बड़ा भौंरा निकला और उस परी की मूर्ति के पास पहुंचकर तेजी से चारो ओर चक्कर लगाने लगा।

भौंरे के नाचने की गति बढ़ती जा रही थी और इसी के साथ उस स्थान पर पानी में एक भंवर बनती जा रही थी। यह देख शैफाली उस भंवर से थोड़ा दूर हट गई।

कुछ ही देर में भंवर ने सभी जलपरियों को अपनी चपेट में ले लिया।

वह जलपरियां कहां जाकर गिरीं, कुछ पता नहीं चला, पर कुछ देर बाद जब भंवर शांत हुई, तो झील के पानी में वह परी जीवित खड़ी थी और उसके आसपास का पानी, परी की पोशाक के समान बैंगनी हो गया था।

यह देख शैफाली उस परी के पास पहुंच गई। परी अब बहुत ध्यान से शैफाली को देख रही थी।

शैफाली को ऐसा लगा कि जैसे वह परी कुछ कहना चाह रही हो, पर पानी की वजह से कुछ कह नहीं पा रही हो, इसलिये शैफाली ने उस परी को अपने पीछे आने का इशारा किया और स्वयं झील की सतह के ऊपर की ओर चल दी।

शैफाली के साथ किसी परी को झील के पानी से निकलता देख सभी ने उन्हें घेर लिया। परी इतने सारे लोगों को अपने पास देख काफी उत्साहित हो गई।

“शायद तुम पानी में कुछ कहना चाह रही थी, पर कह नहीं पा रही थी।....क्या तुम हमारी भाषा समझ सकती हो?” शैफाली ने परी से कहा।

पर परी ने जवाब देने की जगह, शैफाली को देखते हुए उसे छूना शुरु कर दिया।

वह कभी शैफाली के बाल को तो कभी शैफाली चेहरे को छूकर देख रही थी।

ऐसा लग रहा था कि जैसे वह शैफाली को छूकर कुछ महसूस करना चाह रही हो।

शैफाली को परी से कुछ पॉजिटिव फीलिंग आती दिखी, अब शैफाली से रहा नहीं गया और शैफाली ने उस परी से पूछ ही लिया- “ये तुम मुझे छूकर क्यों देख रही हो?”

“दरअसल मैंने कभी इंसान को महसूस नहीं किया, इसलिये ऐसा कर रहीं हूं।” परी ने कहा।

“क्या मतलब! क्या तुम कैश्वर की बनाई रचना नहीं हो?” शैफाली ने आश्चर्य से कहा।

“कौन कैश्वर? मैं किसी कैश्वर को नहीं जानती, मुझे तो बस इतना पता है कि मुझे इन जलपरियों ने मूर्ति बनाकर, इस झील में कैद कर दिया था और मैं आपकी वजह से आज इस जगह से निकल आयी।” परी ने कहा।


जारी रहेगा_____✍️

यह अपडेट कहानी को दो अलग-अलग सिरों से आगे बढ़ाता है—एक तरफ शलाका के अतीत का रहस्योद्घाटन और दूसरी तरफ तिलिस्मा के भीतर शैफाली का साहसिक कारनामा।

शलाका का अतीत और 'आर्केडिया' का रहस्य
इस भाग में आपने फैंटेसी और साइंस-फिक्शन का बेहतरीन मिश्रण पेश किया है। शलाका द्वारा जेम्स को बताई गई कहानी कई चौंकाने वाले खुलासे करती है:
* अटलांटिस और पोसाइडन: ग्रीक पौराणिक कथाओं को 'काला मोती' और 'तिलिस्मी अंगूठी' के साथ जोड़ना दिलचस्प है। यह शलाका के चरित्र को एक दैवीय और प्राचीन गहराई देता है।
* शक्तियों का भ्रम: यह जानना काफी रोचक था कि शलाका के भाइयों के पास कोई वास्तविक शक्ति नहीं थी, बल्कि यह केवल उनकी माँ का फैलाया गया एक भ्रम था। यह राजनीति और अस्तित्व की लड़ाई को बखूबी दर्शाता है।
* आर्केडिया जिसे अब तक एक महल या गुप्त ठिकाना समझा जा रहा था, उसका एक अंतरिक्ष यान निकलना कहानी का सबसे बड़ा 'ट्विस्ट' है। इससे कहानी का स्केल अंटार्कटिका की बर्फ से उठकर ब्रह्मांडीय स्तर पर पहुँच गया है।
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2. वेदालय और आर्यन-आकृति का त्रिकोण
शलाका के वर्णन से आर्यन, आकृति और शलाका के बीच के संघर्ष की पृष्ठभूमि और साफ हुई है।
* आकृति का विलेन बनना और आर्यन का आत्मदाह करना कहानी में इमोशनल वेट जोड़ता है।
* अमृतपान की घटना यह स्पष्ट करती है कि शलाका और उसके भाइयों की दीर्घायु का राज क्या है।
* शलाका का जेम्स को ट्रेनिंग देना संकेत देता है कि जेम्स भविष्य में 'आर्केडिया' का पायलट बन सकता है।
3. तिलिस्मा: शैफाली की बुद्धिमत्ता
कहानी का दूसरा हिस्सा एक्शन और पहेलियों से भरा है। यहाँ शैफाली एक 'लीडर' के रूप में उभरती है:
* मिसगर्न मछली का प्रयोग: कंटक को उठाने के लिए मछली की खाल के दस्ताने बनाना शैफाली की चतुराई को दर्शाता है। यह हिस्सा काफी 'क्रिएटिव' था।
* सेन्टौर की पराजय: बिना किसी बड़े युद्ध के, केवल दिमाग का इस्तेमाल कर सेन्टौर को बर्फ की मूर्ति बनाना एक संतुष्टिदायक मोमेंट था।
* झील की पहेली: "भौंरा जब बन जाये भंवर..." वाली पहेली क्लासिक तिलिस्मी कहानियों की याद दिलाती है। जलपरियों के खतरे को जिस तरह भंवर के जरिए टाला गया, वह काफी सिनेमैटिक था।

4. नई परी का प्रवेश: अंत में झील से निकली परी का किरदार एक नया रहस्य पैदा करता है। उसका यह कहना कि वह 'कैश्वर' को नहीं जानती, यह संकेत देता है कि तिलिस्मा के भीतर भी कुछ ऐसी शक्तियाँ या रचनाएँ हैं जो मुख्य रचयिता के नियंत्रण से बाहर हैं। परी की मासूमियत और उसका इंसानी स्पर्श को महसूस करना एक सुंदर दृश्य था।👌🏻

यह अपडेट जानकारी और एक्शन का एक संतुलित पैकेज है। जहाँ एक ओर शलाका के हिस्से में हमें कहानी का 'बैकग्राउंड' पता चला, वहीं शैफाली के हिस्से ने वर्तमान की चुनौती को सुलझाया। 👍

क्या जेम्स आर्केडिया उड़ा पाएगा? और क्या यह नई परी ऐलेक्स को बचा पाएगी?
खैर शानदार अपडेट है भाई 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻
 

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#177.

“शैफाली, पहले क्या तुम मुझे बताओगी कि यह सब क्या हो रहा है?” सुयश ने बीच में ही शैफाली को टोकते हुए कहा।

शैफाली ने जल्दी-जल्दी झील के अंदर की सारी घटना सुयश सहित सभी को सुना दी। इसके बाद वह फिर परी की ओर घूम गई।

“क्या तुम बता सकती हो कि तुम्हारा नाम क्या है? और तुम यहां कैद होने से पहले कहां रहती थी?” शैफाली ने फिर परी से एक सवाल कर दिया।

“मेरा नाम...मेरा नाम मुझे याद नहीं आ रहा। यहां तक कि मुझे यह भी याद नहीं कि मैं कहां रहती थी, बस मुझे इतना पता है कि मेरे पास हिम के स्वर हैं और उनके द्वारा मैं जादू कर सकती हूं।” परी ने कहा।

“हिम के स्वर?” तभी शैफाली को कविता की दूसरी पंक्ति याद आ गई- “थिरक उठेंगे हिम के स्वर।”
यह सोच शैफाली ने उस परी से कहा- “जरा हमें भी तो हिम के स्वर का जादू दिखाओ। हम तो देखें कि तुममें कितनी प्रतिभा है?”

शैफाली के यह कहते ही उस परी ने अपने हाथ में पकड़े राजदण्ड को हवा में हिलाया। परी के ऐसा करते ही, उसके राजदण्ड में आगे लगे बैंगनी मोती से, कुछ किरणें हवा में निकलीं और इसी के साथ हवा में एक बैंगनी रंग की तितली प्रकट हो गई।

वह तितली जैसे-जैसे अपने पंख हिला रही थी, वातावरण में गुलाबी रंग के अजीब से फाहे फैलते जा रहे थे।

इसी के साथ बर्फ से अजीब से मधुर स्वर निकल कर वातावरण में गूंजने लगे।

जैसे ही वह स्वर ऐलेक्स के कानों में पड़े, ऐलेक्स के शरीर की बर्फ पिघलने लगी। कुछ ही देर में ऐलेक्स बिल्कुल सही हो गया।

जैसे ही ऐलेक्स सही हुआ, वह परी चीख उठी- “मुझे बचा लो...मुझे कुछ हो रहा है, मैं मरना नहीं चाहती, मैं यहां से बाहर जाना चाहती हूं।”

तभी परी का शरीर हवा में धुंआ बनकर उड़ गया, अब बस हवा में उसकी चीखें बचीं थीं।

वातावरण से भी अब बैंगनी रंग पूरी तरह से गायब हो चुका था।

शैफाली को छोड़ किसी की समझ में नहीं आया कि उस परी के साथ क्या हुआ? और वह गायब होकर कहां चली गई।

परी को गायब होता देख, शैफाली की पेशानी पर बल पड़ गये। अब उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ नजर आनें लगीं।

यह देख सुयश ने शैफाली से पूछ लिया- “ये परी अचानक से कहां गायब हो गई? उसे उसका अतीत याद क्यों नहीं आ रहा था? और तुम्हारे चेहरे पर यह चिंता की लकीरें क्यों हैं शैफाली?”

“कैप्टेन अंकल, कुछ तो गलत हो रहा है तिलिस्मा में?...जो मुझे चिंता में डाल रहा है” शैफाली ने चिंतित स्वर में कहा- “दरअसल यह परी कैश्वर का ही बनाया हुआ तिलिस्मा का एक प्रोजेक्ट थी, जो कि अपना
कार्य समाप्त करके स्वतः गायब हो जाती, पर जाने कैसे इस परी को ये महसूस होने लगा, कि वह एक जीवित परी है और इसने अपने कार्य को अपनी कहानी बना लिया। ऐसा तभी हो सकता है, जबकि कैश्वर के बनाये इन प्राणियों में अपने आप भावनाएं आ जाएं।

“अगर इन प्राणियों में भावनाएं आ गईं, तो यह अपना कार्य करना छोड़ एक स्वतंत्र प्राणी की भांति जीने को सोचने लगेंगे और यह स्थिति पूरी पृथ्वी के लिये खतरनाक हो जायेगी। क्यों कि यह काल्पनिक प्राणी, तब जीवित प्राणियों से युद्ध करना शुरु कर देंगे और पृथ्वी का जीवनचक्र खराब कर देंगे। मुझे नहीं पता कि अभी ये भावना एक ही प्राणी में थी या फिर सभी में आ गई है। क्यों कि अगर यह भावना सभी तिलिस्मा के प्राणियों में आ गई, तो वह प्राणी नियमों के विरुद्ध जाकर हमें इस तिलिस्मा को पार नहीं करने देंगे, क्यों कि हमारे द्वार पार करते ही वह स्वतः खत्म हो जायेंगे।”

“मुझे तो लगता है कि कैश्वर को ईश्वर बनने की कुछ ज्यादा ही जल्दी है, इसलिये वह जान बूझकर सभी प्राणियों में भावनाएं डाल रहा है, जिससे हम इस तिलिस्मा को पार नहीं कर सकें।” सुयश ने गुस्साते हुए कहा।

“चलो, फिलहाल इस द्वार को पार करते हैं फिर आगे की बाद में सोचेंगे।” तौफीक ने सबको याद दिलाते हुए कहा।

“इस द्वार की सभी चीजें तो समाप्त हो गईं, फिर भी अभी तक हमें यहां से निकलने का दरवाजा क्यों नहीं मिला?” जेनिथ ने चारो ओर देखते हुए कहा।

तभी शैफाली की नजर जमीन पर गिरी, एक लाल रंग की गोल सी वस्तु पर गई, जो कि एक कंचे के समान था।

शैफाली ने आगे बढ़कर उसे ध्यान से देखा। वह कंचा नहीं बल्कि उसी मिसगर्न मछली की आँख थी, जिसकी खाल से शैफाली ने दस्ताने बनाये थे।

“जब सबकुछ गायब हो गया, तो यह आँख अभी तक क्यों गायब नहीं हुई?” यह सोच शैफाली ने आगे बढ़कर उस मछली की आँख को उठा लिया।

पर जैसे ही शैफाली ने उस आँख को जमीन से उठाया, उस आँख का आकार तेजी से बढ़ने लगा।

यह देख शैफाली ने घबराकर उस मछली की आँख को अपने हाथों से छोड़ दिया।

जमीन पर गिरते ही वह आँख फिर से सामान्य आकार की हो गई। शैफाली ने दोबारा से उसे उठाने की कोशिश की, परंतु फिर से वह आँख बड़ी होने लगी। शैफाली ने दोबारा उस आँख को जमीन पर छोड़ दिया।

यह देख ऐलेक्स ने गुस्साते हुए उस मछली की आँख को उठाकर ऊपर आसमान में उछाल दिया- “अरे फेंको इसे...यह मछली की नहीं, बल्कि शैतान की आँख है।”

अब वह मछली की आँख तेजी से आसमान की ओर जा रही थी और हर अगले पल में आकार में दुगनी होती जा रही थी।

कुछ ही देर में वह आँख अधिकतम ऊंचाई तक पहुंच गई। परंतु अब उसका आकार किसी ग्रह के बराबर हो गया था और अब वह सब पर गिरने के लिये नीचे आ रही थी।

“हे भगवान ये क्या बला है?” क्रिस्टी ने गुर्राते हुए कहा- “अब यह मछली की आँख, हम सबकी माँ की आँख करने वाली है।”

किसी के पास ना तो बचने का कोई उपाय था और ना ही छिपने की जगह। कुछ ही पलों में वह मंगल ग्रह के समान मछली की आँख उन सब पर आ गिरी।

सभी की आँखें डर के मारे बंद हो गईं और उनके मुंह से चीख निकल गई। जब सबकी आँखें खुलीं तो वह वापस पृथ्वी के ग्लोब वाले स्थान पर थे।

“वह तिलिस्मा के उस भाग से बाहर निकलने का द्वार था?” सुयश ने आश्चर्य से कहा- “भगवान बचाये ऐसे द्वार से....मुझे तो लगा कि अब हम सबका काम खत्म हो गया।”

“चलो दोस्तों, अब तिलिस्मा के चौथे भाग के आखिरी द्वार की ओर चलते है, जहां हमें ग्रीनलैंड जाकर वसंत ऋतु की बाधा को दूर करना है।” जेनिथ ने कहा।

अब सभी पृथ्वी के ग्लोब की ओर एक बार फिर से बढ़ गये।


विद्युम्ना का रहस्य:
(2 दिन पहले...... 15.01.02, मंगलवार, 07:30, महावृक्ष, सामरा राज्य, अराका द्वीप)

व्योम, त्रिकाली, युगाका और कलाट महावृक्ष के सामने खड़े थे।

“हे महावृक्ष हमारे परिवार की नयी अमरबेल को आपके आशीर्वाद की जरुरत है। अतः नये वर-वधू को अपने आशीर्वाद से कृतार्थ करें।” कलाट ने महावृक्ष को देखते हुए कहा।

“महाशक्ति के रक्षक को हम पहले ही आशीर्वाद दे चुके है कलाट।” महावृक्ष की आवाज वातवरण में गूंजी- “अब तो बस इनके प्रेम की परीक्षा का समय है।”

“परीक्षा ? कैसी परीक्षा महावृक्ष?” युगाका ने आश्चर्य से महावृक्ष को देखते हुए कहा।

“ठीक वैसी ही, जैसी मैंने बचपन में तुम्हारी परीक्षा ली थी।” महावृक्ष ने कहा।

युगाका अपनी बचपन की परीक्षा को याद कर सिहर उठा, अचानक से उसे अपने शरीर के जलने का अहसास याद आ गया।

“हम किसी भी प्रकार की परीक्षा देने को सहर्ष तैयार है महावृक्ष।” व्योम ने आगे बढ़ते हुए कहा।

“तो फिर ठीक है, तैयार हो जाओ, इस विषम परीक्षा के लिये।” अचानक महावृक्ष की आवाज बहुत तेज हो गई।

ऐसा लगा जैसे महावृक्ष बहुत क्रोध में आ गया हो। अचानक से व्योम और त्रिकाली के सामने से कलाट और युगाका गायब हो गये और महावृक्ष ने अपने शरीर को विकराल कर लिया।

अब व्योम और त्रिकाली को अपना शरीर हवा में उड़ता हुआ दिखाई दिया।

इसी के साथ व्योम और त्रिकाली महावृक्ष की कोटर से होते हुए उसके अंदर समा गये। अंदर इतनी तीव्र रोशनी थी कि दोनों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

धीरे-धीरे रोशनी कम होने लगी, अब त्रिकाली और व्योम ने अपने चारो ओर देखा, उनके सामने आसमान में विशाल रुप में विद्युम्ना के चेहरा दिख रहा था।

नीचे जमीन पर, एक काँच की ट्यूब में त्रिशाल और कलिका बंद थे। उस काँच की ट्यूब के सामने 3 व्यक्ति खड़े थे। एक व्यक्ति जल से निर्मित एक जलमानव लग रहा था।

दूसरा व्यक्ति एक 20 फुट का शक्तिशाली दानव था, जिसने अपने हाथ में कुल्हाड़ा पकड़ रखा था और तीसरा व्यक्ति एक मरियल सा सुकड़ी हड्डी वाला एक बालक था।

“हा ऽऽऽ हा ऽऽऽऽ हा ऽऽऽऽ तो तुम दोनों आये हो विद्युम्ना का विनाश करने।” विद्युम्ना ने हंसते हुए कहा- “जब 2 दिव्य शक्तियों के पास होने के बावजूद भी तुम्हारे माता-पिता मेरा कुछ नहीं कर पाये, तो तुम बच्चे लोग क्या कर पाओगे?”

“यह हम सीधे विद्युम्ना के पास कैसे पहुंच गये? महावृक्ष तो हमारी परीक्षा लेने जा रहे थे।” व्योम ने फुसफुसा कर त्रिकाली से पूछा।

“मुझे भी नहीं पता, पर महावृक्ष कुछ भी कर सकते हैं?” त्रिकाली ने व्योम के समीप जाते हुए कहा।

“तो आओ, जो काम कल करना था, वह आज ही करते हैं।” व्योम ने अपने दाँत भींचते हुए कहा और इसी के साथ व्योम के हाथ में पंचशूल प्रकट हो गया।

त्रिकाली के भी दोनों हाथ बर्फ से भर गये।

“मेरे पास महादेव की दी हुई त्रिशक्ति की ताकत है, जिसे तुम कभी परास्त नहीं कर सकते व्योम।” विद्युम्ना ने हंसते हुए कहा- “तुम्हें पहले मेरी जल शक्ति से टकराना होगा।”

इतना कहते ही विद्युम्ना की आँखों से एक तरंग निकली और इसी के साथ जलमानव, एक छोटी सी झील के ऊपर खड़ा दिखाई देने लगा।

“तुम्हें इस जलमानव से इस झील के ऊपर ही लड़ना होगा व्योम। इस जलमानव की शक्ति जल ही है और तुम्हें इसे हराना भी जल के ही ऊपर होगा।” विद्युम्ना ने कहा।

यह देख व्योम उछलकर जल की सतह पर जा खड़ा हुआ- “ठीक है, तो फिर मैं इसे जल के ऊपर ही परास्त करुंगा।”

त्रिकाली हैरानी से व्योम को जल के ऊपर चलते हुए देख रही थी, त्रिकाली को व्योम की इस शक्ति के बारे में कुछ नहीं पता था।

यह व्योम की गुरुत्व शक्ति का कमाल था, जिसकी वजह से वह जल की सतह पर गुरुत्वाकर्षण से मुक्त हो खड़ा था।

जलमानव ने व्योम को जल के ऊपर आते देख, व्योम पर जल की बूंदों से प्रहार किया। उन बूंदों के शरीर पर पड़ते ही व्योम का शरीर कई जगह से जल गया, पर पंचशूल ने तुरंत ही व्योम के शरीर को सही कर दिया।

अब व्योम ने पंचशूल को फेंककर, जलमानव का सिर धड़ से अलग कर दिया। पर जलमानव का सिर तुरंत से वापस जुड़ गया। यह देख व्योम ने इस बार पंचशूल को हवा में गोल-गोल नचा कर फेंका।

पंचशूल ने पंखे की तरह से घूमते हुए जलमानव के शरीर के असंख्य टुकड़े कर झील में दूर-दूर तक फेंक दिये। पर कुछ ही देर में झील के जल ने सभी टुकड़ों को जोड़कर जलमानव को फिर से खड़ा कर दिया।

यह देख व्योम ने त्रिकाली को एक इशारा किया। इस बार जैसे ही जलमानव पूरी तरह से जुड़ा, त्रिकाली ने अपनी बर्फ की शक्तियों से जलमानव को पूरा का पूरा जमा दिया।

जलमानव को जमते देख व्योम ने एक बार फिर पंचशूल का उपयोग कर जलमानव के टुकड़े कर दिये, पर जैसे ही वह सभी बर्फ के टुकड़े पानी के सम्पर्क में आये, वह फिर से पिघलकर जलमानव का रुप लेने
लगे।

अब व्योम को यह मुसीबत थोड़ी बड़ी दिखने लगी थी। इस बार जैसे ही जलमानव सही हुआ, व्योम ने अपने पंचशूल से ऊर्जा का एक तेज प्रहार जलमानव पर किया।

इस ऊर्जा ने अग्नि के रुप में जलमानव को पिघलाकर पूर्णतया भाप में परिवर्तित कर दिया।

अब वह भाप झील के पानी से मिक्स नहीं हो सकती थी, यह देख व्योम के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई।

उसने मान लिया कि जलमानव अब खत्म हो गया। पर कहते हैं ना, कि जो सोचो, वह चीज उस हिसाब से होती नहीं है और यह कहावत यहां पूरी तरी के से चरितार्थ हो रही थी।

हवा में तैर रहे उन भाप के कणों ने आपस में मिलकर एक बादल का रुप ले लिया और बारिश बनकर वापस झील के पानी में मिल गये।

यह देख विद्युम्ना की हंसी फिर से वातावरण में गूंज गई- “यह जलमानव महा…देव की शक्ति से निर्मित है व्योम, यह इतनी आसानी से समाप्त नहीं होगा।”

जलमानव एक बार फिर जल की सतह पर खड़ा हो गया था।

इस बार व्योम ने अपना बांया हाथ जलमानव की ओर कर हवा में लहराया, पर व्योम के इस प्रहार से जलमानव को कुछ होता दिखाई नहीं दिया? अब एक बार फिर व्योम ने त्रिकाली की ओर देखकर मदद मांगी।

त्रिकाली ने फिर से जलमानव के शरीर को बर्फ में विभक्त कर दिया। इस बार व्योम ने आगे बढ़कर एक प्रचण्ड घूंसा उस जलमानव के सिर पर मार दिया।

जलमानव हर बार की तरह फिर खण्ड-खण्ड हो बिखर गया। पर इस बार जलमानव का शरीर पानी से नहीं मिला, वह बर्फ के सारे टुकड़े अब जल की सतह से कुछ ऊपर हवा में तैर रहे थे।

यह देख विद्युम्ना आश्चर्य से भर उठी- “यह कौन सी शक्ति है व्योम?”

“यह गुरुत्वाकर्षण को मुक्त करने वाली शक्ति है, अब इस शक्ति के माध्यम से यह बर्फ के टुकड़े पानी से कभी नहीं मिल सकते, यह इसी प्रकार से हवा में घूमते रहेंगे।” व्योम ने कहा- “अब दूसरी शक्ति को भेजो विद्युम्ना....मैं आज सभी को हराकर त्रिकाली के माता-पिता को यहां से ले जाऊंगा।”

यह देख विद्युम्ना ने उस दानव को अब व्योम से लड़ने के लिये भेज दिया - “यह मेरी बल शक्ति है, इसके बराबर का बल दुनिया में किसी के पास नहीं है और इस पर तुम्हारे पंचशूल का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके सामने तुम्हारा पंचशूल मात्र एक साधारण अस्त्र की तरह है। परंतु तुम्हें इससे जल पर नहीं, जमीन पर लड़ना होगा।”

उस दानव ने अब व्योम पर अपने कुल्हाड़े से आक्रमण कर दिया। व्योम ने उस दानव का वार अपने पंचशूल पर रोक लिया। अब व्योम ने पंचशूल को हवा में नचाते हुए दानव पर वार कर दिया, पर उस वार को दानव ने आसानी से बचा लिया।

अब व्योम और दानव के बीच युद्ध शुरु हो गया था। कभी लगता कि व्योम दानव पर भारी पड़ रहा है, तो कभी दानव व्योम पर भारी पड़ते दिखाई देता।

त्रिकाली मात्र दर्शक बनी उस युद्ध को निहार रही थी। लगभग आधा घंटा ऐसे ही लड़ते रहने के बाद, व्योम समझ गया कि उस दानव को ऐसे नहीं हराया जा सकता।

“अवश्य ही इस दानव के पास कोई ऐसी चमत्कारी शक्ति है? जो यह प्रयोग कर रहा है, पर मुझे वह दिखाई नहीं दे रही है” व्योम अपने मन ही मन में बड़बड़ाया- “विद्युम्ना इस दानव को ‘बल’ कह कर सम्बोधित कर रही थी, कहीं इसके नाम में ही तो कोई रहस्य नहीं छिपा?”

यह सोच अब व्योम लड़ते हुए उस दानव को ध्यान से देखने लगा। कुछ ही देर में व्योम ने उस दानव की एक आदत को पकड़ लिया और वह आदत थी कि कुछ देर लड़ने के बाद वह दानव अपने पैर को जमीन पर मार रहा था।

“यह बार-बार अपने पैर को जमीन पर मार रहा है, कहीं ये पृथ्वी से कोई शक्ति तो नहीं ले रहा।“ अब व्योम के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई थी।

व्योम को मुस्कुराते देख त्रिकाली ने कहा- “दिमाग खराब हो गया है क्या? यह तुम मुस्कुराकर क्यों लड़ रहे हो ?”

“क्या तुम न्यूटन को जानती हो?” व्योम ने लड़ते-लड़तें अजीब सा सवाल त्रिकाली से कर लिया।

त्रिकाली ने ‘ना’ में अपना सिर हिला दिया। यह देख व्योम ने उस दानव पर अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति का प्रयोग कर दिया।

अब उस दानव के पैर जमीन को छोड़ हवा में लहराने लगे। अब वह दानव बहुत कोशिश करने के बाद भी आगे नहीं बढ़ पा रहा था।

तभी व्योम ने इस बार उछलकर एक जोर का मुक्का उस दानव के सिर पर मारा, दानव तुरंत वहीं गिर कर बेहोश हो गया।

यह देख विद्युम्ना आश्चर्य से भर उठी- “यह तुमने कैसे किया व्योम?”

“पृथ्वी के एक महान वैज्ञानिक ने कहा था कि बल हमेशा द्रव्यमान (भार) और उसके त्वरण (गति) पर निर्भर होता है। यानि की अगर हमारा वजन जितना ज्यादा हो, हम अपनी गति से उतना बल उत्पन्न कर सकते हैं, तो बस मैंने उन्हीं वैज्ञानिक के कथनों को विचार करते हुए, अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से इस दानव के भार को ही समाप्त कर दिया। अब जब किसी का भार ही नहीं बचा, तो उसमें बल कहां से आयेगा? और एक बलरहित दानव को मारने में ज्यादा समय तो लगना नहीं था।”

“बहुत अच्छे।” विद्युम्ना ने व्योम की तारीफ करते हुए कहा- “अब जरा मेरी तीसरी शक्ति से भी निपट लो।”

अब व्योम की नजर विद्युम्ना की तीसरी शक्ति की ओर गई। उस दुबले-पतले बालक को देख व्योम के चेहरे पर हंसी आ गयी- “ये भी लड़ेगा क्या?”

तभी वह बालक धीरे-धीरे व्योम की ओर बढ़ने लगा। व्योम पहले देखना चाहता था कि यह बालक कैसा है? इसलिये व्योम ने उसे कुछ नहीं कहा।

पास आकर उस बालक ने अपना जोर का घूंसा व्योम के पेट में मारा, पर व्योम को उस बालक का घूंसा गुदगुदी के समान महसूस हुआ।

बालक ने अपना मुंह बनाकर, दुखी भाव से विद्युम्ना की ओर देखा और फिर एक बार जोर का हाथ लहरा कर अपना घूंसा व्योम के पेट में मारा, बालक के इस वार से व्योम हवा में उड़ता हुआ 100 फुट से भी
ज्यादा दूर गिरा।

व्योम का पूरा शरीर दर्द से कराह उठा। व्योम को अब अपनी गलती का अहसास हो रहा था। व्योम धीरे से उठकर खड़ा हो गया।

उसने अब अपनी निगाह उस बालक पर डाली, पर तब तक बालक ने त्रिकाली को पकड़कर एक काँच के आदमकद बर्तन में डाल दिया, जो कि हवा में उल्टा लटका था और उस बर्तन का ढक्कन बंद था।

अब त्रिशाल, कलिका और त्रिकाली, तीनो अलग-अलग काँच के बर्तन में हवा में टंगे थे। उनके नीचे जमीन पर एक चाकुओं का बिस्तर सा बना था।

साफ दिख रहा था कि अगर कोई भी उस काँच के बर्तन से गिरा, तो वह सीधे उन धारदार चाकुओं पर गिरेगा।

“कैसा लगा व्योम मेरी छल शक्ति का कमाल?” विद्युम्ना ने कहा- “अब इन तीनों काँच के बर्तनों का बटन मेरे पास है। मैं तीनों बर्तनों का ढक्कन एक साथ खोलूंगी। मेरे ढक्कन खोलते ही तीनों एक साथ इन चाकुओं पर गिरेंगे। अब तुम इन तीनों में से किसी एक को ही बचा सकते हो। और मुझे जानना है कि तुम इन तीनों में से किसे बचाते हो?”

व्योम के पास समय नहीं था सोचने का। अतः उसने एक पल में अपना निर्णय ले लिया।

व्योम अब तेजी से उन चाकुओं की ओर भागा। उसे भागते देख विद्युम्ना ने अपने हाथ में पकड़े यंत्र का बटन दबा दिया।

बटन के दबते ही तीनों शरीर हवा में लहराकर नीचे की ओर जाने लगे। इसी के साथ व्योम किसी को भी बचाने की जगह, उन चाकुओं पर स्वयं लेट गया।

तीनों शरीर व्योम के ऊपर आकर गिरे। अब तीनों लोग तो बच गये थे, पर उनके भार की वजह से सारे चाकू व्योम के शरीर में घुस गये।

यह देख त्रिकाली के मुंह से चीख निकल गई, लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कर पाती, रोशनी का एक तेज झमाका हुआ और त्रिकाली की आँखें बंद हो गईं, जब त्रिकाली की आँखें खुलीं, तो वह और व्योम दोनों ही सकुशल हालत में महावृक्ष के सामने खड़े थे और उनके बगल कलाट और युगाका वैसे ही खड़े थे, जैसा कि वह लोग उन्हें छोड़ कर गये थे।

व्योम और त्रिकाली हैरानी से अपने चारो ओर त्रिशाल व कलिका को ढूंढने लगे।

तभी वातावरण में महावृक्ष की आवाज गूंजी- “कलाट, मेरी परीक्षा पूर्ण हुई, अब व्योम और त्रिकाली विद्युम्ना से टकराने के लिये तैयार हैं।”

“क्या मतलब? क्या यह सिर्फ परीक्षा थी?” व्योम ने उलझे-उलझे से स्वर में पूछा।

“हां व्योम।” महावृक्ष ने कहा- “ये विद्युम्ना, उसकी शक्तियां और त्रिकाली के माता-पिता सब मेरे द्वारा फैलाया भ्रमजाल था। मैं तुम्हें यह दिखाना चाहता था, कि विद्युम्ना कितनी खतरनाक हो सकती है? मैंने अपने भ्रमजाल का निर्माण ठीक उसी प्रकार किया था, जैसे कि विद्युम्ना अपने भ्रमन्तिका का करती है। मुझे ये नहीं पता कि उसकी जल, बल और छल की शक्ति किस प्रकार होगी? पर मैंने तुम्हें अपने भ्रमजाल के माध्यम से समझाना चाहा है कि वह शक्तियां किसी भी प्रकार से हो सकती हैं? इसलिये तुम्हें हर कदम पर सावधान रहना होगा। ......अब तुम यह बताओ व्योम, कि तुम्हें मेरे भ्रमजाल से क्या सीखने को मिला?”

“मैंने सीखा कि शत्रु के चेहरे और उसके शरीर की काया देखकर, उसकी शक्ति का अंदाजा नहीं लगाना चाहिये। छल शक्ति ने मुझे इसी कारण पराजित किया था क्यों कि मैंने उसके शरीर को देखकर उसकी शक्तियों का गलत आंकलन किया था।” व्योम ने कहा।

“बिल्कुल सही व्योम...पर तुमने भ्रमजाल में एक और गलती की थी, जो तुम्हें अभी तक समझ में नहीं आयी?” महावृक्ष ने कहा- “तुम्हें अपनी शक्तियों के बारे में शत्रु को कभी नहीं बताना है, भले ही वह तुम्हारी कितनी भी तारीफ करते हुए पूछे। दरअसल विद्युम्ना की सबसे खास बात यही है, वह पहले लोगों को शब्दजाल से भ्रमित कर, या फिर उनकी किसी प्रकार से परीक्षा ले, उनकी शक्तियों के बारे में जान जाती है और फिर उनके शक्तियों को देखकर ही वह नये भ्रमन्ति का का निर्माण करती है। तो एक बात हमेशा ध्यान रखना, जब तक तुम उसके सामने ना पहुंच जाओ, तब तक अपनी, किसी एक शक्ति का प्रयोग मत करना, वहीं शक्ति अंत में तुम्हें विजय दिलायेगी।”

“जी महावृक्ष, मैं इस बात का ध्यान रखूंगा।” व्योम ने हाथ जोड़कर महावृक्ष को प्रणाम करते हुए कहा।

“तुमने तो देख ही लिया कलाट कि व्योम ने अंतिम समय में किसी एक को ना बचाकर, सभी को बचाने का प्रयत्न किया और यह एक महाशक्ति धारक की सबसे बड़ी निशानी है। त्रिकाली का चयन उत्तम है।” महावृक्ष ने कलाट की ओर देखते हुए कहा।

“जी महावृक्ष, अब आज्ञा दीजिये। त्रिकाली और व्योम को आज ही हिमालय की ओर प्रस्थान करना है।” कलाट ने महावृक्ष को प्रणाम करते हुए कहा और सभी को लेकर सामरा राज्य के महल की ओर चल दिया।

रास्ते भर त्रिकाली के कानों में महा वृक्ष के कहे शब्द गूंज रहे थे- “त्रिकाली का चयन उत्तम है।“

अब वह धीरे-धीरे मुस्कुराकर बीच-बीच में कनखियों से व्योम को देख ले रही थी।


जारी रहेगा_____✍️

रिव्यू: Update #177 रहस्यों, रोमांच और भावनाओं का एक बेहतरीन मिश्रण है। कहानी दो अलग-अलग छोरों पर चल रही है, जहाँ एक तरफ शैफाली का दल 'तिलिस्मा' की गुत्थियों को सुलझा रहा है, वहीं दूसरी ओर व्योम और त्रिकाली 'महावृक्ष' की कठिन परीक्षा से गुजर रहे हैं।

इस भाग में शैफाली का डर बहुत तार्किक और गहरा है। कैश्वर द्वारा बनाए गए 'काल्पनिक प्राणियों' में भावनाओं का पैदा होना एक System Malfunction की तरह है।
* दार्शनिक पहलू: यह हिस्सा 'Artificial Intelligence' के आत्म-जागरूक होने जैसा अहसास कराता है। अगर तिलिस्मा के पात्रों को अपनी मौत (गायब होने) का डर लग गया, तो वे विद्रोह करेंगे, जो पृथ्वी के लिए खतरा बन सकता है।

परी का हवा में धुंआ बनकर गायब होना और ऐलेक्स का ठीक होना कहानी में जादुई तत्वों को और मजबूत करता है।

'मिसगर्न मछली' की आँख और बाहर निकलने का द्वार
आपने यहाँ बहुत ही रचनात्मक तरीके से निकास द्वार को दर्शाया है।

"मछली की आँख, हम सबकी माँ की आँख करने वाली है" — यह संवाद तनावपूर्ण माहौल में एक हल्का-फुल्का हास्य डालता है। क्रिस्टी 😁

आँख का आकार ग्रह के समान बढ़ना और फिर अचानक से ग्लोब वाले स्थान पर पहुँच जाना यह दिखाता है कि तिलिस्मा के नियम भौतिक विज्ञान से परे हैं।

महावृक्ष की परीक्षा
यह इस अपडेट का सबसे मजबूत हिस्सा है। व्योम और त्रिकाली की परीक्षा न केवल शारीरिक थी, बल्कि मानसिक और रणनीतिक भी थी।🤔

आपने भौतिक विज्ञान का बहुत सुंदर उपयोग किया है:
* जलमानव: जल को भाप बनाना और फिर गुरुत्वाकर्षण से उसे अलग रखना एक स्मार्ट चाल थी।
* बल (दानव): न्यूटन के नियमों (Force = Mass × Acceleration) का उल्लेख करना व्योम के किरदार को सिर्फ एक 'योद्धा' नहीं बल्कि एक 'बुद्धिमान नायक' बनाता है।
छल और त्याग: उस दुबले बालक (छल शक्ति) द्वारा व्योम को हराना यह सिखाता है कि " appearances can be deceptive" (जो दिखता है वो होता नहीं)। व्योम का खुद चाकुओं पर लेट जाना उसके 'Selfless' (निस्वार्थ) नायक होने के प्रमाण को पुख्ता करता है।😎

महावृक्ष ने व्योम को सबसे बड़ी चेतावनी दी— "शत्रु को अपनी पूरी शक्तियों का पता मत चलने दो।" यह युद्ध नीति का एक स्वर्ण नियम है।👍

अंत में त्रिकाली का व्योम को कनखियों से देखना और महावृक्ष द्वारा उनके रिश्ते (चयन) पर मुहर लगाना कहानी में एक प्यारी सी भावना छोड़ जाता है।🥰

यह अपडेट कथानक को बहुत आगे ले जाता है। अब पाठक यह जानने को उत्सुक हैं कि ग्रीनलैंड में 'वसंत ऋतु' की बाधा कैसी होगी और क्या व्योम सच में विद्युम्ना के 'छल' को मात दे पाएगा?🤔
अती उत्तम अपडेट भाई साहब 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥✨
 
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