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Incest विक्रम की जागीर बहु नव्या

Premkumar65

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कामुक संवाद और सावित्री का पाखंड
स्थान: कोठी का बरामदा
समय: शाम की चाय
नव्या रसोई से बाहर निकली, तो उसकी चाल में एक अजीब सा विरोधाभास था। उसने सिर पर पल्लू ऐसे ओढ़ रखा था जैसे वह कोई सती-सावित्री हो, पर उस पल्लू के नीचे उसका यौवन बगावत कर रहा था। वह जानबूझकर अपनी चाल को थोड़ा तेज और लचकदार बनाकर चल रही थी, जिससे साड़ी के भीतर उसके विशाल बोबे हर कदम के साथ तालबद्ध तरीके से उछल रहे थे। वह ससुर के सामने आकर खड़ी हुई, हाथ में चाय की केतली थी, पर आँखों में वही 'शनि' वाली ठंडी आग अब 'शुक्र' की नमी में बदल चुकी थी।
विक्रम सिंह ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। उनकी नज़रें साड़ी के पल्लू को चीरकर उन थरथराते हुए उभारों पर जाकर ठहर गईं।
नव्या: (अपने गुलाबी होंठों को दांतों तले दबाते हुए, तिरछी नज़र से) "बाबूजी, चाय पी लीजिये। बहुत देर से 'उबाल' खा रही थी... बिल्कुल वैसे ही जैसे आज सुबह कोठी का सन्नाटा उबल रहा था।"
विक्रम सिंह ने एक गहरी सांस ली। नव्या के शब्दों का तीर सीधे उनके 'मूसल' पर लगा।
विक्रम सिंह: "उबाल तो आना ही था नव्या। जब पात्र इतना 'गहरा' और 'मांसल' हो, तो आग को भड़कने में देर नहीं लगती। तुमने तो सुबह अपनी नग्नता से वह ज्वाला सुलगा दी है, जो अब इस कोठी को राख करके ही दम लेगी।"
नव्या ने चाय कप में डाली। केतली झुकाते समय उसने जानबूझकर अपनी कमर को थोड़ा और मोड़ा, जिससे उसकी भारी गांड़ का उभार साड़ी को फाड़ने जैसा तना हुआ दिखा। उसने अपनी नज़रें झुकाईं, पर मुस्कुराहट उसके होंठों पर खेल रही थी।
नव्या: "बाबूजी, आप तो बड़े ज्ञानी हैं। सुना है कि तपस्वी अपनी प्यास रोकने के लिए 'मृगजल' के पीछे नहीं भागते। पर आप तो आज सुबह उस 'मृगजल' को ऐसे देख रहे थे जैसे सदियों के प्यासे हों। क्या हुआ... क्या उस दर्शन से आपकी 'तपिश' शांत नहीं हुई?"
विक्रम सिंह: (कुर्सी पर थोड़ा आगे झुकते हुए, आवाज में एक कामुक गुर्राहट के साथ) "मृगजल नहीं था वह नव्या... वह तो 'अमृत का कुंड' था। और तपस्वी प्यासा नहीं मरता, वह तो बस सही 'मुहूर्त' का इंतज़ार करता है जब वह उस कुंड में डुबकी लगाकर अपनी सारी थकान मिटा सके। तुमने जो आज सुबह दिखाया है, वह सिर्फ एक झलक थी... असली 'भोग' तो अभी बाकी है।"
नव्या ने अपने होंठों को और ज़ोर से दबाया, जैसे वह अपनी उत्तेजना को रोकना चाहती हो। उसने कप आगे बढ़ाया, पर इस बार वह अपनी उंगलियों को उनके हाथ से बचाने के प्रति बहुत सतर्क थी। छूना मना था, पर हवा में फैली कामुकता किसी शारीरिक स्पर्श से ज्यादा भारी थी।
नव्या: "मुहूर्त तो ग्रहों के हाथ में होता है बाबूजी... और मेरी कुंडली के ग्रह बड़े 'कंटीले' हैं। आप सिर्फ देख सकते हैं, पूज सकते हैं... पर पा नहीं सकते। आज सुबह जो दिखा, उसे अपनी आँखों की 'पूंजी' बना लीजिये, क्योंकि ये सावित्री अपने सत्यवान (सुमित) के अलावा किसी और को अपना 'अंग' दान नहीं करती।"
विक्रम सिंह: (एक अट्टहास के साथ) "सावित्री? जो औरत सुबह आधे खुले दरवाजों के सामने नग्न होकर अपनी जवानी का प्रदर्शन करे, वह सावित्री नहीं, वह 'नियति' की दासी है। और याद रखना नव्या... जिस लन्ड को तुमने आज सुबह आँखों से चूमा है, वह अब सिर्फ देखने से तृप्त नहीं होगा। वह अब तुम्हारी इस 'सावित्री' वाली खाल को उतारने का रास्ता ढूंढ ही लेगा।"
नव्या मुड़ी और अपनी भारी गांड़ को मटकाते हुए रसोई की ओर चल दी। उसे पता था कि पीछे खड़ा 'सांड' उसकी देह के हर लटके-झटके को अपनी आँखों से पी रहा है। वह सावित्री बनने का नाटक तो कर रही थी, पर उसकी जांघों के बीच का गीलापन चीख-चीख कर कह रहा था कि उसे इस द्विअर्थी जंग में मज़ा आने लगा है।
Uffff aag bhadak rahi hai.
 

Premkumar65

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शोख चेतावनी और दहकता इंतज़ार
स्थान: रात का सन्नाटा, कोठी का गलियारा
समय: रात के १०:३० बजे
कोठी के भीतर रात की खामोशी अब पहले जैसी नहीं थी; इसमें एक भारीपन था, एक कामुक बोझ। नव्या अपने कमरे की ओर बढ़ रही थी, तभी उसने देखा कि विक्रम सिंह बरामदे के अंधेरे में अपनी आराम कुर्सी पर बैठे हैं। उनके हाथ में एक गिलास था, और आँखों में वही सुबह वाली विकराल भूख। नव्या रुकी, उसने अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक किया, जिससे उसके विशाल बोबों का उभार और भी तिकोना होकर निखर आया।
उसने अपनी कमर पर हाथ रखा, जिससे उसकी भारी गांड़ का एक हिस्सा बाहर की ओर तन गया। उसने एक शोख और कातिलाना मुस्कुराहट के साथ विक्रम की आँखों में झाँका।
नव्या: (शोख और चुटीले अंदाज़ में) "बाबूजी, रात बहुत गहरी है और आपकी नज़रें उससे भी ज्यादा। पर याद रखियेगा... संयम रखना ही आपके हक में है। देखने तक तो ठीक है, देख-देख कर अपनी प्यास बुझा लीजिये, पर छूने का दुस्साहस मत कीजियेगा। वो 'महंगा' पड़ सकता है... और वो गाल वाली बात अभी ज्यादा पुरानी नहीं हुई है, याद है न?"
उसने अपनी उंगली से अपने गाल की ओर इशारा किया, जहाँ उसने एक महीना पहले थप्पड़ जड़ा था। उसकी आवाज़ में एक मिठास थी, पर उसमें 'कट्टर' अडिगता भी साफ़ झलक रही थी।
विक्रम सिंह ने एक गहरी हूक भरी। उनका हाथ उनकी धोती के ऊपर उस विकराल मूसल पर था, जो नव्या की आवाज़ सुनकर और भी सख्त हो गया था।
विक्रम सिंह: (आवाज़ में एक बेबसी और मर्दाना तड़प के साथ) "तो फिर मैं क्या करूँ नव्या? इस आग का क्या करूँ जो तूने सुबह सुलगाई है? क्या मर जाऊँ? या फिर इसे काट कर फेंक दूँ... क्योंकि ये अब मेरी बस में नहीं रहा।"
नव्या ने अपनी गर्दन को एक तरफ झुकाया, उसके गीले बाल उसकी छाती के उतार-चढ़ाव पर बिखरे हुए थे। उसने एक ऐसी नज़रों से उन्हें देखा जो किसी भी मर्द का कत्ल कर दें।
नव्या: (पलटते हुए, चुटीला जवाब देते हुए) "आपकी आप जानें बाबूजी! काटिये या पालिये, ये आपकी जागीर है। मेरा काम तो बस 'मर्यादा' की याद दिलाना था।"
इतना कहकर वह मटकती हुई अपने कमरे की ओर बढ़ी। भागते वक्त उसकी गांड़ के दोनों पट साड़ी के नीचे जिस तरह आपस में रगड़ खा रहे थे, वह किसी अश्लील मंत्र की तरह विक्रम की धड़कनें बढ़ा रहा था। जैसे ही वह कमरे के पास पहुँची, उसने मुड़कर एक आखिरी बार अपने गुलाबी होंठों को दांतों तले दबाया और कमरे के भीतर जाकर 'खटाक' से कुंडी लगा ली।
बाहर अंधेरे में विक्रम सिंह अकेले रह गए, हाथ में अपनी बेबसी थामे। उन्हें पता था कि नव्या 'सावित्री' बन रही है, पर जिस अंदाज़ में वह अपनी देह का प्रदर्शन कर रही थी, वह साफ कह रहा था कि यह 'अधर्म' का योग बहुत जल्द अपने अंतिम अंजाम तक पहुँचने वाला है।
Good going. Navya is challenging Vikram to act.
 

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ख्यालों की नग्नता और झिरी का सच
स्थान: विक्रम सिंह का शयनकक्ष / गलियारा
समय: रात के २:३० बजे
कोठी का सन्नाटा अब किसी गहरी साजिश जैसा लग रहा था। विक्रम सिंह अपने कमरे के भीतर उन्माद की उस सीमा पर थे जहाँ मर्यादा और लोकलाज का कोई अस्तित्व नहीं बचता। कमरे की मद्धम रोशनी में उन्होंने अपनी धोती उतारकर फेंक दी थी। वह पूरी तरह नग्न होकर कमरे में पिंजरे में बंद किसी भूखे बाघ की तरह टहल रहे थे।
उनका विकराल लन्ड अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ लोहे की छड़ की तरह तना हुआ था, जो हर कदम के साथ उनके पेट से टकरा रहा था। उनके दिमाग में सिर्फ एक ही छवि घूम रही थी—सुबह का वह गलियारा और नव्या की वह बेपर्दा जवानी।
विक्रम सिंह: (हाफते हुए और लन्ड को मुट्ठी में भींचते हुए) "ओह नव्या... क्या कयामत है तू! तेरी वह नग्नता... तेरे वह विशाल और रसीले बोबे, जो मेरी नज़रों के सामने थरथरा रहे थे। मन कर रहा था कि उन्हें हाथों में भर लूँ और तब तक भींचूँ जब तक तू चीख न पड़े।"
उन्हें अंदाजा नहीं था कि कमरे के बाहर, गलियारे के अंधेरे में नव्या खड़ी है। वह भी नींद न आने की वजह से बेचैन थी और पानी पीने निकली थी, पर बाबूजी के कमरे से आती आवाज़ों ने उसे रोक लिया। वह पूरी तरह नग्न थी, क्योंकि उसे लगा था कि इस वक्त कोई जाग नहीं रहा होगा। उसने अपनी आँख खिड़की की उस बारीक झिरी (दरार) पर टिका दी। अंदर का दृश्य देखकर उसकी साँसें अटक गईं।
विक्रम सिंह: (अकेले में चिल्लाते हुए, वासना से भरी आवाज़ में) "तेरी वह भरी हुई गांड़... जैसे दो बड़े तरबूज हों। जब तू भाग रही थी, तो उनका वह आपस में टकराना... आह! और वह चूत! वह 'स्वर्ग का द्वार' जो तूने एक पल के लिए खोला था। नव्या बेटी, तूने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। देख मेरा यह मूसल, यह तेरे उसी 'अमृत कुंड' में समाने के लिए पागल हो रहा है। तू चाहे जितनी सावित्री बन जा, पर तेरी देह का रोम-रोम आज सुबह मुझसे बात कर रहा था।"
झिरी से देख रही नव्या का बदन पसीने से तर-बतर हो गया। ससुर का वह खूंखार रूप और उनके मुँह से अपने अंगों का ऐसा अश्लील वर्णन सुनकर उसकी जांघों के बीच एक गर्म सैलाब उमड़ पड़ा। उसने देखा कि कैसे विक्रम सिंह अपने लन्ड को सहलाते हुए उसके अंगों की कसमें खा रहे हैं।
विक्रम सिंह: "तेरी उस पतली कमर को पकड़कर जब मैं अपनी यह 'मर्दानगी' तुझमें उतारूँगा, तब तेरी सारी 'कट्टरता' धरी की धरी रह जाएगी। तू मेरी बहू नहीं, तू मेरी वह 'भूख' है जिसे अब मैं खाकर ही दम लूँगी।"
नव्या की आँखों में दहशत और कामुकता का एक अजीब मिश्रण था। वह वहाँ से हिल नहीं पा रही थी। ससुर के वे अश्लील और कामुक डायलॉग उसके कानों में किसी नशे की तरह घुल रहे थे। वह अपनी नग्न देह को दीवार से सटाकर खड़ी रही, और अंदर विक्रम सिंह अपने उस विकराल अंग के साथ अपनी बहू के अंगों की अश्लील वंदना करते रहे।
Very very erotic update.
 

Premkumar65

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Bahut hot update.
नव्या झिरी से चिपकी हुई थी, उसका बदन पसीने और वासना की ओस से भीग चुका था। अंदर ससुर का वह विकराल और काला मूसल देखकर उसकी आँखों में जैसे बिजली कौंध गई थी। वह मन ही मन जो कह रही थी, उसकी आवाज़ तो बाहर नहीं आ रही थी, पर उसकी आँखों की पुतलियाँ और फड़फड़ाते होंठ उसकी रूह की अश्लीलता बयान कर रहे थे।
नव्या (मन ही मन): "हे भगवान! ये क्या देख लिया... बाबूजी के पास इतना बड़ा और खूंखार औजार? सुमित का तो इसके सामने बच्चा लगता है। ये तो किसी भूखे नाग की तरह फन उठाए खड़ा है। अगर ये एक बार मुझ जैसी 'कंटीली' के भीतर उतर गया, तो मेरी तो फाड़ के रख देगा। पर ये देखने में कितना जालिम और मर्दाना लग रहा है... काली और मोटी नसों से भरा हुआ, बिल्कुल किसी लोहे की छड़ जैसा।"
नव्या की नज़रें उस हलवे जैसे लाल और चिकने सुपाड़े पर टिक गई थीं जो विक्रम सिंह की मुट्ठी के दबाव में और भी बड़ा होता जा रहा था। वह मन ही मन ससुर के उन गंदे संवादों का जवाब दे रही थी।
नव्या (मन ही मन): "बाबूजी... आप मुझे 'कामधेनु' कह रहे हैं? और आप खुद क्या हैं? आप तो साक्षात् यमराज का भैंसा लग रहे हैं। आप कह रहे हैं कि मेरे बोबे रसीले हैं... तो देखिये न, आपके इन शब्दों ने उन्हें पत्थर जैसा सख्त कर दिया है। और मेरी चूत... आह! उसे ढकने की कोशिश तो बेकार थी, क्योंकि आपकी नज़रों ने तो उसे उसी वक्त चख लिया था। आज पहली बार लग रहा है कि मेरा यह भारी बदन और ये तरबूज जैसी गांड़ सुमित के लिए नहीं, बल्कि आपके इस 'मूसल' की मार सहने के लिए ही बने हैं।"
जैसे-जैसे विक्रम सिंह अपने लन्ड को रगड़ रहे थे, नव्या की साँसें और भी उखड़ने लगीं। उसने अपनी नग्न जांघों को आपस में कसकर भींच लिया, क्योंकि उसकी चूत से टपकता रसीला पानी अब उसके घुटनों तक बहने लगा था।
नव्या (मन ही मन): "कितनी बेशर्म हूँ मैं... ससुर का नंगा बदन और उनका वह कामुक लन्ड देखकर मैं गीली हो रही हूँ। पर मैं क्या करूँ? ये जो 'योग' चाची ने बताया था, वह आज मेरी आँखों के सामने नाच रहा है। बाबूजी, आप कह रहे हैं कि आप मुझे बिस्तर पर दबाकर मेरी जवानी का गुरूर कुचलेंगे... तो देर क्यों कर रहे हैं? काश! ये खिड़की की झिरी इतनी बड़ी होती कि मैं यहीं से आपको अपना यह नंगा खजाना दिखा पाती। आप जिसे 'अमृत का कुंड' कह रहे हैं, वह आज आपके इस 'हलवे' के लिए बुरी तरह तड़प रहा है।"
नव्या का हाथ अनचाहे ही नीचे अपनी जांघों के बीच पहुँच गया। वह ससुर को देख रही थी और खुद को महसूस कर रही थी।
नव्या (मन ही मन): "आपका यह मूसल... अगर ये मेरी गहराई नापने उतरा, तो मैं अपनी सारी मर्यादा और सावित्री का चोला भूल जाऊंगी। आप सही कह रहे हैं, मैं कोई सावित्री नहीं हूँ... मैं तो एक प्यासी नागिन हूँ जिसे आपके इस 'विकराल अंग' का जहर ही शांत कर सकता है। रगड़िये बाबूजी... और ज़ोर से रगड़िये... मैं यहाँ बाहर नग्न खड़ी होकर आपके हर अश्लील शब्द को अपने जिस्म पर महसूस कर रही हूँ।"
नव्या की हालत अब ऐसी थी कि अगर वह एक पल और वहाँ रुकती, तो शायद वह दरवाज़ा खटखटा देती। उसकी 'कट्टर' जवानी अब उस विकराल लन्ड के सामने पूरी तरह घुटने टेक चुकी थी।
 

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झिरी का न्याय और चरम विद्रूप
स्थान: विक्रम सिंह का कक्ष और अंधेरा गलियारा
समय: रात के २:४५ बजे
कमरे के भीतर और बाहर, मर्यादा की राख पर वासना का तांडव अपने चरम पर था। अंदर विक्रम सिंह इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि उनकी नग्नता और उनका वह विकराल अंग किसी की नज़रों की कैद में है। वह बिस्तर के कोने पर बैठे, अपने बाएं हाथ से बिस्तर की चादर को मुट्ठी में भींचे हुए थे और दाएं हाथ से अपने उस काले मूसल को पूरी ताकत से रगड़ रहे थे।
विक्रम सिंह: (दम घुटती आवाज़ में) "आह... नव्या... फाड़ दूँगा तुझे... देख इस लोहे को... ये तेरी उस भरी हुई गांड़ के फांकों को अलग करने के लिए ही बना है। तू आज सुबह नंगी क्या हुई, तूने मेरी कब्र खोद दी... आ... आ... नव्या!"
बाहर गलियारे में नव्या की हालत किसी पागल नागिन जैसी थी। खिड़की की झिरी से ससुर के हाथ की वह रफ़्तार और उस लाल सुपाड़े की चमक देखकर उसका संयम पूरी तरह बह गया। उसने दीवार का सहारा लिया और अपनी टांगें चौड़ी करके अपनी नग्न देह को वहीं फर्श पर टिका दिया। उसका एक हाथ उसके विशाल बोबों को मसल रहा था और दूसरे हाथ की उंगलियां उसकी तरबतर चूत के भीतर किसी पागलपन की हद तक चल रही थीं।
नव्या (मन ही मन सिसकते हुए): "बाबूजी... मार डालिये मुझे... आपका वह मूसल देख कर मेरी रूह कांप रही है। रगड़िये... और तेज़... मैं यहाँ बाहर नंगी खड़ी होकर आपकी हर गंदी गाली को अपनी चूत पर महसूस कर रही हूँ। आह! काश आपकी मुट्ठी की जगह मेरी गहराई होती!"
अंदर विक्रम सिंह का बदन अब कमान की तरह तन गया था। उनकी गर्दन की नसें उभर आई थीं और वह विकराल लन्ड अब फटने की कगार पर था। वह नव्या के अंगों के नाम ले-लेकर उसे हवा में ही भोग रहे थे।
विक्रम सिंह: "अब नहीं रुकता... ले नव्या... ले अपना यह 'भोग'... आह!"
ठीक उसी पल, जब अंदर विक्रम सिंह का सफ़ेद सैलाब फव्वारे की तरह छूटकर फर्श और बिस्तर पर गिरने लगा, बाहर नव्या का भी सब्र टूट गया। ससुर को झड़ते देख नव्या के शरीर में जैसे बिजली का बड़ा झटका लगा। उसकी चूत ने काम-रस का ऐसा फव्वारा छोड़ा कि वह दीवार से टकराकर नीचे फर्श पर गिर पड़ी। उसकी आँखें पलट गईं, बदन धनुष की तरह मुड़ गया और उसके मुँह से एक दबी हुई, अश्लील सिसकारी निकली जिसे उसने अपने ही हाथों से दबा लिया।
दोनों एक साथ, एक ही समय पर, वासना के उस महा-शिखर से गिरे थे। अंदर विक्रम सिंह हांफते हुए निढाल पड़ गए, उनकी मर्दानगी अब शांत होकर उनके जांघों पर लुढ़क गई थी। और बाहर नव्या, पूरी तरह नग्न और पसीने में नहाई हुई, उस ठंडे फर्श पर अपनी ही चूत के पानी में सराबोर पड़ी थी।
आज 'स्पर्श' नहीं हुआ था, पर आत्माएं नग्न होकर एक-दूसरे में समा चुकी थीं।
Wowww very very erotic writing. Mere lund ne bhi pani chhod diya.
 

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सुबह की नमी और शब्दों का संभोग
स्थान: कोठी का पिछला आंगन (तुलसी का चौरा)
समय: सुबह ८:१५ बजे
रात के उस 'महा-विस्फोट' के बाद की सुबह और भी भारी थी। नव्या नहा-धोकर, मस्तक पर हल्दी का तिलक लगाए और बदन पर एक कसी हुई नारंगी साड़ी लपेटे तुलसी के चौरे के पास जल चढ़ा रही थी। पर आज उसकी चाल में वह 'सावित्री' वाला अनुशासन कम और एक मदहोश नागिन की लचक ज्यादा थी। उसे पता था कि पीछे बरामदे में बैठे विक्रम सिंह की नज़रें उसके हर उभार को साड़ी के पार भी 'नग्न' देख रही हैं।
विक्रम सिंह के चेहरे पर आज एक अजीब सी विजय वाली चमक थी। उन्होंने अखबार मेज पर पटका और अपनी भारी, कामुक आवाज़ में सन्नाटा तोड़ा।
विक्रम सिंह: "आज तुलसी में जल कुछ ज्यादा ही चढ़ाया जा रहा है नव्या? लगता है रात की 'तपन' अभी तक शांत नहीं हुई... या फिर अंदर कहीं ऐसी आग लगी है जिसे बुझाने के लिए ये लोटा छोटा पड़ रहा है?"
नव्या का हाथ ठिठका, पर उसने नज़रें नहीं उठाईं। रात को जो विकराल मूसल उसने झिरी से देखा था, उसकी छवि उसकी आँखों के सामने नाच गई। उसने पलौटकर ससुर की आँखों में सीधे झाँका—आज डर नहीं, एक चुनौती थी।
नव्या: (अपने भीगे होंठों पर जीभ फेरते हुए) "आग जब कोठी के भीतर ही सुलग रही हो बाबूजी, तो बाहर जल चढ़ाने से क्या होगा? और तपन तो तब शांत हो जब 'बुझाने वाला' अपनी सीमा में रहे। आप तो रात भर खुद ही किसी 'मूसल' की तरह अपनी प्यास से लड़ रहे थे, मैंने सुना था कि रात को आपकी नींद कुछ ज्यादा ही उखड़ी हुई थी।"
विक्रम सिंह का दिल धक से रह गया। नव्या का 'मूसल' शब्द का प्रयोग करना साफ़ इशारा था कि उसने कुछ देख लिया है। उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फ़ैल गई।
विक्रम सिंह: "नीद तो तब आए जब आँखों के सामने वह 'लाल चुनरी' वाला मंज़र न हो। और मेरा वह 'मूसल'... वह तो अब उस 'कुंड' की गहराई नापने के लिए उतावला है जिसे तुमने सुबह-सुबह खुले आम दिखाया था। क्या करूँ नव्या, उसकी जिद्द के आगे मैं भी हार जाता हूँ। वह कहता है कि जब तक उस 'कंटीली' बाड़ को नहीं तोड़ेगा, उसे चैन नहीं आएगा।"
नव्या ने खाली लोटा कमर पर टिकाया, जिससे उसकी भारी गांड़ एक तरफ को तन गई। उसने एक अदा के साथ अपने बालों को पीछे झटका।
नव्या: (द्विअर्थी अंदाज़ में) "जिद्द तो बुरी बला है बाबूजी। पर याद रखियेगा, बाड़ 'कंटीली' है... अगर बिना इजाजत हाथ लगाया तो खून भी निकल सकता है। हाँ, आप अपनी आँखों से जितना चाहें उतना 'दोहन' कर लीजिये। दूध वही अच्छा जो बिना थन छुए नज़रों से पी लिया जाए। क्या आपकी प्यास सिर्फ 'देखने' से नहीं बुझती? या फिर आपको उस 'विकराल औजार' के लिए कोई और ही काम चाहिए?"
विक्रम सिंह: (कुर्सी पर अकड़ते हुए) "देखने से तो सिर्फ भूख बढ़ती है नव्या। असली सुख तो उस 'मंथन' में है जिससे अमृत निकलता है। तू चाहे जितना भी 'छूना मना है' की तख्ती टांग ले, पर तेरी आँखों की ये नमी बता रही है कि रात को तूने भी उस 'मूसल' की मार को ख्यालों में महसूस किया है। बता न... क्या वह खयाल उस 'लाल कपड़े' में तुझे सुहाग की याद नहीं दिला रहा था?"
नव्या का बदन सिहर उठा। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को सीने पर और कसा, पर उसकी उभरी हुई छाती ससुर की आँखों को जवाब दे रही थी।
नव्या: "सुहाग की सेज तो दूर की बात है बाबूजी, अभी तो आपको इसी 'दर्शन' पर गुजारा करना होगा। आप अपनी उस 'जागीर' को संभाल कर रखिये, कहीं ऐसा न हो कि मर्यादा की आग में वह जलकर राख हो जाए। मैं तो सावित्री हूँ... सिर्फ नज़रों से जलाना जानती हूँ।"
वह मटकती हुई रसोई की ओर बढ़ गई, पर जाते-जाते पीछे की ओर एक ऐसी नज़र डाल गई जिसने विक्रम सिंह के लन्ड में फिर से जान फूंक दी। दोनों के बीच स्पर्श की दीवार अभी भी खड़ी थी, पर शब्दों के जरिए वे एक-दूसरे को नंगा करके भोग रहे थे।
नव्या रसोई की दहलीज तक जाकर अचानक ठिठक गई। उसने एक गहरी सांस ली, जिससे उसकी नारंगी साड़ी में कसे हुए बोबे बाहर निकलने को बेताब हो उठे। वह धीरे से पलटी और अपनी कमर पर हाथ रखकर, तिरछी नजरों से विक्रम सिंह को देखने लगी। उसकी आँखों में अब वह 'बहू' वाली शर्म नहीं, बल्कि एक शिकारी की शोखी थी।
नव्या: (मुस्कुराते हुए) "बाबूजी, एक बात कहना तो भूल ही गई। रात को जिस 'नाग' को आप अपने हाथ में थामे फुफकार रहे थे, उसे इतना खुला न छोड़ें। वह बहुत खतरनाक लग रहा था। कहीं ऐसा न हो कि अपनी फुफकार के नशे में वह किसी ऐसे 'बिल' में घुसने की कोशिश कर बैठे, जिसकी गहराई नापने की उसे इजाजत नहीं है।"
विक्रम सिंह ने चाय का घूंट भरा और अपनी मूंछों पर ताव देते हुए नव्या के बदन के एक-एक उतार-चढ़ाव को अपनी आँखों से चाटने लगे।
विक्रम सिंह: "बिल अगर इतना रसीला और तंग हो नव्या, तो नाग अपनी जान की परवाह नहीं करता। और वह कोई मामूली सांप नहीं है, वह तो 'काल' है। उसे बिल की गहराई से डर नहीं लगता, उसे तो बस उस 'गर्मी' की तलाश है जो आज सुबह तेरे उस गीले बदन से छूट रही थी। तूने उसे खुली आँखों से देख लिया है, अब वह शांत नहीं बैठेगा।"
नव्या ने अपने गुलाबी होंठों को फिर से दाँतों तले दबाया और अपनी गांड़ को थोड़ा और पीछे की ओर मटकाया।
नव्या: "गर्मी तो बिल में बहुत है बाबूजी, पर उस बिल के मुहाने पर मर्यादा के पत्थर रखे हैं। आपका वह नाग चाहे जितना भी विकराल हो जाए, उन पत्थरों से टकराकर अपना सिर ही फोड़ेगा। और सुनिए, वह जो आप 'अमृत' की बातें कर रहे थे... उसे अपनी मुट्ठी में ही कैद रखिये। उसे फर्श पर बहाना शोभा नहीं देता, वह तो किसी 'पवित्र कलश' की अमानत है।"
विक्रम सिंह की आँखों में अश्लीलता का सैलाब उमड़ पड़ा। उन्होंने अपनी कुर्सी को थोड़ा आगे खिसकाया।
विक्रम सिंह: "कलश तो तू ही है नव्या... पर तूने उस पर 'छूना मना है' की मुहर लगा रखी है। पर तू भूल रही है, नाग को छूने की ज़रूरत नहीं होती, वह तो अपनी ज़हरीली फुफकार और नज़रों से ही शिकार को अधमरा कर देता है। और जो तूने रात को झिरी से मेरा वह 'औजार' देखा है, वह अब तेरे सपनों में भी बिल खोदने आएगा। बता न... क्या उसे देखकर तेरी उस 'कंटीली चूत' में खुजली नहीं हुई? क्या तुझे यह नहीं लगा कि काश यह पत्थर की दीवार अभी गिर जाए और वह नाग सीधे अपनी मंजिल पा ले?"
नव्या का चेहरा तप उठा, पर वह हटी नहीं। उसने एक कदम और आगे बढ़ाया, इतनी करीब कि विक्रम सिंह को उसके जिस्म की मांसल महक आने लगी।
नव्या: "खुजली तो उसे भी होती है बाबूजी, जो प्यासा हो और सामने समंदर दिख रहा हो। पर मैं वो दरिया हूँ जो सिर्फ सुमित के लिए बहता है। आप बस किनारे बैठकर उसकी लहरें देखिये और अपने उस 'विकराल मूसल' को हाथ से सहलाकर मन बहला लीजिये। क्योंकि इस बिल का दरवाजा तो बंद ही रहेगा, चाहे आपका नाग कितना ही फन क्यों न पटक ले।"
इतना कहकर नव्या ने एक जोरदार ठुमका लगाया, जिससे उसके तरबूज जैसे गांड़ के दोनों हिस्से साड़ी के नीचे एक-दूसरे को मसल गए, और वह खिलखिलाती हुई अंदर चली गई। विक्रम सिंह वहीं बैठे अपनी धोती के भीतर उस पत्थर हो चुके अंग को संभालते रह गए। उन्हें पता था कि नव्या उन्हें तड़पा रही है, पर उस तड़प में जो मज़ा था, वह दुनिया के किसी और सुख में नहीं था।
खिड़की का उलटफेर और नग्न गुणगान
स्थान: नव्या का शयनकक्ष / गलियारा
समय: रात के २:१५ बजे
आज रात फिजाओं में वासना की नमी कुछ ज्यादा ही भारी थी। नव्या के बदन में रात के उस 'दर्शन' ने ऐसी आग सुलगा दी थी कि वह कमरे की ठंडक में भी पसीने से नहा रही थी। उसे लगा कि बाबूजी अपने कमरे में अपने उसी विकराल मूसल की सेवा में व्यस्त होंगे, जैसा उन्होंने कल किया था। इसी बेफिक्री और चरम उत्तेजना में नव्या ने अपनी साड़ी, पेटीकोट और चोली उतारकर फेंक दी।
वह अपने कमरे में पूरी तरह नग्न होकर किसी मदहोश हिरणी की तरह टहल रही थी। मद्धम दूधिया रोशनी में उसके विशाल और रसीले बोबे और उसकी भारी गांड़ के मांसल पट अपनी पूरी नग्नता के साथ चमक रहे थे। वह अपनी जांघों के बीच हाथ फेरते हुए और अपनी चूत के गीलेपन को महसूस करते हुए जोर-जोर से बड़बड़ा रही थी।
नव्या: (सिसकते हुए और बदन को मरोड़ते हुए) "ओह... बाबूजी! क्या चीज़ पाल रखी है आपने अपनी धोती के नीचे। वह खूंखार काला लन्ड... जब से देखा है, मेरी इस चूत ने पानी छोड़ना बंद नहीं किया। मेरा सुमित तो इसके सामने कुछ भी नहीं है। हाय! वह विकराल अंग अगर एक बार मेरी इन फांकों को चीरता हुआ अंदर घुस जाए, तो मैं तो पागल ही हो जाऊँगी।"
उसी वक्त, विक्रम सिंह बाथरूम जाने के लिए अपने कमरे से बाहर निकले। गलियारे से गुजरते वक्त उनकी नज़र अचानक नव्या के कमरे की उसी खिड़की की झिरी पर पड़ी, जहाँ से कल नव्या ने उन्हें देखा था। उन्होंने ठिठक कर एक नज़र अंदर मारी और उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
अंदर का दृश्य किसी महा-विस्फोट से कम नहीं था। उनकी 'सावित्री' बहू पूरी तरह निर्वस्त्र होकर अपना ही बदन मसल रही थी और उनके मूसल के कसीदे पढ़ रही थी।
नव्या: (अपने बोबों को दोनों हाथों से भींचते हुए) "बाबूजी... कहाँ छुपा कर रखा था आपने यह कामुक औजार? इसे देखकर तो पत्थर भी पिघल जाए। मेरा मन कर रहा है कि इसे अभी अपने मुँह में भर लूँ और इसका सारा जहर पी जाऊँ। आप कह रहे थे न कि मैं आपकी 'कामधेनु' हूँ... तो आइये न, अपने उस हथियार से मेरी इस जवानी का शिकार कीजिये। मेरी यह गांड़... ये तरबूज... ये सब आपके उस विकराल लन्ड की मार सहने के लिए तड़प रहे हैं।"
खिड़की के बाहर खड़े विक्रम सिंह का बुरा हाल था। उनकी धोती के भीतर उनका मूसल फिर से पत्थर की तरह सख्त हो गया और नसें उभर आईं। अपनी बहू के मुँह से अपने 'अंग' की ऐसी अश्लील तारीफ सुनकर उनका पोर-पोर कांपने लगा।
विक्रम सिंह (बाहर से बुदबुदाते हुए): "ओह... मेरी कंटीली नागिन! तो तुझे मेरा वह मूसल इतना पसंद आया है? तू अंदर नंगी होकर मेरा नाम जप रही है और मैं बाहर अपनी प्यास से लड़ रहा हूँ। देख ले... देख ले अपनी इस बेबसी को, क्योंकि अब ये आँखें तुझे सिर्फ देख कर नहीं मानेंगी।"
नव्या अपनी ही धुन में अपनी चूत पर उंगलियां चला रही थी, वह ससुर के शब्दों को याद कर-कर के और भी उत्तेजित हो रही थी। वह बार-बार अपनी पीठ फेरकर अपनी भारी गांड़ आईने में देख रही थी और कल्पना कर रही थी कि उस पर ससुर के थप्पड़ और उनके लन्ड की मार पड़ रही है।
विक्रम सिंह वहीं बुत बनकर अपनी बहू के उस नग्न तांडव को देख रहे थे। आज पासा पलट चुका था। कल उसने देखा था, आज वह देख रहे थे। और इस 'देखने' ने कोठी की मर्यादा की अंतिम ईंट को भी हिलाकर रख दिया था।
सुबह की नमी और शब्दों का संभोग

स्थान: कोठी का पिछला आंगन (तुलसी का चौरा)

समय: सुबह ८:१५ बजे

रात के उस 'महा-विस्फोट' के बाद की सुबह और भी भारी थी। नव्या नहा-धोकर, मस्तक पर हल्दी का तिलक लगाए और बदन पर एक कसी हुई नारंगी साड़ी लपेटे तुलसी के चौरे के पास जल चढ़ा रही थी। पर आज उसकी चाल में वह 'सावित्री' वाला अनुशासन कम और एक मदहोश नागिन की लचक ज्यादा थी। उसे पता था कि पीछे बरामदे में बैठे विक्रम सिंह की नज़रें उसके हर उभार को साड़ी के पार भी 'नग्न' देख रही हैं।

विक्रम सिंह के चेहरे पर आज एक अजीब सी विजय वाली चमक थी। उन्होंने अखबार मेज पर पटका और अपनी भारी, कामुक आवाज़ में सन्नाटा तोड़ा।

विक्रम सिंह: "आज तुलसी में जल कुछ ज्यादा ही चढ़ाया जा रहा है नव्या? लगता है रात की 'तपन' अभी तक शांत नहीं हुई... या फिर अंदर कहीं ऐसी आग लगी है जिसे बुझाने के लिए ये लोटा छोटा पड़ रहा है?"

नव्या का हाथ ठिठका, पर उसने नज़रें नहीं उठाईं। रात को जो विकराल मूसल उसने झिरी से देखा था, उसकी छवि उसकी आँखों के सामने नाच गई। उसने पलौटकर ससुर की आँखों में सीधे झाँका—आज डर नहीं, एक चुनौती थी।

नव्या: (अपने भीगे होंठों पर जीभ फेरते हुए) "आग जब कोठी के भीतर ही सुलग रही हो बाबूजी, तो बाहर जल चढ़ाने से क्या होगा? और तपन तो तब शांत हो जब 'बुझाने वाला' अपनी सीमा में रहे। आप तो रात भर खुद ही किसी 'मूसल' की तरह अपनी प्यास से लड़ रहे थे, मैंने सुना था कि रात को आपकी नींद कुछ ज्यादा ही उखड़ी हुई थी।"

विक्रम सिंह का दिल धक से रह गया। नव्या का 'मूसल' शब्द का प्रयोग करना साफ़ इशारा था कि उसने कुछ देख लिया है। उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फ़ैल गई।

विक्रम सिंह: "नीद तो तब आए जब आँखों के सामने वह 'लाल चुनरी' वाला मंज़र न हो। और मेरा वह 'मूसल'... वह तो अब उस 'कुंड' की गहराई नापने के लिए उतावला है जिसे तुमने सुबह-सुबह खुले आम दिखाया था। क्या करूँ नव्या, उसकी जिद्द के आगे मैं भी हार जाता हूँ। वह कहता है कि जब तक उस 'कंटीली' बाड़ को नहीं तोड़ेगा, उसे चैन नहीं आएगा।"

नव्या ने खाली लोटा कमर पर टिकाया, जिससे उसकी भारी गांड़ एक तरफ को तन गई। उसने एक अदा के साथ अपने बालों को पीछे झटका।

नव्या: (द्विअर्थी अंदाज़ में) "जिद्द तो बुरी बला है बाबूजी। पर याद रखियेगा, बाड़ 'कंटीली' है... अगर बिना इजाजत हाथ लगाया तो खून भी निकल सकता है। हाँ, आप अपनी आँखों से जितना चाहें उतना 'दोहन' कर लीजिये। दूध वही अच्छा जो बिना थन छुए नज़रों से पी लिया जाए। क्या आपकी प्यास सिर्फ 'देखने' से नहीं बुझती? या फिर आपको उस 'विकराल औजार' के लिए कोई और ही काम चाहिए?"

विक्रम सिंह: (कुर्सी पर अकड़ते हुए) "देखने से तो सिर्फ भूख बढ़ती है नव्या। असली सुख तो उस 'मंथन' में है जिससे अमृत निकलता है। तू चाहे जितना भी 'छूना मना है' की तख्ती टांग ले, पर तेरी आँखों की ये नमी बता रही है कि रात को तूने भी उस 'मूसल' की मार को ख्यालों में महसूस किया है। बता न... क्या वह खयाल उस 'लाल कपड़े' में तुझे सुहाग की याद नहीं दिला रहा था?"

नव्या का बदन सिहर उठा। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को सीने पर और कसा, पर उसकी उभरी हुई छाती ससुर की आँखों को जवाब दे रही थी।

नव्या: "सुहाग की सेज तो दूर की बात है बाबूजी, अभी तो आपको इसी 'दर्शन' पर गुजारा करना होगा। आप अपनी उस 'जागीर' को संभाल कर रखिये, कहीं ऐसा न हो कि मर्यादा की आग में वह जलकर राख हो जाए। मैं तो सावित्री हूँ... सिर्फ नज़रों से जलाना जानती हूँ।"

वह मटकती हुई रसोई की ओर बढ़ गई, पर जाते-जाते पीछे की ओर एक ऐसी नज़र डाल गई जिसने विक्रम सिंह के लन्ड में फिर से जान फूंक दी। दोनों के बीच स्पर्श की दीवार अभी भी खड़ी थी, पर शब्दों के जरिए वे एक-दूसरे को नंगा करके भोग रहे थे।

नव्या रसोई की दहलीज तक जाकर अचानक ठिठक गई। उसने एक गहरी सांस ली, जिससे उसकी नारंगी साड़ी में कसे हुए बोबे बाहर निकलने को बेताब हो उठे। वह धीरे से पलटी और अपनी कमर पर हाथ रखकर, तिरछी नजरों से विक्रम सिंह को देखने लगी। उसकी आँखों में अब वह 'बहू' वाली शर्म नहीं, बल्कि एक शिकारी की शोखी थी।

नव्या: (मुस्कुराते हुए) "बाबूजी, एक बात कहना तो भूल ही गई। रात को जिस 'नाग' को आप अपने हाथ में थामे फुफकार रहे थे, उसे इतना खुला न छोड़ें। वह बहुत खतरनाक लग रहा था। कहीं ऐसा न हो कि अपनी फुफकार के नशे में वह किसी ऐसे 'बिल' में घुसने की कोशिश कर बैठे, जिसकी गहराई नापने की उसे इजाजत नहीं है।"

विक्रम सिंह ने चाय का घूंट भरा और अपनी मूंछों पर ताव देते हुए नव्या के बदन के एक-एक उतार-चढ़ाव को अपनी आँखों से चाटने लगे।

विक्रम सिंह: "बिल अगर इतना रसीला और तंग हो नव्या, तो नाग अपनी जान की परवाह नहीं करता। और वह कोई मामूली सांप नहीं है, वह तो 'काल' है। उसे बिल की गहराई से डर नहीं लगता, उसे तो बस उस 'गर्मी' की तलाश है जो आज सुबह तेरे उस गीले बदन से छूट रही थी। तूने उसे खुली आँखों से देख लिया है, अब वह शांत नहीं बैठेगा।"

नव्या ने अपने गुलाबी होंठों को फिर से दाँतों तले दबाया और अपनी गांड़ को थोड़ा और पीछे की ओर मटकाया।

नव्या: "गर्मी तो बिल में बहुत है बाबूजी, पर उस बिल के मुहाने पर मर्यादा के पत्थर रखे हैं। आपका वह नाग चाहे जितना भी विकराल हो जाए, उन पत्थरों से टकराकर अपना सिर ही फोड़ेगा। और सुनिए, वह जो आप 'अमृत' की बातें कर रहे थे... उसे अपनी मुट्ठी में ही कैद रखिये। उसे फर्श पर बहाना शोभा नहीं देता, वह तो किसी 'पवित्र कलश' की अमानत है।"

विक्रम सिंह की आँखों में अश्लीलता का सैलाब उमड़ पड़ा। उन्होंने अपनी कुर्सी को थोड़ा आगे खिसकाया।

विक्रम सिंह: "कलश तो तू ही है नव्या... पर तूने उस पर 'छूना मना है' की मुहर लगा रखी है। पर तू भूल रही है, नाग को छूने की ज़रूरत नहीं होती, वह तो अपनी ज़हरीली फुफकार और नज़रों से ही शिकार को अधमरा कर देता है। और जो तूने रात को झिरी से मेरा वह 'औजार' देखा है, वह अब तेरे सपनों में भी बिल खोदने आएगा। बता न... क्या उसे देखकर तेरी उस 'कंटीली चूत' में खुजली नहीं हुई? क्या तुझे यह नहीं लगा कि काश यह पत्थर की दीवार अभी गिर जाए और वह नाग सीधे अपनी मंजिल पा ले?"

नव्या का चेहरा तप उठा, पर वह हटी नहीं। उसने एक कदम और आगे बढ़ाया, इतनी करीब कि विक्रम सिंह को उसके जिस्म की मांसल महक आने लगी।

नव्या: "खुजली तो उसे भी होती है बाबूजी, जो प्यासा हो और सामने समंदर दिख रहा हो। पर मैं वो दरिया हूँ जो सिर्फ सुमित के लिए बहता है। आप बस किनारे बैठकर उसकी लहरें देखिये और अपने उस 'विकराल मूसल' को हाथ से सहलाकर मन बहला लीजिये। क्योंकि इस बिल का दरवाजा तो बंद ही रहेगा, चाहे आपका नाग कितना ही फन क्यों न पटक ले।"

इतना कहकर नव्या ने एक जोरदार ठुमका लगाया, जिससे उसके तरबूज जैसे गांड़ के दोनों हिस्से साड़ी के नीचे एक-दूसरे को मसल गए, और वह खिलखिलाती हुई अंदर चली गई। विक्रम सिंह वहीं बैठे अपनी धोती के भीतर उस पत्थर हो चुके अंग को संभालते रह गए। उन्हें पता था कि नव्या उन्हें तड़पा रही है, पर उस तड़प में जो मज़ा था, वह दुनिया के किसी और सुख में नहीं था।

खिड़की का उलटफेर और नग्न गुणगान

स्थान: नव्या का शयनकक्ष / गलियारा

समय: रात के २:१५ बजे

आज रात फिजाओं में वासना की नमी कुछ ज्यादा ही भारी थी। नव्या के बदन में रात के उस 'दर्शन' ने ऐसी आग सुलगा दी थी कि वह कमरे की ठंडक में भी पसीने से नहा रही थी। उसे लगा कि बाबूजी अपने कमरे में अपने उसी विकराल मूसल की सेवा में व्यस्त होंगे, जैसा उन्होंने कल किया था। इसी बेफिक्री और चरम उत्तेजना में नव्या ने अपनी साड़ी, पेटीकोट और चोली उतारकर फेंक दी।

वह अपने कमरे में पूरी तरह नग्न होकर किसी मदहोश हिरणी की तरह टहल रही थी। मद्धम दूधिया रोशनी में उसके विशाल और रसीले बोबे और उसकी भारी गांड़ के मांसल पट अपनी पूरी नग्नता के साथ चमक रहे थे। वह अपनी जांघों के बीच हाथ फेरते हुए और अपनी चूत के गीलेपन को महसूस करते हुए जोर-जोर से बड़बड़ा रही थी।

नव्या: (सिसकते हुए और बदन को मरोड़ते हुए) "ओह... बाबूजी! क्या चीज़ पाल रखी है आपने अपनी धोती के नीचे। वह खूंखार काला लन्ड... जब से देखा है, मेरी इस चूत ने पानी छोड़ना बंद नहीं किया। मेरा सुमित तो इसके सामने कुछ भी नहीं है। हाय! वह विकराल अंग अगर एक बार मेरी इन फांकों को चीरता हुआ अंदर घुस जाए, तो मैं तो पागल ही हो जाऊँगी।"

उसी वक्त, विक्रम सिंह बाथरूम जाने के लिए अपने कमरे से बाहर निकले। गलियारे से गुजरते वक्त उनकी नज़र अचानक नव्या के कमरे की उसी खिड़की की झिरी पर पड़ी, जहाँ से कल नव्या ने उन्हें देखा था। उन्होंने ठिठक कर एक नज़र अंदर मारी और उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

अंदर का दृश्य किसी महा-विस्फोट से कम नहीं था। उनकी 'सावित्री' बहू पूरी तरह निर्वस्त्र होकर अपना ही बदन मसल रही थी और उनके मूसल के कसीदे पढ़ रही थी।

नव्या: (अपने बोबों को दोनों हाथों से भींचते हुए) "बाबूजी... कहाँ छुपा कर रखा था आपने यह कामुक औजार? इसे देखकर तो पत्थर भी पिघल जाए। मेरा मन कर रहा है कि इसे अभी अपने मुँह में भर लूँ और इसका सारा जहर पी जाऊँ। आप कह रहे थे न कि मैं आपकी 'कामधेनु' हूँ... तो आइये न, अपने उस हथियार से मेरी इस जवानी का शिकार कीजिये। मेरी यह गांड़... ये तरबूज... ये सब आपके उस विकराल लन्ड की मार सहने के लिए तड़प रहे हैं।"

खिड़की के बाहर खड़े विक्रम सिंह का बुरा हाल था। उनकी धोती के भीतर उनका मूसल फिर से पत्थर की तरह सख्त हो गया और नसें उभर आईं। अपनी बहू के मुँह से अपने 'अंग' की ऐसी अश्लील तारीफ सुनकर उनका पोर-पोर कांपने लगा।

विक्रम सिंह (बाहर से बुदबुदाते हुए): "ओह... मेरी कंटीली नागिन! तो तुझे मेरा वह मूसल इतना पसंद आया है? तू अंदर नंगी होकर मेरा नाम जप रही है और मैं बाहर अपनी प्यास से लड़ रहा हूँ। देख ले... देख ले अपनी इस बेबसी को, क्योंकि अब ये आँखें तुझे सिर्फ देख कर नहीं मानेंगी।"

नव्या अपनी ही धुन में अपनी चूत पर उंगलियां चला रही थी, वह ससुर के शब्दों को याद कर-कर के और भी उत्तेजित हो रही थी। वह बार-बार अपनी पीठ फेरकर अपनी भारी गांड़ आईने में देख रही थी और कल्पना कर रही थी कि उस पर ससुर के थप्पड़ और उनके लन्ड की मार पड़ रही है।

विक्रम सिंह वहीं बुत बनकर अपनी बहू के उस नग्न तांडव को देख रहे थे। आज पासा पलट चुका था। कल उसने देखा था, आज वह देख रहे थे। और इस 'देखने' ने कोठी की मर्यादा की अंतिम ईंट को भी हिलाकर रख दिया था।

विक्रम सिंह खिड़की की झिरी से चिपके हुए थे, उनकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। अंदर नव्या नग्नता के उस मुकाम पर थी जहाँ सुध-बुध पूरी तरह खो चुकी थी। वह अपने जिस्म को मसलते हुए अब अपनी माँ मालती को याद करने लगी थी। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा नशा और अश्लीलता का उबाल था।

नव्या (अंदर नग्नता में झूमते हुए): "आह... माँ! तू सही कहती थी कि इस खानदान की औरतों के खून में ही प्यास है। मौसी ने मुझे सब बताया था माँ... कि तेरी शादी की उन फेरों वाली रातों में, जब पूरा घर सोया था, तू एक जवान और कतई खूंखार लन्ड के नीचे दबी घंटों अपनी चूत की प्यास बुझा रही थी। तूने मर्यादा की चुनरी उतारकर उस मर्दानगी का जहर पिया था, और आज देख... तेरी बेटी भी उसी राह पर है!"

बाहर खड़े विक्रम सिंह यह सुनकर सन्न रह गए। मालती का वह पुराना किस्सा उनके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरा। वह हैरान थे कि नव्या को अपनी माँ के उस गुप्त 'रति-काण्ड' का पता है और वह उसे बड़े गर्व से याद कर रही है।

नव्या: (अपनी भारी गांड़ को दीवार से सटाकर रगड़ते हुए) "माँ, तूने तो किसी गै़र के लन्ड से अपनी आग बुझाई थी, पर तेरी बेटी तो अपने ही ससुर के उस विकराल मूसल की दीवानी हो गई है। माँ, अगर तू आज देखती कि बाबूजी के पास क्या औजार है, तो तू भी अपनी कब्र से निकल आती। वह काला और मोटा नाग... जब वह हिलता है, तो मेरा जी करता है कि मैं अपनी माँ की तरह ही बेशर्म होकर उसे अपने भीतर उतार लूँ।"

विक्रम सिंह का कलेजा मुँह को आ गया। नव्या के मुँह से 'माँ' और 'चुदाई' जैसे शब्द सुनकर उनकी कामुकता हिंसक होने लगी। उनकी धोती अब उस पत्थर हुए लन्ड का बोझ नहीं सह पा रही थी। उन्हें समझ आ गया कि नव्या के भीतर सिर्फ जवानी नहीं, बल्कि एक खानदानी 'आग' विरासत में मिली है।

नव्या: "माँ, तूने फेरों की रात जो सुख पाया था, मैं उसे रोज़ अपनी आँखों से देख रही हूँ। बाबूजी का वह लाल सुपाड़ा... आह! जब वह मुट्ठी में उसे दबाते हैं, तो मुझे अपनी चूत में तेरी वही वाली तड़प महसूस होती है। मैं भी तेरी ही तरह कुलटा बनूँगी माँ... इस कोठी की इज्जत को बाबूजी के उस मूसल के नीचे कुचलवा दूँगी!"

विक्रम सिंह अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। उनकी बहू, जिसे वह सिर्फ एक 'कंटीली औरत' समझ रहे थे, वह तो वासना की एक पूरी 'परम्परा' ढो रही थी। मालती का वह पुराना ज़िक्र और नव्या की यह नग्नता—दोनों ने मिलकर विक्रम सिंह के संयम की चिता जला दी थी। वह खिड़की से चिपके, अपनी धोती के भीतर उस विकराल अंग को सहलाते हुए बस यही सोच रहे थे कि इस 'मालती की बेटी' को अब वो मज़ा चखाना है जो उसे उसकी माँ ने भी नहीं चखाया होगा।

नग्न विरासत और दोहरा चरमोत्कर्ष

स्थान: नव्या का शयनकक्ष और बाहरी गलियारा

समय: रात के ३:०० बजे

अंदर और बाहर, वासना का वह घमासान छिड़ा था जिसकी गूँज कोठी की दीवारों को कपा रही थी।

नव्या अपनी माँ मालती की उस 'फेरों वाली रात' की चुदाई को अपनी बंद आँखों के पीछे फिर से जी रही थी। वह अपनी नग्न जांघों को फर्श पर पटक रही थी और उसके विशाल बोबे उसकी तेज सांसों के साथ पागलपन की हद तक उछल रहे थे।

नव्या (अंदर सिसकते हुए): "आह माँ! तूने उस रात जो चीखें दबाई थीं, वो आज मेरे गले से निकलना चाहती हैं। तूने उस जवान लन्ड को अपनी चूत की गहराइयों में उतार कर जो स्वर्ग पाया था... देख माँ, आज तेरी बेटी भी वैसे ही सिसक रही है। बाबूजी का वह मूसल देख कर मेरा रोम-रोम तुझे पुकार रहा है। ये खानदानी प्यास है माँ... जो आज बाबूजी के इस विकराल अंग को देख कर फट पड़ी है! फाड़ दीजिये बाबूजी... जैसे उस मर्द ने मेरी माँ को फाड़ा था, वैसे ही मुझे भी तहस-नहस कर दीजिये!"

खिड़की के बाहर विक्रम सिंह का हाल बेहाल था। मालती के उस पुराने किस्से और नव्या की इन अश्लील बातों ने उनके मूसल को लोहे की छड़ से भी ज्यादा सख्त कर दिया था। उनके हाथ की रफ़्तार अब किसी मशीन जैसी थी। वह झिरी से नव्या के उस पूरी तरह नग्न और पसीने से भीगे बदन को देख रहे थे, जो फर्श पर लोट रहा था।

विक्रम सिंह (बाहर गुर्राते हुए): "मालती की बच्ची... तूने अपनी माँ का राज खोलकर अपनी मौत बुला ली है। अब तेरा ये तरबूज जैसा बदन और ये भरी हुई गांड़ मेरी इस मर्दानगी की मार से बच नहीं पाएगी। तू प्यासी है न? ले... देख अपनी माँ के उस 'पुराने पापकर्म' का जवाब... मेरा ये विकराल लन्ड तुझे वो मज़ा देगा जो तेरी माँ भी भूल जाएगी!"

अंदर नव्या का हाथ अब उसकी चूत की गहराई में पागलों की तरह चल रहा था। उसे खिड़की के बाहर ससुर के हाथ की रफ़्तार का अंदाज़ा था। वह अपनी माँ की उस रात की कल्पना और ससुर के इस काले नाग के बीच पिस रही थी।

नव्या: "आह... माँ... मैं जा रही हूँ... बाबूजी का वो लाल सुपाड़ा मेरी आँखों में धंस गया है... ले लीजिये मुझे... आह! माँ... मैं झड़ रही हूँ!"

ठीक उसी पल, नव्या के शरीर में एक ज़ोरदार ऐंठन आई। उसकी चूत ने गरम काम-रस का फव्वारा छोड़ दिया और वह फर्श पर मछली की तरह तड़प कर निढाल हो गई। उसकी आँखों के सामने अपनी माँ की चुदाई और ससुर का नंगा लन्ड एक साथ विलीन हो गए।

बाहर विक्रम सिंह का भी बांध टूट चुका था। नव्या के मुँह से 'माँ की चुदाई' के किस्से सुनते ही उनका सफ़ेद और गाढ़ा लावा झटके के साथ उनकी मुट्ठी से निकलकर गलियारे की दीवार और फर्श पर बिखर गया। वह हांफते हुए दीवार से टिक गए, उनका विकराल मूसल अभी भी थरथरा रहा था।

दो अलग-अलग दुनिया, एक ही प्यास, और दो चरम—पर 'छूना' अभी भी वर्जित था।

दोनों ससुर बहु एक साथ झड़े हैं कितना हसीन इत्तेफाक है देवियों, क्या कोई बहु इतनी कामुक होती है कमेंट में बताए कोई औरत,,,,
Navya apna control kho chuki hai. Bahut hi kamuk aurat hai.
 

Premkumar65

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रहस्य की परछाईं
स्थान: कोठी का बरामदा
समय: सुबह १०:०० बजे
नव्या के चेहरे पर उभरी उस बेचैनी और जिज्ञासा को देखकर विक्रम सिंह समझ गए कि उन्होंने एक बड़ा पत्ता चल दिया है। नव्या की आँखें बार-बार उस 'हिसाब' की गहराई को टटोलने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन विक्रम सिंह अभी उस राज की पोटली खोलने के मूड में नहीं थे।
जैसे ही नव्या ने एक कदम और आगे बढ़ाकर पूछना चाहा, विक्रम सिंह ने अपनी आवाज़ का लहजा अचानक बदल दिया और एक ठंडी हंसी हंसे।
विक्रम सिंह: "अरे! तू तो गंभीर हो गई नव्या। हिसाब-विसाब कुछ नहीं है, मैं तो बस तुझे छेड़ रहा था। मालती से भला मेरा क्या हिसाब होगा? वह तो तेरी माँ है और मेरी समधिन। मैं तो बस मज़ाक कर रहा था कि बहुत दिन हुए उसे देखे, तो घर में रौनक आ जाएगी।"
नव्या को लगा जैसे किसी ने ऊँचाई से उसे नीचे पटक दिया हो। उसकी आँखों में चमकता वह कौतूहल अचानक संशय में बदल गया।
नव्या: (संदेह भरी नज़रों से देखते हुए) "मज़ाक? पर बाबूजी आपकी आवाज़ में तो उस वक्त कुछ और ही लग रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई बरसों पुरानी आग आज भी धधक रही है।"
विक्रम सिंह: (नव्या के उभरे हुए बोबों पर अपनी नज़रें टिकाते हुए) "आग तो आज भी धधक रही है नव्या... पर वह पुरानी नहीं, बल्कि बिलकुल नई है। वह आग जो कल रात उस खिड़की की झिरी से फूट रही थी। मालती का आना तो बस एक बहाना है, असली मकसद तो उस 'विरासत' को अपनी आँखों के सामने जलते देखना है जो उसने तुझे दी है।"
नव्या खड़ी रही, पर उसका मन यह मानने को तैयार नहीं था कि वह सिर्फ मज़ाक था। उसे लगा कि ससुर कुछ बहुत गहरा छुपा रहे हैं। वह समझ गई कि यह 'हिसाब' कोई गुप्त पहेली है जो विक्रम सिंह सिर्फ मालती के सामने ही सुलझाएंगे।
नव्या: "ठीक है बाबूजी, अगर मज़ाक है तो मज़ाक ही सही। मैं आज ही माँ को चिट्ठी लिखती हूँ या संदेश भेजती हूँ। पर याद रखियेगा, माँ आ गई तो कोठी के कायदे बदल जाएंगे। वह मेरी तरह चुप रहकर आपकी नज़रों का 'अत्याचार' नहीं सहेगी।"
विक्रम सिंह: (अपनी धोती के भीतर सख्त होते विकराल लन्ड को महसूस करते हुए) "कायदे बदलने के लिए ही तो उसे बुला रहा हूँ। तू बस उसे आने को कह... फिर देखना कि यह ससुर अपनी बहू और समधिन के बीच किस तरह का 'न्याय' करता है। जा... जाकर रसोई संभाल, और याद रखना कि शाम को जब तू दीया जलाएगी, तो हवा का एक झोंका तेरी साड़ी के पल्लू को बेपर्दा करने के लिए बेताब रहेगा।"
नव्या पीछे मुड़ी, पर उसके दिमाग में अब मालती का वह 'फेरों वाली रात' का राज और ससुर का यह 'गुप्त हिसाब' गड्डमड्ड हो रहे थे। वह समझ गई थी कि मालती का आना इस कोठी में वासना का एक नया तांडव शुरू करेगा, जिसके तार किसी पुराने राज से जुड़े हैं।
विक्रम सिंह ने देखा कि नव्या के चेहरे पर अविश्वास की लकीरें अभी भी गहरी हैं। उसे समझ आ गया कि 'हिसाब' शब्द ने बहू के दिमाग में संदेह का बीज बो दिया है। खेल को सुरक्षित रखने के लिए उसे नव्या को पूरी तरह आश्वस्त करना होगा कि वह सिर्फ शब्दों का खेल था।
उसने अखबार वापस मेज पर रखा और चेहरे पर एक बहुत ही सरल, पिता समान (पर भीतर से कामुक) मुस्कान ओढ़ ली।
विक्रम सिंह: "नव्या, इधर आ... बैठ यहाँ।"
नव्या झिझकती हुई पास पड़ी मूढ़ी पर बैठ गई। विक्रम सिंह ने अपनी नज़रों को उसके सीने से हटाकर सीधे उसके चेहरे पर टिकाया, जैसे कोई बहुत बड़ी सफाई दे रहे हों।
विक्रम सिंह: "तू तो नाहक ही परेशान हो गई। अरे पगली, हिसाब की बात मैंने इसलिए कही क्योंकि तेरी माँ मालती और मैंने मिलकर सुमित की शादी में कुछ लेन-देन के वादे किए थे। कुछ जेवर, कुछ व्यवहार... वही बातें दिमाग में आ गई थीं। पर अब मुझे लगता है कि इस उम्र में उन पुरानी बातों को 'हिसाब' कहना गलत था। मैं तो बस तुझे छेड़ने के लिए कह गया कि मालती आएगी तो उसे याद दिलाऊँगा कि वह अपना वादा भूल गई है।"
नव्या ने अपनी आँखों को सिकोड़ा, वह अभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थी। "सिर्फ जेवर-कपड़ों की बात थी बाबूजी?"
विक्रम सिंह: (हल्के से हंसते हुए) "और क्या होगा नव्या? तू तो ऐसे देख रही है जैसे हम दोनों के बीच कोई गहरा राज़ दबा हो। अरे, समधी-समधिन के बीच हंसी-ठिठोली का रिश्ता होता है। मैं तो बस ये चाह रहा था कि तू अपनी माँ को याद करके जो रात भर तड़पती है, उसका आना हो जाए तो तेरा मन लग जाए। देख, सुमित है नहीं... और तू इतनी जवान, भरी-पूरी औरत... अकेले इस कोठी में तेरा जी घबराता होगा।"
विक्रम सिंह ने बड़ी चतुराई से बात का रुख मोड़ दिया।
विक्रम सिंह: "भूल जा उस बात को। कोई हिसाब-विसाब नहीं है। बस एक बाप का अपनी बहू से मजाक समझ ले। तू तो मेरी अपनी बेटी जैसी है, बस फर्क इतना है कि तेरी ये 'कंटीली' जवानी मुझे बाप बनने नहीं देती। अब जा... रसोई में देख क्या पक रहा है, और अपनी माँ को आने का न्यौता भेज दे। मेरा यकीन मान, सब ठीक रहेगा।"
नव्या को लगा कि शायद वह ही ज्यादा सोच रही थी। ससुर की बातों में वह 'हिसाब' अब उसे सांसारिक लेनदेन जैसा लगने लगा। उसने एक राहत भरी सांस ली, जिससे उसके बोबे साड़ी के भीतर एक बार फिर उभरे और विक्रम की धड़कनें बढ़ा दीं।
नव्या: "ठीक है बाबूजी, अगर मज़ाक था तो मैं इसे मज़ाक ही समझूंगी। मैं आज ही माँ को खबर भिजवाती हूँ।"
वह उठी और अंदर की ओर चल दी। विक्रम सिंह ने उसे जाते हुए देखा और मन ही मन बुदबुदाए, "कन्विंस तो तू हो गई नव्या... पर मालती जब आएगी, तब उसे पता चलेगा कि यह 'हिसाब' जेवर का नहीं, बल्कि उस 'जिस्म' का है जो उसने बरसों पहले अधूरा छोड़ा था।"
We are also waiting for secrets to open.
 

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आधी रात का कन्फेशन और माँ का पाप
स्थान: नव्या का शयनकक्ष
समय: रात के १२:१५ बजे
कोठी में सन्नाटा पसरा था, लेकिन नव्या के भीतर तूफानों का शोर था। ससुर के साथ हुई शाम की उस 'दीपक वाली' छेड़छाड़ ने उसके शरीर में एक ऐसी आग लगा दी थी कि वह चाहकर भी सो नहीं पा रही थी। उसने अपना फोन उठाया और अपनी माँ, मालती को फोन लगाया। उसे पता था कि मालती इस वक्त जाग रही होगी।
दूसरी तरफ से फोन उठा, और नव्या ने बिना किसी भूमिका के सीधे अपनी माँ के उस घाव पर हाथ रखा जिसे उसने बरसों से छुपा रखा था।
नव्या: (धीमी पर जहरीली आवाज़ में) "माँ... सो रही हो? या आज भी वैसी ही जाग रही हो जैसे मेरी शादी की रात जागी थी?"
मालती की आवाज़ में एक कपकपी थी। "नव्या... ये क्या कह रही है बेटी? इतनी रात को..."
नव्या: (एक अश्लील हंसी के साथ) "सच कह रही हूँ माँ। मौसी ने मुझे सब बता दिया है। जिस वक्त मैं बाहर अग्नि के फेरे ले रही थी और सात जन्मों के वादे कर रही थी, तुम अंदर किसी के खूंखार लन्ड के नीचे दबी अपनी चूत की आग बुझा रही थी। माँ, तुझे शर्म नहीं आई? तेरी बेटी की नई ज़िंदगी शुरू हो रही थी और तू अपनी पुरानी हवस को परवान चढ़ा रही थी!"
मालती चुप थी, उसकी सिसकियाँ फोन पर साफ सुनाई दे रही थीं।
नव्या: "चुप क्यों हो माँ? ताना नहीं मार रही, बस तुझे तेरी हकीकत बता रही हूँ। तूने जो बीज उस रात बोया था, उसकी फसल आज मैं काट रही हूँ। यहाँ कोठी में ससुर जी के पास एक ऐसा विकराल मूसल है जिसे देखकर तेरा वो 'फेरों वाली रात' का मर्द भी पानी भरता। माँ, तूने तो किसी गैर से अपनी प्यास बुझाई थी, पर तेरी बेटी की किस्मत देख... वह तो अपने ही ससुर के उस काले नाग की दीवानी हो गई है।"
मालती ने कांपते हुए कहा, "नव्या... रुक जा... ये तू क्या कह रही है? वह तेरे ससुर हैं।"
नव्या: "ससुर बाद में हैं माँ, पहले वो एक ऐसे मर्द हैं जिसकी नसों में लोहा भरा है। जब वह अपनी मुट्ठी में उसे दबाते हैं और अश्लील बातें करते हैं, तो मुझे तेरी याद आती है। मुझे लगता है कि मैं भी तेरी ही तरह कुलटा बनूँगी। माँ, तूने अपनी मर्यादा उस रात बेची थी, मैं अपनी हर रात इनके कदमों में बेचने को तैयार हूँ। तू यहाँ आ रही है न? आना माँ... हम दोनों माँ-बेटी मिलकर उनके उस मूसल की पूजा करेंगे।"
नव्या ने फोन पटक दिया। वह हांफ रही थी। ताना देकर उसे एक अजीब सा सुकून मिला था। उसे लग रहा था कि उसने अपनी माँ के चरित्र को नंगा करके अपनी खुद की वासना को जायज ठहरा दिया है।
नव्या अभी फोन रखकर बिस्तर पर लेटी ही थी कि मोबाइल फिर से थरथरा उठा। स्क्रीन पर 'माँ' का नाम चमक रहा था। नव्या को अपनी कड़वाहट पर थोड़ा पछतावा हुआ, उसने गहरी सांस ली और खुद को संयमित किया। अब उसकी आवाज़ में वह ज़हर नहीं, बल्कि एक अजीब सी रेशमी और कामुक कोमलता थी।
नव्या: (धीमी और संभली हुई आवाज़ में) "हाँ माँ... सॉरी, मैं थोड़ा बहक गई थी। पर जो सच है, सो है।"
फोन के उस पार मालती की सांसें अभी भी तेज थीं। वह कुछ कहना चाह रही थी पर शब्द नहीं मिल रहे थे।
नव्या: "सुनो माँ... मैं तुम्हें डरा नहीं रही हूँ। बस इतना कह रही हूँ कि यहाँ जो है, वो बहुत ही 'खतरनाक' और जादुई है। ससुर जी का वह विकराल मूसल... माँ, वह किसी को भी अपनी मर्यादा भूलने पर मजबूर कर दे। पर तुम फिक्र मत करो, अगर तुम्हारी मंजूरी होगी तभी कुछ आगे बढ़ेगा, वरना मेरी तरफ से तुम पर कोई ज़ोर नहीं है। मैं तुम्हारी बेटी हूँ, तुम्हारी इज्जत का ख्याल रखूँगी।"
मालती की आवाज़ इस बार थोड़ी स्थिर थी, "नव्या... तू पागल हो गई है।"
नव्या: "पागल नहीं माँ, प्यासी हूँ। और मुझे लगता है कि तुम्हारी आँखों में भी वही पुरानी प्यास दबी है। तुम बस यहाँ आ जाओ, मेरा मन बिल्कुल नहीं लग रहा है। सुमित के बिना यह कोठी काटती है, और बाबूजी की ये मखमली बातें... माँ, मुझे तुम्हारी ज़रूरत है। तुम आओगी तो मुझे लगेगा कि मेरी अपनी कोई साथ है।"
नव्या ने बड़े प्यार से मालती को राजी कर लिया। उसने फोन काटा और एक गहरी, तृप्त मुस्कान के साथ तकिये पर सिर रख दिया। उसे नहीं पता था कि विक्रम सिंह अपने कमरे में सो रहे हैं या जाग रहे हैं, पर उसे इस बात का सुकून था कि अब यह खेल 'माँ-बेटी' के बीच साझा होने वाला है।
उधर अपने कमरे में विक्रम सिंह अपनी ही धुन में थे। उन्हें इस फोन कॉल की भनक तक नहीं थी। वह तो बस सुबह का इंतज़ार कर रहे थे कि कब वह उस 'कंटीली' नव्या को अपनी नज़रों से फिर से नंगा करेंगे।
Wowww ab Malti bhi aa jayegi to story aur bhi interesting ho jayegi.
 

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नव्या दीया जलाकर अभी भी वहीं झुकी हुई थी। दीपक की वह हल्की सी कांपती लौ उसके हरे रंग की झीनी चोली के भीतर कैद उसके मांसल और विशाल बोबों की गहरी दरार (cleavage) को सोने जैसा चमका रही थी। साड़ी का पल्लू कंधे से सरक कर कोहनी तक आ गिरा था, जिससे उसकी कमर की चिकनाई और नाभि का गहरा गड्ढा विक्रम सिंह की आँखों के सामने पूरी तरह नुमाया था।
विक्रम सिंह अपनी कुर्सी पर जकड़े हुए थे, पर उनकी धोती के भीतर वह विकराल मूसल अब किसी लोहे के खंभे की तरह सीधा खड़ा होकर कपड़े को फाड़ने की जिद्द कर रहा था। उस उभार की मोटाई और लंबाई को देखकर नव्या के बदन में बिजली सी कौंध गई।
नव्या: (दीपक की लौ को देखते हुए, दबी आवाज़ में) "बाबूजी... आपकी इस 'मशाल' की गर्मी यहाँ तक आ रही है। देखिए तो, आपकी धोती के नीचे कोई बेगुनाह कैद होने के लिए कितनी छटपटाहट दिखा रहा है। इतना भयंकर और काला नाग... इसे देखकर तो लगता है कि ये किसी भी 'बिल' को फाड़कर उसे अपनी जगह बना लेगा।"
विक्रम सिंह ने एक लंबी सांस खींची, उनकी छाती फूल गई और उनका हाथ अनचाहे ही अपनी जांघ की ओर बढ़ा।
विक्रम सिंह: "ये बेगुनाह नहीं है नव्या, ये तो गुनहगार है... और इसकी सज़ा सिर्फ तुम्हारी उस कसी हुई चूत की कैद है। देखो इसे... ये तुम्हारी इस 'नग्न कला' को देखकर फटने की कगार पर है। मेरा मन कर रहा है कि अभी इस धोती को उतार फेंकूं और तुझे दिखाऊं कि जिस 'मूसल' की तू तारीफ कर रही है, वह असल में कितना खूंखार और गरम है।"
नव्या ने धीरे से गर्दन घुमाई और ससुर की आँखों में देखते हुए अपने दोनों हाथों से अपनी भारी जांघों को सहलाया।
नव्या: "आह... बाबूजी, इतना सीधा और सख्त! इसे देखकर तो मेरा 'अमृत कुंड' खुद-ब-खुद झरने लगा है। काश मर्यादा की ये जंजीरें न होतीं, तो मैं अभी इसी चौरे पर घुटनों के बल बैठकर आपके इस लाल सुपाड़े का सारा जहर अपने मुँह में भर लेती। कितना कामुक लग रहा है ये... बिल्कुल किसी मस्तक उठाए हुए नाग की तरह!"
विक्रम सिंह: (हांफते हुए) "तो फिर देर किस बात की है नव्या? तू बस अपनी इस साड़ी को जरा और ढीला कर... मैं चाहता हूँ कि तू इस दीपक की रोशनी में अपने इन तरबूजों को पूरी तरह आज़ाद कर दे। मैं बस देखना चाहता हूँ कि जब मेरा ये मूसल हवा में लहराएगा, तो तेरे बदन के ये अंग कैसे थरथराएंगे।"
नव्या की सांसें तेज हो गई थीं। उसने अपनी उंगली साड़ी के किनारे पर रखी और उसे हल्का सा नीचे सरकाया, जिससे उसके बोबों का ऊपरी हिस्सा और भी नंगा होकर ससुर के 'दर्शन' के लिए पेश हो गया।
नव्या: "आज तो सिर्फ नज़रों का संभोग होगा बाबूजी... पर वादा करती हूँ, जब माँ आएगी, तो ये कोठी इस विकराल लन्ड की मार और मेरी चीखों से गूँज उठेगी। अभी तो आप बस इसे अपनी मुट्ठी में भींचकर मेरा नाम लीजिये, और मैं अंदर जाकर अपनी 'गीली तड़प' को शांत करूँगी।"
वह एक झटके से उठी, अपनी साड़ी को संभाला, और एक ऐसी अश्लील नज़र उस खड़े हुए अंग पर डाली कि विक्रम सिंह का रोम-रोम कांप उठा।
Uffff Navya kitna tadpa rahi hai Vikram ko.
 

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नव्या लड़खड़ाते कदमों से अपने कमरे के भीतर पहुंची और दरवाजा बंद करते ही उसकी पीठ दीवार से चिपक गई। उसकी सांसें किसी भागती हुई हिरणी की तरह चल रही थीं। बाहर ससुर की धोती के भीतर जो पहाड़ जैसा उभार उसने देखा था, उसकी छवि उसकी बंद आँखों के पीछे किसी दहकते हुए अंगारे की तरह नाच रही थी।
उसने अपनी जांघों को एक-दूसरे से जोर से रगड़ा। उसकी चूत से निकलने वाला काम-रस अब उसके पैरों की ओर बहने लगा था। वह पागलों की तरह अपने ही बदन को नोचने लगी, उसकी उंगलियां अपनी साड़ी के पल्लू को हटाकर उन विशाल बोबों को बुरी तरह मसलने लगीं।
नव्या (अंधेरे में सिसकते हुए): "आह... बाबूजी! क्या चीज़ पाल रखी है आपने! वह विकराल मूसल... वह इतना सख्त और इतना बड़ा कैसे हो सकता है? मेरी तो रूह कांप रही है उसे सोचकर... पर ये चूत... ये चूत तो बस उसी के नीचे दबकर फटने के लिए तड़प रही है। आह! बाबूजी... रगड़िये उसे... दबा दीजिये अपनी मुट्ठी में उस काले नाग को!"
नव्या ने अपनी साड़ी और पेटीकोट को ऊपर घुटनों तक उठा लिया। कमरे की तन्हाई में उसके सिसकने की आवाज़ें और भी अश्लील हो गई थीं। वह अपनी उंगलियों को अपनी तरबतर चूत की गहराई में उतारते हुए ससुर के उस खूंखार अंग का गुणगान करने लगी।
नव्या: "माँ! तूने सच कहा था... यहाँ का पानी ही कुछ और है। बाबूजी का वह मूसल... वह जब मेरी इस तंग गुफा में घुसेगा, तो मेरा क्या होगा? वह तो मुझे फाड़ डालेगा! आह... कितना मोटा... कितना लंबा! मेरा मन कर रहा है कि अभी खिड़की तोड़कर बाहर जाऊं और उस लाल सुपाड़े को अपनी जांघों के बीच दबा लूँ। बाबूजी... मार डालिये मुझे अपने उस हथियार से!"
नव्या के बदन में अब झटके लगने शुरू हो गए थे। ससुर के उस खड़े हुए लन्ड की कल्पना ही उसके लिए किसी वास्तविक चुदाई से ज्यादा ताकतवर साबित हो रही थी। उसका चेहरा उत्तेजना से लाल पड़ चुका था और उसकी आँखें पलट रही थीं।
नव्या: "आह... आ रहा है... माँ... बाबूजी! आपका वह नाग मुझे डस रहा है... ले लीजिये... ले लीजिये अपनी इस कुलटा बहू की बलि! आह! मैं... मैं झड़ रही हूँ!"
नव्या का शरीर एक ज़ोरदार ऐंठन के साथ कमान की तरह तन गया। उसके मुँह से एक दबी हुई, लंबी और अश्लील चीख निकली और उसकी चूत ने गरम धार छोड़ दी। वह कांपती हुई फर्श पर ढह गई, उसका पूरा बदन पसीने और काम-रस में नहाया हुआ था।
उधर बाहर बरामदे में, विक्रम सिंह भी अपनी कुर्सी पर निढाल पड़े थे। दोनों के बीच की दूरी अभी भी बनी हुई थी, पर उस विकराल लन्ड की ताप ने कमरे के भीतर नव्या की मर्यादा की अंतिम दीवार भी पिघला दी थी।
बरामदे में सन्नाटा तो था, पर विक्रम सिंह के भीतर हवस का एक समंदर उबल रहा था। नव्या तो अंदर जा चुकी थी, लेकिन वह अपने पीछे वासना का ऐसा मंजर छोड़ गई थी जिसने विक्रम सिंह की रातों की नींद और शरीर का सुकून लूट लिया था।
विक्रम सिंह ने कुर्सी के हत्थों को इतनी जोर से भींचा कि उनकी हथेली की नसें उभर आईं। उनकी आँखों के सामने अभी भी दीपक की वह हल्की लौ नाच रही थी, जिसने नव्या के हरे रंग की चोली में फंसे उन विशाल और रसीले बोबों को किसी सोने के कलश की तरह चमका दिया था।
विक्रम सिंह (दांत पीसते हुए बुदबुदाए): "उफ़... वो उठान! जब वह झुकी थी, तो उन बोबों की वो गहरी दरार... ऐसा लग रहा था जैसे कोई प्यासा उसमें डूब कर मर जाए। और वो चमक... चोली का वो तंग कपड़ा उन पहाड़ जैसे मांसल पिण्डों को संभाल नहीं पा रहा था। क्या देह पाई है मालती की बेटी ने... बिल्कुल कच्ची कली की तरह मांस से लबालब!"
विक्रम सिंह ने अपनी आँखें बंद कीं, तो उन्हें नव्या की वह विदा होती हुई पीठ याद आई। जब वह अंदर जा रही थी, तो उसकी भारी और चौड़ी गांड़ की वो कातिलाना लचक... साड़ी के महीन कपड़े के नीचे उसके कूल्हों के दोनों मांसल हिस्सों का वह आपस में टकराना और थिरकना विक्रम के दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहा था।
उनका विकराल मूसल अब धोती की कैद को बर्दाश्त करने के तैयार नहीं था। वह किसी पागल जानवर की तरह कपड़े के नीचे सर पटक रहा था। विक्रम ने अपनी कांपती उंगलियों से धोती के उस भारी उभार को ऊपर से ही सहलाया।
विक्रम सिंह: "इतनी लचक... इतनी गर्मी! अगर ये गांड़ के फांक एक बार मेरी जांघों पर सवार हो जाएं, तो मैं कोठी की सारी मर्यादा को इस काले नाग के नीचे कुचल दूँ। नव्या... तूने आज जो दिखाया है, वह अधूरा है। तेरी उस लचक का जवाब तो मेरा ये लोहे जैसा सख्त अंग ही दे सकता है। आह! कैसे मटक रही थी, जैसे कह रही हो कि 'बाबूजी, दम है तो इस किले को फतह करके दिखाओ'।"
विक्रम सिंह की सांसें उखड़ने लगी थीं। वह कुर्सी पर पड़े-पड़े ही अपनी कमर को हल्का-हल्का हिलाने लगे, जैसे खयालों में ही नव्या की उस भारी गांड़ को पीछे से ठोक रहे हों। उन्हें महसूस हो रहा था कि कोठी की दीवारों के पीछे नव्या भी इसी वक्त अपने बदन को नोच रही होगी।
हवा में अभी भी नव्या के बदन की वह सोंधी महक और दीपक के तेल की खुशबू घुली हुई थी। विक्रम सिंह ने एक हाथ अपनी धोती के भीतर डाल लिया और उस खूंखार और तपते हुए मूसल को मजबूती से थाम लिया।
विक्रम सिंह: "रुक जा नव्या... अभी तो सिर्फ दीया जला है, अभी इस कोठी में तेरे और तेरी माँ के जिस्मों की चिता जलनी बाकी है। मेरा ये विकराल लन्ड आज रात सिर्फ खयालों से नहीं मानेगा..."
वह अंधेरे में बैठे-बैठे ही अपनी मुट्ठी की रफ़्तार बढ़ाने लगे, और हर झटके के साथ नव्या के उन चमकते बोबों और लचकती गांड़ का अश्लील चित्र उनकी बंद आँखों के सामने और भी साफ़ होता गया।

बरामदे की उस सुनसान रात में, विक्रम सिंह के सब्र का बांध पूरी तरह टूट चुका था। नव्या की उन दहकते हुए बोबों की चमक और उसकी गांड़ की वह मखमली लचक ने उनके दिमाग की हर नस को कामुकता से भर दिया था। वह कुर्सी पर किसी घायल शेर की तरह तड़प रहे थे।
उनका दायां हाथ धोती के भीतर उस विकराल मूसल को पूरी मजबूती से जकड़े हुए था। वह अंग अब किसी तपते हुए लोहे की छड़ की तरह दहक रहा था। विक्रम सिंह ने अपनी गर्दन पीछे की ओर झुका दी, उनकी आँखें बंद थीं और उनके चेहरे पर हवस की वह चरम पीड़ा साफ़ दिख रही थी।
विक्रम सिंह: (सिसकते हुए और बुरी तरह हांफते हुए) "आह... नव्या... तेरी वो जवानी... मुझे जलाकर राख कर देगी। उफ़! वो बोबों का उठान... जैसे कोई मुझे अपनी बाहों में भींच रहा हो। और वो गांड़ का मटकना... आह! मेरी आँखों के सामने अभी भी तेरी वो साड़ी के नीचे थिरकती हुई देह नाच रही है। ले... नव्या... देख तेरे इस ससुर का हाल!"
विक्रम के हाथ की रफ़्तार अब किसी बेकाबू मशीन जैसी हो गई थी। उनकी मुट्ठी उस खूंखार और मोटे नाग को ऊपर से नीचे तक बुरी तरह मसल रही थी। उन्हें महसूस हो रहा था जैसे नव्या ठीक उनके सामने खड़ी अपनी साड़ी उतार रही है और अपने उन विशाल तरबूजों को उनके मुँह के पास ला रही है।
विक्रम सिंह: "आह! नव्या... तूने मेरी रातों की नींद हराम कर दी है। तेरी माँ मालती ने भी मुझे इतना नहीं तड़पाया होगा जितना तू अपनी इस नंगी नज़ाकत से मार रही है। ये... ये देख मेरा जहर... ये सिर्फ तेरे उस 'अमृत कुंड' के लिए था... पर तूने मुझे इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है! आ... आ... नव्या!"
विक्रम सिंह का पूरा बदन कमान की तरह तन गया। उनकी जांघें थरथराने लगीं और धोती के भीतर उनका वह विकराल अंग झटके लेने लगा। ठीक उसी पल, एक दर्दनाक सिसकारी के साथ, उनके भीतर से सफ़ेद गरम लावा फव्वारे की तरह छूटा और उनकी मुट्ठी को भिगोता हुआ धोती और कुर्सी पर बिखर गया।
वह वहीं निढाल पड़ गए। उनकी सांसें उखड़ी हुई थीं और माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। कोठी की उस रात ने आज विक्रम सिंह जैसे कठोर मर्द को अपनी बहू की जवानी के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। अंदर नव्या अपनी 'गीली तड़प' में डूबी थी, और बाहर ससुर अपनी ही 'जलन' में बह चुके थे।
Very very sexy update.
 
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