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माँ भी उसे दुलारती रही और बोली: “पता है जब मैं रमेश को ऊँगली पे लेके आई थी, (अगले पति का बच्चे) तब घर में मेरे ससुर और साँस दोनों ने मिलके मेरी चूत की पूजा की थी। बड़ा वाला मेरे ससुर का और छोटावाला तेरे ससुर का।“
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अब आगे.......
जानकी जानती थी की उसकी साँस छोटी ही उम्र में अपने ही बाप से चुद गई थी और बच्चा रह गया था, हालाकि बाद में बाप को उसका पति करार दिया था पर घरवालो ने उसकी शादी करा दी थी पंचायत में जुर्माना भर के। और वह बच्चा रमेश था, जानकी और उसकी साँस में केवल कुछ सालो का ही फर्क था। और वही बच्चा माँ की चूत से खेलता भी है और उसका पति के तौर पर रहता है। पंचायत से ही जानकी और उसकी साँस को रमेश की पत्निया करार कर दिया था जो की एक नियम था की कोई भी स्त्री जो दुहाती है वह विधवा नहीं हो सकती। घर में से किसी से भी शादी करार की जाती है। करार मतलब कोई शादी नहीं होती बस गाँव में बताया जाता है की अब वह दोनों पति पत्नी है। जानकी की शादी के बाद कुछ ही दिनों में और जानकी की ससुर से दिखाई रसम से पहले खेत में बैलगाड़ी की मरमत करते हुए गाडी उन पर गिर गई और वह वहि मर गए। और माँ को अब रमेश से बच्चा पैदा करना जरुरी था। यही गाँव के नियम है। उस नियम से चलते हुए रमेश अब माँ का पति है लेकिन वह पत्नी नहीं कह सकता सर माँ हिकः सकता है हालाकी बच्चे उसी से ही हो सकते है या तोमंजुरी से किसी और के। घर में शादी और माँ कोपतनी बनाया जा सके वैसे कोई नहीं था। वैसे जेठ है पर उनकी उन से नहीं बनती, कुछ हना कुछ टकराव रहता है तो वह गाँव के दुसरे छेड़े पर रहेते है। और तभी तो जानकी की भी दिखाई जेठ से नहीं हुई थी।
जानकी अब तुम्हे सोचना चाहिए, क्या मुझे उस से शादी करके मेरा पति बनाके तेरे ससुर के सामने चूत दिखाई के तौर पर तुझे दू और बच्चा पैदा कारावाऊ? जो की नियम के तौर पर होगा। या फिर अपने प्रेम को पाने के लिए गाय खुद ही अपना खेत उसे दे और बिज को पाले।“
“माँ अब आप दोनों जो चाहो वो करो, इस गाय के पैर फैलाने है तो खुद ही फैलाए। मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी। मुझे तो आपका और उनका (रमेशजी) का साथ सहकार मिले तो मैं किसी के बच्चे पैदा कर लुंगी। आप दोनों और यह घर ही तो मेरा स्वर्ग है। आप दोनों जिस के कहेंगे उसके लंड का वीर्यदान ले लुंगी।“
जानकी ने माँ की ओर देखते हुए जोड़ा;
“लेकिन माँ मुझे डर भी बहोत लगता है जेठजी या ससुरजी के लंड का वीर्यदान हमारे गाँव की परम्परा के अनुसार है। उस वीर्यदान से किसी को कोई आपत्ति नहीं होती है क्यों की वह गाँव के और अपने समाज के है। उनका और गाय का हक बनता है की वह गर्भाधान करे। लेकिन यहाँ तो यह बाहरी परदेशी है एक आवारा पंछी. जमीन को जोत के उड़ जानेवाला पंछी। किसी और खेत में अपना वीर्य को मुतने के लिए। मैं ऐसे तैयार नहीं हूँ माजी।“
“अरे, बेटी मेरे सामने ही चुदवाउंगी बस फिर तो कोई डर नहीं रहेगा, अगर तू कहे तो गाँव में भी बोल दू की यह विदेशी जानकी का दूसरा पति है और जब तक बच्चा नहीं होगा रमेश के लिए मेरा खेत तैयार है।“
“बस माजी बस करो आप भी न! गाँव में सबको पता है की व्यवहारिक स्वरुप से उनको (रमेश) को आधिकारिक तौर से आप के खेत में पानी डालना उनकी फर्ज है। और वह बखूबी निभा भी रहे है। और मुझे इस से कोई ग्लानी भी नहीं है। अगर ऐसा ना होता तो गाँव के नियम तोड़े जाने का संभव बनता लेकिन ऐसा नहीं है। आप उनसे अपने खेत में पानी डलवाते रहे यह आपकी भी जिम्मेदारी है की उनका लंड भरा हुआ ना रहे। जब चाहे हमदोनों में से किसी को भी अपना बिज बो सकते है। वैसे आप बच्चे नहीं चाहती इसलिए आप “UUUU” (नोट: कोई भी ऐसी जदिबुट्टी की खोज ना करे, सब काल्पनिक है) जदिबुत्ति लेती है। ताकि आपको बच्चा न हो लेकिन आप भूल गई की उन्हों ने आपको फलित तो कर ही दिया था। मैं ही एक अभागन हूँ।“
“अपना दुखड़ा रो चुकी??? हम यहाँ मेरी और रमेश की बात नहीं करते, रमेश तो मेरा बच्चा है जब तक वह मुज में समा नहीं जाता, एक बार वह मुज में अपने लिंग से समाता है और बिज्दान करता है तब तक ही वह मेरा पति यानी की मालिक है। जैसे ही मेरा कुआ भर जाता है और वह अपने लिंग को बहार खींचता है वह मेरा बेटा है। उसकी बात ही नहीं कर रहे हम, बेटी। बात उस पंछी की हो रही है जिस से तुम डरती भी हो और प्रभावित भी हो। जा बेटी खुद को प्रफुल्लित रख के अपने पैर वहा फैला दे और अपनी भूख और प्यास मिटा दे। उस लंड से फलित हो जा बेटी।
“माँ.....जी.....” जानकी माँ से लिपट गई। और माँ ने उसकी साडी उठाई और गांड के दारार में ऊँगली फसती हुई बोली: जा बेटी चुद जा और लंड को खली कर के कोंख में डाल दे बेटी।“ जानकी ने भी उसी अदा में माँ की गांड को सह्लाया और कहा:
“माँ मैं आपका यह अहसान कभी नहीं भूलूंगी, आपने मुझे आज़ादी दे दी एक बच्चे के लिए। मुझे उस से प्रेम है लेकिन आपके बेटे से बहोत प्रेम है, मैं उन्हें कभी दुखी नहीं देखना चाहती।“
“मतलब की तू मेरी सौतन ही बनी रहेगी!!!” और दोनों खुल के हँस दी। एक दुसरे की गांड में ऊँगली पिरो के मस्ती करने लगी।
जानकी माँ के पैरो में पद गई और बोली: “बस माँ मेरे इस प्रेम के लिए एक बच्चा लूई के लंड से लेना चाहूंगी। मैं जानती हु की मैं उसे भा गई हूँ। वह मेरी गांड का दीवाना बन गया है। वह जान-बुज के मेरे पीछे चलता है ताकि वह मेरे गांड को देखता रहे। और मुझे पता न चले।“
“अगर कल चुदने का है तो आज ही चुद जा बेटी।“ और कुछ समय के लिए एक दुसरे की गांड ऊँगली से मारती रही।
जानकी ने कहा “मुझे तुम्हारी सौतन ही बना रहना है माँ, मुझे कभी जुदा मत करना, मैं तुम्हारे पैर पड़ती हूँ।“
“मेरी अच्छी सौतन।“ माँ ने उसकी ऊँगली गांड से निकाली और बहार की ओर चल दी। जानकी भी उसके पीछे चल दी। दोनों बरामदे आके बैठी।
“अब मुझे नहीं छोड़ेगी? मेर पास लंड नहीं है बेटी,जाके उसे उठा और अपने ससुर को जैसे मुंह दिखाई देती उसी तरह से उठा।“
“मतलब आप भी माँ?”
“नहीं बेटी, अगर मेरे नसीब में बच्चा है तो मेरे रमेश के लंड से ही होगा। लेकिन अगर तू नहीं गई तो मैं चली जाउंगी।“
जानकी हँस पड़ी और बोली चूत में दम है तो लूई को भी दो पत्निया मिल जायेगी मेरा को इविरोध नहीं होगा माँ। उसने माँ के पालो को निचे की ओर किया और रोज की तरह माँ को बोबले को खिंच के उसके दूध को चूसने लगी। मन ही मन वह बहोत खुश थी की उसे सब की सम्मति मिल गई टी अब वह घर में ही अपनी चूत दिखाई लूई को दे सकती है।
काफी समय माँ को चूसने के बाद अपना पेट भर दिया। यह रोज का था क्यों की माँ के थानों को भी दूध से भरे रखना था। और यह काम वही करती थी। उसने सोचा था की अगर ससुरजी होते तो रोज ही उनके लंड का रस पि के ही अपना पेट भरना था पर यहाँ दूध है।
जब वह माँ को दुहो के उठी तो उसके चहरे पर एक अजीब से प्रसन्नता थी। उसके शरीर में एक नौयौवना आ गई थी। जैसे वह कुँवारी हो और जिस प्रकार से वह अपने स्तनों को थानों में पलट कर बाप के सामने गई थी तब जो शर्म थी ऐसे ही अब थी। उसकी चाल में नजाकत आ गई थी। उसके कुल्हे अब अच्छे से थरथरा रहे थे। जैसे एक हिरनी अपने शरीर में कस्तूरी भर के अपने हिरन को आकर्षने के लिए इधर-उधर तड़पती घूम रही हो।
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आज के लिए बस यही तक समय मिलने पर एक ओर एपिसोड लिख दूंगी।
आप के सहयोग की अपेक्षा सह।
फनलवर की ओर से....
।। जय भारत ।।
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अब आगे.......
जानकी जानती थी की उसकी साँस छोटी ही उम्र में अपने ही बाप से चुद गई थी और बच्चा रह गया था, हालाकि बाद में बाप को उसका पति करार दिया था पर घरवालो ने उसकी शादी करा दी थी पंचायत में जुर्माना भर के। और वह बच्चा रमेश था, जानकी और उसकी साँस में केवल कुछ सालो का ही फर्क था। और वही बच्चा माँ की चूत से खेलता भी है और उसका पति के तौर पर रहता है। पंचायत से ही जानकी और उसकी साँस को रमेश की पत्निया करार कर दिया था जो की एक नियम था की कोई भी स्त्री जो दुहाती है वह विधवा नहीं हो सकती। घर में से किसी से भी शादी करार की जाती है। करार मतलब कोई शादी नहीं होती बस गाँव में बताया जाता है की अब वह दोनों पति पत्नी है। जानकी की शादी के बाद कुछ ही दिनों में और जानकी की ससुर से दिखाई रसम से पहले खेत में बैलगाड़ी की मरमत करते हुए गाडी उन पर गिर गई और वह वहि मर गए। और माँ को अब रमेश से बच्चा पैदा करना जरुरी था। यही गाँव के नियम है। उस नियम से चलते हुए रमेश अब माँ का पति है लेकिन वह पत्नी नहीं कह सकता सर माँ हिकः सकता है हालाकी बच्चे उसी से ही हो सकते है या तोमंजुरी से किसी और के। घर में शादी और माँ कोपतनी बनाया जा सके वैसे कोई नहीं था। वैसे जेठ है पर उनकी उन से नहीं बनती, कुछ हना कुछ टकराव रहता है तो वह गाँव के दुसरे छेड़े पर रहेते है। और तभी तो जानकी की भी दिखाई जेठ से नहीं हुई थी।
जानकी अब तुम्हे सोचना चाहिए, क्या मुझे उस से शादी करके मेरा पति बनाके तेरे ससुर के सामने चूत दिखाई के तौर पर तुझे दू और बच्चा पैदा कारावाऊ? जो की नियम के तौर पर होगा। या फिर अपने प्रेम को पाने के लिए गाय खुद ही अपना खेत उसे दे और बिज को पाले।“
“माँ अब आप दोनों जो चाहो वो करो, इस गाय के पैर फैलाने है तो खुद ही फैलाए। मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी। मुझे तो आपका और उनका (रमेशजी) का साथ सहकार मिले तो मैं किसी के बच्चे पैदा कर लुंगी। आप दोनों और यह घर ही तो मेरा स्वर्ग है। आप दोनों जिस के कहेंगे उसके लंड का वीर्यदान ले लुंगी।“
जानकी ने माँ की ओर देखते हुए जोड़ा;
“लेकिन माँ मुझे डर भी बहोत लगता है जेठजी या ससुरजी के लंड का वीर्यदान हमारे गाँव की परम्परा के अनुसार है। उस वीर्यदान से किसी को कोई आपत्ति नहीं होती है क्यों की वह गाँव के और अपने समाज के है। उनका और गाय का हक बनता है की वह गर्भाधान करे। लेकिन यहाँ तो यह बाहरी परदेशी है एक आवारा पंछी. जमीन को जोत के उड़ जानेवाला पंछी। किसी और खेत में अपना वीर्य को मुतने के लिए। मैं ऐसे तैयार नहीं हूँ माजी।“
“अरे, बेटी मेरे सामने ही चुदवाउंगी बस फिर तो कोई डर नहीं रहेगा, अगर तू कहे तो गाँव में भी बोल दू की यह विदेशी जानकी का दूसरा पति है और जब तक बच्चा नहीं होगा रमेश के लिए मेरा खेत तैयार है।“
“बस माजी बस करो आप भी न! गाँव में सबको पता है की व्यवहारिक स्वरुप से उनको (रमेश) को आधिकारिक तौर से आप के खेत में पानी डालना उनकी फर्ज है। और वह बखूबी निभा भी रहे है। और मुझे इस से कोई ग्लानी भी नहीं है। अगर ऐसा ना होता तो गाँव के नियम तोड़े जाने का संभव बनता लेकिन ऐसा नहीं है। आप उनसे अपने खेत में पानी डलवाते रहे यह आपकी भी जिम्मेदारी है की उनका लंड भरा हुआ ना रहे। जब चाहे हमदोनों में से किसी को भी अपना बिज बो सकते है। वैसे आप बच्चे नहीं चाहती इसलिए आप “UUUU” (नोट: कोई भी ऐसी जदिबुट्टी की खोज ना करे, सब काल्पनिक है) जदिबुत्ति लेती है। ताकि आपको बच्चा न हो लेकिन आप भूल गई की उन्हों ने आपको फलित तो कर ही दिया था। मैं ही एक अभागन हूँ।“
“अपना दुखड़ा रो चुकी??? हम यहाँ मेरी और रमेश की बात नहीं करते, रमेश तो मेरा बच्चा है जब तक वह मुज में समा नहीं जाता, एक बार वह मुज में अपने लिंग से समाता है और बिज्दान करता है तब तक ही वह मेरा पति यानी की मालिक है। जैसे ही मेरा कुआ भर जाता है और वह अपने लिंग को बहार खींचता है वह मेरा बेटा है। उसकी बात ही नहीं कर रहे हम, बेटी। बात उस पंछी की हो रही है जिस से तुम डरती भी हो और प्रभावित भी हो। जा बेटी खुद को प्रफुल्लित रख के अपने पैर वहा फैला दे और अपनी भूख और प्यास मिटा दे। उस लंड से फलित हो जा बेटी।
“माँ.....जी.....” जानकी माँ से लिपट गई। और माँ ने उसकी साडी उठाई और गांड के दारार में ऊँगली फसती हुई बोली: जा बेटी चुद जा और लंड को खली कर के कोंख में डाल दे बेटी।“ जानकी ने भी उसी अदा में माँ की गांड को सह्लाया और कहा:
“माँ मैं आपका यह अहसान कभी नहीं भूलूंगी, आपने मुझे आज़ादी दे दी एक बच्चे के लिए। मुझे उस से प्रेम है लेकिन आपके बेटे से बहोत प्रेम है, मैं उन्हें कभी दुखी नहीं देखना चाहती।“
“मतलब की तू मेरी सौतन ही बनी रहेगी!!!” और दोनों खुल के हँस दी। एक दुसरे की गांड में ऊँगली पिरो के मस्ती करने लगी।
जानकी माँ के पैरो में पद गई और बोली: “बस माँ मेरे इस प्रेम के लिए एक बच्चा लूई के लंड से लेना चाहूंगी। मैं जानती हु की मैं उसे भा गई हूँ। वह मेरी गांड का दीवाना बन गया है। वह जान-बुज के मेरे पीछे चलता है ताकि वह मेरे गांड को देखता रहे। और मुझे पता न चले।“
“अगर कल चुदने का है तो आज ही चुद जा बेटी।“ और कुछ समय के लिए एक दुसरे की गांड ऊँगली से मारती रही।
जानकी ने कहा “मुझे तुम्हारी सौतन ही बना रहना है माँ, मुझे कभी जुदा मत करना, मैं तुम्हारे पैर पड़ती हूँ।“
“मेरी अच्छी सौतन।“ माँ ने उसकी ऊँगली गांड से निकाली और बहार की ओर चल दी। जानकी भी उसके पीछे चल दी। दोनों बरामदे आके बैठी।
“अब मुझे नहीं छोड़ेगी? मेर पास लंड नहीं है बेटी,जाके उसे उठा और अपने ससुर को जैसे मुंह दिखाई देती उसी तरह से उठा।“
“मतलब आप भी माँ?”
“नहीं बेटी, अगर मेरे नसीब में बच्चा है तो मेरे रमेश के लंड से ही होगा। लेकिन अगर तू नहीं गई तो मैं चली जाउंगी।“
जानकी हँस पड़ी और बोली चूत में दम है तो लूई को भी दो पत्निया मिल जायेगी मेरा को इविरोध नहीं होगा माँ। उसने माँ के पालो को निचे की ओर किया और रोज की तरह माँ को बोबले को खिंच के उसके दूध को चूसने लगी। मन ही मन वह बहोत खुश थी की उसे सब की सम्मति मिल गई टी अब वह घर में ही अपनी चूत दिखाई लूई को दे सकती है।
काफी समय माँ को चूसने के बाद अपना पेट भर दिया। यह रोज का था क्यों की माँ के थानों को भी दूध से भरे रखना था। और यह काम वही करती थी। उसने सोचा था की अगर ससुरजी होते तो रोज ही उनके लंड का रस पि के ही अपना पेट भरना था पर यहाँ दूध है।
जब वह माँ को दुहो के उठी तो उसके चहरे पर एक अजीब से प्रसन्नता थी। उसके शरीर में एक नौयौवना आ गई थी। जैसे वह कुँवारी हो और जिस प्रकार से वह अपने स्तनों को थानों में पलट कर बाप के सामने गई थी तब जो शर्म थी ऐसे ही अब थी। उसकी चाल में नजाकत आ गई थी। उसके कुल्हे अब अच्छे से थरथरा रहे थे। जैसे एक हिरनी अपने शरीर में कस्तूरी भर के अपने हिरन को आकर्षने के लिए इधर-उधर तड़पती घूम रही हो।
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आज के लिए बस यही तक समय मिलने पर एक ओर एपिसोड लिख दूंगी।
आप के सहयोग की अपेक्षा सह।
फनलवर की ओर से....
।। जय भारत ।।

