रंजू का सफर - भाग ३
ट्रैन पर हुई घटना से दोनों एक दूसरे से नज़रें नहीं मिला पा रहे थे। खासकर अंजू क्योंकि उत्तेजना में आकर उसने अरुण के साथ ये काम तो कर लिया था, पर शादीशुदा भारतीय नारी के संस्कार उसके अंदर अभी भी थे और उसे अपने ही ऊपर घृणा का पात्र बना रहे थे। उधर अरुण भी बिना कुछ बोले चुप चाप अंजू के पीछे पीछे चल रहा था। अपनी माँ समान मौसी के खूबसूरत जिस्म को उसने एक औरत, एक प्यासी नारी के रूप में देख रहा था। घर के अंदर जैसे ही, दोनों पहुँचे तो अरुण इस उम्मीद में था, कि अंजू उसकी बांहों में चली आएगी। पर उसकी उम्मीदों को तब, झटका लगा जब अंजू अपने बैग के साथ सीधे अपने कमरे में चली गयी। अरुण पहले भी एक दो बार अंजू के घर आ चुका था। अंजू का घर रेलवे कॉलोनी के पास ही था। घर ज़्यादा बड़ा नहीं था। घर बिल्कुल रेलवे क्वार्टर की तरह ही बना हुआ था। तीन कमरों में एक कमरा मेहमानों के लिए, एक नीतू का और एक उसके मौसा और मौसी का था। सारे कमरे हॉल में खुलते थे। बीच में एक हॉल था और हॉल में ही बाथरूम बना हुआ था। घर के पीछे भी एक दरवाज़ा था, जो कि छोटे से बगीचे में खुलता था। वहां थोड़े बहुत पौधे और फूल लगे हुए थे। उसके पीछे बड़ा सा तालाब था, जिसके दूसरे छोर पर घर बने हुए थे, पर वो काफी दूर थी, जहां से कुछ स्पष्ट नहीं दिख सकता था। घर के आगे पक्की सड़क थी, लेकिन वो मुख्य सड़क नहीं थी। जो मुहल्ले के लोग थे, वो आने जाने के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल किया करते थे। उनका किचन ज्यादा बड़ा नहीं था और वो पूर्व दिशा में हॉल से लगा हुआ था। हॉल में ही एक चार सीटर डाइनिंग टेबल लगा था। हॉल से किचन में सब साफ साफ दिखता था। अरुण हर बार की तरह जूते उतारके घर के मुख्य दरवाजे के पास बने जूता स्टैंड में डाला और सीधा जाकर टी वी ऑन कर लिया। वो लोकल क्षेत्रिय चैनल पर भोजपुरी गाने सुनने लगा। अंजू अपने कमरे में जाकर अपने कपड़े इकट्ठे कर वापिस हॉल से होते हुए, बाथरूम की ओर बढ़ रही थी। उसके दिमाग में वही घटना चल रही थी, उसकी हिम्मत नहीं हुई कि वो अरुण की ओर देखे। जबकि अरुण को उसके पायल की झंकार से पता लग गया था, कि अंजू आ रही है। उसने पीछे मुड़कर देखा तो अंजू अपने हाथों में साया ( पेटीकोट) और गमछा लेकर बाथरूम की ओर कमर मटकाते हुए जा रही थी। उसने ये महसूस किया कि, अंजू ट्रैन वाली घटना पर शर्मिंदगी महसूस कर रही है। उसने मन ही मन कहा कि तेरी बेटी को तो चोद लिया है, अब तुम भी बहुत जल्दी इन्ही बांहों में मस्ती से चुदोगी। दरअसल नीतू को चोदने के बाद उसका आत्मविश्वास बढ़ चुका था और घर की औरतों के प्रति उसका नज़रिया भी बदल चुका था। उसके नज़रों में अंजू एक ऐसी औरत थी जो कि सालों से चुदी नहीं थी। ऐसी औरतों के मन में ओढ़ी संस्कारों की चादर उतारनी पड़ती है। एक बार उनका मन नंगा हो जाये, फिर तो वो अपने बदन को नंगा करवाने में देर नहीं करती। अंजू के साथ ये संभावना ज्यादा थी, क्योंकि उसके बदन में जो चिंगारी सुलग रही थी, उसका नमूना अरुण ट्रैन में देख चुका था। जरूरत थी तो उस चिंगारी को थोड़ी हवा देने की, जो उसके अंदर भड़कते ही संस्कारों में फंसी कामुक औरत को स्वच्छंद कर बाहर ले आये। उसके बाद उसके शरीर की भूख नैतिकता को भुला उसके बांहों में दौड़ी चली आएगी। अरुण के आगे भोजपुरी गाना चल रहा था," राते दिया बुता के पिया क्या क्या किया" जिसमें आम्रपाली दुबे सेक्सी अंदाज़ में नाच रही थी। ऐसे में उसका लण्ड खड़ा होने लगा। अंजू बाथरूम में नहा रही थी। जब जब अंजू अपने ऊपर मग से पानी डाल रही थी, तो उसकी आवाज़ अरुण साफ साफ सुन सकता था। अरुण मन मन अंजू मौसी के नंगे बदन पर गिरते पानी की कल्पना कर उत्तेजित हो रहा था। पानी से जब बदन गीला हो रहा होगा, तो अंजू और भी खूबसूरत लग रही होगी। काश की वो अंजू को इस अवस्था में देख पाता, उसके मन में इसका लालच आ रहा था। उसे ट्रैन के टॉयलेट का वो दृश्य याद आ गया, जब उसने अंजू मौसी के नंगी गाँड़ और उसको मूतते हुए देखा था। ऐसा सोचते हुए वो अपना लण्ड हिलाने लगा। जाने कब उसने आम्रपाली की जगह टी वी में अंजू को देखना शुरू किया और अपना लण्ड बाहर निकाल लिया। वो अब अंजू अंजू का नाम लेकर लण्ड हिला रहा था। उसकी आँखों में सपने का वो हिस्सा भी चलने लगा, जब वो अंजू को गोद में उठाये चोद रहा था। वो अपनी धुन में मगन था। तभी अंजू बाथरूम से काले साये ( पेटीकोट) में बाहर निकली। उसने साया को अपने चूचियों के ऊपर डाल रखा था, और वो उसके जांघों के ऊपरी हिस्से तक ही पहुंच पा रहा था। उसकी पेटीकोट उसके बूर से कुछ तीन चार इंच ही नीचे था। उसने अपने दांये हाथ से अपने साये को पकड़ रखा था। अंजू के बाल गीले थे वो दरवाज़े पर आकर अपने बाल में गमछा लपेट रही थी। अरुण को इस बात का एहसास नहीं हुआ था,कि अंजू बाहर आ चुकी है। तभी अंजू की नज़र उसके विकराल आठ इंची लण्ड पर परी। उसे देख उसका मुंह खुला रह गया और वो दो मिनट के लिए रुक सी गयी। अरुण के लण्ड का लाल सुपाड़ा काफी चौड़ा और नुकीला सा था। काला लण्ड का काफी हिस्सा उसके पैंट के अंदर था, फिर भी जो हिस्सा बाहर था वो उसके पति से बड़ा था। अंजू का दिल मचल उठा, और दिल धड़कने लगा। उसे देख वो एक पल को सबकुछ भूल बैठी कि अरुण उसका भांजा है। उसका मन किया कि उस लण्ड को चूमे और प्यार करे। फिर अगले ही पल नैतिकता और रिश्तों की दीवार खड़ी हो गयी। उसे ग्लानि महसूस होने लगी, और वो वहां से तेज़ कदमों से अपने कमरे की ओर चल दी। उसके पाँव में जो पायल थी, उसकी आवाज़ से अरुण ने आंखे खोली। आंख खुलते ही, उसने देखा कि अंजू तेज़ी में कमरे की ओर जा रही थी। उसे अंदाज़ हो चुका था, कि लगता है अंजू ने उसे मूठ मारते देख लिया था। अरुण उसे देख ही रहा था, कि वो गीले पैरों की वजह से स्लिप हो गयी। उसने खुद को संभालने के लिए दीवाल पकड़ ली, वो गिरने से तो बच गयी। पर पेटीकोट से उसका हाथ हटने की वजह से वो उसके बदन से गिरते हुए उसके पैरों में चला गया। इस वक़्त उसके बदन पर कपड़े बिल्कुल नहीं थे, वो बिल्कुल पूरी तरह नंगी थी। उसके गले में मंगलसूत्र था, कानों में झुमके, हाथों में चूड़ियाँ, पैरों में पायल और बिछिया। इस अवस्था में वो काम की देवी लग रही थी। अंजू अभी तक खुद को संभालने की कोशिश कर रही थी, उसे अभी ये महसूस ही नहीं हुआ था, कि वो अपने भांजे के सामने नंगी हो चुकी है। अरुण उसे पीछे से निहार रहा था। उसके गर्दन से होते हुए नंगी पीठ और गाँड़ से लेकर एड़ी तक सब उसके सामने खुले पड़े थे। अरुण तेज़ी से अंजू के पास आया उसने देखा कि अंजू अभी भी लंबी सांसें ले रही थी। उसने अंजू के कमर में हाथ डालके, उसे अपनी ओर खींच लिया और बोला," मौसी तू ठीक हउ? कइसे चलत बारे तू, देख के चल ना। अभी गिर गईल रहित त केतना चोट आ गईल रहित।"
अंजू बोली," अरुण पैर गीला रहिल, ना एहिसे हम फिसल गइनी।" अरुण फिर बोला," देखले कहीं चोट त ना आईल।" अंजू झुक के देखी और बोली," ना चोट ना लागल ह।"तभी उसे महसूस हुआ कि वो तो पूरी नंगी है। वो लजा उठी और फिर झुककर अपना साया उठायी। खुद को अरुण से अलग किया और फिर साया उठाके अपने नंगे बदन को ढकने लगी। अरुण ने उसका साया पकड़ लिया और अंजू उससे साया छुड़ाने की कोशिश करने लगी। अरुण उसे छोड़ना नहीं चाहता था, वो अंजू के इच्छा विरुद्ध उसे अपनी बांहों में खींच लिया। दोनों की सांसें तेज़ चल रही थी, अंजू धीमे स्वर में ही बोली," अरुण छोड़ द साया, जाए दे हमके, ई का करअ तारा?
अरुण उसके चेहरे के करीब आकर बोला," उहे जउन ट्रैन में ना हो सकिल। अंजू मौसी तू बहुत खूबसूरत बारू अउर तहरा देखके हम पागल हो गइल बानि। हम तहके चाहे लगनी ह।"
अंजू," ना ई ना हो सकेले, हम तहार मौसी हईं, तहार माई जइसन। तू हमार साथे, ई कइसे करअ तारू। हम बियाहल औरत बानि, केकरो नाम के मंगलसूत्र पहिनने बानि। एक पतिव्रता नारी। रे बेशरम तहके लाज ना आवेला आपन मौसी के साथ अइसन बात करे में।" उसकी आँखों में लज्जा और क्रोध दोनों थी। अरुण उसे देख डर तो गया फिर भी हिम्मत करते हुए बोला," अच्छा फिर तहके ई सब बतिया ट्रैन में ना सुझल का, तभी त छिनार जइसे, हमार साथे चिपकल रहलु, उ भी उतना भीड़ में। अरे तुहु त इहे चाहत बारू, हम केकरो से ना कहब, हम तहार मन के बतिया बूझतानि। टेंशन ना ले कुछो ना होई। केकरो पता ना चली।"
अंजू," ट्रैन में जे हो गइल से हो गइल। हम बहक गए रहनि। ओकर शुरुवात तुहे कइले रहलु। अब दुबारा ना होई। तू भूल जो कि अइसन कुछो भईल रहले। हमके जाय दे, तहरा के कसम ह, तहार माई के।"
अरुण ठिठक सा गया और उसकी पकड़ ढीली पर गयी। मां की कसम देकर, अंजू अरुण को दूर करने में कामयाब हो गयी। उसने अपनी पेटीकोट संवारी और कमरे के अंदर चली गयी। अरुण निराश होकर वहां से वापिस चला गया। वो फिरसे कुर्सी पर जाकर बैठ गया। और गुस्से में रिमोट से चैनल तेज़ी से बदलने लगा। उसे खुद पे गुस्सा आ रहा था, कि काश ट्रैन वाली घटना ट्रैन पर ना होकर कहीं अकेले में होती, तो अंजू उससे चुद चुकी होती। अंजू कमरे में आकर अपने साये को कमर पे बाँधा और ब्रा पैंटी पहनी। फिर शीशे के सामने आकर अपने बालों को सुखाने के लिए गमछे से झटक रही थी। उसे आश्चर्य हो रहा था, कि अरुण इतनी हिम्मत कहां से जुटा पाया कि उसे लगभग नंगी हालत में दबोच लिया था। उसकी पकड़ भी काफी मजबूत थी, जिससे वो ना खुद को और ना साया को छुड़ा पा रही थी। उसके सामने एक नौजवान मर्द कैसे उससे बदतमीज़ी से बात कर रहा था, और वो उसके साथ तर्क कर रही थी। अब तक वो पूरी तैयार हो चुकी थी। उसने काले रंग की साड़ी पहनी और मैचिंग ब्लाउज। फिर बिंदी और सिंदूर लगाके तैयार हो चुकी थी। कमरे से निकल उसने पहले पूजा की और सारे घर में अगरबत्ती दिखाई। अरुण के आगे आई तो ना उसने उसे देखा ना अरुण ने उसे। अब तक दोपहर हो चुकी थी। घड़ी में 12 बज चुके थे। अंजू और अरुण दोनों को ही भूख लगी हुई थी। अंजू खाना बनाने में जुट गई। उसने जल्दी से मटर आलू की सब्ज़ी और चावल बनाये। थोड़ी ही देर में एक बज चुके थे। अंजू खाना बनाकर अरुण के पास आई और बोली," अरुण खाना खा ले, भूख लागल होई।"
अरुण," ना हमके भूख नइखे, तू खाले।" अंजू फिर बोली," अरे अईसे कइसे भूख ना हईं, चल खाले ना त कमजोरी हो जाई।" अरुण उसकी ओर देख बोला," ठीक बा, लेकिन हम तनि मुंह हाथ धोईब। आवत हईं।" और वो उठके बाथरूम चला गया। उसने दरवाज़ा बंद किया और लैट्रिन की ओर मूतने चला गया। वो मूत रहा था, तभी उसकी नज़र अंजू की पैंटी पर गयी, जो उसने अभी अभी उतारी थी और बिना धोये पड़ी थी। अरुण ने लपककर उस पैंटी को रस्सी से उठा लिया। फिर उस पैंटी को सूंघने लगा। उसमें अंजू के बूर और पेशाब की गंध दूर से ही आ रही थी। अरुण उसे और तेज़ी से सूंघने लगा और जैसे ही उसका मूतना खत्म हुआ उसे अपने लण्ड पर रगड़ने लगा। अरुण फिरसे अंजू के साथ बिताए लम्हे याद करने लगा। जब अंजू यही पैंटी ट्रैन में उतारकर पेशाब कर रही थी और दोनों की नजरें टकराई थी। अरुण कभी उस पैंटी को चाटता, खासकर उस हिस्से को जहां अंजू की बूर होती थी और फिर अपने लण्ड पर रगड़ने लगता। ऐसा करते हुए उसे पंद्रह मिनट से ज़्यादा हो गए, और आखिर उसके लण्ड से पानी बाहर आ गया। अंजू की पैंटी गीली हो गई और फिर उसने नीचे पटक कर उस पैंटी पर मूतने लगा। वो उसके मूत से बिल्कुल गीली हो गयी। उसने पैंटी को वहीं छोड़ बाहर आ गया। उसके अंदर एक संतुष्टि थी, जब वो बाहर आया। बाहर आके दोनों मौसी भांजा खाना खाने लगे। दोनों चुपचाप खा रहे थे, कोई कुछ बोल नहीं रहा था। अंजू ने बीच में उससे पूछा भी कि और ले लो पर वो मना कर गया। दोनों खाकर सोने चले गए। अरुण वहीं हॉल में ही गद्दा बिछा लिया नीचे क्योंकि उसे टी वी देखना था। वो पहले भी आता था तो यही करता था। आखिरकार दोनों सो गए और शाम चार बजे उठे। अंजू अपने कपड़े धोने जा ही रही थी, की तभी दानिश खान का फोन आ गया। ये वही आदमी था, जो दुबई में अंजू के पति के पास रहता था, और उसका समान लेकर जाने वाला था।
अंजू ने फोन उठाया," हेलो दानिशजी कैसे हैं आप? दानिश," जी भाभीजी नमस्ते, हम ठीक हैं, आप कैसे हो?
अंजू," जी हम भी ठीक हैं।"
दानिश," भाभीजी समान तैयार है।"
अंजू," जी तैयार है, वो तो पहले ही कर लिया था।
दानिश," जी बढ़िया, आप लेके चले आइये एयरपोर्ट पर। हमारा जहाज 8 बजे का है।"
अंजू," लेकिन आप त कल जाने वाले थे, फिर आज कैसे?
दानिश," अरे भाभीजी, बस ऐसे ही प्लान चेंज हो गया। आप आ जाइये जल्दी से, हम इंतज़ार कर रहे हैं।
अंजू," ठीक है, दानिश जी हम आते हैं। एक डेढ़ घंटा लग जायेगा।
दानिश," कोई बात नहीं, जल्दी आइये।" और फोन काट दिया। अंजू फौरन सारा सामान इकठ्ठा कर बांधली और अरुण के पास आई। उसे उठाते हुए बोली," अरुण जल्दी उठ, समान लेके जायके पड़ी। उ आदमी आजे जा रहल बा। चल उठ तैयार हो जो।"
अरुण आंख मलते हुए उठा और तैयार होने लगा। कुछ ही देर में दोनों तैयार होकर, वहां से चल दिये। दोनों ने एक ऑटो की और सीधा एयरपोर्ट की ओर चल दिये। ऑटो में और भी लोग थे, अंजू और अरुण एक साथ चिपककर बैठे हुए थे। अरुण ने अंजू के पीछे सीट पर हाथ डालके बैठ गया। उसने एक कोशिश और करनी शुरू की। उसने अंजू की जांघों को साड़ी के ऊपर से सहलाना शुरू किया। अंजू उसकी इस गिरी हुई हरकत पर उसे घूर के देखी, पर अरुण ने ऐसे व्यवहार किया जैसे उसने कुछ अनुचित नहीं किया। अरुण ने फिर अंजू की दायीं चुच्ची को पकड़ लिया जो उसने हाथ पीछे ले जाकर रखा था। अंजू को उससे इसकी उम्मीद नहीं थी। उसके आँचल की वजह से चूचियाँ ढकी हुई थी। अंजू ने अरुण की ओर देखकर आंखों से हाथ हटाने का इशारा किया, पर अरुण ने उसकी एक नया सुनी। वो पूरे रास्ते उसके साथ ऐसे ही छेड़खानी करता रहा। अंजू ने कई बार उसका हाथ झटकने की कोशिश की पर कर नहीं पाई। आखिरकार दोनों एयरपोर्ट पहुंचे और उतरते ही अंजू ने ऑटोवाले को पैसे देकर विदा किया। फिर वो अरुण की ओर मुड़ी और बोली," अरुण ई का करत रहलु, हम तहके समझौनी ह, कि गलत बात ह। तभियो तू फेर उहे सब करअ तारू। तहके आखरी बार कहतानि ई हरकत छोड़ द।" उसके शब्द में काफी कठोरता थी। अरुण उसकी ओर देख बोला," गलती हो गइल माफ कअ द अंजू मौसी, अब ना करब।" अंजू कुछ बोले बिना ही आगे एयरपोर्ट की ओर चल दी। अरुण उसके पीछे पीछे चल रहा था। अंदर जाने पर अंजू ने दानिश को फोन लगाया तो वो सामने ही मिल गया। अंजू ने उसे हाथ जोड़कर नमस्ते किया, जवाब में उसने भी नमस्ते किया। अंजू ने फिर उसे अपना बैग दे दिया।
दानिश," क्या बात है भाभीजी काफी समान भेज रहे हैं। लगता है सारा प्यार समेट दी हैं आप इस बैग में।
अंजू मुस्कुराते हुए," नहीं भाईसाहब ऐसा कुछ नही है। थोड़ा बहुत जो हो सका वो भेज रही हूँ, बाकी कुछ उन्होंने मंगवाया था।"
दानिश बोला," आपसे एक जरूरी बात करनी है।
अंजू ," जी बोलिये ना। "
दानिश," भाभीजी समझ में नहीं आ रहा कैसे कहूँ? अंजू उसकी ओर आश्चर्य से देखते हुए बोली," जी बोलिये ना ऐसी क्या बात है?
दानिश," वैसे तो ये बात हम बताते नहीं पर आपको देखके और आपके प्यार को देख हमसे रहा नहीं जा रहा। आपका पति वहां एक औरत के साथ रंगरेलियां मना रहा है। वो भी एक पाकिस्तानी मुस्लिम लड़की के साथ। वो उसके साथ ही रहता है।
अंजू," क्या? क्या बोल रहे हैं आप। ये मज़ाक कर रहे हैं ना !
दानिश ने अपना मोबाइल निकाला और उसने अंजू के पति और उस औरत की कई तस्वीरें दिखा दी। उनके कई वीडियो भी थे, जिनमें दोनों मस्ती कर रहे थे। दोनों काफी घूम रहे थे। तभी उसने सारी वीडियो और फोटो अंजू के नंबर पर भेज दी। फिर बोला," आपको आगाह करना हमारा कर्तव्य था, इसलिए बता दिए। बाकि ऐसी भी वीडियो हैं जो हम आपको दिखा नही सकते। आप खुद समझदार हैं।"अंजू की आंखों से आंसू बहने लगे और वो फफक फफक कर रोने लगी। उसे अपने पति पर पूरा भरोसा था, जो कि चकनाचूर हो चुका था।
अंजू और उसके बीच बातें हो रही थी। अरुण उन्हें दूर से देख और सुन रहा था। अरुण ने जब अंजू को रोते हुए देखा तो करीब आकर खड़ा हो गया। दानिश थोड़ी देर बाद जाने को हुआ तो अंजू ने गुस्से से वो बैग वापिस ले लिया और बोली," भाँड़ में जाये साला। हम यहां उसका घर संवार रहे हैं और वो अपना नया दुनिया बसा रहा है।" और वो अरुण के साथ रोते हुए एयरपोर्ट से निकल ली। वो लगातार रोते हुए पैदल ही चले जा रही थी। अरुण उसके साथ साथ चल रहा था। वो उसे चुप होने को बार बार बोल रहा था। लेकिन वो चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी। अरुण ने अंजू के हाथ से बैग ले लिया और मोबाइल। वो सारी फ़ोटो और वीडियो एक एक कर देख रहा था। अंजू बस रो रही थी। दोनों पैदल चलते हुए काफी दूर निकल आये थे। अरुण फिर अंजू को समझाया कि घर चलते हैं, पर वो मान ही नहीं रही थी। वो तो अपनी जान देने के लिए बीच सड़क में भागने की कोशिश कर रही थी। अरुण उसे अपनी बांहों में पकड़े हुए थे। वो बार बार हाथों से उसे धक्का देकर अलग होना चाह रही थी। अंजू," अरुण जाय द हमके, का करि जिंदा रहके। एगो पति रहला उहू छिन गईल।" वो दहारे मारकर रो रही थी।" छोड़ द छोड़ द। " इस तरह वो बड़बड़ाते हुए रोती बिलखती चीख रही थी। अरुण उसे समझाते हुए बोला," अंजू मौसी, संभाल अपनाके इँहा तमाशा मत कर। देख सबकोइ देख रहल बा।" पर अंजू लगातार रोये जा रही थी। उसके गाल आंसुओं से भीग चुके थे। अंजू संभलने का नाम ही नहीं ले रही थी। तब अरुण ने उसे खींच के दो थप्पड़ मारा और चिल्ला के बोला," होश में आ।" अंजू ठिठक गयी। अरुण के बहुत समझाने पर वो घर जाने को तैयार हुई। तभी उसने देखा कि, वो अपना पर्स कहीं गिरा बैठी है। और उसके पास पैसे नहीं थे। अरुण ने अपनी जेब टटोली तो उसमें बस 300 रुपये थे। फिर दोनों ने वहां से लोकल बस ली और अपने मंज़िल की ओर निकल पड़े। बस में दोनों को सीट मिल गयी। अंजू खिड़की के पास बैठी और उसके बगल में अरुण। बस की सीटें दो सीटर ही थी। बस में हल्की लाइट जल रही थी। अंजू अभी भी रो रही थी। उसके ऊपर यो मानो पहाड़ टूट पड़ा था। वो जिसकी उम्मीद में सालों से यहां बैठी थी, वो खुद गुलछर्रे उड़ा रहा था। अरुण ने उसकी हालत देख मन में बोला," बेटा, इहे मौका ह अब चिड़िया फंस जाई, बस सब्र से काम ले। ई साली खुदे आई तहरा पास।" अंजू को सांत्वना देने के बहाने उसने अंजू को अपनी बांहों में ले लिया, और उसके आंसू पोछने लगा। अंजू खुद उसके कंधे पर सर रख दी। अगर कोई दूर से देखता तो ये पक्का कहता कि दोनों पति पत्नी हैं। तभी कंडक्टर आया और टिकट के पैसे मांगने लगा। अरुण ने उसे पैसे दिए, उसने पूछा," दो आदमी हैं, क्या? अरुण ने हाँ में सर हिलाया, तो उसने टिकट के पैसे काटकर उसे दे दिया। फिर टिकट देते हुए बोला," का हुआ भाभीजी को, बहुत रो रही हैं। इनका ध्यान रखिये। ऐसी बीवी सबको नहीं मिलती है।" बोलके वो आगे निकल गया। अंजू ने ये बातें सुनी पर वो कुछ बोली नहीं। अरुण भी चुपचाप उसे अपनी बांहों में जकड़े हुए चुप रहने को बोल रहा था। वो बार बार अंजू के गालों पर बहते आंसू को पोछ रहा था। अंजू उसके बांहों में ही रो रोकर सो गई। अरुण ने अंजू को अपने कंधे पर सोते देखा तो उसके गुलाबी होठ उसे आकर्षित करने लगे। अंजू के साथ आज जो जो घटनाएं हुई वो उसे याद कर रहा था। पर इस वक़्त ना जाने, वो खुद पर काबू नहीं कर पाया और अंजू के होंठों को चूमने के लिए बढ़ा। अंजू की गर्म सांसें उसकी साँसों से टकराई तो एक गुदगुदी सी बदन में दौड़ गयी। अंजू को जैसे उसका करीब आना महसूस हुआ उसने अरुण को एक झलक देखा पर कुछ नहीं बोली। अंजू फिर उससे अलग हो गयी और खिड़की की ओर देखने लगी। अरुण उसे समझाते हुए बोला," अंजू मौसी, देखअ हमरा तरफ देखअ। मौसा त दोसर औरतिया के चक्कर में बा, त तू काहे अपना आप के सजा दे रहल बारू। भूल जो उ आदमी के उ तहार प्यार के लायक नइखे। तू आपन ज़िंदगी मत खराब कर।
अंजू बोली," जिंदगी त कैसेहु काटे के पड़ी अरुण।
अरुण," जिंदगी काटे ले ना, जिये खातिर होखेला। अभी त आगे बहुत जिंदगी पड़ल बा, ओकरा चक्कर में तू बाकी ज़िंदगी काहे दांव पर लगा रहल बारू। जीवन में मस्ती ना रही त जियेके का फायदा।"
अंजू खामोश थी। अरुण उसे फिरसे अपनी ओर खींच लिया और बोला," देख तहरा सामने दु रास्ता बा एक त तू ओकरा याद में खुद के जिंदगी के कोश या त जिंदगी से ओकरा निकालके आपन जिंदगी में नया उमंग भर। अइसन उमंग जउन तहार ई ग़म भुला दे।"
अंजू," तू कहे का चाहा तारा?
तभी बस रुक गयी और उनका स्टॉप आ गया। दोनों बस से उतर गए। अंजू उसके साथ चल रही थी। तभी अंजू उसके पास आई और बोली," तू जवाब ना देलु।" अरुण उसकी ओर मुड़ा और बोला," हम जे कहे चाहेनि, उ अईसे ना कह सकेनी।" अंजू," मतलब,।" अरुण ने कहा," तू इँहा रुक और सड़क के दूसरी ओर दारू का ठेका था, वहां से एक क्वार्टर दारू ले आया। अंजू बोली," तू दारू पियेले का? अरुण," आज तहके जरूरत पड़ी, अंजू मौसी।" फिर वो अंजू के साथ घर पहुंच गया। उसने अंजू को चखना लाने को कहा। अंजू उसके लिए प्लेट में नमकीन और पानी ले आयी। अरुण दारू की बोतल खोलके बैठ गया और अंजू को भी साथ बिठा लिया। हालांकि अंजू उसे मना करती रही, पर उसने अंजू की एक ना चलने दी।
उसने अपने लिए और अंजू के लिए एक एक पैग बनाया। अंजू और उसने गिलास उठाया और चियर्स कहा। फिर दोनों पीने लगे। अरुण को तो कभी कभी आदत थी। पर अंजू जैसी संस्कारी औरत जिसने कभी शराब सोचा नहीं था, वो एक घूंट पीने के बाद मुंह बना बैठी और काफी सारा बाहर फेंक दी। अंजू बोली," छि ई कितना गंदा है, लोग कइसे पियलन स। अरुण ने कहा," अंजू मौसी आराम से। धीरे धीरे चुस्की ले। और चखना खो।" अंजू ने वैसा ही किया। इस बार भी उसने मुंह बनाया पर घूंट लगा ली। फिर नमकीन खा ली। अंजू और अरुण बिना कुछ बोले एक पैग खत्म कर चुके थे। अंजू के लिए तो एक पैग ही काफी था। उसपे नशा तो नहीं मस्ती छाने लगा था। उस भोली भाली औरत को अरुण बिगाड़ने में लगा हुआ था। अरुण जानता था कि अगर वो थोड़ा सी मस्ती में भी रहेगी तो उसको तोड़ना आसान हो जाएगा।
अंजू बोली," हाँ अरुण बोलआ, तू का कहे चाहत रहेलु।
अरुण," अंजू मौसी तू बुरा मत मानिहआ लेकिन हम सोचातानि मौसा तहराके छोड़के खुदे दुबई में रहेले ई गलत कइले बा। तहरा जइसन जोरू हमार रहती त कभू छोड़ का ना जयति। हमके त तरस आता उ आदमी पर जउन तहरा जइसन औरत के छोड़ के गायब बा। ओकरा पता नइखे की कउन चीज़ छूट गईल।
अंजू अरुण की आंखों में देख बोली," जउन किस्मत में बा उ त होके रही। हमार किस्मत में तहार मौसा के प्यार नइखे।"
अरुण," ओकर किस्मत में तहार प्यार नइखे। तू त एतना खूबसूरत हउ, तहके त ई उमर में भी बियाह हो जाई। नौजवान लइका सब भी लाइन में लग जाई।"
अंजू बोली," हमके अंदर ही अंदर अभी बहुत गुस्सा बा, आ रहल बा।"
अरुण," फोन ल अउर मौसा जी के मिलावा। हालि हालि कर।"
अंजू," का, ओकरा काहे फोन लगाई? उ हुइन्हे उ पाकिस्तानी लइकी संगे।
अरुण," तू लगाबआ और ओकराके खूब गारी द। जेतना गंदा गंदा गारी आवेला।"
अंजू," ओसे का होई।
अरुण," खूब सुकुन मिली। और उसने फोन से कॉल मिला दिया। उधर से उसका मौसा फोन उठाके हेलो बोला। अंजू बोली," हम बोलतानि, मज़ा आ रहल बा पाकिस्तानी औरत के साथे।" उधर से उसका पति घबराके ," त... त तहके के बताईलस अंजू।" अंजू," सवाल ई ना सवाल ई करआ कि का हम तहके माफ करब की ना। अउर जवाब बा ना।" उधर से आवाज़ आयी," आ...अ.. अंजू सुना त सही।
अंजू अब रौद्र रूप में आ गयी, और बोली," जेतना तहार पति मानके इज़्ज़त करे रहनि, अब उतना ही तहार तिरस्कार करब। अब से तहार हमार रिश्ता खतम। साले मादरचोद, भड़वा, कुकुर के औलाद, तहार माई रंडी, तहार बहिन रंडी। तू साला दलाली करिले ना। कुत्ता हरामी सुवर साला तहरा नरक में जगह ना मिली। मरबू त कीड़ा परिहें साले, तू तहार पूरा खानदान पछताहिये। भोंसड़ीवाला तहरा कभू सुकून ना मिली। तहार माई गली गली चुदवा के तहरा पइदा कइले बा, पते नइखे बाप के बा। अगर तू इँहा आइबु त, तलाक़ के पेपर बनवा लिहा, हरामखोर।"
और फोन काट दिया। उसके मुंह से गालियां सुनके उसका पति जितना हैरान था, उससे ज़्यादा हैरान अरुण था। अंजू उसकी ओर देख बोली," बड़ा हल्का बुझाईल अरुण। तू बड़ा बढ़िया रास्ता बताइलु। अब?
अरुण," देख अंजू मौसी जिंदगी में हँसना जरूरी बा एहीसे दुख केतना बड़का आये, लेकिन ओकराके डट के सामना कर। कभू आपन इच्छा के मत मारआ। एक्के जिनगी बा ओकरा बर्बाद नइखे करे के।
अंजू," हम औरत हईं अरुण। हम आपन मर्ज़ी से ना जी सकीले। ई समाज गलत नज़र से देखे लगी। हम त जाने केतना इच्छा मार डालनी।"
अरुण," एगो बात बताबा अंजू, समाज वाला अभी कहां बारे, जब तहार पति के दोसर चक्कर चल रहल बा। उ आपन जिंदगी के मज़ा ले तारे, तू आपन ले।"
अंजू," अरुण ई कइसे संभव बा ?
अरुण," सबसे पहिले आपन दिल के सुन कि उ का चाहआ तारे। फेर जीवन के खुशी खातिर बिना केकरो परवाह किये बिना ओकरा हासिल कर ले। मन के खुश करे खातिर अगर कुछ अनुचित करे के पड़े, त उ भी कर। जउन में तहके संतुष्टि मिले।
अंजू अब धीरे से उसका इशारा समझ रही थी और उसपे मस्ती छा रही थी। उसका आँचल लुढ़क चुका था और उसका ब्लाउज सामने से पूरा दिख रहा था। उसकी बड़ी बड़ी चुच्चियाँ तनी हुई थी।वो कुर्सी पर पैर ऊपर करके बैठी हुई थी। अंजू फिर अपना सर कुर्सी के पीछे कर बोली," अरुण तू त बड़ा प्यारा प्यारा बात करेले। आपन उमर से उठके बात करिले। काश तहार सोच समाज के सब पुरुष में होत। काश तहरा जइसन हमार प... " और वो चुप हो गयी।
अरुण," बोल बोल चुप काहे हो गईलु। इहे औरत के सबसे कमज़ोरी बा, मन के बात मन में रख लेले। अरे जब तलिक बोलबे ना, तब तक जिनगी असही दुराहा पर रही।"
अंजू उसे घूरके देख रही थी। उसकी आँखों में अरुण के प्रति प्यार और सम्मान सा प्रतीत हो रहा था। ऐसा बिल्कुल नहीं था कि अंजू नशे में थे, बल्कि थोड़ी सी शराब से वो मस्त हो गयी थी। वो अरुण के पास आई और बोली," अरुण एगो बात पूछी सच सच बताइहा।
अरुण," पूछा ना मौसी।"
अंजू उसकी ओर एकटक देखते हुए बोली," तू हमरा बारे में का सोचेले। आज जउन तू हमरा संग ट्रैन पर कइलस, उ कउनो भांजा मौसी संगे ना कर सकिले।
अरुण उठ खड़ा हुआ और अंजू को बिना पलक झपकाए देख बोला," तहके का लागत बा। तहके त बुझात होई की हम हवसी दरिंदा हईं। जउन आपन मौसी के पीछे पड़ल बा। पर सच त इह कि हम तहसे प्यार करेनी। अउर ऐमे हमार गलती ना ह। गलती ना तहार बाटे। गलती त साला ई दिल के बाटे जउन तहके आपन बनावे चाहे ले। तहार जइसन खूबसूरत औरत पास होई, त केहू कइसे ना देखे, कइसे ना चाहेला। आई लव यू अंजू।" अरुण ने बेझिझक होकर एक सांस में सब बोल दिया। अंजू उसकी बातें सुन अवाक थी। क्या रिश्तों के बीच भी प्यार ढूँढा जा सकता है? क्या कोई भांजा अपनी ही मौसी को चाह सकता है? क्या अरुण के साथ वो अनोखा बंधन जोड़ सकती है? वो ये सब वहीं अरुण के बांहों में खड़े हुए सोच रही थी। अचानक उसके मन के सवाल जाने कब उसके होंठों पर बुदबुदाने लगे। और अरुण ने ये सब सुन लिया। अरुण उसे देख बोला," अंजू तहार पहचान का ह? अरुण के मौसी, माई के बहिन या नीतू के मम्मी। ई सबसे पहिले तहार पहचान ह एक औरत के। उ औरत जउन हर पल हर घड़ी कुर्बानी देवेलि। कभू केकरो बेटी बनके, कभू केकरो पत्नी बनके त कभू केकरो माई बनके। रिश्ता नाता प्यार में कोई मायने ना राखेला। मायने बा सच्चा प्यार ढूंढे के। तू अगर आपन मन में झांक के देखबू त उहू तहराके इहे जवाब दी।" अरुण ने अपना आखरी दांव खेला और अंजू के चेहरे को पकड़ उसके होंठों को चूमने लगा। अंजू खुद को भुलाकर उसकी बांहों में पिघलने लगी। लेकिन अगले ही पल वो शर्मा के उसकी बांहों से दूर हो गयी और वहां से भागने लगी। अरुण ने उसका आँचल पकड़ लिया। उसने खड़े होकर अपना आँचल दोनों हाथों से वापिस लेना चाहा। पर वो ऐसा कर नहीं पाई। अरुण उसके आँचल को अपने हाथों से लपेटते हुए, उसके करीब आया। अंजू की सांसें तेज़ चल रही थी। अरुण के पास आते ही अंजू बोली," अरुण एतना पास ना आ, हमके डर लाग रहल बा।" अरुण उसके कमर में हाथ डालके बोला," हम आज तहार सब डर दूर कर देब। अगर तू खुश रहे चाहा तारू, त ई डर के तहके सामना करे के पड़ी।" और वो अंजू की काली साड़ी उतारके वहीं फर्श पर फेंक दिया।अंजू उसका साथ तो नहीं दे रही थी, पर उसका विरोध भी नहीं कर रही थी। अरुण को जैसे ही लगा कि अंजू उसके काबू में आ गयी, उसी समय वो भाग उठी और अपने कमरे में घुसकर दरवाज़ा बंद कर छिटकनि लगा दी। उसकी सांसें तेज़ चल रही थी। उसकी उन्नत चूचियाँ उसकी चढ़ती गिरती साँसों के साथ ऊपर नीचे हो रही थी। बाहर अरुण उसके दरवाज़े पर अब आके खड़ा हुआ था। अरुण दरवाज़ा खटखटा रहा था, पर अंजू दरवाज़ा खोली नहीं बल्कि वहीं दरवाज़े पर बैठ गयी। थोड़ी देर अरुण उसका दरवाज़ा खटखटाया फिर वो निराश होकर हॉल में ही लौट गया। वो ये जान गया था कि अंजू के अंदर दबी चिंगारी अब लौ का रूप ले चुकी है और उसके सूखे जीवन में ये आग की लपटें जल्दी ही फैल जाएगी। वो वापिस आके देखा दारू की बोतल में एक पैग के बराबर दारू बची थी। उसने फौरन एक पेग बनाया और टी वी में सेक्सी गाना चलाकर देखने लगा।
दूसरी ओर अंजू उसके दरवाज़े से दूर जाते कदमों की आहट सुन रही थी। उसका मन अभी भी असमंजस में था। एक स्त्री जो कुछ घंटे पहले तक एक पतिव्रता नारी थी, वो अब अपने ही भांजे के साथ रिश्तों का मान मर्दन कर रही थी। वो वहीं बैठी बैठी सोच रही थी, कि क्या ये कदम उठाना चाहिए? क्या अपने से आधे उम्र के लड़के के साथ जो कि उसकी बहन का भाई है, उसके साथ ये संबंध बनाने चाहिए? क्या इससे उस रिश्ते की पवित्रता कलंकित नहीं होगी, जो एक तरह से मां बेटे का ही रिश्ता था? क्या उसे अपने अंदर की कामुक स्त्री को खुली छूट दे देनी चाहिए? क्या पति की बेवफाई उसे पतिव्रता स्त्री के बंधन से मुक्त कर चुकी थी? क्या इसके बाद अरुण के नज़रों में वो पहले जैसे ही सम्मानित रहेगी? क्या उसे अरुण के साथ रिश्ते की एक नई डोर जोड़ लेनी चाहिए? और ना जाने ऐसे ही कितने सवाल थे? वो चलते हुए अपने कमरे की अलमारी की ओर गयी जहां शीशा लगा हुआ था। खुदको आईने में देख उसने अपने बाल खोल दिये और जैसे खुद की आंखों में देख उन्ही सवालों के जवाब ढूंढने लगी। उसने मन को समझाते हुए बुदबुदाते हुए बोली," ये कदम उठाने में कोई बुराई नहीं अंजू। इसमें गलत ही क्या है? अरुण ने अपने प्यार का इजहार कर दिया है। उसे अपनी सगी मौसी से प्यार करने में दिक्कत नहीं है। प्यार में उमर कोई मायने नहीं रखती। शायद वो ना होता तो आज वो एक बेकार से पति के लिए अपनी जान दे बैठती। अगर अरुण उसका भांजा है,तो इसमें उसकी क्या गलती है? कोई नहीं। प्यार तो रिश्तों नातों से परे है। रिश्ता कलंकित तब होगा जब उनके बीच संबंध के बारे में कोई जानेगा। ये बात वैसे भी गुप्त ही होती हैं। ये सिर्फ पति की बेवफाई नहीं बल्कि उसके अंदर की कामुक स्त्री की मांग थी। जाने कितने दिन से उसने अपने अंदर की प्यास दबा रखी थी। खुद को आज़ाद हो जाने दो, और जिंदगी का लुत्फ उठाओ। जाओ जाओ।"
अरुण बाहर अभी भी टी वी इसी इंतज़ार में देख रहा था कि अंजू दरवाज़ा खोलेगी। वो रह रहकर एक झलक दरवाज़े को देख रहा था। पर हर बार नाउम्मीदी ही हाथ लगती थी। उसने घड़ी की ओर देखा रात के पौने ग्यारह बज रहे थे। अरुण भी थक चुका था, और उसे नींद की वजह से उबासी आ रही थी। तभी उसके कानों में छिटकनि खुलने की आवाज़ आयी। उसने मुड़के देखा अंदर का दरवाजा खुला और अंदर से अंजू बाहर आई। अंजू के देख उसका मुंह खुला रह गया। अंजू सिर्फ एक तौलिये में खुद को लपेटे उसके सामने आ खड़ी हुई। उसकी मोटी जाँघे और ऊपर से उसकी चूचियाँ झलक रही थी। वो आयी और उसने पहले धीरे धीरे पायल की शोर करते हुए टी वी की ओर गयी और उसे बंद किया। फिर वो अरुण के करीब आयी और उसकी आँखों में देखते हुए बोली," अरुण हम अभी तहसे कहनि कि तू जब हमार पास आवेले त हमके डर लागअता। हमके ई डर के सामना करेके पड़ी। काहे कि आज से और अभी से हम अब आपन दिल के सुनब। और एहि खातिर रिश्ता के आखरी दीवार गिरा रहल बानि। और उसने वो तौलिया वहीं गिरा दिया। अंजू सम्पूर्ण नग्न अवस्था में थी। उसके बदन पर एक इंच कपड़ा नहीं था। वो अरुण की ओर बेशर्मों की तरह देख रही थी। उसने खुदके और अरुण के बीच रिश्तों की दीवार लांघ ली थी। और अरुण इसी का इंतज़ार कर रहा था। अंजू उसके सामने पूरी नंगी वैसे ही खड़ी थी। अंजू अपने दोनों हाथ सर के पीछे उठा ली और खुद के नंगे जिस्म को सर से लेकर पैर तक प्रदर्शनी में लगा दी। उसके बाल खुले हुए थे, उसने अपनी गर्दन उठा रखी थी, उसकी लंबी गर्दन बहुत सेक्सी लग रही थी, उसके चुच्चियाँ कड़ी होकर पूरी तरह तनी हुई थी, उसके कांख सांवले कांख में मौजूद रेशमी बाल उसे और आकर्षक बना रहे थे। उसकी कमर में थोड़ी चर्बी जमा थी, पर इस उम्र में औरतों पे ये हल्की वसा काफी आकर्षक लगती है। उसकी ढोढ़ी लंबी और गहरी थी। उसकी मांसल जाँघे उसके शरीर का वजन संभालने के लिए सक्षम थे। उसके पैर भी काफी मजबूत थे, जिनके वजह से वो काफी फुर्तीली थी। उसका दाहिना घुटना अभी हल्का आगे की ओर मुड़ा हुआ था। उसके दोनों पैरों की दो उंगलियों में बिछिया पहनी हुई थी। उसके पैरों में पायल बहुत ही कामुक लग रही थी। अरुण अंजू की नंगी कमर में हाथ डाला और अपनी बांहों में ले लिया। फिर अंजू के चेहरे को अपने हाथ से पकड़ लिया, और बोला," अंजू मौसी कहीं तू ई आपन पति के बेवफाई में क रहल बारू या हमार प्यार तहपे जादू कइलस।"
अंजू बोली," आज दु चीज़ होई अरुण, एक हमार तहार प्यार एक नया रिश्ता के शुरुवात होई, हाँ दोसर कि आज तहार साथ पाके हम आपन पति के बेवफाई के ग़म करब।" ऐसा बोलके उसने अपने गुलाबी होठ अरुण की ओर बढ़ा दिए। उसकी आंखें स्वतः बंद हो चुकी थी। अरुण के बांहों में अंजू किसी जीती हुई ट्रॉफी की तरह लग रही थी, जिसे वो हर हाल में चोदना चाहता था। अरुण मन ही मन बोला," सबर के फल मीठा होखेला" और फिर उसने अंजू के होंठ पर अपने होठों की मुहर लगा दी। अंजू उसके चुम्बन से मचल उठी। वो उसके सर को पकड़ सहला रही थी। दोनों एक दूसरे के होंठ ऐसे चूस रहे थे, जैसे उनमें से मधुरस बह रही हो। फिर ना जाने दोनों की जीभ एक दूसरे के मुंह में कुश्ती करने लगी। दोनों एक दूसरे को प्यार से पटखनी दे रही थी। अरुण के मुंह के हर हिस्से में अंजू अपनी जीभ टहला रही थी। अरुण उसके मुंह की लार को महसूस कर रहा था। फिर अरुण की जीभ ने अंजू के मुंह का जायजा लिया। उसने अंजू के मुंह में काफी सारा थूक दे दिया। अंजू उस मदन रस को सहर्ष स्वीकार करती रही। दोनों एक दूसरे में खोए हुए थे। अंत में सांस उखड़ने से दोनों अलग हुए। दोनों कुछ पल अलग रहे और फिर वापिस उसी क्रिया में संलिप्त हो गए। अरुण तो अंजू के होंठ समेत उसकी गाल, कान के नीचे, ठुड्ढी के आसपास के क्षेत्र को चाट रहा था।
अरुण अंजू से बोला," अंजू मौसी जब तहके ई करहि के रहल त पहिले कमरा में भाग काहे रहलु।"
अंजू," हम औरत बानि अरुण, तहरा जइसन मरद ना। हमके बहुत चीज़ सोचेके परल। मरद के जात छछुंहर होला, रिश्ता नाता देखे बिना केहुके चोद दी। मरद कुछो करेला पर इल्जाम औरत पर ही लागतआ। औरत तेरियाचरित्र होवेली। जउन मरद सुख दी, ओके खूब खुश रखी। हम बहुत सोच विचार कइके, तहरा साथ ई रिश्ता बनावतानी। इमे ना हमार नुकसान ह आ तहार त हैय्ये नइखे। दुनु के रिश्ता अकेले में बंद कमरा में होई। जहां हम अंजू मौसी ना खाली अंजू रहब और तू हमार भांजा ना हमार आशिक़ अरुण रहबा।"
अरुण," वाह अंजू मौसी तू त दिल जीत लेलु। आज हम तहके देखहिया केतना मज़ा करावतानी।"
अंजू उसके होठ पर उंगली रख बोली,"अंजू मौसी ना खाली अंजू बोल, जान बोल, रानी बोल मोर राजा।"
अरुण को याद आया कि ऐसी ही बात अंजू ने सपने में बोली थी। उसने तुरंत अंजू की कमर में चिकोटी काट ली।
अंजू चिंहुँक उठी और बोली," ई चिकोटी काहे कटलस। अरुण ने फिर उसे सपने की सारी बात बताई। अंजू फिर हंसते हुए बोली," त तू ई तसल्ली करे चाहेलु, कि हम असल में बानि।"
अरुण," सच हमके अभी भी विश्वास नइखे हो रहल, कि तू हमार साथे अईसे नंगी बारू अंजू।"
अंजू बोली," अरुण हमके आज अईसे चोदा, कि हम आपन जिनगी के सब ग़म भुला जाई।"
अरुण," ई त तोहरे पर निर्भर बा अंजू, काहे से चुदाई में औरत जेतना खुलके चुदी, जेतना बेबाक और निडर होई। तभी मज़ा आवेला।"
अंजू," हम जानत बानि, एहीसे हमके हमार कमरा में हमार बिस्तर पर ले चल जहां मोर पति मोके चोदने रहनि। ओहि बिस्तरवा पर आज राति तू और हम आपन रिश्ता के शुरुवात करब।" अंजू की बात सुन अरुण काफी उत्साहित हो गया। और उसे बिना एक भी पल गवाए अपनी बांहों में उसके कमरे में ले गया। आज रात दोनों के बीच काफी प्रगाढ़ संबंध स्थापित होनेवाला था। अरुण भले ही इक्कीस साल का था, पर 42 साल की अंजू जिसका वजन साठ किलो के आसपास था, उसे आराम से गोद में संभाले हुए थे। अंजू मुस्कुरा रही थी, और अरुण उसके मुस्कुराते चेहरे को देख रहा था। अरुण कमरे में घुस दाहिने ओर मुड़ा और बिस्तर के करीब पहुंच अंजू को धीरे से बिस्तर पर रख दिया। अंजू उसे अपने ऊपर ही खींच ली। अब उस बिस्तर पर अरुण उस घर की मान मर्यादा को लूटने वाला था। इस घर की इज़्ज़त के साथ तो वो पहले ही खेल चुका था। इससे पहले की वो अंजू को चोदता, उसने कमरे में पूरी रोशनी कर दी। अभी तक उस कमरे में रोशनी नहीं थी। उसने लाइट जला दी, जिससे अंजू और अरुण इन लम्हों को खुद से देख पाए। अंजू की आंखों में लाइट जलने से थोड़ी शर्म आयी और उसकी नज़रे झुक सी गयी। अरुण उसके करीब आया और अंजू के गाल सहलाते हुए बोला," अंजू मोर जान, डर के सामना कर रानी, देख अब ई लाज शरम छोड़ द, काहे कि तू जेतना लजैबु उतना, ही मज़ा कम आयी। खुदके तू हमरा हवाले कर दे, सारा चिंता भूल के। आज राति तू हमार हउ, ई मत भूल।"
अंजू जो अब तक नज़रें झुकाए हुई थी, उसकी ओर देखते हुए बोली," अरुण खाली आज राति ना, अब त सब राति तहरा नाम कअ दैले बानि। अब हम तहार मौसी ना, एक अइसन विवाहित औरत बानि जउन आपन बिस्तर पर खुद दोसर मरद के सामने बिछ गईल बानि। आजु रतिया के यादगार बना द।"
अरुण उसके चूचियों को सहलाते हुए, चूम रहा था। कभी दाएं चूचक को तो कभी बाएं चूचक को। अंजू की चूचियों पर सालों बाद किसी मर्द ने अधिकार किया था। अरुण चूचियों को चूसते हुए, उन्हें खूब मसल रहा था। अंजू की कामुक सीत्कारें कमरे में फैल उठी। अंजू खुद अपने चूचियों को उठा उठाके अरुण के मुंह में घुसेड़ रही थी। उसके दोनों हाथ उसके सर के पीछे थे। वो कामुकता से ओत प्रोत अपना सर कभी दांये तो कभी बाएं कर रही थी। अंजू," आह आह...... आज असही हमार चुचिया के निचोड़ लअ। काश हमके दूध रहति, त तहके दूध पिलाउती। इशशश... आह....ऊ ऊ।"
अरुण अंजू के बदन से मस्ती से खेल रहा था। अंजू ने उसे खुली छूट दे दी थी। अरुण त इस मौके का पूरा फायदा उठा रहा था। उसने जीवन में पहली बार एक तजुर्बेदार, और इतनी कामुक स्त्री के साथ संबंध बनाए थे। अरुण उसके चूचियों को चूमकर जब छोड़ता तो वो उसकी थूक से गीले हो चुके होते। अंजू उसे बस ऐसा करते हुए देख रही थी। अरुण अंजू के साथ कोई पंद्रह मिनट यही कर रहा था। अंजू की बूर रिसने लगी थी। बूर से पानी ऐसे बह रहा था, जैसे कोई बांध खुल गया हो। अंजू कामुकतावश बोली," अरुण आह...आह... जाने केतना रात हम बिना चुदवायने बितैनी ह। केतना रात रिसत बूर लेके सुतनी ह। आज तू आपन लांड जल्दी से हमार बूर में घुसा द।"
अरुण उसे देख बोला," ना अंजू मौसी आज त तहार हमार प्यार के पहिल रात ह। और ई चीज़ के मज़ा जल्दी में ना आराम से लेल जाला। हम जानत बानि कि तू बहुत दिन से चुदवाइले नइखे। और तहार उम्र में औरत जात के चोदाबे के बड़ा मन करेला। लेकिन जल्दबाज़ी में तू मज़ा खो दैबु। अभी त रात शुरू भईल ह, पूरा राति अभी बाकी बा।"
ऐसा बोलके उसने अंजू के होठों को चूमा। फिर उसने अंजू की जांघों के बीच जगह बनाई और लेट गया। उसके सामने अंजू की हसीन बूर उसका स्वागत कर रही थी। बूर पर हल्के हल्के घुंघराले झांट थे, जिन्हें देख ये पता लगता था, कि उसने चार पांच दिन पहले ही बाल काटे हैं। अंजू की बूर बाकी देसी औरतों की तरह सांवली थी। उसकी बूर की सांवली पत्तियां गुलाब की नाजुक पंखुड़ियों की तरह कोमल थी। और वो किसी ताज़ा खिली हुई कली की तरह इतरा रही थी। अंजू हालांकि बहुत दिन से चुदी ना थी, पर पहले की चुदाई की वजह से बूर खुल तो चुकी ही थी, जिसकी वजह से अंदर का गुलाबी हिस्सा बाहर झांक रहा था। अरुण ने उसकी बूर को पहले निहारा, और ऐसे ही जायजा ले रहा था। फिर उसने बूर की फांकों को अलग किया, तो उससे चिपकी बूर का लसलसा पानी उसकी उंगलियों में लग गया। उसने सबसे पहले उसे चूसा और फिर अंजू की बूर में बड़ी उंगली डाल दी। वो अंजू की ओर कामुक दृष्टि से देखते हुए, बूर में उंगली आइस्ते से डाल रहा था। अंजू की कामुक आँहें, उफ़्फ़ माहौल को और भी कामोतेजक बना रही थी। अरुण उसकी जांघों को फैला जीभ उसके बूर पर छुवा दिया। अपनी कोमल बूर पर अरुण की लपलपाती जीभ का एहसास उसे काम सागर में गोता लगाने का अनुभव दिया। अरुण उसकी बूर को फैलाके अब अपनी जुबान से खिलवाड़ कर रहा था। बूर के हर हिस्से को वो चूम और चाट रहा था। बूर का दाना, अंदर का गुलाबी हिस्सा, उसकी पत्तियां, बूर के छेद में भी जीभ घुसाया और यहां तक कि मूत्राशय को भी नहीं छोड़ा। अंजू अपनी बूर चुसवाने में मगन थी, और अरुण उसकी बूर का मदन रस पीने में। बीच बीच में अंजू बड़बड़ाते हुए अरुण को और चूसने को बोलती। उसे विश्वास नहीं हो रहा था, कि अरुण इतना अच्छा बूर कैसे चूसता है। थोड़ी देर बाद अंजू बोल उठी," अरुण आह आह हहहह देखा आह हमार नि ...न...नकल गई लल, पीले हमार बूर के पानी।"अरुण उसके बूर से फूटती धार को पीने लगा। उसने अपने जीवन में ऐसा पहली बार देखा था, और अंजू की बूर से बहती धार को एक बार उसने मूत सोचा, पर उसे पता लग गया कि स्त्री उत्तेजना में जब स्खलित होती है, तो बूर से ऐसा द्रव्य काफी मात्रा में निकलता है। अच्छा हुआ कि अंजू की कामुक उन्माद भरी चीखें, घर के बाहर नहीं जा रही थी, वरना लोग सोचते कि उसका कोई बलात्कार कर रहा है। अंजू बिस्तर पर 5 मिनट यूँही लेटी रही। अंजू भले झड़ चुकी थी, पर उसकी कामाग्नि तो अभी भड़क रही थी।
अरुण," कइसन लगलस अंजू मौसी। मज़ा आईल।"
अंजू," बड़ा मजा आईल अरुण। लेकिन अइसन बुझात बा, कि खाना त खाईनी, पर मन ना भरल।"
अरुण उठा और अपना तना हुआ लण्ड अंजू को दिखाते हुए बोला," मन त तब भरी, जब तोर बूर में लांड घुसी। अंजू मौसी लेकिन उसे पहिले आके चूस लांड के।
अंजू खुद को संभालते हुए उठी और अरुण बिस्तर पर ही खड़ा हो गया। अंजू घुटने के बल बैठ गयी और उसके लण्ड को पुचकारने लगी। उसने ना जाने कितने दिन बाद लण्ड को छुवा था। अरुण का सुपाड़ा ठीक उसके होठों के सामने ही था। उसने ताबड़तोड़ गुलाबी सुपाड़े पर चुम्बन दे डाले। अरुण हर चुम्मे पर आँहें भर रहा था।
अंजू," जाने केतना दिन बाद हम कउनो लांड के देखले बानि। आज मन भर खेलब ई लांड के साथ।"
अरुण," लेला तहरे सेवा में आज हाज़िर बानि। आज तहार जे भी मन करे कर रानी।
अंजू उसका लण्ड लेकर चूसने लगी। उसने अपने एक हाथ से उसका लण्ड पकड़ रखा था, उसके हाथों की चूड़ियां खनखना के बज रही थी। अरुण उसके बालों को अपने हाथों में पकड़ रखा था। और मज़े से लण्ड चुसवा रहा था।
अरुण,"उफ्फ्फ, अंजू रानी का लांड चुसत बारू। और चूस ना, हाँ असही लांड के निचवा का जीभ चलाबेलु। तू त माहिर बारू ई काम में।" अंजू उधर इतने दिनों बाद मिले लण्ड को पूरा भोगना चाहती थी और भोग भी रही थी। उसके थूक से अरुण का लण्ड गीला हो चुका था। और उसकी लार उसके लण्ड से टपक रही थी। अंजू अपने मुंह के हर हिस्से को लण्ड से परिचय करवा रही थी। वो ये बात भूल चुकी थी, को सामने वाला लड़का उसकी बहन का बेटा है। वो कभी लण्ड पूरा मुंह में लेकर चूसती, तो कभी चूमने लगती। काफी देर चूसने के बाद, अंजू की बूर फिर गीली हो उठी और वो अपने बूर के दाने को रगड़ने लगी।
अरुण ने उसे लण्ड छुड़ाया, जिसे वो छोड़ना नहीं चाह रही थी। फिर अंजू पीठ के बल लेट गयी और अरुण उसकी जांघों के बीच बैठ गया। फिर अपना लण्ड हिलाते हुए अंजू की ओर देखा, जैसे अंदर जाने की अनुमति मांग रहा हो। हालांकि, वो इससे परिचित नहीं था, पर संभोग में जब तक स्त्री खुलके साथ ना दे,मज़ा नहीं आता। यहां तो अंजू ना सिर्फ तैयार थी, बल्कि अरुण से ज़्यादा उतावली थी। अपनी बूर को खुद फैलाकर अरुण से बोली," अरुण देखत का बारे, घुसा द हमार बूर में आपन लांड। हम एकदम पियासल बानि, लांड खातिर। तू आपन लांड से आज माई के बहिन के खूब चोद। तू ठीक कहले रहा, कि चुदाई के मज़ा बेशर्मी में ही आवेला।"
अरुण अपना लण्ड अंजू के बूर के मुहाने पर लगाया और कमर के झटके से अंदर घुसा दिया। वैसे तो बूर से काफी पानी आ रहा था, पर जिस बूर में सालों से लण्ड ना गया हो, उसे भी एहसास तो हो ही जाता है। अंजू उस एहसास से गुजरी तो एक हल्की चीख निकल पड़ी, लेकिन थोड़ी देर में ही वो अरुण के लण्ड की आदि हो गयी। अब अरुण अंजू के ऊपर लेटकर कमर हिलाते हुए उसकी बूर चोद रहा था। दोनों एक दूसरे को देखते हुए चुदाई का आनंद ले रहे थे। अंजू की आंखों में खासकर चुदने की ललक कुछ ज़्यादा ही थी।
अरुण ने अंजू को चूमते हुए कहा," अंजू रानी, मज़ा आ रहल बा, चुदाबे में?
अंजू," हाँ बता ना सकेनी, की केतना मज़ा आ रहल बा अरुण। आह हहहह।
अरुण," हमके त विश्वास ना हो रहल बा, कि हम तहके तहार बिस्तर पर तहार घर में चोदे रहल बानि। तहरा जइसन केहू नइखे।"
अंजू," ई सपना ना हक़ीक़त बा अरुण, हम त तहार दीवानी हो गइनी, तहार मौसी बानि उसे का। तू आज ई घर के मान मर्यादा लूट रहल बारू, काहेके हम लुटा रहल बानि।
अरुण," अगर तहार पति के पता चली कि तू पराया मर्द से रिश्ता रखेलु फिर का होई?
अंजू," उ अब हमार पति नइखे, तू बारा। उ अब इँहा आवेके हिम्मत ना करिहन। अब आके का करिहन, सब दौलत खजाना त लुटा गईल।"
वो हंसते हुए बोली। ऐसे में उनकी चुदाई जारी थी। अरुण और वो पिछले 15 20 मिनट से चुदाई में लगे हुए थे। थोड़ी ही देर में उसका बदन अकड़ने लगा। वो और अंजू एक साथ झड़ गए। उनकी काम क्रीड़ा एक ढेड़ घंटे चली थी। उस रात उसने अंजू को सुबह चार बजे तक रुक रुक के तीन बार चोदा। फिर थकान से वो बिस्तर पर एक दूजे की बांहों में सो गए। अंजू के मन में अब कोई भी ग्लानि, या पछतावा नहीं था।