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यह कहानी का वह पन्ना है जहाँ मासूमियत की चिता जल चुकी है और एक 'एंटी-हीरोइन' का जन्म हो रहा है। रंगा ने जिसे अपनी दुनिया माना, वो दरअसल एक ऐसी आग है जो पूरे साम्राज्य को भस्म करने निकली है।
पेश है वीणा का वह रोंगटे खड़े कर देने वाला बैकग्राउंड और उसकी पावरफुल एंट्री:वीणा: मासूम चेहरा... खूँखार फितरत!
"चेहरा मखमल जैसा... पर नीयत असुरों वाली! यह वो गुलाब है जिसे छूने वाले को काँटा नहीं मिलता, सीधा ज़हर मिलता है। ये प्यार करना नहीं, खून पीना जानती है!"

राजस्थान का वो शाही शहर... जयपुर (पिंक सिटी)! जहाँ की हवाओं में राजपूती आन और बान की महक है, वहीं एक बेहद सभ्य, संस्कारी और मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी थी यह वीणा। लेकिन क्या उसका नाम वाकई वीणा है? शायद उसे मीना कहना सही होगा... या फिर वर्षा... या शायद माया! उसके पास तो न जाने कितने चेहरे और कितने नाम हैं, हर शहर में एक नया नकाब! खैर, फिलहाल के लिए उसे रंगा की 'वीणा' ही रहने देते हैं, क्योंकि यही नाम रंगा की मौत के वारंट पर लिखा जाने वाला है।
घर में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, पर वीणा की नज़रें हमेशा आसमान छूने के ख्वाब देखती थीं। कॉलेज की उन अमीर सहेलियों को देख उसके भीतर जलन की एक ऐसी आग सुलगती थी जिसे बुझाना नामुमकिन था। उनकी कलाई पर बंधी लाखों की घड़ियाँ, गले में चमकते करोड़ों के हीरों के हार... उन्हें देखते ही उसके मन में बस एक ही बिजली कौंधती— "ये सब मेरा होना चाहिए... सिर्फ मेरा!"
यहीं से उसके भीतर लालच का वो ज़हरीला बीज पहली बार बोया गया।
वह लालच कोई मामूली भूख नहीं थी, वह एक रूह कंपा देने वाला जुनून था। जब इंसान के सिर पर अपनी औकात से बड़ी चीज़ पाने का भूत सवार हो जाए, तो वो किसी भी हद तक गिरने की हिम्मत जुटा ही लेता है।
लालच ने जब वीणा की आँखों पर पट्टी बाँधी, तो उसने अपनी ही उस सहेली का करोड़ों का हीरों का हार साफ़ कर दिया, जो उसे अपनी बहन मानती थी। एक मासूम परी की तरह दोस्ती की कसमें खाते-खाते, उसने मौका मिलते ही वह जेवर उड़ा दिया।
लेकिन पाप का घड़ा एक दिन फूटता ही है। जब सहेली के घरवाले सुराग ढूँढते हुए आए, तो सबूतों ने चीख-चीख कर गवाही दी कि चोर कोई और नहीं, खुद वीणा है! वीणा के माँ-बाप शहर के बड़े इज़्ज़तदार और शरीफ लोग थे, इसलिए उन लोगों ने रहम खाया:
"देख छोरी! तेरे बाप की पगड़ी और तेरी माँ की इज़्ज़त की खातिर तुझे पुलिस के हवाले नहीं कर रहे। आइंदा ऐसी नीच हरकत मत करना!" चेतावनी देकर उन्होंने अपना हार लिया और उसे विदा कर दिया।
लेकिन वीणा के सीने में पछतावा नहीं, बल्कि नफरत की आग जल रही थी। उसे यह बर्दाश्त नहीं था कि उसके हीरों वाले सपनों और ऐशो-आराम के बीच उसके माँ-बाप की ये 'खोखली मर्यादा' आए। "बेटा मेहनत करो... इज़्ज़त से जियो..."—ये सब नसीहतें उसे कचरे के डिब्बे में डालने लायक लगती थीं।
उसे समझ आ गया कि इस छोटे शहर और इन शरीफ लोगों के बीच उसकी दाल नहीं गलेगी। फिर क्या था? एक आधी रात को, जब पूरी दुनिया सो रही थी, वीणा ने अपने ही घर की दहलीज़ लांघ दी। रिश्ते-नाते, माँ की ममता, बाप का सर—उसने मुड़कर कुछ भी नहीं देखा। उस वक्त उसकी उम्र महज़ बीस साल थी, पर कलेजा किसी मंजे हुए अपराधी जैसा!
घर से भागी हुई इस 'शिकारी' ने अपना अगला ठिकाना चुना सपनों के शहर— मुंबई को! वहाँ वह एक बहुत बड़े करोड़पति परिवार में 'नौकरानी' बनकर दाखिल हुई। लेकिन याद रखना दोस्तों, वह वहाँ झाड़ू-पोछा करने नहीं, बल्कि उस पूरे साम्राज्य का सूपड़ा साफ़ करने आई थी!
ऊपरवाले ने उसे जो चेहरा दिया था, वह उसके लिए किसी खूनी वरदान से कम नहीं था।
"माथे पर चंदन का एक बारीक तिलक, छोटी सी बिंदी और चेहरे पर हमेशा एक बेचारी सी लाचारी... उसे देखकर तो साक्षात यमराज भी अपना फंदा फेंककर उस पर तरस खा जाए!"

अपने चेहरे के हाव-भाव से पत्थर को भी मोम बना देना और किसी को भी मात दे देना—ये कला उसे बखूबी आती थी। वह एक ऐसी अदाकारा थी जिसके लिए पूरी दुनिया एक रंगमंच थी और हर इंसान महज़ एक शिकार!
मुंबई की उस चकाचौंध भरी दुनिया में वीणा ने अपना जो जाल बिछाया, उसने एक रसूखदार साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी। उस घर का मालिक, जो सोने और हीरों के धंधे का बेताज बादशाह था, उसने अपनी ज़िंदगी में हज़ारों शातिर चेहरे देखे होंगे, पर वीणा की उस 'भक्ति' और 'गंगा जैसी पवित्र' मासूमियत के आगे उसकी सारी समझ धरी की धरी रह गई।
"इतनी सुशील, संस्कारी और सलीकेदार लड़की... आखिर ये नौकरानी बनने पर मजबूर क्यों हुई?"—जब तक उस बूढ़े ने यह सोचना शुरू किया, वीणा आधी जंग जीत चुकी थी!
लेकिन ठहरिए! मुंबई की उस आलीशान हवेली में वीणा अकेली शिकारी नहीं थी। साज़िश की इस बिसात पर उसका साथ देने के लिए ड्राइवर बनकर आया था— राजेश!
शुरुआत में दोनों अजनबी बनकर उस घर में घुसे थे। लेकिन एक जैसी गंदी नीयत और रूह कंपा देने वाले लालच ने जल्द ही उनके बीच एक 'खतरनाक केमिस्ट्री' बना दी। देखते ही देखते दोनों के बीच इश्क परवान चढ़ा, पर वो कोई लैला-मजनू वाला प्यार नहीं था; वो तो दौलत की भूख से पैदा हुआ एक 'क्रिमिनल रोमांस' था!
"जिस्मों का मेल तो सिर्फ एक बहाना था, असली मकसद तो उस हवेली की तिजोरी का खज़ाना था!"
घर के अंदर वीणा ने अपनी 'बेचारी' वाली सूरत से मालिक का अटूट भरोसा जीता, तो बाहर राजेश ने अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से घर की कमाई और तिजोरी के हर गुप्त राज़ उगलवा लिए।
वह बुजुर्ग करोड़पति वीणा की सादगी का ऐसा मुरीद हुआ कि उसे सही और गलत का फर्क दिखना बंद हो गया। इसी का फायदा उठाते हुए, एक काली रात को वीणा ने अपनी 'मर्यादा' का पल्लू सरकाया और सीधे उस बूढ़े के बिस्तर तक पहुँच गई। हवस ने जब उस बूढ़े की आँखों पर पट्टी बाँधी, तो वह वीणा के मकड़जाल में पूरी तरह फँस गया।
नतीजा?
अगली सुबह सूरज निकलने से पहले ही, करीब दो करोड़ रुपये की नकदी और पुश्तैनी जेवर समेटकर वीणा और राजेश हवा हो गए!

वह करोड़पति चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया। समाज में उसकी साख इतनी ऊँची थी कि अगर दुनिया को पता चलता कि एक मामूली नौकरानी ने उसे लूट लिया है, तो उसका वजूद मिट्टी में मिल जाता। अपनी 'इज्ज़त' बचाने की खातिर उसने पुलिस में रिपोर्ट तक नहीं की और अकेले में खून के आँसू रोता रहा।
उन दो करोड़ रुपयों के दम पर वीणा और राजेश ने कुछ समय तक शहंशाहों वाली ज़िंदगी जी। ब्रांडेड कपड़े, महंगी गाड़ियाँ और बेहिसाब ऐयाशी... लेकिन याद रखना दोस्तों:
"लालच उस खारे पानी की तरह है, जिसे जितना पियो, प्यास उतनी ही बढ़ती जाती है!"
जैसे-जैसे वो दो करोड़ खत्म होने लगे, वीणा की आँखों में फिर से वही शिकारी भूख जाग उठी। अब शुरू हुआ असली खेल— नया भेस, नया शहर और एक नई खूनी साज़िश! शिकार का यह सिलसिला अब रुकने वाला नहीं था।
जयपुर और मुंबई की गलियों में छोटे-मोटे हाथ साफ करने के बाद, इस 'ज़हरीले जोड़े' की भूख अब बेकाबू हो चुकी थी। अब उन्हें चिल्लर और लाखों की चोरियाँ नहीं, बल्कि सीधा कुबेर का खज़ाना चाहिए था। वीणा की आँखों में एक वहशी चमक थी जब उसने राजेश के सीने पर उंगली गढ़ाकर कहा— "अब ये मोहल्लों की चोरियाँ बंद करो मामा... अब हाथ मारना है तो ऐसा कि हमारी अगली सात पीढ़ियां भी ऐश करें!"
और इसी खूनी लालच ने उनका रुख मोड़ा— राउडी रंगा की खौफनाक सल्तनत की तरफ!
जब रंगा के राजनीतिक रसूख और उस गुप्त करोड़ों के खज़ाने की भनक उनके कानों तक पहुँची, तो राजेश फौरन भेस बदलकर रंगा के इलाके में जा पहुँचा। एक महीने तक उसने साये की तरह रंगा की हर हरकत, उसके उठने-बैठने और उसके वफादार '5 भाइयों' के घेरे पर कड़ी नज़र रखी।
राजेश का कलेजा कांप गया। उसने लौटकर वीणा से कहा— "वीणा... ये कोई मामूली शिकार नहीं है। रंगा एक बेकाबू जंगली सांड है! उसके चारों तरफ फौलादी घेरा है। अगर एक छोटी सी चूक हुई, तो हमारी लाश उठाने वाला भी कोई नहीं बचेगा। ये मौत का खेल है, हमें ये रिस्क नहीं लेना चाहिए!"
पर वीणा... वो तो जैसे मौत की आँखों में आँखें डालकर मुस्कुराने वाली औरत थी। उसने हिकारत से राजेश की तरफ देखा और एक ठंडी मुस्कान बिखेरी— "यही तो असली खेल है मामा! जो किला जितना मज़बूत होता है, उसकी चाबी उतनी ही कीमती होती है। रंगा जितना सख्त है, उसे तोड़ने का मज़ा उतना ही ज़्यादा आएगा।"
राजेश ने दबी आवाज़ में आगे बताया— "वीणा... मैंने पता लगाया है कि रंगा औरतों के मामले में थोड़ा कच्चा है। उसे बाज़ारू या सजने-संवरने वाली औरतें नहीं, बल्कि संस्कारी, घरेलू और बेबस दिखने वाली औरतों के प्रति एक अलग ही खिंचाव महसूस होता है..."
इतना सुनना था कि वीणा का शातिर दिमाग बिजली की रफ़्तार से दौड़ने लगा। उसके होंठों पर एक कातिल मुस्कान फैल गई। "बस मामा! किसी शेर को गिराने के लिए बंदूक की नहीं, उसकी कमज़ोरी की ज़रूरत होती है। अब मेरा असली अवतार देखो!"
इन दो लोमड़ियों ने खुद को पूरी तरह बदल लिया। राजेश ने अपनी आँखों की पुतलियाँ मूँदकर 'अंधे' होने का हफ़्तों रियाज़ किया, ताकि कोई शक न कर सके। और वीणा? उसने खुद को एक दुखी, संस्कारी और बेबस लाचार औरत के सांचे में ढाल लिया।
यहाँ तक कि उन्होंने इस खूनी खेल में दो मासूम बच्चों को भी मोहरा बना लिया! वो बच्चे इनके अपने नहीं थे, बस एक 'कंप्लीट फैमिली' का नाटक रचने के लिए उन्हें पैसे देकर किराए पर लिया गया था। वीणा ने तय किया था कि जैसे ही रंगा का खज़ाना हाथ लगेगा, वो उन बच्चों को वापस छोड़ देगी।
हैरानी की बात तो ये थी कि वीणा की छाती से जो दूध निकलता था, वो कोई ममता नहीं, बल्कि कुछ मेडिकल दवाइयों का कमाल था! रंगा के दिल में उतरने के लिए उसने अपने शरीर तक के साथ खिलवाड़ किया, ताकि वो एक 'दूध पिलाती बेबस माँ' का नाटक पूरी शिद्दत से कर सके।
इलाके में आए अभी जुम्मा-जुम्मा दो ही दिन हुए थे कि वीणा ने अपनी साज़िश का ज़हरीला जाल फेंक दिया। उसे पता था कि रंगा जैसे शिकारी को फँसाने के लिए बंदूक नहीं, बल्कि 'बदन की खुशबू' और 'मर्यादा का ढोंग' चाहिए।
एक तपती दोपहर, रंगा अपनी ऊँची गद्दी पर बैठा वसूली का हिसाब देख रहा था, तभी उसकी खूँखार नज़रें गली से गुज़रती एक 'जीती-जागती मूरत' पर जाकर चिपक गईं।
सिर पर सलीके से रखा पल्लू, माथे पर एक नन्हीं सी बिंदी और आँखों में गंगा जैसी पवित्रता—देखने वाले को लगे साक्षात ल**िक्ष **मि ज़मीन पर उतर आई है! वो कोई और नहीं, शिकार पर निकली वीणा थी। वह बड़ी मासूमियत से रंगा की नज़रों के ठीक सामने रुकी और अपनी साड़ी की प्लेट्स ठीक करने लगी।

उस एक पल में, रंगा की भूखी आँखों ने वीणा की कमर के उस कातिल लचीलेपन और उसके बदन की सुराहीदार बनावट को ऐसे निहारा जैसे तपते रेगिस्तान में किसी प्यासे को ठंडा समंदर दिख गया हो।
और राजेश ने 'अंधे लाचार' पति का ऐसा सधा हुआ नाटक किया कि पूरे मोहल्ले की हमदर्दी उसकी जेब में थी। वहीं दूसरी तरफ, वीणा किसी ज़हरीले साये की तरह रंगा के वजूद के इर्द-गिर्द मंडराने लगी थी। रंगा जहाँ भी कदम रखते, वीणा अपनी उस मस्तानी चाल और कातिल नज़रों के साथ 'इत्तेफाक' से वहीं खड़ी मिल जाती।
बेचारे रंगा! उन्हें क्या पता था कि जिस हिरणी को वो अपनी बाहों में भरने के हसीन सपने देख रहे हैं, वो दरअसल उनकी कब्र खोदने आई एक भूखी लोमड़ी है।
जब वीणा जानबूझकर रंगा के सामने झुककर अपने 'किराए के बच्चे' की कमीज़ ठीक करती या अपनी तिरछी नशीली आँखों से रंगा को चोरी-छिपे निहारती, तो रंगा के फौलादी शरीर में बिजली सी कौंध जाती। उसकी सादगी के पीछे छिपी वो 'संस्कारी कामुकता' रंगा के शातिर दिमाग को सुन्न कर रही थी।
"जिस रंगा ने पुलिस की सैकड़ों गोलियां झेली थीं, अदालतों के अनगिनत केस हँसते-हँसते काटे थे... आज वो वीणा की एक 'मासूम मुस्कान' के सामने घुटने टेक चुका था।"
वीणा के उस बनावटी भोलेपन ने रंगा की सोचने-समझने की शक्ति ही छीन ली थी। रंगा को लग रहा था कि उसे 'गंगा' मिल गई है, पर हकीकत में वो मौत के उस 'गंदे नाले' की तरफ बढ़ रहा था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
ये औरत मुझे चाहिए... इसे पाने के लिए मैं कुछ भी कर दूँगा!"—बस, इसी एक ज़नूनी सनक ने रंगा का दिमाग़ सुन्न कर दिया था। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि वो एक ऐसे दलदल में कदम रख रहे हैं जहाँ से ज़िंदा लौटना नामुमकिन है, पर वीणा की वो 'कातिल' मासूमियत उन्हें चुंबक की तरह अपनी ओर खींच रही थी।
शतरंज की बिसात बिछ चुकी थी और मोहरे अपनी चालें चल रहे थे। रंगा कुछ महीनों के लिए एक ज़रूरी काम से दिल्ली गए हुए थे, और यही इन दोनों शिकारियों के लिए सुनहरा मौका था। राजेश ने पूरे मोहल्ले में ये ढिंढोरा पीट दिया कि कारखाने में एक भयानक हादसा हो गया और उसकी आँखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई।
उनका ये 'अंधेपन' का नाटक इतना सटीक था कि पत्थर दिल इंसान भी पिघल जाए। पूरे मोहल्ले में बस एक ही चर्चा थी— "हाय बेचारी वीणा! अब क्या होगा इस बेचारी का? दो छोटे बच्चे और ऊपर से ये अंधा पति... पहाड़ जैसी ज़िंदगी कैसे कटेगी?"
जब रंगा दिल्ली से लौटे, तो ये खबर उनके कानों से टकराई। वीणा का वो 'लाचार' चेहरा उनकी यादों में बिजली की तरह कौंध गया। उन्होंने अपनी बेवकूफी में सोचा कि मदद के बहाने वीणा के जिस्म और दिल के करीब जाने का इससे अच्छा मौका और कोई नहीं हो सकता।
रंगा अपनी ताकत और पैसे के घमंड में चूर थे। उन्हें लगा कि उन्होंने वीणा को अपनी शर्तों पर झुका लिया है। "कोई भी औरत मेरे खौफ और रसूख के आगे टिक नहीं सकती"—उनके इसी अहंकार को वीणा ने अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। उसकी चाल ही यही थी कि रंगा को लगे कि जीत उनकी हो रही है, जबकि गर्दन रंगा की फँस रही थी!
शुरुआत में जब भी रंगा उसके करीब आने की कोशिश करते, वीणा एक शरीफ घरेलू औरत की तरह तड़पने और विरोध करने का बेहतरीन नाटक करती। रंगा के हर स्पर्श पर वीणा का वो बनावटी संघर्ष और आँखों से गिरते झूठे आँसू रंगा को एक अजीब सी मर्दानगी का अहसास कराते। उन्हें इस बात का विक्षिप्त सुकून मिलता कि— "इस खूँखार शेर के सामने एक खूबसूरत गुलाब गिड़गिड़ा रहा है।" उन्हें भनक तक नहीं थी कि ये आँसू उनकी बर्बादी की कब्र खोद रहे हैं।
"नहीं रंगा ... ऐसा मत कीजिए! मेरे पति अंदर हैं, ये पाप है... छोड़ दीजिए मुझे!"—वीणा का ये सिसकने वाला नाटक रंगा को और भी पागल कर देता। उसका यही झूठा संघर्ष रंगा के लिए सबसे बड़ा चारा बन गया।

इसके अलावा, रंगा ने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल ये की कि उन्होंने वीणा को महज़ एक कमज़ोर और लाचार अबला समझ लिया। उसकी 'गरीबी' पर तरस खाकर उन्होंने उसे अपने ही गोदाम में काम पर रख लिया।
"मामा, ये हमारी पहली और सबसे बड़ी जीत है!"—वीणा ने राजेश के गले लगकर शैतानी ठहाका लगाया।
गोदाम में कदम रखते ही वीणा ने वहाँ होने वाले काले कारोबार की एक-एक परत उधेड़नी शुरू कर दी। उसे पता चल गया कि रंगा सिर्फ चावल के मामूली व्यापारी नहीं हैं, बल्कि हर बोरे के नीचे तस्करी का काला माल छिपा होता है। उस साम्राज्य का हर खूनी राज अब वीणा की मुट्ठी में था।
लेकिन उसका असली निशाना तो वो करोड़ों का स्वर्ण भंडार था! वो इस उलझन में थी कि आखिर वो कुबेर का खज़ाना छिपा कहाँ है, तभी रंगा खुद चलकर उस ज़हरीले जाल में आ गिरे।
वीणा पर अटूट भरोसे और अंधे प्यार की वजह से, रंगा की बुद्धि पर पत्थर पड़ गए थे। उन्होंने खुद वो 'गुप्त कमरा' उसे दिखा दिया जिसे उन्होंने पूरी दुनिया, यहाँ तक कि अपने दुश्मनों से भी छिपाकर रखा था। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी माँ और बहन—जिन्हें वो अपनी जान से बढ़कर मानते थे—उनसे भी वीणा की मुलाकात करवा दी।
"वीणा... ये मेरा परिवार है, मेरी दुनिया है। और अब से तुम भी मेरी इस दुनिया का हिस्सा हो!"—रंगा ने जज़्बाती होकर अपना कलेजा निकाल कर रख दिया।
जबकि वीणा की आँखें उन गहनों और सोने की ईंटों को देखकर लालच से खून की तरह लाल हो रही थीं। रंगा को लगा कि वो अपना दिल खोलकर दिखा रहे हैं... पर असल में वीणा उनकी गर्दन रेतने वाली छुरी की धार तेज़ कर रही थी।
तो दोस्तों... अब तक आपने देखा कि कैसे एक 'पत्थर' पिघल रहा था और एक 'फूल' ज़हर उगल रहा था। अब आपको समझ आ गया होगा कि यह वीणा कोई मामूली औरत नहीं, बल्कि वो काली आंधी है जो रंगा के सम्राज्य के परखच्चे उड़ाने आई है!
एक तरफ वो रंगा है जिसकी दहाड़ से पूरा शहर थर्राता था, और दूसरी तरफ ये शातिर लोमड़ी वीणा, जो अपनी एक मुस्कान से रंगा की किस्मत लिख रही है।
कान खोलकर सुन लो! अब आने वाले हिस्सों में किसी जज़्बात, किसी रहम या किसी नरम दिल की कोई जगह नहीं होगी... अब सिर्फ बारूद महकेगा, खून बहेगा, और धोखे का वो नंगा नाच होगा जिसे देखकर रूह काँप जाएगी!
"रंगा ने दुनिया के सैकड़ों दुश्मनों के सीने में पीतल उतारा है, पर उसे क्या पता था कि सबसे घातक वार उसकी अपनी 'परछाई' करने वाली है!"
"जिसने मौत को अपनी हथेली पर नचाया, आज वो एक हसीना की चूड़ियों की खनक पर नाच रहा है। रंगा... तेरा गुरुर ही तेरी अर्थी सजाएगा!"
अभी तो ये साज़िश रंगा के दरवाज़े तक पहुँची है, पर उसे खत्म करना कोई बच्चों का खेल नहीं। क्या वीणा और राजेश उस खूँखार भेड़िए को उसके ही पिंजरे में मात दे पाएंगे? क्या रंगा, जिसने हज़ारों दुश्मनों की लाशें बिछाईं, इस 'ज़हरीली नागिन' के वार को झेल पाएगा?
दोस्तों, अब तक आपने मोहब्बत की जन्नत का सफर बहुत देख लिया, अब मैं आपको 'नरक' की सैर पर ले चलूँगा! जहाँ वफादारी का गला घोंटा जाएगा और गद्दारी का राजतिलक होगा।
देखते हैं मौत के इस खूनी खेल में जीत किसकी होती है— रंगा के फौलाद की या वीणा के फरेब की?
अपनी सांसें थाम लीजिए और कलेजा मज़बूत कर लीजिए, क्योंकि अब हर मोड़ पर लाशें मिलेंगी और हर सांस में बारूद होगा!
पेश है वीणा का वह रोंगटे खड़े कर देने वाला बैकग्राउंड और उसकी पावरफुल एंट्री:वीणा: मासूम चेहरा... खूँखार फितरत!
"चेहरा मखमल जैसा... पर नीयत असुरों वाली! यह वो गुलाब है जिसे छूने वाले को काँटा नहीं मिलता, सीधा ज़हर मिलता है। ये प्यार करना नहीं, खून पीना जानती है!"

राजस्थान का वो शाही शहर... जयपुर (पिंक सिटी)! जहाँ की हवाओं में राजपूती आन और बान की महक है, वहीं एक बेहद सभ्य, संस्कारी और मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी थी यह वीणा। लेकिन क्या उसका नाम वाकई वीणा है? शायद उसे मीना कहना सही होगा... या फिर वर्षा... या शायद माया! उसके पास तो न जाने कितने चेहरे और कितने नाम हैं, हर शहर में एक नया नकाब! खैर, फिलहाल के लिए उसे रंगा की 'वीणा' ही रहने देते हैं, क्योंकि यही नाम रंगा की मौत के वारंट पर लिखा जाने वाला है।
घर में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, पर वीणा की नज़रें हमेशा आसमान छूने के ख्वाब देखती थीं। कॉलेज की उन अमीर सहेलियों को देख उसके भीतर जलन की एक ऐसी आग सुलगती थी जिसे बुझाना नामुमकिन था। उनकी कलाई पर बंधी लाखों की घड़ियाँ, गले में चमकते करोड़ों के हीरों के हार... उन्हें देखते ही उसके मन में बस एक ही बिजली कौंधती— "ये सब मेरा होना चाहिए... सिर्फ मेरा!"
यहीं से उसके भीतर लालच का वो ज़हरीला बीज पहली बार बोया गया।
वह लालच कोई मामूली भूख नहीं थी, वह एक रूह कंपा देने वाला जुनून था। जब इंसान के सिर पर अपनी औकात से बड़ी चीज़ पाने का भूत सवार हो जाए, तो वो किसी भी हद तक गिरने की हिम्मत जुटा ही लेता है।
लालच ने जब वीणा की आँखों पर पट्टी बाँधी, तो उसने अपनी ही उस सहेली का करोड़ों का हीरों का हार साफ़ कर दिया, जो उसे अपनी बहन मानती थी। एक मासूम परी की तरह दोस्ती की कसमें खाते-खाते, उसने मौका मिलते ही वह जेवर उड़ा दिया।
लेकिन पाप का घड़ा एक दिन फूटता ही है। जब सहेली के घरवाले सुराग ढूँढते हुए आए, तो सबूतों ने चीख-चीख कर गवाही दी कि चोर कोई और नहीं, खुद वीणा है! वीणा के माँ-बाप शहर के बड़े इज़्ज़तदार और शरीफ लोग थे, इसलिए उन लोगों ने रहम खाया:
"देख छोरी! तेरे बाप की पगड़ी और तेरी माँ की इज़्ज़त की खातिर तुझे पुलिस के हवाले नहीं कर रहे। आइंदा ऐसी नीच हरकत मत करना!" चेतावनी देकर उन्होंने अपना हार लिया और उसे विदा कर दिया।
लेकिन वीणा के सीने में पछतावा नहीं, बल्कि नफरत की आग जल रही थी। उसे यह बर्दाश्त नहीं था कि उसके हीरों वाले सपनों और ऐशो-आराम के बीच उसके माँ-बाप की ये 'खोखली मर्यादा' आए। "बेटा मेहनत करो... इज़्ज़त से जियो..."—ये सब नसीहतें उसे कचरे के डिब्बे में डालने लायक लगती थीं।
उसे समझ आ गया कि इस छोटे शहर और इन शरीफ लोगों के बीच उसकी दाल नहीं गलेगी। फिर क्या था? एक आधी रात को, जब पूरी दुनिया सो रही थी, वीणा ने अपने ही घर की दहलीज़ लांघ दी। रिश्ते-नाते, माँ की ममता, बाप का सर—उसने मुड़कर कुछ भी नहीं देखा। उस वक्त उसकी उम्र महज़ बीस साल थी, पर कलेजा किसी मंजे हुए अपराधी जैसा!
घर से भागी हुई इस 'शिकारी' ने अपना अगला ठिकाना चुना सपनों के शहर— मुंबई को! वहाँ वह एक बहुत बड़े करोड़पति परिवार में 'नौकरानी' बनकर दाखिल हुई। लेकिन याद रखना दोस्तों, वह वहाँ झाड़ू-पोछा करने नहीं, बल्कि उस पूरे साम्राज्य का सूपड़ा साफ़ करने आई थी!
ऊपरवाले ने उसे जो चेहरा दिया था, वह उसके लिए किसी खूनी वरदान से कम नहीं था।
"माथे पर चंदन का एक बारीक तिलक, छोटी सी बिंदी और चेहरे पर हमेशा एक बेचारी सी लाचारी... उसे देखकर तो साक्षात यमराज भी अपना फंदा फेंककर उस पर तरस खा जाए!"

अपने चेहरे के हाव-भाव से पत्थर को भी मोम बना देना और किसी को भी मात दे देना—ये कला उसे बखूबी आती थी। वह एक ऐसी अदाकारा थी जिसके लिए पूरी दुनिया एक रंगमंच थी और हर इंसान महज़ एक शिकार!
मुंबई की उस चकाचौंध भरी दुनिया में वीणा ने अपना जो जाल बिछाया, उसने एक रसूखदार साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी। उस घर का मालिक, जो सोने और हीरों के धंधे का बेताज बादशाह था, उसने अपनी ज़िंदगी में हज़ारों शातिर चेहरे देखे होंगे, पर वीणा की उस 'भक्ति' और 'गंगा जैसी पवित्र' मासूमियत के आगे उसकी सारी समझ धरी की धरी रह गई।
"इतनी सुशील, संस्कारी और सलीकेदार लड़की... आखिर ये नौकरानी बनने पर मजबूर क्यों हुई?"—जब तक उस बूढ़े ने यह सोचना शुरू किया, वीणा आधी जंग जीत चुकी थी!
लेकिन ठहरिए! मुंबई की उस आलीशान हवेली में वीणा अकेली शिकारी नहीं थी। साज़िश की इस बिसात पर उसका साथ देने के लिए ड्राइवर बनकर आया था— राजेश!
शुरुआत में दोनों अजनबी बनकर उस घर में घुसे थे। लेकिन एक जैसी गंदी नीयत और रूह कंपा देने वाले लालच ने जल्द ही उनके बीच एक 'खतरनाक केमिस्ट्री' बना दी। देखते ही देखते दोनों के बीच इश्क परवान चढ़ा, पर वो कोई लैला-मजनू वाला प्यार नहीं था; वो तो दौलत की भूख से पैदा हुआ एक 'क्रिमिनल रोमांस' था!
"जिस्मों का मेल तो सिर्फ एक बहाना था, असली मकसद तो उस हवेली की तिजोरी का खज़ाना था!"
घर के अंदर वीणा ने अपनी 'बेचारी' वाली सूरत से मालिक का अटूट भरोसा जीता, तो बाहर राजेश ने अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से घर की कमाई और तिजोरी के हर गुप्त राज़ उगलवा लिए।
वह बुजुर्ग करोड़पति वीणा की सादगी का ऐसा मुरीद हुआ कि उसे सही और गलत का फर्क दिखना बंद हो गया। इसी का फायदा उठाते हुए, एक काली रात को वीणा ने अपनी 'मर्यादा' का पल्लू सरकाया और सीधे उस बूढ़े के बिस्तर तक पहुँच गई। हवस ने जब उस बूढ़े की आँखों पर पट्टी बाँधी, तो वह वीणा के मकड़जाल में पूरी तरह फँस गया।
नतीजा?
अगली सुबह सूरज निकलने से पहले ही, करीब दो करोड़ रुपये की नकदी और पुश्तैनी जेवर समेटकर वीणा और राजेश हवा हो गए!

वह करोड़पति चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया। समाज में उसकी साख इतनी ऊँची थी कि अगर दुनिया को पता चलता कि एक मामूली नौकरानी ने उसे लूट लिया है, तो उसका वजूद मिट्टी में मिल जाता। अपनी 'इज्ज़त' बचाने की खातिर उसने पुलिस में रिपोर्ट तक नहीं की और अकेले में खून के आँसू रोता रहा।
उन दो करोड़ रुपयों के दम पर वीणा और राजेश ने कुछ समय तक शहंशाहों वाली ज़िंदगी जी। ब्रांडेड कपड़े, महंगी गाड़ियाँ और बेहिसाब ऐयाशी... लेकिन याद रखना दोस्तों:
"लालच उस खारे पानी की तरह है, जिसे जितना पियो, प्यास उतनी ही बढ़ती जाती है!"
जैसे-जैसे वो दो करोड़ खत्म होने लगे, वीणा की आँखों में फिर से वही शिकारी भूख जाग उठी। अब शुरू हुआ असली खेल— नया भेस, नया शहर और एक नई खूनी साज़िश! शिकार का यह सिलसिला अब रुकने वाला नहीं था।
जयपुर और मुंबई की गलियों में छोटे-मोटे हाथ साफ करने के बाद, इस 'ज़हरीले जोड़े' की भूख अब बेकाबू हो चुकी थी। अब उन्हें चिल्लर और लाखों की चोरियाँ नहीं, बल्कि सीधा कुबेर का खज़ाना चाहिए था। वीणा की आँखों में एक वहशी चमक थी जब उसने राजेश के सीने पर उंगली गढ़ाकर कहा— "अब ये मोहल्लों की चोरियाँ बंद करो मामा... अब हाथ मारना है तो ऐसा कि हमारी अगली सात पीढ़ियां भी ऐश करें!"
और इसी खूनी लालच ने उनका रुख मोड़ा— राउडी रंगा की खौफनाक सल्तनत की तरफ!
जब रंगा के राजनीतिक रसूख और उस गुप्त करोड़ों के खज़ाने की भनक उनके कानों तक पहुँची, तो राजेश फौरन भेस बदलकर रंगा के इलाके में जा पहुँचा। एक महीने तक उसने साये की तरह रंगा की हर हरकत, उसके उठने-बैठने और उसके वफादार '5 भाइयों' के घेरे पर कड़ी नज़र रखी।
राजेश का कलेजा कांप गया। उसने लौटकर वीणा से कहा— "वीणा... ये कोई मामूली शिकार नहीं है। रंगा एक बेकाबू जंगली सांड है! उसके चारों तरफ फौलादी घेरा है। अगर एक छोटी सी चूक हुई, तो हमारी लाश उठाने वाला भी कोई नहीं बचेगा। ये मौत का खेल है, हमें ये रिस्क नहीं लेना चाहिए!"
पर वीणा... वो तो जैसे मौत की आँखों में आँखें डालकर मुस्कुराने वाली औरत थी। उसने हिकारत से राजेश की तरफ देखा और एक ठंडी मुस्कान बिखेरी— "यही तो असली खेल है मामा! जो किला जितना मज़बूत होता है, उसकी चाबी उतनी ही कीमती होती है। रंगा जितना सख्त है, उसे तोड़ने का मज़ा उतना ही ज़्यादा आएगा।"
राजेश ने दबी आवाज़ में आगे बताया— "वीणा... मैंने पता लगाया है कि रंगा औरतों के मामले में थोड़ा कच्चा है। उसे बाज़ारू या सजने-संवरने वाली औरतें नहीं, बल्कि संस्कारी, घरेलू और बेबस दिखने वाली औरतों के प्रति एक अलग ही खिंचाव महसूस होता है..."
इतना सुनना था कि वीणा का शातिर दिमाग बिजली की रफ़्तार से दौड़ने लगा। उसके होंठों पर एक कातिल मुस्कान फैल गई। "बस मामा! किसी शेर को गिराने के लिए बंदूक की नहीं, उसकी कमज़ोरी की ज़रूरत होती है। अब मेरा असली अवतार देखो!"
इन दो लोमड़ियों ने खुद को पूरी तरह बदल लिया। राजेश ने अपनी आँखों की पुतलियाँ मूँदकर 'अंधे' होने का हफ़्तों रियाज़ किया, ताकि कोई शक न कर सके। और वीणा? उसने खुद को एक दुखी, संस्कारी और बेबस लाचार औरत के सांचे में ढाल लिया।
यहाँ तक कि उन्होंने इस खूनी खेल में दो मासूम बच्चों को भी मोहरा बना लिया! वो बच्चे इनके अपने नहीं थे, बस एक 'कंप्लीट फैमिली' का नाटक रचने के लिए उन्हें पैसे देकर किराए पर लिया गया था। वीणा ने तय किया था कि जैसे ही रंगा का खज़ाना हाथ लगेगा, वो उन बच्चों को वापस छोड़ देगी।
हैरानी की बात तो ये थी कि वीणा की छाती से जो दूध निकलता था, वो कोई ममता नहीं, बल्कि कुछ मेडिकल दवाइयों का कमाल था! रंगा के दिल में उतरने के लिए उसने अपने शरीर तक के साथ खिलवाड़ किया, ताकि वो एक 'दूध पिलाती बेबस माँ' का नाटक पूरी शिद्दत से कर सके।
इलाके में आए अभी जुम्मा-जुम्मा दो ही दिन हुए थे कि वीणा ने अपनी साज़िश का ज़हरीला जाल फेंक दिया। उसे पता था कि रंगा जैसे शिकारी को फँसाने के लिए बंदूक नहीं, बल्कि 'बदन की खुशबू' और 'मर्यादा का ढोंग' चाहिए।
एक तपती दोपहर, रंगा अपनी ऊँची गद्दी पर बैठा वसूली का हिसाब देख रहा था, तभी उसकी खूँखार नज़रें गली से गुज़रती एक 'जीती-जागती मूरत' पर जाकर चिपक गईं।
सिर पर सलीके से रखा पल्लू, माथे पर एक नन्हीं सी बिंदी और आँखों में गंगा जैसी पवित्रता—देखने वाले को लगे साक्षात ल**िक्ष **मि ज़मीन पर उतर आई है! वो कोई और नहीं, शिकार पर निकली वीणा थी। वह बड़ी मासूमियत से रंगा की नज़रों के ठीक सामने रुकी और अपनी साड़ी की प्लेट्स ठीक करने लगी।

उस एक पल में, रंगा की भूखी आँखों ने वीणा की कमर के उस कातिल लचीलेपन और उसके बदन की सुराहीदार बनावट को ऐसे निहारा जैसे तपते रेगिस्तान में किसी प्यासे को ठंडा समंदर दिख गया हो।
और राजेश ने 'अंधे लाचार' पति का ऐसा सधा हुआ नाटक किया कि पूरे मोहल्ले की हमदर्दी उसकी जेब में थी। वहीं दूसरी तरफ, वीणा किसी ज़हरीले साये की तरह रंगा के वजूद के इर्द-गिर्द मंडराने लगी थी। रंगा जहाँ भी कदम रखते, वीणा अपनी उस मस्तानी चाल और कातिल नज़रों के साथ 'इत्तेफाक' से वहीं खड़ी मिल जाती।
बेचारे रंगा! उन्हें क्या पता था कि जिस हिरणी को वो अपनी बाहों में भरने के हसीन सपने देख रहे हैं, वो दरअसल उनकी कब्र खोदने आई एक भूखी लोमड़ी है।
जब वीणा जानबूझकर रंगा के सामने झुककर अपने 'किराए के बच्चे' की कमीज़ ठीक करती या अपनी तिरछी नशीली आँखों से रंगा को चोरी-छिपे निहारती, तो रंगा के फौलादी शरीर में बिजली सी कौंध जाती। उसकी सादगी के पीछे छिपी वो 'संस्कारी कामुकता' रंगा के शातिर दिमाग को सुन्न कर रही थी।
"जिस रंगा ने पुलिस की सैकड़ों गोलियां झेली थीं, अदालतों के अनगिनत केस हँसते-हँसते काटे थे... आज वो वीणा की एक 'मासूम मुस्कान' के सामने घुटने टेक चुका था।"
वीणा के उस बनावटी भोलेपन ने रंगा की सोचने-समझने की शक्ति ही छीन ली थी। रंगा को लग रहा था कि उसे 'गंगा' मिल गई है, पर हकीकत में वो मौत के उस 'गंदे नाले' की तरफ बढ़ रहा था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
ये औरत मुझे चाहिए... इसे पाने के लिए मैं कुछ भी कर दूँगा!"—बस, इसी एक ज़नूनी सनक ने रंगा का दिमाग़ सुन्न कर दिया था। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि वो एक ऐसे दलदल में कदम रख रहे हैं जहाँ से ज़िंदा लौटना नामुमकिन है, पर वीणा की वो 'कातिल' मासूमियत उन्हें चुंबक की तरह अपनी ओर खींच रही थी।
शतरंज की बिसात बिछ चुकी थी और मोहरे अपनी चालें चल रहे थे। रंगा कुछ महीनों के लिए एक ज़रूरी काम से दिल्ली गए हुए थे, और यही इन दोनों शिकारियों के लिए सुनहरा मौका था। राजेश ने पूरे मोहल्ले में ये ढिंढोरा पीट दिया कि कारखाने में एक भयानक हादसा हो गया और उसकी आँखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई।
उनका ये 'अंधेपन' का नाटक इतना सटीक था कि पत्थर दिल इंसान भी पिघल जाए। पूरे मोहल्ले में बस एक ही चर्चा थी— "हाय बेचारी वीणा! अब क्या होगा इस बेचारी का? दो छोटे बच्चे और ऊपर से ये अंधा पति... पहाड़ जैसी ज़िंदगी कैसे कटेगी?"
जब रंगा दिल्ली से लौटे, तो ये खबर उनके कानों से टकराई। वीणा का वो 'लाचार' चेहरा उनकी यादों में बिजली की तरह कौंध गया। उन्होंने अपनी बेवकूफी में सोचा कि मदद के बहाने वीणा के जिस्म और दिल के करीब जाने का इससे अच्छा मौका और कोई नहीं हो सकता।
रंगा अपनी ताकत और पैसे के घमंड में चूर थे। उन्हें लगा कि उन्होंने वीणा को अपनी शर्तों पर झुका लिया है। "कोई भी औरत मेरे खौफ और रसूख के आगे टिक नहीं सकती"—उनके इसी अहंकार को वीणा ने अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। उसकी चाल ही यही थी कि रंगा को लगे कि जीत उनकी हो रही है, जबकि गर्दन रंगा की फँस रही थी!
शुरुआत में जब भी रंगा उसके करीब आने की कोशिश करते, वीणा एक शरीफ घरेलू औरत की तरह तड़पने और विरोध करने का बेहतरीन नाटक करती। रंगा के हर स्पर्श पर वीणा का वो बनावटी संघर्ष और आँखों से गिरते झूठे आँसू रंगा को एक अजीब सी मर्दानगी का अहसास कराते। उन्हें इस बात का विक्षिप्त सुकून मिलता कि— "इस खूँखार शेर के सामने एक खूबसूरत गुलाब गिड़गिड़ा रहा है।" उन्हें भनक तक नहीं थी कि ये आँसू उनकी बर्बादी की कब्र खोद रहे हैं।
"नहीं रंगा ... ऐसा मत कीजिए! मेरे पति अंदर हैं, ये पाप है... छोड़ दीजिए मुझे!"—वीणा का ये सिसकने वाला नाटक रंगा को और भी पागल कर देता। उसका यही झूठा संघर्ष रंगा के लिए सबसे बड़ा चारा बन गया।

इसके अलावा, रंगा ने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल ये की कि उन्होंने वीणा को महज़ एक कमज़ोर और लाचार अबला समझ लिया। उसकी 'गरीबी' पर तरस खाकर उन्होंने उसे अपने ही गोदाम में काम पर रख लिया।
"मामा, ये हमारी पहली और सबसे बड़ी जीत है!"—वीणा ने राजेश के गले लगकर शैतानी ठहाका लगाया।
गोदाम में कदम रखते ही वीणा ने वहाँ होने वाले काले कारोबार की एक-एक परत उधेड़नी शुरू कर दी। उसे पता चल गया कि रंगा सिर्फ चावल के मामूली व्यापारी नहीं हैं, बल्कि हर बोरे के नीचे तस्करी का काला माल छिपा होता है। उस साम्राज्य का हर खूनी राज अब वीणा की मुट्ठी में था।
लेकिन उसका असली निशाना तो वो करोड़ों का स्वर्ण भंडार था! वो इस उलझन में थी कि आखिर वो कुबेर का खज़ाना छिपा कहाँ है, तभी रंगा खुद चलकर उस ज़हरीले जाल में आ गिरे।
वीणा पर अटूट भरोसे और अंधे प्यार की वजह से, रंगा की बुद्धि पर पत्थर पड़ गए थे। उन्होंने खुद वो 'गुप्त कमरा' उसे दिखा दिया जिसे उन्होंने पूरी दुनिया, यहाँ तक कि अपने दुश्मनों से भी छिपाकर रखा था। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी माँ और बहन—जिन्हें वो अपनी जान से बढ़कर मानते थे—उनसे भी वीणा की मुलाकात करवा दी।
"वीणा... ये मेरा परिवार है, मेरी दुनिया है। और अब से तुम भी मेरी इस दुनिया का हिस्सा हो!"—रंगा ने जज़्बाती होकर अपना कलेजा निकाल कर रख दिया।
जबकि वीणा की आँखें उन गहनों और सोने की ईंटों को देखकर लालच से खून की तरह लाल हो रही थीं। रंगा को लगा कि वो अपना दिल खोलकर दिखा रहे हैं... पर असल में वीणा उनकी गर्दन रेतने वाली छुरी की धार तेज़ कर रही थी।
तो दोस्तों... अब तक आपने देखा कि कैसे एक 'पत्थर' पिघल रहा था और एक 'फूल' ज़हर उगल रहा था। अब आपको समझ आ गया होगा कि यह वीणा कोई मामूली औरत नहीं, बल्कि वो काली आंधी है जो रंगा के सम्राज्य के परखच्चे उड़ाने आई है!
एक तरफ वो रंगा है जिसकी दहाड़ से पूरा शहर थर्राता था, और दूसरी तरफ ये शातिर लोमड़ी वीणा, जो अपनी एक मुस्कान से रंगा की किस्मत लिख रही है।
कान खोलकर सुन लो! अब आने वाले हिस्सों में किसी जज़्बात, किसी रहम या किसी नरम दिल की कोई जगह नहीं होगी... अब सिर्फ बारूद महकेगा, खून बहेगा, और धोखे का वो नंगा नाच होगा जिसे देखकर रूह काँप जाएगी!
"रंगा ने दुनिया के सैकड़ों दुश्मनों के सीने में पीतल उतारा है, पर उसे क्या पता था कि सबसे घातक वार उसकी अपनी 'परछाई' करने वाली है!"
"जिसने मौत को अपनी हथेली पर नचाया, आज वो एक हसीना की चूड़ियों की खनक पर नाच रहा है। रंगा... तेरा गुरुर ही तेरी अर्थी सजाएगा!"
अभी तो ये साज़िश रंगा के दरवाज़े तक पहुँची है, पर उसे खत्म करना कोई बच्चों का खेल नहीं। क्या वीणा और राजेश उस खूँखार भेड़िए को उसके ही पिंजरे में मात दे पाएंगे? क्या रंगा, जिसने हज़ारों दुश्मनों की लाशें बिछाईं, इस 'ज़हरीली नागिन' के वार को झेल पाएगा?
दोस्तों, अब तक आपने मोहब्बत की जन्नत का सफर बहुत देख लिया, अब मैं आपको 'नरक' की सैर पर ले चलूँगा! जहाँ वफादारी का गला घोंटा जाएगा और गद्दारी का राजतिलक होगा।
देखते हैं मौत के इस खूनी खेल में जीत किसकी होती है— रंगा के फौलाद की या वीणा के फरेब की?
अपनी सांसें थाम लीजिए और कलेजा मज़बूत कर लीजिए, क्योंकि अब हर मोड़ पर लाशें मिलेंगी और हर सांस में बारूद होगा!
मिलते हैं अगले रोंगटे खड़े कर देने वाले अपडेट में!
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