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कामिनी ने बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और अपनी पीठ उससे टिका दी।
उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। "हमफ़्फ़्फ़... हमफ़्फ़्फ़... हमफ़्फ़्फ़........"
उसका पूरा शरीर पसीने से तर-बतर था, लेकिन यह पसीना गर्मी का नहीं, चरम उत्तेजना का था।
एक चोर चोरी कर के भागा था.
कामिनी लड़खड़ाते कदमों से वॉशबेसिन के पास गई और आईने में अपनी शक्ल देखी।
उसका चेहरा... वह पहचान नहीं पा रही थी कि यह वही 'कामिनी' है।
उसकी आँखें चढ़ी हुई थीं, पुतलियां फैली हुई थीं, और गाल टमाटर की तरह लाल थे।
लेकिन सबसे बुरी हालत उसके होंठों की थी।
कादर के उस खुरदरे, मोटे और विशाल लंड को इतनी देर तक चूसने की वजह से उसके होंठ सूजकर मोटे हो गए थे। वे कांप रहे थे।
कामिनी ने अपनी उंगली अपने निचले होंठ पर फेरी।
उसे वहां अभी भी कादर के लंड की गरमाहट और उस मसालेदार सूप का कसैला स्वाद महसूस हो रहा था।
"कादर..." कामिनी के मुंह से एक आह निकली।
उसकी नज़र अपनी छाती पर गई।
उसका ब्लाउज़ पसीने से चिपक गया था।
अंदर, उसके भारी स्तन फूलकर सख्त हो गए थे।
उत्तेजना के कारण उसके स्तनों पर नीली नसें उभर आई थीं, जो उसकी गोरी त्वचा के नीचे साफ़ चमक रही थीं।
निप्पल इतने सख्त हो गए थे कि ब्लाउज़ के कपड़े में चुभ रहे थे।
उसे अपने स्तनों में एक मीठा-मीठा दर्द हो रहा था, जैसे वे किसी के मज़बूत हाथों का इंतज़ार कर रहे हों। वो मर्दाने हाथ जो कस कस के उसके स्तनों को भींचे उसका सारा दर्द निकाल दे.
और नीचे... उसकी योनि?
वह तो रो रही थी।
कामिनी की जांघों के बीच एक अजीब सी फड़कन (Throbbing) हो रही थी।
उसकी योनि की दीवारें बार-बार सिकुड़ रही थीं और फैल रही थीं— "धक्-धक्... धक्-धक्..."
वह अधूरी रह गई थी। वह उस मुकाम पर थी जहाँ से लौटना नामुमकिन होता है।
उसकी योनि चीख-चीख कर "लंड" मांग रही थी—मोटा, सख्त और भरने वाला।
कामिनी ने ठंडा पानी अपने चेहरे पर मारा, लेकिन अंदर का ज्वालामुखी शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। वह हताश होकर आईने को घूरने लगी।
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उधर बाहर हॉल में, रमेश अपनी ही धुन में था।
रमेश को रत्ती भर भी परवाह नहीं थी कि उसकी बीवी कहाँ गायब हो गई। उसे बस अपनी दारू और मटन की पड़ी थी। उसने एक बार भी नहीं पूछा— "कामिनी कहाँ है? ठीक तो है?
बंटी ने दरवाजा खोला था,
उसकी नज़रें मोबाइल स्क्रीन पर गड़ी थीं, उंगलियां तेज़ी से गेम खेल रही थीं।
"अरे सुन.. वो... बहार... कुर्सी...." रमेश के शब्द मुँह मे ही बंद हो गए.
बंटी ने अपने बाप को देखा तक नहीं, और बिना कुछ बोले पलटकर वापस अपने कमरे की तरफ चल दिया।
उसे अपने बाप, उसके शराबी दोस्त, या अपनी माँ की 'हरकतों' से कोई मतलब नहीं दिख रहा था—या शायद वह सब जानकर भी अनजान बना हुआ था।
रमेश बड़बड़ाया, "साला... आजकल की औलाद..." और खुद ही कुर्सी उठाने लगा। शमशेर ने भी हाथ बटाया.
बगीचे में, उसी चूल्हे और आग के पास, जहाँ थोड़ी देर पहले 'रासलीला' हुई थी, अब महफ़िल जम रही थी।
रमेश और शमशेर ने प्लास्टिक की कुर्सियां आग के पास लगा ली थीं।
शमशेर ने गर्मी और 'माहौल' बनाने के लिए अपनी पुलिस की वर्दी उतार दी थी।
वह अब सिर्फ़ अपनी सफ़ेद बनियान और खाकी पैंट में बैठा था।
उसका गठीला, कसरती बदन और चौड़ा सीना बनियान में साफ़ दिख रहा था। उसके डोले (Biceps) रमेश के थुलथुले शरीर के सामने लोहे जैसे लग रहे थे।
शमशेर ने व्हिस्की की बोतल खोली और दो गिलास बनाए।
और कादर खान?
कादर की हालत 'सांप-छछूंदर' जैसी थी।
उसने कामिनी का दिया हुआ सफ़ेद दुपट्टा जल्दी से खोलकर एक कोने में छुपा दिया था, क्योंकि अगर वह दुपट्टा रमेश देख लेता तो सवाल खड़े हो जाते।
लेकिन अब समस्या यह थी कि उसका पाजामा तो अभी भी फटा हुआ था।
और उसका लंड... वह अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ था। वह अर्ध-जागृत (Semi-hard) अवस्था में था और फटे हुए कपड़े से बाहर झांकने को बेताब था।
कादर ने एक हाथ में मटन का भगोना पकड़ा हुआ था, और दूसरे हाथ से अपनी पाजामे को जांघों के बीच भींचकर पकड़ रखा था।
वह अपनी टांगें सिकोड़कर, छोटे-छोटे कदम बढ़ाता हुआ चल रहा था, ताकि उसका 'खुला हुआ राज़' किसी को न दिखे।
"अरे कादर भाई! लाओ लाओ..." रमेश ने आवाज़ दी। "खुशबू से ही नशा हो रहा है।"
कादर धीरे से आया और टेबल की आड़ लेकर खड़ा हो गया, ताकि उसका निचला हिस्सा टेबल के पीछे छुप जाए।
उसने मटन का भगोना टेबल पर रखा।
उसकी नज़र शमशेर पर पड़ी।
शमशेर बनियान में बैठा सिगरेट फूंक रहा था। उसकी नज़रें कादर पर नहीं, बल्कि घर के दरवाज़े पर थी, शायद कमीनी की तलाश मे था.
एक तरफ कादर अपनी फटी हुई इज़्ज़त (पाजामा) बचा रहा था, दूसरी तरफ कामिनी बाथरूम में अपनी आग बुझाने का विचार कर रही थी, जिस्म मे फट पड़ने को बेताब ज्वालामुखी को दबा रही थी.
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बाहर बगीचे में आग जल रही थी।
रमेश ने मटन सूप का कटोरा मुंह से लगाया।
"सुऊऊऊप्प... सुड़पपप्पाप्प्पप...."
उसने एक बड़ा घूंट भरा। गरम, मसालेदार और रसीला शोरबा उसके गले से नीचे उतरा।
रमेश की आँखें फैल गईं।
"वाह! वाह भाई वाह!" रमेश चिल्लाया। "कादर... क्या जादू है तेरे हाथों में यार! कसम से, ऐसा स्वाद आज तक नहीं आया। एकदम... एकदम अलग ही नशा है इसमें, तुझे घर पर छुपा के रखने का अच्छा ईनाम दिया तूने"
"शुक्रिया साब " कादर, जो टेबल की आड़ में अपनी फटी हुई इज़्ज़त (पाजामा) छुपाए खड़ा था, फीका सा मुस्कुराया।
उसने दबी हुई आवाज़ में कहा, "साब वो कुछ खबर लगी? छापा क्यों पड़ा था, किसने खबर दी "
कादर ने शमशेर की तरफ उत्सुकता से पूछा, जैसे जानना चाहता था उसके पास कितना वक़्त है.
तभी पीछे से आहट हुई।
कामिनी सामने दरवाज़े से बाहर चली आ रही थी, बलखाती कमर मटकाती, पीछे से आती दूधिया रौशनी मे उसका कामुक जिस्म साफ झलक रहा था,
रमेश की पीठ उसकी तरफ थी लेकिन शमशेर और कादर इस अद्भुत नज़ारे का लुत्फ़ उठाया रहे थे.
उसने अपना चेहरा धो लिया था, बाल ठीक कर लिए थे, लेकिन साड़ी का पल्लू अभी भी सरका ही हुआ था, या यूँ कहिये उसने इसे ठीक करने की जरुरत ही नहीं समझी।
हाथ में पानी की बोतल और सलाद की प्लेट थी।
रमेश ने कामिनी को देखा।
"अरे कामिनी! आ भई... देख क्या चीज़ बनाई है कादर ने। अमृत है अमृत! तू भी ले एक कटोरी।"
कामिनी की सांस अटक गई।
उस सूप को पीना तो दूर, उसे देखकर ही कामिनी को अपनी जांघों के बीच गीलापन महसूस होने लगा। उसे याद आ गया कि कैसे वह सूप कादर के लाल टोप पर बह रहा था।
"न... नहीं," कामिनी हकलायी। "म... मैंने चख लिया था। आप लोग खाओ।" कामिनी ने जिस तरीके से इस सूप को चखा था शायद ही और किसी औरत ने चखा हो.
कामिनी आगे बढ़ी और टेबल पर सलाद रखने लगी।
तभी उसे एक तीखी नज़र का अहसास हुआ।
सामने शमशेर बैठा था।
उसने अपनी वर्दी उतार दी थी। वह सिर्फ़ सफ़ेद बनियान में था।
आग की रौशनी में शमशेर का चौड़ा सीना, उसके बांहों के कसे हुए डोले और उसकी मोटी गर्दन साफ़ दिख रही थी। रमेश का शरीर ढीला-ढाला था, लेकिन शमशेर का शरीर कसा हुआ (Tight) और ताकतवर था।
शमशेर के हाथ में व्हिस्की का गिलास था, लेकिन उसकी नज़रें गिलास पर नहीं, कामिनी पर थीं।
उसकी बाज़ जैसी नज़रें कामिनी के चेहरे पर गड़ गईं।
उसने देखा...
वो कामिनी के हुस्न को बारीकी से निहार रहा था.
उसकी फूली हुई सांसें...
और सबसे अहम्... उसके सूजे हुए, लाल और कांपते होंठ।
शमशेर, जो एक पुराना पुलिस वाला था, औरतों की 'बॉडी लैंग्वेज' पढ़ना बखूबी जानता था।
उसने एक घूंट भरा और कामिनी की आँखों में सीधा देखा।
"भाभी जी..." शमशेर की आवाज़ भारी और गहरी थी। "आज आप बहुत थकी हुई लग रही हैं। होंठ भी सूज गए हैं... क्या मटन ज्यादा तीखा था?"
शमशेर के इस सवाल में एक चिंगारी थी।
कामिनी का दिल धक से रह गया। उसे लगा शायद शमशेर ने उसे वहाँ से भाग कर जाता देख लिया है।
"व... वो... बस गर्मी बहुत है," कामिनी ने नज़रें चुरा लीं।
शमशेर मुस्कुराया।
जवाब मे कामिनी भी काँखियो से कादर की तरफ देख शमशेर को देख मुस्कुरा दी.
कादर अभी भी जाँघे दबाये खड़ा था.
"सुनिए आपके पुराने कपडे इसे दे दूँ क्या?" कामिनी ने रमेश के कंधे पर हाथ रख पूछा.
"मेरे कपडे कादर को कहाँ से आएंगे, देख उसे एक बार, साला राक्षस जैसा है " रमेश हस पड़ा.
कामिनी जाने को ही थी की.
"अच्छा सुन वो एक दो पुरानी लुंगी होंगी वो दे दे, क्यों भाई कादर काम चला अभी कल देखते है तेरे लिए कोई कपडे "
रमेश ने बेपरवाही से कहाँ.
उसने कादर को देखा तक नहीं, वो दारू और मटन सूप पीने में मगन था।
"आओ मै देती हूँ " कामिनी आगे बढ़ चली पीछे पीछे कादर कामिनी की मादक गांड को निहारता चल पड़ा, चल क्या पड़ा जैसे उसकी गांड ने खिंच लिया हो.
तभी शमशेर ने रमेश के गिलास में और शराब डाल दी—बिना पानी के। "ले.भाई.... आज जी भर के पी। साला घर मे ऐसा मजा फिर कब मिलेगा,
शमशेर की कुटिल, चालक पोलीसिया नजरें कामिनी और कादर को अलग ही नजर से देख रही थी.
रमेश ने वह कड़क पेग एक सांस में गटक लिया।
शराब और कबाब का दौर चलने लगा.
कामिनी तेज़ कदमों से अपने बेडरूम में दाखिल हुई। उसके पीछे-पीछे कादर खान किसी साये की तरह अंदर आ गया।
कामिनी ने दरवाज़ा तो नहीं लगाया (ताकि शक न हो), लेकिन उसे हल्का सा भिड़ा दिया।
कमरे में सफ़ेद ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी जल रही थी।
बाहर की पीली आग की रौशनी के मुकाबले यहाँ सब कुछ साफ़, नंगा और सच दिख रहा था।
कामिनी अलमारी की तरफ लपकी और एक पुरानी चेकदार लुंगी निकाल लाई।
वह पलटी, "ये लो कादर... इसे..."
लेकिन उसके शब्द गले में ही अटक गए।
कादर ने लुंगी पकड़ने का इंतज़ार नहीं किया था।
उसने कामिनी के पलटते ही, अपने उस फटे हुए पाजामे को एक झटके में नीचे सरका दिया था।
वह बेडरूम के बीचों-बीच, सफ़ेद रौशनी में कमर के नीचे नंगा खड़ा था।
कामिनी की नज़रें सीधे उसके पैरों के बीच गड़ गईं।
बाहर तो अँधेरा था, लेकिन यहाँ ट्यूबलाइट की रौशनी में वह 'राक्षस' और भी डरावना और लुभावना लग रहा था।
उसका 10 इंच का काला, नसों भरा लंड अभी भी पूरी तरह तना हुआ था।
उसके लाल और नंगे टोप (सुपाड़े) पर अभी भी कहीं कहीं मटन सूप की चिकनाई और कामिनी की लार चमक रही थी। वह गीला था और फनफना रहा था।
कामिनी की सांसें अटक गईं।
उसका गला सूख गया, लेकिन जांघों के बीच सुनामी आ गई।
वह उस काले खंभे की तरफ खिंची चली गई। उसे बस उसे छूना था, अपनी मुट्ठी में भरना था।
कामिनी ने कांपते हाथों से लुंगी बेड पर फेंकी और कादर की तरफ बढ़ी।
उसका हाथ उस सलामी देते हुए टोप को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा।
लेकिन तभी...
"खटाक!"
कादर ने हवा में ही कामिनी की कलाई थाम ली।
उसकी पकड़ लोहे जैसी मज़बूत थी।
कामिनी ने हैरान होकर कादर के चेहरे को देखा। कादर की आँखों में हवस की आग थी, लेकिन साथ ही एक जिद भी थी।
"रुको मैडम....." कादर की आवाज़ भारी और मर्दाने गुरूर से भरी थी।
"अभी नहीं... तूने मेरा चखा है, अब मेरी बारी है।"
कामिनी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही कादर ने उसे एक झटके से अपनी तरफ खींचा और अगले ही पल...
"धप्प!!"
कादर ने कामिनी को, उसकी साड़ी समेत, पीछे बेड पर धक्का दे दिया।
कामिनी का भारी बदन गद्दे पर गिरा। स्प्रिंग चरचरा उठे।
गिरते ही कामिनी की साड़ी और पेटीकोट घुटनों से ऊपर सरक गए।
उसने पैंटी नहीं पहनी थी, वो इतनी गीली हो चुकी थी की उसे उतार देना ही कामिनी को उचित लगा था.
कामिनी ने अपनी टांगें सिकोड़नी चाहीं, लेकिन कादर ने उन्हें अपने मज़बूत हाथों से पकड़कर चौड़ा कर दिया।
बेड की सफ़ेद चादर पर कामिनी की गोरी, मांसल और भरी हुई जांघें फैल गईं।
और उन दोनों जांघों के बीच...
उसकी गुलाबी, सूजी हुई और रस टपकाती योनि कादर के सामने बेपर्दा थी।
वह पूरी तरह गीली थी।
उसके गुलाबी होठ (Labia) बाहर की तरफ उभरे हुए थे और उनमें से कामिनी का पारदर्शी पानी (Lubrication) रिसकर जांघों पर बह रहा था।
वह मंज़र देखकर कादर पागल हो गया।
"आह्ह्ह... क्या माल है..." कादर बड़बड़ाया।
"वक़्त कम है मेरी जान... लेकिन प्यास बहुत है।"
कादर ने बिना कोई चेतावनी दिए, बिना कोई तैयारी किए, अपना सिर कामिनी की दोनों जांघों के बीच घुसा दिया।
"स्स्स्लर्प......!!"
कादर ने अपनी खुरदरी और चौड़ी जीभ सीधे कामिनी की योनि के द्वार पर दे मारी।
"आआआआहहहहह.... कादर....!!"
कामिनी की चीख निकल गई। उसने जल्दी से अपना मुंह अपने हाथ से दबा लिया, ताकि आवाज़ बाहर न जाए।
लेकिन उसका शरीर बेड पर तड़प उठा।
कादर किसी भूखे कुत्ते की तरह उस पर टूट पड़ा था।
उसने अपने दोनों हाथों से कामिनी के कूल्हों (Buttocks) को जकड़ लिया और उन्हें ऊपर उठा दिया, ताकि उसकी योनि का दाना-दाना उसके मुंह के सामने आ जाए।
कादर की जीभ कामिनी की योनि की गहराइयों को खंगालने लगी।
वह अपनी जीभ की नोक को कामिनी के उभरे हुए दाने (Clitoris) पर फिराता, और फिर पूरी जीभ से उसकी योनि के छेद को चाटने लगता।
"फच्... फच्... चप्प... चप्प..."
पूरे कमरे में चाटने की गीली और गंदी आवाज़ें गूंजने लगीं।
कामिनी की योनि का स्वाद... नमकीन, खट्टा और कस्तूरी जैसा नशीला था।
कादर उसे ऐसे पी रहा था जैसे रेगिस्तान में पानी मिल गया हो।
कामिनी की हालत ख़राब थी।
उसकी कमर हवा में उठ रही थी। उसकी उंगलियां बेडशीट को नोच रही थीं।
"उफ्फ्फ्फ... कादर... मार डालोगे क्या... आह्ह्ह... ऐसे ही... और ज़ोर से..."
कामिनी का सिर दाएं-बाएं डोल रहा था।
उसे लंड चाहिए था, लेकिन कादर की गरम जीभ उसे पागल कर रही थी।
कादर ने अपनी नाक कामिनी के दाने पर रगड़ दी। वह उसकी महक को सूंघ रहा था, चाट रहा था।
उसने अपनी एक उंगली कामिनी की फड़कती हुई योनि में घुसा दी और जीभ से ऊपर क्लिटोरिस को रगड़ने लगा।
बाहर रमेश और शमशेर शराब पी रहे थे... और यहाँ अंदर कादर कामिनी की जवानी का रस पी रहा था।
कामिनी अब बर्दाश्त की सीमा पर थी।
उसकी जांघें कादर के सिर को भींच रही थीं।
"कादर... रुकना मत... मैं... मैं झड़ने वाली हूँ... कादर...!!"
कामिनी वैसे ही वासना की दहलीज पर खड़ी थी, बस थोड़ी और मेहनत और कुएँ से शर्तिया पानी निकलना ही था.
लेकिन कामिनी की किस्मत उसकी हवास उसकी परीक्षा लेने के मूड मे थी.
****************
कामिनी का शरीर धनुष की तरह तन गया था।
उसकी एड़ियां बिस्तर पर रगड़ खा रही थीं।
उसकी योनि के अंदर कादर की उंगली और बाहर उसकी जीभ ने ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया था कि अब वह ज्वालामुखी फटने ही वाला था।
"कादर... बस... बस आ गई... आह्ह्ह्ह... मत रुकना... !!"
कामिनी का सिर पीछे लुढ़क गया, आँखें चढ़ गईं। वह उस 'मोक्ष' के अंतिम पड़ाव पर थी।
अगले 5 सेकंड में उसका शरीर ऐंठने वाला था और सारा रस कादर के मुंह में बहने वाला था।
लेकिन ठीक उसी "नाज़ुक पल" (Crucial Moment) पर...
बाहर से एक भारी और शराबी आवाज़ ने बेडरूम के सन्नाटे को चीर दिया।
"अरे ओ कादर भाई!! कहाँ रह गए यार??"
वह शमशेर की आवाज़ थी। नशे में धुत, लेकिन तेज़।
"सूप ठंडा हो रहा है... और बोतल ख़त्म हो गई है! जल्दी आ भाई!"
वह आवाज़ किसी हथौड़े की तरह कामिनी के दिमाग पर पड़ी। ऐसा लगा ठीक उसके पीछे से, बिल्कुल पास से आवाज़ आई हो, दोनों ने चौंक कार बैडरूम की खुली खिड़की की तरफ देखा, वो खुली हुई थी.
कामिनी की सांसे थाम गई, उसने कैसे इस बात पर गौर नहीं किया, अक्सर हवास मे डूबा इंसान खुले दरवाजे, खुली खिड़की नहीं देख पाता.
कामिनी के साथ भी यही हुआ.
और उससे भी बड़ा झटका तब लगा, जब कादर ने अचानक अपना मुंह हटा लिया।
"चटाक!"
कादर ने एक झटके में अपना सिर पीछे खींच लिया।
कामिनी की योनि, जो चरम सुख के लिए तैयार थी, एकदम से सन्न रह गई।
वह 'झड़ने' वाली थी, लेकिन वह करंट वहीं का वहीं नसों में जम गया।
कादर खड़ा हुआ और लगभग नंगा ही दौड़ता हुआ खिड़की के पास पंहुचा, उसने देखा शमशेर और रमेश वही स्टोर के पास बैठे गप मार रहे थे,
"आया साब..... " कादर वही से चिल्लाया।
उसके होंठ और दाढ़ी कामिनी के पानी (Juices) से सने हुए थे।
उसने अपनी कलाई से अपना मुंह पोंछा और एक गहरी सांस ली।
"मै जाता हूँ, वरना लफड़ा हो जायेगा " कादर ने कामिनी की तरफ देखा, जो बिस्तर पर अभी भी टांगें फैलाए, तड़प रही थी।
कादर ने एक पल के लिए कामिनी की उस गीली, लाल और फड़कती हुई योनि को ललचाई नज़रों से देखा।
कादर ने पास पड़ी वो चेकदार लुंगी उठाई।
उसने उसे झटका और अपनी कमर पर बांधना शुरू किया।
कामिनी की नज़रें अभी भी धुंधली थीं, लेकिन उसने देखा...
कादर ने लुंगी के नीचे कुछ नहीं पहना था।
उसका काला, विशाल लंड अभी भी लोहे की तरह खड़ा था।
जैसे ही उसने लुंगी बांधी...
लुंगी के कपड़े में आगे की तरफ एक विशाल तंबू (Tent) बन गया।
वह खड़ा लंड लुंगी को आगे की तरफ धकेल रहा था, जैसे कह रहा हो कि 'मैं अभी शांत नहीं हुआ हूँ'।
"मैं चलता हूँ..." आपकी सेवा मे फिर हाजिर होऊंगा.
कादर मुड़ा और बेडरूम से बाहर निकल गया।
कामिनी बिस्तर पर अकेली रह गई।
उसकी साड़ी उठी हुई थी, जांघें फैली हुई थीं।
उसकी योनि गीली थी, लेकिन प्यासी थी।
उस अधूरेपन ने उसे अंदर से तोड़ दिया। उसे रोना आ रहा था, और साथ ही गुस्सा भी।
गुस्सा रमेश पर, शमशेर पर..... जिसने गलत वक़्त पर आवाज़ दी।
गुस्सा कादर पर... जो उसे ऐसे छोड़ गया।
और गुस्सा खुद पर... कि वह अपनी हवस की गुलाम बन गई थी।
कामिनी ने अपनी जांघों को सिकोड़ा और करवट लेकर तकिये में मुंह छुपा लिया।
उसने अपनी मुट्ठी भींची और गद्दे पर दे मारी।
"उफ्फ्फ्फ......!!"
उसकी योनि में एक मीठा-मीठा दर्द हो रहा था। यह दर्द उसे पूरी रात सोने नहीं देने वाला था।
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कादर बेडरूम से निकला और गैलरी से होता हुआ अंधेरे बगीचे में आया।
उसकी चाल अजीब थी।
वह अपनी टांगें चौड़ी करके चल रहा था, जैसे किसी पहलवान ने अखाड़े में लंगोट बांधा हो।
वजह साफ़ थी—लुंगी के नीचे उसका 10 इंच का खंभा अभी भी पूरे उफान पर था। वह ठंडा होने का नाम नहीं ले रहा था।
लुंगी का कपड़ा आगे से बुरी तरह तना हुआ था, एक विशाल तंबू बना हुआ था जो हवा में झूल रहा था।
कादर टेबल के पास पहुंचा।
रमेश तो नशे में धुत था, उसकी गर्दन एक तरफ लुढ़की हुई थी।
लेकिन शमशेर?
शमशेर की आँखें जल रही थीं।
उसने कादर को आते हुए देखा।
उसकी नज़र सबसे पहले कादर के चेहरे पर गई।
कादर ने अपना मुंह पोंछ लिया था, लेकिन कामिनी की योनि का रस और उसकी लार की चमक अभी भी उसकी दाढ़ी और होठों पर कहीं-कहीं बाकी थी।
फिर शमशेर की नज़र नीचे गई... कादर की लुंगी पर।
शमशेर ने वो "उभार" देख लिया।
वह कोई बच्चा नहीं था। वह समझ गया कि लुंगी के नीचे क्या छुपा है और यह "हथियार" इतना तना हुआ क्यों है।
"आ गए कादर भाई..." शमशेर ने एक गहरी सांस ली और कुर्सी पर पीछे टिक गया।
उसने रमेश को कोहनी मारी। "ओए रमेश... उठ! तेरा बावर्ची आ गया।"
फिर शमशेर ने कादर की आँखों में देखा।
"बड़ा वक़्त लगाया अंदर? लुंगी ढूंढ रहे थे... या कुछ और भी कर रहे थे?"
शमशेर की आवाज़ में एक कुटिल व्यंग्य था।
उसने अपनी उंगली से इशारा किया।
"और ये लुंगी में क्या 'तोप' छुपा लाए हो भाई? लगता है अंदर कुछ ज्यादा ही 'गर्मी' थी?"
कादर का दिल धक से रह गया।
उसे लगा पकड़ा गया।
लेकिन शमशेर के चेहरे पर गुस्सा नहीं था... बल्कि एक गंदी मुस्कान थी।
शमशेर मज़े ले रहा था।
"कुछ नहीं साब..." कादर ने नज़रें झुका लीं और टेबल की आड़ में हो गया। "वो... बस कपड़ा टाइट बांध लिया है।"
अभी कादर कुछ सफाई देता की तभी बगीचे सन्नाटे को तोड़ता रघु लड़खड़ाते कदमों से अंदर दाखिल हुआ,
रघु, जो अपनी 'दवाई' (दारू) पीकर वापस आ गया था, नशे में झूमता हुआ स्टोर रूम की तरफ बढ़ा चला आ रहा था,
"अच्छा कादर भाई आ गया तेरा दोस्त, तुम लोग दावत उड़ाओ, हम लोगो का तो हो गया " शमशेर ने रमेश को उठाया और अपने कंधे का सहारा दे घर की ओर बढ़ गया.
कादर, जो वहीं अंधेरे में लुंगी लपेटे खड़ा था, रघु को देखकर मन मसोस कर रह गया।
'साला कबाब में हड्डी...' कादर ने दांत पीसे।
रघु के आ जाने से अब कादर के लिए दोबारा घर में घुसना नामुमकिन था। उसका 'खेल' अधूरा रह गया था।
उधर, रमेश पूरी तरह नशे में धुत्त था।
उसे कादर के उस 'जादुई मटन सूप' पर इतना भरोसा था कि लड़खड़ाते हुए भी उसे लग रहा था कि आज रात वह कामिनी की चीखें निकलवा देगा।
"कामिनी... मेरी जान...देख तेरा शेर आ रहा है..." रमेश बड़बड़ा रहा था, जबकि उसके पैर ज़मीन पर टिक भी नहीं रहे थे।
शमशेर ने रमेश का हाथ अपने कंधे पर रखा और उसे सहारा देकर घर के अंदर ले जाने लगा।
शमशेर के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। एक रहस्य था,
इन्ही सब उपक्रम मे कोई आधे घंटे बीत गए थे, शमशेर रमेश को घसीटता हुआ बेडरूम के दरवाज़े तक ले आया।
शमशेर ने बेडरूम का दरवाज़ा धकेला।
अंदर का नज़ारा देखकर शमशेर के कदम वहीं जम गए।
ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी में... कामिनी बिस्तर पर औंधे मुंह (पेट के बल) लेटी हुई थी।
उसका चेहरा तकिये में दबा हुआ था, शायद वह अपनी सिसकियाँ दबा रही थी।
लेकिन उसकी पोजीशन...
उसकी भारी और मांसल गांड (Buttocks) पीछे की तरफ उभरी हुई थी। साड़ी घुटनों तक ऊपर चढ़ी हुई थी, जिससे उसकी गोरी, सुडौल पिंडलियां (Calves) और जांघों का पिछला हिस्सा साफ़ चमक रहा था।
शमशेर का दिमाग यह नज़ारा देखकर सुन्न हो गया।
उसे लगा जैसे कोई "हथिनी" अपने साथी का इंतज़ार कर रही हो।
उसकी मर्दानगी ने उसकी खाकी पैंट के अंदर तुरंत सलामी दे दी।
"आओ रमेश..." शमशेर ने जानबूझकर भारी आवाज़ में कहा, अपनी नज़रें कामिनी की गांड से हटाए बिना।
शमशेर की आवाज़ सुनते ही कामिनी बिजली के करंट की तरह चौंकी।
वह ख्यालों में थी—कादर के लंड और अपनी अधूरी प्यास के ख्यालों में।
हड़बड़ाहट में उसे याद ही नहीं रहा कि उसका हुक खुला हुआ है और पल्लू गिरा हुआ है।
"उह्ह... आप..."
कामिनी घबराकर झटके से पलटी और खड़ी होने की कोशिश की।
लेकिन इस जल्दबाज़ी में वही हुआ जिसका शमशेर को इंतज़ार था।
कामिनी का पल्लू, जो उसने बस नाम के लिए कंधे पर रखा था, सरककर नीचे ज़मीन पर आ गिरा।
और उसके साथ ही...
उसका ब्लाउज़, जिसका ऊपर का हुक कादर के लिए खोला गया था, तनाव न सह सका और फैल गया।
शमशेर की आँखों के सामने जन्नत का दरवाज़ा खुल गया।
कामिनी के विशाल, गोरे और पसीने से सने हुए स्तन लगभग पूरी तरह बेपर्दा हो गए।
वे भारी थे, और तेज़ सांसों की वजह से ऊपर-नीचे हो रहे थे।
उनकी गहरी घाटी (Cleavage) इतनी गहरी थी कि उसमें पसीने की बूंदें चमक रही थीं।
कादर के लंड को चूसने और उत्तेजना की वजह से उसके निप्पल ब्लाउज़ के कपड़े को चीरकर बाहर झांक रहे थे।
उन पर उभरी हुई नीली नसें शमशेर को साफ़ दिखाई दे रही थीं।
शमशेर किसी भूखे कुत्ते की तरह उन घाटियों को घूरे जा रहा था।
उसने रमेश को पकड़ा हुआ था, लेकिन उसकी आँखें कामिनी के 'मांस' को नोच रही थीं।
कामिनी ने शमशेर की नज़रों को अपने स्तनों पर रेंगते हुए महसूस किया।
वह शर्म से लाल हो गई, लेकिन उसने खुद को ढका नहीं।
शायद वह भी चाहती थी कि कोई उसे देखे... कोई उसे सराहे... क्योंकि कादर ने उसे 'अधूरी' छोड़ दिया था।
"थैंक्स भाई... थैंक्स..." रमेश ने लड़खड़ाते हुए कहा। उसकी आँखें बंद हो रही थीं।
"अब तू जा... और कामिनी... कामिनी तू इधर आ..."
रमेश बेहोशी में भी हुकुम चला रहा था। उसे लगा वह कामिनी को प्यार करेगा, जबकि वह खड़े होने के लायक भी नहीं था।
शमशेर ने रमेश को एक झटके में बेड पर पटक दिया।
रमेश गद्दे पर गिरते ही ढेर हो गया।
अब कमरे में सिर्फ़ दो लोग जाग रहे थे— शमशेर और कामिनी।
शमशेर कमरे से बाहर नहीं गया।
वह बेड के पास, रमेश के पैरों की तरफ खड़ा हो गया।
उसने अपनी बनियान ठीक की, जिससे उसका चौड़ा सीना और तन गया।
इस पोज़ (Pose) ने कामिनी का ध्यान शमशेर के निचले हिस्से पर खींच लिया।
शमशेर की टाइट खाकी पुलिसिया पैंट में एक विशाल उभार (Bulge) साफ़... बिल्कुल साफ़ दिख रहा था।
उसका लंड पूरा खड़ा था और पैंट की ज़िप को फाड़ने की कोशिश कर रहा था।
वह उभार कादर के लंड जितना विशाल तो नहीं था, लेकिन वह सख्त और खतरनाक लग रहा था।
शमशेर ने कामिनी की आँखों में देखा, फिर उसके खुले हुए स्तनों पर, और फिर वापस आँखों में।
"रमेश तो सो गया भाभी..." शमशेर की आवाज़ में एक गहरा नशा था।
वह एक कदम आगे बढ़ा।
"लेकिन लगता है... आपको नींद नहीं आ रही।"
कामिनी के होंठ (जो अभी भी सूजे हुए थे) कांपने लगे।
उसकी योनि ने एक बार फिर "धक्-धक्" किया।
सामने पति बेहोश पड़ा था, और उसके पैरों के पास एक 'सांड' जैसा मर्द खड़ा था जो उसे कच्चा चबाने को तैयार था।
कामिनी के पास दो रास्ते थे—चीखना, या... समर्पण करना।
कामिनी ने बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और अपनी पीठ उससे टिका दी।
उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। "हमफ़्फ़्फ़... हमफ़्फ़्फ़... हमफ़्फ़्फ़........"
उसका पूरा शरीर पसीने से तर-बतर था, लेकिन यह पसीना गर्मी का नहीं, चरम उत्तेजना का था।
एक चोर चोरी कर के भागा था.
कामिनी लड़खड़ाते कदमों से वॉशबेसिन के पास गई और आईने में अपनी शक्ल देखी।
उसका चेहरा... वह पहचान नहीं पा रही थी कि यह वही 'कामिनी' है।
उसकी आँखें चढ़ी हुई थीं, पुतलियां फैली हुई थीं, और गाल टमाटर की तरह लाल थे।
लेकिन सबसे बुरी हालत उसके होंठों की थी।
कादर के उस खुरदरे, मोटे और विशाल लंड को इतनी देर तक चूसने की वजह से उसके होंठ सूजकर मोटे हो गए थे। वे कांप रहे थे।
कामिनी ने अपनी उंगली अपने निचले होंठ पर फेरी।
उसे वहां अभी भी कादर के लंड की गरमाहट और उस मसालेदार सूप का कसैला स्वाद महसूस हो रहा था।
"कादर..." कामिनी के मुंह से एक आह निकली।
उसकी नज़र अपनी छाती पर गई।
उसका ब्लाउज़ पसीने से चिपक गया था।
अंदर, उसके भारी स्तन फूलकर सख्त हो गए थे।
उत्तेजना के कारण उसके स्तनों पर नीली नसें उभर आई थीं, जो उसकी गोरी त्वचा के नीचे साफ़ चमक रही थीं।
निप्पल इतने सख्त हो गए थे कि ब्लाउज़ के कपड़े में चुभ रहे थे।
उसे अपने स्तनों में एक मीठा-मीठा दर्द हो रहा था, जैसे वे किसी के मज़बूत हाथों का इंतज़ार कर रहे हों। वो मर्दाने हाथ जो कस कस के उसके स्तनों को भींचे उसका सारा दर्द निकाल दे.
और नीचे... उसकी योनि?
वह तो रो रही थी।
कामिनी की जांघों के बीच एक अजीब सी फड़कन (Throbbing) हो रही थी।
उसकी योनि की दीवारें बार-बार सिकुड़ रही थीं और फैल रही थीं— "धक्-धक्... धक्-धक्..."
वह अधूरी रह गई थी। वह उस मुकाम पर थी जहाँ से लौटना नामुमकिन होता है।
उसकी योनि चीख-चीख कर "लंड" मांग रही थी—मोटा, सख्त और भरने वाला।
कामिनी ने ठंडा पानी अपने चेहरे पर मारा, लेकिन अंदर का ज्वालामुखी शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। वह हताश होकर आईने को घूरने लगी।
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उधर बाहर हॉल में, रमेश अपनी ही धुन में था।
रमेश को रत्ती भर भी परवाह नहीं थी कि उसकी बीवी कहाँ गायब हो गई। उसे बस अपनी दारू और मटन की पड़ी थी। उसने एक बार भी नहीं पूछा— "कामिनी कहाँ है? ठीक तो है?
बंटी ने दरवाजा खोला था,
उसकी नज़रें मोबाइल स्क्रीन पर गड़ी थीं, उंगलियां तेज़ी से गेम खेल रही थीं।
"अरे सुन.. वो... बहार... कुर्सी...." रमेश के शब्द मुँह मे ही बंद हो गए.
बंटी ने अपने बाप को देखा तक नहीं, और बिना कुछ बोले पलटकर वापस अपने कमरे की तरफ चल दिया।
उसे अपने बाप, उसके शराबी दोस्त, या अपनी माँ की 'हरकतों' से कोई मतलब नहीं दिख रहा था—या शायद वह सब जानकर भी अनजान बना हुआ था।
रमेश बड़बड़ाया, "साला... आजकल की औलाद..." और खुद ही कुर्सी उठाने लगा। शमशेर ने भी हाथ बटाया.
बगीचे में, उसी चूल्हे और आग के पास, जहाँ थोड़ी देर पहले 'रासलीला' हुई थी, अब महफ़िल जम रही थी।
रमेश और शमशेर ने प्लास्टिक की कुर्सियां आग के पास लगा ली थीं।
शमशेर ने गर्मी और 'माहौल' बनाने के लिए अपनी पुलिस की वर्दी उतार दी थी।
वह अब सिर्फ़ अपनी सफ़ेद बनियान और खाकी पैंट में बैठा था।
उसका गठीला, कसरती बदन और चौड़ा सीना बनियान में साफ़ दिख रहा था। उसके डोले (Biceps) रमेश के थुलथुले शरीर के सामने लोहे जैसे लग रहे थे।
शमशेर ने व्हिस्की की बोतल खोली और दो गिलास बनाए।
और कादर खान?
कादर की हालत 'सांप-छछूंदर' जैसी थी।
उसने कामिनी का दिया हुआ सफ़ेद दुपट्टा जल्दी से खोलकर एक कोने में छुपा दिया था, क्योंकि अगर वह दुपट्टा रमेश देख लेता तो सवाल खड़े हो जाते।
लेकिन अब समस्या यह थी कि उसका पाजामा तो अभी भी फटा हुआ था।
और उसका लंड... वह अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ था। वह अर्ध-जागृत (Semi-hard) अवस्था में था और फटे हुए कपड़े से बाहर झांकने को बेताब था।
कादर ने एक हाथ में मटन का भगोना पकड़ा हुआ था, और दूसरे हाथ से अपनी पाजामे को जांघों के बीच भींचकर पकड़ रखा था।
वह अपनी टांगें सिकोड़कर, छोटे-छोटे कदम बढ़ाता हुआ चल रहा था, ताकि उसका 'खुला हुआ राज़' किसी को न दिखे।
"अरे कादर भाई! लाओ लाओ..." रमेश ने आवाज़ दी। "खुशबू से ही नशा हो रहा है।"
कादर धीरे से आया और टेबल की आड़ लेकर खड़ा हो गया, ताकि उसका निचला हिस्सा टेबल के पीछे छुप जाए।
उसने मटन का भगोना टेबल पर रखा।
उसकी नज़र शमशेर पर पड़ी।
शमशेर बनियान में बैठा सिगरेट फूंक रहा था। उसकी नज़रें कादर पर नहीं, बल्कि घर के दरवाज़े पर थी, शायद कमीनी की तलाश मे था.
एक तरफ कादर अपनी फटी हुई इज़्ज़त (पाजामा) बचा रहा था, दूसरी तरफ कामिनी बाथरूम में अपनी आग बुझाने का विचार कर रही थी, जिस्म मे फट पड़ने को बेताब ज्वालामुखी को दबा रही थी.
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बाहर बगीचे में आग जल रही थी।
रमेश ने मटन सूप का कटोरा मुंह से लगाया।
"सुऊऊऊप्प... सुड़पपप्पाप्प्पप...."
उसने एक बड़ा घूंट भरा। गरम, मसालेदार और रसीला शोरबा उसके गले से नीचे उतरा।
रमेश की आँखें फैल गईं।
"वाह! वाह भाई वाह!" रमेश चिल्लाया। "कादर... क्या जादू है तेरे हाथों में यार! कसम से, ऐसा स्वाद आज तक नहीं आया। एकदम... एकदम अलग ही नशा है इसमें, तुझे घर पर छुपा के रखने का अच्छा ईनाम दिया तूने"
"शुक्रिया साब " कादर, जो टेबल की आड़ में अपनी फटी हुई इज़्ज़त (पाजामा) छुपाए खड़ा था, फीका सा मुस्कुराया।
उसने दबी हुई आवाज़ में कहा, "साब वो कुछ खबर लगी? छापा क्यों पड़ा था, किसने खबर दी "
कादर ने शमशेर की तरफ उत्सुकता से पूछा, जैसे जानना चाहता था उसके पास कितना वक़्त है.
तभी पीछे से आहट हुई।
कामिनी सामने दरवाज़े से बाहर चली आ रही थी, बलखाती कमर मटकाती, पीछे से आती दूधिया रौशनी मे उसका कामुक जिस्म साफ झलक रहा था,
रमेश की पीठ उसकी तरफ थी लेकिन शमशेर और कादर इस अद्भुत नज़ारे का लुत्फ़ उठाया रहे थे.
उसने अपना चेहरा धो लिया था, बाल ठीक कर लिए थे, लेकिन साड़ी का पल्लू अभी भी सरका ही हुआ था, या यूँ कहिये उसने इसे ठीक करने की जरुरत ही नहीं समझी।
हाथ में पानी की बोतल और सलाद की प्लेट थी।
रमेश ने कामिनी को देखा।
"अरे कामिनी! आ भई... देख क्या चीज़ बनाई है कादर ने। अमृत है अमृत! तू भी ले एक कटोरी।"
कामिनी की सांस अटक गई।
उस सूप को पीना तो दूर, उसे देखकर ही कामिनी को अपनी जांघों के बीच गीलापन महसूस होने लगा। उसे याद आ गया कि कैसे वह सूप कादर के लाल टोप पर बह रहा था।
"न... नहीं," कामिनी हकलायी। "म... मैंने चख लिया था। आप लोग खाओ।" कामिनी ने जिस तरीके से इस सूप को चखा था शायद ही और किसी औरत ने चखा हो.
कामिनी आगे बढ़ी और टेबल पर सलाद रखने लगी।
तभी उसे एक तीखी नज़र का अहसास हुआ।
सामने शमशेर बैठा था।
उसने अपनी वर्दी उतार दी थी। वह सिर्फ़ सफ़ेद बनियान में था।
आग की रौशनी में शमशेर का चौड़ा सीना, उसके बांहों के कसे हुए डोले और उसकी मोटी गर्दन साफ़ दिख रही थी। रमेश का शरीर ढीला-ढाला था, लेकिन शमशेर का शरीर कसा हुआ (Tight) और ताकतवर था।
शमशेर के हाथ में व्हिस्की का गिलास था, लेकिन उसकी नज़रें गिलास पर नहीं, कामिनी पर थीं।
उसकी बाज़ जैसी नज़रें कामिनी के चेहरे पर गड़ गईं।
उसने देखा...
वो कामिनी के हुस्न को बारीकी से निहार रहा था.
उसकी फूली हुई सांसें...
और सबसे अहम्... उसके सूजे हुए, लाल और कांपते होंठ।
शमशेर, जो एक पुराना पुलिस वाला था, औरतों की 'बॉडी लैंग्वेज' पढ़ना बखूबी जानता था।
उसने एक घूंट भरा और कामिनी की आँखों में सीधा देखा।
"भाभी जी..." शमशेर की आवाज़ भारी और गहरी थी। "आज आप बहुत थकी हुई लग रही हैं। होंठ भी सूज गए हैं... क्या मटन ज्यादा तीखा था?"
शमशेर के इस सवाल में एक चिंगारी थी।
कामिनी का दिल धक से रह गया। उसे लगा शायद शमशेर ने उसे वहाँ से भाग कर जाता देख लिया है।
"व... वो... बस गर्मी बहुत है," कामिनी ने नज़रें चुरा लीं।
शमशेर मुस्कुराया।
जवाब मे कामिनी भी काँखियो से कादर की तरफ देख शमशेर को देख मुस्कुरा दी.
कादर अभी भी जाँघे दबाये खड़ा था.
"सुनिए आपके पुराने कपडे इसे दे दूँ क्या?" कामिनी ने रमेश के कंधे पर हाथ रख पूछा.
"मेरे कपडे कादर को कहाँ से आएंगे, देख उसे एक बार, साला राक्षस जैसा है " रमेश हस पड़ा.
कामिनी जाने को ही थी की.
"अच्छा सुन वो एक दो पुरानी लुंगी होंगी वो दे दे, क्यों भाई कादर काम चला अभी कल देखते है तेरे लिए कोई कपडे "
रमेश ने बेपरवाही से कहाँ.
उसने कादर को देखा तक नहीं, वो दारू और मटन सूप पीने में मगन था।
"आओ मै देती हूँ " कामिनी आगे बढ़ चली पीछे पीछे कादर कामिनी की मादक गांड को निहारता चल पड़ा, चल क्या पड़ा जैसे उसकी गांड ने खिंच लिया हो.
तभी शमशेर ने रमेश के गिलास में और शराब डाल दी—बिना पानी के। "ले.भाई.... आज जी भर के पी। साला घर मे ऐसा मजा फिर कब मिलेगा,
शमशेर की कुटिल, चालक पोलीसिया नजरें कामिनी और कादर को अलग ही नजर से देख रही थी.
रमेश ने वह कड़क पेग एक सांस में गटक लिया।
शराब और कबाब का दौर चलने लगा.
कामिनी तेज़ कदमों से अपने बेडरूम में दाखिल हुई। उसके पीछे-पीछे कादर खान किसी साये की तरह अंदर आ गया।
कामिनी ने दरवाज़ा तो नहीं लगाया (ताकि शक न हो), लेकिन उसे हल्का सा भिड़ा दिया।
कमरे में सफ़ेद ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी जल रही थी।
बाहर की पीली आग की रौशनी के मुकाबले यहाँ सब कुछ साफ़, नंगा और सच दिख रहा था।
कामिनी अलमारी की तरफ लपकी और एक पुरानी चेकदार लुंगी निकाल लाई।
वह पलटी, "ये लो कादर... इसे..."
लेकिन उसके शब्द गले में ही अटक गए।
कादर ने लुंगी पकड़ने का इंतज़ार नहीं किया था।
उसने कामिनी के पलटते ही, अपने उस फटे हुए पाजामे को एक झटके में नीचे सरका दिया था।
वह बेडरूम के बीचों-बीच, सफ़ेद रौशनी में कमर के नीचे नंगा खड़ा था।
कामिनी की नज़रें सीधे उसके पैरों के बीच गड़ गईं।
बाहर तो अँधेरा था, लेकिन यहाँ ट्यूबलाइट की रौशनी में वह 'राक्षस' और भी डरावना और लुभावना लग रहा था।
उसका 10 इंच का काला, नसों भरा लंड अभी भी पूरी तरह तना हुआ था।
उसके लाल और नंगे टोप (सुपाड़े) पर अभी भी कहीं कहीं मटन सूप की चिकनाई और कामिनी की लार चमक रही थी। वह गीला था और फनफना रहा था।
कामिनी की सांसें अटक गईं।
उसका गला सूख गया, लेकिन जांघों के बीच सुनामी आ गई।
वह उस काले खंभे की तरफ खिंची चली गई। उसे बस उसे छूना था, अपनी मुट्ठी में भरना था।
कामिनी ने कांपते हाथों से लुंगी बेड पर फेंकी और कादर की तरफ बढ़ी।
उसका हाथ उस सलामी देते हुए टोप को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा।
लेकिन तभी...
"खटाक!"
कादर ने हवा में ही कामिनी की कलाई थाम ली।
उसकी पकड़ लोहे जैसी मज़बूत थी।
कामिनी ने हैरान होकर कादर के चेहरे को देखा। कादर की आँखों में हवस की आग थी, लेकिन साथ ही एक जिद भी थी।
"रुको मैडम....." कादर की आवाज़ भारी और मर्दाने गुरूर से भरी थी।
"अभी नहीं... तूने मेरा चखा है, अब मेरी बारी है।"
कामिनी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही कादर ने उसे एक झटके से अपनी तरफ खींचा और अगले ही पल...
"धप्प!!"
कादर ने कामिनी को, उसकी साड़ी समेत, पीछे बेड पर धक्का दे दिया।
कामिनी का भारी बदन गद्दे पर गिरा। स्प्रिंग चरचरा उठे।
गिरते ही कामिनी की साड़ी और पेटीकोट घुटनों से ऊपर सरक गए।
उसने पैंटी नहीं पहनी थी, वो इतनी गीली हो चुकी थी की उसे उतार देना ही कामिनी को उचित लगा था.
कामिनी ने अपनी टांगें सिकोड़नी चाहीं, लेकिन कादर ने उन्हें अपने मज़बूत हाथों से पकड़कर चौड़ा कर दिया।
बेड की सफ़ेद चादर पर कामिनी की गोरी, मांसल और भरी हुई जांघें फैल गईं।
और उन दोनों जांघों के बीच...
उसकी गुलाबी, सूजी हुई और रस टपकाती योनि कादर के सामने बेपर्दा थी।
वह पूरी तरह गीली थी।
उसके गुलाबी होठ (Labia) बाहर की तरफ उभरे हुए थे और उनमें से कामिनी का पारदर्शी पानी (Lubrication) रिसकर जांघों पर बह रहा था।
वह मंज़र देखकर कादर पागल हो गया।
"आह्ह्ह... क्या माल है..." कादर बड़बड़ाया।
"वक़्त कम है मेरी जान... लेकिन प्यास बहुत है।"
कादर ने बिना कोई चेतावनी दिए, बिना कोई तैयारी किए, अपना सिर कामिनी की दोनों जांघों के बीच घुसा दिया।
"स्स्स्लर्प......!!"
कादर ने अपनी खुरदरी और चौड़ी जीभ सीधे कामिनी की योनि के द्वार पर दे मारी।
"आआआआहहहहह.... कादर....!!"
कामिनी की चीख निकल गई। उसने जल्दी से अपना मुंह अपने हाथ से दबा लिया, ताकि आवाज़ बाहर न जाए।
लेकिन उसका शरीर बेड पर तड़प उठा।
कादर किसी भूखे कुत्ते की तरह उस पर टूट पड़ा था।
उसने अपने दोनों हाथों से कामिनी के कूल्हों (Buttocks) को जकड़ लिया और उन्हें ऊपर उठा दिया, ताकि उसकी योनि का दाना-दाना उसके मुंह के सामने आ जाए।
कादर की जीभ कामिनी की योनि की गहराइयों को खंगालने लगी।
वह अपनी जीभ की नोक को कामिनी के उभरे हुए दाने (Clitoris) पर फिराता, और फिर पूरी जीभ से उसकी योनि के छेद को चाटने लगता।
"फच्... फच्... चप्प... चप्प..."
पूरे कमरे में चाटने की गीली और गंदी आवाज़ें गूंजने लगीं।
कामिनी की योनि का स्वाद... नमकीन, खट्टा और कस्तूरी जैसा नशीला था।
कादर उसे ऐसे पी रहा था जैसे रेगिस्तान में पानी मिल गया हो।
कामिनी की हालत ख़राब थी।
उसकी कमर हवा में उठ रही थी। उसकी उंगलियां बेडशीट को नोच रही थीं।
"उफ्फ्फ्फ... कादर... मार डालोगे क्या... आह्ह्ह... ऐसे ही... और ज़ोर से..."
कामिनी का सिर दाएं-बाएं डोल रहा था।
उसे लंड चाहिए था, लेकिन कादर की गरम जीभ उसे पागल कर रही थी।
कादर ने अपनी नाक कामिनी के दाने पर रगड़ दी। वह उसकी महक को सूंघ रहा था, चाट रहा था।
उसने अपनी एक उंगली कामिनी की फड़कती हुई योनि में घुसा दी और जीभ से ऊपर क्लिटोरिस को रगड़ने लगा।
बाहर रमेश और शमशेर शराब पी रहे थे... और यहाँ अंदर कादर कामिनी की जवानी का रस पी रहा था।
कामिनी अब बर्दाश्त की सीमा पर थी।
उसकी जांघें कादर के सिर को भींच रही थीं।
"कादर... रुकना मत... मैं... मैं झड़ने वाली हूँ... कादर...!!"
कामिनी वैसे ही वासना की दहलीज पर खड़ी थी, बस थोड़ी और मेहनत और कुएँ से शर्तिया पानी निकलना ही था.
लेकिन कामिनी की किस्मत उसकी हवास उसकी परीक्षा लेने के मूड मे थी.
****************
कामिनी का शरीर धनुष की तरह तन गया था।
उसकी एड़ियां बिस्तर पर रगड़ खा रही थीं।
उसकी योनि के अंदर कादर की उंगली और बाहर उसकी जीभ ने ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया था कि अब वह ज्वालामुखी फटने ही वाला था।
"कादर... बस... बस आ गई... आह्ह्ह्ह... मत रुकना... !!"
कामिनी का सिर पीछे लुढ़क गया, आँखें चढ़ गईं। वह उस 'मोक्ष' के अंतिम पड़ाव पर थी।
अगले 5 सेकंड में उसका शरीर ऐंठने वाला था और सारा रस कादर के मुंह में बहने वाला था।
लेकिन ठीक उसी "नाज़ुक पल" (Crucial Moment) पर...
बाहर से एक भारी और शराबी आवाज़ ने बेडरूम के सन्नाटे को चीर दिया।
"अरे ओ कादर भाई!! कहाँ रह गए यार??"
वह शमशेर की आवाज़ थी। नशे में धुत, लेकिन तेज़।
"सूप ठंडा हो रहा है... और बोतल ख़त्म हो गई है! जल्दी आ भाई!"
वह आवाज़ किसी हथौड़े की तरह कामिनी के दिमाग पर पड़ी। ऐसा लगा ठीक उसके पीछे से, बिल्कुल पास से आवाज़ आई हो, दोनों ने चौंक कार बैडरूम की खुली खिड़की की तरफ देखा, वो खुली हुई थी.
कामिनी की सांसे थाम गई, उसने कैसे इस बात पर गौर नहीं किया, अक्सर हवास मे डूबा इंसान खुले दरवाजे, खुली खिड़की नहीं देख पाता.
कामिनी के साथ भी यही हुआ.
और उससे भी बड़ा झटका तब लगा, जब कादर ने अचानक अपना मुंह हटा लिया।
"चटाक!"
कादर ने एक झटके में अपना सिर पीछे खींच लिया।
कामिनी की योनि, जो चरम सुख के लिए तैयार थी, एकदम से सन्न रह गई।
वह 'झड़ने' वाली थी, लेकिन वह करंट वहीं का वहीं नसों में जम गया।
कादर खड़ा हुआ और लगभग नंगा ही दौड़ता हुआ खिड़की के पास पंहुचा, उसने देखा शमशेर और रमेश वही स्टोर के पास बैठे गप मार रहे थे,
"आया साब..... " कादर वही से चिल्लाया।
उसके होंठ और दाढ़ी कामिनी के पानी (Juices) से सने हुए थे।
उसने अपनी कलाई से अपना मुंह पोंछा और एक गहरी सांस ली।
"मै जाता हूँ, वरना लफड़ा हो जायेगा " कादर ने कामिनी की तरफ देखा, जो बिस्तर पर अभी भी टांगें फैलाए, तड़प रही थी।
कादर ने एक पल के लिए कामिनी की उस गीली, लाल और फड़कती हुई योनि को ललचाई नज़रों से देखा।
कादर ने पास पड़ी वो चेकदार लुंगी उठाई।
उसने उसे झटका और अपनी कमर पर बांधना शुरू किया।
कामिनी की नज़रें अभी भी धुंधली थीं, लेकिन उसने देखा...
कादर ने लुंगी के नीचे कुछ नहीं पहना था।
उसका काला, विशाल लंड अभी भी लोहे की तरह खड़ा था।
जैसे ही उसने लुंगी बांधी...
लुंगी के कपड़े में आगे की तरफ एक विशाल तंबू (Tent) बन गया।
वह खड़ा लंड लुंगी को आगे की तरफ धकेल रहा था, जैसे कह रहा हो कि 'मैं अभी शांत नहीं हुआ हूँ'।
"मैं चलता हूँ..." आपकी सेवा मे फिर हाजिर होऊंगा.
कादर मुड़ा और बेडरूम से बाहर निकल गया।
कामिनी बिस्तर पर अकेली रह गई।
उसकी साड़ी उठी हुई थी, जांघें फैली हुई थीं।
उसकी योनि गीली थी, लेकिन प्यासी थी।
उस अधूरेपन ने उसे अंदर से तोड़ दिया। उसे रोना आ रहा था, और साथ ही गुस्सा भी।
गुस्सा रमेश पर, शमशेर पर..... जिसने गलत वक़्त पर आवाज़ दी।
गुस्सा कादर पर... जो उसे ऐसे छोड़ गया।
और गुस्सा खुद पर... कि वह अपनी हवस की गुलाम बन गई थी।
कामिनी ने अपनी जांघों को सिकोड़ा और करवट लेकर तकिये में मुंह छुपा लिया।
उसने अपनी मुट्ठी भींची और गद्दे पर दे मारी।
"उफ्फ्फ्फ......!!"
उसकी योनि में एक मीठा-मीठा दर्द हो रहा था। यह दर्द उसे पूरी रात सोने नहीं देने वाला था।
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कादर बेडरूम से निकला और गैलरी से होता हुआ अंधेरे बगीचे में आया।
उसकी चाल अजीब थी।
वह अपनी टांगें चौड़ी करके चल रहा था, जैसे किसी पहलवान ने अखाड़े में लंगोट बांधा हो।
वजह साफ़ थी—लुंगी के नीचे उसका 10 इंच का खंभा अभी भी पूरे उफान पर था। वह ठंडा होने का नाम नहीं ले रहा था।
लुंगी का कपड़ा आगे से बुरी तरह तना हुआ था, एक विशाल तंबू बना हुआ था जो हवा में झूल रहा था।
कादर टेबल के पास पहुंचा।
रमेश तो नशे में धुत था, उसकी गर्दन एक तरफ लुढ़की हुई थी।
लेकिन शमशेर?
शमशेर की आँखें जल रही थीं।
उसने कादर को आते हुए देखा।
उसकी नज़र सबसे पहले कादर के चेहरे पर गई।
कादर ने अपना मुंह पोंछ लिया था, लेकिन कामिनी की योनि का रस और उसकी लार की चमक अभी भी उसकी दाढ़ी और होठों पर कहीं-कहीं बाकी थी।
फिर शमशेर की नज़र नीचे गई... कादर की लुंगी पर।
शमशेर ने वो "उभार" देख लिया।
वह कोई बच्चा नहीं था। वह समझ गया कि लुंगी के नीचे क्या छुपा है और यह "हथियार" इतना तना हुआ क्यों है।
"आ गए कादर भाई..." शमशेर ने एक गहरी सांस ली और कुर्सी पर पीछे टिक गया।
उसने रमेश को कोहनी मारी। "ओए रमेश... उठ! तेरा बावर्ची आ गया।"
फिर शमशेर ने कादर की आँखों में देखा।
"बड़ा वक़्त लगाया अंदर? लुंगी ढूंढ रहे थे... या कुछ और भी कर रहे थे?"
शमशेर की आवाज़ में एक कुटिल व्यंग्य था।
उसने अपनी उंगली से इशारा किया।
"और ये लुंगी में क्या 'तोप' छुपा लाए हो भाई? लगता है अंदर कुछ ज्यादा ही 'गर्मी' थी?"
कादर का दिल धक से रह गया।
उसे लगा पकड़ा गया।
लेकिन शमशेर के चेहरे पर गुस्सा नहीं था... बल्कि एक गंदी मुस्कान थी।
शमशेर मज़े ले रहा था।
"कुछ नहीं साब..." कादर ने नज़रें झुका लीं और टेबल की आड़ में हो गया। "वो... बस कपड़ा टाइट बांध लिया है।"
अभी कादर कुछ सफाई देता की तभी बगीचे सन्नाटे को तोड़ता रघु लड़खड़ाते कदमों से अंदर दाखिल हुआ,
रघु, जो अपनी 'दवाई' (दारू) पीकर वापस आ गया था, नशे में झूमता हुआ स्टोर रूम की तरफ बढ़ा चला आ रहा था,
"अच्छा कादर भाई आ गया तेरा दोस्त, तुम लोग दावत उड़ाओ, हम लोगो का तो हो गया " शमशेर ने रमेश को उठाया और अपने कंधे का सहारा दे घर की ओर बढ़ गया.
कादर, जो वहीं अंधेरे में लुंगी लपेटे खड़ा था, रघु को देखकर मन मसोस कर रह गया।
'साला कबाब में हड्डी...' कादर ने दांत पीसे।
रघु के आ जाने से अब कादर के लिए दोबारा घर में घुसना नामुमकिन था। उसका 'खेल' अधूरा रह गया था।
उधर, रमेश पूरी तरह नशे में धुत्त था।
उसे कादर के उस 'जादुई मटन सूप' पर इतना भरोसा था कि लड़खड़ाते हुए भी उसे लग रहा था कि आज रात वह कामिनी की चीखें निकलवा देगा।
"कामिनी... मेरी जान...देख तेरा शेर आ रहा है..." रमेश बड़बड़ा रहा था, जबकि उसके पैर ज़मीन पर टिक भी नहीं रहे थे।
शमशेर ने रमेश का हाथ अपने कंधे पर रखा और उसे सहारा देकर घर के अंदर ले जाने लगा।
शमशेर के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। एक रहस्य था,
इन्ही सब उपक्रम मे कोई आधे घंटे बीत गए थे, शमशेर रमेश को घसीटता हुआ बेडरूम के दरवाज़े तक ले आया।
शमशेर ने बेडरूम का दरवाज़ा धकेला।
अंदर का नज़ारा देखकर शमशेर के कदम वहीं जम गए।
ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी में... कामिनी बिस्तर पर औंधे मुंह (पेट के बल) लेटी हुई थी।
उसका चेहरा तकिये में दबा हुआ था, शायद वह अपनी सिसकियाँ दबा रही थी।
लेकिन उसकी पोजीशन...
उसकी भारी और मांसल गांड (Buttocks) पीछे की तरफ उभरी हुई थी। साड़ी घुटनों तक ऊपर चढ़ी हुई थी, जिससे उसकी गोरी, सुडौल पिंडलियां (Calves) और जांघों का पिछला हिस्सा साफ़ चमक रहा था।
शमशेर का दिमाग यह नज़ारा देखकर सुन्न हो गया।
उसे लगा जैसे कोई "हथिनी" अपने साथी का इंतज़ार कर रही हो।
उसकी मर्दानगी ने उसकी खाकी पैंट के अंदर तुरंत सलामी दे दी।
"आओ रमेश..." शमशेर ने जानबूझकर भारी आवाज़ में कहा, अपनी नज़रें कामिनी की गांड से हटाए बिना।
शमशेर की आवाज़ सुनते ही कामिनी बिजली के करंट की तरह चौंकी।
वह ख्यालों में थी—कादर के लंड और अपनी अधूरी प्यास के ख्यालों में।
हड़बड़ाहट में उसे याद ही नहीं रहा कि उसका हुक खुला हुआ है और पल्लू गिरा हुआ है।
"उह्ह... आप..."
कामिनी घबराकर झटके से पलटी और खड़ी होने की कोशिश की।
लेकिन इस जल्दबाज़ी में वही हुआ जिसका शमशेर को इंतज़ार था।
कामिनी का पल्लू, जो उसने बस नाम के लिए कंधे पर रखा था, सरककर नीचे ज़मीन पर आ गिरा।
और उसके साथ ही...
उसका ब्लाउज़, जिसका ऊपर का हुक कादर के लिए खोला गया था, तनाव न सह सका और फैल गया।
शमशेर की आँखों के सामने जन्नत का दरवाज़ा खुल गया।
कामिनी के विशाल, गोरे और पसीने से सने हुए स्तन लगभग पूरी तरह बेपर्दा हो गए।
वे भारी थे, और तेज़ सांसों की वजह से ऊपर-नीचे हो रहे थे।
उनकी गहरी घाटी (Cleavage) इतनी गहरी थी कि उसमें पसीने की बूंदें चमक रही थीं।
कादर के लंड को चूसने और उत्तेजना की वजह से उसके निप्पल ब्लाउज़ के कपड़े को चीरकर बाहर झांक रहे थे।
उन पर उभरी हुई नीली नसें शमशेर को साफ़ दिखाई दे रही थीं।
शमशेर किसी भूखे कुत्ते की तरह उन घाटियों को घूरे जा रहा था।
उसने रमेश को पकड़ा हुआ था, लेकिन उसकी आँखें कामिनी के 'मांस' को नोच रही थीं।
कामिनी ने शमशेर की नज़रों को अपने स्तनों पर रेंगते हुए महसूस किया।
वह शर्म से लाल हो गई, लेकिन उसने खुद को ढका नहीं।
शायद वह भी चाहती थी कि कोई उसे देखे... कोई उसे सराहे... क्योंकि कादर ने उसे 'अधूरी' छोड़ दिया था।
"थैंक्स भाई... थैंक्स..." रमेश ने लड़खड़ाते हुए कहा। उसकी आँखें बंद हो रही थीं।
"अब तू जा... और कामिनी... कामिनी तू इधर आ..."
रमेश बेहोशी में भी हुकुम चला रहा था। उसे लगा वह कामिनी को प्यार करेगा, जबकि वह खड़े होने के लायक भी नहीं था।
शमशेर ने रमेश को एक झटके में बेड पर पटक दिया।
रमेश गद्दे पर गिरते ही ढेर हो गया।
अब कमरे में सिर्फ़ दो लोग जाग रहे थे— शमशेर और कामिनी।
शमशेर कमरे से बाहर नहीं गया।
वह बेड के पास, रमेश के पैरों की तरफ खड़ा हो गया।
उसने अपनी बनियान ठीक की, जिससे उसका चौड़ा सीना और तन गया।
इस पोज़ (Pose) ने कामिनी का ध्यान शमशेर के निचले हिस्से पर खींच लिया।
शमशेर की टाइट खाकी पुलिसिया पैंट में एक विशाल उभार (Bulge) साफ़... बिल्कुल साफ़ दिख रहा था।
उसका लंड पूरा खड़ा था और पैंट की ज़िप को फाड़ने की कोशिश कर रहा था।
वह उभार कादर के लंड जितना विशाल तो नहीं था, लेकिन वह सख्त और खतरनाक लग रहा था।
शमशेर ने कामिनी की आँखों में देखा, फिर उसके खुले हुए स्तनों पर, और फिर वापस आँखों में।
"रमेश तो सो गया भाभी..." शमशेर की आवाज़ में एक गहरा नशा था।
वह एक कदम आगे बढ़ा।
"लेकिन लगता है... आपको नींद नहीं आ रही।"
कामिनी के होंठ (जो अभी भी सूजे हुए थे) कांपने लगे।
उसकी योनि ने एक बार फिर "धक्-धक्" किया।
सामने पति बेहोश पड़ा था, और उसके पैरों के पास एक 'सांड' जैसा मर्द खड़ा था जो उसे कच्चा चबाने को तैयार था।
कामिनी के पास दो रास्ते थे—चीखना, या... समर्पण करना।
रमेश नशे में धुत होकर कुर्सी पर झूल रहा था। उसके हाथ से गिलास छूटने को हो रहा था।
सामने जल रही लकड़ियाँ अब राख बन चुकी थीं, आग बुझने की कगार पर थी।
"अबे... ये कादर कहाँ मर गया?" रमेश लड़खड़ाती जुबान में बड़बड़ाया। "सूप भी ठंडा हो रहा है... और आग भी ठंडी हो गई।"
शमशेर ने अपनी सिगरेट का कश खींचा और उसे पैर से मसल दिया।
"तू बैठ रमेश... मैं देखता हूँ। थोड़ी लकड़ियाँ और ले आता हूँ, लगाता हूँ चूल्हे मे" शमशेर अपनी कुर्सी से उठा।
शमशेर अंधेरे में चलता हुआ स्टोर रूम के पास लकड़ियों के ढेर की तरफ गया। वहाँ कुछ नहीं मिला, वो थोड़ा आगे बड़ा की उसे खिड़की से आतिज़ रौशनी मे कुछ लकड़िया दिखाई दी,
लकड़ियों का ढेर कामिनी के बेडरूम की खिड़की के ठीक नीचे था।
वह पास गया और झुककर लकड़ी उठाने ही वाला था कि तभी...
सन्नाटे में उसे एक दबी हुई आवाज़ सुनाई दी।
"आह्ह्ह.... उफ्फ्फ्फ.... कादर...."
शमशेर का हाथ हवा में रुक गया।
यह आवाज़ किसी बिल्ली की नहीं, एक औरत की सिसकारी थी।
और वो औरत कोई और नहीं, उसके खास दोस्त रमेश की बीवी कामिनी की थी।
शमशेर ने गर्दन उठाई ।
बेडरूम की खिड़की के पल्ले हल्के से खुले हुए थे। पर्दा नाम मात्र माँ लगा हुआ था।
अंदर ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी जल रही थी।
शमशेर ने सांस रोकी और दबे पांव खिड़की के पास गया।
उसने उस झीरी (Gap) से अंदर झांका।
और जो उसने देखा... उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
बेड पर कामिनी अपनी साड़ी समेटे, टांगें चौड़ी किए पड़ी थी।
और उसके दोनों पैरों के बीच... वह 'गुंडा, कसाई दो कोड़ी का मटन काटने वाला कादर खान अपना मुंह गड़ाए हुए था।
शमशेर की आँखों ने देखा कि कैसे कादर की जीभ कामिनी की गुलाबी गुफा को चाट रही थी।
"फच्... फच्... चप्प... चप्प..." की आवाज़ें अब शमशेर को साफ़ सुनाई दे रही थीं।
शमशेर का लंड, जो पैंट के अंदर सोया हुआ था, एक झटके में लोहे की रॉड बन गया।
'साला... यह क्या चल रहा है?' शमशेर का दिमाग चकरा गया।
'साला इसे तो मैं सती-सावित्री समझता था... और यहाँ ये रांड इस कल के आए लौंडे से अपनी चुत चटवा रही है?'
शमशेर की आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि हवस और जलन थी।
उसे जलन इस बात की थी कि वह जगह (कामिनी की टांगों के बीच) उसकी होनी चाहिए थी, लेकिन वहां कादर मज़े ले रहा था।
उसने देखा कामिनी तड़प रही थी।
कामिनी ने कादर के बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़ रखा था और उसे अपनी योनि पर दबा रही थी।
"चूस कादर.... खा जा मेरी चुत.... आह्ह्ह्ह... मुझे ख़त्म कर दे...."
कामिनी के ये शब्द शमशेर के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरे।
'अरे बाप रे... यह तो पूरी खिलाडी निकली...' शमशेर ने अपने होंठों पर जीभ फेरी। 'इतनी प्यास? इतनी आग?'
उसने देखा कि कामिनी की कमर हवा में उठने लगी है। वह क्लाइमेक्स (झड़ने) के करीब थी।
शमशेर की पुलिसिया खोपड़ी ने तुरंत काम किया।
'अगर यह अभी झड़ गई... तो इसकी आग शांत हो जाएगी। और फिर यह मुझे भाव नहीं देगी।'
'नहीं... इसे शांत नहीं होने देना। इसे तड़पाना है।'
एक भूखे जानवर को काबू करना आसान होता है,
शमशेर के दिमाग में एक वहशी प्लान ने जन्म लिया।
उसने तुरंत खिड़की से हटकर अपनी नज़रें रमेश की तरफ घुमाईं और अपनी आवाज़ को भारी और ऊँचा कर लिया।
उसने जानबूझकर ठीक उसी वक़्त चिल्लाया जब कामिनी चरम पर थी।
"अरे ओ कादर भाई!! कहाँ रह गए यार??"
उसकी आवाज़ अंदर बम की तरह फटी।
शमशेर ने खिड़की की झीरी से देखा—कादर झटके से पीछे हटा और कामिनी बिस्तर पर अधूरी तड़पती रह गई।
शमशेर के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई।
'तड़प मेरी जान... तड़प... अब तेरी यह अधूरी आग मैं बुझाऊंगा। कादर ने तो सिर्फ़ सुलगाया है... राख तो मैं करूँगा।'
शमशेर ने जल्दी से वहां से हटकर अपनी जगह वापस ले ली, जैसे उसे कुछ पता ही न हो।
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वही कहीं इस घर से दूर
स्थान: पुलिस कमिश्नर ऑफिस, शहर | समय: रात के 12:15 बजे)
कमरे में एसी की 'हम्म्म' की आवाज़ के अलावा सिर्फ़ बूटों की 'ठक-ठक' गूंज रही थी।
पुलिस कमिश्नर विक्रम सिंह एक घायल शेर की तरह अपने केबिन में इधर से उधर टहल रहा था।
उसकी वर्दी की बांहें ऊपर चढ़ी हुई थीं, टाई ढीली थी, और आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। उसकी आँखें लाल थीं—गुस्से से और थकान से।
"धत् तेरे की!" विक्रम ने टेबल पर मुक्का मारा। कांच का पेपरवेट हिल गया।
कल रात की रेड... उसके करियर का एक काला धब्बा बन गई थी।
उसे पक्की खबर थी कि कादर खान ढाबे पर ड्रग्स की बड़ी खेप के साथ मौजूद है। लेकिन जब उसकी टीम वहां पहुंची, तो चिड़िया उड़ चुकी थी। ढाबा खाली था।
कादर खान और 50 लाख का माल... दोनों हवा हो गए थे।
विक्रम के लिए यह सिर्फ़ एक केस नहीं, उसकी नाक का सवाल था। वह हार मानने वालों में से नहीं था।
तभी केबिन का दरवाज़ा हल्का सा खुला।
हवलदार ने डरते-डरते झांका।
"स... साहब..." हवलदार की आवाज़ कांप रही थी। "वो... वो खबरी आया है। 'कल्लू काना'। बोल रहा है बहुत ज़रूरी बात बतानी है।"
विक्रम की आँखों में खून उतर आया।
"भेजो साले को अंदर..." विक्रम गुर्राया। "आज अगर उसने बकवास की, तो उसकी दूसरी आँख भी फोड़ दूंगा। हरामखोर ने मेरी इज़्ज़त मिटटी में मिला दी।"
दो मिनट बाद, एक मरियल, गंदा और शराब की बदबू में डूबा हुआ आदमी लगभग घिसटता हुआ अंदर आया।
उसके कपड़े फटे थे और वह नशे में झूल रहा था।
विक्रम ने उसे देखते ही अपना आपा खो दिया।
उसने लपककर उस खबरी की गिरेबान पकड़ी और उसे दीवार से सटा दिया।
"आ साले मादरचोद..." विक्रम चिल्लाया। "तूने गलत टिप दी मुझे? मेरा टाइम ख़राब किया?"
विक्रम का हाथ उठा, वह उसे मारने ही वाला था।
"मलिक... मलिक... रहम!" खबरी गिड़गिड़ाया। उसके हाथ जुड़ गए। "खबर सही थी मेरी माई-बाप... कसम खुदा की! कादर खान ड्रग का धंधा करता है और वो वहीं था।"
"तो कहाँ गया वो?" विक्रम ने उसकी गर्दन दबोच ली, उसकी सांसें घुटने लगीं। "कहाँ है कादर खान? कहाँ है उसकी ड्रग? ज़मीन खा गई या आसमान निगल गया?"
"साहब... वही... वही तो बताने आया हूँ..." खबरी ने मुश्किल से सांस ली।
विक्रम ने अपनी पकड़ थोड़ी ढीली की।
"बक! जल्दी बक!"
खबरी ने हांफते हुए कहा, "कादर खान वहां से माल लेके भाग गया था साहब। उसे भी किसी ने टिप दे दी थी कि पुलिस आ रही है।"
विक्रम की भौहें तन गईं। 'पुलिस की रेड की खबर लीक हुई? मतलब विभाग में कोई गद्दार है?'
खबरी ने अपनी बात जारी रखी, "आज शाम... जब मैं देसी ठेके पर था, तो एक आदमी नशे में बड़बड़ा रहा था। मैंने उससे दोस्ती की... उसे थोड़ी और पिलाई।"
खबरी ने एक कुटिल हंसी हंसी। "दारू पेट में जाती है तो राज़ बाहर आते हैं साहब।"
"उसने बताया उसका नाम रघु है... साला कभी कादर के ढाबे पर रहता था। आज हिचहह.... हिचहह..." खबरी को हिचकी आ गई।
"आज क्या?" विक्रम का सब्र टूट रहा था। उसने उसे झिंझोड़ा। "पूरा बोल!"
"आज साला बोल रहा था कि वो मेरे घर पर पड़ा हुआ है।"
"कौनसा घर? कैसा घर?" विक्रम उत्तेजना में चिल्लाया।
"बंगला नंबर 69..." खबरी ने धीरे से कहा।
विक्रम चौंक गया। "बंगला नंबर 69? सिविल लाइन्स वाला इलाका?"
विक्रम ने खबरी को घूरा। "साले, वो पॉश इलाका है। वहां बड़े अफ़सर और रईस लोग रहते हैं। वो शराबी वहां कैसे रह सकता है? तू फिर मुझे घुमा रहा है?"
विक्रम ने गुस्से में खबरी का कान पकड़कर मरोड़ दिया।
"आईईईई.... साहब पूरा तो सुनो बाप..." खबरी दर्द से बिलबिलाया। "वो उस बंगले का मालिक नहीं है। वो वहां नौकर है। कुछ दिन पहले ही वहां के बाबू ने उसे काम पर रखा है। वो अपना नाम रघु बताता है, और बोलता है कादर उसका पुराना जिगरी यार है।"
विक्रम ने खबरी को छोड़ा।
उसका दिमाग कंप्यूटर की तरह चलने लगा।
'कादर का पुराना दोस्त... रघु... बंगला नंबर 69 में नौकर है। और कादर गायब है।'
'यानी कादर खान कहीं भागा नहीं है... वो शहर के बीचों-बीच, एक रईस बंगले में, नौकर के क्वार्टर में छुपा बैठा है। पुलिस जंगलों, सस्ते होटेलों और ढाबों में खाक छान रही है, और वो एसी बंगले में मज़े कर रहा है!'
विक्रम के चेहरे पर एक शिकारी की चमक आ गई।
उसने तुरंत लैंडलाइन फ़ोन उठाया और नंबर घुमाया।
"ट्रिन... ट्रिन... ट्रिन..."
उधर पुलिस स्टेशन में सब-इंस्पेक्टर मोहन ऊंघ रहा था। फ़ोन की घंटी सुनकर वह हड़बड़ाकर उठा।
"ह... हेलो? पुलिस स्टेशन...सिविल लाइन"
"मोहन!" विक्रम की आवाज़ में बिजली कड़क रही थी। "कमिश्नर विक्रम बोल रहा हूँ।"
मोहन कुर्सी से खड़ा होकर सावधान की मुद्रा में आ गया। "जय हिन्द सर! सलाम सर!"
"सलाम छोड़," विक्रम ने कड़क कर पूछा। "थाना इंचार्ज शमशेर सिंह कहाँ है? उसे फ़ोन दे।"
मोहन के पसीने छूट गए।
"स... सर... वो तो घर गए। उनकी शिफ्ट ख़त्म हो गई थी। शाम को ही निकल गए थे।"
"बास्टर्ड...!!" विक्रम चिल्लाया। "पुलिस कभी ऑफ़ ड्यूटी नहीं होती! शहर में इतना बड़ा क्रिमिनल घुम रहा है और ये हरामखोर घर जाकर सो रहा है?"
विक्रम ने एक पल सोचा, फिर आदेश दिया।
"मोहन, कान खोलकर सुन। अभी के अभी, पूरी फोर्स तैयार कर। एक रेड करनी है।"
"जी सर... कहाँ सर?" मोहन ने कांपते हुए पूछा।
"शहर के बंगला नंबर 69 में।"
विक्रम की आवाज़ में मौत का सन्नाटा था।
"मैं खुद वहां पहुँच रहा हूँ। तुम अपनी जीप लेकर निकलो। बंगले को चारों तरफ से घेर लो। एक भी परिंदा अंदर नहीं जाना चाहिए और एक भी चूहा बाहर नहीं निकलना चाहिए। समझ गया?"
"जी... जी सर! समझ गया!" मोहन ने फ़ोन रख दिया और "रेड अलर्ट" का सायरन बजा दिया।
विक्रम ने फ़ोन पटका।
उसने अपनी सर्विस रिवॉल्वर चेक की, उसे लोडेड किया और होल्स्टर में डाला।
उसकी आँखों में अंगारे दहक रहे थे।
"कादर खान..." विक्रम बड़बड़ाया। "आज तू पाताल में भी छुपा होगा, तो घसीट कर निकालूँगा।"
वह लंबे डग भरता हुआ अपनी जीप की तरफ बढ़ा।
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वहीँ दूसरी तरफ... शहर के उसी बंगला नंबर 69 में...
बाहर का गेट बस आपस मे सटा हुआ था किसी को सुध नहीं थी की उसे बंद किया जाये,
घर का मालिक रमेश, शराब और मटन के नशे में बेड पर औंधे मुंह पड़ा था, दुनिया से बेखबर।
और उसके बेडरूम में...
उसकी खूबसूरत बीवी कामिनी दीवार से सटी खड़ी थी, उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसका पल्लू ज़मीन पर था, और छाती खुली हुई थी।
और उसके ठीक सामने...
उस इलाके का थाना इंचार्ज, दरोगा शमशेर सिंह खड़ा था।
जिसकी खाकी पैंट में 'तंबू' बना हुआ था और जिसकी आँखों में वहशीपन था।
उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस 'शिकार' (कामिनी) को वह खाने जा रहा है...
उसके घर के बाहर पुलिस की गाड़ियों के सायरन और कमिश्नर विक्रम के कदम बस कुछ ही पलों की दूरी पर हैं।
एक तूफ़ान बाहर आ रहा था... और एक तूफ़ान अंदर आने वाला था।
बेडरूम में रमेश के खर्राटों की गूंज थी, लेकिन कामिनी के कानों में सिर्फ़ अपनी धड़कनों का शोर और शमशेर की भारी सांसें थीं।
शमशेर ने कामिनी को दीवार से सटा रखा था। उसका विशाल शरीर कामिनी के लिए एक पिंजरे की तरह था।
कामिनी की नज़रें नीचे झुकी हुई थीं, जहाँ शमशेर की खाकी पैंट का ज़िप अब खुल चुका था।
शमशेर ने एक हाथ से अपनी पैंट नीचे सरकाई और अपना अंडरवियर भी खींच दिया।
"फटाक..."
इलास्टिक छूटने की आवाज़ के साथ ही शमशेर का विशाल, काला और लोहे जैसा सख्त लंड आज़ाद होकर बाहर उछल आया।
वह पूरी तरह तना हुआ था, हवा में झूल रहा था और कामिनी के पेट को लगभग छू रहा था।
कामिनी की आँखें उस मर्दाने हथियार पर गड़ गईं।
कादर का लंड 'जंगली' था, लेकिन शमशेर का लंड 'ताकतवर' था। वह मोटा था, और उसका सुपाड़ा (Head) गुस्से में लाल होकर चमक रहा था।
कामिनी की योनि, जो कादर के अधूरेपन से तड़प रही थी, अब उस पुलिसिया डंडे को महसूस करने के लिए मचल उठी।
उसका हाथ अनजाने में ही आगे बढ़ा।
उसकी उंगलियां उस गरम और नसों भरे लंड को अपनी मुट्ठी में भरने के लिए तड़प रही थीं।
लेकिन शमशेर खिलाड़ी था। वह शिकार को इतनी आसानी से शिकार नहीं करने देने वाला था।
"ना... ना..."
जैसे ही कामिनी का हाथ वहां पहुंचा, शमशेर ने उसका हाथ झटक दिया।
उसने कामिनी की साड़ी का पल्लू, जो पहले ही गिर चुका था, उसे एक झटके में पूरी तरह खींच लिया।
"पहले कपड़े उतारो..." शमशेर का आदेश स्पष्ट और खूंखार था। "ब्लाउज़ और पेटीकोट... सब कुछ। मुझे तुम्हारे जिस्म का कोना-कोना देखना है।"
कामिनी के पास कोई रास्ता नहीं था। वासना ने उसे लाचार बना दिया था।
कांपते हाथों से उसने अपनी कमर पर बंधी पेटीकोट की डोरी खोली।
"सर्रररर......"
रेशमी साड़ी और पेटीकोट एक साथ उसके पैरों पर गिरकर ढेर हो गए।
अब वह सिर्फ अपने ब्लाउज़ में खड़ी थी।
कामिनी ने अपने कन्धों को झटका, और ब्लाउज़ भी सरककर ज़मीन पर गिर गया।
ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी में कामिनी का सम्पूर्ण नंगा यौवन चमक उठा।
शमशेर की आँखें फटी की फटी रह गईं।
उसने सुनैना को देखा था, कई औरतों, कोठे की रंडियो को देखा था, लेकिन कामिनी... कामिनी का जिस्म किसी संगमरमर की मूरत जैसा था, जो वासना की आग में तपकर गुलाबी हो गया था।
उसका बदन मक्खन जैसा गोरा और गठा हुआ था।
सबसे पहले शमशेर की नज़र उसके विशाल और भारी स्तनों पर गई।
वे पसीने से सने हुए थे और तेल की तरह चमक रहे थे।
वे इतने भारी थे कि उनका वजन कामिनी की छाती पर साफ़ दिख रहा था, लेकिन फिर भी वे तनकर खड़े थे।
कादर के चूसने और कामिनी की उत्तेजना की वजह से, उन गोरे स्तनों पर नीली नसें (Blue Veins) साफ़ उभर आई थीं, जो किसी नक्शे की तरह उसके निप्पलों तक जा रही थीं।
और उसके निप्पल...
मोटे, काले और बेर की तरह सख्त। वे अकड़े हुए थे और शमशेर को चुनौती दे रहे थे।
नीचे उसकी गहरी नाभि, और फिर उसकी चौड़ी कमर जो किसी सुराही की तरह थी।
और उन भरी हुई जांघों के बीच... उसका कामुक त्रिकोण... जहाँ बाल का कोई नामोनिशान नहीं था, एक दम साफ चिकना खूबसूरत, जहाँ से अब भी रस बह रहा था।
शमशेर ने ऐसा 'भरा हुआ' और 'कसावदार' माल अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखा था।
"उफ्फ्फ्फ... क्या चीज़ हो तुम कामिनी..."
शमशेर के मुंह से लार टपकने को हो गई।
उससे अब रहा नहीं गया।
उसने एक जानवर की तरह कामिनी पर हमला बोल दिया।
उसने कामिनी को दीवार से इतनी जोर से सटाया कि कामिनी की नंगी पीठ ठंडी दीवार से चिपक गई।
"सीइइइ......" कामिनी के मुंह से सिसकी निकल गई।
दीवार बर्फ जैसी ठंडी थी, लेकिन सामने शमशेर का जिस्म भट्टी जैसा गरम था।
शमशेर ने कामिनी के दोनों गालों को अपने मज़बूत पंजों में जकड़ लिया और उसके सूजे हुए होंठों को अपने मुंह में भर लिया।
"म्मम्मम्म... चप्प... चप्प..."
वह उसे चूम नहीं रहा था, वह उसे नोच रहा था। शमशेर की जीभ कामिनी के मुंह को खंगाल रही थी।
मटन और शराब का तीखा नशा कामिनी के मुँह मे घुलने लगा, लार से होता हुआ पेट मे जाने लगा,
एक अजीब सा अहसास था, हल्का सा तीखा, कसैला लेकिन नशीला.
शमशेर का एक हाथ नीचे गया और उसने कामिनी के भरे हुए, भारी स्तन को अपनी मुट्ठी में भर लिया।
उसने उसे बुरी तरह भींचा, मसला और दबाया।
वह उस गोरे मांस को अपनी उंगलियों में ऐसे गूंथ रहा था जैसे कोई आटा गूंथता है।
"आह्ह्ह्ह... उम्मम्म... धीरे..." कामिनी दर्द और मज़े में सिसक उठी।
शमशेर ने उसके खड़े निप्पल को अपनी उंगलियों में पकड़कर मरोड़ दिया, और फिर अपना मुंह नीचे ले जाकर उस काले निप्पल को अपने दांतों और होंठों में जकड़ लिया।
"स्स्स्लर्प......"
शमशेर उसे पीने लगा, चूसने लगा, जैसे कोई बच्चा माँ का दूध पीता है,लेकिन एक शैतानी भूख के साथ।
कामिनी का सिर पीछे दीवार से टकरा रहा था।
उसका पूरा जिस्म जल रहा था।
वह बार-बार अपने हाथ नीचे ले जाती, शमशेर के उस खड़े लंड को पकड़ने की कोशिश करती।
उसे उस खंभे की गर्मी अपनी हथेली में चाहिए थी।
लेकिन शमशेर उसे अपना 'लंड ' पकड़ने ही नहीं दे रहा था।
जैसे ही कामिनी का हाथ नीचे जाता, शमशेर उसे पकड़कर वापस दीवार पर पटक देता।
"तड़प...साली रांड " शमशेर उसके कान में गुर्राया, उसके स्तन को और ज़ोर से भींचते हुए।
"अभी और तड़प... जब तक मैं न कहूँ, तू मुझे छुएगी नहीं।"
कामिनी बेबस थी, गंदे शब्द खुद को रांड कहना उसे सुकून दे रहा था, शमशेर का ये जंगलीपना उसे मदहोश कर रहा था, साथ ही यही बेबसी उसे और गीला कर रही थी।
सामने बेड पर उसका पति रमेश बेहोश पड़ा था, और यहाँ दीवार से सटी कामिनी एक गैर-मर्द के हाथों अपनी जवानी लुटवा रही थी, अपने स्तनों को मसलवा रही थी।
उसकी योनि से पानी की धार बह निकली।
वह दर्द और हवस में चिल्ला रही थी—
"आह्ह्ह... शमशेर... मार डालोगे... आह्ह्ह... और ज़ोर से... !!"
बेडरूम की दीवार से सटी कामिनी अब सिर्फ़ मांस का एक टुकड़ा बनकर रह गई थी।
शमशेर, जो अब पूरी तरह 'जानवर' बन चुका था, कामिनी के जिस्म को नोच रहा था।
उसका मुंह कामिनी की गर्दन और स्तनों को चूस रहा था, लेकिन उसके हाथ... उसके हाथ पीछे जाकर कामिनी के सबसे मादक हिस्से के साथ खेल रहे थे।
शमशेर के मज़बूत और खुरदरे पंजे कामिनी की विशाल, नंगी और मुलायम गांड पर गड़ गए थे।
उसने उन दोनों भारी-भरकम कूल्हों (Buttocks) को अपनी मुट्ठी में भरकर बुरी तरह भींचा।
"आह्ह्ह..." कामिनी दर्द से बिलबिला उठी।
"साली... क्या मांस भरा है पीछे..." शमशेर गुर्राया। "आज तेरी यह गांड मारूंगा।"
कामिनी के रोंगटे खड़े हो गए।
उसे याद आया... जब शमशेर पहली बार उनके घर डिनर पर आया था। तब कामिनी साड़ी में थी, और झुककर पानी दे रही थी।
तब शमशेर ने रमेश से हंसते हुए कहा था— "भाई, अगर मेरी बीवी की गांड ऐसी होती, तो कसम से मार-मार के लाल कर देता।"
आज वह डरावनी फैंटेसी हकीकत बनने जा रही थी।
कामिनी को लगा जैसे कोई गर्म लोहे की सलाख उसके अंदर घुसने वाली है।
शमशेर की उंगलियां उसकी गांड की गहरी दरार (Butt Crack) में रेंगने लगीं।
वह सूखी थी, तंग थी। शमशेर ने अपनी ऊँगली पर थूका और फिर वापस से कामिनी की गांड दरार ने तेराने लगा, शमशेर वहां रास्ता बनाने की कोशिश कर रहा था।
"न... नहीं... प्लीज..." कामिनी ने तड़पते हुए शमशेर के सीने पर हाथ रखा।
"आअह्ह्ह.... उउउफ्फ्फ्फ़... ये क्या कर रहे हो? मैं तुम्हारे दोस्त की बीवी हूँ शमशेर... होश में आओ।"
कामिनी ने अपनी 'इज़्ज़त' और 'रिश्ते' का वास्ता देकर उसे रोकना चाहा।
यह सुनते ही शमशेर की आँखों में खून उतर आया।
वह रुका नहीं, बल्कि उसने कामिनी के बालों को पकड़कर उसका चेहरा ऊपर खींच लिया।
"दोस्त की बीवी?" शमशेर ने कामिनी की आँखों में झांका।
"साली... रांड... चुप!" शमशेर दहाड़ा।
"हरामखोर... अभी जब उस कादर से, उस दो टके के कसाई से अपनी चुत चटवा रही थी, तब याद नहीं आया कि तू दोस्त की बीवी है? तब तो बड़ा मज़ा आ रहा था तुझे?"
शमशेर का यह कथन सुनते ही कामिनी का जिस्म काठ (लकवा) मार गया।
उसकी गांड की मांसपेशियां, जो कस गई थीं, डर के मारे ढीली पड़ गईं।
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया, जैसे जिस्म से सारा खून निचोड़ लिया गया हो।
उसकी चोरी पकड़ी गई थी। रंगे हाथों।
अब उसके पास कोई दलील नहीं थी, कोई बहाना नहीं था।
वह शमशेर की नज़रों में अब 'भाभी' नहीं, बस एक 'बिगड़ी हुई रंडी' थी।
शमशेर ने उसकी घबराहट को महसूस कर लिया,
"क्यों? निकल गई हवा?" शमशेर ने एक कुटिल मुस्कान दी।
"शुक्र मना कि तू मेरे दोस्त की बीवी है, इसलिए यहाँ बेडरूम में प्यार से पेश आ रहा हूँ। वरना जैसी हरकत तूने की है ना... तुझे तो भरे बाज़ार में नंगा करके चोदता।"
शमशेर का चेहरा गुस्से और उत्तेजना से लाल टमाटर हो रहा था। उसका खूंखार पुलिसिया रूप अब पूरी तरह बाहर आ चुका था।
कामिनी अभी सदमे में थी, कुछ सोच ही नहीं पा रही थी।
तभी शमशेर ने एक्शन लिया।
उसने कामिनी के बालों को मुट्ठी में जकड़ा और उसे एक झटके से बिस्तर की तरफ धकेल दिया।
"चल... झुक जा अपने खसम के सामने।"
शमशेर ने उसे ठीक उसी जगह झुकाया जहाँ रमेश बेहोश पड़ा था।
रमेश का मुंह खुला था, और उसके होंठों से थूक (लार) बहकर तकिये पर गिर रही थी।
कामिनी अपने ही पति के चेहरे के सामने, उसके बिल्कुल पास, घुटनों और कोहनी के बल (Doggy Style) आ गई।
उसकी आँखों के सामने रमेश का बेहोश चेहरा था।
उसे अजीब सी बेचैनी हो रही थी, ग्लानि (Guilt) हो रही थी...
लेकिन उसका जिस्म?
उसका जिस्म इस अपमान और जबरदस्ती पर पागलों की तरह प्रतिक्रिया दे रहा था।
डर के बावजूद, उसकी योनि अभी भी कादर की याद में और अब शमशेर के डर में पानी छोड़ रही थी।
जैसे ही कामिनी झुकी, शमशेर के सामने जो मंज़र पेश हुआ, वह किसी भी मर्द का ईमान डगमगा देने वाला था।
कामिनी की विशाल, गोरी और मखमली गांड हवा में ऊपर उठ गई।
झुकने की वजह से उसके गांड के दोनों भारी पाट (Cheeks) फैलकर अलग हो गए।
ट्यूबलाइट की रौशनी सीधे उस 'गुलाबी घाटी' पर पड़ रही थी।
नीचे लटकती हुई उसकी योनि के गुलाबी होंठ (Lips) साफ़ दिख रहे थे। वे सूजे हुए थे और गीले थे।
उनमें से एक महीन लकीर में पारदर्शी पानी (Kamras) रिस रहा था, जो उसकी जांघों के अंदरूनी हिस्से को भिगो रहा था। वह गुफा कादर के जाने के बाद से खाली थी और अब भरने के लिए चीख रही थी।
और उसके ठीक ऊपर... वह छोटा, तंग और भूरा-गुलाबी छेद (Anus)।
गांड के पाटों के फैलने से वह छेद बिल्कुल नुमाया (Exposed) हो गया था।
कामिनी के डर और उत्तेजना की वजह से वह छेद "लपक" रहा था।
वह बार-बार सिकुड़ रहा था और खुल रहा था (Puckering)।
जैसे उसे समझ नहीं आ रहा हो कि वह शमशेर के लंड के स्वागत के लिए खुले, या अपनी सुरक्षा के लिए बंद हो जाए।
वह "खुल-बंद" होता हुआ छेद शमशेर को सीधा निमंत्रण दे रहा था— "आओ और मुझे फाड़ दो।"
शमशेर उस नज़ारे को देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठा।
उसका खड़ा लंड पैंट को फाड़ने पर उतारू था।
"उफ्फ्फ्फ... साली..." शमशेर बड़बड़ाया।
"साला रमेश ऐसा नसीब पा कर भी बहार मुँह मारता रहा... शमशेर मन ही मन बड़बड़या,
शमशेर की आँखों के सामने कामिनी की वह विशाल, गोरी गांड किसी जन्नत के दरवाज़े की तरह खुली हुई थी।
ट्यूबलाइट की रौशनी में वह तंग, सिकुड़ता हुआ और गुलाबी छेद (Anus) उसे चुम्बन के लिए बुला रहा था।
वह नज़ारा इतना मादक था कि शमशेर का सारा पुलिसिया संयम, सारी सभ्यता धरी की धरी रह गई।
उसे अब लंड डालने की जल्दी नहीं थी... उसे उस "वर्जित फल" को चखना था।
शमशेर ने आव देखा न ताव।
उसने अपने दोनों मज़बूत हाथों से कामिनी के गांड के दोनों पाटों (Butt Cheeks) को पकड़कर और कसकर चौड़ा कर दिया।
और अगले ही पल...
उसने अपना पूरा चेहरा कामिनी की उस गहरी, महकती हुई दरार में दे मारा।
"चटाक...!!"
उसके खुरदरे गाल और दाढ़ी कामिनी के मुलायम कूल्हों से टकराए।
और शमशेर की मोटी, चौड़ी और खुरदरी जीभ सीधे निशाने पर लगी—कामिनी के गांड के छेद पर।
"आअह्ह्ह.... आउच.... उउउफ्फ्फ्फ़...!!"
कामिनी के मुंह से एक बेकाबू चीख निकल गई।
उसका पूरा शरीर बिजली का झटका खाकर कांप उठा (Convulsed)।
वह बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठी में भींचकर ऐंठ गई।
यह स्पर्श... यह हमला... उसने अपनी ज़िंदगी में, अपने सपनों में भी नहीं सोचा था।
शमशेर की जीभ गरम लोहे की तरह थी, लेकिन गीली और रसीली।
शमशेर ने अपनी जीभ की नोक को सुई की तरह कड़ा किया और उसे कामिनी के तंग छेद (Sphincter) पर गोल-गोल फिराने लगा।
"स्स्स्लर्प... लप... लप... लप..."
कमरे में चाटने की गीली और गंदी आवाज़ें गूंजने लगीं, जो रमेश के खर्राटों को भी दबा रही थीं।
कामिनी का डर, उसकी हया, उसकी कुलीनता... सब इस एक स्पर्श के साथ हवा हो गए।
उसका जिस्म हवस की आग में दहक उठा।
यह मज़ा योनि के मज़े से बिल्कुल अलग था। यह गहरा था।
कामिनी को महसूस हुआ कि शमशेर की जीभ सिर्फ़ उसकी चमड़ी को नहीं चाट रही।
जैसे-जैसे शमशेर अपनी थूक से उस सूखे छेद को गीला कर रहा था और अपनी जीभ को अंदर धकेलने की कोशिश कर रहा था...
कामिनी को लगा जैसे गांड के उस छेद से होती हुई कोई बारीक नस (Nerve) सीधे उसके दिल से जुडी है।
शमशेर का हर एक 'चाट'... उसके दिल को अंदर से गुदगुदा रही थी, झिंझोड़ रहा थी.
"उफ्फ्फ्फ... शमशेर... आह्ह्ह्ह... यह क्या... उईईई माँ..."
कामिनी का सिर तकिये में धंस गया।
वह किसी मादा भेड़िया की तरह हुंकार उठी।
उसकी पीठ धनुष की तरह तन गई और अनजाने में उसने अपनी गांड को और पीछे धकेल दिया—सीधे शमशेर के मुंह पर।
यह एक मूक सहमति थी— "और चाटो... और अंदर तक..."
शमशेर समझ गया कि नशा चढ़ गया है।
उसने कामिनी की जांघों के बीच से बहते हुए पानी (Vaginal Juice) को अपनी उंगलियों पर लिया और उसे कामिनी के गांड के छेद पर लगा दिया।
और फिर उसने अपनी जीभ को चपटा करके उस पूरे इलाके को एक आइसक्रीम की तरह चाटना शुरू किया।
वह अपनी नाक को कामिनी के कूल्हों के बीच रगड़ रहा था, उसकी कस्तूरी (Musk) जैसी गंध को सूंघ रहा था।
कामिनी की मनोदशा अब किसी जानवर जैसी हो गई थी।
उसे अब यह नहीं याद था कि वह किसकी बीवी है, या सामने कौन है।
उसे बस वह "गीलापन" और वह "गरमाहट" चाहिए थी।
उसकी गांड का छेद, जो पहले डर से बंद था, अब मज़े में ढीला पड़ने लगा था... शमशेर के स्वागत के लिए खुलने लगा था।
शमशेर ने अपना मुंह हटाया, उसकी दाढ़ी कामिनी के रसों से सनी हुई थी।
उसने कामिनी की कांपती हुई गांड पर एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा।
"चटाक!!"
"साली... स्वाद आ गया..." शमशेर गुर्राया।
" अब हुई ना तैयार तेरी गुफा.."
शमशेर अब रुकने वाला नहीं था। कामिनी की गांड चाटने के बाद उस पर हवस का नशा पूरी तरह हावी हो चुका था।
उसने एक हाथ से अपनी बेल्ट का बक्कल पहले ही खोल रखा था।
अब उसने एक ही झटके में अपनी खाकी पैंट और अंडरवियर को घुटनों से नीचे सरका दिया।
पैंट के नीचे गिरते ही उसका विशाल, काला और नसों भरा लंड पूरी तरह आज़ाद हो गया।
वह हवा में ऐसे डोल रहा था जैसे कोई भूखा और गुस्से में भरा कोबरा (सांप) अपना फन फैलाए शिकार ढूंढ रहा हो।
वह 'सांप' फनफना रहा था, उसका लाल टोप (Suapada) सूजा हुआ था और वह अपना बिल (कामिनी की गांड) तलाश रहा था।
शमशेर ने कामिनी की कमर को अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया।
उसने अपने उस बेचैन सांप को दिशा दिखाई।
शमशेर ने अपने लंड को मुट्ठी में भरा और उसे कामिनी की गीली और खुली हुई गांड की दरार पर रख दिया।
उसने लंड को ऊपर-नीचे रगड़ना शुरू किया।
"स्लप... स्लप..."
शमशेर का गरम और सख्त लंड, कामिनी की मुलायम और थूक से गीली गांड के छेद पर घिसने लगा।
कामिनी उस झुलसा देने वाली गर्मी से सिहर उठी।
उसे पता चल गया कि अब 'मौत या मजा दरवाज़े पर खड़ा है।
उसमें अब विरोध करने की न तो हिम्मत बची थी, और सच कहें तो... न ही इच्छा।
उसका शरीर उस कठोर दंड को पाने के लिए तैयार हो गया।
सामने बिस्तर पर रमेश बेहोश पड़ा था।
कामिनी ने झट से रमेश की शर्ट का कॉलर अपनी मुट्ठी में भरा और उसे अपने मुंह में ठूंस लिया।
उसने अपने जबड़े भींच लिए, ताकि उसकी चीखें बाहर न जा सकें।
उसने अपनी गांड को हल्का सा पीछे धकेला, अनजाने में ही शमशेर को इशारा कर दिया।
उसकी गांड का वह छोटा सा, गुलाबी छेद बाहर की तरफ (Prolapse) खुलने लगा, जैसे कह रहा हो— "आओ, मुझे भर दो।"
शमशेर ने अब और इंतज़ार नहीं किया।
उसने अपने लंड के विशाल, मशरूम जैसे टोपे (Glans) को कामिनी की गांड के ठीक मुहाने पर सेट किया।
वह छेद बहुत छोटा था, और टोप बहुत बड़ा।
शमशेर ने कामिनी की कमर को कसकर पकड़ा और अपनी कमर को आगे की तरफ धकेला।
एक धीमा लेकिन ताकतवर दबाव।
कामिनी की गांड की मांसपेशियां (Sphincter) खिंचने लगीं।
उसकी आँखें चौड़ी हो गईं, पुतलियां फैल गईं। उसने रमेश की शर्ट को दांतों तले दबा लिया।
"तड़ड़ड़......"
गांड की चमड़ी तनने लगी। लंड का मोटा टोप उस तंग रास्ते को जबरदस्ती चौड़ा कर रहा था।
वह एक टाइट रबर रिंग को फाड़कर अंदर घुसने जैसा था।
"खचाक.....!!"
एक गीली और भारी आवाज़ के साथ शमशेर ने एक ज़ोरदार धक्का मारा।
मेहनत रंग लाई।
शमशेर के लंड का वह मोटा, लाल और विशाल टोप कामिनी की गांड के तंग दरवाज़े को तोड़ता हुआ अंदर घुस गया।
"आआआआआहहहहह...... उउउउफ्फ्फ्फ़.... म्म्म्म्म्प्पप्प.....!!!"
कामिनी की चित्कार निकल गई।
उसे लगा जैसे किसी ने गरम लोहे की कील उसकी गांड में ठोक दी हो।
उसका सिर झटके से ऊपर उठा, नसे तन गईं।
लेकिन रमेश की शर्ट ने उसकी उस गगनभेदी चीख को घोंट दिया।
और ठीक उसी पल...
जैसे ही वह विशाल लंड गांड के अंदर घुसा और उसने अंदर के अंगों (Bladder/G-Spot) पर ज़बरदस्त दबाव बनाया...
कामिनी का शरीर अपना नियंत्रण खो बैठा।
उसकी चुत, जो पहले से ही गीली थी, लंड के इस अचानक हमले को बर्दाश्त नहीं कर पाई।
"सर्ररररर...... पिच....पाचककक ससससररर......!!"
कामिनी की चुत से पेशाब और उत्तेजना के पानी की एक तेज़ धार (Squirt) फव्वारे की तरह छूट गई।
वह धार सीधे बिस्तर पर गिरी, बिस्तर की चादर गीली हो गई।
ऐसा लगा जैसे कामिनी के शरीर ने शमशेर के लंड के लिए जगह खाली की हो।
वह नज़ारा अद्भुत था।
पीछे एक मर्द उसकी गांड मार रहा था, और आगे से वह औरत झड़ (Squirt) रही थी।
शमशेर ने उस गीलेपन को देखा और पागल हो गया।
"साली... मूत दिया तूने?" शमशेर हांफते हुए हंसा। "ले अब पूरा ले..."
और उसने अपना बाकी का 8 इंच का तना भी अंदर उतारना शुरू कर दिया।
शमशेर का विशाल लंड का 'सुपाड़ा' (Topa) कामिनी की गांड के तंग दरवाज़े को तोड़कर अंदर घुस चुका था।
शुरुआत में तो लगा जैसे कामिनी की गांड फट गई हो, लेकिन जैसे ही शमशेर ने रुकने के बजाय धीरे-धीरे कमर चलानी शुरू की, मंज़र बदलने लगा।
"स्लप... चप... स्लप..."
गीली थूक और कामिनी के रसों की वजह से लंड चिकना होकर अंदर-बाहर होने लगा।
शमशेर ने बहुत सधे हुए अंदाज़ में छोटे-छोटे धक्के मारने शुरू किए।
वह अपने लंड को आधा बाहर खींचता, और फिर धीरे से वापस अंदर ठेल देता।
इस रगड़ ने कामिनी के अंदर एक नया ही तूफ़ान खड़ा कर दिया।
वह गांड, जो कुछ पलों पहले दर्द से चीख रही थी, अब उस 'भराव' (Fullness) को महसूस करके पागल होने लगी।
कामिनी को महसूस हुआ कि उसकी गांड की मांसपेशियां (Sphincter) शमशेर के लंड को किसी रबर बैंड की तरह जकड़ रही हैं, उसे चूम रही हैं।
दर्द पल भर में ही उत्तेजना में तब्दील होने लगा।
उसे अपनी नाभि के नीचे, पेट की गहराई में एक मीठा-मीठा दर्द और भारीपन महसूस हुआ।
यह चुत के मज़े से ज्यादा गहरा और नशीला था।
कामिनी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि गांड मरवाने में भी इतना मज़ा है। वह उस 'भरने' के अहसास की गुलाम हो गई।
उसने रमेश की शर्ट को मुंह से थूक दिया और दबी हुई आवाज़ में सिसकी—
"आह्ह्ह... शमशेर... और... और अंदर..."
उसने अपनी गांड को पीछे की तरफ धकेला।
वह चाहती थी कि वह मोटा सांप उसकी आंतों तक घुस जाए। वह अब और लंड मांग रही थी।
शमशेर ने यह इशारा समझ लिया।
"साली... स्वाद आ गया तुझे भी?" शमशेर हांफते हुए हंसा।
उसने कामिनी की कमर को कसकर पकड़ा और मौका देखकर एक ज़ोरदार धक्का मारा।
"धप्प...!!"
शमशेर का लंड, जो अब तक सिर्फ़ सुपाड़ा अंदर डाले हुए था, अब आधा (Half Shaft) अंदर चला गया।
कामिनी की आँखें पलट गईं। उसे लगा वह जन्नत में है।
वे दोनों अपनी लय (Rhythm) पकड़ने ही वाले थे।
कामिनी और लंड लेने के लिए पीछे धकेल रही थी, और शमशेर पूरा अंदर डालने के लिए जोर लगा रहा था।
तभी...
अचानक रात के सन्नाटे को चीरती हुई एक तेज़ और डरावनी आवाज़ बेडरूम में गूंज उठी।
"वी... वू... वी... वू... वी... वू...!!!!"
(Police Siren Wailing Loudly)
आवाज़ इतनी तेज़ और नज़दीक थी कि लगा पुलिस की जीप सीधे बेडरूम के अंदर घुस आई है।
और आवाज़ के साथ ही...
बेडरूम की खिड़की के पर्दे पर लाल और नीली रौशनी (Red & Blue Lights) चमकने लगी।
पर्दे से छनकर आती वह घूमती हुई रौशनी पूरे कमरे में डिस्को लाइट की तरह नाचने लगी—कभी कामिनी की नंगी पीठ पर लाल, तो कभी शमशेर के चेहरे पर नीला।
कामिनी और शमशेर बुरी तरह डर गए।
उनका नशा एक सेकंड में हिरन हो गया।
कामिनी, जो अभी मज़े में झूम रही थी, अब खौफ से कांप उठी।
"हय राम! ये... ये क्या हुआ? इतनी रात को पुलिस?" कामिनी बड़बड़ाई।
वह किसी खूंटे से बंधे जानवर की तरह छटपटाने लगी। उसे लगा अब सब ख़त्म। इज़्ज़त, घर, सब कुछ।
लेकिन असली मुसीबत तो अब शुरू हुई।
पुलिस के सायरन की आवाज़ सुनकर शमशेर का, जो एक पुलिस वाला ही था, डर के मारे बुरा हाल हो गया।
डर का सीधा असर उसके लंड पर पड़ा।
उसका वह लोहे जैसा खड़ा लंड, जो कामिनी की गांड में आधा घुसा हुआ था, अचानक सिकुड़ने लगा। वह ढीला पड़ गया।
शमशेर ने हड़बड़ाहट में अपना लंड बाहर खींचना चाहा।
लेकिन यहाँ फिजिक्स ने खेल कर दिया।
कामिनी भी डरी हुई थी। डर के कारण उसकी गांड की मांसपेशियां (Sphincter) बुरी तरह सिकुड़ गईं।
उसकी तंग गांड ने शमशेर के आधे-अधूरे और अब ढीले पड़ते हुए लंड पर एक वैक्यूम बना दिया।
शमशेर अपना लंड बहार खींच रहा था, लेकिन लंड बाहर नहीं आ रहा था।
उसका सुपाड़ा (Topa) अंदर बुरी तरह फंस (Stuck) गया था।
"अरे... अरे... छोड़ इसे..." शमशेर फुसफुसाया, पसीने से तर-बतर होकर।
"आआआआह्हः..... बहार निकालो इसे... हाय माँ..." कामिनी सिसक उठी।
उसे ऐसा लग रहा था जैसे शमशेर लंड नहीं, उसकी आंतें खींच रहा है।
शमशेर ने एक हाथ कामिनी की कमर पर रखा और दूसरे हाथ से अपनी जांघ पर जोर दिया।
उसने एक झटका मारा।
"इइइइ... पप्पाप्प... पुककक...!!" (PLUCK!)
एक गीली और अजीब सी आवाज़ आई, जैसे किसी ने शैंपेन की बोतल का कॉर्क (Cork) खोला हो, या कीचड़ में फंसा पैर बाहर निकाला हो।
शमशेर का लंड झटके से बाहर निकल आया।
उसका सुपाड़ा लाल था और उस पर कामिनी की गांड की गीलापन लगा हुआ था।
कामिनी को ऐसा लगा जैसे उसकी गांड का छेद बाहर की तरफ पलट गया हो।
उसे महसूस हुआ कि उसका दिल और कलेजा उस रास्ते से बाहर खिंच आया है।
उसकी गांड का छेद अब खुला (Gaping) रह गया था, जो हवा में "धक्-धक्" कर रहा था।
दर्द और खिंचाव ने उसकी आँखों में आंसू ला दिए।
लंड के निकलते ही शमशेर तुरंत पीछे हटा।
उसने आव देखा न ताव, अपनी खाकी पैंट और अंडरवियर को जल्दी-जल्दी ऊपर चढ़ाया।
उसकी हालत पतली थी। उसका लंड अब पूरी तरह सिकुड़कर केंचुआ बन गया था।
उसने बेल्ट लगाई भी नहीं, बस हाथ में पकड़ ली।
"मै... मैं देखता हूँ बाहर क्या है..." शमशेर ने हकलाते हुए कहा। "शायद रेड है... तुम... तुम जल्दी से कपड़े पहन लो।"
शमशेर ने रमेश की तरफ इशारा किया।
"और इस चूतिये को... रमेश को जगाओ! जल्दी!"
कामिनी के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं।
वह नंगी थी, पसीने से लथपथ थी, उसकी गांड और योनि से पानी बह रहा था।
बाहर लाल-नीली बत्ती चमक रही थी।
उसने कांपते हाथों से अपनी साड़ी और पेटीकोट को उठाया जो ज़मीन पर पड़े थे।
उसने उन्हें लपेटा नहीं, बस अपने आगे पकड़ लिया।
वह रमेश के पास गई और उसे झिंझोड़ने लगी।
"उठो... उठो रमेश... प्लीज उठो..." कामिनी की आवाज़ में रुलाई थी।
"देखो बाहर पुलिस आई है... उठो ना!"
रमेश नशे में "हूं... हां..." कर रहा था, उसे खबर ही नहीं थी कि उसकी बीवी की गांड अभी-अभी मारी गई है और घर के बाहर पुलिस खड़ी है।
तभी बाहर से मेगाफोन (Loudspeaker) पर आवाज़ आई—
"बंगला नंबर 69! पुलिस ने घर को चारों तरफ से घेर लिया है। जो भी अंदर है, हाथ ऊपर करके बाहर आ जाओ!"
आवाज़ किसी और की नहीं, कमिश्नर विक्रम सिंह की थी।
शमशेर का खून जम गया।
(क्रमशः)