एपिसोड 1: स्मृतियों की पगडंडी
कोंकण के शांत आंचल में बसा एक छोटा सा, सुंदर गांव। प्रकृति की गोद में सिमटे इस गांव की अपनी ही एक लय थी।
गांव से लगभग सात-आठ किलोमीटर की दूरी पर तहसील का एक कस्बा था, जहाँ मेरा माध्यमिक स्कूल स्थित था। हर सुबह नौ-साढ़े नौ बजे के करीब स्कूल के लिए घर से निकलना और फिर शाम को छह बजे तक थके-हारे घर लौटना—यही मेरी दिनचर्या बन गई थी। स्कूल तक पहुँचने का वह रास्ता केवल दूरी तय करना नहीं था, बल्कि हर दिन एक नया अनुभव, एक नया रोमांच लेकर आता था।
उस सफर को तय करने के कई तरीके थे। कभी-कभी गांव से तहसील जाने वाली सरकारी 'एस.टी. बस' मिल जाती। बस स्टैंड पर यात्रियों का रेला, बस के भीतर पैर रखने की जगह न होना, हवा में तैरती धूल की परतें और डीजल की वह तीखी गंध—ये सब उस सफर का अभिन्न हिस्सा थे।
लेकिन जब बस नहीं मिलती, तो हम पैदल ही निकल पड़ते। खेतों के बीच से होकर गुज़रते वे कच्चे-पक्के रास्ते, छायादार पेड़ों की कतारें और पक्षियों का कलरव मन मोह लेता था। मानसून के दिनों में सड़कों पर फैला वह चिखल (कीचड़) और गर्मियों में पैरों के नीचे उड़ती धूल—मौसम बदलता, पर हमारा रास्ता नहीं। पैदल चलते समय रास्ते में स्कूल के अन्य मित्र मिल जाते, और फिर बातों का ऐसा सिलसिला शुरू होता कि मील का पत्थर कब पीछे छूट जाता, पता ही न चलता।
कभी-कभी हम सड़क किनारे खड़े होकर किसी परिचित या अपरिचित गाड़ी वाले को हाथ देकर 'लिफ्ट' भी मांग लिया करते थे। अगर गाड़ी रुक गई, तो वह किसी बड़े पुरस्कार जैसा लगता, वरना अपनी दो टांगें तो थीं ही! स्कूल का वह सफर अपने आप में रोज एक नया साहस, एक नई चुनौती था।
वक्त के साथ गांव के उन सीधे-सादे लोगों की आत्मीयता और एक-दूसरे की मदद करने की उनकी सहज वृत्ति मुझे भीतर तक छूने लगी। स्कूल में भी नए मित्र बने, जिनके साथ खेलना और ठहाके लगाना अब जीवन का हिस्सा बन गया था। शुरुआती संकोच धीरे-धीरे आत्मविश्वास में बदल रहा था। मिट्टी की वह सोंधी महक, चारों ओर पसरी मखमली हरियाली, खेतों में चरते पशुओं की आवाज़ें और वह स्वच्छ, उन्मुक्त हवा—इन सबके बीच मैं प्रकृति को बेहद करीब से महसूस करने लगा था।
वह केवल स्कूल का रास्ता नहीं था, वह जीवन को करीब से देखने की मेरी पहली पाठशाला थी।
कोंकण के शांत आंचल में बसा एक छोटा सा, सुंदर गांव। प्रकृति की गोद में सिमटे इस गांव की अपनी ही एक लय थी।
गांव से लगभग सात-आठ किलोमीटर की दूरी पर तहसील का एक कस्बा था, जहाँ मेरा माध्यमिक स्कूल स्थित था। हर सुबह नौ-साढ़े नौ बजे के करीब स्कूल के लिए घर से निकलना और फिर शाम को छह बजे तक थके-हारे घर लौटना—यही मेरी दिनचर्या बन गई थी। स्कूल तक पहुँचने का वह रास्ता केवल दूरी तय करना नहीं था, बल्कि हर दिन एक नया अनुभव, एक नया रोमांच लेकर आता था।
उस सफर को तय करने के कई तरीके थे। कभी-कभी गांव से तहसील जाने वाली सरकारी 'एस.टी. बस' मिल जाती। बस स्टैंड पर यात्रियों का रेला, बस के भीतर पैर रखने की जगह न होना, हवा में तैरती धूल की परतें और डीजल की वह तीखी गंध—ये सब उस सफर का अभिन्न हिस्सा थे।
लेकिन जब बस नहीं मिलती, तो हम पैदल ही निकल पड़ते। खेतों के बीच से होकर गुज़रते वे कच्चे-पक्के रास्ते, छायादार पेड़ों की कतारें और पक्षियों का कलरव मन मोह लेता था। मानसून के दिनों में सड़कों पर फैला वह चिखल (कीचड़) और गर्मियों में पैरों के नीचे उड़ती धूल—मौसम बदलता, पर हमारा रास्ता नहीं। पैदल चलते समय रास्ते में स्कूल के अन्य मित्र मिल जाते, और फिर बातों का ऐसा सिलसिला शुरू होता कि मील का पत्थर कब पीछे छूट जाता, पता ही न चलता।
कभी-कभी हम सड़क किनारे खड़े होकर किसी परिचित या अपरिचित गाड़ी वाले को हाथ देकर 'लिफ्ट' भी मांग लिया करते थे। अगर गाड़ी रुक गई, तो वह किसी बड़े पुरस्कार जैसा लगता, वरना अपनी दो टांगें तो थीं ही! स्कूल का वह सफर अपने आप में रोज एक नया साहस, एक नई चुनौती था।
वक्त के साथ गांव के उन सीधे-सादे लोगों की आत्मीयता और एक-दूसरे की मदद करने की उनकी सहज वृत्ति मुझे भीतर तक छूने लगी। स्कूल में भी नए मित्र बने, जिनके साथ खेलना और ठहाके लगाना अब जीवन का हिस्सा बन गया था। शुरुआती संकोच धीरे-धीरे आत्मविश्वास में बदल रहा था। मिट्टी की वह सोंधी महक, चारों ओर पसरी मखमली हरियाली, खेतों में चरते पशुओं की आवाज़ें और वह स्वच्छ, उन्मुक्त हवा—इन सबके बीच मैं प्रकृति को बेहद करीब से महसूस करने लगा था।
वह केवल स्कूल का रास्ता नहीं था, वह जीवन को करीब से देखने की मेरी पहली पाठशाला थी।