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Incest माई

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एपिसोड 1: स्मृतियों की पगडंडी

कोंकण के शांत आंचल में बसा एक छोटा सा, सुंदर गांव। प्रकृति की गोद में सिमटे इस गांव की अपनी ही एक लय थी।
गांव से लगभग सात-आठ किलोमीटर की दूरी पर तहसील का एक कस्बा था, जहाँ मेरा माध्यमिक स्कूल स्थित था। हर सुबह नौ-साढ़े नौ बजे के करीब स्कूल के लिए घर से निकलना और फिर शाम को छह बजे तक थके-हारे घर लौटना—यही मेरी दिनचर्या बन गई थी। स्कूल तक पहुँचने का वह रास्ता केवल दूरी तय करना नहीं था, बल्कि हर दिन एक नया अनुभव, एक नया रोमांच लेकर आता था।
उस सफर को तय करने के कई तरीके थे। कभी-कभी गांव से तहसील जाने वाली सरकारी 'एस.टी. बस' मिल जाती। बस स्टैंड पर यात्रियों का रेला, बस के भीतर पैर रखने की जगह न होना, हवा में तैरती धूल की परतें और डीजल की वह तीखी गंध—ये सब उस सफर का अभिन्न हिस्सा थे।
लेकिन जब बस नहीं मिलती, तो हम पैदल ही निकल पड़ते। खेतों के बीच से होकर गुज़रते वे कच्चे-पक्के रास्ते, छायादार पेड़ों की कतारें और पक्षियों का कलरव मन मोह लेता था। मानसून के दिनों में सड़कों पर फैला वह चिखल (कीचड़) और गर्मियों में पैरों के नीचे उड़ती धूल—मौसम बदलता, पर हमारा रास्ता नहीं। पैदल चलते समय रास्ते में स्कूल के अन्य मित्र मिल जाते, और फिर बातों का ऐसा सिलसिला शुरू होता कि मील का पत्थर कब पीछे छूट जाता, पता ही न चलता।
कभी-कभी हम सड़क किनारे खड़े होकर किसी परिचित या अपरिचित गाड़ी वाले को हाथ देकर 'लिफ्ट' भी मांग लिया करते थे। अगर गाड़ी रुक गई, तो वह किसी बड़े पुरस्कार जैसा लगता, वरना अपनी दो टांगें तो थीं ही! स्कूल का वह सफर अपने आप में रोज एक नया साहस, एक नई चुनौती था।
वक्त के साथ गांव के उन सीधे-सादे लोगों की आत्मीयता और एक-दूसरे की मदद करने की उनकी सहज वृत्ति मुझे भीतर तक छूने लगी। स्कूल में भी नए मित्र बने, जिनके साथ खेलना और ठहाके लगाना अब जीवन का हिस्सा बन गया था। शुरुआती संकोच धीरे-धीरे आत्मविश्वास में बदल रहा था। मिट्टी की वह सोंधी महक, चारों ओर पसरी मखमली हरियाली, खेतों में चरते पशुओं की आवाज़ें और वह स्वच्छ, उन्मुक्त हवा—इन सबके बीच मैं प्रकृति को बेहद करीब से महसूस करने लगा था।
वह केवल स्कूल का रास्ता नहीं था, वह जीवन को करीब से देखने की मेरी पहली पाठशाला थी।​
 

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एपिसोड 2: माई – एक सम्मोहक आत्मीयता
उस नई दुनिया में मेरी सबसे पहली और अमिट पहचान मेरी बड़ी काकी से हुई। घर में नन्हे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई उन्हें बड़े प्रेम से 'माई' कहकर पुकारता था। देखते ही देखते उनका वह स्वरूप मेरे अंतर्मन में गहराई से अंकित हो गया, और मैं भी उन्हें 'माई' ही कहने लगा।
माई का रंग अत्यंत साफ़ और निखरा हुआ था—मानो दूध में केसर की एक बूंद घुली हो। उनके चेहरे पर एक ऐसी अलौकिक प्रसन्नता थी, जो किसी को भी सहज ही अपनी ओर खींच लेती। चेहरा गोल और भरा हुआ, लेकिन नक्श बहुत ही नक्काशीदार थे। नाक थोड़ी चपटी होने के बावजूद उनके चेहरे पर बहुत जचती थी। उनके गालों की वह सुर्खी और हल्का भारीपन ऐसा था कि मन करता था बस उन्हें निहारते रहें। होंठ गुलाबी और मांसल थे, जैसे अभी-अभी खिली हुई किसी फूल की पंखुड़ियाँ। उनकी आँखें बोलती थीं; उनमें एक साथ शांत ममता और थोड़ी सी शरारत, दोनों ही झलकती थी। उनके बाल घने, लंबे और स्याह काले थे, जिन्हें वे अक्सर करीने से गूँथकर चोटी बना लेतीं, पर कभी जो वे बाल खुले छोड़तीं, तो वे उनकी कमर तक लहराते थे। उनकी मुस्कान में तो जैसे जादू था, जो आस-पास के उदास माहौल को भी पल भर में खुशगवार बना देती थी। उनके इस रूप ने मेरे बाल-मन को पूरी तरह जीत लिया था।
कद में वे थोड़ी छोटी थीं, लेकिन उनका व्यक्तित्व और काया मज़बूत और सुडौल थी। उनके चलने-फिरने के अंदाज़ में एक खास तरह की गरिमा और आकर्षण था। वे सदैव पारंपरिक 'नौवारी साड़ी' पहना करती थीं। कोंकण की महिलाओं का नौवारी पहनने का ढंग ही ऐसा होता है कि उनके शरीर की प्राकृतिक बनावट और उभार अधिक स्पष्टता से उभरकर आते हैं। माई तो साड़ी इतने सलीके और चुस्त तरीके से बाँधती थीं कि उनकी देह का सौंदर्य और भी निखर उठता था। विशेषकर नौवारी साड़ी में नारी के देह का पिछला हिस्सा और भी आकर्षक दिखता है, और जब माई झुकतीं या चलतीं, तो उनके शरीर का वह सुगठित भाग साड़ी के भीतर से अपनी उपस्थिति दर्ज कराता था।
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साड़ी के पल्लू के नीचे से उनकी गोरी कमर की झलक पाकर मन में एक अजीब सी हलचल होने लगती थी। उनकी उस निखरी और रेशमी त्वचा पर पड़ने वाली बारीक बलियाँ (वलय) उनके सौंदर्य में चार चाँद लगा देती थीं। कभी-कभी काम की आपाधापी में उनका पल्लू थोड़ा सरक जाता, तो उनके ब्लाउज में बमुश्किल समाए हुए उनके पुष्ट वक्षों का आकार स्पष्ट आभास देता था।
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पीछे से देखने पर उनकी साफ़, चौड़ी और भरी हुई पीठ अत्यंत सुंदर दिखती थी। चालीस की उम्र पार करने के बावजूद उनके सौंदर्य पर वक्त की कोई धूल नहीं पड़ी थी, बल्कि वह और भी परिपक्व और ओजस्वी हो उठा था।
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मैं स्वभाव से बहुत शांत और आज्ञाकारी लड़का था। गांव आने के बाद मैंने खुद को घर के छोटे-मोटे कामों में व्यस्त कर लिया था। माई को भी अक्सर मेरी मदद की ज़रूरत पड़ती—कभी मिक्सी चलवानी हो, कभी पानी भरकर देना हो, या कभी कोई भारी सामान उठाना हो। मैं बड़ी खुशी से उनके ये सारे काम कर देता था।
दिन भर के काम और घर की भागदौड़ की वजह से उनकी कमर में अक्सर दर्द रहता था। तब वे मुझे बुलातीं और अपनी कमर दबाने के लिए कहतीं। शुरुआत में यह मेरे लिए बहुत ही स्वाभाविक काम था; मुझे लगता था कि मैं घर के किसी बड़े सदस्य की सेवा कर रहा हूँ। मैं बड़ी मासूमियत से उनकी कमर और कंधों को धीरे-धीरे सहलाता और दबाता। कभी-कभी वे मेरे कंधों पर हाथ रखकर खड़ी हो जातीं और मैं उनके दोनों कंधे पकड़कर अपने घुटनों से उनकी गर्दन से लेकर कमर तक के हिस्से को दबाव देते हुए मालिश करता। इससे उन्हें बहुत सुकून मिलता और वे इत्मीनान से कहतीं, "हांss, अब जाकर बहुत आराम मिल रहा है।"
लेकिन जैसे-जैसे मेरा शरीर बढ़ने लगा, इस क्रिया में मुझे कुछ नया और भिन्न महसूस होने लगा। मेरी उम्र बढ़ रही थी और उसके साथ ही मन और तन में भी बदलाव आ रहे थे। माई की त्वचा का वह स्पर्श अब केवल सेवा का स्पर्श नहीं रह गया था। मेरी उंगलियों को उनके शरीर की ऊष्मा (गर्मी) और उनकी मांसपेशियों की कोमलता का एहसास होने लगा था। कमर दबाते समय मेरी उंगलियाँ अनजाने में ही इधर-उधर भटकने लगतीं। पीठ के उस खुले हिस्से पर, जहाँ साड़ी का आवरण नहीं होता था, मेरे घुटने अब पहले से कुछ ज्यादा देर तक ठहरने लगे थे। उनके उस निखरे, गौर वर्ण के देह को छूते समय मेरे भीतर एक अनजानी सी सिहरन पैदा होने लगी थी।
जब मैं उनकी कमर सहलाता या पीठ पर अपना घुटना टिकाता, तो मेरा पूरा ध्यान बस उनकी देह के उतार-चढ़ाव पर ही केंद्रित रहता। मेरी आँखें उनके शरीर की हर लकीर को पढ़ने की कोशिश करतीं। साड़ी से झलकती उनकी कमर, कभी अनायास दिख जाने वाले उनके स्तन, उनकी सुराहीदार गर्दन और वह चौड़ी पीठ... हर चीज़ में अब एक चुंबकीय आकर्षण महसूस होता था। विशेष रूप से जब वे कमर दबवाने के लिए मेरे सामने खड़ी होतीं और उनका पल्लू सरकने से उनके पेट या ब्लाउज का कोई हिस्सा दिखाई दे जाता, तो मेरी उत्सुकता चरम पर पहुँच जाती। मन में विचारों का एक ऐसा बवंडर उठता, जिसे उस उम्र में मैं कोई नाम नहीं दे पा रहा था। एक तरफ उन्हें आराम पहुँचाने का संतोष था, तो दूसरी तरफ उनकी देह के प्रति यह नई, अपरिचित चेतना... मैं इन दो पाटों के बीच झूल रहा था। माई का वह शालीन और फिर भी कामुक रूप मेरे किशोर मन पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ता जा रहा था।
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माई की कमर दबाते समय अब मैं पहले जैसा निष्पाप और मासूम नहीं रहा था। मेरे स्पर्श और मेरी नज़रों के पीछे अब एक अलग ही भाव छुपा था, जिसकी शायद उन्हें भनक तक नहीं थी। लेकिन मेरे लिए माई का वह देह, उनका वह स्पर्श और उससे उपजने वाली भावनाएँ... मेरी बढ़ती उम्र का एक रहस्यमयी और बेहद आकर्षक मोड़ बन चुकी थीं।​
 
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एपिसोड 3: चेतना की पहली लहर
यह वह दौर था जब मैं शायद आठवीं या नौवीं कक्षा में रहा होऊँगा। जीवन के उस पड़ाव पर, जहाँ मन के बंद झरोखों से भावनाओं की नई और अनजानी बयार धीरे-धीरे भीतर प्रवेश करने लगी थी। माई के प्रति वह पहला आकर्षण, वह पहली आसक्ति मुझे उसी दौरान महसूस हुई।
वह एक तपती हुई दोपहर थी। सूरज अपने पूरे शबाब पर था और स्कूल की दिनभर की भागदौड़ के बाद मेरा शरीर बुरी तरह टूट रहा था। घर कदम रखते ही मैंने अपना बस्ता एक कोने में पटका, हाथ-मुँह धोए और माँ के हाथ का परोसा हुआ गरमा-गरम भोजन किया। पेट तो भर गया, लेकिन मन में एक अजीब सी छटपटाहट थी—जैसे कुछ अधूरा हो, कुछ छूट रहा हो। मैं घर में बेमकसद यहाँ-वहाँ टहलने लगा। खिड़की से बाहर तपती सड़क को देखा, फिर वापस अंदर आ गया। सारा घर दोपहर की गहरी शांति में डूबा हुआ था, सब अपने-अपने कामों में मशगूल थे। केवल माई अपनी चिर-परिचित चारपाई पर लेटी हुई थीं। उन्होंने खुद को चादर से ढँक रखा था, लेकिन उनकी वह शांत और सोई हुई मुद्रा मेरे भीतर न जाने कैसी हलचल पैदा कर रही थी।
अचानक उनकी आवाज़ गूँजी, "इधर आ, थोड़ी देर यहाँ सो जा।" उनकी आवाज़ में वही चिर-परिचित कोमलता और आत्मीयता थी, जो मुझे हमेशा अपनी ओर खींचती थी। मैं उनके पास गया। उन्होंने चारपाई पर दीवार की तरफ मेरे लिए जगह बनाई और मैं चुपचाप उनके बगल में लेट गया। मेरा सिर उनके सिरहाने के बिल्कुल करीब था। उन्होंने अपनी चादर का एक हिस्सा उठाकर मुझ पर डाल दिया। वह चादर थोड़ी पुरानी और खुरदरी थी, लेकिन उसमें माई के शरीर की वह मंद, सोंधी सी खुशबू रची-बसी थी, जो मुझे किसी और ही लोक में ले जाती थी। मैं छोटा था, पर उस क्षण मुझे कुछ ऐसा महसूस हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था। नींद तो कोसों दूर थी, बल्कि मन में एक अजीब सी अधीरता घर करने लगी थी। देह थकी हुई थी, पर चेतना पूरी तरह जागृत थी—जैसे कुछ नया अनुभव करने की प्रतीक्षा में हो।
तभी मेरे भीतर एक विचित्र और तीव्र इच्छा ने जन्म लिया—'उन्हें छूने की इच्छा'। क्यों? यह सवाल मन में कौंधा, पर जवाब नदारद था। वह इच्छा किसी छोटे से पौधे की तरह थी, जिसे कल्पनाओं का जल मिला और वह तेज़ी से बढ़ने लगी। मैंने बहुत ही सावधानी से अपना शरीर उनकी ओर खिसकाना शुरू किया। डर था कि कहीं उनकी नींद न टूट जाए या मेरे मन की हलचलों की उन्हें भनक न लग जाए। धीरे-धीरे मेरा हाथ उनके हाथ के करीब पहुँचा और एक पल के लिए हमारी खाल एक-दूसरे से छुई। वह स्पर्श अत्यंत क्षणिक और कोमल था, लेकिन उसने मेरे पूरे वजूद में बिजली की एक लहर दौड़ा दी। मेरा हृदय ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा—मानो सीना चीरकर बाहर आ जाएगा। शायद माई को उस स्पर्श का आभास हुआ, क्योंकि उन्होंने तुरंत अपना हाथ थोड़ा दूर कर लिया।
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उनके उस सहज से बदलाव ने मेरे भीतर एक बवंडर खड़ा कर दिया। उस चादर के नीचे, उनके इतने करीब अब एक पल भी रुकना मेरे लिए दूभर हो गया। मैं कुछ बुदबुदाते हुए झटके से उठा और बाहर की ओर भाग गया। लेकिन मेरा जिस्म भले ही बाहर था, मेरा मन उसी चारपाई पर अटका रह गया था।
उस दिन के बाद से मेरे भीतर उनके प्रति एक नए किस्म का आकर्षण पनपने लगा। उन्हें चोरी-छिपे देखना, उनकी हर हरकत पर नज़र रखना, उनके स्पर्श को फिर से पाने की जुगत भिड़ाना—यही मेरा नया शगल बन गया था। उनकी वह शांत मुखमुद्रा, वह मंद स्पर्श और उस चादर की गंध... इन सबने मिलकर मेरे भीतर एक दीया जला दिया था। उनकी मौजूदगी में मेरा मन एक अलग ही तरंग पर सवार रहता था।
हालाँकि, ये भावनाएँ अभी इतनी प्रबल नहीं थीं कि वे मेरे बचपन को निगल जाएँ। मैं अब भी वही स्कूल जाने वाला, दोस्तों के साथ खिलंदड़पन करने वाला लड़का था। घर के कामों और खेल-कूद के शोर में माई के वे विचार कहीं पीछे छूट जाते थे। फिर भी, वह कसक मन के किसी गुप्त कोने में सुरक्षित थी—जैसे किसी मद्धम जलते दीये की लौ, जो बुझती नहीं, बस शांत रहती है। उस एक दोपहर ने मेरे बचपन के कैनवास पर एक नया और गहरा रंग बिखेर दिया था, जिसे मैं खुद भी पूरी तरह समझ नहीं पा रहा था।​
 
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एपिसोड 4: अतृप्त रातें और गहराता सम्मोहन
उसके बाद वक्त का एक लंबा कारवां गुज़र गया। मैं बड़ा हुआ, गाँव की पगडंडियों को पीछे छोड़ शिक्षा के लिए शहर आ गया और वहीं की आपाधापी में खुद को पूरी तरह झोंक दिया। लेकिन फिर भी, मन के किसी गहरे और अंधेरे कोने में उसके प्रति, मेरी 'माई' के प्रति वह पुराना आकर्षण अब भी सांसें ले रहा था। शहर बदला, लोग बदले, परिवेश बदला, पर माई की स्मृतियों की वह नमी और वह विचित्र खिंचाव ज़रा भी कम नहीं हुआ। वह खिंचाव महज़ शारीरिक नहीं था, बल्कि उनके समूचे व्यक्तित्व और मौजूदगी में कुछ ऐसा रहस्यमयी था जो मुझे चुंबकीय रूप से अपनी ओर खींचता रहता था।
उनके पति, यानी मेरे काका, तब ही चल बसे थे जब उनका बेटा बहुत छोटा था। अचानक टूटे उस दुख के पहाड़ को उन्होंने कैसे सहा होगा, इसकी कल्पना करना भी रूह कँपा देता है। खुशकिस्मती से काका की जगह उनके बेटे को नौकरी मिल गई। उसकी शादी हुई और वह अपनी पत्नी के साथ मुंबई में बस गया। अब साल में केवल दो बार—मई की गर्मियों और दीवाली की छुट्टियों में—ही उसका गाँव आना होता था। उन चंद दिनों के लिए वह घर लोगों की चहल-पहल से भर जाता, लेकिन बाकी के सारे दिन माई उस विशाल और पुराने 'वाड़े' (हवेली) में बिल्कुल अकेली होती थीं। उनकी वह एकाकी परछाईं घर की दीवारों पर रेंगती रहती, और कभी-कभी मुझे महसूस होता कि उस खामोश घर में उनका अकेलापन मेरी अपनी तन्हाई से भी कहीं अधिक गहरा और स्याह है।
मैं भी पढ़ाई के सिलसिले में शहर में रहता था। कॉलेज की दुनिया, नए दोस्त और किताबों का बोझ—इन सबने मुझे घेरा हुआ था। छुट्टियों में ही गाँव आना हो पाता था। शहर में रहकर मैं अक्सर खुद को आधुनिकता और व्यस्तता में भुलाने की कोशिश करता, पर जैसे ही गाँव की मिट्टी पर कदम रखता, सब कुछ बदल जाता। विशेषकर उन्हें देखते ही, वह दबी हुई आसक्ति एक ज़ोरदार लहर की तरह सतह पर आ जाती। किशोर उम्र में अनजाने में बोया गया वह बीज अब एक विशाल वृक्ष बन चुका था। वे सामने न भी हों, तो भी उनकी मूरत आँखों के सामने से नहीं हटती थी। उनका वह सदा ओस की बूंदों जैसा भीगा सा लगने वाला गोरापन, घर के कामों के बोझ या उम्र के असर से उनकी कमर और पेट पर उभरी हुई वे मांसल और कोमल बलियाँ (सलवटें), बर्तन माँजते या पानी भरते वक्त पल्लू के पीछे से अनचाहे ही दिखने वाली उनके पुष्ट वक्षों की वह गोलाई... यह सब मेरी नज़रों से बच नहीं पाता था। उन्हें इस तरह चोरी-छिपे निहारने में एक अजीब, रहस्यमयी संतोष मिलता था, पर साथ ही अपराधबोध की एक तीव्र भावना भी मन में उमड़ती, जो मुझे भीतर तक झकझोर देती। वह रिश्ता अत्यंत पवित्र था, पर मेरे विचार... वे अपवित्रता की सीमा लाँघ रहे थे।
गाँव आने पर माई अक्सर बीच के कमरे में सोती थीं और मैं बाहर के दीवानखाने या बरामदे में। गाँव की रातें जल्दी ही खामोशी की चादर ओढ़ लेती थीं, और जैसे-जैसे सन्नाटा गहराता, मेरी बेचैनी बढ़ने लगती। जब पक्का यकीन हो जाता कि घर के सभी लोग गहरी नींद में हैं, तो मेरा मन बेकाबू होने लगता। कभी-कभी उनकी ही याद में अचानक नींद खुल जाती। फिर मैं दबे पाँव बिस्तर से उठता। अपने श्वासों पर नियंत्रण रखते हुए और उस पुरानी लकड़ी की फर्श पर ज़रा भी आहट न हो, इसकी चरम सावधानी बरतते हुए मैं किसी चोर की तरह उनकी कोठरी के दरवाज़े तक पहुँच जाता। उस वक्त मेरे सीने की धड़कन मुझे खुद इतनी साफ़ सुनाई देती कि डर लगता कहीं उसकी आवाज़ से ही कोई जाग न जाए।
दरवाज़े के नीचे बनी दरार से अंदर का थोड़ा सा नज़ारा मिल जाता था। कमरे में मद्धम लाल रंग का 'ज़ीरो' वाट का बल्ब जलता रहता था। उस रहस्यमयी और धुंधली रोशनी में, मैं अपनी आँखों को पूरी ताकत से सिकोड़कर उन्हें देखने की कोशिश करता। कभी-कभी उस लाल आभा में नहाया हुआ उनका शांत और मोहक चेहरा नज़र आता। नींद में थोड़े खुले हुए उनके होंठ, उनकी सांसों की लय के साथ उठती-गिरती उनकी छाती... कभी-कभी नींद के आगोश में उनकी साड़ी के बंधन ढीले हो जाते और उनके केले के खंभे जैसे सुडौल और गोरे पैरों की झलक मिल जाती। उनके चेहरे पर गिरती बालों की लट और उस अस्त-व्यस्त साड़ी को देखकर मेरा दिल जैसे डूबने लगता और साँसें थम सी जातीं।
लेकिन कितनी भी देर वहाँ रुककर आँखें थकाने के बावजूद, उनकी देह का पूर्ण दर्शन असंभव ही रहता। वे अक्सर चादर ओढ़कर सोती थीं या फिर दरवाज़े का कोना मेरे और उनके बीच दीवार बन जाता। अंततः, एक अतृप्त प्यास और निराशा के साथ मैं पीछे मुड़ता। अपने बिस्तर पर लौटकर सोने की कोशिश करता, पर बंद आँखों के पीछे वही आधे-अधूरे दृश्य नाचते रहते। मन में सवालों और वासनाओं का बवंडर उठता। मुझे पता था कि यह गलत है, यह पाप है, पर उस बेकाबू खिंचाव पर लगाम कसना मेरे बस में नहीं था। वे रातें पहले से कहीं ज़्यादा गहरी और लंबी लगने लगी थीं।​
 

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एपिसोड 5: द्वंद्व और वर्जित स्पर्श
गाँव की उन छुट्टियों के दिनों को अब मुड़कर देखता हूँ, तो वे नियति का एक अजीब ताना-बाना लगते हैं। मई की वह झुलसा देने वाली उमस, आसमान में कभी-कभी दिखने वाले 'वलवा' (मानसून पूर्व) के आवारा काले बादल और बारिश की आहट पाकर पसरी प्रकृति की वह रहस्यमयी शांति।
उस साल घर में सब जुटे हुए थे। चचेरे भाई, उनकी पत्नी और उनके दो छोटे बच्चे—एक छोटी बेटी और एक गोल-मटोल बड़ा बेटा। उनकी बेटी, 'परी', उम्र में सबसे छोटी थी—महज़ दो साल की। उसके हँसमुख, गुलाबी गाल और आँखों की वह चंचलता सबको मोह लेती थी। वह जब किसी की गोद में बैठती, तो उसकी नाज़ुक हरकतें और उसकी वह खिलखिलाहट घर भर की ममता बटोर लेती थी।
माई हमेशा की तरह अपनी सादी सूती साड़ी और करीने से बँधे जूड़े में नज़र आतीं। चेहरा हँसमुख था, पर उनकी आँखों में हमेशा एक हल्की सी गंभीरता और एक अनकही उदासी छिपी रहती थी।
आँगन में वलवा की बारिश की बूंदें बस गिरने ही वाली थीं। बाहर सुखाने के लिए रखा गया सामान और अनाज अंदर समेटना ज़रूरी था। माई ने परी को अपनी गोद में ले रखा था और वह माई के कंधे पर सिर टिकाए ऊँघ रही थी। उसकी नींद खराब न हो, इसलिए माई उसे नीचे नहीं उतार रही थीं।
मैंने माई से कहा, "माई, तुम बाहर का सामान समेट लो, मैं बच्ची को ले लेता हूँ," और ऐसा कहते हुए मैं परी को थामने के लिए उनकी ओर बढ़ा। न जाने उस पल मुझ पर क्या सवार हुआ। बच्ची को अपनी गोद में लेते समय मैंने 'अनजाने' में उनके वक्षों को छू लिया। उन्हें वह महसूस हुआ या नहीं, यह तो मैं नहीं जानता, पर उस स्पर्श ने मेरे पूरे बदन में एक सिहरन पैदा कर दी।
वे चौंक गईं। उनके चेहरे का भाव पल भर में बदला, पर उन्होंने कुछ कहा नहीं। उनके गालों पर एक हल्की लालिमा उभर आई और वे तुरंत बाहर की ओर मुड़ गईं। मेरा हृदय इतनी तेज़ी से धड़क रहा था कि उसकी आवाज़ मेरे कानों में गूँजने लगी थी। वह स्पर्श... मानों बिजली का कोई तेज़ झटका हो। लेकिन उस झटके में एक अजीब सा माधुर्य था, एक वर्जित तृप्ति थी।
उनके प्रति मेरी वह सुप्त आसक्ति फिर से जाग उठी थी। मेरा मन बार-बार उसी तरह उन्हें छूने को आतुर होने लगा। मैंने अपनी इस इच्छा को दबाने की बहुत कोशिश की, लेकिन इतने सालों से भीतर जमा हुआ वह वेग मुझे शांत नहीं बैठने दे रहा था।
उसके बाद के दिन मेरे लिए एक युद्ध की तरह थे। हर सुबह उठकर मैं खुद से यह कसम खाता, "आज उनके करीब नहीं जाऊँगा।" लेकिन माई की खिलखिलाहट, उनकी साड़ी की वह सरसराहट और उनकी मौजूदगी मेरे हर संकल्प को मिट्टी में मिला देती थी।
एक रात हम सब बैठे बातें कर रहे थे। माई चाय बनाने के लिए उठीं, तो मैं भी उनके पीछे-पीछे रसोई में चला गया। "मुझे पानी पीना है," कहते हुए मैंने जानबूझकर अपना हाथ उनकी कमर पर रख दिया। वे बुरी तरह काँप उठीं। उन्होंने मेरी ओर देखा—उनकी आँखों में सवाल था, थोड़ा सा डर था और एक अनजानी सी परछाईं थी।
मैंने बच्ची को गोद में लेने के बहाने दो-तीन बार फिर उनके शरीर और उनके वक्षों को छुआ। उन्हें यह व्यवहार बेहद अजीब और संदेहास्पद लगा होगा, पर उन्होंने कुछ कहा नहीं। लेकिन मुझे बोलने के बजाय उन्होंने चुपचाप उस चीज़ को भाँप लिया और सावधानी बरतनी शुरू कर दी ताकि मैं दोबारा ऐसा न कर सकूँ। उन्होंने बहुत ही कुशलता से मुझे उस 'आनंद' से वंचित कर दिया।​
 
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Iron Man

Try and fail. But never give up trying
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Nice Start
 

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एपिसोड 6: नीली रोशनी और गहरी खामोशी

उन गर्मियों की छुट्टियों में गाँव का वह पुश्तैनी घर अपनों से गुलज़ार था। दिन भर बच्चों का शोर-शराबा और बड़ों की अनवरत चर्चाओं से पूरा 'वाडा' गूँजता रहता, लेकिन रात होते ही वहाँ एक अजब सी शांति पसर जाती थी। घर की गहमागहमी जब खत्म होती, तो अंदर के कमरों में मेरा चचेरा भाई, भाभी और उनके बच्चे गहरी नींद में खो जाते। वह बाहरी बड़ा हॉल (दालान) सिर्फ हम दोनों के लिए बचता—मेरे और माई के लिए। वह हॉल दोनों घरों को जोड़ने वाली एक साझी कड़ी था, इसलिए वहाँ एक अपनी सी गर्माहट महसूस होती थी। सीढ़ियों के पास वाले कोने में माई का बिस्तर नियत रहता और हॉल के दूसरे छोर पर, मेरे कोने में मेरी सतरंजी (चटाई) बिछी होती थी।
टेलीविज़न उन्हीं की तरफ, सीढ़ियों के नीचे एक पुरानी लकड़ी की अलमारी में रखा था। दिन भर उस पर बच्चों के कार्टूनों का कब्ज़ा रहता, लेकिन देर रात वह मेरा अकेला साथी बन जाता। मेरे पसंदीदा कार्यक्रम रात साढे़ दस या ग्यारह बजे के करीब शुरू होते। उन्हें खत्म कर, जब आँखों पर नींद का बोझ बढ़ने लगता, तब मैं धीरे से उठकर अपने बिस्तर की ओर मुड़ता। अक्सर उस वक्त माई टीवी के सामने ही अपने बिस्तर पर अधलेटी नज़र आतीं। कभी आँखें मूँदे शांत सोई हुई, तो कभी टीवी पर बदलते दृश्यों को शून्य नज़रों से निहारती हुईं। मैं न चाहते हुए भी उनकी ओर देखता रह जाता। उस आधी नींद में भी उनका ध्यान टीवी की ओर रहता था, मानो कहानी के सूत्र उन्हें जागते रहने पर मजबूर कर रहे हों।
ऐसी ही एक रात, जब टीवी का कार्यक्रम अपने चरम पर था, मेरा ध्यान उनकी शांत सोई हुई देह की ओर गया। एक क्षण बाद, उनके नथुनों से खर्राटों की एक मद्धम और लयबद्ध आवाज़ आने लगी। हमेशा की तरह, टीवी देखते-देखते वे कब नींद की आगोश में चली गईं, उन्हें पता ही नहीं चला। उनकी वह चिर-परिचित आवाज़ सुनकर मेरे चेहरे पर एक मुस्कान तैर गई। मैंने धीरे से रिमोट उठाकर आवाज़ और कम कर दी, इतनी कि बस मुझे सुनाई दे। मकसद सिर्फ इतना था कि घर की शांति भंग न हो और उनकी नींद में कोई खलल न पड़े।
जैसे ही आवाज़ कम हुई, हॉल की खामोशी और गहरी हो गई। मैं दोबारा उन्हें गौर से निहारने लगा। उन्होंने खुद पर एक पतली सी चादर ओढ़ रखी थी। सोते समय उन्होंने उसे गले तक ढँका होगा, पर अब नींद की करवटों की वजह से वह खिसककर छाती तक नीचे आ गई थी। चादर की उस सिलवट से उनके गले और कंधों का कुछ हिस्सा साफ झलक रहा था। टीवी की स्क्रीन से निकलती उस नीली और अस्थिर रोशनी में उनका चेहरा पहले से कहीं अधिक अलग, रहस्यमयी और शांत लग रहा था। दिन के समय उनके चेहरे पर दिखने वाली वह फिक्र, भागदौड़ और थकान का अब वहाँ नामो-निशान तक नहीं था।
वह चेहरा उस वक्त असीम संतोष से भरा था। पलकें मुँदी हुई थीं और भौंहें ढीली पड़ गई थीं। उनके होंठों के कोनों में एक हल्की, अस्पष्ट सी मुस्कान तैर रही थी—शायद सपने में वे किसी से बतिया रही थीं या कोई पुरानी सुखद याद उन्हें सुकून पहुँचा रही थी। त्वचा की झुर्रियां उस रोशनी में और भी स्पष्ट उभर आई थीं—मानो वे उनके जीवन के संघर्षों और अनुभवों के पद-चिह्न हों। माथे का कुमकुम मिट चुका था, पर उसकी एक धुंधली सी लाल लकीर अब भी वहाँ ठहरी हुई थी। उनके काले बाल तकिये पर बेतरतीब बिखरे हुए थे।
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उनकी सांसों की वह धीमी लय और खर्राटों की वह मंद आवाज़... इस सबने वातावरण में एक अजीब सी स्थिरता पैदा कर दी थी। बाहर झींगुरों की आवाज़ गूँज रही थी और अंदर पंखे की घरघराहट। उस सन्नाटे में, टीवी की मद्धम रोशनी में चमकता उनका वह मासूम चेहरा देखते हुए मेरे मन में विचारों का बवंडर उठने लगा। कितना थक जाती होगी यह स्त्री दिन भर? मन में न जाने कितनी यादों और ज़िम्मेदारियों का बोझ ढोती होगी? वक्त की धारा इंसान को कितना बदल देती है, पर कुछ चीज़ें—जैसे उनका यह शांत होकर सोना, उनके खर्राटों की यह आवाज़—ये आज भी वैसी ही थीं। बचपन में भी मैं उन्हें इसी तरह थककर सोते हुए देखा करता था।
उनके चेहरे को देखते-देखते अनजाने में ही मेरे मन में उनके प्रति अपार ममता और श्रद्धा उमड़ आई। एक पल के लिए उनकी उम्र, उनकी निस्वार्थ ममता और उनका वह भोलापन—सब कुछ मेरी आँखों के सामने जीवंत हो उठा। मैं कुछ देर तक स्तब्ध होकर उन्हें देखता रहा। टीवी पर चल रहा कार्यक्रम अब पृष्ठभूमि में कहीं खो गया था। मेरे लिए वह क्षण, वह रात और टीवी की हल्की रोशनी में नहाया हुआ माई का वह शांत चेहरा ही एक अविस्मरणीय अनुभव बन गया था।​
 
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