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Nice update....Update 44
मैं बाथरूम में नहा रहा था और बाहर माँ अपने ही दिल और जज्बातों में घिरी अपनी एक अलग ही दुनिया मैं थी
आगे माँ
हितेश अंदर नहाने चले गए हैं और मैं यहाँ खिड़की के पास खड़ी बाहर की हलचल देख रही हूँ। नीचे सड़क पर लोग अपनी-अपनी धुन में यहाँ-वहाँ जा रहे हैं। किसे खबर थी कि आज इस घर की चारदीवारी के पीछे एक माँ और उसके सगे बेटे की सुहागरात है।
'सुहागरात'... यह शब्द ज़हन में आते ही मेरे अंदर कुछ हलचल होने लागी है।
मुझे याद है जब माँ ने हितेश से शादी की बात छेड़ी थी, तो मेरे पैरों तले ज़मीन निकल गई थी मेरे लिए अपने ही बेटे से शादी को 'हाँ' कहना दुनिया का सबसे मुश्किल काम था। पर एक बात तय थी—हितेश की आँखों में मेरे लिए जो समंदर था, वो सिर्फ प्यार का था। मैंने उन नज़रों में कभी 'वासना' की वो गंदी भूख नहीं देखी। शायद उसके इसी पाक और साफ़ सुथरे इरादों ने मुझे उसका हाथ थामने का हौसला दिया।
मैंने उसे दिल से अपना पति मान लिया है, पर फिर भी... दिल के किसी अंधेरे कोने में एक डर बैठा है। मैं उम्र में उससे बड़ी हूँ, आज तो सब हसीन है, पर कल जब ये फासला चेहरे पर दिखने लगेगा, तब क्या होगा?
क्या मैं उसका साथ निभा पाऊँगी? मेरी पहली शादी बहुत कम उम्र में हो गई थी, इसलिए तकनीकी तौर पर फासला ज़्यादा नहीं है, फिर भी ये सामाजिक डर पीछा नहीं छोड़ता।
पर फिर खुद को समझाती हूँ कि हमारा रिश्ता प्रेम के धागों से बुना गया है, कोई कागज़ी सौदा नहीं। फिर ये उथल-पुथल कैसी?
और हितेश... उफ़! कितने शरारती हो गए हैं वो। कैसी बहकी-बहकी बातें और हरकतें करने लगे हैं। वो 'किस' (Kiss)... उसकी तपिश अभी भी मेरी साँसों में शहद की तरह घुली हुई है। अगर मम्मी का फोन नहीं आता, तो न जाने हम कितनी देर तक उसमें खोए रहते। छी! छी! मैं भी क्या-क्या सोचने लगी हूँ।
अब मुझे खुद को पूरी तरह बदलना होगा। एक माँ के रोल से बाहर निकलकर 'पत्नी' का रूप लेना होगा। पर क्या उस माँ को मार पाऊँगी मैं? क्या उस ममता का गला घोंटकर सिर्फ़ एक पतिव्रता बीवी बन पाऊँगी? कुछ समझ नहीं आता। शायद सब कुछ वक्त पर छोड़ देना ही बेहतर है। वक्त ने ही तो हमें यहाँ तक पहुँचाया है, वही रास्ता भी दिखाएगा।
वो कितना तड़प रहे हैं मुझे छूने के लिए... और मैं? क्या मैं भी वही चाह रही हूँ? सच तो ये है कि 'हाँ'। इतने बरसों के बाद... कोई मुझे एक 'औरत' समझकर प्यार करेगा। और वो कोई गैर नहीं, मेरा अपना ही बेटा, मेरा हितेश है जो अब मेरा पति बन चुका है।
मम्मी भी तो वो इशारे कर रही थी... कि अब जल्दी माँ बन जाऊँ। मैं जानती हूँ उनके मन में क्या है। बढ़ती उम्र के साथ माँ बनने की राह मुश्किल होती जाती है। क्या सब कुछ ठीक होगा? हे ईश्वर, ये क्या-क्या सोच रही हूँ मैं!
अभी तो हमें... उफ़! कैसे कर पाऊँगी मैं वो सब? जब वो मुझे... नहीं, कितनी शर्म आ रही है सोचकर भी। दिल इस कदर ज़ोरों से धड़क रहा है जैसे सीने से बाहर निकल जाएगा।
पर न जाने क्यों, इस बेचैनी के बीच एक नई सी उमंग, एक नई लहर जाग रही है। आज मैं फिर से सुहागन बन गई हूँ। फिर से सुहागन! शायद ही दुनिया में कोई ऐसी औरत होगी, जो अपने ही सगे बेटे की सुहागन बनती होगी। लेकिन अब इन बातों को सोचने का क्या हासिल? अब तो मैं उनकी हो चुकी हूँ। वो तमाम प्यारे रंग जो मेरी ज़िंदगी के दामन से छूट गए थे, हितेश उन्हें फिर से वापस ले आए है। हितेश... मेरा बेटा, मेरे पति, मेरे सब कुछ!
पर क्या मैं आज की रात उनका साथ दे पाऊँगी? न जाने कितने हसीन सपने सजाए होंगे उन्होंने, कितने अरमान होंगे उनके दिल में—क्या मैं उन उम्मीदों पर खरी उतर पाऊँगी? क्या वो समझ पाएंगे मेरे दिल की उलझन? एक अड़चन कहीं न कहीं अब भी दिल में खटकती है।
पर छोड़ो... देखते हैं क्या होगा। मुझे यकीन है कि वो मेरी ख़ामोशी को भी पढ़ लेंगे। वो मुझे पूरा वक्त देंगे अपने इस नए रूप में ढलने के लिए। सच तो ये है कि मेरा दिल भी बेकरार है उनकी बाहों में समा जाने के लिए, पर एक अनजाना सा ख़ौफ़ भी है।
कल तक मैं मम्मी-पापा की पनाह में थी, और आज मुझे मेरा अपना घर मिल गया। मेरा घर... मेरे हितेश का घर... 'हमारा' घर। अब यही मेरा नया संसार है। इस वक्त जो सुखद अहसास मुझे हो रहा है, उसे लफ़्ज़ों में बयान करना मुमकिन नहीं। मम्मी पापा से दूर होने का मलाल ज़रूर है, पर आज मुझे ये भी महसूस हो रहा है कि मैं फिर से 'पूरी' हो जाऊँगी।
वो सुख, जो मुझे हितेश के पापा ने दिया था, जिसे मैं अरसों पहले भूल चुकी थी... वो ख़ुशी, जो हर नारी की तमन्ना होती है और उसे मुकम्मल होने का अहसास दिलाती है—वो सुख अब मुझे मेरा हितेश देगा। कितना 'Handsome' है वो, बिल्कुल किसी हीरो की तरह।
ऐसा लगता है जैसे ऊपर वाला खुद हितेश के रूप में मेरे लिए आ गया हो। अब मैं फिर से ख़्वाबों की वादियों में उड़ूँगी, मेरी कामनाओं को फिर से पंख मिल जाएँगे। मेरी बेरंग ज़िंदगी में फिर से बहार आएगी। अब कोई है जो मुझे थाम लेगा, मुझे एक नई दिशा देगा, अपनी बेपनाह मोहब्बत से मुझे सराबोर कर देगा। मेरा हितेश मुझे फिर से मुकम्मल कर देगा।
न जाने क्यों, मेरे लबों पर अचानक ये गीत थिरकने लगा है...
“ओ बेख़बर, ओ बेकदर... बेताबियाँ, बेचैनियाँ हैं जवान, मेरी नज़र ढूँढे तुझे, तू कहाँ... आ तुझको मैं आँखों का काजल बना लूँ... ओ बेख़बर!”
मैं कहीं खो गई हूँ। अब मुझे सड़क पर चलने वाले लोग नहीं दिख रहे। ये गीत, ये धुन मुझे मेरे हितेश के और करीब ले जा रही है। खुद पर से मेरा काबू खत्म होता जा रहा है। मैं बस उनका इंतज़ार कर रही हूँ...
उफ़! कितना वक्त लगाते हैं ये नहाने में!
आगे मैं
मेरे कानों में माँ की पायल की वो खनक गूँजना बंद हो गई और मैं अचानक अपनी यादों के भँवर से बाहर निकल आया। शावर बंद कर जब मैं बाथरूम से बाहर आया, तो देखा माँ अभी भी खिड़की के पास खड़ी बाहर की तरफ देख रही थी—शायद अपनी ही किसी दुनिया में खोई हुई।
अब मुझसे और इंतज़ार नहीं हो रहा था। हमारे बीच का ये कुछ कदमों का फासला मुझे सदियों जैसा लग रहा था। मैं दबे पाँव उनके करीब बढ़ता गया... और करीब... इतना कि मेरा मेरा जिस्म उनसे से जा सटा, जी हाँ मैं अपनि ही माँ के जिस्म से सटा था।
जैसे ही मेरे जिस्म की गर्मी ने उन्हे छुआ, मैंने महसूस किया कि माँ के मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकल गई। उनके पूरे बदन में एक सिहरन (vibration) दौड़ गई। मुझे यकीन था कि उन्होने अपनी आँखें मूँद ली होंगी। उस पल हम जिस परमानन्द 'Ecstasy' से गुज़र रहे थे, उसे सिर्फ़ हम दोनों ही समझ सकते थे। हमारी धड़कनें इतनी तेज़ थीं, मानो दो दिल आपस में कोई गहरि बात कर रहे हों।
मेरा लण्ड उस वक्त इतना सख्त 'Hard' और फुला हुआ 'Tense' हो गया था कि उसमें हल्का सा दर्द होने लगा था। माँ को मेरे लौड़े की उस बेताबी का पूरा अहसास हो रहा होगा।
मैंने धीरे से अपने हाथ उनके कंधों पर रखे। उनकी मुलायम स्किन के नीचे मचती उस हलचल को मैं साफ महसूस कर पा रहा था। मैंने धीरे-धीरे अपने हाथ नीचे सरकाते हुए उनकी बाँहों को छुआ।
माँ की दोनों मुट्ठियाँ कसी हुई थीं, जैसे वो अपनी घबराहट को रोकने की कोशिश कर रही हो। लेकिन जैसे ही मेरी उँगलियों ने उनकी हथेलियों को छुआ, उनकी मुट्ठियाँ खुल गईं। मैंने अपनी उँगलियाँ उनकी उँगलियों में फँसा दीं। हम दोनों के हाथ फिर से एक साथ मुट्ठियों में बंद हो गए। यह सिर्फ़ हाथों का मिलना नहीं था, ये हमारे प्रेम का वो वादा था जिसने हमें एक-दूसरे को पूरा करने की मंज़िल पर खड़ा कर दिया था।
माँ के बालों की वो भीनी-भीनी खुशबू 'Fragrance' मेरी साँसों में उतरने लगी। मैं अपना चेहरा उनके भीगे बालों में फेरने लगा।
मुझे महसूस हुआ कि वो थोड़ा और पीछे की तरफ झुकी और पूरी तरह मुझ से सट गई। उनके बालों की खुशबू पीते हुए मैं धीरे से उनकी गर्दन तक पहुँचा। अब माँ की साँसें तेज़ हो चुकी थीं, और मेरी हालत भी उससे अलग नहीं थी।
मैंने उनकी गर्दन के उस कोमल हिस्से को चूम लिया। उस गहरे अहसास के बीच मेरे लबों से खुद-ब-खुद निकल पड़ा— "I LOVE YOU..."
शायद बहुत ही हल्की आवाज़ में, माँ ने भी फुसफुसाते हुए कहा— "I LOVE YOU TOO.."
मेरे तड़पते हुए कानों ने उन अल्फ़ाज़ों को पकड़ लिया। आज मुझे वो अधिकार 'Legal Right' मिल गया था अपनी माँ को छूने का, उन्हे टूटकर प्यार करने का और उन्हे फिर से मुकम्मल करने का।
बहुत ही खुबसुरत शानदार लाजवाब और अद्भुत मनमोहक अपडेट हैं भाई मजा आ गयाUpdate 44
मैं बाथरूम में नहा रहा था और बाहर माँ अपने ही दिल और जज्बातों में घिरी अपनी एक अलग ही दुनिया मैं थी
आगे माँ
हितेश अंदर नहाने चले गए हैं और मैं यहाँ खिड़की के पास खड़ी बाहर की हलचल देख रही हूँ। नीचे सड़क पर लोग अपनी-अपनी धुन में यहाँ-वहाँ जा रहे हैं। किसे खबर थी कि आज इस घर की चारदीवारी के पीछे एक माँ और उसके सगे बेटे की सुहागरात है।
'सुहागरात'... यह शब्द ज़हन में आते ही मेरे अंदर कुछ हलचल होने लागी है।
मुझे याद है जब माँ ने हितेश से शादी की बात छेड़ी थी, तो मेरे पैरों तले ज़मीन निकल गई थी मेरे लिए अपने ही बेटे से शादी को 'हाँ' कहना दुनिया का सबसे मुश्किल काम था। पर एक बात तय थी—हितेश की आँखों में मेरे लिए जो समंदर था, वो सिर्फ प्यार का था। मैंने उन नज़रों में कभी 'वासना' की वो गंदी भूख नहीं देखी। शायद उसके इसी पाक और साफ़ सुथरे इरादों ने मुझे उसका हाथ थामने का हौसला दिया।
मैंने उसे दिल से अपना पति मान लिया है, पर फिर भी... दिल के किसी अंधेरे कोने में एक डर बैठा है। मैं उम्र में उससे बड़ी हूँ, आज तो सब हसीन है, पर कल जब ये फासला चेहरे पर दिखने लगेगा, तब क्या होगा?
क्या मैं उसका साथ निभा पाऊँगी? मेरी पहली शादी बहुत कम उम्र में हो गई थी, इसलिए तकनीकी तौर पर फासला ज़्यादा नहीं है, फिर भी ये सामाजिक डर पीछा नहीं छोड़ता।
पर फिर खुद को समझाती हूँ कि हमारा रिश्ता प्रेम के धागों से बुना गया है, कोई कागज़ी सौदा नहीं। फिर ये उथल-पुथल कैसी?
और हितेश... उफ़! कितने शरारती हो गए हैं वो। कैसी बहकी-बहकी बातें और हरकतें करने लगे हैं। वो 'किस' (Kiss)... उसकी तपिश अभी भी मेरी साँसों में शहद की तरह घुली हुई है। अगर मम्मी का फोन नहीं आता, तो न जाने हम कितनी देर तक उसमें खोए रहते। छी! छी! मैं भी क्या-क्या सोचने लगी हूँ।
अब मुझे खुद को पूरी तरह बदलना होगा। एक माँ के रोल से बाहर निकलकर 'पत्नी' का रूप लेना होगा। पर क्या उस माँ को मार पाऊँगी मैं? क्या उस ममता का गला घोंटकर सिर्फ़ एक पतिव्रता बीवी बन पाऊँगी? कुछ समझ नहीं आता। शायद सब कुछ वक्त पर छोड़ देना ही बेहतर है। वक्त ने ही तो हमें यहाँ तक पहुँचाया है, वही रास्ता भी दिखाएगा।
वो कितना तड़प रहे हैं मुझे छूने के लिए... और मैं? क्या मैं भी वही चाह रही हूँ? सच तो ये है कि 'हाँ'। इतने बरसों के बाद... कोई मुझे एक 'औरत' समझकर प्यार करेगा। और वो कोई गैर नहीं, मेरा अपना ही बेटा, मेरा हितेश है जो अब मेरा पति बन चुका है।
मम्मी भी तो वो इशारे कर रही थी... कि अब जल्दी माँ बन जाऊँ। मैं जानती हूँ उनके मन में क्या है। बढ़ती उम्र के साथ माँ बनने की राह मुश्किल होती जाती है। क्या सब कुछ ठीक होगा? हे ईश्वर, ये क्या-क्या सोच रही हूँ मैं!
अभी तो हमें... उफ़! कैसे कर पाऊँगी मैं वो सब? जब वो मुझे... नहीं, कितनी शर्म आ रही है सोचकर भी। दिल इस कदर ज़ोरों से धड़क रहा है जैसे सीने से बाहर निकल जाएगा।
पर न जाने क्यों, इस बेचैनी के बीच एक नई सी उमंग, एक नई लहर जाग रही है। आज मैं फिर से सुहागन बन गई हूँ। फिर से सुहागन! शायद ही दुनिया में कोई ऐसी औरत होगी, जो अपने ही सगे बेटे की सुहागन बनती होगी। लेकिन अब इन बातों को सोचने का क्या हासिल? अब तो मैं उनकी हो चुकी हूँ। वो तमाम प्यारे रंग जो मेरी ज़िंदगी के दामन से छूट गए थे, हितेश उन्हें फिर से वापस ले आए है। हितेश... मेरा बेटा, मेरे पति, मेरे सब कुछ!
पर क्या मैं आज की रात उनका साथ दे पाऊँगी? न जाने कितने हसीन सपने सजाए होंगे उन्होंने, कितने अरमान होंगे उनके दिल में—क्या मैं उन उम्मीदों पर खरी उतर पाऊँगी? क्या वो समझ पाएंगे मेरे दिल की उलझन? एक अड़चन कहीं न कहीं अब भी दिल में खटकती है।
पर छोड़ो... देखते हैं क्या होगा। मुझे यकीन है कि वो मेरी ख़ामोशी को भी पढ़ लेंगे। वो मुझे पूरा वक्त देंगे अपने इस नए रूप में ढलने के लिए। सच तो ये है कि मेरा दिल भी बेकरार है उनकी बाहों में समा जाने के लिए, पर एक अनजाना सा ख़ौफ़ भी है।
कल तक मैं मम्मी-पापा की पनाह में थी, और आज मुझे मेरा अपना घर मिल गया। मेरा घर... मेरे हितेश का घर... 'हमारा' घर। अब यही मेरा नया संसार है। इस वक्त जो सुखद अहसास मुझे हो रहा है, उसे लफ़्ज़ों में बयान करना मुमकिन नहीं। मम्मी पापा से दूर होने का मलाल ज़रूर है, पर आज मुझे ये भी महसूस हो रहा है कि मैं फिर से 'पूरी' हो जाऊँगी।
वो सुख, जो मुझे हितेश के पापा ने दिया था, जिसे मैं अरसों पहले भूल चुकी थी... वो ख़ुशी, जो हर नारी की तमन्ना होती है और उसे मुकम्मल होने का अहसास दिलाती है—वो सुख अब मुझे मेरा हितेश देगा। कितना 'Handsome' है वो, बिल्कुल किसी हीरो की तरह।
ऐसा लगता है जैसे ऊपर वाला खुद हितेश के रूप में मेरे लिए आ गया हो। अब मैं फिर से ख़्वाबों की वादियों में उड़ूँगी, मेरी कामनाओं को फिर से पंख मिल जाएँगे। मेरी बेरंग ज़िंदगी में फिर से बहार आएगी। अब कोई है जो मुझे थाम लेगा, मुझे एक नई दिशा देगा, अपनी बेपनाह मोहब्बत से मुझे सराबोर कर देगा। मेरा हितेश मुझे फिर से मुकम्मल कर देगा।
न जाने क्यों, मेरे लबों पर अचानक ये गीत थिरकने लगा है...
“ओ बेख़बर, ओ बेकदर... बेताबियाँ, बेचैनियाँ हैं जवान, मेरी नज़र ढूँढे तुझे, तू कहाँ... आ तुझको मैं आँखों का काजल बना लूँ... ओ बेख़बर!”
मैं कहीं खो गई हूँ। अब मुझे सड़क पर चलने वाले लोग नहीं दिख रहे। ये गीत, ये धुन मुझे मेरे हितेश के और करीब ले जा रही है। खुद पर से मेरा काबू खत्म होता जा रहा है। मैं बस उनका इंतज़ार कर रही हूँ...
उफ़! कितना वक्त लगाते हैं ये नहाने में!
आगे मैं
मेरे कानों में माँ की पायल की वो खनक गूँजना बंद हो गई और मैं अचानक अपनी यादों के भँवर से बाहर निकल आया। शावर बंद कर जब मैं बाथरूम से बाहर आया, तो देखा माँ अभी भी खिड़की के पास खड़ी बाहर की तरफ देख रही थी—शायद अपनी ही किसी दुनिया में खोई हुई।
अब मुझसे और इंतज़ार नहीं हो रहा था। हमारे बीच का ये कुछ कदमों का फासला मुझे सदियों जैसा लग रहा था। मैं दबे पाँव उनके करीब बढ़ता गया... और करीब... इतना कि मेरा मेरा जिस्म उनसे से जा सटा, जी हाँ मैं अपनि ही माँ के जिस्म से सटा था।
जैसे ही मेरे जिस्म की गर्मी ने उन्हे छुआ, मैंने महसूस किया कि माँ के मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकल गई। उनके पूरे बदन में एक सिहरन (vibration) दौड़ गई। मुझे यकीन था कि उन्होने अपनी आँखें मूँद ली होंगी। उस पल हम जिस परमानन्द 'Ecstasy' से गुज़र रहे थे, उसे सिर्फ़ हम दोनों ही समझ सकते थे। हमारी धड़कनें इतनी तेज़ थीं, मानो दो दिल आपस में कोई गहरि बात कर रहे हों।
मेरा लण्ड उस वक्त इतना सख्त 'Hard' और फुला हुआ 'Tense' हो गया था कि उसमें हल्का सा दर्द होने लगा था। माँ को मेरे लौड़े की उस बेताबी का पूरा अहसास हो रहा होगा।
मैंने धीरे से अपने हाथ उनके कंधों पर रखे। उनकी मुलायम स्किन के नीचे मचती उस हलचल को मैं साफ महसूस कर पा रहा था। मैंने धीरे-धीरे अपने हाथ नीचे सरकाते हुए उनकी बाँहों को छुआ।
माँ की दोनों मुट्ठियाँ कसी हुई थीं, जैसे वो अपनी घबराहट को रोकने की कोशिश कर रही हो। लेकिन जैसे ही मेरी उँगलियों ने उनकी हथेलियों को छुआ, उनकी मुट्ठियाँ खुल गईं। मैंने अपनी उँगलियाँ उनकी उँगलियों में फँसा दीं। हम दोनों के हाथ फिर से एक साथ मुट्ठियों में बंद हो गए। यह सिर्फ़ हाथों का मिलना नहीं था, ये हमारे प्रेम का वो वादा था जिसने हमें एक-दूसरे को पूरा करने की मंज़िल पर खड़ा कर दिया था।
माँ के बालों की वो भीनी-भीनी खुशबू 'Fragrance' मेरी साँसों में उतरने लगी। मैं अपना चेहरा उनके भीगे बालों में फेरने लगा।
मुझे महसूस हुआ कि वो थोड़ा और पीछे की तरफ झुकी और पूरी तरह मुझ से सट गई। उनके बालों की खुशबू पीते हुए मैं धीरे से उनकी गर्दन तक पहुँचा। अब माँ की साँसें तेज़ हो चुकी थीं, और मेरी हालत भी उससे अलग नहीं थी।
मैंने उनकी गर्दन के उस कोमल हिस्से को चूम लिया। उस गहरे अहसास के बीच मेरे लबों से खुद-ब-खुद निकल पड़ा— "I LOVE YOU..."
शायद बहुत ही हल्की आवाज़ में, माँ ने भी फुसफुसाते हुए कहा— "I LOVE YOU TOO.."
मेरे तड़पते हुए कानों ने उन अल्फ़ाज़ों को पकड़ लिया। आज मुझे वो अधिकार 'Legal Right' मिल गया था अपनी माँ को छूने का, उन्हे टूटकर प्यार करने का और उन्हे फिर से मुकम्मल करने का।
Thanks AlotVery nicely modified, awesome writing skills![]()
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Thanks broRomanchak. Pratiksha agle rasprad update ki

Thank bhaiUpdate bhai ji.....adbhut lekhni h aapki
