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बुरियापुर उस जिले का सबसे छोटा गाँव था। छोटा होने के बावजूद यह गाँव अपनी हरियाली के लिए दूर-दूर तक जाना जाता था। चारों तरफ पेड़-पौधों की भरमार थी। ऐसा लगता था मानो प्रकृति ने हरियाली की चादर बिछाकर उसके बीच इस छोटे-से गाँव को बसा दिया हो।
गाँव के बाहर सिर्फ एक छोटा-सा चौक था, जहाँ सब्ज़ियाँ और रोज़मर्रा की कुछ छोटी-मोटी चीज़ें मिल जाया करती थीं। लेकिन अगर किसी को कोई बड़ा सामान खरीदना हो, तो शहर ही जाना पड़ता था। शहर बुरीयापुर से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर था।
इसी बुरियापुर गाँव के एक कोने में शंभू का छोटा-सा घर बना हुआ था। शंभू अपनी दो शादीशुदा बेटियों के साथ उसी घर में रहता था।
शंभू रोज़ गाँव में सबसे पहले उठने वालों में से था।
हर रोज कि तरह ही सुबह के ठीक पाँच बजे उसकी आँख खुल गई। आसमान में अभी हल्की-सी लालिमा दिखाई देने लगी थी। गाँव के ज्यादातर लोग अभी गहरी नींद में थे। कहीं-कहीं मुर्गे के बाँग देने की आवाज़ सुनाई दे रही थी और पेड़ों पर बैठे पक्षी भी धीरे-धीरे चहचहाने लगे थे।
शंभू चारपाई पर लेटे-लेटे अंगड़ाई लेने लगा। जैसे ही उसकी नजर नीचे गई, उसने देखा कि उसकी धोती के अंदर उसका मोटा और लंबा लंड सीधा खड़ा था। शंभू का लंड हर सुबह उठने के समय ऐसे ही तना रहता था। वह अपने हाथ से उसे धीरे-धीरे मसलने लगा। करीब पाँच मिनट तक वह अपने लंड को सहलाता रहा और अपनी जवानी के दिनों को याद करता रहा जब सविता उसके साथ होती थी। फिर बेबसी से उसने सांस छोड़ी, चारपाई से उठा और आँगन में आकर सबसे पहले एक नीम की दातून तोड़ी।
दातून मुँह में दबाए वह घर से बाहर निकल गया।
उस समय गाँव में घर के अंदर शौचालय जैसी सुविधा बहुत कम घरों में हुआ करती थी। इसलिए शंभू रोज़ की तरह दातून करते हुए गाँव से थोड़ी दूर अपने खेतों की तरफ शौच के लिए निकल पड़ा। सुबह की ठंडी हवा चल रही थी। चारों तरफ खेतों में ओस की बूँदें चमक रही थीं। शंभू धीरे-धीरे खेतों की पगडंडी पर आगे बढ़ता गया।
शौच से निवृत्त होने के बाद उसने खेत के किनारे हाथ-मुँह धोया, दातून से अच्छी तरह दाँत साफ किए और फिर वापस अपने घर की तरफ चल पड़ा।
घर पहुँचते ही उसकी नज़र सबसे पहले गोहाल की तरफ गई। गाय और भैंसें रातभर वहीं बँधी हुई थीं। शंभू ने गोहाल का दरवाज़ा खोला और एक-एक करके गाय-भैंसों को बाहर निकालने लगा। कोई गाय रस्सी खींच रही थी तो कोई भैंस सुस्ती से वहीं खड़ी थी। शंभू ने सबको आँगन के पास बाँधा और उनके लिए चारा-पानी का इंतज़ाम करने लगा।
आज उसे शहर भी जाना था। खेतों में डालने के लिए खाद खरीदनी थी और शहर करीब पंद्रह किलोमीटर दूर था। इसलिए शंभू ने तय किया था कि सुबह का काम जल्दी निपटाकर वह बैलगाड़ी लेकर शहर निकल जाएगा।
गाय-भैंसों का काम निपटाने के बाद शंभू अब अपनी बैलगाड़ी तैयार करने में लग गया। उसने बैलों को बाहर निकाला, उनके शरीर पर हाथ फेरकर देखा और फिर बैलगाड़ी के पहिए, रस्सियाँ और जुआ अच्छी तरह जाँचने लगा।
सुबह की पहली किरण अब गाँव की कच्ची गलियों पर पड़ने लगी थी। धीरे-धीरे बुरियापुर जाग रहा था...
रोज़ सुबह जब शंभू गोहाल का दरवाज़ा खोलकर गाय-भैंसों को बाहर निकालता, तो उनकी रंभाती आवाज़ें घर के अंदर तक गूँज जातीं।
उसी आवाज़ से कमरे में सो रही सुनीता की आँख खुल गई।
कमरे में सुनीता और कुसुम दोनों सोती थीं। कुसुम की नींद बहुत गहरी थी, इसलिए वह अभी भी बेखबर सो रही थी। सुनीता की नींद उससे हल्की थी, इसलिए मवेशियों की आवाज़ सुनते ही उसकी आँख खुल गई।
रात में बिजली न होने के कारण कमरा काफी गर्म हो गया था। सुनीता भी रोज़ की तरह ब्लाउज़ और पेटीकोट में ही सोई थी। गर्मी की वजह से उसके शरीर पर पसीना था और रातभर करवटें बदलने से उसके बाल भी बिखरे हुए थे।
सुनीता ने आँखें मलते हुए कुछ देर कुसुम की तरफ देखा। कुसुम अभी भी गहरी नींद में थी।
सुनीता सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में सोती थी। बिजली न होने की वजह से रातभर कमरा उमस से भरा रहता था । उसके पूरे शरीर पर पसीना चमकता। ब्लाउज शरीर से चिपक जाता।
आँख खुलते ही सुनीता चारपाई पर लेटी-लेटी लंबी अंगड़ाई लेती। उसके बड़े-बड़े 44 के चूचे ब्लाउज के अंदर तनाव से फूले नज़र आते। और हर सुबह उसके निप्पल सख्त होकर खड़े हो जाते। ब्लाउज के ऊपर से ही उनकी नुकीली शक्ल साफ दिखती।
फिर वह धीरे से हाथ नीचे ले जाती। पेटीकोट के अंदर डालकर अपनी बुर को छूती। उसकी बुर हल्की साँवली रंग की थी, लेकिन बहुत खूबसूरत। ऊपर घने और बड़े-बड़े काले झाँटों का जंगल उगा हुआ था। लंबे-लंबे झाँट उसकी मोटी फाँकों के आसपास फैले रहते।
सुनीता का पति रमेश बंबई में रहता था। इसलिए वह अपने झाँट कभी साफ नहीं करती थी। बाहर लोगों के सामने वह बड़ी साफ-सुथरी और संस्कारी औरत बनकर रहती। सबको दिखाने के लिए कि वह कितनी साफ स्त्री है। लेकिन असल में वह बहुत गंदी थी। उसे गंदी चीज़ें बहुत पसंद थीं।
हर सुबह उसकी बुर गीली रहती। झाँटों के बीच से चिपचिपा पानी रिस रहा होता। पूरा दिन उसकी बुर से वह गीला-चिपचिपा पानी रिसता रहता। पैंटी या पेटीकोट अंदर से हमेशा नम रहता।
सुनीता अपनी उँगलियाँ अपनी बदबूदार मुंह मै डाल कर अपनी बदबू वाली थूक से गिला करती और उस उंगली को अपनी बुर के पास ले जाकर अंदर डालती और धीरे-धीरे हिलाने लगती। आँखें बंद करके सिसकियाँ लेने लगती। “हम्म…अह्ह्ह … ह्म्म…” उसकी हल्की-हल्की आवाज़ें कमरे में गूँजतीं। वह हर रोज़ ऐसे ही अपनी बुर में उँगली डालती। सुनिता बहुत कामुक औरत थी। शरीर में हमेशा जलन सी
रहती।
उँगली निकालकर वह अपनी गीली उँगलियों को नाक के पास ले जाती और गहरी साँस लेकर सूँघती। झाँटों और बुर की मिली-जुली गंदी गंध जिसका बदबू खट्टी, तेज़ और चिपचिपी सा लगता है । उसे वह गंध बहुत पसंद थी।
फिर वह बगल की तरफ हाथ ले जाती है । काँख में घने बाल उगे होते, पसीने से गीले होते है । वह उँगलियों से काँख के बालों को छूती, फिर उन्हीं उँगलियों को नाक के पास लाकर सूँघती। पसीने और बालों की तेज़ गंध उसे और उत्तेजित कर देती।
कुसुम अभी भी गहरी नींद में करवटें बदल रही होती। सुनीता चुपचाप उछलकर बैठ जाती, पसीने से भीगे बाल पीछे करती और धीरे से चारपाई से उतर जाती।
बाहर शंभू की आवाज़ आ रही होती है गाय-भैंसों को हाँकते हुए।
सुनीता दरवाज़े के पास जाकर खड़ी हो जाती, अभी भी सिर्फ भीगे ब्लाउज और पेटीकोट मे थी । निप्पल सख्त होती है चूत गीली… और बाप के काम करने की आवाज़ सुनती रहती है ।
सुनिता अपनी सारी को अच्छे से लपेट कर बाहर आ जाती है जहाँ उसका बाप अपनी बैलगाड़ी को त्यार कर रहा था ।
सुनीता ने बाहर आते ही पूछा
सुनिता - पापा जी, आज इतनी सुबह-सुबह क्या कर रहे हो?”
शंभू ने उसकी तरफ देखा और बोला,
शंभू - “आज शहर जाना है बिटिया… खेत के लिए खाद लानी है।”
सुनीता थोड़ी नाराज़ अंदाज़ में बोली,
सुनिता - “मगर रात में बताए क्यों नहीं? बता देते तो कुछ खाने-पीने का सामान बना देती। वैसे भी शहर से आने में पूरा दिन निकल जाएगा।”
शंभू ने हँसते हुए कहा,
शंभू - “कोई बात नहीं बिटिया। मैं शहर में ही कुछ खा-पी लूँगा। तू फिक्र मत कर।”
सुनीता ने आगे बढ़कर कहा,
सुनिता - “पापा जी, मैं जानती हूँ आप कुछ नहीं खाते। देखो कितने पतले हो गए हो… लोग क्या कहेंगे कि दो-दो शादीशुदा जवान बेटियाँ हैं, दोनों अपने बाप का ख्याल नहीं रखतीं?”
शंभू उसकी बात सुनकर चुपचाप उसके पास आ गया। उसकी नज़र अचानक सुनीता की अस्त-व्यस्त साड़ी पर पड़ गई। लाल ब्लाउज इतना कसा हुआ था कि उसके बड़े-बड़े चूचे आधे से ज़्यादा बाहर आने को बेताब लग रहे थे। साड़ी उसने कुछ ऐसे पहनी थी कि कमर का गदराया हुआ हिस्सा और ऊपर का भारी उभार साफ झलक रहा था। शंभू की साँसें तेज़ हो गईं। वह कुछ पल तक बस अपनी बेटी के शरीर को निहारता रहा।
शंभू धीरे-धीरे सुनीता के और करीब आ गया।
जैसे ही वह एक हाथ की दूरी पर पहुँचा, सुनीता के शरीर से उठती पसीने की गंध उसकी नाक में पूरी तरह समा गई। थोड़ी खट्टी, थोड़ी नमकीन, और गर्म… पता नहीं क्यों, अपनी गदराई हुई, भारी-भरकम चूचों वाली बेटी के पसीने की ये गंदगी भरी खुशबू उसे पागल कर रही थी। वह अनजाने में गहरी साँस खींचकर उस गंध को सीने में उतार रहा था।
सुनीता देख रही थी कि बाबूजी कुछ बोल नहीं रहे। बस उसे घूरे जा रहे हैं। उनकी आँखें उसके चेहरे से सरककर गर्दन, फिर सीने पर ठहर गई थीं।
शंभू ने अपना मोटा, खुरदुरा हाथ बढ़ाकर सुनीता के कंधे पर रखा। उंगलियाँ उसके नरम मांस को दबा रही थीं। धीमी, भारी आवाज़ में बोला,
शंभू - “सुनीता… तू ही तो मेरा सबसे ज़्यादा ख्याल रखती है। तू नहीं होती तो ये घर… और मेरा क्या होता…”
सुनीता की आँखें भर आईं। वह भावुक हो गई। उसकी नज़र अपने बाप के गठीले, पसीने से चमकते शरीर पर चली गई। नारंगी बनियान शरीर से चिपककर सीने के बालों को गीला किए हुए थी। पसीने की बूँदें उसकी गर्दन से छाती की तरफ रिस रही थीं।
सुनीता ने अपना पल्लू उठाया और धीरे-धीरे बाबूजी के माथे का पसीना पोंछने लगी। उसी पल शंभू की आँखें पहली बार पूरी तरह उसकी बेटी के चूचों पर जा टिकीं। लाल ब्लाउज इतना कसकर पहना था कि आधे से ज़्यादा उभार बाहर को धकेल रहे थे। इतने बड़े… इतने भारी… इतने गोल… शंभू के मन में ख्याल आया “साली… कितना विशाल चूची है मेरी बेटी का… हाथ में भी न समाए इतने…”
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फिर उसकी नज़र काँख की तरफ सरक गई। ब्लाउज के किनारे से काँख का भीगा हुआ हिस्सा साफ दिख रहा था। घने काले बाल पसीने से चिपककर चमक रहे थे। शंभू ने अनजाने में साँस तेज़ कर ली। उस गंदी, गर्म और भरी हुई खुशबू ने उसके लंड को धोती के अंदर सख्त कर दिया।
सुनीता पल्लू से माथा पोंछती रही। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि उसके बाप की आँखें अब उसके चूचों और भीगे काँख पर टिकी हुई हैं।
तभी अचानक शंभू के मन में एक आवाज़ गूंजी -
“क्या सोच रहा है तू…? बेटी है तेरी… साली अपनी ही औलाद को ऐसे घूर रहा है… हरामज़ादे…”
उसकी साँस अटक गई। वह झटके से नज़रें हटा लेना चाहता था, लेकिन आँखें मानो चिपकी हुई थीं। मन के अंदर शर्म और हवस दोनों एक साथ लड़ रहे थे। धोती के अंदर उसका लंड और भी सख्त हो चुका था, और वह खुद से नफरत करते हुए भी उस गंध और नज़ारे से अलग नहीं हो पा रहा था।
सुनीता ने अपने पिता की तरफ देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ कहा
सुनीता: “कैसे ना रखूँ ख्याल बाबूजी... आप मेरा इतना ख्याल रखते हैं। आपके अलावा मेरा है भी कौन?”
शंभू कुछ पल बेटी की तरफ देखता रहा। उसके चेहरे पर पिता वाला स्नेह साफ दिखाई दे रहा था।
सुनीता ने बात खत्म करते हुए अपना पल्लू ठीक किया और उसे एक तरफ कर लिया।
तभी शंभू ने पास रखी पानी से भरी बाल्टी उठाई और सुनीता की तरफ बढ़ाते हुए बोला
शंभू: “अच्छा बिटिया, अब तू जा... पहले मुँह-हाथ धो ले। सुबह-सुबह उठी है, थोड़ी देर में काम भी करना है।”
सुनीता ने कोई जवाब नहीं दिया। बस चुपचाप सिर हिलाई और अपनी बड़ी गदराई गांड मटकते हुए चली गई
शंभू भी वापस अपनी बैलगाड़ी तैयार करने में लग गया।