फागुन के दिन चार
भाग ५० रिपोर्ट पृष्ठ ४८८
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Thanks so much. How I wish to know how you enjoyed the last part ?Wow!!! Heartiest Congratulations Madam...for successful running of your story (rather i would call it as Marathon story) since 2 years!!!
That's a super great achievement!! Well done and Congrats once again!!
Not only that....but in a few days your story will also complete 500 pages. Inspite of working on multiple super looong stories, you have been very consistent in providing updates for this one as well..That's double awesome and achievement!!
komaalrani
इन्तजार रहेगा, आभार।आपने ५०वें भाग पर मेरी राय मांगी है.. लेकिन मैं यह कहना चाहूँगा की अभी मेरा पूरा ध्यान आपकी दूसरी कालजयी रचना 'जोरू का गुलाम' पर ही केंद्रित रहा है.. दुर्भाग्यवश, 'फागुन के दिन चार' के साथ अभी मैं वह निरंतरता नहीं बना पाया हूँ की उस पर कमेन्ट कर सकूँ..
मुझे लगता है कि बिना पूरी कहानी और किरदारों को समझे, बीच में से किसी एक अपडेट पर कुछ भी कह देना आपकी बेहतरीन लेखनी के साथ नाइंसाफी होगी.. मैं इसे अधूरा या चलताऊ नहीं पढ़ना चाहता.. पर जल्द ही कोशिश करूंगा की इसे पढ़ पाऊँ
शीला भाभी
डी॰बी॰ के बताए गए टार्गेट में अभी 20 मिनट बाकी थे। तभी भाभी अंदर आई और सीधे मेरे कंप्यूटर पे। (वह पहले भी कई बार मुझे कंप्यूटर पे ब्ल्यू फिल्म देखते पकड़ चुकी थी)
“आफिस का काम कर रहे हो…” उन्होंने गहरी सांस लेकर पूछा और मेरे पास बैठ गईं।
“हाँ थोड़ा सा…” मैंने बोला और एक नया पेज रिपोर्ट में खोला।
“तुम ना। मैं देख रही हूँ सुबह से, इसी से चिपके हो। अरे, मैंने तुम्हें बनारस से गुड्डी को साथ लाने को बोला था। तो मैंने सोचा था कि कुछ उसका मन लगा रहेगा। कुछ। और वो सुबह से या तो काम में लगी हुई है या शीला भाभी उसके पीछे पड़ी हुई है। थोड़ा उसके साथ टाइम पास करो। लेकिन तुम तो छुट्टी पे आये हो ना…” उन्होंने सीरियस होकर पूछा।
कुछ बात टालने की गरज से, कुछ उत्सुकता वश मैंने पूछा- “भाभी ये शीला भाभी का क्या चक्कर है। ये आई किस लिए हैं…”
“अरे यार। भाभी मुश्कुरायीं थोड़े अपने फार्म में आई, बोली- “इनकी शादी के 5-6 साल हो गए हैं कोई बच्चा नहीं हुआ। तो किसी ने इनसे कहा था कि यहाँ एक साधू हैं, वो गंडा बांधते हैं, भभूत देते हैं। तो कल उनसे मिलकर वो काम तो उन्होंने कर लिया। मैंने ही कहा कि अब दो-तीन दिन होली रह गई है, यहीं रुक जाइए। तो मान गईं…”
“लेकिन इतने दिन शादी के हुए तो। इनके पति। और डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाया…” मैंने बोला।
भाभी खिलखिलाने लगी, फिर हल्के से बोली- “सब ठीक है डाक्टर ने बोला है। लेकिन तुम्हीं क्यों नहीं कुछ कर देते अपना भभूत दे दो ना। इधर-उधर नाली में बहाते होगे…”
फिर उन्होंने ने राज खोला- “उनके पति बालक प्रिय हैं। और वो भी बाटम (पैसिव), भाभी ने मेरी संगत में ये सब शब्द सीख लिए थे। और थोड़ा होता भी नहीं उनसे। और नतीजा ये हो गया कि ये भी थोड़ा कन्याप्रेमी हो गई। कुछ तो शादी के पहले से ही थी और अब ज्यादा…”
अब मेरी समझ में आया की ओ गुड्डी के पीछे क्यों पड़ी थी और गुड्डी उनसे क्यों बच रही थी और मेरी ओर भी जिस तरह से वो देख रही थी।
“दे दो न बिचारी को वीर्य दान…” भाभी हँसकर बोली।
“धत्…” मैं शर्माया।
“अरे इसमें शर्माने की क्या बात है। वो भी बचपन की खिलाड़ी हैं तुम्हारी भी अच्छी ट्रेनिंग हो जायेगी मजा मिलेगा। और बिचारी का काम हो जाएगा…” भाभी ने मेरे गाल पे कसकर चिकोटी काटी और जाते-जाते बोली- “जल्दी आओ गरम गरम गुझिया निकल रही है…” और चली गईं।
बचपन से मुझे होली में कड़ाही के पास बैठने का शौक था और भाभी के आने के बाद तो और भी। मैंने बगल में बैठकर कभी चूल्हे की रोशनी में उनके गोरे गुलाबी दमकते चेहरे को और कभी कड़ाही में छनन छनन होती गुझिया और हर लाट जो निकलता उसमें से एक भाभी के हाथ से मेरे मुँह में। कभी मैं भाभी को स्कूल की गप्प सुनाता कभी उनके छोटे मोटे काम करता।
लेकिन आज ये रिपोर्ट। इसके साथ मुझे सपोर्टिंग डाकुमेंट्स भी अनेक्स करने होंगे।