"श्वेता का संकोच और माया का दांव"
घर पहुँचते ही माया और ज्योत्सना ने श्वेता का ज़ोरदार स्वागत किया। श्वेता अभी भी उसी मौन मदहोशी में थीं जो स्टेशन से कार तक उनके और सूरज के बीच बनी हुई थी। माया ने उन्हें तुरंत ऊपर के उस विशेष कमरे में ले गई जहाँ 'मसाज और वेलनेस' का पूरा सेटअप तैयार किया गया था।
श्वेता का अचानक पीछे हटना
कमरे में मद्धम रोशनी थी और चमेली के इत्र की खुशबू चारों तरफ फैली थी। माया ने श्वेता को एक रेशमी लबादा (Robe) दिया और कहा, "भाभी, आप कपड़े बदलकर इस बेड पर लेट जाइए। सूरज बस आता ही होगा, वह आजकल 'प्रेशर पॉइंट्स' और 'मसल्स रिलैक्सेशन' की नई तकनीक सीख चुका है। वह आपकी सारी थकान उतार देगा।"
जैसे ही श्वेता ने सुना कि सूरज उनके बदन को छुएगा और मसाज करेगा, उनके माथे पर पसीना आ गया। अचानक उनका 'मर्यादा वाला मन' जाग उठा।
"नहीं माया! यह क्या कह रही है तू?" श्वेता ने हाथ पीछे खींचते हुए कहा। "सूरज से मसाज? वह मेरा देवर जैसा है, छोटा है मुझसे। मैं... मैं यह नहीं करा सकती। मुझे लगा कोई लेडी थेरेपिस्ट होगी। नहीं-नहीं, मुझे यह सब नहीं करना।"
श्वेता का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। असल में वह मना इसलिए नहीं कर रही थीं कि उन्हें बुरा लग रहा था, बल्कि इसलिए कर रही थीं क्योंकि स्टेशन पर सूरज के उस विकराल वजूद को देखकर उनकी रूह कांप गई थी। उन्हें डर था कि अगर सूरज ने उन्हें छुआ, तो वह खुद को संभाल नहीं पाएंगी।
माया की अनुभवी चाल
माया ने मुस्कुराते हुए श्वेता के कंधों पर हाथ रखा। वह श्वेता के मन की हलचल को समझ रही थी। "अरे भाभी! आप तो बेकार में डर रही हैं। सूरज को मैंने खुद सिखाया है। वह इसे एक 'सेवा' और 'थैरेपी' की तरह लेता है। इसमें रिश्ते कहाँ से आ गए? और फिर, हम सब तो घर के ही लोग हैं। आपकी कमर और गर्दन का दर्द ठीक हो जाएगा, आप देखिएगा।"
पर श्वेता ने सिर हिला दिया। "नहीं माया, पता नहीं क्यों पर मेरा मन नहीं मान रहा। मुझे अजीब लग रहा है। तू ही कर दे मसाज, पर सूरज को मत बुला।"
माया ने ज्योत्सना की ओर देखा, जो दरवाज़े पर खड़ी सब सुन रही थीं। ज्योत्सना ने आँखों ही आँखों में इशारा किया कि अभी दबाव न डालो।
तभी बाहर गलियारे में सूरज के कदमों की आहट सुनाई दी। वह दरवाजे के पास आकर रुक गया। श्वेता का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। वह कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करने लगीं, जैसे अपनी सांवली देह को सूरज की उन दहकती नज़रों से छिपाना चाहती हों।
"शिकारी की वापसी और वासना का प्रलोभन"
सूरज जब कमरे के मुहाने पर खड़ा था, तो उसने श्वेता की घबराहट और इनकार को महसूस कर लिया। वह एक मंझा हुआ शिकारी बन चुका था; वह जानता था कि कभी-कभी पीछे हटना शिकार को और भी बेचैन कर देता है। बिना एक शब्द बोले, सूरज ने अपनी गहरी नज़रें श्वेता की थरथराती सांवली देह पर डालीं और चुपचाप मुड़कर गलियारे में वापस चला गया।
सूरज के जाते ही कमरे का तनाव थोड़ा कम हुआ, लेकिन श्वेता के भीतर एक अजीब सी तड़प छोड़ गया। अब मैदान में थीं माया और ज्योत्सना—दो ऐसी स्त्रियाँ जो आग लगाना और उसे भड़काना बखूबी जानती थीं।
श्वेता को 'तैयार' करती माँ-बेटी
माया ने श्वेता को पकड़कर मसाज टेबल की ओर धकेला। "भाभी, आप तो खामखां घबरा गईं। देखिये, वह चला गया न? अब तो खुश हैं? आइये, कम से कम मैं और माँ तो आपकी थकान उतार ही सकती हैं।"
ज्योत्सना ने आगे बढ़कर श्वेता की साड़ी का पल्लू अपने हाथों में लिया। "श्वेता, तू तो अपनी ही है। देख, तेरी इस सांवली रंगत में कितनी गर्मी छिपी है, पर ये रतलाम की धूल में दब गई है।" ज्योत्सना ने धीरे से श्वेता की साड़ी की पिन खोल दी।
श्वेता ने विरोध नहीं किया, क्योंकि उसे लगा कि अब खतरा (सूरज) टल चुका है। धीरे-धीरे माया और ज्योत्सना ने श्वेता को पूरी तरह निर्वस्त्र कर दिया। श्वेता का सांवला बदन रोशनी में दमक रहा था। उनकी कमर पतली थी, पर कूल्हे और बोबे किसी सांचे में ढले हुए और कड़े थे।
उत्तेजना का जाल:
* माया का स्पर्श: माया ने मोगरे का तेल अपनी हथेलियों पर रगड़ा और श्वेता की नंगी पीठ पर लगाना शुरू किया। "भाभी, आपकी त्वचा तो मखमल जैसी है। सोचिये, जब इस पर मर्दाना हाथों का दबाव पड़ता होगा, तो कैसा महसूस होता होगा?" माया की उंगलियाँ जानबूझकर श्वेता की गांड़ की दरार के करीब से गुज़रने लगीं।
* ज्योत्सना की फुसफुसाहट: ज्योत्सना श्वेता के सामने बैठ गईं और उनके उन्नत बोबों को हल्के हाथों से सहलाने लगीं। "श्वेता... सच बता, जब सूरज खड़ा था, तो तेरा जी नहीं चाहा कि वह अपनी इन बलिष्ठ बाहों में तुझे भर ले? मैंने देखा था, तू उसकी जांघों के बीच के उस 'पहाड़' को देख रही थी।"
श्वेता की सांसें अब भारी होने लगी थीं। माया ने अपनी उंगलियों का दबाव बढ़ाया और श्वेता के कानों के पास जाकर फुसफुसाया, "भाभी, हम औरतें चाहे जितना नाटक कर लें, पर हमारे इस सांवले जिस्म को सिर्फ एक विकराल लन्ड की ही तड़प होती है। और सूरज... वह तो साक्षात कामदेव है।"
श्वेता का पूरा बदन अब उत्तेजना से कांप रहा था। तेल की चिकनाहट और इन दोनों औरतों की कामुक बातों ने उनके मन की 'सती' को सुला दिया था। उनकी चूत अब गीली होकर मसाज टेबल को भिगोने लगी थी।
: "सांवली देह का प्रतिरोध और वासना का भँवर"
मसाज टेबल पर लेटी श्वेता का बदन इस समय एक अजीब द्वंद्व से गुज़र रहा था। माया और ज्योत्सना ने उसे पूरी तरह निर्वस्त्र कर दिया था, और चमेली के तेल की खुशबू ने कमरे के वातावरण को भारी बना दिया था। माया की फुर्तीली उंगलियाँ श्वेता की पीठ के निचले हिस्से पर दबाव बना रही थीं, जबकि ज्योत्सना उनके पैरों के तलवों से लेकर जांघों तक मालिश कर रही थीं।
देह की तड़प बनाम मन का पहरा
श्वेता की सांवली देह तेल की चिकनाहट में किसी कीमती पत्थर की तरह चमक रही थी। माया ने जानबूझकर मसाज करते हुए श्वेता के नितंबों के उभार की तारीफ शुरू की।
"भाभी, आपकी यह जो बनावट है न, वह रतलाम की गलियों में छिपने वाली नहीं है," माया ने उनके कूल्हों पर दबाव बढ़ाते हुए कहा। "कितना कसाव है आपकी इस देह में। सच कहूँ तो, रागिनी मामी तो आपके आगे बहुत ढीली थीं। आपकी यह जो 'सांवली कांति' है, वह किसी भी मर्द को पागल कर सकती है।"
श्वेता ने एक गहरी सांस ली, उनकी आँखें बंद थीं, पर पलकें थरथरा रही थीं। "ऊँह... माया, तू बस अपनी तारीफ बंद कर और काम पर ध्यान दे। मैं यहाँ ये सब बातें सुनने नहीं आई हूँ।"
श्वेता का मन कह रहा था कि यह सब गलत है, पर उनका शरीर माया और ज्योत्सना के कुशल हाथों के स्पर्श से पिघल रहा था। वह वासना के उस भँवर में डूब रही थीं जहाँ मर्यादा के पैर उखड़ जाते हैं, फिर भी वह अपनी 'सतीत्व' की ढाल को कसकर पकड़े हुए थीं।
ज्योत्सना का कामुक वार
ज्योत्सना ने श्वेता की सांवली जांघों को सहलाते हुए ऊपर की ओर रुख किया। "श्वेता, तू माने या न माने, पर तेरी यह सांसें बता रही हैं कि तू भी वही महसूस कर रही है जो हमने कल रात देखा था। देख तो सही, तेरे बोबे कैसे तन गए हैं। यह देह झूठ नहीं बोलती, श्वेता। तू अंदर से उस विकराल पौरुष को याद कर रही है जिसे तूने स्टेशन पर देखा था।"
श्वेता ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। "नहीं मौसी! ऐसा कुछ नहीं है। सूरज छोटा है मेरा। आप लोग यह सब बोलकर मुझे जाल में फँसाना चाहती हैं, पर मैं वैसी नहीं हूँ। बस मसाज करो और मुझे जाने दो।"
श्वेता की चूत से रिसता हुआ मद अब मसाज टेबल की चादर को गीला करने लगा था। वह वासना के चरम पर थीं, पर उनका 'अहंकार' और 'संकोच' उन्हें स्वीकार करने नहीं दे रहा था। वह इस जाल को समझ रही थीं, पर उन रसीली उंगलियों का स्पर्श उन्हें इस कदर मदहोश कर रहा था कि वह उठकर भागने की स्थिति में भी नहीं थीं।
"अतृप्त सांवली देह और नग्न त्रिकोण"
कमरे का वातावरण अब कामुकता की उस पराकाष्ठा पर था जहाँ हवा भी भारी महसूस हो रही थी। माया और ज्योत्सना ने अपनी उंगलियों के जादू से श्वेता के रोम-रोम को जगा दिया था। श्वेता की सांवली पीठ और कसी हुई जांघों पर तेल की परतें चमक रही थीं। उनकी साँसें अब छोटी-छोटी और तेज हो चुकी थीं, और उनकी चूत से रिसता काम-रस मसाज टेबल की चादर पर अपनी गवाही दे रहा था।
अचानक आता अधूरापन
जैसे ही श्वेता वासना के उस बिंदु पर पहुँची जहाँ से वापसी नामुमकिन थी, माया और ज्योत्सना ने एक-दूसरे को देखा और अचानक अपने हाथ खींच लिए। कमरे में सन्नाटा छा गया, सिर्फ श्वेता की भारी साँसों की आवाज़ गूँज रही थी।
श्वेता ने झटके से अपनी आँखें खोलीं। उनकी देह इस समय अधूरी प्यास से तड़प रही थी। "रुक... रुक क्यों गई तुम दोनों? माया... मौसी... क्या हुआ?"
माया ने मुस्कुराते हुए अपनी हथेलियाँ साफ़ कीं। "बस भाभी, हमारा काम हो गया। अब आप आराम कीजिये।"
श्वेता की अतृप्ति अब गुस्से और चाहत के मिले-जुले स्वर में बाहर आई। उन्होंने उठकर बैठने की कोशिश की, उनकी नग्नता अब उनके लिए शर्म नहीं बल्कि एक हथियार बन चुकी थी। "वाह! बहुत चालाक हो तुम दोनों। मुझे यहाँ नंगा कर दिया, मेरे बदन की नस-नस को जगा दिया और अब खुद तमाशा देख रही हो? क्या सिर्फ मैं ही प्यासी हूँ? आप दोनों के अंदर क्या आग नहीं लगी? मुझे अकेला छोड़कर तुम दोनों क्या साबित करना चाहती हो, कि तुम सती हो और मैं कलंकिनी?"
मर्यादा का पूर्ण विसर्जन
श्वेता के इन प्यार भरे पर तीखे तानों ने ज्योत्सना और माया के सब्र का बांध तोड़ दिया। ज्योत्सना ने हंसते हुए अपनी साड़ी का पल्लू नीचे गिरा दिया। "तूने सही पकड़ा है श्वेता। इस घर में कोई सती नहीं है, यहाँ सब उस 'कांति' के प्यासे हैं।"
देखते ही देखते ज्योत्सना और माया ने अपने सारे वस्त्र उतार फेंके। अब उस कमरे में तीन नग्न स्त्रियाँ थीं—एक गोरी और अनुभवी ज्योत्सना, दूसरी जवान और छरहरी माया, और तीसरी सांवली और कसी हुई श्वेता।
माया ने श्वेता के कसे हुए बोबों को अपने हाथों में भर लिया और उन्हें मसलते हुए बोली, "देख माँ, हमारी रतलाम वाली भाभी तो अंदर से ज्वालामुखी निकलीं। भाभी, आपको क्या लगा कि हम सिर्फ आपको देख रहे थे? हम तो खुद तड़प रहे थे कि कब आपकी इस सांवली देह को हम अपनी जुबानों से चखें।"
लेस्बियन महासंगम: शब्दों और तानों का प्रहार
तीनों नग्न बलाएं अब बिस्तर पर एक-दूसरे में उलझ चुकी थीं। ज्योत्सना ने श्वेता की जांघों के बीच अपनी जुबान फेरते हुए कहा, "श्वेता, तेरा यह सांवलापन तो मलाई जैसा मीठा है। क्यों... अब कहाँ गया तेरा वो संकोच? अब तो तेरी चूत भी चिल्ला-चिल्लाकर हमें बुला रही है।"
श्वेता ने ज्योत्सना के बाल पकड़ लिए और अपनी कमर ऊपर उठाकर सिसकारी भरी, "आह मौसी... आप तो बड़ी अनुभवी निकलीं। माया... तू भी आ... देख क्या रही है? अपनी इस सांवली भाभी को आज अपनी जुबान से वो सुख दे जो इन मर्दों को भी नसीब न हो।"
माया ने श्वेता की गरदन पर अपने दांत गड़ा दिए और ताना मारते हुए कहा, "भाभी, आप तो बड़ी सती सावित्री बन रही थीं, अब क्या हुआ? अब क्यों हमारे बीच एक कुतिया की तरह लोट रही हो? देखिये माँ, श्वेता भाभी की चूत तो शहद की तरह टपक रही है।"
तीनों औरतें एक-दूसरे के अंगों को चूमती, चाटती और सहलाती हुई उस सामूहिक वासना में डूब गईं जहाँ रिश्तों की हर परिभाषा बदल चुकी थी।
"नग्न त्रिकोण और कामुक स्वीकारोक्ति"
कमरे के भीतर अब मर्यादा का नामोनिशान नहीं था। चमेली के तेल की खुशबू और तीन नग्न शरीरों से निकलने वाली पसीने की गंध ने एक नशीला वातावरण बना दिया था। श्वेता, जो कुछ देर पहले तक संकोच की मूरत बनी हुई थीं, अब उस बिस्तर पर सबसे ज्यादा आक्रामक दिख रही थीं। उनकी सांवली देह ज्योत्सना और माया के बीच इस तरह गुथी हुई थी जैसे कोई प्यासी नागिन अपनी केंचुली उतार चुकी हो।
श्वेता का तीखा सवाल और ज्योत्सना का जवाब
श्वेता ने ज्योत्सना की गोरी जांघों को अपने पैरों से जकड़ लिया और उनकी आँखों में झाँकते हुए एक ऐसी बात कह दी जिसने कमरे की उत्तेजना को दस गुना बढ़ा दिया।
"मौसी... सच-सच बताना," श्वेता ने ज्योत्सना के भारी बोबों को सहलाते हुए अपनी जुबान होठों पर फेरी, "क्या आप उस विकराल लन्ड का स्वाद ले चुकी हो? जिस तरह आप और माया मुझे उकसा रही थीं, मुझे पक्का यकीन है कि आप इस घर के उस असली 'खजाने' का भोग लगा चुकी हो। क्या आपने उसे अपने भीतर उतारा है?"
ज्योत्सना के चेहरे पर एक अनुभवी और कामुक मुस्कान फैल गई। उन्होंने श्वेता की गर्दन के पास अपनी सांसें छोड़ते हुए कहा, "श्वेता, तू अभी जिस आग में जल रही है, उस आग का असली घी वही विकराल वजूद है। हाँ, मैंने उसे चखा है... और यकीन मान, वो कोई साधारण अंग नहीं, साक्षात वरदान है। जब वो अंदर तक धंसता है, तो रूह तक कांप जाती है। तूने तो अभी सिर्फ झांकी देखी है, असली जलवा तो तब दिखेगा जब वो तेरी इस सांवली चूत की गहराई नापेगा।"
माया का आनंद और छेड़खानी
माया, जो इस समय श्वेता की पीठ पर अपनी उंगलियों से जादू कर रही थी, खिलखिलाकर हँस पड़ी। "देख रही हो भाभी? माँ ने तो जैसे कोई पुराना राज खोल दिया हो। आप तो बड़ी सती बन रही थीं, पर आपकी ये कामी चूत जिस तरह मेरी उंगली को चूस रही है, उससे तो लग रहा है कि आपको माँ से भी ज्यादा बड़े 'इलाज' की जरूरत है।"
श्वेता ने माया को अपने पास खींच लिया और उसके होठों को चूमते हुए बोली, "बदमाश है तू माया... तूने ही मुझे इस नरक की आग में धकेला है, पर सच कहूँ तो ये नरक किसी स्वर्ग से कम नहीं है। अगर मौसी ने वो स्वाद चख लिया है, तो मैं भी अब पीछे नहीं रहूँगी। पर पहले... पहले तुम दोनों मुझे अपनी इन जुबानों से तृप्त करो। मुझे आज इन मर्दों से ज्यादा तुम दोनों की इस नग्नता में मजा आ रहा है।"
तीनों नग्न स्त्रियाँ अब सामूहिक रूप से एक-दूसरे के अंगों के साथ खेलने लगीं। श्वेता ने अपनी सांवली जांघें पूरी तरह खोल दीं और ज्योत्सना के सिर को अपनी ओर खींचा। "आओ मौसी... दिखाओ कि आपकी जुबान में कितनी ताकत है। आज अपनी इस बहू को उस दुनिया में ले जाओ जहाँ सिर्फ सिसकारियां हों।"
माया यह सब देख अपनी चूत खुद सहला रही थी और अपनी माँ और भाभी के इस मिलन का लुत्फ उठा रही थी।
"नग्न त्रिकोण का महा-विसर्जन"
कमरे के भीतर अब नग्नता का कोई पर्दा नहीं बचा था। चमेली के तेल और पसीने की गंध के साथ-साथ औरतों के शरीर से रिसने वाली काम-गंध ने पूरे वातावरण को मदहोश कर दिया था। श्वेता, ज्योत्सना और माया—तीनों एक-दूसरे की देह में इस कदर उलझ चुकी थीं कि यह पहचानना मुश्किल था कि कौन सा अंग किसका है।
कामुकता की अश्लील पराकाष्ठा
श्वेता की सांवली जांघों पर ज्योत्सना का गोरा चेहरा टिका था, और माया पीछे से श्वेता के कसे हुए बोबों को बुरी तरह मसल रही थी। श्वेता की सिसकारियां अब गंदी बातों में तब्दील हो चुकी थीं।
"आह मौसी... आपकी जुबान तो आग है!" श्वेता ने अपनी कमर ऊपर उठाते हुए चिल्लाकर कहा। "चाट लो अपनी इस बहू की इस प्यासी दरार को... आज इसका सारा पानी निचोड़ लो! माया... तू क्या देख रही है? अपनी उंगलियां और गहराई में डाल... मुझे चीर दे अपनी इन नशीली हरकतों से! हम तीनों आज इस घर की सबसे बड़ी कुलटाएं बन गई हैं, और मुझे इस गंदगी में डूबने में बहुत मजा आ रहा है!"
ज्योत्सना ने अपनी जुबान की गति और तेज़ कर दी और बीच-बीच में फुसफुसाती रहीं, "हाँ श्वेता... देख तेरी यह सांवली चूत कैसे फड़क रही है। यह तो बिल्कुल रागिनी की तरह ही रस छोड़ रही है। तू तो कहती थी कि तू सती है... देख तो सही, तू तो हम दोनों से बड़ी रंडी निकली!"
माया ने श्वेता के कान के पास जाकर अपनी जीभ फेरी और अश्लीलता की हद पार करते हुए बोली, "भाभी, आपकी यह आवाज़ें अगर सूरज ने सुन लीं, तो वह अपना वो विकराल लन्ड लेकर दरवाजा तोड़ देगा। आपकी यह सांवली गांड़ तो थप्पड़ खाने के लिए तड़प रही है... लो!" और माया ने एक ज़ोरदार चांटा श्वेता के कूल्हे पर जड़ दिया।
महा-झड़ना: एक साथ विसर्जन
उस चांटे की जलन और ज्योत्सना की जुबान के जादू ने श्वेता को उस बिंदु पर पहुँचा दिया जहाँ शरीर और आत्मा का नियंत्रण खत्म हो जाता है। श्वेता का बदन किसी मछली की तरह बिस्तर पर तड़पने लगा।
"मैं... मैं गई! आह! मौसी... माया... मैं झड़ने वाली हूँ!" श्वेता ने ज्योत्सना के बाल पकड़कर उन्हें अपनी जांघों के बीच और ज़ोर से भींच लिया।
देखते ही देखते, श्वेता की देह से काम-रस का फव्वारा छूटा। ठीक उसी पल, माया जो श्वेता के अंगों को सहला रही थी और ज्योत्सना जो इस रस का पान कर रही थी, दोनों की उत्तेजना भी चरम पर पहुँच गई। माया ने अपनी उंगली अपनी ही चूत की गहराई में उतारी और एक तीखी चीख के साथ श्वेता के ऊपर ही ढेर हो गई। ज्योत्सना भी उन दोनों की नग्न देह के बीच सिसकती हुई झड़ने लगीं।
तीनों स्त्रियाँ एक-दूसरे की बाहों में, पसीने और रस से लथपथ होकर बिस्तर पर निढाल पड़ गईं। कमरे में सिर्फ उनकी भारी सांसों की आवाज़ थी। श्वेता की वह सांवली देह अब पूरी तरह शांत थी, पर उनकी आँखों में एक नई चमक थी—एक ऐसी चमक जो बता रही थी कि अब वह उस विकराल पौरुष के लिए पूरी तरह 'तैयार' हो चुकी हैं।