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Incest दीदी का घायल

mastmast123

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पात्र परिचय
* सूरज (भाई): 23 वर्ष, आकर्षक और बलिष्ठ व्यक्तित्व। चार लाख महीने की आय होने के बाद भी स्वभाव में गजब की विनम्रता और कोमलता है। उसकी आँखों में चमक से ज्यादा अपनी बहन के लिए चिंता और स्नेह झलकता है। वह आर्थिक रूप से मजबूत है, पर दिल से अभी भी वही छोटा भाई है जो अपनी दीदी की एक मुस्कान के लिए कुछ भी कर सकता है।
* माया (बड़ी बहन): 26 वर्ष, अपूर्व सुंदरी। उसके चेहरे पर एक सात्विक और दिव्य 'कांति' (चमक) है जो दुःख की घड़ी में भी फीकी नहीं पड़ी है। उसकी गरिमा और सौम्यता उसे भीड़ से अलग बनाती है। ससुराल का घर उजड़ने का दर्द उसकी आँखों में एक गहराई दे गया है।
* ज्योत्सना (माँ): नाम के अनुरूप ही शांत और शीतल स्वभाव वाली। वह परिवार की वह धुरी हैं जो पिता के जाने के बाद भी बच्चों को संस्कार और प्रेम से बांधे हुए हैं।
प्रथम अध्याय: "ममता की छाँव और स्नेह का मरहम"
शहर के शोर से दूर, एक भव्य लेकिन शांत बंगले के बरामदे में सूरज टहल रहा था। सूरज, जिसकी उम्र अभी महज़ 23 साल थी, अपनी मेहनत और काबिलियत से आज ऊँचाइयों पर था। महीने के चार लाख रुपये उसके बैंक खाते में तो आते थे, पर उसके व्यवहार में रत्ती भर भी अहंकार नहीं था। उसके मजबूत कंधे आज थोड़े झुके हुए थे, क्योंकि आज उसकी बड़ी बहन, उसकी 'माया दीदी' हमेशा के लिए वापस घर लौट रही थीं।
सफेद रंग की कार आकर रुकी। ज्योतिर्मय चेहरे वाली माया कार से उतरी। 26 साल की माया की कांति ऐसी थी कि ढलती शाम में भी उसका चेहरा दमक रहा था। वह घर की दहलीज पर आकर रुकी, उसकी आँखों में अपने उजड़े हुए संसार की नमी थी।
सूरज भागकर बाहर आया। उसने अपनी बहन का हाथ थाम लिया। उसकी पकड़ में कोई अधिकार नहीं, बल्कि एक कोमल सहानुभूति थी। उसने माया के सूटकेस को खुद उठाया और धीमी आवाज़ में कहा, "दीदी, आप वापस आ गईं... अब आपको कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है। यह घर, यह भाई और आपकी खुशियाँ—सब यहीं हैं।"
माया ने अपने छोटे भाई के बलिष्ठ हाथों को देखा, जो अब उसका सहारा बनने के लिए तैयार थे। उसने फीकी सी मुस्कान के साथ सूरज के सिर पर हाथ रखा।
अंदर से माँ ज्योत्सना निकलकर आईं। उनके चेहरे पर ममता का वैसा ही उजाला था जैसा नाम का अर्थ होता है। उन्होंने माया को गले से लगा लिया। घर के मंदिर में जलते दीपक की रोशनी माँ के चेहरे पर पड़ रही थी।
"सूरज, अपनी दीदी के लिए वही पसंद का केसरिया दूध बनवा," ज्योत्सना जी ने कोमलता से कहा।
ड्राइंग रूम में बैठकर सूरज अपनी बहन के पैरों के पास जमीन पर बैठ गया। वह इतना धनवान होने के बावजूद अपनी जड़ों से जुड़ा था। "दीदी, जो हुआ उसे एक बुरा सपना समझकर भूल जाइए। मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब आपका है। मैं कल ही आपके नाम से एक नया बिजनेस सेटअप करवा दूंगा, ताकि आपकी वह चमक कभी फीकी न पड़े।"
माया की आँखों से आंसू छलक पड़े। उसे लगा कि भले ही एक घर उजड़ गया हो, पर इस भाई और माँ के निस्वार्थ प्रेम की छाँव में वह फिर से जी उठेगी। सूरज का कोमल हृदय अपनी बहन के हर आंसू को पोंछने के लिए व्याकुल था। वह दुखी था कि उसकी दीदी को इतना सहना पड़ा, पर संकल्पित था कि अब उनकी जिंदगी में खुशियों की कोई कमी नहीं रहने देगा।
रात के सन्नाटे में, ज्योत्सना जी ने मस्तक पर हल्दी का तिलक लगाते हुए अपने दोनों बच्चों को देखा। बाहर चांदनी खिली थी, और घर के अंदर स्नेह का एक ऐसा अध्याय शुरू हो रहा था जहाँ घावों को भरने के लिए सिर्फ प्यार और अपार समर्पण था।
 

mastmast123

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"अंतर्मन की प्यास और ममता का संकोच"
आलीशान बंगले के पिछवाड़े बना बगीचा चांदनी रात में दूधिया रोशनी से नहाया हुआ था। हवा में रात की रानी की खुशबू घुली थी, जो मन को एक अजब सा सुकून दे रही थी। माया अपनी माँ ज्योत्सना की गोद में सिर रखकर लेटी थी। सूरज अभी-अभी अपने ऑफिस का कुछ काम निपटाकर ऊपर गया था।
दुखों के बादल छंट तो नहीं रहे थे, पर इस घर की दीवारें उन्हें सोखने की कोशिश ज़रूर कर रही थीं।
"माया..." ज्योत्सना ने धीरे से अपनी बेटी के रेशमी बालों को सहलाया। "आज तेरी आँखों में वो पुरानी वाली चमक देखी मैंने, जब सूरज तेरे लिए तेरा पसंदीदा गजरा लेकर आया था।"
माया ने आँखें बंद कर लीं। उसकी कांति युक्त त्वचा पर चांदनी का उजाला पड़ रहा था। "हाँ माँ, सूरज बहुत ख्याल रखता है। ऐसा लगता है जैसे उसने ठान लिया है कि मुझे दुनिया का हर सुख लाकर दे देगा। पर कभी-कभी दिल के किसी कोने में एक खालीपन रह जाता है।"
ज्योत्सना जी चुप हो गईं। एक माँ अपनी संतान के मन की आहट को उसकी खामोशी में भी सुन लेती है। उन्होंने एक गहरी सांस ली। वे जानती थीं कि माया अभी सिर्फ 26 साल की है—एक ऐसी उम्र जब जीवन की उमंगें और शरीर की अपनी जरूरतें चरम पर होती हैं। वैवाहिक सुख का उजड़ना सिर्फ सामाजिक क्षति नहीं होती, वह एक स्त्री के अंतर्मन की प्यास को भी अधूरा छोड़ देती है।
माँ ने थोड़ा हिचकिचाते हुए, अपनी आवाज़ को और कोमल किया। "बेटी, सूरज तुझे दुनिया की हर दौलत दे सकता है, मैं तुझे ममता दे सकती हूँ... पर एक उम्र के बाद जो एक स्त्री की स्वाभाविक प्यास होती है, जो साथ और जो स्पर्श एक जीवनसाथी से मिलता है... मैं अक्सर डर जाती हूँ कि उस प्यास का क्या होगा? तू अभी बहुत जवान है माया।"
माया का गोरा चेहरा क्षण भर में सुर्ख लाल हो गया। उसने झटके से अपनी माँ की गोद से सिर उठाया और चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया।
"क्या माँ... आप भी!" माया ने लजाते हुए और थोड़ा संकोच के साथ कहा। उसकी आवाज़ में एक मीठी सी झिड़क थी। "अभी तो मैं वापस आई हूँ, और आप फिर से वही बातें करने लगीं।"
"शर्मा मत पगले," ज्योत्सना ने उसे वापस अपने करीब खींचते हुए कहा। "मैं तेरी माँ हूँ। मैं जानती हूँ कि कोमल हृदय और शरीर को जब प्रेम की आदत पड़ जाती है, तो ये एकांत काटने को दौड़ता है। तू कब तक खुद को इस 'कांति' के पीछे छिपाएगी?"
माया ने अपनी माँ के हाथ को अपने गाल से सटा लिया। उसकी लज्जा अब एक गंभीर सोच में बदल रही थी। "माँ, अभी मेरा मन उन रास्तों पर फिर से चलने को तैयार नहीं है। सूरज का प्यार और आपकी गोद ही अभी मेरी प्यास बुझाने के लिए काफी है। बाकी... किस्मत ने जो लिखा होगा, वो होगा ही।"
अंधेरे कोने में खड़े सूरज ने शायद इन बातों का कुछ हिस्सा सुन लिया था। उसके हाथ मुट्ठी में भिंच गए। वह अपनी बहन के लिए दुनिया जीत सकता था, पर उसकी इस 'प्यास' का इलाज क्या उसके पास था? वह अपनी दीदी के सम्मान के लिए किसी से भी लड़ सकता था, पर कुदरत के इन नियमों से कैसे लड़ता?
 

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माया की बात सुनकर ज्योत्सना के हाथों की गति ठहर गई। चांदनी की दूधिया रोशनी में ज्योत्सना का चेहरा किसी शांत झील जैसा लग रहा था, जिसमें माया ने एक कंकड़ फेंक कर हलचल मचा दी थी।
माया ने शरारत भरी मुस्कान के साथ माँ की आँखों में झाँका। "सच कह रही हूँ माँ। मेरी प्यास की फिक्र तो आपको है, पर अपनी तरफ तो देखो? आप पचास की दहलीज पर होकर भी पैंतीस की लगती हो। सच कहूँ तो, जब आप और सूरज साथ चलते हो, तो लोग आपको माँ नहीं, उसकी बड़ी बहन समझते हैं। आपकी यह कांति, यह रूप... क्या यह सब यूँ ही समय की धूल में खो जाएगा?"
ज्योत्सना का गोरा मुखमंडल लज्जा की एक गहरी परत से ढंक गया। उन्होंने अपनी नज़रें झुका लीं, जैसे कोई सोलह साल की किशोरी पहली बार प्रेम की बात सुन रही हो। उन्होंने धीरे से माया के कंधे पर एक हल्की सी चपत लगाई और मुड़कर अपने पल्लू को ठीक करने लगीं।
"धत पगली! क्या बोल रही है..." ज्योत्सना ने लजाकर माया के कान के बिल्कुल पास जाकर फुसफुसाते हुए कहा, "मेरे बारे में कौन सोचता है रे? मैं तो अब बस तुम दोनों की खुशियों की परछाईं बनकर जीना चाहती हूँ।"
माया ने हार नहीं मानी। उसने माँ का हाथ अपने हाथों में लिया—एक हाथ जिसमें माँ की ममता थी और दूसरा जिसमें अभी भी यौवन का वही तेज था। "सोचने वाले बहुत हैं माँ, बस आपकी नज़रें झुकी रहती हैं। सूरज भी तो यही चाहता है कि आप अपनी पहचान, अपनी मुस्कान फिर से ढूंढें। क्या पिता जी के चले जाने के बाद आपकी भावनाओं का अंत हो गया?"
ज्योत्सना की पलकें भीग गईं, पर लज्जा की वह मुस्कान अभी भी होंठों पर ठहरी थी। उन्होंने माया के कान खींचते हुए कहा, "बड़ी हो गई है न, इसलिए अब माँ को ही पट्टी पढ़ा रही है? चल, बहुत रात हो गई, अब सो जा।"
माया मुस्कुराते हुए लेट गई, पर ज्योत्सना की धड़कनें उस रात कुछ तेज़ थीं। अंधेरे में, घर के दूसरे कोने में बैठा सूरज अपनी माँ और बहन की इन बातों को सुन रहा था। उसके कोमल हृदय में अपनी माँ के लिए एक अजीब सी कसक उठी। वह जानता था कि माँ ने अपनी पूरी जवानी उनकी सुरक्षा में होम कर दी थी।
 

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मर्यादा की लक्ष्मण रेखा और अंतर्मन का द्वंद्व"
सुबह की सुनहरी धूप खिड़कियों से छनकर घर के अंदर आ रही थी, पर घर के भीतर एक अजीब सी खामोशी पसरी थी। सूरज अपने ऑफिस जा चुका था। आज उसे एक बड़ी डील फाइनल करनी थी, जिससे उसकी मासिक आय और बढ़ने वाली थी। लेकिन ऑफिस के ऊँचे केबिन में बैठकर भी उसका मन घर की उन दो औरतों में अटका था, जो उसके जीवन का आधार थीं।
उधर घर पर, ज्योत्सना और माया रसोई के काम निपटाकर डाइनिंग टेबल पर बैठी थीं। सामने चाय के प्याले रखे थे, पर दोनों का ध्यान कहीं और था।
ज्योत्सना ने अपनी थरथराती आवाज़ से सन्नाटा तोड़ा। "माया... रात से मेरा मन बहुत भारी है। मैं बार-बार सोच रही हूँ, क्या होगा हम दोनों का? सूरज अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ेगा, उसकी शादी होगी, उसका अपना संसार होगा। पर हम? इस सन्नाटे में हमारी ये जवानी और ये ज़रूरतें... क्या ऐसे ही घुटती रहेंगी?"
माया ने प्याला मेज पर रख दिया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर दृढ़ता थी।
माँ ने थोड़ा और साहस जुटाया, "क्या... क्या किसी पराए मर्द का हमारे जीवन में आना ज़रूरी है? क्या कोई बाहरी व्यक्ति इस घर की रिक्तता को भर पाएगा?"
'पराया मर्द' शब्द सुनते ही माया के चेहरे की कांति एक कठोर तेज में बदल गई। उसने तुरंत विरोध में सिर हिलाया।
"नहीं माँ, बिल्कुल नहीं!" माया की आवाज़ में एक स्पष्ट इनकार था। "घर की इज़्ज़त सबसे ऊपर है। पिता जी के जाने के बाद सूरज ने जिस तरह इस घर को संभाला है, हम किसी पराए को लाकर उस मर्यादा को खंडित नहीं कर सकते। और सबसे बड़ी बात... मुझे पसंद नहीं कोई बाहरी। बाहरी लोग सिर्फ जिस्म और दौलत देखते हैं, रूह नहीं।"
ज्योत्सना अपनी बेटी की बात सुनकर दंग रह गईं। "तो फिर क्या रास्ता है माया? क्या यह प्यास और यह तड़प हमें अंदर ही अंदर जलाती रहेगी?"
माया उठी और माँ के पीछे जाकर उनके कंधों पर हाथ रख दिया। "माँ, समाधान घर के अंदर ही होगा। हम किसी बाहरी को अपनी चौखट लांघने नहीं देंगे। सूरज सिर्फ हमारा भाई या बेटा नहीं है, वह इस घर का 'मर्दाना वजूद' है। जो सुकून, जो सुरक्षा हमें यहाँ मिल रही है, वह किसी पराए मर्द की बाहों में नहीं मिल सकती।"
 

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"परछाइयों का संगम"
दोपहर की ढलती धूप ने कमरे में एक सुनहरा सा धुंधलका फैला दिया था। सूरज अपने ऑफिस के कामों में व्यस्त था, उसे खबर भी नहीं थी कि घर की इन चार दीवारों के बीच भावनाओं का कौन सा दरिया उमड़ रहा है। उसके मन में अपनी माँ और बहन के लिए केवल अपार श्रद्धा और पवित्र प्रेम था। वह तो बस उनकी सुख-सुविधाओं के लिए दिन-रात एक कर रहा था।
इधर घर में, माया ने अपनी माँ का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया। माँ के हाथ की कोमलता और गर्माहट ने माया के भीतर एक अजीब सा विश्वास भर दिया।
"माँ," माया ने ज्योत्सना की आँखों में गहराई से झाँकते हुए कहा, "हमें किसी तीसरे, किसी पराए की ज़रूरत क्यों है? आपने ही तो सिखाया है कि नारी खुद में पूर्ण है। आप मेरा सहारा बनिए, और मैं आपका। हम एक-दूसरे की अधूरी प्यास और अकेलेपन को खुद क्यों नहीं बाँट लेते?"
यह सुनते ही ज्योत्सना का गोरा चेहरा लाज से गहरा गुलाबी हो गया। उन्होंने अपनी नज़रें नीची कर लीं, जैसे कोई राज़ खुल गया हो। पचास की उम्र में भी उनकी लज्जा किसी नवयौवना जैसी थी।
माया ने हाथ की पकड़ और मजबूत की। "बाहरी मर्द घर में आएगा, तो इज़्ज़त की दीवारें दरकेंगी। लेकिन हम? हम तो एक ही खून हैं, एक ही साये की दो परछाइयाँ। जो दर्द आप महसूस करती हैं, वही मैं भी करती हूँ। जो खालीपन आपकी रातों में है, वही मेरी रातों में भी है।"
दोनों के हाथों के बीच एक गर्माहट बढ़ने लगी—एक ऐसी गर्मी जो केवल शरीर की नहीं, बल्कि दो तरसती हुई रूहों की थी। ज्योत्सना ने धीरे से अपनी दूसरी हथेली माया के हाथ के ऊपर रख दी।
"क्या... क्या तू सच कह रही है माया?" ज्योत्सना ने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा, उनका गला संकोच से भर आया था। "मेरे बारे में... कौन सोचता है रे?"
माया मुस्कुराई—उसकी मुस्कान में वह 'कांति' और वह चमक थी जो किसी को भी मोह ले। उसने माँ के और करीब आकर उनके कंधे पर अपना सिर टिका दिया। "मैं सोचती हूँ न माँ। आपकी यह खूबसूरती, यह उम्र... इसे किसी पराए की नज़र नहीं, बल्कि मेरी मुहब्बत की छाँव चाहिए।"
ज्योत्सना इतनी शर्मा गईं कि उन्होंने अपना चेहरा माया के बालों में छिपा लिया। "क्या माँ आप भी..." कहकर माया ने जो बात शुरू की थी, अब वह एक मूक समझौते में बदल रही थी। दोनों एक-दूसरे की सामीप्यता की गर्मी महसूस कर रही थीं। उस पल में न कोई समाज था, न कोई मर्यादा का डर, बस दो औरतें थीं जो एक-दूसरे के एकांत का मरहम बन रही थीं।
सन्नाटे में केवल उनकी सांसों की आवाज़ थी और वह गर्माहट, जो धीरे-धीरे उनके अंतर्मन की प्यास को सहला रही थी।
 

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"चांदनी और रेशम का मिलन"
उस रात आसमान में पूरा चांद खिला था, जिसकी शीतल रोशनी खिड़की के पर्दों को भेदकर कमरे के भीतर अपनी जगह बना रही थी। घर का वह कोना आज बाकी दुनिया से पूरी तरह कट चुका था। सूरज गहरी नींद में था, और पूरा बंगला एक रहस्यमयी खामोशी में डूबा था।
माया और ज्योत्सना एक ही रेशमी बिस्तर पर आमने-सामने थीं। कमरे में मोगरे की महकती अगरबत्ती का धुआं धीरे-धीरे तैर रहा था, जो माहौल को और भी मदहोश बना रहा था।
"माँ..." माया की आवाज़ आज पहले जैसी नहीं थी। उसमें एक भारीपन था, एक ऐसी प्यास जो बरसों से दबी हुई थी। उसने धीरे से ज्योत्सना की साड़ी के पल्लू को अपनी उंगलियों में फँसाया। "मैंने कहा था न, आप पैंतीस की लगती हो... लेकिन इस रोशनी में तो आप किसी अप्सरा से कम नहीं दिख रहीं।"
ज्योत्सना का पूरा बदन थरथरा रहा था। लज्जा और संकोच की परतें धीरे-धीरे पिघल रही थीं। माया ने अपनी कांति युक्त हथेलियों से माँ के कंधे से सरकते हुए रेशमी कपड़े को छुआ। जैसे-जैसे कपड़ा नीचे गिरा, ज्योत्सना की गोरी काया चांदनी में चमक उठी।
माया की नज़रें माँ के शरीर के हर उतार-चढ़ाव पर ठहर रही थीं। वह मंत्रमुग्ध होकर माँ के यौवन की प्रशंसा करने लगी। "माँ, यह ढलती उम्र नहीं, यह तो खिलता हुआ निखार है। आपकी सुडौल बनावट, यह कसाव... किसी पराए की नज़र इस पर पड़ जाती तो अनर्थ हो जाता। अच्छा हुआ कि यह सब सिर्फ मेरे लिए है।"
माया के हाथ अब रुक नहीं रहे थे। उसका स्पर्श कोमल था, पर उसमें एक अधिकार था। ज्योत्सना ने अपनी आँखें मूंद लीं और एक गहरी आह भरी। माया ने झुककर माँ के कानों में अपनी भावनाओं को शब्दों का रूप देना शुरू किया—वह हर अंग की सुंदरता को ऐसी उपमाओं से नवाज रही थी जो सीधे रूह को छू रही थीं। संकोच की दीवारें पूरी तरह ढह चुकी थीं।
ज्योत्सना ने भी अपनी बाहें माया के इर्द-गिर्द कस लीं। दो शरीर, एक ही जैसी सुंदरता और एक ही जैसा दर्द, अब एक-दूसरे की गर्मी में पिघलकर एक हो रहे थे। उस रात, माँ और बेटी के रिश्तों की पुरानी परिभाषाएँ मिट गईं और उनकी जगह एक ऐसे अहसास ने ले ली जो सिर्फ महसूस किया जा सकता था।
 

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माया की उंगलियां अब किसी कुशल कलाकार की तरह सक्रिय थीं। कमरे की मद्धम रोशनी और खिड़की से आती चांदनी ने ज्योत्सना की गोरी देह पर प्रकाश और परछाईं का एक अद्भुत खेल रच दिया था।
माया ने बहुत ही धीमे से, जैसे किसी कीमती विरासत को सहला रही हो, ज्योत्सना की चोली की गांठों को एक-एक कर ढीला करना शुरू किया। जैसे-जैसे कपड़ा सरका, ज्योत्सना के बदन की वह छुपी हुई कांति और सुडौल बनावट उजागर होने लगी।
"उफ्फ माँ..." माया की सांसें तेज हो गईं, उसकी आँखों में तृप्ति और विस्मय का मिला-जुला भाव था। "ये देह है या कोई संगमरमर की तराशी हुई मूरत? पचास साल की उम्र में भी यह उठान... यह कसाव... जैसे वक्त ठहर गया हो।"
ज्योत्सना का मस्तक पसीने की नन्ही बूंदों से चमक उठा था। उन्होंने अपना चेहरा तकिए में छुपा लिया, पर उनकी सांसों की बढ़ती रफ्तार बता रही थी कि वे इस समर्पण का पूरा आनंद ले रही हैं।
माया ने अपनी हथेली को माँ के उदर के उस हिस्से पर फेरा जो रेशम के हटते ही बेपर्दा हुआ था। "क्या देह पाई है आपने माँ... लोग बाहर की सुंदरता के पीछे भागते हैं, पर असली खजाना तो यहाँ घर के भीतर छिपा था। यह उठान, यह ढलान... किसी को भी दीवाना बना दे। आज मुझे खुद पर गर्व हो रहा है कि मैं आपकी बेटी हूँ और इस सौंदर्य की वारिस भी।"
माया के शब्द किसी मादक संगीत की तरह ज्योत्सना के कानों में रस घोल रहे थे। संकोच अब पूरी तरह से खत्म हो चुका था, उसकी जगह एक गहरी, आदिम प्यास ने ले ली थी। माँ का वह 'कांति' युक्त बदन अब माया की बाहों में पूरी तरह पिघलने को आतुर था। मर्यादा के सारे बांध टूट चुके थे, और कमरे की हवा उन दोनों के बीच की बढ़ती गर्मी से भारी हो गई थी।
 

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माया की नज़रों में इस समय सिर्फ और सिर्फ अपनी माँ के बदन का वह सम्मोहक आकर्षण था। जैसे-जैसे वह माँ की देह के रहस्यों को देख रही थी, उसकी प्यास और बढ़ती जा रही थी।
माया धीरे से नीचे की ओर झुकी। उसकी रेशमी ज़ुल्फ़ें ज्योत्सना के पेट पर बिखर गईं, जिससे ज्योत्सना के बदन में एक सिहरन दौड़ गई। जब माया ने झुककर माँ की गहरी और सुडौल नाभि को अपने होठों से छुआ, तो ज्योत्सना का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया। वह कोमल स्पर्श किसी बिजली के झटके जैसा था।
उधर ज्योत्सना के भीतर जैसे भावनाओं और बरसों से दबी हुई कामनाओं का एक सागर हिलोरे लेने लगा। एक ऐसी प्यास, जिसे उन्होंने समाज और मर्यादा के नाम पर पत्थर के नीचे दबा रखा था, वह आज पूरी शिद्दत से अंगड़ाई लेकर जाग उठी थी। शरीर का वह हिस्सा, जो अब तक वीरान था, वहां अब एक अजीब सी हलचल और नमी महसूस होने लगी।
जब माया का स्पर्श और भी गहरा हुआ, तो ज्योत्सना के हलक से एक दबी हुई सिसकारी निकली। उन्होंने बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठियों में कस कर भींच लिया।
"आह... माया!" ज्योत्सना की आवाज़ कांप रही थी, आँखों में एक नशा था और चेहरे पर लज्जा और सुख का अद्भुत संगम। उन्होंने तड़पकर माया का सिर अपने करीब खींच लिया और सिसकते हुए बोलीं, "मेरी जान लेगी क्या रे... ऐसा तो पहले कभी महसूस नहीं हुआ। तू क्या कर रही है मेरे साथ..."
माया की कांति युक्त आँखों में एक विजेता की चमक थी। उसने माँ के चेहरे की ओर देखा, जो इस समय पूरी तरह कामुकता के रंग में रंगा हुआ था। "माँ, यह तो बस शुरुआत है। इस सागर की लहरों को आज शांत नहीं होना है। आज हमें एक-दूसरे में पूरी तरह खो जाना है।"
उस रात कमरे का तापमान बढ़ता गया। दो शरीर, जो एक-दूसरे की खुशबू और स्पर्श से अब तक अनजान थे, अब उस 'अधूरी प्यास' को बुझाने के लिए एक-दूसरे में समा जाने को बेताब थे।
 

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माया के हाथों ने अब अंतिम बाधा को भी दूर करने का मन बना लिया था। उसने बहुत ही आहिस्ते से, जैसे किसी बेशकीमती तोहफे से रेशम की परत हटा रही हो, ज्योत्सना के पेटीकोट की डोर को ढीला किया। कपड़ा धीरे-धीरे सरक कर पैरों के पास ढेर हो गया और चांदनी की उस मद्धम रोशनी में वह 'खजाना' पूरी तरह बेपर्दा हो गया।
ज्योत्सना की गोरी काया का वह सबसे गुप्त हिस्सा किसी तराशे हुए हीरे की तरह चमक रहा था। वहां न कोई बाधा थी, न कोई बाल; वह बिल्कुल क्लीन शेव्ड और आईने की तरह साफ था, जैसे बरसों से किसी पवित्र अनुष्ठान की तरह इसकी देखभाल की गई हो। उस हिस्से की कोमलता और स्वच्छता देखकर माया की आँखें फटी की फटी रह गईं।
"उफ्फ माँ..." माया ने एक लंबी और गरम सांस छोड़ी, उसकी आँखों में तृप्ति की एक अजीब सी लहर दौड़ गई। उसने अपना चेहरा माँ के उस चमकते हुए हिस्से के करीब ले जाकर एक मीठा सा उलाहना दिया, "मेरी माँ को देखो... इस उम्र में भी इसे कैसे चमका के रखा है। कोई कह सकता है कि आप दो बच्चों की माँ हो? आपने तो मुझे सच में मार ही डाला आज।"
ज्योत्सना का चेहरा शर्म से लाल हो गया, उन्होंने अपने हाथों से अपनी आँखों को ढँक लिया। उनके शरीर का वह हिस्सा अब माया की गरम सांसों की छुअन से सिहर रहा था। माया ने अपनी उंगलियों के पोरों से उस रेशमी त्वचा को बहुत ही नज़ाकत से सहलाया।
"सच माँ, बाहरी दुनिया के मर्द तो इस खूबसूरती के लायक ही नहीं थे," माया ने फुसफुसाते हुए कहा। "यह तो किसी मन्दिर के गर्भगृह जैसा पवित्र और सुंदर है।"
ज्योत्सना के बदन में एक मीठा सा दर्द और उससे भी मीठी उमंग जाग उठी। सागर की वह अंगड़ाई अब उफान पर थी। माया का यह समर्पण और प्रशंसा माँ के भीतर के उस स्त्री-तत्व को जगा रहा था जो बरसों से सुप्तावस्था में था। उस रात उस कमरे में माँ और बेटी का रिश्ता एक ऐसे धरातल पर पहुँच गया जहाँ सिर्फ 'कांति', 'तृप्ति' और 'एकात्मकता' शेष थी।
उस रात की हवा अब पूरी तरह मादक हो चुकी थी। कमरे का सन्नाटा अब दोनों की तेज होती सांसों और धड़कनों के संगीत से भरा था। माया ने जब उस 'खजाने' को पूरी तरह बेपर्दा देखा, तो उसकी आंखों में तृप्ति की एक ऐसी लहर दौड़ी जिसने उसकी सारी हिचक मिटा दी।
माया ने अपना चेहरा धीरे-धीरे नीचे झुकाया। उसकी गरम सांसें जब ज्योत्सना की उस रेशमी और साफ त्वचा से टकराईं, तो ज्योत्सना का पूरा बदन कमान की तरह तन गया। माया ने अपनी जुबान से उस 'चमकते हुए हिस्से' की गहराई को बहुत ही आहिस्ते से छुआ। वह रसास्वादन किसी तपस्या की पूर्णता जैसा था।
"आह... माया!" ज्योत्सना के मुंह से एक लंबी सिसकारी निकली। उनके हाथ माया के बालों में फंस गए और उन्होंने उसे और भी करीब खींच लिया। "तू तो आज मेरी रूह तक को भिगो देगी..."
लेकिन ज्योत्सना भी अब केवल मूक दर्शक नहीं थीं। उनके भीतर का दबा हुआ सागर अब उफान मार रहा था। उन्होंने अपनी कांपती हुई हथेलियों से माया के रेशमी कुर्ते के बटन खोलना शुरू किए। जैसे-जैसे माया के अंग उजागर हुए, ज्योत्सना की आंखों में भी एक शिकारी जैसी चमक आ गई।
उन्होंने माया के एक उन्नत अंग को अपने हाथों में भरते हुए बहुत ही द्विअर्थी अंदाज़ में कहा, "कहती है कि मैं पैंतीस की लगती हूँ, पर अपनी तरफ तो देख... यह फल तो अभी पूरी तरह पक कर रस से लबालब भरा है। इसे तोड़ने वाला तो कोई भाग्यशाली ही होगा।"
माया ने भी मुस्कुराते हुए माँ की आँखों में झाँका, "तो फिर देर किस बात की माँ? जो चीज़ अपनी है, उसे चखने के लिए किसी और का इंतज़ार क्यों? आप बस अपना प्यार लुटाती रहिए।"
ज्योत्सना ने अपनी उंगलियों से माया के अंगों को सहलाते हुए शरारत भरी आवाज़ में कहा, "सच में माया, तूने जो आज प्यास जगाई है, वो अब बिना पूरा रस लिए शांत नहीं होगी। देख तो सही, इस आंगन में कितनी नमी फैल गई है..."
दोनों एक-दूसरे के अंगों की बनावट और उनकी कोमलता का बखान करते हुए उस प्रेम के महासागर में डूबती चली गईं। मर्यादा की सारी हदें अब उस कमरे की देहलीज के बाहर छूट गई थीं। उस रात माँ और बेटी ने एक-दूसरे के सौंदर्य को न केवल देखा, बल्कि उसे जी भरकर महसूस किया।
कमरे की हवा अब पूरी तरह भारी और उत्तेजक हो चुकी थी। सन्नाटे को चीरती हुई दोनों की सांसें एक-दूसरे में उलझ रही थीं। माया ने अपनी तैयारी पहले ही मुकम्मल कर ली थी। उसने बिस्तर के पास रखा वह लंबा और चिकना खीरा उठाया, जो पहले से ही सुगंधित तेल में पूरी तरह सराबोर होकर चमक रहा था। तेल की वह चिकनाहट चांदनी की रोशनी में और भी मादक लग रही थी।
माया ने उस तेल से सनी हुई वस्तु का एक सिरा अपनी प्यासी देह के केंद्र में टिकाया और दूसरा सिरा ज्योत्सना की उस 'क्लीन शेव्ड' और चमकती हुई चूत के मुहाने पर रख दिया। जैसे ही वह स्पर्श हुआ, ज्योत्सना के बदन में एक बिजली सी दौड़ गई।
"आह... यह क्या कर रही है तू..." ज्योत्सना की आवाज़ में एक अजीब सी तड़प थी, जिसमें मनाही कम और चाहत ज्यादा थी।
माया ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी आँखों से अपनी माँ को शांत रहने का इशारा किया। उसने ढेर सारा तेल अपनी हथेलियों में लिया और ज्योत्सना के उन्नत बोबों पर मलना शुरू किया। तेल के मर्दन से वे और भी सख्त और कांति युक्त होकर चमकने लगे। ज्योत्सना ने भी वही तेल लेकर माया के अंगों का मर्दन शुरू किया। अब दोनों के बदन तेल की चिकनाहट से एक-दूसरे पर फिसल रहे थे।
जैसे ही माया ने उस वस्तु को दोनों के केंद्रों के बीच पिरोया और अपनी देह को हरकत दी, कमरे में सिसकारियों का एक तूफान उठ खड़ा हुआ। वह जुड़ाव किसी जादुई बंधन जैसा था—एक ही वस्तु से दोनों की प्यास एक साथ बुझने और बढ़ने लगी थी।
वह घमासान कोई साधारण मिलन नहीं था। अगले चार घंटों तक उस कमरे ने वह दृश्य देखा जो मर्यादाओं की हर दीवार को ढहा चुका था। तेल से सने हुए शरीर, एक-दूसरे में गुंथी हुई बाहें और वह निरंतर होती हरकत... सन्नाटे में केवल मांस के आपस में टकराने की और सिसकारियों की आवाज़ें गूंज रही थीं। ज्योत्सना का वह 'सागर' अब पूरी तरह उफान पर था और माया का 'जुनून' उसे पार करने की कोशिश कर रहा था।
पसीने और तेल की बूंदें उनके अंगों से रिसकर चादर को भिगो रही थीं। चार घंटों के उस महायज्ञ में माँ और बेटी ने एक-दूसरे के शरीर के हर कोने को, हर आह को और हर प्यास को अपना बना लिया। जब अंततः वह तूफान थमा, तो दोनों बेदम होकर एक-दूसरे की बाहों में ढह गईं। उनकी देह शांत थी, पर रूहें एक-दूसरे में विलीन हो चुकी थीं।
 

mastmast123

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"भोर की तृप्ति और अंगों का गुणगान"
भोर की पहली किरण जब खिड़की के भारी पर्दों को चीरकर कमरे में दाखिल हुई, तो बिस्तर का नज़ारा किसी युद्ध के बाद की शांति जैसा था। चार घंटों के उस उन्मादी घमासान और तेल से सराबोर जिस्मों की रगड़ ने हवा में एक सोंधी और मादक गंध छोड़ दी थी। सूरज अभी गहरी नींद में था, पर यहाँ माँ-बेटी के बीच एक नया सवेरा हो चुका था।
माया ने अपनी आँखें खोलीं और सबसे पहले अपनी माँ ज्योत्सना की ओर देखा। ज्योत्सना के चेहरे पर वह दिव्य कांति थी जो केवल पूर्ण तृप्ति के बाद आती है।
माया ने करवट ली और बड़े प्यार से माँ के उन बोबों को सहलाया जो रात भर की मलाई और तेल के मर्दन से अभी भी सुर्ख और भारी लग रहे थे।
"माँ," माया ने फुसफुसाते हुए कहा, "सुबह की इस रोशनी में आपके ये बोबे और भी कांति युक्त लग रहे हैं। रात भर जो मैंने इनका मर्दन किया है, उससे इनका उभार किसी कुंवारी कन्या जैसा हो गया है। देखिए तो सही, कितनी जान आ गई है इनमें।"
ज्योत्सना ने लजाकर अपनी पलकें झुका लीं, पर इस बार वह संकोच नहीं था, बल्कि एक स्वीकारोक्ति थी। उन्होंने माया का हाथ पकड़कर अपनी उस जांघ के करीब ले गईं जहाँ रात भर की 'सेवा' का असर सबसे गहरा था।
"सच कह रही है माया..." ज्योत्सना ने धीमी आवाज़ में कहा, उनकी आवाज़ में अभी भी रात की खुमारी थी। "तूने रात भर मेरी चूत की जो सेवा की है, जो रस तूने वहां से निचोड़ा है... उससे ऐसा लग रहा है जैसे उस सूखे सागर में फिर से लहरें उठने लगी हैं। मेरी चूत अभी भी उस सुख से थरथरा रही है जो तूने उस खीरे और अपनी जुबान से दिया है।"
माया मुस्कुराई और झुककर माँ के माथे को चूम लिया। "माँ, आपकी इस चूत की सेवा करना मेरे लिए किसी इबादत से कम नहीं था। इसकी सफ़ाई और इसकी सुंदरता ने तो मेरा मन ही मोह लिया। अब आपको किसी पराए की ज़रूरत कभी नहीं पड़ेगी।"
ज्योत्सना ने भी माया के अंगों को निहारा और कहा, "और तेरे ये बोबे... इनका जो स्वाद मैंने चखा है, वह तो किसी अमृत से कम नहीं था। सच में, हम दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हैं।"
दोनों ने एक-दूसरे को बाहों में भर लिया। रात भर की उस 'देह-पूजा' ने उनके बीच के फासले मिटा दिए थे। अब वे केवल माँ-बेटी नहीं थीं, बल्कि एक-दूसरे के जिस्म और रूह की राज़दार बन चुकी थीं।
 
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