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पात्र परिचय
* सूरज (भाई): 23 वर्ष, आकर्षक और बलिष्ठ व्यक्तित्व। चार लाख महीने की आय होने के बाद भी स्वभाव में गजब की विनम्रता और कोमलता है। उसकी आँखों में चमक से ज्यादा अपनी बहन के लिए चिंता और स्नेह झलकता है। वह आर्थिक रूप से मजबूत है, पर दिल से अभी भी वही छोटा भाई है जो अपनी दीदी की एक मुस्कान के लिए कुछ भी कर सकता है।
* माया (बड़ी बहन): 26 वर्ष, अपूर्व सुंदरी। उसके चेहरे पर एक सात्विक और दिव्य 'कांति' (चमक) है जो दुःख की घड़ी में भी फीकी नहीं पड़ी है। उसकी गरिमा और सौम्यता उसे भीड़ से अलग बनाती है। ससुराल का घर उजड़ने का दर्द उसकी आँखों में एक गहराई दे गया है।
* ज्योत्सना (माँ): नाम के अनुरूप ही शांत और शीतल स्वभाव वाली। वह परिवार की वह धुरी हैं जो पिता के जाने के बाद भी बच्चों को संस्कार और प्रेम से बांधे हुए हैं।
प्रथम अध्याय: "ममता की छाँव और स्नेह का मरहम"
शहर के शोर से दूर, एक भव्य लेकिन शांत बंगले के बरामदे में सूरज टहल रहा था। सूरज, जिसकी उम्र अभी महज़ 23 साल थी, अपनी मेहनत और काबिलियत से आज ऊँचाइयों पर था। महीने के चार लाख रुपये उसके बैंक खाते में तो आते थे, पर उसके व्यवहार में रत्ती भर भी अहंकार नहीं था। उसके मजबूत कंधे आज थोड़े झुके हुए थे, क्योंकि आज उसकी बड़ी बहन, उसकी 'माया दीदी' हमेशा के लिए वापस घर लौट रही थीं।
सफेद रंग की कार आकर रुकी। ज्योतिर्मय चेहरे वाली माया कार से उतरी। 26 साल की माया की कांति ऐसी थी कि ढलती शाम में भी उसका चेहरा दमक रहा था। वह घर की दहलीज पर आकर रुकी, उसकी आँखों में अपने उजड़े हुए संसार की नमी थी।
सूरज भागकर बाहर आया। उसने अपनी बहन का हाथ थाम लिया। उसकी पकड़ में कोई अधिकार नहीं, बल्कि एक कोमल सहानुभूति थी। उसने माया के सूटकेस को खुद उठाया और धीमी आवाज़ में कहा, "दीदी, आप वापस आ गईं... अब आपको कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है। यह घर, यह भाई और आपकी खुशियाँ—सब यहीं हैं।"
माया ने अपने छोटे भाई के बलिष्ठ हाथों को देखा, जो अब उसका सहारा बनने के लिए तैयार थे। उसने फीकी सी मुस्कान के साथ सूरज के सिर पर हाथ रखा।
अंदर से माँ ज्योत्सना निकलकर आईं। उनके चेहरे पर ममता का वैसा ही उजाला था जैसा नाम का अर्थ होता है। उन्होंने माया को गले से लगा लिया। घर के मंदिर में जलते दीपक की रोशनी माँ के चेहरे पर पड़ रही थी।
"सूरज, अपनी दीदी के लिए वही पसंद का केसरिया दूध बनवा," ज्योत्सना जी ने कोमलता से कहा।
ड्राइंग रूम में बैठकर सूरज अपनी बहन के पैरों के पास जमीन पर बैठ गया। वह इतना धनवान होने के बावजूद अपनी जड़ों से जुड़ा था। "दीदी, जो हुआ उसे एक बुरा सपना समझकर भूल जाइए। मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब आपका है। मैं कल ही आपके नाम से एक नया बिजनेस सेटअप करवा दूंगा, ताकि आपकी वह चमक कभी फीकी न पड़े।"
माया की आँखों से आंसू छलक पड़े। उसे लगा कि भले ही एक घर उजड़ गया हो, पर इस भाई और माँ के निस्वार्थ प्रेम की छाँव में वह फिर से जी उठेगी। सूरज का कोमल हृदय अपनी बहन के हर आंसू को पोंछने के लिए व्याकुल था। वह दुखी था कि उसकी दीदी को इतना सहना पड़ा, पर संकल्पित था कि अब उनकी जिंदगी में खुशियों की कोई कमी नहीं रहने देगा।
रात के सन्नाटे में, ज्योत्सना जी ने मस्तक पर हल्दी का तिलक लगाते हुए अपने दोनों बच्चों को देखा। बाहर चांदनी खिली थी, और घर के अंदर स्नेह का एक ऐसा अध्याय शुरू हो रहा था जहाँ घावों को भरने के लिए सिर्फ प्यार और अपार समर्पण था।
* सूरज (भाई): 23 वर्ष, आकर्षक और बलिष्ठ व्यक्तित्व। चार लाख महीने की आय होने के बाद भी स्वभाव में गजब की विनम्रता और कोमलता है। उसकी आँखों में चमक से ज्यादा अपनी बहन के लिए चिंता और स्नेह झलकता है। वह आर्थिक रूप से मजबूत है, पर दिल से अभी भी वही छोटा भाई है जो अपनी दीदी की एक मुस्कान के लिए कुछ भी कर सकता है।
* माया (बड़ी बहन): 26 वर्ष, अपूर्व सुंदरी। उसके चेहरे पर एक सात्विक और दिव्य 'कांति' (चमक) है जो दुःख की घड़ी में भी फीकी नहीं पड़ी है। उसकी गरिमा और सौम्यता उसे भीड़ से अलग बनाती है। ससुराल का घर उजड़ने का दर्द उसकी आँखों में एक गहराई दे गया है।
* ज्योत्सना (माँ): नाम के अनुरूप ही शांत और शीतल स्वभाव वाली। वह परिवार की वह धुरी हैं जो पिता के जाने के बाद भी बच्चों को संस्कार और प्रेम से बांधे हुए हैं।
प्रथम अध्याय: "ममता की छाँव और स्नेह का मरहम"
शहर के शोर से दूर, एक भव्य लेकिन शांत बंगले के बरामदे में सूरज टहल रहा था। सूरज, जिसकी उम्र अभी महज़ 23 साल थी, अपनी मेहनत और काबिलियत से आज ऊँचाइयों पर था। महीने के चार लाख रुपये उसके बैंक खाते में तो आते थे, पर उसके व्यवहार में रत्ती भर भी अहंकार नहीं था। उसके मजबूत कंधे आज थोड़े झुके हुए थे, क्योंकि आज उसकी बड़ी बहन, उसकी 'माया दीदी' हमेशा के लिए वापस घर लौट रही थीं।
सफेद रंग की कार आकर रुकी। ज्योतिर्मय चेहरे वाली माया कार से उतरी। 26 साल की माया की कांति ऐसी थी कि ढलती शाम में भी उसका चेहरा दमक रहा था। वह घर की दहलीज पर आकर रुकी, उसकी आँखों में अपने उजड़े हुए संसार की नमी थी।
सूरज भागकर बाहर आया। उसने अपनी बहन का हाथ थाम लिया। उसकी पकड़ में कोई अधिकार नहीं, बल्कि एक कोमल सहानुभूति थी। उसने माया के सूटकेस को खुद उठाया और धीमी आवाज़ में कहा, "दीदी, आप वापस आ गईं... अब आपको कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है। यह घर, यह भाई और आपकी खुशियाँ—सब यहीं हैं।"
माया ने अपने छोटे भाई के बलिष्ठ हाथों को देखा, जो अब उसका सहारा बनने के लिए तैयार थे। उसने फीकी सी मुस्कान के साथ सूरज के सिर पर हाथ रखा।
अंदर से माँ ज्योत्सना निकलकर आईं। उनके चेहरे पर ममता का वैसा ही उजाला था जैसा नाम का अर्थ होता है। उन्होंने माया को गले से लगा लिया। घर के मंदिर में जलते दीपक की रोशनी माँ के चेहरे पर पड़ रही थी।
"सूरज, अपनी दीदी के लिए वही पसंद का केसरिया दूध बनवा," ज्योत्सना जी ने कोमलता से कहा।
ड्राइंग रूम में बैठकर सूरज अपनी बहन के पैरों के पास जमीन पर बैठ गया। वह इतना धनवान होने के बावजूद अपनी जड़ों से जुड़ा था। "दीदी, जो हुआ उसे एक बुरा सपना समझकर भूल जाइए। मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब आपका है। मैं कल ही आपके नाम से एक नया बिजनेस सेटअप करवा दूंगा, ताकि आपकी वह चमक कभी फीकी न पड़े।"
माया की आँखों से आंसू छलक पड़े। उसे लगा कि भले ही एक घर उजड़ गया हो, पर इस भाई और माँ के निस्वार्थ प्रेम की छाँव में वह फिर से जी उठेगी। सूरज का कोमल हृदय अपनी बहन के हर आंसू को पोंछने के लिए व्याकुल था। वह दुखी था कि उसकी दीदी को इतना सहना पड़ा, पर संकल्पित था कि अब उनकी जिंदगी में खुशियों की कोई कमी नहीं रहने देगा।
रात के सन्नाटे में, ज्योत्सना जी ने मस्तक पर हल्दी का तिलक लगाते हुए अपने दोनों बच्चों को देखा। बाहर चांदनी खिली थी, और घर के अंदर स्नेह का एक ऐसा अध्याय शुरू हो रहा था जहाँ घावों को भरने के लिए सिर्फ प्यार और अपार समर्पण था।