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#21
सौम्या के घर पहुँचने में रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे। सौम्या तो जाते ही बेड पर ढेर हो गई।
ढेर तो मैं भी हो चुकी थी, लेकिन दिमाग मे अभी तक घमासान चल रहा था।
जिन लोगों के सहारे मैं देविका और मेघना तक पहुँचना चाह रही थी, वे लोग एक एक करके दुनिया से विदा लेते जा रहे थे।
चंदन ने बताया था, की संध्या की मौत से तो खुद धीरज अपसेट था और वो देविका और मेघना को ढूंढने में लगा हुआ था।
इसका तो साफ मतलब यही निकलता था कि उन दोनों का धीरज के किसी भी ठिकाने पर मिलना नामुमकिन था। मैंने एक नजर सौम्या पर डाली, वो गहरी नींद के हवाले हो चुकी थी।
गुरु को कल सुबह थाने से बाहर निकालने के लिए तो मेरी थ्योरी पूरी तरह से तैयार थी, अगर खबरी वहां से संध्या के गांव वाले रोमेश नाम के आशिक का कोई सबूत भी लाने में कामयाब हो गया तो, ये सोने पर सुहागा हो सकता था।
लेकिन पिस्टल पर गुरु की उंगलियों के निशान के बारे में तो तस्वीर तभी साफ हो सकती थी, जब देविका और मेघना हमारे कब्जे में आ जाये।
सोचते सोचते घन्टा भर गुजर चुका था, लेकिन आगे के सारे रास्ते देविका पर जाकर खत्म हो रहे थे।
क्या देविका के घर की तलाशी में कोई सुराग मिल सकता था। मेरे ख्याल से जेल से आने के बाद देविका और मेघना जहाँ कहीं भी है, दोनो साथ साथ ही है।
अभी तक उन लोगों के पास धीरज बवानिया के मरने की खबर पहुंच चुकी होंगी। लेकिन इस वक़्त तो धीरज की मौत की खबर उनके लिए राहत भरी खबर होती।
ऐसे ही सोचते हुए मुझे कब नींद ने अपने पंजो में जकड़ लिया, मुझे इसका पता ही नही चला।
अगली सुबह मैं अकेली ही रोमेश के पास थाने आई थी। लेकिन आने से पहले मैं एसी पी शर्मा जी को सारे तथ्यों से अवगत करवाकर आई थी, और उन्होंने मुझ से रोहिणी थाने के एस एचओ माहेश्वरी साहब से बात करने का आश्वासन दिया था।
सौम्या ने राधा से बोलकर सुबह ही रोमेश का नाश्ता और लंच तैयार करवा दिया था। सौम्या को आज मैंने ही जिद करके उसके आफिस जाने के लिए मना लिया था।
खबरी आज सुबह ही जयपुर से वापिस आ चुका था, और उसने मुझे आते ही एक लिफाफा सौंपा था, जिनमे कुछ फ़ोटोग्राफ और कुछ लव लेटर थे, जो खबरी संध्या की किसी रिश्तेदार सहेली से ये बोलकर लाया था, की इससे संध्या के असली कातिल जल्दी ही पकड़े जायेगे।
खबरी को मैने सौम्या के आफिस में ही भेज दिया था, जहाँ उसने पूरे दिन आफिस का चपरासी बनकर आफिस में आने जाने वाले हर शख्स पर नजर रखनी थी।
मुझे आशंका थी कि सौम्या के आफिस जाने से देविका या मेघना में से कोई भी सौम्या से मिलने की कोशिश कर सकता था।
"बड़ा तहलका मचाया हुआ है तुमने, भगवान सिंह बता रहा था कि किसी गैंगस्टर के एनकाउंटर में तुम भी पुलिस कार्यवाही में साथ थी, ऐसा चमत्कार कैसे हो गया" रोमेश ने नाश्ता खत्म करने के बाद बात की शुरुआत की थी।
"वो एक लंबी कहानी है, वो थाने से बाहर चलकर बात करेगे, बस इतना समझ लो की सब शर्मा जी की मेहरबानी की वजह से हुआ है, और मैंने शर्मा जी को पूरी कहानी बता दी है कि तुम्हे कैसे साजिश का शिकार बनाया जा रहा हैं, और कौन लोग इसके पीछे हो सकते है, बाकी वो संध्या की डायरी में तुम्हारा जो नाम है, उसे भी हल कर लिया है" मैने गुरू की तरफ देखते हुए बोला।
तभी एक सिपाही ने कमरे में प्रवेश किया।
"तुम्हे साहब बुला रहे है अपने कमरे में" सिपाही ने गुरु की तरफ देखते हुए बोला।
सिपाही के बोलते ही मैं और गुरु, माहेश्वरी साहब के कमरे की ओर चल पड़े थे। कमरे में भगवान सिंह पहले से ही मौजूद था।
"शर्मा जी ने इस केस में कुछ नए तथ्यों के बारे में बताया है, उसको देखते हुए हम अभी तुम्हे हिरासत में नही ले रहे है, क्यो कि इसी केस में कल एक गैंगस्टर की संलिप्ता देखने को मिली है, जो तुम्हारी शिष्या रागिनी की मेहरबानी से ही पुलिस एनकाउंटर में मारा गया है, जिसकी वजह से आज पुलिस की भी काफी जय जयकार हो रही है, इस कारण से डिपार्टमेंट ने तय किया हैं कि इस केस की और गहराई से जांच करने के बाद ही हम किसी को अरेस्ट करे या पूछताछ के लिए हिरासत में ले" ये बोलकर माहेश्वरी साहब चुप हो गए।
"इसका मतलब बन्दा हाल फिलहाल खुद को आज़ाद समझे" मैंने हर्षित स्वर में बोला।
"हाँ अभी तो तुम आज़ाद ही हो रोमेश" इस बार भगवान सिंह ने बुझे हुए स्वर में कहा।
"ये लीजिये! इन्हे देखने के बाद आपकी वो संध्या की डायरी में रोमेश का नाम होने वाले तथ्य की भी हवा निकल जाएगी, संध्या के गांव में ही उसका एक आशिक था, इतेफाक से उसका नाम भी रोमेश ही था, जिसने भी संध्या के कत्ल की साजिश रची है, उसे संध्या के आशिक का नाम पहले से ही मालूम था, इसलिए उसने संध्या की डायरी भी पुलिस के लिये उसके कमरे में प्लांट कर दी, जबकि पुलिस को संध्या के कमरे से और कुछ भी नही मिला, आपके उन देवप्रिय साहब ने बहुत कामचलाऊ जांच करी है इस केस में" मैंने भगवान सिंह की ओर देखते हुए तंज भरे स्वर में कहा।
भगवान सिंह ने उस लिफाफे को अपने हाथ मे थाम लिया और उसके अंदर मौजूद फोटोग्राफ और लव लेटर को देखने लगा।
"अब इजाजत दे सरकार, आज रात तक क़ातिल को पकड़ने का वादा रागिनी ने किया हुआ है तो, उस वादे पर भी खरा उतरना है" इस बार गुरु ने माहेश्वरी साहब की तरफ अपना हाथ विदा लेने के अंदाज में बढ़ाते हुए बोला।
जिसे माहेश्वरी साहब ने तत्प्रता से थाम लिया था, फिर उसी अंदाज में भगवान सिंह से भी विदा लेकर हम थाने से बाहर आ गए।
"देविका और मेघना गायब है, सबसे पहले उन्हें ढूंढना है" मैने गुरु की तरफ देखते हुए बोला।
"सिर्फ देविका और मेघना ही गायब नही है, एक बन्दा और भी गायब है" गुरु ने कुछ सोचते हुए कहा।
"कौन" मेरे मुंह से बरबस ही निकला।
"देवप्रिय, मुझे वो कल से एक बार भी थाने में नही दिखा है, हमे उसे सिर्फ ये सोचकर नही छोड़ना है कि वो पुलिस वाला है, वो पुलिस की वर्दी में कोई गुंडा भी हो सकता है, जिनका काम ही रिश्वत ख़ाकर अपराधियो को बचाने का होता है"
गुरु ने देवप्रिय का नाम लेकर सिद्ध कर दिया था कि गुरु के दिमाग का कोई तोड़ नही है। मैंने मुरीद निग़ाहों से गुरु की ओर देखा।
"चलो पहले घर चलो, फ्रेश हो कर कुछ सोचते है कि आगे क्या करना है" ये बोलकर गुरु थाने की चारदीवारी से बाहर निकलकर एक रिक्शा वाले को आवाज लगा चुके थे।
थाने से पुलिस हिरासत से छूटने के बाद एक बार फिर से आपका ये सेवक कहानी के सूत्रधार की भूमिका में आ चुका था।
"गुरु क्यो न आज रात को ही देविका के फ्लैट की तलाशी ली जाए" रागिनी फ्लैट में कदम रखते ही बोली।
"ये आईडिया तो मेरे दिमाग में भी आया है, लेकिन पहले फ्रेश होकर कुछ खा पी लेते है, उसके बाद देविका और मेघना की भी खोज खबर लेते है" मैंने बाथरूम की ओर बढ़ते हुए बोला।
रागिनी बाहर पड़े हुए सोफे पर लेट चुकी थी। कन्या वास्तव में बहुत मेहनती और दिलेर थी।
मेरी किस्मत इस मामले में भगवान ने सोने की कलम से लिखी थी, की मेरे धंधे में मुझे रागिनी जैसी लड़की मेरी असिस्टेन्ट के रूप में मिली थी, और अब वो हर रोज अपने कैरियर में तरक्की की सीढिया चढ़ रही थी।
मैं पंद्रह मिनट के बाद मस्त नहाकर बाथरूम से बाहर आया तो रागिनी मोबाइल में खोई हुई थी।
"बॉयफ्रेंड के साथ इतनी चैटिंग मत किया कर, आंखे खराब हो जाएगी तो छोड़कर चला जाएगा" मैंने रागिनी से चक्कलस की।
"गुरु अभी तो ये चैटिंग की बीमारी मुझे लगी नही है, लेकिन जिस दिन लग गई न, तो तुम चश्मा लगाकर देखा करोगे की रागिनी अभी आफिस आई या नही" रागिनी किसी भी मामले में कम नही थी, न बहादुरी में और न बकलोली में।
"फिर मोबाइल में क्या ताका झांकी कर रही है, इतनी देर से" मैंने फिर से पूछा।
"शादी विवाह की साइट पर अपने लिए कोई स्मार्ट और डैशिंग सा बन्दा ढूंढ रही थी, मम्मी पापा, आजकल रोज शादी के लिए पीछे पड़े रहते है" रागिन मेरी ओर देखकर मुस्कराकर बोली।
"ये तेरे सामने खड़ा बन्दा तुझे स्मार्ट और डैशिंग नही लगता" मैंने कुपित स्वर में बोला।
"स्मार्ट से ज्यादा मुझे तो तुम बेवकूफ लगते हो गुरु, जरा सी सुंदर लड़की देखी नही की दिमाग को सीधा अपनी खोपड़ी से उतारकर अपने घुटने में ले आते हो, आपकी इसी बेवकूफी का नतीजा है कि आज आपको थाने से दो दिन के बाद छुट्टी मिली है, तो स्मार्टनेस के मामले में तो तुम्हारे नंबर जीरो हो गए गुरु, बाकी रही डैशिंग होने की बात तो बिना स्मार्टनेस के डैशिंग बन्दे का क्या मैं अचार डालूंगी" रागिनी ने घुमा फिरा कर मुझे रिजेक्ट ही करना था।
"कम्बख्तमारी, सीधा एक शब्द नही बोल सकती थी 'रिजेक्ट' इतना घुमा फिरा कर ढेर सारी बेइज्जती करने के बाद रिजेक्ट करना जरुरी था" मैंने चिढ़े हुए स्वर में कहा।
"गुरु मै कौन होती हूँ! तुम्हे रिजेक्ट करने वाली, तीन सौ करोड की मालकिन सौम्या तुम पर दिलो जान से फिदा है, लेकिन आप उसे घास ही नही डालते, एक क़ातिल हसीना है मेघना, बेचारी तुम पर बेइंतेहा फिदा थी, उसे ही तुमने जेल भिजवा दिया, पूरा वेट है तुम्हारा दिल्ली शहर की हसीनाओं में, ये तो मुझे पता है कि तुम मेरे साथ मजाक करते हो" रागिनी अब मरहम भरे स्वर में बोली।
"अब बकलोली ही करती रहेगी या कॉफी भी बनाकर लायेगी, उसके बाद देविका के घर पर भी चलना है" मैंने रागिनी की बातों पर विराम लगातें हुए बोला।
"अब गुरु इस बकलोली की शुरुआत तो आपने ही कि थी, तो खत्म करना तो मेरा फर्ज बनता है न" रागिनी एक क़ातिल मुस्कान मुझ पर डालकर किचन की ओर बढ़ गई। इस वक़्त कॉफी की मुझे बेइंतेहा तलब लगी हुई थी।
*
मैं अपनी गाड़ी को देविका के फ्लैट से पहले ही एक जगह पार्क कर चुका था।
इस वक़्त रात का एक बज चुका था। सेक्टर चौबीस की अंदरूनी सड़को पर इस वक़्त लोगो की आवाजाही बिल्कुल न के बराबर थी, कोई इक्का दुक्का गाड़ी ही हमे अभी तक नजर आई थी।
हम सीधा फ्लैट पर पहुंचे और मैंने मास्टर की से ताला खोला। समूचे फ्लैट में अंधकार छाया हुआ था। मैंने आहिस्ता से दरवाजे को फिर से बन्द किया, तब तक रागिनी दबे पांव अंदर की ओर बढ़ चुकी थी।
"दरवाजा मैंने ही खोला है, इसका मतलब अंदर कोई नही है" मैंने रागिनी को बोला।
लेकिन रागिनी ने मेरी बात को अनसुना किया और उन्ही दबे पांव से वो आगे बढ़ती रही।
मैं भी अब रागिनी का ही अनुसरण करने के लिए मजबूर था। तभी उस अंधेरे में मुझे ऐसा लगा कि अंदर कि तरफ कोई बन्दा चल रहा है।
मुझे अब रागिनी का दबे पाँव चलना समझ मे आया था। मैंने देखा कि रागिनी अपनी पिस्टल को भी अपने हाथ मे ले चुकी थी।
तभी उस अंधेरे में भी एक साये को मैंने मेन गेट की तरफ दौडतें हुए देखा, शायद हम उसके बिल्कुल
करीब पहुंच चुके थे, जिसका एहसास उसे हो चुका था, लेकिन मुझे नही हुआ था।
मैने और रागिनी ने एक साथ दरवाजे कि तरफ जम्प लगाई, वो साया अभी दरवाजे के हैंडल को घुमाने की कोशिश ही कर रहा था, की रागिनी उसके पैरों से लिपट चुकी थी।
जैसे ही रागिनी उसके पैरों में लिपटी, वैसे ही वो साया मुझ पर गिरा और मुझे लेकर जमीन पर गिर पड़ा, उसके लिपटे हुए बदन की लज्जत से मैं ये अंदाजा तो लगा चुका था कि मुझ से लिपटने वाली कोई लड़की थी।
तभी रागिनी ने अपनी मोबाइल की टॉर्च की रोशनी उस साये के ऊपर फेंकी। उस रोशनी में उस चेहरे पर नजर पड़ते ही रागिनी के मुंह से बरबस ही निकला था।
"तान्या तुम" वो कोई तान्या थी, जिसे मैं नही जानता था।
"कौन है ये" मैंने रागिनी की तरफ देखकर पूछा।
"तुम लाइट जलाओ गुरु, फिर इसके बारे में इसके मुंह से ही सुनवाती हूँ" रागिनी के बोलते ही मैंने दरवाजे के पास ही स्विच बोर्ड को तलाश किया, और लाइट जला दी।
तब तक रागिनी, तान्या को उठाकर सोफे पर बिठा चुकी थी।
“गुरु! एक बार अंदर चेक कर लो, की ये यहां क्या गुल खिलाने आई थी, तब तक मैं इस पर नजर रखती हूं" रागिनी ने मुझे बोला तो मैं अंदर के कमरे की तरफ बढ़ गया।
अंदर कुछ भी बिखरा हुआ नजर नही आया, सभी कुछ सही सलामत था, शायद ये लड़की हमसे कुछ समय पहले ही फ्लैट में घुसी थी।
अब या तो इस लड़की की किस्मत खराब थी या हम लोगो की किस्मत अच्छी थी कि, ये लड़की यहां से कुछ नही ले जा पाई थी।
मैं एक बार फिर से एक सरसरी नजर डालकर वापस रागिनी के पास आ गया।
"ये अभी अपने काम को शायद शुरू नही कर पाई थी, तभी हम लोग आ गए, और ये भागने की कोशिश करने लगी थी" मैंने रागिनी से बोला।
"किस फिराक में आई थी यहाँ तुम तान्या" रागिनी ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
"जिस फिराक में तुम लोग आए हो, मुझे पक्का यकीन है कि देविका ने ही गौरव की जान ली है" तान्या ने बिफरे हुए स्वर में कहा।
"तुम्हारा गौरव से क्या लेना देना है" मैंने तान्या से पूछा।
"गौरव इसका बॉयफ्रेंड था" जवाब रागिनी ने दिया था।
"लेकिन देविका तो उसे अपना बॉयफ्रेंड बता रही थी" मैंने तान्या की ओर देखते हुए बोला।
"वो कुछ दिनों के लिए हमारी रूममेट थी, गौरव तब भी मेरा ही बॉयफ्रेंड था, फिर मैंने उसे गौरव की कंपनी में नौकरी दिलवा दी थी, तो कमीनी ने खुद गौरव को अपने जाल में फंसा लिया था, और उसके पैसे पर अय्यासी करने लगी थी" इस बार तान्या ने अपने, देविका और गौरव के बारे में मुझे बताया।
"तुम तान्या तक कैसे पहुँची" मेरे इस वक़्त इतने सवाल पूछने की एक ही वजह थी, की रागिनी ने अभी तक तान्या तक पहुंचने की कहानी नही बताई थी।
"संध्या तान्या की ही रूममेट थी, संध्या के रूम पर जब मैं अपनी इन्वेस्टिगेशन के लिए पहुंची थी तो, वहाँ मुझे तान्या मिली थी, तान्या ने ही मुझे धीरज बवानिया के बारे में बताया था, की वो संध्या का बॉयफ्रेंड था, उसके बाद सारी कड़ियाँ आपस मे जुड़ती चली गई, तभी मैं सौम्या की जान भी बचा पाई थी" रागिनी ने मुझे बताया।
जारी रहेगा_____
सौम्या के घर पहुँचने में रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे। सौम्या तो जाते ही बेड पर ढेर हो गई।
ढेर तो मैं भी हो चुकी थी, लेकिन दिमाग मे अभी तक घमासान चल रहा था।
जिन लोगों के सहारे मैं देविका और मेघना तक पहुँचना चाह रही थी, वे लोग एक एक करके दुनिया से विदा लेते जा रहे थे।
चंदन ने बताया था, की संध्या की मौत से तो खुद धीरज अपसेट था और वो देविका और मेघना को ढूंढने में लगा हुआ था।
इसका तो साफ मतलब यही निकलता था कि उन दोनों का धीरज के किसी भी ठिकाने पर मिलना नामुमकिन था। मैंने एक नजर सौम्या पर डाली, वो गहरी नींद के हवाले हो चुकी थी।
गुरु को कल सुबह थाने से बाहर निकालने के लिए तो मेरी थ्योरी पूरी तरह से तैयार थी, अगर खबरी वहां से संध्या के गांव वाले रोमेश नाम के आशिक का कोई सबूत भी लाने में कामयाब हो गया तो, ये सोने पर सुहागा हो सकता था।
लेकिन पिस्टल पर गुरु की उंगलियों के निशान के बारे में तो तस्वीर तभी साफ हो सकती थी, जब देविका और मेघना हमारे कब्जे में आ जाये।
सोचते सोचते घन्टा भर गुजर चुका था, लेकिन आगे के सारे रास्ते देविका पर जाकर खत्म हो रहे थे।
क्या देविका के घर की तलाशी में कोई सुराग मिल सकता था। मेरे ख्याल से जेल से आने के बाद देविका और मेघना जहाँ कहीं भी है, दोनो साथ साथ ही है।
अभी तक उन लोगों के पास धीरज बवानिया के मरने की खबर पहुंच चुकी होंगी। लेकिन इस वक़्त तो धीरज की मौत की खबर उनके लिए राहत भरी खबर होती।
ऐसे ही सोचते हुए मुझे कब नींद ने अपने पंजो में जकड़ लिया, मुझे इसका पता ही नही चला।
अगली सुबह मैं अकेली ही रोमेश के पास थाने आई थी। लेकिन आने से पहले मैं एसी पी शर्मा जी को सारे तथ्यों से अवगत करवाकर आई थी, और उन्होंने मुझ से रोहिणी थाने के एस एचओ माहेश्वरी साहब से बात करने का आश्वासन दिया था।
सौम्या ने राधा से बोलकर सुबह ही रोमेश का नाश्ता और लंच तैयार करवा दिया था। सौम्या को आज मैंने ही जिद करके उसके आफिस जाने के लिए मना लिया था।
खबरी आज सुबह ही जयपुर से वापिस आ चुका था, और उसने मुझे आते ही एक लिफाफा सौंपा था, जिनमे कुछ फ़ोटोग्राफ और कुछ लव लेटर थे, जो खबरी संध्या की किसी रिश्तेदार सहेली से ये बोलकर लाया था, की इससे संध्या के असली कातिल जल्दी ही पकड़े जायेगे।
खबरी को मैने सौम्या के आफिस में ही भेज दिया था, जहाँ उसने पूरे दिन आफिस का चपरासी बनकर आफिस में आने जाने वाले हर शख्स पर नजर रखनी थी।
मुझे आशंका थी कि सौम्या के आफिस जाने से देविका या मेघना में से कोई भी सौम्या से मिलने की कोशिश कर सकता था।
"बड़ा तहलका मचाया हुआ है तुमने, भगवान सिंह बता रहा था कि किसी गैंगस्टर के एनकाउंटर में तुम भी पुलिस कार्यवाही में साथ थी, ऐसा चमत्कार कैसे हो गया" रोमेश ने नाश्ता खत्म करने के बाद बात की शुरुआत की थी।
"वो एक लंबी कहानी है, वो थाने से बाहर चलकर बात करेगे, बस इतना समझ लो की सब शर्मा जी की मेहरबानी की वजह से हुआ है, और मैंने शर्मा जी को पूरी कहानी बता दी है कि तुम्हे कैसे साजिश का शिकार बनाया जा रहा हैं, और कौन लोग इसके पीछे हो सकते है, बाकी वो संध्या की डायरी में तुम्हारा जो नाम है, उसे भी हल कर लिया है" मैने गुरू की तरफ देखते हुए बोला।
तभी एक सिपाही ने कमरे में प्रवेश किया।
"तुम्हे साहब बुला रहे है अपने कमरे में" सिपाही ने गुरु की तरफ देखते हुए बोला।
सिपाही के बोलते ही मैं और गुरु, माहेश्वरी साहब के कमरे की ओर चल पड़े थे। कमरे में भगवान सिंह पहले से ही मौजूद था।
"शर्मा जी ने इस केस में कुछ नए तथ्यों के बारे में बताया है, उसको देखते हुए हम अभी तुम्हे हिरासत में नही ले रहे है, क्यो कि इसी केस में कल एक गैंगस्टर की संलिप्ता देखने को मिली है, जो तुम्हारी शिष्या रागिनी की मेहरबानी से ही पुलिस एनकाउंटर में मारा गया है, जिसकी वजह से आज पुलिस की भी काफी जय जयकार हो रही है, इस कारण से डिपार्टमेंट ने तय किया हैं कि इस केस की और गहराई से जांच करने के बाद ही हम किसी को अरेस्ट करे या पूछताछ के लिए हिरासत में ले" ये बोलकर माहेश्वरी साहब चुप हो गए।
"इसका मतलब बन्दा हाल फिलहाल खुद को आज़ाद समझे" मैंने हर्षित स्वर में बोला।
"हाँ अभी तो तुम आज़ाद ही हो रोमेश" इस बार भगवान सिंह ने बुझे हुए स्वर में कहा।
"ये लीजिये! इन्हे देखने के बाद आपकी वो संध्या की डायरी में रोमेश का नाम होने वाले तथ्य की भी हवा निकल जाएगी, संध्या के गांव में ही उसका एक आशिक था, इतेफाक से उसका नाम भी रोमेश ही था, जिसने भी संध्या के कत्ल की साजिश रची है, उसे संध्या के आशिक का नाम पहले से ही मालूम था, इसलिए उसने संध्या की डायरी भी पुलिस के लिये उसके कमरे में प्लांट कर दी, जबकि पुलिस को संध्या के कमरे से और कुछ भी नही मिला, आपके उन देवप्रिय साहब ने बहुत कामचलाऊ जांच करी है इस केस में" मैंने भगवान सिंह की ओर देखते हुए तंज भरे स्वर में कहा।
भगवान सिंह ने उस लिफाफे को अपने हाथ मे थाम लिया और उसके अंदर मौजूद फोटोग्राफ और लव लेटर को देखने लगा।
"अब इजाजत दे सरकार, आज रात तक क़ातिल को पकड़ने का वादा रागिनी ने किया हुआ है तो, उस वादे पर भी खरा उतरना है" इस बार गुरु ने माहेश्वरी साहब की तरफ अपना हाथ विदा लेने के अंदाज में बढ़ाते हुए बोला।
जिसे माहेश्वरी साहब ने तत्प्रता से थाम लिया था, फिर उसी अंदाज में भगवान सिंह से भी विदा लेकर हम थाने से बाहर आ गए।
"देविका और मेघना गायब है, सबसे पहले उन्हें ढूंढना है" मैने गुरु की तरफ देखते हुए बोला।
"सिर्फ देविका और मेघना ही गायब नही है, एक बन्दा और भी गायब है" गुरु ने कुछ सोचते हुए कहा।
"कौन" मेरे मुंह से बरबस ही निकला।
"देवप्रिय, मुझे वो कल से एक बार भी थाने में नही दिखा है, हमे उसे सिर्फ ये सोचकर नही छोड़ना है कि वो पुलिस वाला है, वो पुलिस की वर्दी में कोई गुंडा भी हो सकता है, जिनका काम ही रिश्वत ख़ाकर अपराधियो को बचाने का होता है"
गुरु ने देवप्रिय का नाम लेकर सिद्ध कर दिया था कि गुरु के दिमाग का कोई तोड़ नही है। मैंने मुरीद निग़ाहों से गुरु की ओर देखा।
"चलो पहले घर चलो, फ्रेश हो कर कुछ सोचते है कि आगे क्या करना है" ये बोलकर गुरु थाने की चारदीवारी से बाहर निकलकर एक रिक्शा वाले को आवाज लगा चुके थे।
थाने से पुलिस हिरासत से छूटने के बाद एक बार फिर से आपका ये सेवक कहानी के सूत्रधार की भूमिका में आ चुका था।
"गुरु क्यो न आज रात को ही देविका के फ्लैट की तलाशी ली जाए" रागिनी फ्लैट में कदम रखते ही बोली।
"ये आईडिया तो मेरे दिमाग में भी आया है, लेकिन पहले फ्रेश होकर कुछ खा पी लेते है, उसके बाद देविका और मेघना की भी खोज खबर लेते है" मैंने बाथरूम की ओर बढ़ते हुए बोला।
रागिनी बाहर पड़े हुए सोफे पर लेट चुकी थी। कन्या वास्तव में बहुत मेहनती और दिलेर थी।
मेरी किस्मत इस मामले में भगवान ने सोने की कलम से लिखी थी, की मेरे धंधे में मुझे रागिनी जैसी लड़की मेरी असिस्टेन्ट के रूप में मिली थी, और अब वो हर रोज अपने कैरियर में तरक्की की सीढिया चढ़ रही थी।
मैं पंद्रह मिनट के बाद मस्त नहाकर बाथरूम से बाहर आया तो रागिनी मोबाइल में खोई हुई थी।
"बॉयफ्रेंड के साथ इतनी चैटिंग मत किया कर, आंखे खराब हो जाएगी तो छोड़कर चला जाएगा" मैंने रागिनी से चक्कलस की।
"गुरु अभी तो ये चैटिंग की बीमारी मुझे लगी नही है, लेकिन जिस दिन लग गई न, तो तुम चश्मा लगाकर देखा करोगे की रागिनी अभी आफिस आई या नही" रागिनी किसी भी मामले में कम नही थी, न बहादुरी में और न बकलोली में।
"फिर मोबाइल में क्या ताका झांकी कर रही है, इतनी देर से" मैंने फिर से पूछा।
"शादी विवाह की साइट पर अपने लिए कोई स्मार्ट और डैशिंग सा बन्दा ढूंढ रही थी, मम्मी पापा, आजकल रोज शादी के लिए पीछे पड़े रहते है" रागिन मेरी ओर देखकर मुस्कराकर बोली।
"ये तेरे सामने खड़ा बन्दा तुझे स्मार्ट और डैशिंग नही लगता" मैंने कुपित स्वर में बोला।
"स्मार्ट से ज्यादा मुझे तो तुम बेवकूफ लगते हो गुरु, जरा सी सुंदर लड़की देखी नही की दिमाग को सीधा अपनी खोपड़ी से उतारकर अपने घुटने में ले आते हो, आपकी इसी बेवकूफी का नतीजा है कि आज आपको थाने से दो दिन के बाद छुट्टी मिली है, तो स्मार्टनेस के मामले में तो तुम्हारे नंबर जीरो हो गए गुरु, बाकी रही डैशिंग होने की बात तो बिना स्मार्टनेस के डैशिंग बन्दे का क्या मैं अचार डालूंगी" रागिनी ने घुमा फिरा कर मुझे रिजेक्ट ही करना था।
"कम्बख्तमारी, सीधा एक शब्द नही बोल सकती थी 'रिजेक्ट' इतना घुमा फिरा कर ढेर सारी बेइज्जती करने के बाद रिजेक्ट करना जरुरी था" मैंने चिढ़े हुए स्वर में कहा।
"गुरु मै कौन होती हूँ! तुम्हे रिजेक्ट करने वाली, तीन सौ करोड की मालकिन सौम्या तुम पर दिलो जान से फिदा है, लेकिन आप उसे घास ही नही डालते, एक क़ातिल हसीना है मेघना, बेचारी तुम पर बेइंतेहा फिदा थी, उसे ही तुमने जेल भिजवा दिया, पूरा वेट है तुम्हारा दिल्ली शहर की हसीनाओं में, ये तो मुझे पता है कि तुम मेरे साथ मजाक करते हो" रागिनी अब मरहम भरे स्वर में बोली।
"अब बकलोली ही करती रहेगी या कॉफी भी बनाकर लायेगी, उसके बाद देविका के घर पर भी चलना है" मैंने रागिनी की बातों पर विराम लगातें हुए बोला।
"अब गुरु इस बकलोली की शुरुआत तो आपने ही कि थी, तो खत्म करना तो मेरा फर्ज बनता है न" रागिनी एक क़ातिल मुस्कान मुझ पर डालकर किचन की ओर बढ़ गई। इस वक़्त कॉफी की मुझे बेइंतेहा तलब लगी हुई थी।
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मैं अपनी गाड़ी को देविका के फ्लैट से पहले ही एक जगह पार्क कर चुका था।
इस वक़्त रात का एक बज चुका था। सेक्टर चौबीस की अंदरूनी सड़को पर इस वक़्त लोगो की आवाजाही बिल्कुल न के बराबर थी, कोई इक्का दुक्का गाड़ी ही हमे अभी तक नजर आई थी।
हम सीधा फ्लैट पर पहुंचे और मैंने मास्टर की से ताला खोला। समूचे फ्लैट में अंधकार छाया हुआ था। मैंने आहिस्ता से दरवाजे को फिर से बन्द किया, तब तक रागिनी दबे पांव अंदर की ओर बढ़ चुकी थी।
"दरवाजा मैंने ही खोला है, इसका मतलब अंदर कोई नही है" मैंने रागिनी को बोला।
लेकिन रागिनी ने मेरी बात को अनसुना किया और उन्ही दबे पांव से वो आगे बढ़ती रही।
मैं भी अब रागिनी का ही अनुसरण करने के लिए मजबूर था। तभी उस अंधेरे में मुझे ऐसा लगा कि अंदर कि तरफ कोई बन्दा चल रहा है।
मुझे अब रागिनी का दबे पाँव चलना समझ मे आया था। मैंने देखा कि रागिनी अपनी पिस्टल को भी अपने हाथ मे ले चुकी थी।
तभी उस अंधेरे में भी एक साये को मैंने मेन गेट की तरफ दौडतें हुए देखा, शायद हम उसके बिल्कुल
करीब पहुंच चुके थे, जिसका एहसास उसे हो चुका था, लेकिन मुझे नही हुआ था।
मैने और रागिनी ने एक साथ दरवाजे कि तरफ जम्प लगाई, वो साया अभी दरवाजे के हैंडल को घुमाने की कोशिश ही कर रहा था, की रागिनी उसके पैरों से लिपट चुकी थी।
जैसे ही रागिनी उसके पैरों में लिपटी, वैसे ही वो साया मुझ पर गिरा और मुझे लेकर जमीन पर गिर पड़ा, उसके लिपटे हुए बदन की लज्जत से मैं ये अंदाजा तो लगा चुका था कि मुझ से लिपटने वाली कोई लड़की थी।
तभी रागिनी ने अपनी मोबाइल की टॉर्च की रोशनी उस साये के ऊपर फेंकी। उस रोशनी में उस चेहरे पर नजर पड़ते ही रागिनी के मुंह से बरबस ही निकला था।
"तान्या तुम" वो कोई तान्या थी, जिसे मैं नही जानता था।
"कौन है ये" मैंने रागिनी की तरफ देखकर पूछा।
"तुम लाइट जलाओ गुरु, फिर इसके बारे में इसके मुंह से ही सुनवाती हूँ" रागिनी के बोलते ही मैंने दरवाजे के पास ही स्विच बोर्ड को तलाश किया, और लाइट जला दी।
तब तक रागिनी, तान्या को उठाकर सोफे पर बिठा चुकी थी।
“गुरु! एक बार अंदर चेक कर लो, की ये यहां क्या गुल खिलाने आई थी, तब तक मैं इस पर नजर रखती हूं" रागिनी ने मुझे बोला तो मैं अंदर के कमरे की तरफ बढ़ गया।
अंदर कुछ भी बिखरा हुआ नजर नही आया, सभी कुछ सही सलामत था, शायद ये लड़की हमसे कुछ समय पहले ही फ्लैट में घुसी थी।
अब या तो इस लड़की की किस्मत खराब थी या हम लोगो की किस्मत अच्छी थी कि, ये लड़की यहां से कुछ नही ले जा पाई थी।
मैं एक बार फिर से एक सरसरी नजर डालकर वापस रागिनी के पास आ गया।
"ये अभी अपने काम को शायद शुरू नही कर पाई थी, तभी हम लोग आ गए, और ये भागने की कोशिश करने लगी थी" मैंने रागिनी से बोला।
"किस फिराक में आई थी यहाँ तुम तान्या" रागिनी ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
"जिस फिराक में तुम लोग आए हो, मुझे पक्का यकीन है कि देविका ने ही गौरव की जान ली है" तान्या ने बिफरे हुए स्वर में कहा।
"तुम्हारा गौरव से क्या लेना देना है" मैंने तान्या से पूछा।
"गौरव इसका बॉयफ्रेंड था" जवाब रागिनी ने दिया था।
"लेकिन देविका तो उसे अपना बॉयफ्रेंड बता रही थी" मैंने तान्या की ओर देखते हुए बोला।
"वो कुछ दिनों के लिए हमारी रूममेट थी, गौरव तब भी मेरा ही बॉयफ्रेंड था, फिर मैंने उसे गौरव की कंपनी में नौकरी दिलवा दी थी, तो कमीनी ने खुद गौरव को अपने जाल में फंसा लिया था, और उसके पैसे पर अय्यासी करने लगी थी" इस बार तान्या ने अपने, देविका और गौरव के बारे में मुझे बताया।
"तुम तान्या तक कैसे पहुँची" मेरे इस वक़्त इतने सवाल पूछने की एक ही वजह थी, की रागिनी ने अभी तक तान्या तक पहुंचने की कहानी नही बताई थी।
"संध्या तान्या की ही रूममेट थी, संध्या के रूम पर जब मैं अपनी इन्वेस्टिगेशन के लिए पहुंची थी तो, वहाँ मुझे तान्या मिली थी, तान्या ने ही मुझे धीरज बवानिया के बारे में बताया था, की वो संध्या का बॉयफ्रेंड था, उसके बाद सारी कड़ियाँ आपस मे जुड़ती चली गई, तभी मैं सौम्या की जान भी बचा पाई थी" रागिनी ने मुझे बताया।
जारी रहेगा_____
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