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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

Lovely Anand

Love is life
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आह ....तनी धीरे से ...दुखाता
(Exclysively for Xforum)
यह उपन्यास एक ग्रामीण युवती सुगना के जीवन के बारे में है जोअपने परिवार में पनप रहे कामुक संबंधों को रोकना तो दूर उसमें शामिल होती गई। नियति के रचे इस खेल में सुगना अपने परिवार में ही कामुक और अनुचित संबंधों को बढ़ावा देती रही, उसकी क्या मजबूरी थी? क्या उसके कदम अनुचित थे? क्या वह गलत थी? यह प्रश्न पाठक उपन्यास को पढ़कर ही बता सकते हैं। उपन्यास की शुरुआत में तत्कालीन पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए सेक्स को प्रधानता दी गई है जो समय के साथ न्यायोचित तरीके से कथानक की मांग के अनुसार दर्शाया गया है।

इस उपन्यास में इंसेस्ट एक संयोग है।
अनुक्रमणिका
भाग 126 (मध्यांतर)
भाग 127 भाग 128 भाग 129 भाग 130 भाग 131 भाग 132
भाग 133 भाग 134 भाग 135 भाग 136 भाग 137 भाग 138
भाग 139 भाग 140 भाग141 भाग 142 भाग 143 भाग 144 भाग 145 भाग 146 भाग 147 भाग 148 भाग 149 भाग 150 भाग 151 भाग 152 भाग 153 भाग 154 भाग 155 भाग 156 भाग 157 भाग 158 भाग 159 भाग 160 भाग 161भाग 162 भाग 163 भाग 164 भाग 165 भाग 166 भाग 167
 
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LustyArjuna

Member
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भाग 185


सूरज (भरी हुई आवाज़ में): "मौसी... आज मुझे स्वर्ग मिल गया। आप मेरी अप्सरा है आराध्या है आप मेरी इबादत हैं।"

सोनी की बाहें, जो अब तक रक्षात्मक तरीके से उसके वक्ष पर बँधी थीं, धीरे-धीरे ढीली पड़ने लगीं। सूरज के शरीर की गरमी और उसके आलिंगन की कशिश ने सोनी के भीतर की बची-खुची झिझक को पिघला दिया था। वह सूरज के कंधे पर अपना सिर टिकाकर एक लंबी और बेबस सांस छोड़ गई। उसे महसूस हुआ कि सूरज की उंगलियाँ अब उसके नीले ब्लाउज के पीछे लगे हुकों पर बड़ी नजाकत के साथ हरकत कर रही हैं।

सूरज और सोनी की तड़प बढ़ती जा रही थी और नियति घड़ी की सुइयों को रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी..

अब आगे..

उधर हवेली में सुगना सरयू सिंह की आदमकद तस्वीर के सामने खड़ी उनके मर्दाना चेहरे को देखे जा रही थी। सपनों में आकर उन्होंने सुगना को खुश रहने और उसे आत्मग्लानि से उभारने का जो महत्वपूर्ण कार्य किया था सुगना उसके लिए अपना आभार व्यक्त कर रही थी।

आत्मग्लानि से मुक्ति पाकर सुगना का व्यक्तित्व एक बार फिर खिल उठा था और अब वह इस चंचलता और शोखी के साथ खुशहाल मन से अपनी छोटी बहन सोनी को गर्भवती कराने के लिए हर जतन कर रही थी। नियति सुगना को खुश देखकर स्वयं खुश हो रही थी। जो स्वयं वासना से कई वर्षों से विमुख थी…वह अपनी छोटी बहन सोनी के तन बदन और अंतर्मन में कामुकता भर रही थी..

सुगना.ने आवाज लगाई…….मालती सोनी के कमरे में आ…

मालती की आवाज हाल से आई….आई मां

सुगना ने पैकेट से गहरे मैरून रंग की साटन (Satin) की चादर निकाली। उसने मालती से कहा, "इसे बिछा, और ध्यान रख कि एक भी सिलवट न रहे।"

मालती ने जब उस ठंडी और चिकनी चादर को पलंग पर फैलाया, तो उसकी उंगलियों में एक अजीब सी लहर दौड़ गई। वह चादर इतनी ज्यादा मुलायम और 'स्लिपरी' थी कि उसे छूते ही शरीर में सिहरन होने लगती थी। ये वो दौर था जब इस तरह के बोल्ड कलर्स और फैब्रिक्स रोमांस के नए प्रतीक बन रहे थे।

लाली पुत्री रीमा भी कमरे में आ चुकी थी। सुगना के निर्देश पर उसने मोगरे की लंबी लड़ियों को छत के पंखे से लेकर बेड के चारों कोनों तक इस तरह बांधा कि पलंग एक सफेद खुशबूदार पिंजरे जैसा दिखने लगा।


सुगना ने कमरे की मुख्य लाइटें बंद कर दीं और बेड के पीछे लगी लाल और वार्म-व्हाइट एलईडी लाइट्स जला दीं। हवा में 'जैस्मीन' वाले रूम फ्रेशनर की भारी खुशबू और जलती हुई खुशबूदार मोमबत्तियों का धुआं एक नशीला माहौल बना रहा था।

मालती जब तकियों के नीचे इत्र के फाहे छिपा रही थी, अ उसकी नज़र उस चिकनी चादर और मोगरे की लड़ियों पर थी। उसकी साँसें भारी होने लगीं। उसे याद आया वह पिछला हफ्ता, जब वह घर के पीछे वाले गोदाम में राजू (लाली का बड़ा पुत्र) के साथ थी। राजू का वह गठा हुआ शरीर, उसकी बेबाक छुअन और वह त्वरित संभोग... उन यादों ने मालती के शरीर के भीतर एक आग लगा दी।

उसने अपनी आँखें बंद कीं और उसे लगा जैसे उस सजे-धजे बिस्तर पर सोनी मौसी नहीं, बल्कि वह खुद लेटी है।

बनारस की उस हवेली की पुरानी दीवारों के बीच मालती एक आधुनिक विद्रोह की तरह थी। 5 फुट 6 इंच का सुडौल कद और उस पर चुस्त फिटिंग वाली जींस—मालती का व्यक्तित्व उस दौर की नई आज़ादी का प्रतीक था। जब वह अपनी टाइट जींस और फिटेड शर्ट या टी शर्ट पहनकर हवेली के आंगन से गुजरती, तो पुरानी पीढ़ी की सांसें थम जातीं।

सुगना ने कई बार उसे टोकने की कोशिश की थी। वह अक्सर कहती, "मालती, इतनी चुस्त जींस पहनकर पूरे घर में घूमना शोभा नहीं देता, कम से कम दुपट्टा ही ले लिया कर।" पर मालती बस एक फीकी मुस्कान के साथ अपनी मां की बात टाल देती। वह जानती थी कि उसकी जींस की कसावट उसके शरीर के हर उभार को, उसकी सुडौल जांघों और कूल्हों की ढलान को बड़ी बेबाकी से निखारती है, और उसे अपनी इस 'देहिक शक्ति' का पूरा अहसास था।

मालती वैसे भी बार डांसर बबीता और सुगना के धर्म पति रतन की पुत्री थी। उसने साज सज्जा और श्रृंगार तथा अपने बदन की नुमाइश अपनी मां से सीखी थी। यह तो वह बनारस में थी अन्यथा न जाने क्या-क्या गुल खिलाती।

धीरे-धीरे सुगना ने भी हार मान ली थी। वह समझ चुकी थी कि यह दशक उसकी बेटियों को बदल रहा है। हालांकि, जब घर में सोनू (उसका मामा) या विकास (मौसा जी) के आने की आहट होती, तो मालती के पहनावे में अचानक एक बनावटी शालीनता आ जाती। वह तुरंत अपनी वेस्टर्न शर्ट उतारकर एक लंबी कुर्ती डाल लेती, ताकि बड़ों की नज़रों में उसकी छवि एक 'मर्यादित' लड़की की बनी रहे।

मालती की इस आधुनिकता के पीछे एक बड़ा हाथ राजू का भी था। पिछले कुछ महीनों में उन दोनों के बीच की नजदीकियां जिस्मानी जुस्तजू में बदल चुकी थीं। राजू, जो मालती के इसी बेबाक अंदाज और जींस में दिखने वाले उसके निखरे हुए बदन पर लट्टू था, अक्सर उसे एकांत में पाने के बहाने ढूंढता । बनारस की तपती दोपहरों में जब हवेली के लोग सो रहे होते, मालती और राजू छत के उस कोने में मिलते जहाँ पुराने कबाड़ के पीछे छिपने की जगह थी। वहाँ, उन तंग कपड़ों के बीच राजू का हाथ जब मालती की कमर को भींचता, तो वह सिहर उठती।

कभी-कभी, जब रीमा गहरी नींद में होती या घर के काम में व्यस्त होती, मालती राजू को अपने कमरे में बुला लेती। लेकिन यह बहुत रिस्की था। साए की तरह मंडराती सुगना की मौजूदगी और रीमा के साथ कमरा साझा करने की मजबूरी ने उनके मिलन को हमेशा 'अधूरा' और 'जल्दबाज़ी' वाला बना दिया था।

आज जब मालती सोनी मौसी के उस मैरून साटन वाले बिस्तर को सजा रही थी, तो उसकी यादें राजू के साथ बिताए उन चंद 'रिस्की' पलों की ओर खिंची चली गईं। उसने सोचा— "वहाँ छत की तपती सीमेंट पर या अलमारी के पीछे खड़े-खड़े मिलने वाला सुख क्या सुख है? असली सुख तो इस तरह के बिस्तर पर है, जहाँ कोई डर न हो और जिस्म पूरी तरह आज़ाद हो।"

उसने बिस्तर के कोने को अपनी मुट्ठी में भींचा। उसकी जींस की बटन जैसे उसके पेट पर दबाव बना रही थी, जो उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रहा था। उसे लगा कि काश इस वक्त राजू यहाँ होता और वह अपनी जींस की ज़िप खोलकर उसे आमंत्रित कर पाती।

सुगना मालती को कुछ दिशा निर्देश दे रही थी पर मालती जैसे खुद में खोई हुई थी…

मालती का चेहरे पर वासना की लालिमा थी उसने महसूस किया कि उसकी जाँघों के बीच एक अजीब सी गर्मी और गीलापन उतर आया है। उसने अनजाने में ही अपने कुर्ते के ऊपर से अपनी जाँघ को ज़ोर से मसला। उसका रोम-रोम उस बिस्तर की कल्पना मात्र से झंकृत हो उठा था। वह इतनी उत्तेजित हो चुकी थी कि उसे सुगना की आवाज़ भी सुनाई नहीं दे रही थी।

सुगना ने दूर से अपनी बेटी को देखा, जो पसीने और उत्तेजना से सराबोर थी। उसे स्त्रियों की कामुकता का अंदाजा था उसने मालती के मन में चल रहे भावनाओं को पढ़ लिया और मालती को प्यार से झिड़कते हुए बोला

“ कहां खो गई जल्दी-जल्दी खत्म कर और भी बहुत सारे काम है ..

सुगना को इतना तो अंदाजा था की घर की लड़कियां बड़ी हो चुकी है और उनकी शारीरिक ज़रूरतें अब परवान चढ़ रही है पर उसे इस बात का इल्म नहीं था कि मालती बिना विवाह के भी वैवाहिक सुख लूट रही है।

रीमा साइड टेबल पर स्ट्रॉबेरी और चॉकलेट के टुकड़े सजा रही थी। उसने देखा कि उसकी बड़ी बहन मालती कैसे बेसुध होकर बिस्तर को निहार रही है।

रीमा: "दीदी! कहाँ खो गईं? देखो, माँ ने यह क्या रखा है?"

तभी लाली सुगना को खोजती हुई सोनी के कमरे में आ गई और सजा धजा बिस्तर देखकर सुगना के कान में बोली..

“लगता सोनिया के आज बढ़िया से पूजाई होखी”

तोरो मन करे लगल का? तोरो सजा दी का…सुगना ने अपनी आंखों को नचाते हुए कहा…सोनू के फोन क देत बानी…

हट पागल ….लाली ने पीछे हटते हुए कहा…

लाली इस विशेष अनुष्ठान के बारे में उतना ही जानती थी जितना सुगना ने बताया था। उसे यह नहीं पता था कि सुगना में एक अनूठा बदलाव आ रहा है और उसके जीवन में कामुकता एक बार फिर अपना स्थान तलाश रही है।

सोनी का कमरा अब एक 'इरोटिक सुइट' बन चुका था। पंखे की मंद गति से मोगरे की लड़ियाँ हिल रही थीं। कमरा अब उस मिलन के लिए चीख रहा था। मालती और रीमा जब कमरे से बाहर निकलीं, तो उनके भीतर की कामुकता जाग चुकी थी। विशेषकर मालती, जो अब बस उस पल के इंतज़ार में थी जब वह राजू से दोबारा मिल सके और इस 'साटन' वाली कल्पना को हकीकत में बदल सके।

इधर सुगना अपनी बेटियों के साथ सोनी की मिलन के लिए बिस्तर लगा रही थी उधर सुगना पुत्र सूरज सोनी का संतान सप्तमी का अनुष्ठान पूरा करने की तैयारी में था।

उधर रेडिएंट होटल के सूट में…

सूरज (भरी हुई आवाज़ में): "मौसी... आज मुझे स्वर्ग मिल गया। आप मेरी अप्सरा है आराध्या है आप मेरी इबादत हैं।"

सोनी की बाहें, जो अब तक रक्षात्मक तरीके से उसके वक्ष पर बँधी थीं, धीरे-धीरे ढीली पड़ने लगीं। सूरज के शरीर की गरमी और उसके आलिंगन की कशिश ने सोनी के भीतर की बची-खुची झिझक को पिघला दिया था। वह सूरज के कंधे पर अपना सिर टिकाकर एक लंबी और बेबस सांस छोड़ गई। उसे महसूस हुआ कि सूरज की उंगलियाँ अब उसके नीले ब्लाउज के पीछे लगे हुकों पर बड़ी नजाकत के साथ हरकत कर रही हैं।

सूरज और सोनी की तड़प बढ़ती जा रही थी और नियति घड़ी की सुइयों को रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी..

सोनी के भीतर एक पल को सामाजिक लोक-लाज की लहर उठी, पर सूरज ने जिस शिद्दत से उसे अपने सीने से चिपका रखा था, वहाँ से वापस लौटने का रास्ता बंद हो चुका था। सूरज ने एक-एक करके उन हुकों को आज़ाद किया। ब्लाउज की तंग बंदिशें जैसे ही ढीली हुईं, सोनी को अपने वक्ष पर उस भारीपन से मुक्ति महसूस हुई, लेकिन साथ ही एक नई उत्तेजना ने उसे घेर लिया।

कुछ ही पलों में, वह नीला रेशमी ब्लाउज और उसके भीतर का महीन आवरण (ब्रा) सोनी की मखमली त्वचा से फिसलते हुए नीचे जा गिरे। वे कालीन पर पड़ी उस महँगी बनारसी साड़ी और पेटीकोट के ढेर में जाकर मिल गए—उन वस्त्रों के साथ, जिन्होंने कुछ देर पहले तक सोनी के वक्ष और उसकी जांघों को एक मर्यादित आवरण दिया था।

अब सोनी के बदन पर केवल वह गहरे मरुन रंग की मेहंदी की बेलें थीं, जो उसके उभरे हुए वक्ष के चारों ओर लिपटी हुई किसी नागिन की तरह लग रही थीं। उसके वक्ष के अग्रभाग, जो ठंड और उत्तेजना से अब पूरी तरह कड़े हो चुके थे, सूरज के सामने अपनी पूरी प्राकृतिक गरिमा में थे। सुगना ने उन पर जो केसरिया लेप लगाया था, उसकी महक अब और भी तीखी होकर पूरे कमरे में फैल गई थी।

सोनी अपने शरीर से अलग हुए कपड़ों के बीचो-बीच खड़ी थी और उसके कपड़े उसके चारों तरफ एक लक्ष्मण रेखा खींचे हुए थे। सूरज समझदार था उसे पता था की मौसी के कपड़े खराब हो सकते हैं उसने सोनी का हाथ पकड़ा और उसे कपड़ों से बनी लक्ष्मण रेखा से बाहर आने का इशारा किया सोनी ने अपने पैर बढ़ाए और अपने कपड़ों के घेरे से बाहर आ गई।

अपनी नग्नता का एहसास कर सोनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। सूरज ने उसे एक बार फिर अपने आलिंगन में भर लिया। उसने महसूस किया कि सूरज के हाथ अब उसकी नग्न पीठ से होते हुए नीचे की ओर सरक रहे हैं। वह पूरी तरह से नियति और सूरज की भावनाओं के समक्ष समर्पित हो चुकी थी। उस सुइट की खामोशी में अब सिर्फ दो जिस्मों के आपस में रगड़ने की आवाज़ और उनकी भारी होती साँसें गूँज रही थीं। 'संतान सप्तमी' का वह व्रत, जो पति की लंबी उम्र और वंश की कामना के लिए था, इस एकांत कमरे में एक नई और वर्जित परिभाषा लिख रहा था।

सूरज का हर स्पर्श अब सोनी के लिए एक नई इबादत बन चुका था। उसकी मजबूत हथेलियाँ सोनी की रेशमी पीठ पर किसी कलाकार की तूलिका की तरह सरक रही थीं। जैसे-जैसे सूरज के हाथ नीचे की ओर बढ़े, सोनी का रोम-रोम एक अनजानी अग्नि में तपने लगा। सूरज की उंगलियों ने जब सोनी के सुडौल और भारी नितंबों की गोलाई को अपने घेरे में लिया, तो सोनी के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली सिसकी निकल गई।

सूरज की उंगलियाँ अब उन घुमावों और गहराइयों की थाह ले रही थीं, जहाँ तक आज से पहले केवल कल्पनाएँ ही पहुँची थीं। अचानक, भटकती हुई वे लंबी उंगलियाँ उस 'महोगनी की गांठ' तक जा पहुँचीं, जहाँ सुगना ने वह दिव्य कमल का फूल बनाया था। जैसे ही सूरज के पोरों ने उस नाजुक और मखमली दहलीज पर दस्तक दी, सोनी का पूरा अस्तित्व कांप उठा।

सोनी की 'मुनिया' इस स्पर्श की जैसे सदियों से प्रतीक्षा कर रही थी। वह पूरी तरह काम-रस में सराबोर थी, मानो अपने साथी के स्वागत में खुशी के आंसू बहा रही हो। वह गीलापन, वह मेहंदी की खुशबू और सूरज की उंगलियों का वह जादुई दबाव—सब मिलकर सोनी के भीतर एक ऐसा ज्वार उठा रहे थे जिसे रोकना अब उसके वश में नहीं था।

सोनी के सुर्ख होठों से एक धीमी और थरथराती आवाज़ निकली, "अह्ह... सूरज...तनी…….!"

उसने अपनी गर्दन पीछे की ओर झुका दी और उसकी आँखें मुँद गईं। सूरज की उंगलियाँ जब उस रेशमी दरार के भीतर अपनी जगह बनाने लगीं, तो सोनी को लगा जैसे उसके शरीर के भीतर हजारों बिजलियाँ एक साथ कौंध गई हों। वह 'काम-रस' जो अब तक केवल एक मद्धम धारा था, अब सैलाब बनकर बहने लगा था, जिसने सूरज की उंगलियों को पूरी तरह भिगो दिया था।

मर्यादा की आखिरी कड़ियाँ अब पूरी तरह टूट चुकी थीं। उस आलीशान कमरे की खामोशी में केवल सोनी की भारी होती सांसें और सूरज की उंगलियों की वह सतरंगी हलचल गूँज रही थी। सोनी अब केवल सूरज की मौसी नहीं थी, वह उस पल में केवल एक स्त्री थी जो अपने प्रेमी के स्पर्श में खुद को पूरी तरह विसर्जित कर देना चाहती थी। सूरज ने उसे और भी कसकर अपने आलिंगन में भर लिया, जैसे वह उस नग्न और सजी-धजी काया को अपने भीतर ही समा लेना चाहता हो।


सोनी का नग्न और तराशा हुआ बदन, जिस पर रची लाल मेहंदी की बेलें किसी रहस्यमयी नक्शे की तरह चमक रही थीं, सूरज के कपड़ों की खुरदरी छुअन से बेचैन हो उठा था। वह कोमल रेशम और फूलों की खुशबू से सजी स्त्री, अब सूरज के कपड़ों के उस अवरोध को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।

सोनी के भीतर जैसे कोई आदिम शक्ति जाग गई थी। उसने बिना कुछ सोचे, यंत्रवत अपनी कांपती हुई उंगलियाँ सूरज के शर्ट के बटन पर टिका दीं। वह यह क्यों कर रही थी? इसका जवाब शायद उसके पास भी नहीं था, पर उसकी आँखों में छाई गहरी धुंध बता रही थी कि वह इस वक्त केवल एक बेबस स्त्री थी, जो अपने सामने खड़े उस पौरुष को पूरी तरह नग्न और करीब देखना चाहती थी जिसने उसे अब से कुछ देर पहले कार में जागृत किया था।

सूरज ने जैसे ही सोनी की उंगलियों की उस बेचैनी को महसूस किया, उसकी आँखों में एक विजयी चमक कौंध गई। उसने अपनी मौसी के इरादों को भांप लिया और बड़े सम्मान के साथ उन्हें अपने आलिंगन से थोड़ा ढीला किया।

सूरज ने एक गहरी साँस ली और अपनी बेल्ट के बकल को एक झटके में खोला। अभी सोनी की उंगलियाँ उसके शर्ट के ऊपरी बटनों से जूझ ही रही थीं कि सूरज ने अपनी पैंट का बटन खोल दिया। रेशमी और भारी बनारसी साड़ी के ढेर के ऊपर ही सूरज की पैंट भी ठीक उसी तरह फिसलकर गिर गई, जैसे कुछ देर पहले सोनी का पेटीकोट गिरा था।

अब दोनों के बीच कपड़ों की वह अंतिम दीवार भी ढह चुकी थी। मद्धम रोशनी में सूरज का सुगठित और तना हुआ बदन सोनी की नज़रों के सामने था। सोनी की उंगलियाँ अब सूरज की नग्न छाती को छू रही थीं, और उसका अपना नग्न वक्ष सूरज की धड़कनों के बेहद करीब था। उसके बने हुए निप्पल सूरज के सीने को छू रहे थे जैसे वह सूरज का ध्यान खींच रहे हो।

कमरे की वह ठंडक अब जैसे दहकते हुए अंगारों में बदल गई थी। मर्यादा का नामो-निशान मिट चुका था; वहां केवल दो जिस्म थे जो एक-दूसरे की खुशबू और ताप में पूरी तरह विलीन हो जाने को बेताब थे। सूरज ने आगे बढ़कर सोनी की कमर पर हाथ रखा और उसे फिर से अपनी ओर खींच लिया, जहाँ अब दोनों की त्वचा के बीच कोई पर्दा नहीं बचा था।

रात के 9:00 बज चुके थे। कमरे की मद्धम रोशनी और जिस्मों की महक के बीच समय जैसे ठहर गया था, लेकिन घड़ी की सुइयों ने सूरज को हकीकत की याद दिलाई। टन …टन… एक के बाद एक घड़ी की मधुर धुन सूरज और सोनी को रोकने की कोशिश कर रही थी और उन्हें समय का ध्यान दिला रही थी। सूरज ने सोनी के दहकते बदन को अपने करीब महसूस करते हुए उसके कान के पास झुककर हौले से फुसफुसाया, "मौसी... रात के नौ बज गए हैं। माँ घर पर परेशान हो रही होगी। एक बार उन्हें खबर कर देनी चाहिए कि ट्रेन लेट है, वरना वह अनहोनी की चिंता में डूब जाएगी।"

वासना में लिपटे युवक का ध्यान भटकना असामान्य सा लगता है पर वह सूरज था सरयू सिंह का पुत्र जिसे न सिर्फ अपनी जिम्मेदारी का एहसास था अपितु वह अपनी मां का सदैव आदर और सम्मान करता था।

हकीकत के इस अहसास ने सोनी को एक झटके में उस काल्पनिक लोक से बाहर खींच लिया। वह सूरज के आलिंगन से अलग हुई, पर उसके नग्न बदन पर अब भी उत्तेजना की सुर्खी छाई थी। सूरज के कहने पर उसने साइड टेबल से फोन उठाया और घर का फोन लगाया।

सोनी अब पूरी तरह नग्न अवस्था में मखमली बिस्तर पर पेट के बल लेट गई। इस मुद्रा में उसके शरीर के ढलान और उभार किसी नक्काशीदार पहाड़ की वादियों जैसे लग रहे थे। उसकी पीठ से नीचे उतरती वह सुडौल कमर और उसके बाद शुरू होने वाले उसके नितंबों का विशाल और भारी उभार, जिस पर नीले ब्लाउज से अलग हुई गोरी त्वचा और लाल मेहंदी की बेलें साफ दिख रही थीं, सूरज को पागल कर देने के लिए काफी था। सूरज बिस्तर के किनारे खड़ा, अपनी नग्नता में डूबा हुआ, अपना हाथ अपने तने हुए अंग पर फेर रहा था। उसकी नज़रें सोनी की उन दो फांकों के बीच अटकी थीं, जहाँ सुगना का बनाया वह 'कमल' जांघों के बीच से झांक रहा था और अब भी अपनी खुशबू बिखेर रहा था।

फोन पर सुगना की आवाज़ आते ही सोनी ने खुद को संयत किया।

सोनी: "दीदी... हाँ, हम रेडिएंट होटल में हैं। बनारस के पास मालगाड़ी पटरी से उतर गई है, इसलिए विकास जी की ट्रेन अब रात 10:30 से पहले नहीं आएगी। स्टेशन पर बहुत भीड़ थी, इसलिए सूरज मुझे यहाँ ले आया।"

फोन के दूसरी तरफ सुगना ने एक शरारती हंसी बिखेरी। उसे अपनी छोटी बहन की आवाज़ में छिपी वह भारीपन और थकावट महसूस हो रही थी, जिसका कारण वह बखूबी समझती थी।

होटल के उस आलीशान सुइट में खामोशी इतनी गहरी थी कि फोन के ईयरपीस से छनकर आती सुगना की हर बात सूरज के कानों में उतर रही थी जिसका इलम सोनी को नहीं था। सोनी बिस्तर पर पेट के बल लेटी थी, उसके सुडौल और भारी नितंब हवा में किसी संगमरमर की पहाड़ी की तरह उभरे हुए थे।

सोनी और सुगना बाते करने लगे सुगना सोनी का मन बहलाने के लिए बातें करने लगी उसके अनुसार सोनी को तो समय ही काटना था। नग्नता की इस अवस्था में, फोन पर अपनी बड़ी बहन की कामुक बातें सुनते हुए उसके शरीर में रह-रहकर सिहरन दौड़ जाती थी।

सुगना (फोन पर): "क्यों रे सोनी, वहाँ सुइट के मखमली बिस्तरों की ठंडक तेरी जाँघों की आग बुझा पा रही है या नहीं? देख, मैंने तेरी 'मुनिया' पर जो कमल खिलाया है, उसे कुम्हलाने मत देना। विकास जब वहाँ पहुँचे, तो उसे वह जगह सूखी नहीं, बल्कि रजरस से लबालब मिलनी चाहिए।"

सुगना की इन बेबाक बातों को सुनकर सोनी का चेहरा शर्म से सुर्ख हो गया। उसने अपनी नज़रें झुका लीं, जहाँ सूरज बिस्तर के ठीक बगल में खड़ा था। सूरज का सुगठित बदन पूरी तरह नग्न था और उसका उत्तेजित पौरुष किसी तने हुए तीर की तरह सीधा खड़ा था । सूरज सोनी की आँखों के ठीक सामने अपने लंड पर अपना हाथ फेर रहा था। सोनी को अंदाजा नहीं था कि सूरज अपनी माँ की बातें सुन रहा था।

सोनी (कांपती आवाज़ में): "दीदी... आप भी न... क्या-क्या बोल रही हैं। मैं... मैं बस आराम कर रही हूँ।"

सुगना: (खिलखिलाते हुए) "आराम? अरी पगली, आज की रात आराम के लिए नहीं, आहुति के लिए है। तू बस अपनी उस 'देह-वेदी' को सहेज कर रख। सुना है रेडिएंट होटल के कमरों में बड़े-बड़े आईने होते हैं। ज़रा उठकर देख तो सही, जो चित्रकारी मैंने तेरी कमर और जाँघों के जोड़ पर की है, वह इस वक्त कितनी प्यासी लग रही होगी। अपनी उंगलियों से ज़रा उस कमल को छूकर देख, क्या वह गीला हो चुका है?"

सुगना के इस 'निर्देश' ने जैसे आग में घी का काम किया। सोनी ने फोन कान से सटाए हुए ही अपनी एक टांग थोड़ी ऊपर की ओर मोड़ी। इस हरकत से उसके नितंबों की वह गहरी दरार और भी साफ उजागर हो गई, जहाँ रची मेहंदी की खुशबू अब पसीने और काम-रस के साथ मिलकर और भी मादक हो गई थी।

सूरज ने देखा कि उसकी माँ की बातें सुनकर सोनी की साँसें तेज़ हो गई हैं और उसके वक्ष बिस्तर के गद्दे पर रगड़ खा रहे हैं। वह समझ गया कि सोनी अनजाने में ही अपना एक पैर आगे कर उस नितंबों के बीच की दरार को उजागर कर उसे वह मौका दे रही है जिसका वह भूखा था। वह सोनी के पीछे आ गया।

सुगना: "सोनी, याद रखना, आज संतान सप्तमी है। तेरा रोम-रोम पुकारना चाहिए। जब तक तेरी कोख की मिट्टी गीली नहीं होगी, तब तक बीज कैसे अंकुरित होगा? अपनी उस 'दहलीज' को बार-बार सहलाती रह, ताकि विकास के आने तक वह पूरी तरह से 'पिघल' चुकी हो।"

सोनी ने एक गहरी आह भरी। सूरज अब और इंतज़ार नहीं कर सका। वह धीरे से घुटनों के बल बिस्तर पर चढ़ा और सोनी के उन भारी नितंबों के ठीक पीछे अपनी जगह बनाई। उसने अपनी माँ की आवाज़ सुनते हुए ही अपना हाथ आगे बढ़ाया और सोनी की जाँघों के उस जोड़ को छुआ, जिसके बारे में सुगना अभी बात कर रही थी।

सोनी सिहर उठी, पर उसने फोन नहीं काटा। सुगना की कामुक सलाहें और सूरज का साक्षात स्पर्श—दोनों ने मिलकर सोनी को मदहोशी की उस पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया जहाँ मर्यादा का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। सूरज की उंगलियाँ अब उस रजरस से भीगे 'कमल' को सहला रही थीं, जबकि फोन पर सुगना लगातार उस 'वेदी' को सजाने और तैयार रखने की प्रेरणा दे रही थी।

सोनी ने फोन कसकर पकड़ लिया और दबी हुई सिसकी में बोली, "हाँ दीदी... सब... सब तैयार है... जैसा आपने कहा था... वैसा ही हो रहा है।"

सुगना.. ध्यान रखना मेहंदी की सजावट खराब नहीं होनी चाहिए..

सूरज ने सोनी की पीठ पर एक छोटा सा दंश दिया, और सुगना की हँसी फोन पर गूँजती रही, मानो नियति खुद इस वर्जित मिलन पर अपनी मुहर लगा रही हो। सूरज और सोनी अब सुगना की आवाज़ के साथ-साथ एक ऐसे भँवर में डूब रहे थे जहाँ समय और रिश्ते, दोनों धुंधले पड़ चुके थे।

सुगना की इन कामुक बातों को सुनकर सोनी की आँखें बंद हो गई और उसके चेहरे पर हया की एक नई परत चढ़ गई। वह बिस्तर की चादर को अपनी उंगलियों में भींच रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि सूरज की ललचाई नज़रें उसके नितंबों के उस संवेदनशील हिस्से को जैसे चीर रही हैं।

सोनी ने कांपती आवाज़ में कहा, "जी दीदी... मैं... मैं ध्यान रखूँगी।"

सूरज कहां है..? सुगना ने पूछा…

सोनी क्या उत्तर देती है झूठ बोलना लाजमी था उसने कहा…नीचे कुछ खाने गया है..

सोनी की बात सुनकर सूरज ने अपना मुंह नीचे कर सोनी के नितंबों के पास लाया और अपने दांतों से सोनी के नितंबों को पकड़ने की नाकाम कोशिश की जैसे वह उसे खा जाना चाहता हो ।


सोनी ने एक गहरी सांस ली। सूरज अब और इंतज़ार करने के मूड में नहीं था। सोनी के मन में सुगना की बातों ने जैसे आग में घी का काम किया था। तभी सूरज ने अपना हाथ अपने लंड से हटाया और सोनी के उन भारी नितंबों के बीच अपनी उंगलियां फिर से टिका दीं, जहाँ सुगना ने 'मुनिया' को तैयार रखने की सलाह दी थी।

सोनी सुगना से अभी भी इधर-उधर की बातें कर रही थी उधर सूरज तरस रहा था। पर सोनी के नितंबों से खुलकर खेल रहा था कभी वह अपने दोनों हाथ से नितंबों को फैलाता और उनके बीच छुपे खजाने को खोजने की कोशिश करता परंतु सोनी तुरंत ही अपने नितंबों को सिकुड़ कर अपनी गांड को और अंदर घुसा लेती सोनी के नितंब तुरंत तनाव में आ जाते सूरज समझ जाता सूरज के दोबारा प्रयास करने पर सोनी ने अपनी गर्दन घुमाई और सूरज की तरफ देखा…

नजरों ने नजरों की भाषा समझ ली सूरज रुक गया पर उसने सोनी को फोन रखने का इशारा कर दिया बर्दाश्त की सीमा अब पार हो चुकी थी…सोनी ने बात समाप्त की


फोन कटते ही सूरज सोनी से सट गया।

सूरज के लंड का वह भारी और गर्म स्पर्श जैसे ही सोनी के नितंबों पर पड़ा, उसके पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई। वह समझ गई कि अब सूरज को और अधिक देर तक रोकना नामुमकिन है। हकीकत और अपनी वासना के बीच झूलती सोनी ने एक झटके में करवट बदली और पीठ के बल आ गई।

शेष अगले भाग में..
Atyant kamuk Update Lovely bhai 🙌

Tadpa rhe ho readers ko......milan ko aur jyada kamuk or exiting bnane k liye...
 

Chalakmanus

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भाग 187
सूरज ने श्रद्धा और वासना के अद्भुत संगम के साथ अपना सिर झुकाया और सोनी की उस रसीली दहलीज पर अपने होंठ टिका दिए। सोनी ने अपना सिर पीछे की ओर पटक दिया और एक लंबी आह भरी। वह समझ चुकी थी कि आज की रात बनारस के इस सुइ़ट में जो इतिहास लिखा जाएगा, वह उसके और सूरज के बीच एक ऐसा गुप्त बंधन बना देगा जिसे दुनिया की कोई मर्यादा कभी तोड़ नहीं पाएगी।


अब उस कमरे में सिर्फ 'पूजन' था, 'पुजारी' था और सोनी की वह दहकती हुई देह और उसकी जांघों के बीच छुपी वह यज्ञ वेदी थी जो वीर्य आहुति की प्रतीक्षा में अपने अधर खोले उस चर्म दंड का इंतजार कर रही थी जिसने इस सृष्टि की रचना की थी…।

अब आगे..

होटल के उस आलीशान सुइट की मद्धम पीली रोशनी अब उस जुनून की गवाह बन रही थी, जिसने मर्यादा की हर आखिरी दीवार को ढहा दिया था। सूरज, जो अब तक संयम बरत रहा था, सोनी के बदन की उस तड़प और उसकी 'मुनिया' की रसीली पुकार को महसूस करते ही अपने होश खो बैठा। उसके भीतर का युवा पौरुष जो स्वयं सोनी ने जागृत किया था अब एक अनियंत्रित सैलाब बन चुका था और उसी पर न्योछावर होने को आतुर था।

सूरज ने सोनी की भारी जांघों को अपने कंधों पर टिका लिया, जिससे वह 'महोगनी की गांठ' और सुगना द्वारा बनाया गया वह 'कमल' पूरी तरह से उसके प्रहारों के लिए सामने उजागर हो गया। वह भूल गया कि उसके नीचे उसकी सम्माननीय मौसी है; उस क्षण उसे केवल वह कामुक प्रतिमा दिख रही थी जिसे विधाता ने आज की रात उसके लिए ही सजाया था।

जैसे ही उस 'चर्म दंड' का पहला स्पर्श उस रसीली दहलीज से हुआ, सोनी के पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई। उसने अपने हाथों से बिस्तर की मखमली चादर को इतनी जोर से जकड़ लिया कि उसकी उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए।

सूरज ने जल्दबाजी नहीं की। वह उस अहसास को एक-एक कतरे में पीना चाहता था। जैसे-जैसे वह इंच-दर-इंच उस 'मुनिया' की गहराइयों में उतरने लगा, सोनी का सिर पीछे की ओर लुढ़कता गया और उसके गले की नसें उभर आईं। वह 'महोगनी की गांठ' अब सूरज के प्रहारों के दबाव में अपने केंद्र में उस चर्म दंड के लिए जगह बना रही थी। कमरे की हवा में एक अजीब सी 'चिपचिपाहट' और गर्मी बढ़ गई थी, जो उस जुनून की तीव्रता को बयां कर रही थी।


जब सूरज ने एक अंतिम और निर्णायक दबाव के साथ खुद को सोनी के भीतर पूरी तरह समाहित कर लिया, तो सोनी के मुंह से एक लंबी, बेबस 'आह' निकली जो धीरे-धीरे एक सिसकारी में बदल गई। वह प्रवेश इतना गहरा था कि सोनी को लगा जैसे सूरज उसके रूह के किसी गुप्त हिस्से तक पहुँच गया हो। मिलन पूर्ण हो चुका था सूरज के लिंग में सोने के गर्भ को चूम लिया था।

'पूज्या' और 'पुजारी' एक हो चुके थे।

सोनी की आँखें आधी खुली और आधी बंद थीं, जिनमें अब केवल वासना नहीं, बल्कि एक असीम तृप्ति का भाव था। सूरज की देह का पसीना सोनी की नाभि पर गिरकर चमक रहा था। बनारस के उस बंद कमरे में अब मर्यादा का कोई नामोनिशान नहीं बचा था; वहां केवल दो देह थी जो एक-दूसरे में सिमटकर इतिहास का वह पन्ना लिख रही थीं जिसे 'गुप्त बंधन' कहा जाने वाला था और आने वाले समय में इस कहानी को एक अनोखा और अद्भुत पात्र मिलने जा रहा था।

सूरज ने धीरे पर गहरे धक्के लगाने शुरू किए। हर प्रहार के साथ सोनी का पूरा बदन बिस्तर पर उछल जाता। इसी उन्माद के बीच, सूरज की नजरें सोनी के उन भारी वक्षों पर टिकीं, जो हर धक्के के साथ बेतरतीब लहरों की तरह उछल रहे थे। अपनी उत्तेजना के चरम पर, सूरज ने झुककर सोनी की एक सुडौल चूची को अपने मुँह में भर लिया। वह उन्हें महज़ चूम नहीं रहा था, बल्कि पूरी प्यास और अधिकार के साथ उन्हें ज़ोर-ज़ोर से पीने लगा।

सोनी (सिसकते हुए): "अह्ह... सूरज... धीरे….... आह! तू तो... तू बच्चा नहीं है ... उह्ह धीरे…..!"

सोनी के वक्ष, जिन पर रची मेहंदी की बेलें अब पसीने से भीगकर चमक रही थीं, सूरज के मुँह और छाती के बीच पिस रहे थे। सूरज एक तरफ से अपनी कमर से प्रहार कर रहा था और दूसरी तरफ सोनी के वक्षों के अग्रभाग को अपने होंठों और दांतों के बीच दबाकर उनका सारा रस पी जाने को बेताब था। सुगना ने उन पर जो केसरिया लेप लगाया था, उसकी महक और स्वाद सूरज के पौरुष को और भी हिंसक बना रहा था।

जैसे-जैसे सूरज की रफ्तार बढ़ी और उसके चूसने की शिद्दत तेज़ हुई, सोनी की आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा। उसका रोम-रोम कांप उठा…

सूरज की देह से टपकता पसीना और सोनी के शरीर की वह दहकती गर्मी मिलकर एक ऐसी उमस पैदा कर रही थी, जो सूरज को और उकसा रही थी। सूरज के धक्के अब धीमे लेकिन और भी गहरे और मर्मभेदी हो गए थे। वह सोनी की आंखों में उतरकर उस तृप्ति को देखना चाहता था जिसे उसने खुद अपने हाथों से जगाया था।

सूरज की नजरें सोनी के उस चेहरे पर टिकी थीं जो अब लज्जा और तृप्ति के दोराहे पर था सोनी संभोग में लीन तो थी पर वह सूरज को खुलकर अपने मर्द की तरह स्वीकार करने में शायद अब भी हिचकिचा रही थी। सोनी अपनी पलके आधीबंद की सिर्फ उसे अद्भुत एहसास को महसूस कर रही थी पर उसके अधर मौन थे।उधर सूरज के मन में विचारों की एक तेज लहर दौड़ रही थी:

"यही वह देह है जिसे अब तक मैंने केवल सम्मान की नजरों से देखा था, जिसे छूना तो दूर, जिसके बारे में सोचना भी पाप लगता था। पर आज... आज इस यज्ञ की वेदी पर यह 'पूज्या' खुद अर्पण हो चुकी है। क्या यह वास्तव में वही मौसी है? या यह विधाता की रची वह कामुक प्रतिमा है जिसे सिर्फ मेरे लिए गढ़ा गया था? इसका एक-एक अंग, इसकी यह मखमली त्वचा और इसकी जांघों के बीच का वह मंदिर... अब सब मेरा है। मैं पुजारी हूँ, और आज इस मंदिर का अभिषेक मैं अपने पौरुष से करूँगा।"

उसके मन में एक अजीब सी 'बेशर्मी' घर कर गई थी। वह चाहता था कि सोनी सिर्फ इस सुख को महसूस ही न करे, बल्कि अपनी जुबान से इस 'अधर्म' और 'आनंद' को स्वीकार भी करे। वह उसकी मर्यादा को पूरी तरह ढहा देना चाहता था।

सूरज ने अपने धक्कों की रफ्तार को थोड़ा धीमा किया, लेकिन गहराई और बढ़ा दी। उसने अपना पसीने से भीगा चेहरा सोनी के चेहरे के करीब लाया और अपनी हथेली से उसके तपते हुए गालों को थपथपाया।

सूरज (गहरी और मादक आवाज में): "मौसी... आँखें खोलिए। मुझे देखना है कि आपकी इन आँखों में मेरे लिए कितनी प्यास बची है।"

जब सोनी ने अपनी पलकें नहीं खोलीं, तो सूरज ने अपनी तर्जनी (index finger) से उसकी बंद पलकों को धीरे से ऊपर उठाया। उसकी आँखों में चढ़ी हुई मदहोशी को देखकर सूरज के होंठों पर एक विजयी मुस्कान आ गई।

सूरज: "मौसी... बोलिए ना, कैसा लग रहा है आपको? बोलिए, अच्छा लग रहा है ना? यह उत्तेजना आपकी ही दी हुई है और आपको ही अर्पित करना चाह रहा हूं….(यह कहते हुए सूरज ने अपना लंड एक बार सोनी की योनि से पूरी तरह बाहर निकाल लिया और लंड के सुपाड़े को उसके भागनासे पर रगड़ते हुए सोनी को एहसास दिला दिया कि वह क्या कहना चाह रहा है)

सोनी, जो अब तक केवल सिसकारियों में बात कर रही थी, इस सीधे और नग्न सवाल से कांप उठी। उसे शर्म आ रही थी कि वह अपने भांजे के सामने अपनी देह की भूख को कैसे स्वीकार करे, पर सूरज के बार-बार पूछने और उसके अंगों की निरंतर हलचल ने उसे मजबूर कर दिया।

सोनी (टूटती हुई आवाज में): "सूरज... तू बहुत बेशर्म हो गया है... आह! पर सच तो यह है कि... मुझे यह अहसास बहुत पसंद है। तेरे साथ किया जा रहा यह सहवास... यह रूह को तृप्त कर देने वाला है। तू अद्भुत है सूरज... तूने मुझे आज एक औरत होने का असली मतलब समझा दिया अब आजा मुझमें समा जा…।"

सोनी की इस स्वीकारोक्ति ने सूरज के भीतर जैसे बारूद का काम किया। अब उसके मन में कोई दुविधा नहीं थी। उसने झुककर सोनी के होंठों को इतनी शिद्दत से चूमा कि उनकी सांसें एक-दूसरे में उलझ गईं और लंड एक बार फिर गुलाबी गहराइयों में खो गया…

सूरज के धक्के अब धीमे पर और भी मर्मभेदी हो गए। वह सोनी की रसीली दहलीज के हर कोने को अपने पौरुष से नाप लेना चाहता था। कमरे की हवा में बढ़ती वह 'चिपचिपाहट' और केसर की महक अब उस 'गुप्त बंधन' की मुहर बन रही थी। सूरज के मन में अब बस एक ही लक्ष्य था—इस 'यज्ञ' को उस मुकाम तक ले जाना जहाँ से वापसी का कोई रास्ता न बचे और सोनी की कोख उस 'इतिहास' को संजोने के लिए तैयार हो जाए जिसे आज रात लिखा जा रहा था।

सोनी की हालत अब बेकाबू हो रही थी। सूरज के दांतों का वह वक्षों पर गहरा खिंचाव और नीचे से लगातार होता वह प्रहार उसके भीतर एक ऐसा तूफान ला चुका था जिसे रोक पाना अब उसके बस में नहीं था।

सोनी का पूरा बदन अब कांपने लगा था। उसकी जांघें, जो सूरज के कंधों पर टिकी थीं, अब थरथरा रही थीं। उसे महसूस हो रहा था कि उसके भीतर का वह सैलाब, वह रसीला ज्वार अब बांध तोड़ने को आतुर है। सुगना द्वारा बनाया गया वह 'कमल' अब पूरी तरह खिल चुका था और सूरज के हर प्रहार को सोख रहा था।

"सूरज... रुक मत... आअह्ह! मैं... मैं अब और नहीं सह सकती... कुछ हो रहा है... सूरज!" सोनी की आवाज में एक अजीब सी खनक और तड़प थी।

सूरज ने अपनी गति कम नहीं की। वह तो उस 'पुजारी' की भांति था जो जानता था कि उसकी 'वेदी' अब अपनी चरम आहुति के लिए तैयार है। उसने सोनी के होंठों को अपने दांतों के बीच दबा लिया ताकि उसकी चीखें कमरे की दीवारों के बाहर न जा सकें।

अचानक, सोनी का शरीर पूरी तरह से अकड़ गया। उसकी उंगलियां सूरज की पीठ के मांस में गहरे धंस गईं। वह 'मुनिया' की गहराइयों से उठते हुए उस सुखद झटके को महसूस कर रही थी जिसने उसे सुन्न कर दिया था। उसके भीतर से रसों का एक गर्म फव्वारा फूटा, जिसने उस 'चर्म दंड' को पूरी तरह भिगो दिया। सोनी का सिर पीछे लुढ़क गया, उसकी सांसें उखड़ गईं और वह झटके खाते हुए बिस्तर पर पस्त होने लगी।

सूरज ने उसे महसूस किया—उसकी उस रसीली दीवार का सिकुड़ना और उस तरल का प्रवाह। उसने खुद को अभी भी थामे रखा था। उसका अपना 'पौरुष' अभी भी तनकर खड़ा था, अडिग और शांत। वह थका नहीं था, बल्कि सोनी की उस तृप्ति को महसूस कर एक अजीब सी जीत का अनुभव कर रहा था।

सोनी अब पूरी तरह से निढाल होकर बिस्तर पर फैल गई थी, उसका बदन पसीने और उस चरम आनंद के अवशेषों से चमक रहा था। वह स्खलित होकर शांत हो चुकी थी, लेकिन सूरज की आंखों की वह 'वासना' अब भी शांत नहीं हुई थी; वह तो बस अभी उस मंदिर की पहली आरती का गवाह बना था।

सोनी का बदन ढीला पड़ गया और वह बेतहाशा हाँफने लगी। सूरज ने उसके वक्षों को मुक्त किया और उसके चेहरे के पास अपनी भारी सांसें छोड़ने लगा। 'संतान सप्तमी' का वह अनुष्ठान अपने चरम को छू चुका था। सोनी ने अपनी आँखें खोलीं और सूरज को देखा—उसका पुजारी अब उसका स्वामी बन चुका था असीम तृप्ति के आनंद में सोनी की पलके फिर मूँद गईं।। उसे महसूस हुआ कि सुगना की दी हुई वह 'कामुक दीक्षा' आज पूरी तरह से सफल हो गई थी, और उसके वक्षों पर सूरज के दांतों के निशान उस वर्जित मिलन की अमिट मुहर बन चुके थे।

सूरज ने जब महसूस किया कि सोनी सुख के चरम को छूकर पूरी तरह निढाल हो चुकी है, तो उसने बड़ी शालीनता से खुद पर काबू पाया। वह अभी स्खलित नहीं हुआ था, पर सोनी की हालत देखकर उसने अपना लिंग बाहर निकाल लिया।

सोनी को लगा जैसे किसी ने उसके हृदय से उसका कलेजा निकाल लिया हो पर वह अर्ध चेतन अवस्था में थी।


सोनी की साँसें अब भी उखड़ी हुई थीं और उसका शरीर स्खलन के बाद की उस मीठी सुस्ती में डूबा हुआ था। सूरज बिस्तर के किनारे बैठ गया और कुछ पलों के लिए सोनी को उस सुकून में रहने दिया।

सरयू सिंह के पुत्र सूरज में गजब का संयम था। उसने अपनी सांसों को नियंत्रित किया और सोनी को चैतन्यता का इंतजार करने लगा…

कमरे में छाई खामोशी और ठंडी ए.सी. की हवा ने धीरे-धीरे सोनी की चेतना को वापस लौटाया। जब उसकी आँखों से मदहोशी की धुंध छँटी, तो उसने देखा कि सूरज पसीने से लथपथ पास ही बैठा था। सोनी के पैर के पंजे उसकी गोद में थे उसके तने हुए लंड से टकरा रहे थे। सोनी को जब इसका एहसाह हुआ उसने अपनी आंखें खोलीं उसकी नज़र सूरज के उस अंग पर पड़ी जो अब भी पूरी तरह तना हुआ और अपनी मंज़िल का इंतज़ार कर रहा था।

सोनी अपने पैर पीछे खींचे उसे अपराध बोध हो रहा था कि जिस अद्भुत लिंग में उसे तृप्त किया था वह उसे अपने पैरों से छू रही थी…

क्या हुआ मौसी…सूरज ने सोनी की जांघों पर हाथ फिराने हुए कहा..

कुछ नहीं…सोनी उठकर बैठ गई..और सूरज के माथे को चूम लिया…सोनी का ध्यान अपनी मुनिया पर गया उसे महसूस हो गया कि अबतक सूरज का स्खलन नहीं हुआ है…

सोनी को अचानक 'संतान सप्तमी' के उस गूढ़ रहस्य का स्मरण हुआ जो सुगना ने उसे समझाया था। यह अनुष्ठान तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक कि 'बीज' का अर्पण उस पवित्र वेदी पर न हो जाए। उसने महसूस किया कि सूरज ने उसकी संतुष्टि के लिए अपने वेग को रोककर रखा है, पर इस कारण यह धार्मिक और दैवीय अनुष्ठान अभी अधूरा है।

सोनी ने एक गहरी साँस ली और अपनी मुनिया पर हाथ फेरते हुए उन पर रची उस 'मेहंदी' और रिस रहे 'काम-रस' के मिश्रण को देखा। और फिर सूरज की ओर मुखातिब हुई।

सोनी (धीमी और भर्राई हुई आवाज़ में): "सूरज... तू रुक क्यों गया? अभी यह यज्ञ पूरा नहीं हुआ है। सुगना दीदी की मन्नत और इस रात का महत्व तभी सिद्ध होगा जब तू अपनी पूरी आहुति इस वेदी में देगा। मुझे निढाल देखकर तूने खुद को रोक लिया, पर मेरी देह अब भी तेरे उस 'बीज' की प्रतीक्षा कर रही है जिसके बिना यह संतान सप्तमी का व्रत अधूरा रह जाएगा।"

सोनी ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर सूरज के लंड को थाम लिया और उसे अपनी हथेलियां में भरकर प्यार करने लगी जैसे वह उसे असीम सुख देने के लिए अपनी कृतज्ञता जाहिर कर रही हो। सोनी को उसे अद्भुत लंड पर इतना प्यार आया कि उसके मन में उसे चूमना की इच्छा जागृत हुई परंतु सूरज के लंड पर होंठ लगाने का मतलब सोनी जानती थी…


उसने सूरज की हथेली को पकड़ कर अपनी मुनिया की तरफ ले गई और उसे स्पर्श कराते हुए बोली

“आज यह तेरे तेज को अपने भीतर धारण करने के लिए तरस रही है…तूने मुझे अद्भुत सुख दिया है अब मुझे पूर्णता का एहसास करा दे मेरी कोख भर दे …. मुझे मां बना दे…”

इसी दौरान सोनी ने अनजाने में ही सूरज के अंगूठे को सहला दिया और सूरज के लंड में अचानक एक तीव्र उत्तेजना हुई और उसका आकार कुछ और बढ़ गया…

उसकी आँखों में अब केवल वासना भर चुकी थी , सूरज ने जब अपनी मौसी के संकल्प और समर्पण को देखा, तो उसका संयम फिर से जवाब दे गया और वह उस अधूरी पूजा को पूर्णता तक ले जाने के लिए तैयार हो गया।

उसने सोनी को एक बार फिर बिस्तर पर लिटा दिया.. और अपने लंड को सोने की चुदी हुई लिसलिसी बुर पर रखकर सोनी की चूचियों को सहलाते हुए नीचे एक जोर का धक्का दिया सोनी की चीख निकल गई…सोनी को अब अफसोस हो रहा था उसने आखिर वह अंगूठा क्यों सहलाया…

होटल के उस सुइट में अब कामवासना का तूफान अपने चरम पर था। सूरज, जो अब तक बातों से सोनी के मन को टटोल रहा था, अपनी कामोत्तेजना के अंतिम वेग को रोक नहीं पाया। उसने सोनी की कमर को अपनी मजबूत पकड़ में जकड़ लिया वापस अपने लिंग को उसी जन्नत में उतार दिया और बेतहाशा, तीव्र धक्के लगाने शुरू किए।

सूरज अब सोनी को पूरी निर्ममता से चोद रहा था। उसे तने हुए विशाल लंड के लिए सोनी की बुर एक कमसिन लड़की की भांति प्रतीत हो रही थी और वह विशाल लंड उसे चीरता हुआ अपनी शक्ति का एहसास कर रहा था। सोनी का रोम रोम कांप रहा था। पर जाने विधाता ने योनि में न जाने सृजन की कैसी शक्ति दी है वह धीरे-धीरे सूरज के विशाल लंड को भी आत्मसात कर चुकी थी और अब सोनी एक बार फिर आनंद की सीढ़ियां चढ़ रही थी।

वहीं दूसरी ओर सुगना के मन में बेचैनी का एक नया बवंडर उठ रहा था। सुगना, जिसने इस पूरी रात की पटकथा अपनी रूह फूंककर लिखी थी, वह बनारस के अपने घर की देहली पर पलक-पावड़े बिछाए विकास का इंतज़ार कर रही थी।

उसके मन में बस एक ही छवि थी—कि विकास समय पर पहुँचेगा और उसकी छोटी बहन सोनी के उस 'मृग-छौने' जैसे बदन में अपने वंश का बीज रोपित करेगा। सुगना ने सोनी के बदन पर जो कामुक रंगरेलियां बनाई थी उसे उसका बेटा खराब कर रहा था। सुगना को क्या पता था कि कुदरत ने उसकी प्रार्थनाओं को सुनने का एक ऐसा रास्ता निकाला है, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

जैसे-जैसे घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ रही थीं और आधी रात का समय नज़दीक आ रहा था, सुगना की धड़कनें तेज़ हो रही थीं। वह बार-बार खिड़की से बाहर झांकती और फिर ठाकुर जी की मूरत के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती।

"हे ईश्वर, आज की रात का एक-एक पल ठहर जाए। यह समय रुक जाए जब तक विकास सोनी के पास न पहुँच जाए। मेरी मेहनत, मेरी मन्नत और सोनी का वह सोलह श्रृंगार निष्फल नहीं जाना चाहिए। आज की रात उस वेदी को उसका पुजारी मिलना ही चाहिए।"

वह ईश्वर से समय को थाम लेने का अनुरोध कर रही थी, ताकि 'संतान सप्तमी' का वह शुभ मुहूर्त निकल न जाए।


हैरानी की बात यह थी कि सुगना की वह प्रार्थना स्वीकार हो रही थी, पर उस ढंग से नहीं जैसा उसने सोचा था। जिस वक्त वह ईश्वर से 'समय रोकने' और 'गर्भ सिंचन' की गुहार लगा रही थी, ठीक उसी वक्त उसका अपना पुत्र, सूरज, अपनी माँ और मौसी की उन गुप्त इच्छाओं और प्रार्थनाओं को साक्षात् साकार कर रहा था।

होटल के उस बंद कमरे में सूरज अपनी पूरी पौरुष शक्ति के साथ सोनी के 'गर्भ सिंचन' के लिए पुरज़ोर प्रयास कर रहा था। सुगना बाहर बैठकर जिस 'बीज अर्पण' के लिए तड़प रही थी, उसका बेटा उसी अनुष्ठान को अपनी रगों के गर्म रक्त से मुकम्मल कर रहा था।


यह नियति का कैसा क्रूर और कामुक मज़ाक था—एक माँ बाहर बैठकर जिस वंश की बेल को सींचने की दुआ कर रही थी, उसका बेटा भीतर उसी बेल की जड़ों में अपनी जवानी का रस उड़ेल रहा था। सुगना की हर आह और हर दुआ, सूरज के हर धक्के और हर प्रहार के साथ सुर मिला रही थी।

बनारस की वह रात अब एक ऐसे रहस्य की गवाह बन चुकी थी, जहाँ प्रार्थना करने वाली माँ थी, त्याग करने वाली मौसी थी, और उन दोनों की अधूरी कामनाओं को अपने पौरुष से पूर्ण करने वाला वह इकलौता पुत्र था। सुगना की अधीरता और सूरज का जुनून, दोनों मिलकर 'संतान सप्तमी' के उस इतिहास को लिख रहे थे, जिसका सच कभी उजाले में नहीं आना था।

सूरज का पौरुष अब एक दहकते हुए अंगारे की तरह था, जो हर प्रहार के साथ सोनी की गहराइयों को झुलसा रहा था। सोनी, जो एक बार फिर उत्तेजना के शिखर पर थी, सूरज के इन अनियंत्रित और शक्तिशाली प्रहारों के नीचे बेबस हो गई। उसके मुँह से निकलने वाली सिसकियाँ अब लंबी आहों और मदहोश कर देने वाली चीखों में बदल चुकी थीं।


जैसे-जैसे सूरज की रफ्तार बढ़ी, सोनी का शरीर कमान की तरह तन गया। उसके पैरों की उंगलियाँ मुड़ गईं और उसकी योनि की मांसपेशियाँ एक तीव्र संकुचन (Contractions) के साथ सूरज के अंग को चारों तरफ से जकड़ने लगीं। सोनी अपनी सुध-बुध खो चुकी थी; उसकी आँखों के सामने रंगीन बिजलियाँ कौंध रही थीं। वह अपनी चरम संतुष्टि के उस विस्फोट में पूरी तरह बह गई, उसका रोम-रोम स्खलन के आनंद से थरथरा उठा।

सोनी के उस गर्म और संकुचित स्पर्श ने सूरज के धैर्य को भी अंतिम सीमा तक पहुँचा दिया। सूरज ने अपनी पूरी ताकत बटोरकर कुछ अंतिम और बेहद गहरे प्रहार किए। वह भूल गया कि वह कहाँ है; उसे बस उस 'यज्ञ' की आखिरी आहुति देनी थी। एक जोरदार और अंतिम धक्के के साथ, सूरज ने अपने पौरुष को सोनी की 'महोगनी की गांठ' की सबसे गहरी गहराई तक धँसा दिया।


अगले ही पल, सूरज का पूरा शरीर कांप उठा। उसके भीतर संचित वह 'दिव्य बीज' एक तीव्र फुहार के साथ मुक्त हो गया। सोनी ने अपने भीतर उस गर्म धारा के प्रवाह को महसूस किया, जो उसके गर्भ की गहराइयों तक पहुँच रही थी। वह वीर्य सोनी की उस प्यासी 'मुनिया' को पूरी तरह से तृप्त और संचित करने लगा। 'संतान सप्तमी' का वह व्रत, जिसकी कामना सुगना ने की थी, उस क्षण में सूरज के उस बीज के अर्पण के साथ साक्षात् पूर्ण हुआ।

सोनी के वक्ष, जिन पर रची मेहंदी अब पसीने और उत्तेजना से दहक रही थी, सूरज की भारी छाती के नीचे बुरी तरह दब रहे थे। उसे महसूस हो रहा था कि सूरज का पौरुष अभी भी उसके भीतर उसी गहराई पर टिका हुआ है, जैसे वह उस पवित्र स्थान को पूरी तरह से अपनी छाप से भर देना चाहता हो।

दोनों जिस्म पसीने से लथपथ, एक-दूसरे में गुंथे हुए, बिस्तर पर निढाल पड़ गए। कमरे में केवल उनकी उखड़ी हुई साँसों का शोर था। बनारस की उस रात ने एक वर्जित लेकिन पूर्ण अनुष्ठान को संपन्न होते देखा था। सोनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसे अब एक अजीब सी शांति और तृप्ति का अनुभव हो रहा था—

जैसे उसकी प्यासी देह को अंततः उसका देवता मिल गया हो।


शेष अगले भाग में
Maalik kya likhte hai aap 👌👌👌
 
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Chalakmanus

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भाग 188
सोनी के वक्ष, जिन पर रची मेहंदी अब पसीने और उत्तेजना से दहक रही थी, सूरज की भारी छाती के नीचे बुरी तरह दब रहे थे। उसे महसूस हो रहा था कि सूरज का पौरुष अभी भी उसके भीतर उसी गहराई पर टिका हुआ है, जैसे वह उस पवित्र स्थान को पूरी तरह से अपनी छाप से भर देना चाहता हो।

दोनों जिस्म पसीने से लथपथ, एक-दूसरे में गुंथे हुए, बिस्तर पर निढाल पड़ गए। कमरे में केवल उनकी उखड़ी हुई साँसों का शोर था। बनारस की उस रात ने एक वर्जित लेकिन पूर्ण अनुष्ठान को संपन्न होते देखा था। सोनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसे अब एक अजीब सी शांति और तृप्ति का अनुभव हो रहा था—जैसे उसकी देह की वेदी को अंततः उसका देवता मिल गया हो।

अब आगे..

उस आलीशान कमरे में अब सन्नाटा था, लेकिन वह सन्नाटा शांति का नहीं, बल्कि आने वाले दिनों के उस तूफ़ान की आहट था जिसकी पटकथा सुगना ने लिख दी थी। वासना का वह पहला ज्वार भले ही थम गया था, लेकिन 'संतान सप्तमी' का असली विधान तो अब शुरू होना था।

सोनी अब भी सूरज के नीचे दबी हुई थी, उसका बदन सूरज के उस अंतिम अर्पण की गरमाहट को अपने भीतर समेटे हुए था। तभी उसे दीदी की कही वह गुप्त बात याद आई, जो इस व्रत का सबसे कठिन और मादक नियम था।


उस गुप्त अध्याय के अनुसार, जिस पुरुष ने पहले दिन इस देह-वेदी पर अपनी आहुति दे दी है, उसे ही अगले सात दिनों तक लगातार इस 'उर्वर' भूमि को सींचना था। नियम स्पष्ट था—सिर्फ एक बार नहीं, बल्कि जितनी बार संभव हो सके, उस 'मुनिया' को वीर्य के अर्पण से तृप्त करना था ताकि वह 'बीज' जड़ पकड़ सके।

सोनी ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं और सूरज के चेहरे को देखा, जो अब भी उसकी गर्दन के पास अपनी भारी साँसें छोड़ रहा था। उसे अहसास हुआ कि आज की रात तो महज़ एक 'आगाज' थी; असली अंजाम तो उन आने वाले सात दिनों में लिखा जाना था जहाँ उसे और सूरज को मर्यादा की हर हद को बार-बार पार करना होगा।

मिलन के बाद अब बिछड़ने की तैयारी थी सूरज ने अपना तना हुआ लंड सोनी की मुनिया से बाहर निकाला और हमेशा की तरह वह पक्क …की आवाज सोनी और सूरज दोनों ने सुनी…इस आवाज में भी उतनी ही मधुरता थी जितना सोनी की कराह में थी।

सूरज के साथ-साथ सोनी भी खड़ी हो गई दोनों पूरी तरह नग्न आदिम अवस्था में एक दूसरे के समक्ष खड़े थे…सूरज का अद्भुत और विशाल लंड पूरी उत्तेजना के साथ खड़ा था जिस पर काम रस ऐसे लिपटा हुआ था जैसे उसे किसी मक्खन की हांडी में डुबो दिया गया हो…

सोनी को पता था उसे क्या करना है विधाता की उस अनुपम कृति ने उसे जो सुख और संतोष दिया था उसे शांत करना आवश्यक था…. सोनी अब अपने घुटनों पर थी.. उसने सूरज के तने हुए लंड को अपने हाथों में थाम लिया और प्यार से सहलाते हुए और सूरज की तरफ देखते हुए बोला: "सूरज... तूने जो आज शुरू किया है, उसे अब तुझे ही अंजाम तक पहुँचाना होगा। दीदी ने कहा था कि एक बार की आहुति पर्याप्त नहीं है... इस वेदी को अगले सात दिनों तक तेरे ही अर्पण की प्यास रहेगी।"

सूरज की आँखों में एक नई चमक थी। वह समझ गया कि अब यह खेल सिर्फ एक रात का नहीं रह गया है। उसे अपनी मौसी की उस 'महोगनी की गांठ' को बार-बार अपनी मर्दानगी से सींचना होगा, जब तक कि वह 'कमल' पूरी तरह से फल न देने लगे।

सूरज: "तो तैयार रहिए मौसी... क्योंकि अब सूरज न थकेगा, न रुकेगा। अगले सात दिन बनारस की यह धरती हमारी गवाह बनेगी कि कैसे एक पुजारी अपनी आराध्या को तृप्ति के शिखर तक ले जाता है।"

सोनी ने एक गहरी साँस ली और सूरज ले लंड को और भी कसकर अपने हथेली के आलिंगन में भर लिया । उसे पता था कि अब से लेकर अगले सात दिनों तक, वह केवल विकास की पत्नी नहीं, बल्कि सूरज की वह 'भूमि' होगी जिसे वह अपनी इच्छा और शक्ति से उर्वर बनाएगा। वासना का वह तूफ़ान अब एक स्थायी अग्नि में बदल चुका था।

सोनी के मन में अब विचारों का एक गहरा भंवर उठ रहा था। सूरज के पौरुष की गर्माहट अभी भी उसके रोम-रोम में बसी थी, लेकिन ठंडी हकीकत ने उसके दिमाग के द्वार खटखटा दिए थे। वह जानती थी कि सुगना दीदी ने इस 'संतान सप्तमी' के व्रत के लिए जो ताना-बाना बुना था, उसका केंद्र विकास ही थे। पर नियति ने आज की रात की पहली और सबसे महत्वपूर्ण आहुति सूरज के हाथों दिला दी थी।

सोनी ने एक गहरी सांस ली और अपनी बिखरी हुई जुल्फों को समेटते हुए मन ही मन एक बेहद जटिल और साहसी निर्णय लिया।

सोनी का संकल्प (मन ही मन): "आज की रात जो आग सूरज ने जलाई है, वह अगले सात दिनों तक मुझे सुलगाती रहेगी। मैं सूरज के साथ इस 'वर्जित सत्य' को जियूँगी, क्योंकि मेरी कोख को अब उसी के ताप की प्यास है। पर दुनिया के लिए, सुगना दीदी के लिए और खुद विकास जी के लिए, मैं एक समर्पित पत्नी बनी रहूँगी। यह राज़ इस होटल की दीवारें और मेरी अंतरात्मा ही जानेगी। विकास जी इस व्रत का नाम होंगे, पर सूरज इसकी आत्मा और हकीकत।"

सोनी ने आईने में अपनी चमकती हुई आँखों को देखा। उसके चेहरे पर अब एक चतुर और परिपक्व स्त्री की मुस्कान थी, जिसने अपनी तृप्ति और अपनी मर्यादा, दोनों को एक ही धागे में पिरो लिया था। और खुद को तैयार किया—एक ऐसे दोहरे जीवन के लिए जहाँ वह एक साथ 'देवी' भी थी और 'अप्सरा' भी।

घड़ी की सुइयों ने रात के 11 बजा दिए थे और इसके साथ ही सुइट के उस मायावी वातावरण में हकीकत की घंटी बज चुकी थी। विकास की ट्रेन आने में अब बहुत कम समय बचा था। सोनी भारी कदमों से बाथरूम की ओर बढ़ी ताकि खुद को फिर से उस 'मर्यादित पत्नी' के रूप में ढाल सके जिसका इंतज़ार विकास और सुगना कर रहे थे।

जैसे ही उसने बाथरूम के बड़े आईने के सामने अपनी छवि देखकर सिहर उठी। आईने में दिख रही स्त्री वह सोनी नहीं थी जो शाम को यहाँ आई थी; यह तो सूरज के जुनून की लिखी हुई एक दास्तां थी।

उसकी गोरी चूचियों पर, जिन्हें सुगना ने केसर और चंदन से महकाया था, अब सूरज के दांतों और होठों के गहरे लाल निशान उभरे हुए थे। सूरज ने जिस बेतहाशा अंदाज़ में उन्हें पिया था, वे अब उसकी कामुकता की गवाही दे रहे थे । उसकी सुडौल कमर और भारी नितंबों पर सूरज की उंगलियों के नीले निशान साफ दिख रहे थे, जहाँ उसने सोनी को अपनी ओर खींचने के लिए मजबूती से जकड़ा था।

पेट और जांघों पर रची मेहंदी पसीने और घर्षण की वजह से थोड़ी धुंधली पड़ गई थी, जो उस 'युद्ध' का प्रमाण थी जो अभी-अभी उस मखमली बिस्तर पर लड़ा गया था। जांघों पर रिसा हुआ वीर्य चमक रहा था…

सोनी का कलेजा जोर से धड़कने लगा। उसने थरथराते हाथों से उन निशानों को छूकर देखा। एक पल के लिए उसे अपनी देह से सूरज के पौरुष की वह तीखी गंध आई जिसे वह कभी नहीं भूल सकती थी।

"हे भगवान! मैं विकास जी का सामना कैसे करूँगी?" उसने मन ही मन सोचा। "अगर रोशनी में उन्होंने मुझे देख लिया, तो इन निशानों का क्या जवाब दूँगी? सुगना दीदी ने तो मुझे उनके लिए संवारा था, पर यहाँ तो किसी और ने ही अपनी मुहर लगा दी है।"

वह घबराहट में जल्दी-जल्दी पानी की बौछारें अपने बदन पर डालने लगी, जैसे वह उन निशानों को धो देना चाहती हो। पर वे निशान महज़ त्वचा पर नहीं थे, वे तो उसकी रूह पर अंकित हो चुके थे।

बाहर सूरज अब कपड़े पहनकर शांत बैठा था, पर सोनी के भीतर एक ऐसा चोर घुस गया था जो उसे विकास की आँखों में आँखें डालने से रोक रहा था। 'संतान सप्तमी' का वह गुप्त अनुष्ठान अब एक मीठे अपराध की तरह उसके सीने पर भारी होने लगा था।

स्टेशन का माहौल शोर-शराबे से भरा था, पर सोनी के भीतर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। जैसे ही विकास ट्रेन से उतरा और सूरज के साथ गाड़ी तक पहुंचा उसकी नज़र अपनी पत्नी पर पड़ी। सोनी बनारसी साड़ी में लिपटी, अपनी दमकती काया लिए उसका इंतजार कर रहीं थी। उसके चेहरे पर छाई वह 'खास' सुर्खी विकास की पारखी नज़रों से छिपी नहीं रही।

तीनों कार में सवार होकर घर की ओर चल दिए। सूरज गाड़ी चला रहा था और विकास पीछे की सीट पर सोनी के साथ बैठा था। पूरे रास्ते विकास की आँखें सोनी के बदन का मुआयना करती रहीं।

विकास को लगा कि सोनी आज कुछ बदली-बदली सी है। उसके चेहरे पर थकान तो थी, पर साथ ही एक ऐसी संतुष्टि और चमक थी जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी। वह बार-बार सोनी की ओर झुकता और उसके कान के पास फुसफुसाता:

विकास: "सोनी, आज तुम कुछ ज्यादा ही नशीली लग रही हो। बनारस की हवा लग गई है या सुगना दीदी ने तुम्हें कोई घुट्टी पिलाई है? मेरा तो जी कर रहा है कि घर पहुँचने का इंतज़ार भी न करूँ।"

सोनी का दिल जोरों से धड़क रहा था। वह डर रही थी कि कहीं विकास की नज़र उसकी गर्दन के उन मद्धम निशानों पर न पड़ जाए जो साड़ी के पल्ले के नीचे छुपे थे। उसने अपनी गर्दन और झुका ली और खिड़की के बाहर देखने का नाटक करने लगी।

इधर सूरज शांत होकर ड्राइविंग कर रहा था, पर रियर-व्यू मिरर (Rear-view mirror) में उसकी आँखें बार-बार सोनी से टकरा रही थीं। वह देख रहा था कि कैसे विकास उस शरीर पर अपना अधिकार जता रहा है, जिसे अभी कुछ देर पहले उसने खुद अपनी मर्दानगी से तृप्त किया था। सूरज के चेहरे पर एक गूढ़ मुस्कान थी—उसे पता था कि विकास जिस 'खजाने' को आज रात लूटने की योजना बना रहा है, उसका सबसे कीमती हिस्सा वह पहले ही अपने नाम कर चुका है।

सोनी को विकास का वह 'ताड़ना' (घूरना) असहज कर रहा था। वह सोच रही थी कि सुगना ने घर पर आरती की थाली सजा रखी होगी और उसे विकास के साथ उसी रात के अनुष्ठान में बैठना होगा। उसे रह-रहकर सूरज के वे तीखे स्पर्श याद आ रहे थे, जो अब विकास की नज़रों के नीचे एक 'अपराधबोध' बन रहे थे।

जैसे-जैसे हवेली करीब आ रही थी, सोनी अपनी साड़ी को और कसकर लपेट रही थी। वह जानती थी कि असली परीक्षा तो अब शुरू होगी, जब घर की रोशनी में सुगना की अनुभवी आँखें और विकास की भूखी देह उसका सामना करेगी। 'संतान सप्तमी' की वह रात अब अपने दूसरे और सबसे पेचीदा पड़ाव पर पहुँच चुकी थी।

घर पहुँचते ही सुगना ने दरवाज़ा खोला। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और संतोष था, जैसे उसकी बरसों की मन्नत आज पूरी होने वाली हो। उसने आरती की थाली पहले ही सजा रखी थी।

सुगना: "पधारो विकास! बड़ी लंबी राह तकवाई तुमने। और सोनी, तू इतनी थकी-थकी क्यों लग रही है? आ जाओ, जल्दी से हाथ-मुँह धो लो, मैंने गरमा-गरम खाना लगाती हूं।"

घर में सन्नाटा था, बाकी सदस्य गहरी नींद में थे, लेकिन सुगना की फुर्ती बता रही थी कि आज की रात उसके लिए कितनी महत्वपूर्ण है। डाइनिंग टेबल पर बनारसी पकवानों की खुशबू फैली हुई थी। विकास भूखा था, इसलिए उसने चाव से खाना शुरू किया, लेकिन उसकी नज़रें रह-रहकर बगल में बैठी सोनी पर टिक जातीं।

सोनी का हाल बेहाल था। वह चाहकर भी नज़रें नहीं उठा पा रही थी। उसे लग रहा था कि सुगना की तेज़ नज़रें उसकी साड़ी के भीतर छिपे उन 'खरोंचों' और 'नीले निशानों को देख लेंगी जो सूरज ने अभी कुछ घंटों पहले उसकी देह पर उकेरे थे। वह बहुत ही सलीके से अपना पल्ला संभाल रही थी।

सुगना (सूरज की ओर देखते हुए): "सूरज, तू भी बैठ जा बेटा। तूने आज बहुत मेहनत की है। सोनी को स्टेशन से होटल और फिर यहाँ लाना... तू न होता तो पता नहीं क्या होता।"

सूरज ने बिना कुछ बोले अपनी माँ की तरफ देखा। उसके चेहरे पर एक गहरी शांति थी। उसने बस इतना कहा, "माँ, मैंने बस वही किया जो आज की रात का नियम था। मेरा फर्ज़ अब पूरा हुआ।" सोनी ने टेबल के नीचे अपनी उंगलियां भींच लीं। वह जानती थी कि सूरज की इस बात के पीछे कितने गहरे अर्थ छिपे हैं।

खाना खत्म होते-होते रात के 1:30 बज चुके थे। बनारस की वह रात अब अपने अंतिम प्रहर में प्रवेश कर रही थी। सुगना ने टेबल साफ की और विकास की ओर देखते हुए धीरे से मुस्कुराई।

सुगना: "अब देर मत करो विकास। शुभ घड़ी निकली जा रही है। कमरा सजा दिया है मैंने, और सोनी... तू जाकर तैयार हो जा। याद है ना, आज की रात का क्या महत्व है?"

सोनी का दिल धड़कना बंद कर गया। वह उठी और भारी कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ी, जहाँ अब उसे विकास के साथ उस 'यज्ञ' का नाटक पूरा करना था जिसकी असली आहुति वह सूरज को दे चुकी थी। सूरज वहीं डाइनिंग हॉल के अंधेरे कोने में खड़ा अपनी मौसी के डगमगाते कदमों को देख रहा था।

बेडरूम का दरवाज़ा बंद होते ही विकास के भीतर का संयम जवाब दे गया। उसने बिना एक पल गंवाए सोनी को पीछे से अपनी आगोश में भर लिया। उसकी गरम सांसें सोनी की गर्दन पर पड़ रही थीं, जहाँ अभी कुछ देर पहले सूरज के होंठों की तपिश थी। विकास के हाथ बेताबी से सोनी के वक्षों की ओर बढ़े। जैसे ही उसने ब्लाउज के ऊपर से उन्हें मसला, उसकी नज़र गहरी कटिंग वाली चोली के भीतर दिख रही मेहंदी की सुर्ख लाल बेलों पर पड़ी।

विकास (हैरानी और उत्तेजना में): "अरे! यह क्या मेरी जान... तुमने आज इन पर भी मेहंदी लगवाई है? सच में, सुगना जी ने तो आज तुम्हें कयामत बना दिया है। ज़रा दिखाओ तो सही, यह कलाकारी कहाँ तक गई है?"

विकास के हाथ ब्लाउज की डोरियों की तरफ बढ़े ही थे कि सोनी ने बड़ी चतुराई से उसके हाथ थाम लिए। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था क्योंकि उसे पता था कि उन वक्षों पर मेहंदी के साथ-साथ सूरज के दांतों के गहरे निशान भी मौजूद हैं।

सोनी (मुस्कुराते हुए): "इतनी भी क्या जल्दी है? आप जाइए, पहले हाथ-मुँह धोकर कपड़े बदल लीजिए।

विकास -- सुगना दीदी कुछ खास 'सरप्राइज' की बात कर रही थीं,

सोनी --आपका वह उपहार इसी बिस्तर पर आपका इंतज़ार करेगा। वैसे भी बहुत देर हो चुकी है, अब और वक्त मत गंवाइए।"

विकास की आँखों में चमक आ गई। वह मुस्कुराया और 'सरप्राइज' के लालच में बाथरूम की ओर बढ़ गया। जैसे ही बाथरूम का दरवाज़ा बंद हुआ, सोनी ने फुर्ती से काम लेना शुरू किया। उसने अपने शरीर से बनारसी साड़ी और वह टाइट ब्लाउज उतार फेंका। वह पूरी तरह नग्न हो गई, लेकिन आईने में अपने बदन को देखते ही उसकी रूह कांप गई—सूरज के दिए हुए निशानों को छुपाना नामुमकिन था।

उसने तुरंत मन ही मन अपनी योजना को अंतिम रूप दिया। वह बिस्तर पर लेट गई और एक दूध जैसी सफेद चादर को अपने गले तक ओढ़ लिया। उसने तय किया कि वह मुनिया तो दिखाएगी पर चादर को अपने वक्षों से हटने नहीं देगी और जल्दी से कमरे की लाइट को इतना मद्धम कर देगी कि विकास को केवल अहसास हो, कुछ दिखे नहीं।

कुछ ही देर में विकास बाथरूम से निकला। उसने देखा कि कमरे की में लाइट बंद है और केवल कोने में रखा एक छोटा लैंप मद्धम पीली रोशनी बिखेर रहा है। बिस्तर पर सफेद चादर में लिपटी सोनी किसी अप्सरा की तरह लग रही थी।

मद्धम रोशनी में विकास जैसे ही बिस्तर के करीब आया, उसकी धड़कनें सोनी के सौंदर्य को देख कर और तेज़ हो गईं। सोनी ने अपनी योजना के अनुसार एक गहरी साँस ली और चादर को धीरे-धीरे ऊपर खींचना शुरू हुआ सोनी के नंगे पैर पुष्ट जांघें और वह जांघों का जोड़ कुछ भी पलों में उजागर हो गया…। जैसे-जैसे चादर हट रही थी विकास की पुतलियां फैलती जा रही थी। सोनी ने उसे चादर से उन अंगों पर आवरण दिया रहा जहां सूरज ने उसे अदभुत मिलन के दौरान अपने निशान छोड़ दिए थे।

विकास की आँखें फटी की फटी रह गईं। सुगना ने सोनी की 'मुनिया' और जांघों पर जो 'महोगनी की गांठ' और 'कमल' की कलाकारी की थी, वह उस पीली रोशनी में किसी जादुई नक्काशी की तरह चमक रही थी। विकास ने आज से पहले अपनी पत्नी के इस सबसे निजी अंग को इतना सजा हुआ और कामुक कभी नहीं देखा था।उस पर से सूरज की जबरदस्त चूदाई से मुनिया के होंठ फूल कर और भी खूबसूरत हो गए थे।

विकास (हैरानी और विस्मय में): "हे भगवान... सोनी! ... यह तो अद्भुत है। सुगना जी ने वाकई कमाल कर दिया है। ऐसी सजावट... जैसे कोई मंदिर की वेदी हो। सुगना दी इतनी शरारती है मुझे आज मालूम चला"

सोनी ने बहुत ही चतुराई से चादर को इस तरह पकड़ा हुआ था कि उसके वक्ष और ऊपर का हिस्सा ढका रहे। जब विकास नीचे की उस नक्काशी को निहारने में खोया था, सोनी ने अपने हाथों से चादर को अपनी चूचियों पर और कस लिया ताकि सूरज के दाँतों के निशान और वह 'लाल घेरे' विकास की नज़रों से बचे रहें।

विकास मंत्रमुग्ध होकर आगे बढ़ा और अपने कांपते हाथों से उस 'कमल' को छूने की कोशिश करने लगा। उसे लग रहा था कि आज वह अपनी पत्नी को नहीं, बल्कि किसी साक्षात् काम-देवी को प्राप्त करने जा रहा है। उसे इस बात का रत्ती भर भी इल्म नहीं था कि जिस 'वेदी' को वह अब पूजने जा रहा है, वहाँ की पहली और सबसे प्रगाढ़ आहुति उसका अपना भतीजा, सूरज, पहले ही दे चुका है।

सोनी ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसे एक तरफ विकास का वह मुग्ध चेहरा दिख रहा था और दूसरी तरफ उसे अपने भीतर अब भी सूरज के उस 'बीज' की गर्माहट महसूस हो रही थी। उसने विकास का सिर अपनी ओर खींचते हुए धीरे से कहा:

सोनी: "अब बस देखिए मत... इस अनुष्ठान को पूरा कीजिए। दीदी की मन्नत और मेरा यह श्रृंगार, दोनों ही आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।"

विकास ने अब और सब्र नहीं किया। वह उस 'सजी हुई मुनिया' की सुंदरता में ऐसा खोया कि उसे ऊपर के निशानों की सुध ही नहीं रही। वह बस उस 'कमल' के रस को चखने और अपनी प्यास बुझाने के लिए बावला हो उठा। बनारस की उस रात का यह दूसरा और सबसे जटिल प्रहार अब शुरू होने जा रहा था।

विकास अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था। उसने चादर के भीतर हाथ डालकर सोनी के सुडौल जिस्म को अपनी बांहों में भींच लिया। मौका देखकर सोननी में लाइट को और भी ज्यादा कम कर दिया, पर विकास की भूख इतनी ज्यादा थी कि उसने अंधेरे में ही सोनी के वक्षों को अपने मुँह में भरने के लिए झपट्टा मारा।

जैसे ही विकास के होंठ और दांत सोनी की चूचियों पर टिके, सोनी के मुँह से एक दर्दनाक आह निकल गई।

सोनी: "अह्ह्ह... उह्ह! धीरे... विकास जी, धीरे!"

विकास को लगा कि यह शायद उत्तेजना की आह है, पर हकीकत कुछ और थी। सूरज ने जिस बेतहाशा अंदाज़ में उन वक्षों को चूसा और काटा था, वे हिस्से अब बेहद संवेदनशील और जख्मी थे। विकास का स्पर्श उन ताज़ा निशानों पर नमक की तरह लग रहा था। हर बार जब विकास उन्हें अपने मुँह में दबाता, सोनी को सूरज के उस आदिम जुनून की याद आती, जिसने उसकी देह पर ये निशान छोड़े थे।

विकास अब पूरी लय में आ चुका था। उसने अपनी जांघों के बीच सोनी की नक्काशीदार जांघों को फंसाया और उस 'सजी हुई मुनिया' के भीतर प्रवेश करने के लिए ज़ोर लगाया।

विकास (हाँफते हुए): "सोनी... आज तुम्हारा बदन इतना गरम क्यों है? जैसे आग उगल रहा हो। और यह खुशबू... यह तो पागल कर देने वाली है।"

सोनी बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींचती रही। वह एक अजीब दोराहे पर थी—ऊपर से उसे विकास का प्रहार झेलना था, पर भीतर से उसका रोम-रोम अब भी सूरज के उस 'बीज' और उस बेतहाशा चोदने के अंदाज़ को महसूस कर रहा था। विकास के धक्के उसे वह सुख नहीं दे पा रहे थे जो सूरज ने दिया था, बल्कि वे सूरज के दिए हुए जख्मों को कुरेद रहे थे।

विकास की उत्तेजना अब अपने चरम पर थी। वह सोनी की उस 'सजी हुई देह' के मोहपाश में इस कदर जकड़ा गया था कि उसे वास्तविकता और माया के बीच का अंतर महसूस ही नहीं हो रहा था। सोनी की योजना सफल रही थी—उसने न केवल सूरज के निशानों को चतुराई से विकास के स्पर्श के नीचे छिपा दिया, बल्कि विकास के हर धक्के और हर चुंबन को उन पुराने निशानों पर इस तरह लिया जैसे वह सूरज के उस 'सत्य' पर विकास की 'मर्यादा' का लेप लगा रही हो।

कमरे की मद्धम पीली रोशनी में विकास का चेहरा पसीने से चमक रहा था। वह सोनी की सुडौल जांघों को अपने कंधों पर टिकाए, उस 'महोगनी की गांठ' और 'कमल' की कलाकारी के भीतर गहराई तक उतरने का प्रयास कर रहा था। सोनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर ली थीं। उसे महसूस हो रहा था कि विकास का पुरुषार्थ अब अपने अंतिम वेग की ओर बढ़ रहा है।

सोनी (कांपती आवाज़ में): "विकास जी... सब कुछ अर्पित कर दीजिए... आज की रात खाली नहीं जानी चाहिए... दीदी की मन्नत... मेरी कोख... सब आपकी राह देख रहे हैं!"

सोनी के इन शब्दों ने विकास के भीतर जैसे एक विस्फोट कर दिया। उसने सोनी की कमर को अपनी उंगलियों से इतनी ज़ोर से जकड़ा कि उसके नाखून उन नीले निशानों पर फिर से गड़ गए जो सूरज ने छोड़े थे। लेकिन इस बार सोनी चिल्लाई नहीं, बल्कि उसने उस दर्द को अपनी कोख की प्यास में बदल लिया। विकास ने एक आखिरी, गहरा और शक्तिशाली धक्का लगाया और सोनी के बदन को अपनी पूरी ताकत से भींच लिया।

विकास के कंठ से एक भारी हुंकार निकली। उसे महसूस हुआ कि उसके अस्तित्व का सारा सार, उसकी सारी ऊर्जा और वह 'बीज' एक तीव्र प्रवाह के साथ सोनी की उस 'उर्वर भूमि' में विसर्जित हो रहा है। वह 'संतान सप्तमी' की पहली आधिकारिक आहुति थी जो दुनिया की नज़रों में जायज़ थी।

सोनी को अपने भीतर वह गरमाहट महसूस हुई। विकास का 'अर्पण' अब उस जगह पहुँच रहा था जहाँ कुछ घंटों पहले सूरज ने अपनी छाप छोड़ी थी। दो अलग-अलग पुरुषों का अंश अब उसकी कोख की देहली पर एक-दूसरे से टकरा रहा था। सोनी ने महसूस किया कि विकास अब निढाल होकर उसके ऊपर गिर गया है, उसकी भारी साँसें उसकी गर्दन पर गरम हवा की तरह टकरा रही थीं।

विकास (हाँफते हुए और तृप्ति के स्वर में): "सोनी... आज तुमने मुझे वह दिया है जो सालों में नहीं मिला। सुगना जी सच कहती थीं... बनारस की यह रात खाली नहीं जाएगी। मुझे महसूस हो रहा है... कि आज हमने कुछ महान सिद्ध कर लिया है।"

सोनी ने धीरे से विकास के बालों में अपनी उंगलियां फंसाईं। उसने विकास को अपने सीने से लगा लिया, पर उसकी नज़रें कमरे की उस मद्धम रोशनी में कहीं दूर टिकी थीं। उसे पता था कि विकास जिसे अपनी 'जीत' समझ रहा है, वह दरअसल उस बड़े 'अनुष्ठान' का हिस्सा है जिसका सूत्रधार सूरज है।

विकास के स्खलन के साथ ही 'संतान सप्तमी' का वह पहला दिन संपन्न हुआ। सुगना की पटकथा के अनुसार, बीज बो दिया गया था। विकास अब गहरी और संतुष्ट नींद की आगोश में जा रहा था, उसे इस बात का ज़रा भी अंदाज़ नहीं था कि वह जिस 'खेत' की रखवाली का दंभ भर रहा है, उसकी मिट्टी को पहले ही एक युवा और जोशीले 'किसान' ने अपनी मेहनत से सींच दिया है।

सोनी अब भी जाग रही थी। उसने महसूस किया कि उसके भीतर अब दो सत्यों का वास है। एक वह, जो समाज देखेगा—विकास की संतान। और दूसरा वह, जिसे उसकी आत्मा और देह पूजेगी—सूरज का जुनून। उसे याद आया कि अभी तो छह दिन और बाकी हैं... छह दिन जहाँ उसे इसी तरह दिन में 'सती' और रात में 'अभिसारिका' का किरदार निभाना होगा।

उसने करवट बदली और अंधेरे में खिड़की की ओर देखा, जहाँ से बनारस की रात उसे चुपचाप देख रही थी। उसे पता था कि कल की सुबह जब सूरज (भतीजा) उसके सामने आएगा, तो उसकी आँखों में वही सवाल होगा: "क्या तुम तैयार हो, अगली आहुति के लिए?"

सोनी ने मन ही मन खुद को और मज़बूत किया। 'संतान सप्तमी' का खेल अब महज़ एक व्रत नहीं, बल्कि वासना, समर्पण और धोखे का एक ऐसा संगम बन चुका था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।

पर सुगना के परिवार में खुशियां आने वाली थी..

शेष अगले भाग में
Ab 6 din lagataar rail gandi chalegi..
Or sayad uske baad or bhi
 
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Chalakmanus

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भाग 189

उसने करवट बदली और अंधेरे में खिड़की की ओर देखा, जहाँ से बनारस की रात उसे चुपचाप देख रही थी। उसे पता था कि कल की सुबह जब सूरज (भतीजा) उसके सामने आएगा, तो उसकी आँखों में वही सवाल होगा: "क्या तुम तैयार हो, अगली आहुति के लिए?"

सोनी ने मन ही मन खुद को और मज़बूत किया। 'संतान सप्तमी' का खेल अब महज़ एक व्रत नहीं, बल्कि वासना, समर्पण और धोखे का एक ऐसा संगम बन चुका था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।

पर सुगना के परिवार में खुशियां आने वाली थी..

अब आगे…


विकास, जो अपनी पत्नी की जवानी को भोगने के बाद अब गहरी और सुकून भरी नींद में डूबा था, सुबह की पहली किरण के साथ जाग गया।

सूरज की मद्धम रोशनी खिड़की के पर्दों को चीरती हुई कमरे में आ रही थी। विकास ने करवट ली और सामने नग्न सोनी को महसूस कर उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई। उसके सामने सोनी निढाल होकर सो रही थी। थकान और रात के भारी अनुष्ठान के कारण वह अभी भी गहरी नींद में थी।


विकास ने धीरे से सफेद चादर को हटाया। सोनी का पूरा बदन उसके सामने बिल्कुल नग्न और बेपर्दा था। विकास की नज़रें सबसे पहले उसकी जांघों पर पड़ीं, जहाँ वह 'महोगनी की गांठ' और सुगना द्वारा बनाई गई कलाकारी अब थोड़ी धुंधली पड़ चुकी थी, पर कल रात के घर्षण के कारण वहाँ एक अजीब सी सुर्खी छाई हुई थी।

पर जैसे ही विकास की नज़र ऊपर की ओर बढ़ी, उसके माथे पर हल्की सी शिकन आ गई।


सोनी के गोरे वक्षों और उसकी सुडौल कमर पर वे नीले और लाल निशान अब दिन की रोशनी में साफ़ झलक रहे थे। विकास को लगा कि शायद कल रात वह खुद ही इतना बेकाबू हो गया था कि उसने अपनी पत्नी के बदन को इस कदर नोच डाला। उसे याद आ रहा था कि कल रात सोनी बार-बार दर्द से कराह रही थी, पर उसने उसे उसकी उत्तेजना समझा था।

"क्या कल रात मैं वाकई इतना हिंसक हो गया था? ये चूचियों पर दांतों के गहरे निशान... और कमर पर उंगलियों के ये नील... शायद इस 'संतान सप्तमी' के जुनून ने मुझे उग्र बना दिया था।"

वह मंत्रमुग्ध होकर अपनी पत्नी के उस बदन को निहारता रहा जिस पर सूरज के दिए निशान थे, पर विकास को अपने होने का गुमान था। उसे कहाँ पता था कि इन निशानों का असली रचयिता कोई और है।

सोनी के चेहरे पर अभी भी रात की उस कश्मकश की थकान थी। उसके मुनिया के होंठ थोड़े सूजे हुए थे और उसकी साँसें अब भी भारी थीं। विकास ने धीरे से अपना हाथ सोनी की कमर पर रखा, ठीक उसी जगह जहाँ सूरज ने उसे कसकर जकड़ा था। स्पर्श पाते ही सोनी नींद में ही सिहरी, जैसे उसका बदन अभी भी उस 'पुराने' स्पर्श को पहचान रहा हो।

विकास उसे जगाना नहीं चाहता था। वह बस वहीं लेटे-लेटे उस 'पवित्र' और 'अपवित्र' के मिलन की गवाह उस सुंदर काया को देखता रहा, यह सोचकर कि आज से उसके वंश का नया अध्याय शुरू हो चुका है। उसे इस बात का इल्म तक नहीं था कि जिस कोख के फलने का वह इंतज़ार कर रहा है, उसे सींचने वाला असली 'माली' सुगना पुत्र सूरज है।

विकास सोनी की मादक काया को बेहद प्यार से आलिंगन में लिए एक बार फिर सो गया।

सुबह की मद्धम रोशनी जब कमरे में फैली, तो सोनी की आँखें भारीपन के साथ खुलीं। उसके पूरे बदन में एक ऐसी थकावट थी जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी—जैसे उसकी हड्डियों के जोड़-जोड़ ढीले पड़ गए हों। उसने करवट ली तो जांघों के बीच की वह 'महोगनी की गांठ' और कमर की नसों में एक मीठा सा खिंचाव महसूस हुआ।

विकास अभी भी गहरी नींद में था। सोनी धीरे से उठी और लड़खड़ाते कदमों से बाथरूम की ओर बढ़ी। जैसे ही उसने बाथरूम का दरवाज़ा बंद किया और आईने के सामने खड़ी हुई, वह खुद को निहारकर ठिठक गई।


उसने देखा कि उसके गोरे जिस्म पर कल की रात की पूरी दास्तां लिखी हुई थी। उसके वक्षों पर सूरज के दांतों के वे गहरे लाल निशान अब हल्के नीले पड़ रहे थे, और कमर पर उंगलियों के वे छाप किसी युद्ध के पदचिह्नों की तरह उभर आए थे। उसने पानी का नल खोला और ठंडे पानी की बौछारें अपने चेहरे पर डालीं, पर उसका मन कल रात की उन यादों की तपिश में जल रहा था।

बाथरूम की दीवारों के बीच अकेले खड़े होकर उसने अपनी आँखें मूंद लीं और कल रात के उस 'वर्जित अनुष्ठान' को याद करने लगी। उसे याद आया कि कैसे सूरज ने उसे पहली बार उस आलीशान सुइट में छुआ था। वह सूरज का बेतहाशा चोदना, उसकी 'मुनिया' को अपने पौरुष से चीरना, और उसके वक्षों को पूरी प्यास के साथ पीना... वह सब उसकी रूह में बस गया था।

फिर उसे विकास के साथ गुजरी रात के वे घंटे याद आए। विकास की वही पुरानी, जानी-पहचानी छुअन अब उसे फीकी लग रही थी। विकास का वह प्यार, सूरज के उस आदिम जुनून के सामने उसे बेजान सा महसूस हो रहा था। उसे याद आया कि कैसे विकास ने उसके उन्हीं निशानों पर अपना मुंह रखा था, यह सोचकर कि वे उसी के दिए हुए हैं, जबकि सोनी उस दर्द में भी सूरज का नाम जप रही थी।

सोनी ने अपनी हथेलियों से अपने वक्षों को ढका और एक ठंडी आह भरी। उसे खुद पर हैरत हो रही थी कि वह एक ही रात में दो मर्दों की आगोश में रही, पर उसका रोम-रोम केवल उस एक युवक—सूरज—के लिए तड़प रहा था जिसने उसे पहली बार एक 'स्त्री' होने का असली मतलब समझाया था।

उसने शावर खोला और अपने बदन पर धार छोड़ी। पानी की हर बूंद के साथ वह उन निशानों को सहला रही थी। वह जानती थी कि बाहर निकलते ही उसे फिर से आदर्श पत्नी होने का मुखौटा पहनना है, पर इस बंद बाथरूम में वह केवल उस रात की उन मदहोश यादों की कैदी थी। 'संतान सप्तमी' की वह रात अब उसके जीवन का सबसे गहरा और सबसे मीठा राज़ बन चुकी थी।

डाइनिंग टेबल पर सुबह के नाश्ते का दृश्य देखने में तो साधारण था, लेकिन उसके पीछे छिपे राज़ और जज्बात बनारस की उसी सुबह की तरह भारी थे। मेज के चारों ओर चार लोग बैठे थे, पर उनके मन अलग-अलग दिशाओं में दौड़ रहे थे।

सुगना मेज की मुखिया बनी परोस रही थी। उसकी नज़रों में एक अजीब सी तृप्ति थी। वह बार-बार विकास और सोनी के चेहरों को देख रही थी, यह सोचकर कि कल की रात उसके वंश के लिए कितनी कल्याणकारी रही होगी।

विकास बहुत ही खुश और ऊर्जावान लग रहा था। वह मजे से कचौड़ी और जलेबी का आनंद ले रहा था। उसने बीच-बीच में सोनी की तरफ देखा और एक शरारती मुस्कान दी, जैसे वह कल रात के उस 'घमासान' को याद कर रहा हो, जिसका श्रेय वह खुद को दे रहा था।

सूरज बिल्कुल शांत था। वह अपनी चाय का घूंट भर रहा था और उसकी निगाहें अपनी थाली पर टिकी थीं। लेकिन बीच-बीच में जब वह अपनी पलकें उठाता, तो उसकी नज़रों का एक सिरा सोनी से जा टकराता। वह चुपचाप देख रहा था कि कैसे विकास उस अधिकार के साथ सोनी से बात कर रहा था, जिसे सूरज ने कल रात अपनी बांहों में तोड़-मरोड़ दिया था। सूरज के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, बस एक पुरुषोचित अहंकार था कि वह सोनी के बदन के एक-एक इंच का असली मालिक बन चुका है।

सोनी की हालत सबसे ज्यादा नाजुक थी। वह अपनी साड़ी के पल्ले को बार-बार गर्दन तक खींच रही थी, ताकि दिन की तेज़ रोशनी में कोई निशान न दिख जाए। उसके बदन की थकावट उसके चेहरे की रंगत से साफ़ झलक रही थी। जब विकास ने उसका हाथ थामने की कोशिश की, तो वह सिहर उठी। उसे लग रहा था कि एक तरफ वह मर्द बैठा है जो उसका 'पति' है, और दूसरी तरफ वह जो उसके 'गर्भ' का असली विधाता बन चुका है।

मेज पर सन्नाटा तो था, पर बर्तन टकराने की आवाज़ के बीच उन तीन लोगों के दिलों की धड़कनें साफ़ सुनी जा सकती थीं।

सुगना (हँसते हुए): "सोनी, तू तो आज कुछ बोल ही नहीं रही? और विकास, आपको बनारस का नाश्ता कैसा लगा?"

विकास: "दीदी, आज तो हर चीज़ में एक अलग ही स्वाद है। क्यों सोनी, है ना?"

सोनी ने बस धीमे से सिर हिला दिया और एक पल के लिए उसकी आँखें सूरज से मिलीं। उस एक पल के 'आई-कॉन्टैक्ट' ने मेज पर मौजूद उस अदृश्य तनाव को और गहरा कर दिया। सूरज की उन आँखों में कल रात की पूरी दास्तां तैर रही थी, जिसे सोनी चाहकर भी अपनी यादों से नहीं मिटा पा रही थी। नाश्ते की उस टेबल पर 'संतान सप्तमी' का वह गुप्त यज्ञ अब एक नई और खतरनाक करवट लेने की तैयारी में था।

नाश्ते के बाद जब विकास और सूरज बाहर बरामदे में चले गए, सुगना सोनी को हाथ पकड़कर प्यार से खींचते हुए बेडरूम में ले गई और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। सोनी का दिल धड़क रहा था, वह बार-बार अपनी साड़ी के पल्ले से अपनी गर्दन को ढंकने की कोशिश कर रही थी, लेकिन सुगना की पारखी नजरों से कुछ भी छिपाना मुमकिन नहीं था।

सुगना ने बिना कुछ कहे सोनी के करीब आकर बड़े प्यार से उसकी साड़ी का पल्ला गर्दन से हटाया। जैसे ही सूरज के दिए हुए वे गहरे लाल और कमर के नीले निशान उजागर हुए, सुगना की आँखें खुशी से चमक उठीं।

सुगना (हैरानी और खुशी के साथ): "अरे वाह! विकास ने तो कमाल कर दिया। मैंने तो सोचा था कि वह शहर की चकाचौंध में थोड़ा सुस्त पड़ गया होगा, पर ये निशान तो कुछ और ही कहानी कह रहे हैं।"

सोनी शर्म से पानी-पानी हो रही थी। सुगना की जिज्ञासा यहीं नहीं रुकी। उसने दबी ज़ुबान में सोनी से उसके वक्षों के बारे में पूछा। सोनी ने कांपते हाथों से अपने ब्लाउज की डोरी ढीली की और अपने वक्षों को बाहर निकाला। जब सुगना ने उन पर सूरज के दांतों के गहरे निशान देखे, तो वह प्रसन्नता से भर गई। उसे लगा कि विकास ने पूरी रात अपनी मर्दानगी की छाप सोनी के बदन पर छोड़ी है।

सुगना (सोनी को आलिंगन में भरते हुए): "बस यही... वह आग है जिसकी ज़रूरत इस 'संतान सप्तमी' के यज्ञ को थी। सोनी, तू सौभाग्यशाली है कि तुझे ऐसा मर्द मिला जिसने तुझे इस कदर झकझोर दिया।"

सुगना ने सोनी को अपने सीने से लगा लिया और उसकी पीठ सहलाते हुए उसके कान में फुसफुसाकर बोली:

सुगना: "मेरी बात गांठ बांध ले सोनी... अगले 7 दिनों तक तुझे हर बार, बार-बार इसी उत्तेजना के साथ संभोग करना है। अपने बदन को तैयार रख। जिसने इस यज्ञ को कल रात शुरू किया है, उसकी पूर्ण आहुति भी उसी के साथ होनी चाहिए। ईश्वर तेरी मनोकामना ज़रूर पूरी करेंगे।"

सोनी चुपचाप सुगना के आलिंगन में सिमटी रही। उसे पता था कि सुगना जिसे 'विकास' की मर्दानगी समझकर आशीर्वाद दे रही थी, वह दरअसल सुगना के अपने पुत्र सूरज का जुनून था। सुगना का निर्देश मानने से सोनी को इस बात की दोहरी खुशी थी कि वह सूरज की बांहों में भी रहेगी और सुगना की नज़रों में 'सती' भी बनी रहेगी।

सुगना को सोनी का यह हाल देखकर अपनी सुहागरात की याद आ गई, जब सरयू सिंह ने उसे पहली बार बेतहाशा अंदाज़ में चोदा था। उसे याद आया कि कैसे सरयू सिंह ने भी उसके बदन पर ऐसे ही निशान छोड़े थे।

पिता और पुत्र ने पदमा की दोनों बेटियों को तृप्त कर दिया था।

सुगना ने बड़े लाड़ से सोनी की ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया और उसके माथे को चूमते हुए गर्व से बोली:

सुगना: "पगली, शर्मा मत! देख तेरे बदन पर कहाँ-कहाँ ये निशान आए हैं... यही तो एक सुहागन का असली गहना है। बस यही उत्तेजना और ऐसी ही मर्दानगी चाहिए इस अनुष्ठान को पूर्ण करने के लिए। तू बस उसे अपने भीतर समाती जा, कोख अपने आप फल जाएगी।"

सोनी बस मुस्कुरा दी। उसे अहसास था कि वह अब एक ऐसे गुप्त और पवित्र खेल का हिस्सा बन चुकी है, जहाँ मर्यादा की दीवारें केवल दुनिया के लिए थीं, जबकि भीतर केवल 'सूरज' की तपन और 'सुगना' का आशीर्वाद था। सुगना की उन बातों ने सोनी के भीतर सूरज के प्रति प्यास को और बढ़ा दिया था। वह मन ही मन मुस्कुरा रही थी कि कैसे उसने एक बहुत बड़े तूफान को टाल दिया। उसने सूरज का नाम तक नहीं आने दिया, पर वह जानती थी कि सुगना जिस 'सिंचन' की बात कर रही है, उसका असली आनंद वह सूरज की आगोश में ही लेगी, जबकि दुनिया की नज़रों में विकास ही उसका विधाता बना रहेगा।

उधर सुगना एक ऐसे उल्लास में थी, जो पूरी तरह से पवित्रता और कुल की मर्यादा पर आधारित था। वह इस बात से बिल्कुल बेखबर थी कि जिस 'संतान सप्तमी' के अनुष्ठान को वह अपनी देखरेख में आगे बढ़ा रही है, उसकी नींव में मर्यादा की ईंटें पहले ही दरक चुकी हैं। सुगना की आँखों में सोनी के लिए जो प्रेम था, वह एक बड़ी बहन का था जो अपनी छोटी बहन की सूनी गोद भरना चाहती थी, पर उसे इस बात का रत्ती भर भी इल्म नहीं था कि उसका अपना पुत्र सूरज और उसकी सगी बहन सोनी एक-दूसरे के जिस्मानी राज़दार बन चुके हैं।

सुगना का व्यक्तित्व आज भी किसी मदमस्त यौवन की याद दिलाता था। साड़ी के बंद घेरों में उसकी भारी और सुडौल काया एक ऐसी गरिमा समेटे हुए थी, जो किसी को भी प्रभावित कर दे। उसकी चाल में एक अजब सा लोच था, और जब वह मुस्कुराती तो उसके गालों पर पड़ने वाले भँवर आज भी किसी को अपनी ओर खींचने की शक्ति रखते थे। वर्षों पहले सरयू सिंह और सोनू के साथ जो कुछ भी उसके जीवन में घटित हुआ था, उसने उसे भीतर से और भी अधिक 'स्त्रीत्व' से भर दिया था। वह जानती थी कि पुरुष की भूख और स्त्री का समर्पण क्या होता है, पर उसने अपनी इस चपलता को मर्यादा के गहरे आवरण में छिपा रखा था।

सुगना स्वयं में एक ऐसी पहेली थी जो बाहर से ठंडी और शांत दिखती थी, पर जिसके भीतर अनुभवों का एक गर्म लावा बहता था। सरयू सिंह के स्वप्न वाले आशीर्वाद ने उसे अपनी पुरानी यादों के बोझ से मुक्त कर दिया था, जिससे उसकी देह और मन में एक नई ताजगी आ गई थी। वह आज भी उतनी ही कामुक और आमंत्रित करने वाली थी, पर उसकी यह मादकता अब किसी प्रेमी के लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के वंश की रक्षा के लिए 'मार्गदर्शक' के रूप में उभर रही थी।

उसकी सुडौल कमर पर साड़ी का वह खिंचाव और उसकी आँखों का वह गहरा काजल... सब कुछ एक अधिकारपूर्ण स्त्री की कहानी कह रहे थे। वह सोनी को यह सीख दे रही थी कि इन सात दिनों में जिसने इस अनुष्ठान को शुरू किया था वो उसे पूरी तरह से आत्मसात कर ले, यह नहीं जानती थी कि वह अनजाने में अपनी बहन को अपने ही बेटे की आगोश में बार-बार भेजने का आशीर्वाद दे रही है।

सुगना की यह अनभिज्ञता ही इस कहानी का सबसे रोमांचक मोड़ था। वह अपनी बहन को सतीत्व और संतान प्राप्ति का पाठ पढ़ा रही थी, जबकि सोनी उस पाठ को 'सूरज' की तपन के साथ व्यावहारिक रूप दे रही थी। सुगना का यह विश्वास कि "विकास ने सोनी को तृप्त किया है", सोनी के लिए एक ढाल बन गया था, जिसके पीछे वह अपनी और सूरज की उस वर्जित दुनिया को सुरक्षित रख सकती थी।

दोपहर की उस मखमली धूप में, जब घर के बाकी हिस्से सन्नाटे में डूबे थे, सुगना ने एक गहरा निश्वास छोड़ा और विकास तथा सोनी को अपने और करीब आने का इशारा किया। उसके चेहरे पर एक बड़ी बहन की ममता और उस विशेष अनुष्ठान की गंभीरता का मिला-जुला भाव था।

सुगना ने धीरे से विकास का दाहिना हाथ अपने हाथों में लिया। विकास को अपनी हथेली पर सुगना के स्पर्श की एक ऐसी गर्माहट महसूस हुई जो उसने पहले कभी अनुभव नहीं की थी। सुगना की उंगलियों की कोमलता और उस छुअन में एक अजीब सा आकर्षण था, जिसने एक पल के लिए विकास के भीतर एक सिहरन पैदा कर दी। वह उस स्पर्श के सम्मोहन में जैसे बंध सा गया।

सुगना ने विकास का वह हाथ बड़ी आत्मीयता से सोनी के हाथ में रखा और दोनों की हथेलियों को आपस में भींचते हुए बोली:

सुगना: "विकास जी, आज से आप दोनों का हर पल, हर सांस इस अनुष्ठान के प्रति समर्पित होनी चाहिए। यह सात दिन आपके जीवन की सबसे बड़ी तपस्या हैं। मैं चाहती हूँ कि आप दोनों एक-दूसरे में इस कदर खो जाएं कि बीच में कोई तीसरा विचार भी न आए।"

सुगना ने आगे सुझाव देते हुए कहा, "मेरा मन है कि आप दोनों इन कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर घूमने चले जाएं। आप दोनों का मन और देह एक-दूसरे के और करीब आएंगे। घर की जिम्मेदारियों से दूर आप इस 'यज्ञ' को और बेहतर तरीके से पूर्ण कर पाएंगे।"

विकास, जो पहले ही सुगना की बातों और उसके जादुई स्पर्श से मोहित था, तुरंत राजी हो गया। उसने उत्साह से कहा, "दीदी, आपका विचार वाकई बहुत सुंदर है। सोनी के लिए भी थोड़ा बदलाव होगा और हम सुकून से वक्त बिता पाएंगे।"

परन्तु, जैसे ही यात्रा की बात छिड़ी, सोनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह मन ही मन कांप उठी।

सोनी की उलझन (स्वगत): "नहीं... यह नहीं हो सकता! अगर मैं विकास जी के साथ बाहर चली गई, तो सूरज का क्या होगा? इस अनुष्ठान की पहली आहुति तो सूरज ने दी है। मेरी देह और कोख तो अब सूरज की उस तड़प की आदी हो चुकी है। यदि सात दिनों तक वह 'असली पुजारी' मेरे पास नहीं रहा, तो यह व्रत कैसे पूर्ण होगा?"

सोनी ने लड़खड़ाती आवाज़ में बहाने बनाने शुरू किए, "दीदी... अभी बाहर जाना ठीक नहीं होगा। व्रत के नियम हैं, घर का मंदिर है, और फिर मुझे थकावट भी बहुत है। हम यहीं रहकर भी तो सब कर सकते हैं..."

विकास ने उसे टोकते हुए कहा, "अरे सोनी, थकान तो घूमने से मिट जाएगी। और दीदी खुद कह रही हैं, तो नियमों की चिंता तुम क्यों करती हो?"

सुगना ने भी सोनी की पीठ सहलाते हुए उसे मनाया, "पगली, यह तेरे ही भले के लिए है। जा, विकास जी के साथ थोड़ा समय बिता। तेरे चेहरे पर जो यह संकोच है, वह एकांत में ही खुलेगा।"

सोनी जितना मना करती, विकास और सुगना का आग्रह उतना ही बढ़ता गया। सोनी अंदर ही अंदर घुट रही थी; उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह सूरज के बिना इन सात रातों की कल्पना कैसे करे। वह बस बेबसी से सुगना को देख रही थी, जो अनजाने में ही उसे उस 'शक्ति' से दूर भेज रही थी जिसे सोनी अपना सब कुछ मान चुकी थी।

दोपहर का वह एकांत अब सोनी के लिए एक नई चुनौती लेकर आया था—एक तरफ पति का साथ और दीदी का आदेश, तो दूसरी तरफ उस 'वर्जित प्रेम' की अधूरी प्यास।

दोपहर की उस मादक चर्चा के बीच अभी सस्पेंस बना ही था कि अचानक पीछे से सूरज की भारी और अधिकारपूर्ण आवाज़ गूँजी, "अरे! कहाँ जाने की तैयारी हो रही है? मेरी भी छुट्टियाँ चल रही हैं, अकेले-अकेले मजे करने का प्लान है क्या?"

सुगना ने पलटकर अपने बेटे को देखा और हंसते हुए टोकने की कोशिश की, "अरे तू कहाँ जाएगा? ये लोग एकांत के लिए जा रहे हैं, तू बीच में 'दाल-भात में मूसरचंद' क्यों बनेगा? तेरी मौसी और मौसा जी को कुछ वक्त साथ बिताने दे।"

सूरज के चेहरे पर एक कुटिल और आत्मविश्वास से भरी मुस्कान तैर गई। उसने तिरछी नज़रों से सोनी की ओर देखा, जिसकी धड़कनें उस आवाज़ को सुनते ही तेज़ हो गई थीं। सूरज बोला:

"माँ, मैं मूसरचंद नहीं, बल्कि इस रथ का 'सारथी' बनूँगा। ड्राइवर वैसे भी छुट्टी पर है, मैं खुद गाड़ी चलाकर मौसा जी और मौसी को ट्रिप पर ले जाऊँगा। इसी बहाने मेरी भी घूमना-फिरना हो जाएगा और मौसा जी को रास्ते भर आराम भी मिलेगा।"

जैसे ही सूरज ने 'गाड़ी चलाने' की बात की, सोनी का रोम-रोम झंकृत हो उठा। उसे याद आया कि कल रात सूरज ने उसे किस बेरहमी और जुनून के साथ 'चलाया' था। उसके मन में एक बिजली सी कौंधी—क्या यह विधाता का कोई संकेत है?

विकास तो जैसे खुशी से उछल पड़ा। उसे सूरज का साथ और उसकी ड्राइविंग स्किल पर पूरा भरोसा था। उसने तपाक से कहा:

विकास (उत्साह में): "अरे! यह तो सोने पर सुहागा हो गया। सूरज, तू साथ है तो फिर कोई फिक्र ही नहीं। चल, तैयारी कर ले... हम लोग नैनीताल चलेंगे। पहाड़ों के टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर हम दोनों बारी-बारी से ड्राइव करेंगे।"

'बारी-बारी से ड्राइव' करने की बात सुनते ही सोनी के भीतर एक सिहरन दौड़ गई। उसे लगा जैसे विकास अनजाने में कोई दोहरी बात कह रहा हो। उसका दिमाग चकराने लगा—हे भगवान! ये लोग गाड़ी चलाने की बात कर रहे हैं या मेरे जिस्म की? सोनी ने कल्पना की... नैनीताल की सर्द रातें, एक तरफ उसका पति विकास और दूसरी तरफ उसका मदमस्त प्रेमी सूरज। दोनों उसे 'बारी-बारी' से अपने प्रेम की ऊँचाइयों तक ले जाएंगे। विधाता ने जैसे सोनी को गर्भवती करने की ठान ली थी, तभी तो उसने विकास के मुँह से वह बात कहलवाई जिसने सोनी की वासना और डर को चरम पर पहुँचा दिया।

सोनी का कलेजा धक-धक कर रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस ट्रिप से डरे या खुश हो। आने वाले दिन उसके लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे, जहाँ उसे दो मर्दों के बीच पिसना था, और उन दोनों को ही यह अहसास दिलाना था कि वही उसके 'असली सारथी' हैं।

उसने मन ही मन अपने इष्ट से प्रार्थना की, पर उसकी प्रार्थना में भी एक अजीब सी माँग थी—वह सूरज की आगोश से दूर नहीं जाना चाहती थी। संतान सप्तमी का यह अनुष्ठान अब एक ऐसे 'रोड ट्रिप' पर निकलने वाला था जहाँ मर्यादा की हर सीमा टूटने वाली थी।


शेष अगले भाग में
Ab saari kainaat lag gayi hai soni ko maa banane main
 

Lovely Anand

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आप जो भी लिखते हैं गजब लिखते हैं जिसका जवाब अभी 7 दिन में पता चलेगा कैसे सोनी और सूरज का मिलन होता है और ही दिलचस्प होगा जब सुगना इसमें शामिल होगी
Class daily chal rahi hai student gayab hain... summar vacation to nahi chahiye?
 

Lutgaya

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भाग 154

लाली के प्रश्न का उत्तर देने के बाद शिष्य ने जो प्रश्न सुगना और सोने से किया था उसने वही प्रश्न लाली के समक्ष दोहरा दिया।

लाली मैं इधर-उधर देखा और धीमे स्वर में सरयू सिंह के निधन का कारण शिष्य को बताने लगे..

लाली सच्चाई से अनभिज्ञ थी उसे उतना ही ज्ञात था जितना सभ्य समाज के लिए जरूरी था सरयू सिंह के पाप सोनी और सुगना के हृदय में दफन थे.. जो अपनी यादों में कोई उस काले दिन को याद कर रही थी।


अब आगे..

हवेली में विद्यानंद का शिष्य अब प्रस्थान की तैयारी में था उसने जो प्रश्न पूछा था उसका उत्तर उसे अब तक नहीं मिला था लाली ने जो उसे बताया था वह अधूरा सत्य था बहरहाल उसे दान दक्षिणा देकर विदा कर दिया गया पर उसने लाली और सुगना के मन में खलबली मचा दी थी।

“दीदी विद्यानंद के शिष्य आखिर उ सब कहे पूछता रहले ……. सोनी ने आज आशंकित मन से पूछा।

“हमारा का मालूम…” सुगना सच में अनभिज्ञ थी कि अचानक विद्यानंद का शिष्य आज कई वर्षों बाद उनके घर पधार और उसने यह प्रश्न किया। उसके सच शब्द पर विशेष जोर देने का आशय निश्चित ही गूढ़ था परंतु सुगना और सोनी दोनों इसका आशय नहीं समझ सकी।

सरयू सिंह की मृत्यु कैसे हुई यह बात सिर्फ सुगना और सोनी को पता थी उनकी आंखों के समक्ष उस दिन की घटनाएं एक-एक करके घूम गई परंतु उनके आधर न खुले।

विद्यानंद के शिष्य का हवेली में आगमन सुगना के मन में बीते समय की कई स्मृतियाँ जगा गया। विद्यानंद की शिक्षाएँ, उनके सिद्धांत और उनसे जुड़ी भविष्यवाणियाँ एक बार फिर उसके मन में गूंज उठीं। सुगना के लिए संसार में यदि कुछ सबसे महत्वपूर्ण था, तो वह था उसका पुत्र सूरज। अब उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य यही था कि सूरज एक सामान्य, स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन जी सके तथा अपने वंश को आगे बढ़ा सके।

सूरज अब युवावस्था की दहलीज़ पर कदम रख चुका था। पढ़ाई में वह सदैव अव्वल रहा, शरीर से भी सुदृढ़ और आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था। परंतु उसके भीतर एक ऐसा मौन संघर्ष चल रहा था, जिसे वह न तो किसी से कह पाता था और न ही स्वयं पूरी तरह समझ पाता था। मित्रों के बीच जब किशोरावस्था और युवावस्था से जुड़ी सामान्य बातें होतीं, तो वह चुपचाप स्वयं को अलग कर लेता।

सूरज की कद काठी और सुडौल शरीर उसे एक मजबूत युवा के रूप में दर्शाते परंतु जांघों के बीच वह न जाने किस श्राप से ग्रसित था कि एक खूबसूरत लिंग का स्वामी होने के बावजूद अब तक वह उसमें तनाव या संवेदना महसूस नहीं कर पाया था।


ऐसा नहीं है कि उसने अपने हाथों से लिंग मर्दन की कोशिश नहीं परंतु जब लिंग में उत्तेजना ही ना हो तो मैं मैथुन का प्रश्न ही नहीं उठता। सूरज मन ही मन परेशान हो चुका था उसने तरह-तरह की किताबें पड़ी अपने प्रोफेसर से इस प्रकार की समस्या के बारे में बात करने की कोशिश की। अपनी पहचान छुपाए रख कर उसका इलाज खोजना दुरूह कार्य था। कोई भी उपाय काम नहीं आ रहा था समय बीतता गया और अब यह सूरज के तनाव का कारण बनने लगा था।

सूरज को कभी-कभी अपने बचपन की धुंधली याद आती जब उसकी नून्नी उसकी मौसी सोनी के अंगूठा सहलाने के कारण तनाव में आ जाती थी और फिर न जाने कैसे शांत हो जाती। यह यादें इतनी धुंधली थी कि सूरज को उन पर यकीन भी नहीं था।

उसने पुस्तकों में समाधान खोजने की कोशिश की, शिक्षकों से परोक्ष रूप से प्रश्न करने का साहस भी जुटाया, किंतु अपनी पहचान और संकोच के कारण वह कभी खुलकर बात नहीं कर सका। समय बीतता गया और यह अनिश्चितता धीरे-धीरे उसके मन पर बोझ बनने लगी।

उधर सुगना, जिसने स्वयं वैराग्यपूर्ण जीवन अपना लिया था, अपने पुत्र के मन में चल रहे इस द्वंद्व को समझ नहीं पा रही थी। उसे इतना आभास अवश्य था कि विद्यानंद द्वारा कही गई कुछ बातें अभी अधूरी थीं और समय आने पर उसे अपनी आंखों के समक्ष वह पाप घटित होते हुए देखना होगा। पर वह समय अभी दूर था। सूरज अपनी पढ़ाई में व्यस्त था और सुगना उसके भीतर उठ रहे प्रश्नों से अनजान।

इधर कॉलेज में परीक्षा परिणाम घोषित होने का दिन आ पहुँचा। पूरे परिसर में उत्साह और आशंका का मिला-जुला माहौल था। आज सूरज के कॉलेज में विद्यार्थीयो की की गई मेहनत का रिजल्ट आने वाला था सभी के मन में उत्साह था और जो कमजोर थे उनके मन में भय। जैसे ही रामू चपरासी नोटिस बोर्ड की ओर अपने हाथों में कुछ कागज लिए आगे बढ़ा विद्यार्थियों ने उसे घेर लिया । उसने अपने हाथ झटक और बोला

चुपचाप दूर खड़े जाओ वरना फिर वापस चला जाऊंगा


उसकी झल्लाहट स्वाभाविक थी। जिस तरह से बच्चों ने उसे घेर रखा था उसे रिजल्ट को नोटिस बोर्ड पर चिपकाने में दिक्कत महसूस हो रही थी। आखिरकार बच्चों ने अपना गोल घेरा थोड़ा बड़ा किया और रामू चपरासी ने एक-एक करके सारे पन्ने नोटिस बोर्ड पर लगा दिए।

एक बार फिर सूरज ने पूरे कॉलेज में प्रथम स्थान प्राप्त किया। शिक्षक और विद्यार्थी सभी उसे बधाइयाँ देने लगे।

वह सचमुच ईश्वर की विशेष कृति प्रतीत होता था—तेज़ बुद्धि, आकर्षक व्यक्तित्व और गंभीर स्वभाव। वह कम बोलता था, पर उसकी उपस्थिति ही बहुत कुछ कह जाती थी। कॉलेज में बूढ़े बरगद के नीचे बैठी कुछ लड़कियां आपस में बातें कर रही थी

“यार, यह सूरज किसी से दोस्ती क्यों नहीं करता?”

पहली लड़की ने कहा।

“करता तो है, तुझसे बात नहीं करता क्या?”

दूसरी ने जवाब दिया।

“अरे, मैं वैसी वाली दोस्ती की बात कर रही हूँ। आज तक मैंने उसे किसी लड़की के साथ अकेले नहीं देखा।”

तभी तीसरी ने उसकी हाँ में हाँ मिलाई,

“हाँ, यह बात तो सच है। आज तक मैंने सूरज की गर्लफ्रेंड के बारे में कुछ नहीं सुना।”

“लगता है सूरज को आसमान से उतरी अप्सरा चाहिए, तभी उसने आज तक किसी लड़की को प्रपोज़ तक नहीं किया।”

“रोजी, एक बार तू ही उससे दोस्ती बढ़ा न। वैसे भी तू इस कॉलेज की सबसे हॉट लड़की है, और मुझे पता है तू कहीं-न-कहीं यही चाहती है। आजकल लड़का ही क्यों, लड़की भी तो सामने से कदम बढ़ा सकती है।”

रोजी वाकई बेहद खूबसूरत थी—गोरा रंग, नीली आँखें, कंधों तक लहराते भूरे बाल, गालों पर हल्की लाली और चेहरे पर आत्मविश्वास। उसका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि किसी भी लड़के की हिम्मत नहीं होती थी कि वह आसानी से उसके पास जाकर नज़दीकियाँ बढ़ाने की कोशिश करे।

रोजी ने एक लंबी साँस ली और मुस्कुराते हुए बोली,

“मैं खुद से तो नहीं जाऊँगी, पर अगर वह आया तो रोकूँगी भी नहीं।”
यह कहते हुए उसके चेहरे पर हल्की लालिमा फैल गई।

फिर वह उठ खड़ी हुई और बोली,

“चलो, क्लास का टाइम हो रहा है। वैसे भी सूरज का नाम ले-लेकर तुम लोगों ने इसकी बेचैनी बढ़ा दी है।”

रोजी ने उस लड़की के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, जो अब तक चुपचाप सब सुन रही थी और मन-ही-मन सूरज के बारे में सोच रही थी। उसकी बुर पनिया चुकी थी पर उसे पता था कि उसका प्यार एकतरफा है और सूरज शायद उसके भाग्य में नहीं।

उस लड़की ने शर्माते हुए रोजी के पेट पर हल्का सा मुक्का मारा और बोली,

“ज़्यादा मत बन, अभी तेरी हालत भी मेरी जैसी ही है।”

बात कुछ हद तक सच थी। रोजी सूरज के बारे में सोचती ज़रूर थी, पर वह आत्मसम्मान से भरी हुई थी और खुद आगे बढ़कर उसे प्रपोज नहीं करना चाहती थी।

क्लास का समय होने पर सब अपनी-अपनी जगह बढ़ चले। सूरज हमेशा की तरह शांत और गंभीर मुद्रा में आगे बढ़ गया—अपने भीतर के प्रश्नों और बाहर की दुनिया की अपेक्षाओं के बीच संतुलन साधने की कोशिश करता हुआ।

परिणाम के दिन के बाद कॉलेज का वातावरण फिर से अपनी सामान्य गति में लौट आया, पर सूरज के भीतर कुछ बदल चुका था। प्रथम आने की खुशी क्षणिक थी; उसके पीछे छिपी बेचैनी अब और स्पष्ट होने लगी थी। उसे लगने लगा था कि उसकी सफलता, उसका अनुशासन और उसका गंभीर व्यक्तित्व—सब कहीं न कहीं किसी अनकहे भय को ढँकने का प्रयास भर हैं।

उस शाम वह देर तक कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठा रहा। किताबों की कतारें, शांत वातावरण और पन्नों की सरसराहट—यह सब जो उसे सुकून देते थे आज उसका मन उसमें नहीं लग रहा था। उसने मनोविज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी कुछ किताबें निकालीं। शब्दों के बीच वह अपने ही प्रश्न ढूँढ रहा था, पर उत्तर अब भी धुंधले थे। वह बार-बार ही सोच रहा था कि आखिर उसके लिंग में तनाव क्यों नहीं आता पर जितनी भी कामुक कल्पनाएं करता पर परिणाम यस का तस। जितना वह पढ़ता, उतना ही उसे एहसास होता कि कुछ संघर्ष ऐसे होते हैं, जिनका समाधान केवल पुस्तकों में नहीं मिलता।

उधर हवेली में सुगना भी असमंजस में थी। सूरज के चेहरे पर बढ़ती गंभीरता उसने महसूस तो की थी, पर उसका कारण समझ नहीं पा रही थी। उसने कई बार चाहा कि बेटे से खुलकर बात करे, पर हर बार शब्द गले में अटक जाते। माँ होने के बावजूद कुछ प्रश्न ऐसे थे, जिन्हें पूछने का साहस वह भी नहीं जुटा पा रही थी।

उसे विद्यानंद के उपदेश की एक बात याद आ गई

“हर समस्या का समाधान समय पर नहीं, सही समय पर होता है।” यह वाक्य उसके मन में देर तक गूंजता रहा।

अगले दिन कॉलेज में रोज़ी ने पहली बार सूरज से स्वयं बात करने का निश्चय किया। यह कोई प्रस्ताव नहीं था, न ही कोई बड़ा कदम—बस एक साधारण-सी बातचीत। कैंटीन के पास उसने सूरज को अकेले खड़े देखा और पास जाकर बोली,

“कांग्रेसुलेशंस, सूरज। तुम हर बार सबको पीछे छोड़ देते हो।”

सूरज ने हल्की मुस्कान के साथ धन्यवाद कहा। उसकी आँखों में विनम्रता थी, पर वही परिचित दूरी भी। बातचीत कुछ मिनट चली—पढ़ाई, कॉलेज और आने वाले इंटर्नशिप के बारे में। रोज़ी को लगा कि सूरज बोलता कम है, पर जब बोलता है तो बहुत सोच-समझकर।

उस छोटी-सी बातचीत के बाद सूरज के मन में हलचल थी। आज पहली बार रोगी ने उसे अकेले में इतनी देर तक बात की थी। उसे एहसास हुआ कि लोग उससे जुड़ना चाहते हैं, पर वह स्वयं ही किसी अदृश्य दीवार के पीछे खड़ा रहता है। क्या यह दीवार उसने स्वयं बनाई है, या यह किसी पुराने डर की देन है—यह प्रश्न उसे भीतर से कचोटने लगा। आज दोपहर में उसने रोजी के बारे में सोचा उसे अपने ख्वाबों की अप्सरा बनाने की कोशिश की जो उसमें कामुकता जागृत कर सके पर परिणाम वही


ढाक के तीन पात

शाम को कमरे में लौटकर उसने खिड़की से बाहर देखा। आसमान में धीरे-धीरे अंधेरा उतर रहा था। उसे लगा जैसे उसका जीवन भी किसी संध्या काल में ठहरा हुआ है—जहाँ न पूरी रोशनी है, न पूरा अंधेरा।

उसी क्षण उसने एक निर्णय लिया। अब वह अपने प्रश्नों से भागेगा नहीं। चाहे समय लगे, चाहे रास्ता कठिन हो, पर उसे स्वयं को समझना होगा। यह केवल उसकी समस्या नहीं थी; यह उसकी पहचान, उसका भविष्य और उसके जीवन की दिशा से जुड़ा प्रश्न था।

दूर हवेली में बैठी सुगना भी उसी रात अनजाने भय से घिरी हुई थी। माँ और पुत्र—दोनों अलग-अलग जगह, अलग-अलग कारणों से—एक ही सत्य के करीब बढ़ रहे थे। समय धीरे-धीरे अपने रहस्य खोलने वाला था।


उधर रोजी……घटनाक्रम को अपनी निगाहों से देख रही थी.

सूरज से हुई वह छोटी-सी बातचीत रोज़ी के मन में अपेक्षा से कहीं ज़्यादा देर तक ठहरी रही। उसे हैरानी इस बात की नहीं थी कि सूरज गंभीर है—यह तो सब जानते थे—हैरानी इस बात की थी कि उसकी आँखों में एक ऐसी दूरी थी, जो किसी घमंड से नहीं, बल्कि किसी गहरे आत्मसंघर्ष से उपजी लगती थी।

रोज़ी स्वयं को जानती थी। कॉलेज में उसका आत्मविश्वास, उसकी हँसी, और उसका खुलापन उसे भीड़ से अलग करता था। लोग उसे “हॉट”, “बोल्ड” और “आउटगोइंग” कहते थे, पर बहुत कम लोग जानते थे कि वह सामने वाले की चुप्पी को भी पढ़ने की कोशिश करती है। सूरज की चुप्पी उसे आकर्षित नहीं—उसे परेशान कर रही थी।

क्लास में बैठी वह बार-बार उसकी ओर देख लेती। सूरज हमेशा की तरह सामने की बेंच पर बैठा, नोट्स बनाता हुआ, जैसे बाकी दुनिया से उसका कोई सीधा सरोकार ही न हो। न लड़कियों की हँसी, न दोस्तों की चुहलबाज़ी—कुछ भी उसे विचलित नहीं करता था।

“कोई इतना अलग कैसे हो सकता है?”
यह सवाल रोज़ी के मन में बार-बार उठ रहा था।

उसने खुद से पूछा—

क्या यह उदासीनता है?
या कोई ऐसा बोझ, जिसे वह किसी को दिखाना नहीं चाहता?

रोज़ी को याद आया कि बातचीत के दौरान सूरज ने आँख मिलाकर बात तो की थी, पर उनमें एक अनकहा संकोच था। जैसे वह हर शब्द बोलने से पहले तय करता हो कि कितना कहना सुरक्षित है। यह सोचकर रोज़ी के भीतर एक अजीब-सी संवेदना जागी—यह आकर्षण नहीं था, यह जिज्ञासा भी नहीं थी; यह किसी को समझने की चाह थी।

शाम को हॉस्टल के कमरे में वह अपनी सहेलियों की बातें सुन रही थी। कोई किसी नए रिश्ते की चर्चा कर रही थी, कोई भविष्य की योजनाओं की। रोज़ी खिड़की के पास खड़ी बाहर देख रही थी। उसे लगा कि सूरज इन सब बातों से बहुत दूर है, जैसे वह अपने ही रास्ते पर अकेले चल रहा हो।

उसी क्षण उसने तय किया—

वह उसे बदलने की कोशिश नहीं करेगी।
वह उसे अपनी तरह बनाने की ज़िद नहीं करेगी।
पर अगर सूरज कभी बोलना चाहे, तो वह सुनने के लिए मौजूद रहेगी।

अगले दिन उसने जानबूझकर सूरज के पास वाली सीट चुनी। कोई बड़ा संवाद नहीं हुआ—बस नोट्स साझा किए गए, एक-दो औपचारिक वाक्य। पर रोज़ी ने महसूस किया कि सूरज की कठोर-सी दिखने वाली दुनिया में भरोसे के लिए बहुत कम जगह है, और वही जगह सबसे कीमती होती है।

उस शाम लौटते समय रोज़ी के मन में एक स्पष्ट भाव था—

यह कोई प्रेम-कथा की शुरुआत नहीं है।
यह किसी ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसे समझे जाने की ज़रूरत है।

और शायद, अनजाने में, रोज़ी उस कहानी का हिस्सा बन चुकी थी।

दूर कहीं सूरज अपने ही विचारों में उलझा था, और हवेली में सुगना आने वाले समय की आहट महसूस कर रही थी।


तीन अलग-अलग मन, तीन अलग-अलग दिशाएँ—पर मंज़िल शायद एक ही थी सूरज का पुरुषत्व जागृत करना

उस दिन कॉलेज से लौटते समय मौसम में अजीब-सी नमी थी। आसमान पर बादल थे, पर बारिश नहीं—जैसे कुछ बरसने से पहले खुद को रोक रहा हो। रोज़ी और सूरज लाइब्रेरी से साथ निकले थे। बातचीत सामान्य थी, पर खामोशियों में कुछ नया पल रहा था।

कॉलेज के पुराने बरगद के पास आकर वे रुक गए। यहाँ अक्सर छात्र बैठा करते थे, पर उस समय जगह खाली थी। रोज़ी ने पहली बार महसूस किया कि सूरज की चुप्पी अब उसे अजनबी नहीं लग रही थी। उसमें एक भरोसा था—संकोच के पीछे छिपी हुई सच्चाई।

“तुम बहुत कुछ अपने भीतर रखते हो,”

रोज़ी ने धीरे से कहा।

सूरज ने कुछ उत्तर नहीं दिया, बस पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा। उस दृष्टि में प्रश्न भी था और अनुमति भी—जैसे वह कह रहा हो कि अगर कुछ कहना है, तो अभी।

रोज़ी ने एक क्षण का निर्णय लिया। न जल्दबाज़ी थी, न नाटकीयता। उसने धीरे से आगे बढ़कर सूरज के गाल को हल्के से छुआ और फिर उसके होंठों पर एक क्षणिक, सधा हुआ चुम्बन रख दिया।

वह चुम्बन छोटा था, पर उसका प्रभाव गहरा।

सूरज जैसे ठिठक गया। यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं था—यह पहली बार था जब किसी ने उसकी दुनिया में बिना सवाल किए, बिना अपेक्षा रखे, इतनी निकटता दिखाई थी। उसके भीतर कोई दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला। यह शारीरिक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि एक भावनात्मक जागरण था—अपने अस्तित्व को स्वीकार किए जाने का।

रोज़ी पीछे हटी। उसकी आँखों में कोई चुनौती नहीं थी, सिर्फ़ स्नेह और सम्मान।

“अगर तुम्हें असहज लगा हो, तो—”

उसने वाक्य पूरा नहीं किया।

“नहीं,”

सूरज ने पहली बार तुरंत उत्तर दिया।
“ऐसा नहीं है।”

उसकी आवाज़ में कंपन था, पर डर नहीं। उस क्षण सूरज ने महसूस किया कि उसके भीतर बहुत समय से सोई हुई संवेदनाएँ—स्पर्श, अपनापन, और स्वीकार्यता—धीरे-धीरे जाग रही हैं। उसने आगे बढ़कर रोजी को अपने आलिंगन में ले लिया और उसके अधरों को बेतहाशा चूमने लगा । रोजी को इतने आत्मीय और गहरे चुंबन की आशा नहीं थी पर जब सूरज स्वयं आगे बढ़कर उसके अधरों को चूम रहा था रोजी ने भी उसका भरपूर साथ दिया । चुंबन की गहराई बढ़ती गई इसका असर रोजी पर तो हुआ पर सूरज के लिंग में उत्तेजना अब भी नहीं आई।

रोजी अपनी वासना पर काबू करते हुए सूरज से अलग हो गई वह इस स्थिति में अब एक पल भी रुकना नहीं चाहती थी उसका दिल तेजी से धड़क रहा था उसने अपनी गर्दन झुका ली अपना बैग गले में लटकाया और बोली

“फिर मिलती हूं “ वह तेज कदमों से सूरत से दूर होती गई… इधर सूरज का मन दुखी हो चला था आज रोजी ने जिस प्रकार उसका साथ दिया था और इतना गहरा चुंबन लिया था इसमें तो किसी भी युवा के लिंग में तनाव भर जाता पर सूरज का श्राप उसे खा जा रहा था। रोजी का यह गहरा और आत्मीय चुंबन भी सूरज के लिंग में उत्तेजना भरने में नाकामयाब रहा।

अगली सुबह दोनों फिर मिले वे दोनों कुछ देर चुप खड़े रहे। न कोई वादा, न कोई परिभाषा। सिर्फ़ एक समझ—कि कुछ बदला है, और यह बदलाव दबाव से नहीं, भरोसे से आया है।

रोज़ी मुस्कुराई।

“जब बोलना चाहो, मैं सुनूँगी,”
कहकर वह वहाँ से चली गई।

सूरज देर तक वहीं खड़ा रहा। बरगद के पत्ते हिल रहे थे।

बरगद के नीचे घटित उस क्षण के बाद सूरज देर तक वहीं खड़ा रहा। मन में हलचल थी—विचार, भावनाएँ, स्मृतियाँ—सब एक साथ उमड़ रही थीं। रोज़ी का चुम्बन कोई साधारण घटना नहीं था; उसने भीतर कुछ छुआ था, यह सूरज भली-भाँति महसूस कर रहा था।

पर उसी के साथ एक और सत्य भी उतना ही स्पष्ट था।

भावनात्मक स्पर्श के बावजूद, उसके शरीर ने कोई उत्तर नहीं दिया।

सूरज ने स्वयं को टटोलने की कोशिश नहीं की—उसे उसकी ज़रूरत भी नहीं पड़ी। वह जानता था। यह मौन, यह शून्य, उसके लिए नया नहीं था। बस इस बार, यह और अधिक स्पष्ट हो गया था।

कमरे में लौटकर वह देर तक आईने के सामने खड़ा रहा। वही चेहरा, वही सुदृढ़ काया—सब कुछ सामान्य था। फिर भी भीतर कहीं कुछ ऐसा था, जो प्रतिक्रिया देना भूल चुका था।

“क्या मेरे भीतर ही कोई कमी है?”
यह प्रश्न अब पहली बार डर के साथ नहीं, बल्कि स्वीकार्यता के साथ उठा।

उसने खुद से झूठ नहीं बोला। रोज़ी के प्रति आकर्षण था—सम्मान था, अपनापन था। उसका स्पर्श उसे अच्छा लगा था। मन ने प्रतिक्रिया दी थी, पर शरीर अब भी किसी अनजाने बंधन में बंधा हुआ था।

उस रात उसे नींद नहीं आई।

उसने फिर से चिकित्सा की किताबें खोलीं, पर इस बार पढ़ने का तरीका अलग था। अब वह समाधान नहीं, समझ ढूँढ रहा था। उसे एहसास होने लगा कि यह समस्या केवल शारीरिक नहीं हो सकती—यह कहीं गहरे जुड़ी है, स्मृतियों से, मन के कोनों में दबी किसी अनुभूति से।

दूसरी ओर, रोज़ी भी बेचैन थी।

उसने सूरज की आँखों में उस क्षण कुछ देखा था—घबराहट नहीं, झिझक नहीं—बल्कि एक शांत उलझन। उसे यह भी महसूस हुआ था कि सूरज पीछे नहीं हटा, अपितु आगे बढ़ा। सूरज ने आगे बढ़कर जिस प्रकार मुनि के आधारों पर गहरा चुंबन लिया था बल्कि लेते ही रहा था उसने स्वयं रोगी को उत्तेजित कर दिया था।

रोज़ी ने खुद से एक वादा किया—

वह जल्दबाज़ी नहीं करेगी। उसे स्वयं अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना था पर सूरज का साथ उसे अच्छा लगने लगा था।

हवेली में, उसी रात, सुगना को अचानक एक अजीब-सा भारीपन महसूस हुआ। बिना किसी स्पष्ट कारण के। उसने दीपक के सामने बैठकर आँखें मूँद लीं। विद्यानंद की आवाज़ जैसे उसके भीतर गूँज उठी—

“जब संकेत मिलने लगें, तब समझो समय निकट है।”

सूरज के भीतर भावनाएँ जाग रही थीं,

रोज़ी धैर्य सीख रही थी,
और सुगना को पहली बार लग रहा था कि जो वह टालती आ रही थी—अब उससे मुँह मोड़ना संभव नहीं।

यह चुप्पी स्थायी नहीं थी।

यह किसी परिवर्तन से पहले का मौन थी।
लवली भाई शानदार लेखन
बस कहानी पूरी कर दो
 

tarahb2

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मैं तो छोटी बहन के साथ संबंध बना लिया था तब से ऐसा हो गया हू
बीवी में भी उतना मजा नहीं आता जितना छोटी बहन की बुर चाटने में आया था, भगवान कसम इतना नमकीन पानी था चू त का मजा ही आ गया था उस रात। गीली इतनी की जितना साफ़ करूं जीभ से इतना गीली होती रही।
बात बहुत पुरानी है, एक दिन छोटी बहन ने छत पे लिंग को सहलाते हुए देखा। ये बात को बीते सालों बीत गए। फिर एक दिन एग्जाम सेंटर से वापिस लाते वक़्त इतना आंधी और बारिश पड़ी कि हम भीग गए और लंबा सफ़र हमने स्कूटी पर सफ़र किया एक दूसरे से कभी कभी सट जाते थे। तो मेरे अंदर इन दोनों मोड़ से बहन के प्रति incest जागा। फिर वो कभी कम नहीं हुआ।

फिर काफी बार नोटिस किया कि जब हम कहीं जाते तो वो जानबूझ कर अपने दूदू मेरी कमर पर सटा देती थी।


एक दिन एक घटना घटी की उसकी कमर में कंधे से नीचे चोट लगी मेरे द्वारा ही एक ही जगह मुक्के मारने से। फिर दो दिन बाद मैने माफी मांगी और मालिश करने को उकसाया।
छोटी ने मना भी नहीं किया तो जब वो टीशर्ट ऊपर करती तो ब्रा साफ दिखती और गौरी पीठ से मेरे अंदर incest बढ़ने लगा । लगातार कई दिन और मालिश करता रहा तो दूसरे या तीसरे दिन मैने बोला छोटी ब्रा गंदी हो जाएगी इसे भी उतार लेती। तो मैने अपने हाथों से जब ब्रा खोली तो भगवान कसम मेरा लंड इतना तनाव में था कि मेरा वीर्य निकल गया।
ब्रा पूरी नहीं खोली सिर्फ हुक खोले तो छोटी ने अपने हाथों से अपने दूदू छिपाए रखे। मैं मालिश कंधे की करने के लिए बोला था लेकिन मेरे अंदर की उत्तेजना ने पूरी कमर को नीचे तक और जानबूझकर कांख के आसपास मालिश करता रहता था।
मै इस दौरान कई बार समझा था जब किसी बात को लेकर बात करता तो उसकी सांस भारी और आवाज में मादकता होती और आवाज में सिसकी तो नहीं लेकिन जवाब क्लियर भी नहीं होता तो मैं समझ गया था आग भड़क रही है कही न कही छोटी की चू त मै भी।

ये खेल मालिश का लगभग ऐसे ही एक वीक ही चल सका। फिर मालिश बंद हो गई।.... अगले भाग में ..,


बात बहुत पुरानी है, एक दिन छोटी बहन ने छत पे लिंग को सहलाते हुए देखा। ये बात को बीते सालों बीत गए। फिर एक दिन एग्जाम सेंटर से वापिस लाते वक़्त इतना आंधी और बारिश पड़ी कि हम भीग गए और लंबा सफ़र हमने स्कूटी पर सफ़र किया एक दूसरे से कभी कभी सट जाते थे। तो मेरे अंदर इन दोनों मोड़ से बहन के प्रति incest जागा। फिर वो कभी कम नहीं हुआ।

फिर काफी बार नोटिस किया कि जब हम कहीं जाते तो वो जानबूझ कर अपने दूदू मेरी कमर पर सटा देती थी।


एक दिन एक घटना घटी की उसकी कमर में कंधे से नीचे चोट लगी मेरे द्वारा ही एक ही जगह मुक्के मारने से। फिर दो दिन बाद मैने माफी मांगी और मालिश करने को उकसाया।
छोटी ने मना भी नहीं किया तो जब वो टीशर्ट ऊपर करती तो ब्रा साफ दिखती और गौरी पीठ से मेरे अंदर incest बढ़ने लगा । लगातार कई दिन और मालिश करता रहा तो दूसरे या तीसरे दिन मैने बोला छोटी ब्रा गंदी हो जाएगी इसे भी उतार लेती। तो मैने अपने हाथों से जब ब्रा खोली तो भगवान कसम मेरा लंड इतना तनाव में था कि मेरा वीर्य निकल गया।
ब्रा पूरी नहीं खोली सिर्फ हुक खोले तो छोटी ने अपने हाथों से अपने दूदू छिपाए रखे। मैं मालिश कंधे की करने के लिए बोला था लेकिन मेरे अंदर की उत्तेजना ने पूरी कमर को नीचे तक और जानबूझकर कांख के आसपास मालिश करता रहता था।
मै इस दौरान कई बार समझा था जब किसी बात को लेकर बात करता तो उसकी सांस भारी और आवाज में मादकता होती और आवाज में सिसकी तो नहीं लेकिन जवाब क्लियर भी नहीं होता तो मैं समझ गया था आग भड़क रही है कही न कही छोटी की चू त मै भी।

ये खेल मालिश का लगभग ऐसे ही एक वीक ही चल सका। फिर मालिश बंद हो गई।

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Tumne kabhi chhoti ko fuck kiya hai..
हां हम कई महीनों साथ सोए और सम्बन्ध भी बनाए..
ऐसे ही चलता रहा कुछ दिन, जब वो कपड़े धोती या खाना बनाती तो मैं सच बताऊं तो छोटी की गांड़ देख देख के अपना लिंग मसलता रहता था। इससे मेरे मन में अंदर तक छोटी के प्रति उसकी चू त को भोगने की हवस जागती चली गई। एक परसेंट भी गिल्ट जैसा नहीं लगता था ना बुरा लगा कि सगी बहन है ऐसा क्यों करूं, ऐसे विचार नहीं लाऊ लेकिन उसकी गांड़ और दुदू को टीशर्ट के ऊपर से देखते ही मेरा लिंग तन जाता था।
कभी कभी सोते समय और सुबह सुबह चद्दर में से जानबूझकर सोने का नाटक करके अपने लिंग को तनाव में लाके ऊपर की ओर तंबू बना देता और सोने का नाटक करते रहता था। उससे भी शायद उसके भी मन में उत्तेजना चल रही होगी शायद।
एक दिन रात को वो अपने बेड पर सो रही थी तो मैने देखा उसकी टीशर्ट पेट के ऊपर तक दूदू से थोड़ा नीचे तक खिसकी हुई है और उसकी नाभि और पेट साफ साफ दिखाई दे रहा था। वैसे लाइट बंद थी लेकिन रोड़ लाइट रोशनदान से आती थी तो हल्का हल्का दिखता था। लेकिन पेट और नाभि की गहराई साफ़ पता चल रही थी। उस रात मैने उल्टा लेटकर बिस्तर पर अपने लिंग को रगड़ा था। कुछ देर बीती वो हिली और tshirt थोड़ा और ऊपर कर ली, शायद इसलिए कि पंखा तो चल रहा था लेकिन रूम में गर्मी थी। तब मुझे महसूस हुआ कि शायद वो भी जाग रही है और हां करवट भी मेरी तरफ थी उसकी और कुछेक देर में कसमस भी करती तो मेरा शक यकीन में बदलने लगा तो मैं शांत हो गया। उसके बाद भी एक आंख हल्की हल्की बंद कर करके नाभि और पेट देखते रहा। जब शायद, शायद उसे लगा भैया तो शांत हैं तो वो बाथरूम करने उठी, बाथरूम अटैच था तो यार जो charrrrrrr charrrrrrr shiiiiii charrr shiiii की साफ साफ आवाज मेरे कानों में पड़ी तो भगवान कसम मेरे से कंट्रोल नहीं हुआ। मुझे लगा जैसे वो मेरे लिंग पर मूत रही है और फिर मैं उसकी चू त चाट रहा हूं तो मेरा वीर्य निकल गया।
बाथरूम से आई तो मैं एकदम साइलेंट सीधा लेता था। फिर जब वो लेटी तो एक मिनट भी नहीं हुआ फिर वही पेट पूरा दिखाती हुई सोने का नाटक करने लगी शायद। उस रात मुझे महसूस हुआ सच में अगर उसी रात में छोटी बहन को कसकर पकड़ लेता और उसके होठों को अपने होठों में लेके चूसने लगता कुछ देर और उसके दूदू दबा देता तो वो अपनी चू त जरूर चटवा लेती और मेरा मन इतना चू त चाटने को ho रहा था जब बाथरूम से उसके मूतने की आवाज मेरे कानों में आ रही थी कि कम से कम आधे घंटे तो जरूर चाटता रहता। और मुझे यकीन था उस दिन मुझे उसकी चू त चाटने और चोदने को जरूर मिलती । दोनों तरफ मेरे लिंग में उसकी चू त में आग बराबर भड़क रही थी।

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आग भड़कती रही मेरे अंदर जब रात को सोते वक्त नाभि और पेट जानबूझ कर दिखा रही थी। फिर हम एक दिन 28 दिसंबर को कही दूसरे शहर शिफ्ट हुए तो सारा सामान पैक कर दिया था। सोने के लिए बस एक गद्दा बेड पर रखा। तो हम दोनों साथ ही सोए उस रात मैने तो जान बुझ कर लेकिन उसे भी पता होगा लेकिन मैने नींद का नाटक किया और उसके नाभि के नीचे चू त से ऊपर जहां से चू त के बाल चालू होते हैं वहां हाथ रख कर सो गया। छोटी ने हाथ हटाने की कोशिश भी नहीं की तो मेरे अंदर हिम्मत बढ़ती गई और सुबह चार बजे के आसपास उसकी टीशर्ट ऊपर थोड़ी से हो रखी थी तो फिर मैने उसकी और करवट लेके उसके पेट को छू दिया तो ईमानदारी से बताऊं तो इतना मुलायम पेट था, मैने पहले भी छुए लड़कियों के पेट लेकिन इतना मुलायम कभी नहीं छुआ किसी लड़की। मुझे इतना एक्साइटमेंट फील हुआ जैसे उस दिन मालिश के समय वीर्य निकल गया उतना ही लेकिन इस बार लिंग तनाव में था लेकिन रगड़ने के लिए उचित समय और जगह नहीं थी, हालांकि छोटी की जांघ पर लिंग सटा हुआ था, दबाव भी दे रहा था हल्के हल्के लेकिन रगड़ा नहीं। यहां से मेरा यकीन पक्का हुआ कि आगे बढ़ा जा सकता है क्योंकि कोई विरोध देखने को नहीं मिला। फिर हम अगली सुबह दूसरे शहर शिफ्ट हुए।

नए घर में हम दोनों बस ( आप सोच रहे हैं कि सिर्फ हम दोनों ही, जी हां ये अलग कहानी है, जीजू और छोटी में कुछ साल रिश्ते में अनबन चली उसकी लेकिन उसका विवरण करना ना उचित है ना जरूरत) शाम को जब बिस्तर सेट करने लगे तो मेरी बहन ने पूछा कैसे कैसे लगाऊं बेड तो मैने कहा एक ही बेड को अच्छे से दोनों गद्दे लगा के सेट कर लीजिए। छोटी भी शायद यही चाहती थी तो उसने कोई प्रश्न ही नहीं किया, बस बोली ठीक है। तब भी मुझे लगा आग शायद उसकी भी चू त में उतनी ही भड़क रही है जितना मेरे लिंग में रोज बहन को सोच सोच के तनाव रहता है। तो 29दिसंबर से हम दोनों ने उस दिन के बाद एक ही बिस्तर पर सोना प्रारंभ कर दिया। दिन में हम एक बेड अलग करके हॉल में भी लगा देते थे क्योंकि हम सबकी नजर में भाई बहन थे और असलियत में भी थे ही तो वाजिब है दो बिस्तर होने ही चाहिए थे। वो भी तब जब दोनों की उम्र 30 के इर्दगिर्द है।
रोज साथ सोते और एक दूसरे से सट् के सोते। मै तो रोज उसके पेट पर अब तो नंगे पेट पर उसकी मुलायम त्वचा का एहसास करता और लिंग को मज़े देता।
दो या तीन दिन ही गुजरे होंगे मैने रात को एक दिन उसके होठों के पास अपने होंठ लेजाकर महसूस किया। आह क्या मजा आया बिना छुए ही। फिर मुझसे सच में रहा नहीं गया और कुछ ही मिनट बाद मैने उसके होठों की एक चुम्मी ले ली। और सहम कर धड़कन रुक सी गई इसलिए कि कहीं विरोध तो ना करेगी।
फिर मैने फिर से उसके होठों पर अपने होंठ रख दिए और चूसने लगा। आह भाई क्या रस था बस एक मिनट चूसने को मिला फिर में अपनी करवट बदल कर सो गया और सुबह का इंतजार करने लगा। वो मुझसे पहले खड़ी हो गई थी तो जब मैं खड़ा हुआ तो मैने देखा सब नॉर्मल। उसने खाने का पूछा तो खाना बना और हां वो मालिश वाले दिनों के समय से ही हम साथ खाना खाते थे तो एक्साइटमेंट वहां से भी पैदा हुआ था।
अब जब उसने सुबह से दिन भर कुछ नहीं कहा तो ये सिलसिला चल पड़ा। ऐसे ही बस उसके पेट को सहलाता और रोज उसके होठों को चूसने लगा देर देर तक वो बस इतना ही कहती। नहीं भई ना भई, ना भई। और मैं पीता रहता था। लेकिन उसने अपने होंठों को हटाने की कोशिश नहीं की, फिर धीरे धीरे मैने उसके दुदू दबाना और पीना शुरू कर दिया। एक दिन तो दूदू पीते पीते मेरा वीर्य निकल गया था उसकी जांघों को रगड़ते रगड़ते।

आगे कैसे मैने उसकी चू त चाट चाट कर मजे लिए नेक्स्ट टाइम बताता हूं
एक और रियल पिक्चर भेज रहा हूं... भगवान कसम एक दम रियल है। फेस थोड़ा इरेज करता हूं प्राइवेसी के लिए।

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file-00000000e04c71f6af34dd4491bdf7fa file-000000007cdc71fa9096ad7a9db92457शेष अगले बार समय मिलेगा तो लिखेंगे
 
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