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Fantasy Aryamani:- A Pure Alfa Between Two World's

nain11ster

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भाग:–174


जीजू इस सवाल का जवाब तो देते लेकिन उपस्थित हो तब न। आर्यमणि, अमेया को लेकर अंतर्ध्यान हो चुका था। दोनो एक रेस्टोरेंट में थे और वहां आर्यमणि ने चॉकलेट केक ऑर्डर कर दिया। अमेया जितनी हैरान थी उतनी खुश भी। वहीं आर्यमणि, अमेया को देख उसके आंसू रुक ही नही रहे थे।

ढेर सारी जगह पर दोनो साथ घूमे। कई सारे झूलों पर दोनो साथ झूले। इस बीच ओर्जा, जिसकी टेलीपैथी दुनिया की सबसे कमाल की टेलीपैथी थी वह कोशिश करके देख ली, लेकिन आर्यमणि के दिमाग के आस पास भी कोई फटक न पाया। साथ में अमेया भी थी लेकिन अमेया के पास न तो कोई मंत्र, ना कोई तंत्र, न कोई हथियार और न ही कोई वार उसे छू सकती थी। उसका जन्म ही इतना अलौकिक था कि हर शक्ति निष्प्रभावित हो जाती थी। तभी तो जिस किसी ने अमेय को स्पर्श किया, ऐसी अलौकिक शांति खुद में मेहसूस करते थे जो उन्होंने जीवन में पहले कभी मेहसूस न किया हो।

पूरे एक दिन बाद आर्यमणि सीधा अंतर्ध्यान होकर सात्विक गांव पहुंचा। इस पल में सबसे बड़ा सवाल तो यही था कि कैसे आर्यमणि अन्यर्ध्यान होकर इस अलौकिक गांव तक पहुंच सकता था। तब आर्यमणि ने जादूगर महान की एक बात सबको याद दिलाई.... “मैं नर भेड़िया हूं और बहुत सी बाधाएं मेरे इस रूप के कारण अपने आप ही समाप्त हो जाती है। मै इस लोक में तो क्या दूसरी दुनिया में भी अंतर्ध्यान होकर जा सकता हूं, जिसे विपरीत या नकारात्मक शक्तियों की दुनिया भी कहते है।”

सुनकर ही सब आश्चर्य और खुशी, दोनो ही भाव दे रहे थे। वहीं बीते दिन बिना बताए गायब होने के लिये आर्यमणि ने माफी मांगा। अपनी सफाई में बस उसने इतना ही कहा की एक दिन सिर्फ पिता–पुत्री और दूसरा कोई नहीं। हर कोई आर्यमणि की भावना का मुस्कुराकर स्वागत किया।

आर्यमणि, ऋषि शिवम के लिये खुश था। काफी समय बाद इस धरती ने किसी ऋषि का उदय होते हुये देखा था। ऋषि शिवम् अपनी शिक्षा पूर्ण कर चुके थे। अपने तप से उन्होंने ब्रह्म ज्ञान को पा लिया था और एक बार फिर आर्यमणि के साथ सफर पर जाना चाहते थे। रूही, इवान और अलबेली के जाने का गम उन्हे भी काफी था। और उन सबसे बढ़कर ऋषि शिवम् को हत्याकांड वाले दिन की पूरी कहानी जाननी थी।

हत्याकांड वाले दिन की पूरी कहानी तो बहुत से लोगों को जाननी थी, लेकिन उस से भी ज्यादा सबको उन सालों का हिसाब चाहिए था जिनमे आर्यमणि नही था और न ही किसी से संपर्क किया। ओजल और निशांत दोनो ने पूछ–पूछ कर पागल बना रखा था। हत्याकांड वाले दिन की छोटी सी औपचारिक चर्चा के बाद आर्यमणि ने उन बीते सालों की व्यथा बयां कर दिया, जिनमे वो किसी से संपर्क नही कर पाया और महासागर में ही फंसा रहा।

आचार्य जी तो फूले न समा रहे थे जब उन्हे पता चला की आर्यमणि नागलोक की भूमि और जल योग में बैठे योगियों की सभा में अपनी साधना को सिद्ध कर आया था। हां लेकिन पूरी कहानी सुनाते–सुनाते आर्यमणि फिर से अपने पैक के खोने के गम में खो गया।

एक बार फिर सांत्वना का हाथ आर्यमणि के कंधे पर था। लेकिन इस बार महा नही थी, बल्कि आर्यमणि का पूरा परिवार था। उनके लिये तो आर्यमणि मर चुका था किंतु उसे प्रत्यक्ष सामने देख फिर उनके भी आंसू नहीं रुके। भूमि, जया और केशव, आर्यमणि को जीवित देखकर पूरे व्याकुलता से उससे मिल रहे थे।

कुछ दिनों तक आर्यमणि सब लोगों के बीच सात्त्विक गांव में ही रहा। कुछ दिन अलौकिक गांव में विश्राम के बाद आर्यमणि एक बार फिर अपनी यात्रा पर जाने के लिये तैयार था। जाने से पहले आर्यमणि आचार्य जी से मिला.... “शांत चेहरे के पीछे का रोष मैं मेहसूस कर सकता हूं।”...

आर्यमणि:– अपस्यु से कहिएगा कुछ दिन तक थोड़ा संभल कर काम करे। मै कुछ लोगों को उसके अंजाम तक पहुंचाने के बाद, उसका साथ दूंगा।

आचार्य जी:– उन तक संदेश पहुंच जायेगा। वैसे उन्होंने भी एक संदेश दिया है। गुरु अपस्यु चाहते है, यात्रा की शुरवात आप उनकी तय जगह से शुरू करे। इसके अलावा 2 दिन बाद पलक की शादी है, और गुरु अपस्यु ने कहा है आगे आपकी मर्जी।

आर्यमणि:– मन को असीम सुख देने वाला यह सूचना थी। अब आज्ञा चाहूंगा आचार्य जी।

आचार्य जी:– गुरु आर्यमणि आपके दोनो बच्चों की शिक्षा यहीं होगी और ये आग्रह नही आदेश है। इसके अलावा मुझे पता चला की शेषनाग लोक धरती फिर से पूर्ण विकसित हो कर अलौकिक जीवों का घर बन चुका है। वहां से मुझे एक जोड़े बारासिंघा, एक जोड़े नील गाय, एक जोड़ा कामधेनु गाय, एक जोड़ा ऐरावत हाथी, 4 जोड़े गरुड़, एक जोड़ा एकश्रींगी अश्व, कुछ सुंदर और मनमोहक पंछियों के जोड़े, कुछ सुंदर सकहारी जानवर आज ही अपने गांव ले आओ। इसके अलावा यहां के बगीचों में सुंदर पुष्प और जहरीले पौधों की कमी नही होनी चाहिए। सरोवर में मुझे पूरा जलीय तंत्र के जीव चाहिए। और गुरुदेव ध्यान रहे मीठे पानी का जलीय जीव लेकर आइयेगा।

आर्यमणि, अपने हाथ जोड़ते.... “सब आज ही हो जायेगा आचार्य जी, तभी मैं यहां से निकलूंगा। और कुछ...

आचार्य जी:– हां आप अपनी एक यात्रा पूरी कर आएं। उसके बाद गुरु अपस्यु की मदद के लिये जाने से पहले यहां 2000 कुटिया का निर्माण भी आपको ही करना है।

आर्यमणि:– हो जायेगा आचार्य जी। क्या अब मैं जा सकता हूं?

आचार्य जी:– बिलकुल गुरुदेव आप प्रस्थान करे। और हां एक भी दोषी को मुक्ति नही दीजिएगा गुरुदेव...

“ऐसा ही होगा आचार्य जी।”... इतना कहकर आर्यमणि आचार्य जी की कुटिया से निकल आया। वहां से निकलकर वह आगे कुछ करने जाता उस से पहले ही आर्यमणि से मिलने ऋषि शिवम पहुंच चुके थे। चेहरे पर मुस्कान और शरारती सवालिया नजर। उनके हाव–भाव देख आर्यमणि की हंसी निकल गयी।

आर्यमणि:– आप पीछा नहीं छोड़ते वाले ये मैं जानता हूं। लेकिन ऋषिवर आप तो मेरी दुविधा समझिए, यहां मैं कुछ नही कह सकता।

ऋषि शिवम्:– आपके अभिनय को नमन। खुद तो झूठ बोल ही रहे, ऊपर से आंसू भी निकाल रहे। कैसे गुरुदेव...

आर्यमणि:– कहानी थोड़ी अलग हो सकती है पर दिल का वियोग कोई अभिनय नही। वाकई में मैं दो राहों के बीच फंसा हूं। कुछ दिन और इसे चलने देते है।

ऋषि शिवम्:– मतलब कुछ दिनों तक मैं भी यह भूल जाऊं की 3 एमुलेट अब तक मेरे पास नही पहुंचे। जल्दी कीजिए गुरुदेव, सारे काम छोड़कर पहले इसे ही सुलझा दीजिए...

आर्यमणि:– आपको क्या लगता है, मैं क्या इस विषय में नही सोच रहा। पहले पूरे लोगों को उलझा लेने दीजिए। फिर आपके साथ एक चर्चा होगी उसके बाद निर्णय लेते है।

ऋषि शिवम:– हां इसलिए तो आपके साथ आ रहा हूं। मै तो इतना ही कहूंगा लापता होने के लिये 4 साल बहुत ज्यादा वक्त है, जो भी करना है जल्दी कीजिए।

आर्यमणि:– अब तो साथ चल ही रहे है। बिना देर लगाये सारा काम होगा। शिवम सर आप जब तक यात्रा पर निकलने वालों को समेटिए तब तक मैं आचार्य जी का काम कर देता हूं।

ऋषि शिवम ने यात्रा पर चलने वालों को समेटना शुरू किया और इधर आर्यमणि अंतर्ध्यान होकर सीधा शेषनाग क्षेत्र के जमीनी भू–भाग में पहुंचा। वहां के जंगलों से जानवरों और पंछियों को । इधर जबतक महा ने सरोवर को मीठे जलीय जीव से भर दिया। जाने से पहले आर्यमणि ने वहां के बगीचे को ठीक वैसे ही हरा–भरा कर दिया जैसा आचार्य जी चाहते थे।

आधे दिन में पूरा काम समाप्त करने के बाद आर्यमणि, कुछ नए और कुछ पुराने सदस्यो से सुसज्जित अल्फा पैक को लेकर निकला। जिसमे 2 वुल्फ (आर्यमणि और ओजल), 3 महान जादूगर (ओजल, निशांत और महा), अलौकिक शक्ति के साथ पैदा हुई 2 स्त्री, जो महान पराक्रमी थी (महा और ओर्जा), 2 सिद्ध प्राप्त तपस्वी, जिन्होंने कई मंत्र सिद्ध किये थे और जो टेलीपोर्टेशन कर सकते थे (आर्यमणि और ऋषि शिवम) और एक ब्रह्म ज्ञान प्राप्त ऋषि (शिवम) साथ चल रहे थे।

ओर्जा को छोड़कर सभी अंतर्ध्यान होकर नैनीताल के उस अग्नि कुंड वाली जगह पर पहुंचे, जहां वर्षो पहले गुरु निशि और उनके शिष्यों को जिंदा आग में झोंक दिया गया था। बड़ा सा कुंवानुमा गड्ढा आज भी वहां था। और चारो ओर धूल... आर्यमणि ने एक छोटा सा कमांड दिया और उस कुएं का गहरा तल धीरे–धीरे करके ऊपर आने लगा।

वह तल जमीन से 10 फिट ऊंचा गया और आंखों के सामने जंग लगे लोहे का गोल ढांचा था। उसी ढांचे के बीच एक छोटा सा दरवाजा भी था। दरवाजा जब खुला तब सबको कहना पड़ गया.... मानना होगा बाहर से देखो तो कितना पुराना लगता है, लेकिन अंदर की बनावट तो किसी पांच सितारे होटल की लिफ्ट की तरह थी।

खैर उस लिफ्ट से पूरा अल्फा पैक नीचे पहुंचा। 10 मीटर का छोटा सा गलियारा पार करने के बाद पूरा अल्फा पैक जैसे वाकई किसी पांच सितारा होटल के लॉबी में पहुंचे हो। उस लॉबी के पास लगे मार्किंग से आर्यमणि समझ गया की उसे कहां जाना था। पूरे पैक के साथ वह एक दरवाजे पर खड़ा था। दरवाजा जैसे ही खुला, एक व्यक्ति रेंगते हुये धीरे–धीरे बाहर आया।

“कहां तुम राजा की तरह जीने वाले, और देखो तो तुम्हारी क्या हालत बना दी गयी है। लगता है काफी तकलीफ में हो जीजा जी”....

“पानी... पानी... पानी”....

नीचे रेंगते हुये जयदेव पहुंचा था। पिछले 4 वर्षों से वो यहां का अंधियारा कैद झेल रहा था। इस जगह की जेल का उद्घाटन शायद जयदेव ने ही किया था। उसके बाद ही गुरु निशि के कत्ल में जिन इंसानों का सीधा हाथ था उन्हे यहां की जेल में लाया गया था। आजीवन अंधकार भोगने की सजा। खाना उतना ही जितना जीवित रह सके और पानी पूरे दिन में एक बार।

आर्यमणि तो फिर भी बात कर रहा था बाकियों ने तो अपने नाक दबाकर दूरियां बना ली थी। करे भी क्यों न, जयदेव के शरीर से गंदी सड़ी सी बास आ रही थी। जयदेव एक बार फिर अपना सर ऊपर करके पानी, पानी करने लगा। पीछे से सबके आवाज भी आने लगे.... “सरे हुये मल की बदबू कैसे बर्दास्त हो रही है आर्य।”...

तभी आर्यमणि भी चार कदम पीछे हटते.... "क्या यार जीजू... सारे अवांछित काम एक ही जगह करने पड़ रहे है क्या? रुको पहले तुम्हारे जगह और फिर तुम्हारी सफाई की व्यवस्था करवा दूं।”.... इतना कहकर आर्यमणि ने एक बार फिर कमांड दिया और जयदेव वापस से अपने अंधेरी कोठरी में।

पीछे से नाक पर हाथ दिये महा कहने लगी.... “पतिदेव जाओ आप भी स्नान कर लो। गंदा बास मार रहे हो।”...

आर्यमणि:– पर पहले मुझे एक बार गले लगाने की इच्छा हो रही है।

महा:– ठीक है लगा लीजिए गले फिर दोनो साथ नहाने जायेंगे...

आर्यमणि:– तुम पलटवार भी कर लेती हो महा। ठीक है आ रहा हूं मैं।

निशांत:– अबे भूल जा हम यहां है। अकेला क्यों जा रहा। जिसकी इतनी हॉट बीवी हो वो साथ नहाने से हिचकिचाते नही।

ओजल:– तभी एक दिन ओर्जा के पीछे–पीछे बाथरूम में घुसे थे और हवाई जहाज की तरह सीधा कीचड़ में लैंड किये।

निशांत:– नाना, वो तो तुम्हे भ्रम दिखा था। वो मैं नही था।

ओजल:– निशांत, मुझे तुम्हारा भ्रम भी दिखा था, और उसका नतीजा भी हम सबने देखा था। ओर्जा को इंप्रेस करने के चक्कर में जो तुमने होशियारी की थी ना। मारो, मुझे मारो, मुझे जरा भी चोट नही लग सकती।

महा:– इसे चोट क्यों नही लग सकती थी...

ओजल:– दीदी ये भ्रम पैदा करता है। आपको लगेगा पास ही खड़ा हो पर रहता कहीं और है।

महा:– काफी अनोखी शक्ति है, और उतने ही कमाल की भी। फिर क्या हुआ, ओर्जा, निशांत जी को मारने के प्रयास में थक गयी क्या?

ओजल :– नही दीदी... वो इतना तेज दौड़ी की लगभग वो गायब ही हो गयी। अपने टेलीपैथी के जरिए निशांत के दिमाग से जुड़ी और हवा में ऐसा मुक्का रखकर दी की ये तीन दिन तक बेहोश रहा।

निशांत:– कुछ भी हां...

ओजल:– शिवम सर देखो ये सच स्वीकार नहीं रहा।

निशांत:– मैं अकेला थोड़े ना हूं। इस लिस्ट में तो तुम दोनो का नाम भी है। आज तक दोनो कभी स्वीकार किये की एक दूसरे से प्यार करते हो।

जबतक इनकी बातें हो रही थी, आर्यमणि भी फ्रेश होकर आ गया। जैसे ही आया निशांत की बात सुनकर चौंकते हुये..... “क्या सच में शिवम् सर।”..

ओजल:– यात्रा शुरू होते ही उन्होंने मौन लिया है। वैसे सारी पंचायत यहीं कर लेनी है या जो करने आये थे वो कर ले।

ओजल की बात सुनकर आर्यमणि आगे का काम शुरू कर दिया। जयदेव एक बार फिर बाहर था। नहाने के वक्त लगता है खूब पानी पिया था, इसलिए अपने पैडों पर खड़ा होकर आ रहा था।.... “सुनो आर्य मुझे किस बात की सजा दे रहे। तुम्हे या तुम्हारे पैक को मारने की साजिश माया ने रची थी।”...

आर्यमणि:– ओजल कल पलक की शादी में वेडिंग गिफ्ट ले जाना है। जल्दी करो जब तक हम ऊपर जा रहे।

इधर आर्यमणि की बात समाप्त हुई उधर कल्पवृक्ष दंश के एक ही वार से जयदेव का फरफराता हुआ धर जमीन पर और सर हवा में। रुको जीजू मैं भी आयी। पलक की शादी का गिफ्ट तो ले लिया, लेकिन शादी में पहन के जाने लायक कपड़े कहां है।

आर्यमणि जमीन पर गिरे धर को ठिकाने लगाते...... “चलो फिर पहले शॉपिंग ही करते है।”..

ओजल:– शॉपिंग के लिये कहां चले...

आर्यमणि:– दिल्ली ही चलते है। वैसे भी आज तक मैं कभी दिल्ली नही गया...

निशांत:– हां यार आज तक मैं भी कभी राजधानी नही गया...

ओजल:– मैं तो कहीं गयी ही नही...

महा:– तो फिर चलो दिल्ली...

एक पूरा दिन ये लोग दिल्ली में शॉपिंग करते रहे। रात को इन सब ने अपस्यु की पत्नी ऐमी के पिता सिन्हा जी के यहां की मेहमाननवाजी भी स्वीकार किये, और भोर होने पर जब सिन्हा जी नाश्ते के लिये सबको उठाने पहुंचे तब सभी बिस्तर से गायब थे। दरअसल रात के खाने के बाद ही ये लोग अंतर्ध्यान होकर मालदीव पहुंच चुके थे। मालदीव के ही किसी आइलैंड पर पलक की शादी थी और दूल्हा किसी दूर ग्रह का निवासी था।

टापू पर हुये अल्फा पैक हत्याकांड को लगभग 4 साल हो गये थे। इन 4 सालों में बहुत से बदलाव भी आये थे। आम नायजो के बीच केवल पलक ही पलक छाई थी। उसका जलवा ऐसा था कि जहां भी होती किसी और का वजूद दिखता ही नही था। इसका एक कारण यह भी था कि पलक की तरह सोचने वाले काबिल नायजो की तादात इतनी हो चुकी थी कि किसी भी सिस्टम को चुनौती दे दे। जहां भी जाति हुजूम पीछे चला आता।

 

CG

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Bhupinder Singh

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भाग:–174


जीजू इस सवाल का जवाब तो देते लेकिन उपस्थित हो तब न। आर्यमणि, अमेया को लेकर अंतर्ध्यान हो चुका था। दोनो एक रेस्टोरेंट में थे और वहां आर्यमणि ने चॉकलेट केक ऑर्डर कर दिया। अमेया जितनी हैरान थी उतनी खुश भी। वहीं आर्यमणि, अमेया को देख उसके आंसू रुक ही नही रहे थे।

ढेर सारी जगह पर दोनो साथ घूमे। कई सारे झूलों पर दोनो साथ झूले। इस बीच ओर्जा, जिसकी टेलीपैथी दुनिया की सबसे कमाल की टेलीपैथी थी वह कोशिश करके देख ली, लेकिन आर्यमणि के दिमाग के आस पास भी कोई फटक न पाया। साथ में अमेया भी थी लेकिन अमेया के पास न तो कोई मंत्र, ना कोई तंत्र, न कोई हथियार और न ही कोई वार उसे छू सकती थी। उसका जन्म ही इतना अलौकिक था कि हर शक्ति निष्प्रभावित हो जाती थी। तभी तो जिस किसी ने अमेय को स्पर्श किया, ऐसी अलौकिक शांति खुद में मेहसूस करते थे जो उन्होंने जीवन में पहले कभी मेहसूस न किया हो।

पूरे एक दिन बाद आर्यमणि सीधा अंतर्ध्यान होकर सात्विक गांव पहुंचा। इस पल में सबसे बड़ा सवाल तो यही था कि कैसे आर्यमणि अन्यर्ध्यान होकर इस अलौकिक गांव तक पहुंच सकता था। तब आर्यमणि ने जादूगर महान की एक बात सबको याद दिलाई.... “मैं नर भेड़िया हूं और बहुत सी बाधाएं मेरे इस रूप के कारण अपने आप ही समाप्त हो जाती है। मै इस लोक में तो क्या दूसरी दुनिया में भी अंतर्ध्यान होकर जा सकता हूं, जिसे विपरीत या नकारात्मक शक्तियों की दुनिया भी कहते है।”

सुनकर ही सब आश्चर्य और खुशी, दोनो ही भाव दे रहे थे। वहीं बीते दिन बिना बताए गायब होने के लिये आर्यमणि ने माफी मांगा। अपनी सफाई में बस उसने इतना ही कहा की एक दिन सिर्फ पिता–पुत्री और दूसरा कोई नहीं। हर कोई आर्यमणि की भावना का मुस्कुराकर स्वागत किया।

आर्यमणि, ऋषि शिवम के लिये खुश था। काफी समय बाद इस धरती ने किसी ऋषि का उदय होते हुये देखा था। ऋषि शिवम् अपनी शिक्षा पूर्ण कर चुके थे। अपने तप से उन्होंने ब्रह्म ज्ञान को पा लिया था और एक बार फिर आर्यमणि के साथ सफर पर जाना चाहते थे। रूही, इवान और अलबेली के जाने का गम उन्हे भी काफी था। और उन सबसे बढ़कर ऋषि शिवम् को हत्याकांड वाले दिन की पूरी कहानी जाननी थी।

हत्याकांड वाले दिन की पूरी कहानी तो बहुत से लोगों को जाननी थी, लेकिन उस से भी ज्यादा सबको उन सालों का हिसाब चाहिए था जिनमे आर्यमणि नही था और न ही किसी से संपर्क किया। ओजल और निशांत दोनो ने पूछ–पूछ कर पागल बना रखा था। हत्याकांड वाले दिन की छोटी सी औपचारिक चर्चा के बाद आर्यमणि ने उन बीते सालों की व्यथा बयां कर दिया, जिनमे वो किसी से संपर्क नही कर पाया और महासागर में ही फंसा रहा।

आचार्य जी तो फूले न समा रहे थे जब उन्हे पता चला की आर्यमणि नागलोक की भूमि और जल योग में बैठे योगियों की सभा में अपनी साधना को सिद्ध कर आया था। हां लेकिन पूरी कहानी सुनाते–सुनाते आर्यमणि फिर से अपने पैक के खोने के गम में खो गया।

एक बार फिर सांत्वना का हाथ आर्यमणि के कंधे पर था। लेकिन इस बार महा नही थी, बल्कि आर्यमणि का पूरा परिवार था। उनके लिये तो आर्यमणि मर चुका था किंतु उसे प्रत्यक्ष सामने देख फिर उनके भी आंसू नहीं रुके। भूमि, जया और केशव, आर्यमणि को जीवित देखकर पूरे व्याकुलता से उससे मिल रहे थे।

कुछ दिनों तक आर्यमणि सब लोगों के बीच सात्त्विक गांव में ही रहा। कुछ दिन अलौकिक गांव में विश्राम के बाद आर्यमणि एक बार फिर अपनी यात्रा पर जाने के लिये तैयार था। जाने से पहले आर्यमणि आचार्य जी से मिला.... “शांत चेहरे के पीछे का रोष मैं मेहसूस कर सकता हूं।”...

आर्यमणि:– अपस्यु से कहिएगा कुछ दिन तक थोड़ा संभल कर काम करे। मै कुछ लोगों को उसके अंजाम तक पहुंचाने के बाद, उसका साथ दूंगा।

आचार्य जी:– उन तक संदेश पहुंच जायेगा। वैसे उन्होंने भी एक संदेश दिया है। गुरु अपस्यु चाहते है, यात्रा की शुरवात आप उनकी तय जगह से शुरू करे। इसके अलावा 2 दिन बाद पलक की शादी है, और गुरु अपस्यु ने कहा है आगे आपकी मर्जी।

आर्यमणि:– मन को असीम सुख देने वाला यह सूचना थी। अब आज्ञा चाहूंगा आचार्य जी।

आचार्य जी:– गुरु आर्यमणि आपके दोनो बच्चों की शिक्षा यहीं होगी और ये आग्रह नही आदेश है। इसके अलावा मुझे पता चला की शेषनाग लोक धरती फिर से पूर्ण विकसित हो कर अलौकिक जीवों का घर बन चुका है। वहां से मुझे एक जोड़े बारासिंघा, एक जोड़े नील गाय, एक जोड़ा कामधेनु गाय, एक जोड़ा ऐरावत हाथी, 4 जोड़े गरुड़, एक जोड़ा एकश्रींगी अश्व, कुछ सुंदर और मनमोहक पंछियों के जोड़े, कुछ सुंदर सकहारी जानवर आज ही अपने गांव ले आओ। इसके अलावा यहां के बगीचों में सुंदर पुष्प और जहरीले पौधों की कमी नही होनी चाहिए। सरोवर में मुझे पूरा जलीय तंत्र के जीव चाहिए। और गुरुदेव ध्यान रहे मीठे पानी का जलीय जीव लेकर आइयेगा।

आर्यमणि, अपने हाथ जोड़ते.... “सब आज ही हो जायेगा आचार्य जी, तभी मैं यहां से निकलूंगा। और कुछ...

आचार्य जी:– हां आप अपनी एक यात्रा पूरी कर आएं। उसके बाद गुरु अपस्यु की मदद के लिये जाने से पहले यहां 2000 कुटिया का निर्माण भी आपको ही करना है।

आर्यमणि:– हो जायेगा आचार्य जी। क्या अब मैं जा सकता हूं?

आचार्य जी:– बिलकुल गुरुदेव आप प्रस्थान करे। और हां एक भी दोषी को मुक्ति नही दीजिएगा गुरुदेव...

“ऐसा ही होगा आचार्य जी।”... इतना कहकर आर्यमणि आचार्य जी की कुटिया से निकल आया। वहां से निकलकर वह आगे कुछ करने जाता उस से पहले ही आर्यमणि से मिलने ऋषि शिवम पहुंच चुके थे। चेहरे पर मुस्कान और शरारती सवालिया नजर। उनके हाव–भाव देख आर्यमणि की हंसी निकल गयी।

आर्यमणि:– आप पीछा नहीं छोड़ते वाले ये मैं जानता हूं। लेकिन ऋषिवर आप तो मेरी दुविधा समझिए, यहां मैं कुछ नही कह सकता।

ऋषि शिवम्:– आपके अभिनय को नमन। खुद तो झूठ बोल ही रहे, ऊपर से आंसू भी निकाल रहे। कैसे गुरुदेव...

आर्यमणि:– कहानी थोड़ी अलग हो सकती है पर दिल का वियोग कोई अभिनय नही। वाकई में मैं दो राहों के बीच फंसा हूं। कुछ दिन और इसे चलने देते है।

ऋषि शिवम्:– मतलब कुछ दिनों तक मैं भी यह भूल जाऊं की 3 एमुलेट अब तक मेरे पास नही पहुंचे। जल्दी कीजिए गुरुदेव, सारे काम छोड़कर पहले इसे ही सुलझा दीजिए...

आर्यमणि:– आपको क्या लगता है, मैं क्या इस विषय में नही सोच रहा। पहले पूरे लोगों को उलझा लेने दीजिए। फिर आपके साथ एक चर्चा होगी उसके बाद निर्णय लेते है।

ऋषि शिवम:– हां इसलिए तो आपके साथ आ रहा हूं। मै तो इतना ही कहूंगा लापता होने के लिये 4 साल बहुत ज्यादा वक्त है, जो भी करना है जल्दी कीजिए।

आर्यमणि:– अब तो साथ चल ही रहे है। बिना देर लगाये सारा काम होगा। शिवम सर आप जब तक यात्रा पर निकलने वालों को समेटिए तब तक मैं आचार्य जी का काम कर देता हूं।

ऋषि शिवम ने यात्रा पर चलने वालों को समेटना शुरू किया और इधर आर्यमणि अंतर्ध्यान होकर सीधा शेषनाग क्षेत्र के जमीनी भू–भाग में पहुंचा। वहां के जंगलों से जानवरों और पंछियों को । इधर जबतक महा ने सरोवर को मीठे जलीय जीव से भर दिया। जाने से पहले आर्यमणि ने वहां के बगीचे को ठीक वैसे ही हरा–भरा कर दिया जैसा आचार्य जी चाहते थे।

आधे दिन में पूरा काम समाप्त करने के बाद आर्यमणि, कुछ नए और कुछ पुराने सदस्यो से सुसज्जित अल्फा पैक को लेकर निकला। जिसमे 2 वुल्फ (आर्यमणि और ओजल), 3 महान जादूगर (ओजल, निशांत और महा), अलौकिक शक्ति के साथ पैदा हुई 2 स्त्री, जो महान पराक्रमी थी (महा और ओर्जा), 2 सिद्ध प्राप्त तपस्वी, जिन्होंने कई मंत्र सिद्ध किये थे और जो टेलीपोर्टेशन कर सकते थे (आर्यमणि और ऋषि शिवम) और एक ब्रह्म ज्ञान प्राप्त ऋषि (शिवम) साथ चल रहे थे।

ओर्जा को छोड़कर सभी अंतर्ध्यान होकर नैनीताल के उस अग्नि कुंड वाली जगह पर पहुंचे, जहां वर्षो पहले गुरु निशि और उनके शिष्यों को जिंदा आग में झोंक दिया गया था। बड़ा सा कुंवानुमा गड्ढा आज भी वहां था। और चारो ओर धूल... आर्यमणि ने एक छोटा सा कमांड दिया और उस कुएं का गहरा तल धीरे–धीरे करके ऊपर आने लगा।

वह तल जमीन से 10 फिट ऊंचा गया और आंखों के सामने जंग लगे लोहे का गोल ढांचा था। उसी ढांचे के बीच एक छोटा सा दरवाजा भी था। दरवाजा जब खुला तब सबको कहना पड़ गया.... मानना होगा बाहर से देखो तो कितना पुराना लगता है, लेकिन अंदर की बनावट तो किसी पांच सितारे होटल की लिफ्ट की तरह थी।

खैर उस लिफ्ट से पूरा अल्फा पैक नीचे पहुंचा। 10 मीटर का छोटा सा गलियारा पार करने के बाद पूरा अल्फा पैक जैसे वाकई किसी पांच सितारा होटल के लॉबी में पहुंचे हो। उस लॉबी के पास लगे मार्किंग से आर्यमणि समझ गया की उसे कहां जाना था। पूरे पैक के साथ वह एक दरवाजे पर खड़ा था। दरवाजा जैसे ही खुला, एक व्यक्ति रेंगते हुये धीरे–धीरे बाहर आया।

“कहां तुम राजा की तरह जीने वाले, और देखो तो तुम्हारी क्या हालत बना दी गयी है। लगता है काफी तकलीफ में हो जीजा जी”....

“पानी... पानी... पानी”....

नीचे रेंगते हुये जयदेव पहुंचा था। पिछले 4 वर्षों से वो यहां का अंधियारा कैद झेल रहा था। इस जगह की जेल का उद्घाटन शायद जयदेव ने ही किया था। उसके बाद ही गुरु निशि के कत्ल में जिन इंसानों का सीधा हाथ था उन्हे यहां की जेल में लाया गया था। आजीवन अंधकार भोगने की सजा। खाना उतना ही जितना जीवित रह सके और पानी पूरे दिन में एक बार।

आर्यमणि तो फिर भी बात कर रहा था बाकियों ने तो अपने नाक दबाकर दूरियां बना ली थी। करे भी क्यों न, जयदेव के शरीर से गंदी सड़ी सी बास आ रही थी। जयदेव एक बार फिर अपना सर ऊपर करके पानी, पानी करने लगा। पीछे से सबके आवाज भी आने लगे.... “सरे हुये मल की बदबू कैसे बर्दास्त हो रही है आर्य।”...

तभी आर्यमणि भी चार कदम पीछे हटते.... "क्या यार जीजू... सारे अवांछित काम एक ही जगह करने पड़ रहे है क्या? रुको पहले तुम्हारे जगह और फिर तुम्हारी सफाई की व्यवस्था करवा दूं।”.... इतना कहकर आर्यमणि ने एक बार फिर कमांड दिया और जयदेव वापस से अपने अंधेरी कोठरी में।

पीछे से नाक पर हाथ दिये महा कहने लगी.... “पतिदेव जाओ आप भी स्नान कर लो। गंदा बास मार रहे हो।”...

आर्यमणि:– पर पहले मुझे एक बार गले लगाने की इच्छा हो रही है।

महा:– ठीक है लगा लीजिए गले फिर दोनो साथ नहाने जायेंगे...

आर्यमणि:– तुम पलटवार भी कर लेती हो महा। ठीक है आ रहा हूं मैं।

निशांत:– अबे भूल जा हम यहां है। अकेला क्यों जा रहा। जिसकी इतनी हॉट बीवी हो वो साथ नहाने से हिचकिचाते नही।

ओजल:– तभी एक दिन ओर्जा के पीछे–पीछे बाथरूम में घुसे थे और हवाई जहाज की तरह सीधा कीचड़ में लैंड किये।

निशांत:– नाना, वो तो तुम्हे भ्रम दिखा था। वो मैं नही था।

ओजल:– निशांत, मुझे तुम्हारा भ्रम भी दिखा था, और उसका नतीजा भी हम सबने देखा था। ओर्जा को इंप्रेस करने के चक्कर में जो तुमने होशियारी की थी ना। मारो, मुझे मारो, मुझे जरा भी चोट नही लग सकती।

महा:– इसे चोट क्यों नही लग सकती थी...

ओजल:– दीदी ये भ्रम पैदा करता है। आपको लगेगा पास ही खड़ा हो पर रहता कहीं और है।

महा:– काफी अनोखी शक्ति है, और उतने ही कमाल की भी। फिर क्या हुआ, ओर्जा, निशांत जी को मारने के प्रयास में थक गयी क्या?

ओजल :– नही दीदी... वो इतना तेज दौड़ी की लगभग वो गायब ही हो गयी। अपने टेलीपैथी के जरिए निशांत के दिमाग से जुड़ी और हवा में ऐसा मुक्का रखकर दी की ये तीन दिन तक बेहोश रहा।

निशांत:– कुछ भी हां...

ओजल:– शिवम सर देखो ये सच स्वीकार नहीं रहा।

निशांत:– मैं अकेला थोड़े ना हूं। इस लिस्ट में तो तुम दोनो का नाम भी है। आज तक दोनो कभी स्वीकार किये की एक दूसरे से प्यार करते हो।

जबतक इनकी बातें हो रही थी, आर्यमणि भी फ्रेश होकर आ गया। जैसे ही आया निशांत की बात सुनकर चौंकते हुये..... “क्या सच में शिवम् सर।”..

ओजल:– यात्रा शुरू होते ही उन्होंने मौन लिया है। वैसे सारी पंचायत यहीं कर लेनी है या जो करने आये थे वो कर ले।

ओजल की बात सुनकर आर्यमणि आगे का काम शुरू कर दिया। जयदेव एक बार फिर बाहर था। नहाने के वक्त लगता है खूब पानी पिया था, इसलिए अपने पैडों पर खड़ा होकर आ रहा था।.... “सुनो आर्य मुझे किस बात की सजा दे रहे। तुम्हे या तुम्हारे पैक को मारने की साजिश माया ने रची थी।”...

आर्यमणि:– ओजल कल पलक की शादी में वेडिंग गिफ्ट ले जाना है। जल्दी करो जब तक हम ऊपर जा रहे।

इधर आर्यमणि की बात समाप्त हुई उधर कल्पवृक्ष दंश के एक ही वार से जयदेव का फरफराता हुआ धर जमीन पर और सर हवा में। रुको जीजू मैं भी आयी। पलक की शादी का गिफ्ट तो ले लिया, लेकिन शादी में पहन के जाने लायक कपड़े कहां है।

आर्यमणि जमीन पर गिरे धर को ठिकाने लगाते...... “चलो फिर पहले शॉपिंग ही करते है।”..

ओजल:– शॉपिंग के लिये कहां चले...

आर्यमणि:– दिल्ली ही चलते है। वैसे भी आज तक मैं कभी दिल्ली नही गया...

निशांत:– हां यार आज तक मैं भी कभी राजधानी नही गया...

ओजल:– मैं तो कहीं गयी ही नही...

महा:– तो फिर चलो दिल्ली...

एक पूरा दिन ये लोग दिल्ली में शॉपिंग करते रहे। रात को इन सब ने अपस्यु की पत्नी ऐमी के पिता सिन्हा जी के यहां की मेहमाननवाजी भी स्वीकार किये, और भोर होने पर जब सिन्हा जी नाश्ते के लिये सबको उठाने पहुंचे तब सभी बिस्तर से गायब थे। दरअसल रात के खाने के बाद ही ये लोग अंतर्ध्यान होकर मालदीव पहुंच चुके थे। मालदीव के ही किसी आइलैंड पर पलक की शादी थी और दूल्हा किसी दूर ग्रह का निवासी था।

टापू पर हुये अल्फा पैक हत्याकांड को लगभग 4 साल हो गये थे। इन 4 सालों में बहुत से बदलाव भी आये थे। आम नायजो के बीच केवल पलक ही पलक छाई थी। उसका जलवा ऐसा था कि जहां भी होती किसी और का वजूद दिखता ही नही था। इसका एक कारण यह भी था कि पलक की तरह सोचने वाले काबिल नायजो की तादात इतनी हो चुकी थी कि किसी भी सिस्टम को चुनौती दे दे। जहां भी जाति हुजूम पीछे चला आता।
Nice update
 

CFL7897

Be lazy
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To Arya ne apne safar ki suruwat kar di hai uska sath dene k liye uske kuch purane sathi aur kuch naye saythi is safar par nikale hai....

Madav aur Nishant ki sister ki bhi sayad sadi hone wali thi kuch samaye pirv!!!
To kya inki sadi ko gayi hai ya abhi samaye shesh hai???

Palak ki shadi ....wahh Arya ko safar ki suruwat karne k liye sahandar awasar mila hai...dekhate hai Arya ke dosi waha milte hai ya nahi???

Arya aur Shivam Sar ke bich Ki Baat Ek chhupe Hue Rahasya ki taraf Ishara kar rahi hai ...........
Jin pattharon Ki Mala Ki Baat Shivam Sar kah rahe hain usko unhone Apne Hathon se banaya tha aur Unka Manana Hai Ki Yadi Alpha pack Mar chuka hai to unke amulet Wapas a Jaane chahie Shivam Sar ke pass...... lekin abhi tak Aisa Hua Nahin Hai isliye Shivam sar ka yah Sawal Raha ki Iske Piche ki sacchai kya hai???? Kyu ki 4 sal ka samay bit chuka hai na hi Amulat aur nahi pack ki lash mili hai.....

Shandar update bhai
 

Devilrudra

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भाग:–174


जीजू इस सवाल का जवाब तो देते लेकिन उपस्थित हो तब न। आर्यमणि, अमेया को लेकर अंतर्ध्यान हो चुका था। दोनो एक रेस्टोरेंट में थे और वहां आर्यमणि ने चॉकलेट केक ऑर्डर कर दिया। अमेया जितनी हैरान थी उतनी खुश भी। वहीं आर्यमणि, अमेया को देख उसके आंसू रुक ही नही रहे थे।

ढेर सारी जगह पर दोनो साथ घूमे। कई सारे झूलों पर दोनो साथ झूले। इस बीच ओर्जा, जिसकी टेलीपैथी दुनिया की सबसे कमाल की टेलीपैथी थी वह कोशिश करके देख ली, लेकिन आर्यमणि के दिमाग के आस पास भी कोई फटक न पाया। साथ में अमेया भी थी लेकिन अमेया के पास न तो कोई मंत्र, ना कोई तंत्र, न कोई हथियार और न ही कोई वार उसे छू सकती थी। उसका जन्म ही इतना अलौकिक था कि हर शक्ति निष्प्रभावित हो जाती थी। तभी तो जिस किसी ने अमेय को स्पर्श किया, ऐसी अलौकिक शांति खुद में मेहसूस करते थे जो उन्होंने जीवन में पहले कभी मेहसूस न किया हो।

पूरे एक दिन बाद आर्यमणि सीधा अंतर्ध्यान होकर सात्विक गांव पहुंचा। इस पल में सबसे बड़ा सवाल तो यही था कि कैसे आर्यमणि अन्यर्ध्यान होकर इस अलौकिक गांव तक पहुंच सकता था। तब आर्यमणि ने जादूगर महान की एक बात सबको याद दिलाई.... “मैं नर भेड़िया हूं और बहुत सी बाधाएं मेरे इस रूप के कारण अपने आप ही समाप्त हो जाती है। मै इस लोक में तो क्या दूसरी दुनिया में भी अंतर्ध्यान होकर जा सकता हूं, जिसे विपरीत या नकारात्मक शक्तियों की दुनिया भी कहते है।”

सुनकर ही सब आश्चर्य और खुशी, दोनो ही भाव दे रहे थे। वहीं बीते दिन बिना बताए गायब होने के लिये आर्यमणि ने माफी मांगा। अपनी सफाई में बस उसने इतना ही कहा की एक दिन सिर्फ पिता–पुत्री और दूसरा कोई नहीं। हर कोई आर्यमणि की भावना का मुस्कुराकर स्वागत किया।

आर्यमणि, ऋषि शिवम के लिये खुश था। काफी समय बाद इस धरती ने किसी ऋषि का उदय होते हुये देखा था। ऋषि शिवम् अपनी शिक्षा पूर्ण कर चुके थे। अपने तप से उन्होंने ब्रह्म ज्ञान को पा लिया था और एक बार फिर आर्यमणि के साथ सफर पर जाना चाहते थे। रूही, इवान और अलबेली के जाने का गम उन्हे भी काफी था। और उन सबसे बढ़कर ऋषि शिवम् को हत्याकांड वाले दिन की पूरी कहानी जाननी थी।

हत्याकांड वाले दिन की पूरी कहानी तो बहुत से लोगों को जाननी थी, लेकिन उस से भी ज्यादा सबको उन सालों का हिसाब चाहिए था जिनमे आर्यमणि नही था और न ही किसी से संपर्क किया। ओजल और निशांत दोनो ने पूछ–पूछ कर पागल बना रखा था। हत्याकांड वाले दिन की छोटी सी औपचारिक चर्चा के बाद आर्यमणि ने उन बीते सालों की व्यथा बयां कर दिया, जिनमे वो किसी से संपर्क नही कर पाया और महासागर में ही फंसा रहा।

आचार्य जी तो फूले न समा रहे थे जब उन्हे पता चला की आर्यमणि नागलोक की भूमि और जल योग में बैठे योगियों की सभा में अपनी साधना को सिद्ध कर आया था। हां लेकिन पूरी कहानी सुनाते–सुनाते आर्यमणि फिर से अपने पैक के खोने के गम में खो गया।

एक बार फिर सांत्वना का हाथ आर्यमणि के कंधे पर था। लेकिन इस बार महा नही थी, बल्कि आर्यमणि का पूरा परिवार था। उनके लिये तो आर्यमणि मर चुका था किंतु उसे प्रत्यक्ष सामने देख फिर उनके भी आंसू नहीं रुके। भूमि, जया और केशव, आर्यमणि को जीवित देखकर पूरे व्याकुलता से उससे मिल रहे थे।

कुछ दिनों तक आर्यमणि सब लोगों के बीच सात्त्विक गांव में ही रहा। कुछ दिन अलौकिक गांव में विश्राम के बाद आर्यमणि एक बार फिर अपनी यात्रा पर जाने के लिये तैयार था। जाने से पहले आर्यमणि आचार्य जी से मिला.... “शांत चेहरे के पीछे का रोष मैं मेहसूस कर सकता हूं।”...

आर्यमणि:– अपस्यु से कहिएगा कुछ दिन तक थोड़ा संभल कर काम करे। मै कुछ लोगों को उसके अंजाम तक पहुंचाने के बाद, उसका साथ दूंगा।

आचार्य जी:– उन तक संदेश पहुंच जायेगा। वैसे उन्होंने भी एक संदेश दिया है। गुरु अपस्यु चाहते है, यात्रा की शुरवात आप उनकी तय जगह से शुरू करे। इसके अलावा 2 दिन बाद पलक की शादी है, और गुरु अपस्यु ने कहा है आगे आपकी मर्जी।

आर्यमणि:– मन को असीम सुख देने वाला यह सूचना थी। अब आज्ञा चाहूंगा आचार्य जी।

आचार्य जी:– गुरु आर्यमणि आपके दोनो बच्चों की शिक्षा यहीं होगी और ये आग्रह नही आदेश है। इसके अलावा मुझे पता चला की शेषनाग लोक धरती फिर से पूर्ण विकसित हो कर अलौकिक जीवों का घर बन चुका है। वहां से मुझे एक जोड़े बारासिंघा, एक जोड़े नील गाय, एक जोड़ा कामधेनु गाय, एक जोड़ा ऐरावत हाथी, 4 जोड़े गरुड़, एक जोड़ा एकश्रींगी अश्व, कुछ सुंदर और मनमोहक पंछियों के जोड़े, कुछ सुंदर सकहारी जानवर आज ही अपने गांव ले आओ। इसके अलावा यहां के बगीचों में सुंदर पुष्प और जहरीले पौधों की कमी नही होनी चाहिए। सरोवर में मुझे पूरा जलीय तंत्र के जीव चाहिए। और गुरुदेव ध्यान रहे मीठे पानी का जलीय जीव लेकर आइयेगा।

आर्यमणि, अपने हाथ जोड़ते.... “सब आज ही हो जायेगा आचार्य जी, तभी मैं यहां से निकलूंगा। और कुछ...

आचार्य जी:– हां आप अपनी एक यात्रा पूरी कर आएं। उसके बाद गुरु अपस्यु की मदद के लिये जाने से पहले यहां 2000 कुटिया का निर्माण भी आपको ही करना है।

आर्यमणि:– हो जायेगा आचार्य जी। क्या अब मैं जा सकता हूं?

आचार्य जी:– बिलकुल गुरुदेव आप प्रस्थान करे। और हां एक भी दोषी को मुक्ति नही दीजिएगा गुरुदेव...

“ऐसा ही होगा आचार्य जी।”... इतना कहकर आर्यमणि आचार्य जी की कुटिया से निकल आया। वहां से निकलकर वह आगे कुछ करने जाता उस से पहले ही आर्यमणि से मिलने ऋषि शिवम पहुंच चुके थे। चेहरे पर मुस्कान और शरारती सवालिया नजर। उनके हाव–भाव देख आर्यमणि की हंसी निकल गयी।

आर्यमणि:– आप पीछा नहीं छोड़ते वाले ये मैं जानता हूं। लेकिन ऋषिवर आप तो मेरी दुविधा समझिए, यहां मैं कुछ नही कह सकता।

ऋषि शिवम्:– आपके अभिनय को नमन। खुद तो झूठ बोल ही रहे, ऊपर से आंसू भी निकाल रहे। कैसे गुरुदेव...

आर्यमणि:– कहानी थोड़ी अलग हो सकती है पर दिल का वियोग कोई अभिनय नही। वाकई में मैं दो राहों के बीच फंसा हूं। कुछ दिन और इसे चलने देते है।

ऋषि शिवम्:– मतलब कुछ दिनों तक मैं भी यह भूल जाऊं की 3 एमुलेट अब तक मेरे पास नही पहुंचे। जल्दी कीजिए गुरुदेव, सारे काम छोड़कर पहले इसे ही सुलझा दीजिए...

आर्यमणि:– आपको क्या लगता है, मैं क्या इस विषय में नही सोच रहा। पहले पूरे लोगों को उलझा लेने दीजिए। फिर आपके साथ एक चर्चा होगी उसके बाद निर्णय लेते है।

ऋषि शिवम:– हां इसलिए तो आपके साथ आ रहा हूं। मै तो इतना ही कहूंगा लापता होने के लिये 4 साल बहुत ज्यादा वक्त है, जो भी करना है जल्दी कीजिए।

आर्यमणि:– अब तो साथ चल ही रहे है। बिना देर लगाये सारा काम होगा। शिवम सर आप जब तक यात्रा पर निकलने वालों को समेटिए तब तक मैं आचार्य जी का काम कर देता हूं।

ऋषि शिवम ने यात्रा पर चलने वालों को समेटना शुरू किया और इधर आर्यमणि अंतर्ध्यान होकर सीधा शेषनाग क्षेत्र के जमीनी भू–भाग में पहुंचा। वहां के जंगलों से जानवरों और पंछियों को । इधर जबतक महा ने सरोवर को मीठे जलीय जीव से भर दिया। जाने से पहले आर्यमणि ने वहां के बगीचे को ठीक वैसे ही हरा–भरा कर दिया जैसा आचार्य जी चाहते थे।

आधे दिन में पूरा काम समाप्त करने के बाद आर्यमणि, कुछ नए और कुछ पुराने सदस्यो से सुसज्जित अल्फा पैक को लेकर निकला। जिसमे 2 वुल्फ (आर्यमणि और ओजल), 3 महान जादूगर (ओजल, निशांत और महा), अलौकिक शक्ति के साथ पैदा हुई 2 स्त्री, जो महान पराक्रमी थी (महा और ओर्जा), 2 सिद्ध प्राप्त तपस्वी, जिन्होंने कई मंत्र सिद्ध किये थे और जो टेलीपोर्टेशन कर सकते थे (आर्यमणि और ऋषि शिवम) और एक ब्रह्म ज्ञान प्राप्त ऋषि (शिवम) साथ चल रहे थे।

ओर्जा को छोड़कर सभी अंतर्ध्यान होकर नैनीताल के उस अग्नि कुंड वाली जगह पर पहुंचे, जहां वर्षो पहले गुरु निशि और उनके शिष्यों को जिंदा आग में झोंक दिया गया था। बड़ा सा कुंवानुमा गड्ढा आज भी वहां था। और चारो ओर धूल... आर्यमणि ने एक छोटा सा कमांड दिया और उस कुएं का गहरा तल धीरे–धीरे करके ऊपर आने लगा।

वह तल जमीन से 10 फिट ऊंचा गया और आंखों के सामने जंग लगे लोहे का गोल ढांचा था। उसी ढांचे के बीच एक छोटा सा दरवाजा भी था। दरवाजा जब खुला तब सबको कहना पड़ गया.... मानना होगा बाहर से देखो तो कितना पुराना लगता है, लेकिन अंदर की बनावट तो किसी पांच सितारे होटल की लिफ्ट की तरह थी।

खैर उस लिफ्ट से पूरा अल्फा पैक नीचे पहुंचा। 10 मीटर का छोटा सा गलियारा पार करने के बाद पूरा अल्फा पैक जैसे वाकई किसी पांच सितारा होटल के लॉबी में पहुंचे हो। उस लॉबी के पास लगे मार्किंग से आर्यमणि समझ गया की उसे कहां जाना था। पूरे पैक के साथ वह एक दरवाजे पर खड़ा था। दरवाजा जैसे ही खुला, एक व्यक्ति रेंगते हुये धीरे–धीरे बाहर आया।

“कहां तुम राजा की तरह जीने वाले, और देखो तो तुम्हारी क्या हालत बना दी गयी है। लगता है काफी तकलीफ में हो जीजा जी”....

“पानी... पानी... पानी”....

नीचे रेंगते हुये जयदेव पहुंचा था। पिछले 4 वर्षों से वो यहां का अंधियारा कैद झेल रहा था। इस जगह की जेल का उद्घाटन शायद जयदेव ने ही किया था। उसके बाद ही गुरु निशि के कत्ल में जिन इंसानों का सीधा हाथ था उन्हे यहां की जेल में लाया गया था। आजीवन अंधकार भोगने की सजा। खाना उतना ही जितना जीवित रह सके और पानी पूरे दिन में एक बार।

आर्यमणि तो फिर भी बात कर रहा था बाकियों ने तो अपने नाक दबाकर दूरियां बना ली थी। करे भी क्यों न, जयदेव के शरीर से गंदी सड़ी सी बास आ रही थी। जयदेव एक बार फिर अपना सर ऊपर करके पानी, पानी करने लगा। पीछे से सबके आवाज भी आने लगे.... “सरे हुये मल की बदबू कैसे बर्दास्त हो रही है आर्य।”...

तभी आर्यमणि भी चार कदम पीछे हटते.... "क्या यार जीजू... सारे अवांछित काम एक ही जगह करने पड़ रहे है क्या? रुको पहले तुम्हारे जगह और फिर तुम्हारी सफाई की व्यवस्था करवा दूं।”.... इतना कहकर आर्यमणि ने एक बार फिर कमांड दिया और जयदेव वापस से अपने अंधेरी कोठरी में।

पीछे से नाक पर हाथ दिये महा कहने लगी.... “पतिदेव जाओ आप भी स्नान कर लो। गंदा बास मार रहे हो।”...

आर्यमणि:– पर पहले मुझे एक बार गले लगाने की इच्छा हो रही है।

महा:– ठीक है लगा लीजिए गले फिर दोनो साथ नहाने जायेंगे...

आर्यमणि:– तुम पलटवार भी कर लेती हो महा। ठीक है आ रहा हूं मैं।

निशांत:– अबे भूल जा हम यहां है। अकेला क्यों जा रहा। जिसकी इतनी हॉट बीवी हो वो साथ नहाने से हिचकिचाते नही।

ओजल:– तभी एक दिन ओर्जा के पीछे–पीछे बाथरूम में घुसे थे और हवाई जहाज की तरह सीधा कीचड़ में लैंड किये।

निशांत:– नाना, वो तो तुम्हे भ्रम दिखा था। वो मैं नही था।

ओजल:– निशांत, मुझे तुम्हारा भ्रम भी दिखा था, और उसका नतीजा भी हम सबने देखा था। ओर्जा को इंप्रेस करने के चक्कर में जो तुमने होशियारी की थी ना। मारो, मुझे मारो, मुझे जरा भी चोट नही लग सकती।

महा:– इसे चोट क्यों नही लग सकती थी...

ओजल:– दीदी ये भ्रम पैदा करता है। आपको लगेगा पास ही खड़ा हो पर रहता कहीं और है।

महा:– काफी अनोखी शक्ति है, और उतने ही कमाल की भी। फिर क्या हुआ, ओर्जा, निशांत जी को मारने के प्रयास में थक गयी क्या?

ओजल :– नही दीदी... वो इतना तेज दौड़ी की लगभग वो गायब ही हो गयी। अपने टेलीपैथी के जरिए निशांत के दिमाग से जुड़ी और हवा में ऐसा मुक्का रखकर दी की ये तीन दिन तक बेहोश रहा।

निशांत:– कुछ भी हां...

ओजल:– शिवम सर देखो ये सच स्वीकार नहीं रहा।

निशांत:– मैं अकेला थोड़े ना हूं। इस लिस्ट में तो तुम दोनो का नाम भी है। आज तक दोनो कभी स्वीकार किये की एक दूसरे से प्यार करते हो।

जबतक इनकी बातें हो रही थी, आर्यमणि भी फ्रेश होकर आ गया। जैसे ही आया निशांत की बात सुनकर चौंकते हुये..... “क्या सच में शिवम् सर।”..

ओजल:– यात्रा शुरू होते ही उन्होंने मौन लिया है। वैसे सारी पंचायत यहीं कर लेनी है या जो करने आये थे वो कर ले।

ओजल की बात सुनकर आर्यमणि आगे का काम शुरू कर दिया। जयदेव एक बार फिर बाहर था। नहाने के वक्त लगता है खूब पानी पिया था, इसलिए अपने पैडों पर खड़ा होकर आ रहा था।.... “सुनो आर्य मुझे किस बात की सजा दे रहे। तुम्हे या तुम्हारे पैक को मारने की साजिश माया ने रची थी।”...

आर्यमणि:– ओजल कल पलक की शादी में वेडिंग गिफ्ट ले जाना है। जल्दी करो जब तक हम ऊपर जा रहे।

इधर आर्यमणि की बात समाप्त हुई उधर कल्पवृक्ष दंश के एक ही वार से जयदेव का फरफराता हुआ धर जमीन पर और सर हवा में। रुको जीजू मैं भी आयी। पलक की शादी का गिफ्ट तो ले लिया, लेकिन शादी में पहन के जाने लायक कपड़े कहां है।

आर्यमणि जमीन पर गिरे धर को ठिकाने लगाते...... “चलो फिर पहले शॉपिंग ही करते है।”..

ओजल:– शॉपिंग के लिये कहां चले...

आर्यमणि:– दिल्ली ही चलते है। वैसे भी आज तक मैं कभी दिल्ली नही गया...

निशांत:– हां यार आज तक मैं भी कभी राजधानी नही गया...

ओजल:– मैं तो कहीं गयी ही नही...

महा:– तो फिर चलो दिल्ली...

एक पूरा दिन ये लोग दिल्ली में शॉपिंग करते रहे। रात को इन सब ने अपस्यु की पत्नी ऐमी के पिता सिन्हा जी के यहां की मेहमाननवाजी भी स्वीकार किये, और भोर होने पर जब सिन्हा जी नाश्ते के लिये सबको उठाने पहुंचे तब सभी बिस्तर से गायब थे। दरअसल रात के खाने के बाद ही ये लोग अंतर्ध्यान होकर मालदीव पहुंच चुके थे। मालदीव के ही किसी आइलैंड पर पलक की शादी थी और दूल्हा किसी दूर ग्रह का निवासी था।

टापू पर हुये अल्फा पैक हत्याकांड को लगभग 4 साल हो गये थे। इन 4 सालों में बहुत से बदलाव भी आये थे। आम नायजो के बीच केवल पलक ही पलक छाई थी। उसका जलवा ऐसा था कि जहां भी होती किसी और का वजूद दिखता ही नही था। इसका एक कारण यह भी था कि पलक की तरह सोचने वाले काबिल नायजो की तादात इतनी हो चुकी थी कि किसी भी सिस्टम को चुनौती दे दे। जहां भी जाति हुजूम पीछे चला आता।
Superb👍👍👍
 
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