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Adultery गुजारिश

HalfbludPrince

मैं बादल हूं आवारा
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259
#2

रात अचानक से बहुत भारी हो गयी , ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था , छोटे मोटे झगडे मारपीट तो खैर चलती रहती थी पर ऐसे कभी किसी की लाश नहीं मिली थी, धीरे धीरे करके पूरा गाँव ही जमा हो गया था. एक दो लोगो ने मुनीम की लाश को देखा कोई जख्म नहीं, कोई मारपीट नहीं तो फिर ये मरा कैसे.

“लगता है हार्ट अटैक हो गया होगा ” किसी ने कहा

मुनीम की उम्र कोई ६५ के आस पास होगी तो ऐसा हो सकता था पर न जाने क्यों मुझे लग रहा था की उसे किसी ने मारा है . इस बखेड़े में एक बात छुट गयी थी की वो औरत कौन थी . और अब तो इतनी भीड़ हो गयी थी की कुछ भी अनुमान लगाना मुश्किल था .

अनुमान , हाँ पर इतना जरुर था की वो हो न हो मेरे ही मोहल्ले की थी की क्योंकि जिस गली में वो मुड़ी थी उधर हमारे ही घर थे . बाकि बची रात मैंने उस औरत के बारे में सोच सोच कर काटी की कौन हो सकती है वो , खैर सुबह मुझे करतार (कट्टु )मिला

मैं- साले कल कहाँ मरवा रहा था मैंने कितना ढूंढा तुझे

कट्टु- यार भाई, वो कल बापू साथ सो गया था तो मैं निकल नहीं पाया

मैं कट्टु को उस औरत के बारे में बताना चाहता था पर न जाने क्यों मैंने खुद को रोक लिया और हम बाते करते हुए जोहड़ की तरफ चल पड़े.

मैं- तुझे क्या लगता है मुनीम को हार्ट अटैक आया या किसी ने मारा उसे .

कट्टु- जो भी हुआ ठीक ही हुआ , साला मर गया लोगो के बही खाते में बहुत बढ़ा कर हिसाब लिखता था वो .

मैं- पुलिस को सुचना देनी चाहिए थी , वो तहकीकात करती

कट्टु- आजतक कभी पुलिस आई है क्या गाँव में , पंच लोग ही पुलिस बने फिरते है . वैसे माँ बता रही थी की तू आजकल मजार पर बहुत जाने लगा है . क्या करता है तू उधर ,

मैं- कुछ नहीं यार बस वैसे ही .

कट्टु- तुझे मालूम है न की अपने गाँव वाले उधर कम ही जाते है

मैं- यार अब इसमें क्या है , सब तो जाते है

कट्टु- चल छोड़, सुन मैं आज शहर जा रहा हूँ तू भी चल

मैं- ना रे

कट्टु- चल न , बस अड्डे होकर आयेंगे कोई नयी किताब आई होगी तो देख लेंगे .

मैं- फिर कभी

कट्टु- ठीक है मैं तो जाऊंगा ही सुन तेरी साइकिल ले जाऊ

मैं- ठीक है .

करतार के जान के बाद भी मैं बहुत देर तक जोहड़ पर बैठा रहा , घुटनों तक पैर पानी में दिए मैं बस उस औरत के बारे में सोचने लगा, काश वो मुनीम की लाश नहीं मिलती तो मेरे नसीब में एक चूत मिल गयी थी .

न जाने क्यों मेरे अन्दर एक तन्हाई थी, एक अजीब सी बेताबी ,एक उदासी मैं बस इन दिनों अकेला रहना चाहता था .

शायद इसका एक कारण चढ़ती जवानी भी हो सकती थी , जब इस उम्र में हार्मोन बदलते है , पर बस ऐसा ही था , एक बार फिर उस शाम मैं मजार के पास पहुँच गया था , पर आज वो बाबा इकतारा नहीं बजा रहा था , लोगो ने इंतज़ार किया पर उसका मूड नहीं हुआ . धीरे धीरे करके लोग जाने लगे. मैं उसी पेड़ के निचे बैठा था कम्बल ओढ़े.



“ओये मुसाफिरा ओथे क्यों बैठा है आज पास जरा ” बाबा ने आवाज दी .

मैं उसके पास गया .

मैं- आज इकतारा नहीं बजाया

बाबा- उसकी मर्जी, जब उसका मन हो बजे

मैं- आओ चा पीते है

बाबा- ठीक है .

मैंने चाय वाले को आवाज दी .

बाबा- कुछ परेशां लगता है मुसफिरा

मैं- मालूम नहीं , आजकल मेरा मन नहीं लगता कही भी ,

बाबा- होता है , भरोसा रख उस रब्ब पर . तेरे लिए भी कुछ लिखा होगा उसने .

मैंने बाबा को चाय का कप दिया और खुद भी चुस्की ली, बरसती ठण्ड में जैसे रूह को करार आ गया.

मैं- जानते हो बाबा मैं रोज यहाँ आकर क्यों बैठता हूँ .

बाबा- जानता हु मुसाफिरा भला मुझसे क्या छिपा है .

“तुमने देखा होगा उन्हें, वो आते थे न यहाँ ” मैंने कहा

बाबा- ठण्ड बढ़ रही है मुसफिरा घर जा .

मैं- तुम जानते थे न उन्हें

बाबा- सब जानते थे उन्हें, वो जो पेड़ हैं न जिसके निचे तो घंटो बैठता है तेरी माँ ने लगाया था . बड़ा शौक था उसे , कहती थी मैं रहू न रहू ये पेड़ जरुर रहेगा. बड़ी नेक थी वो.



अपनी माँ के बारे में सुन कर मेरी आँखों से आंसू गिर गए.

“ना मुसाफिरा न , इनको संभाल कर रख बड़े अनमोल है ये , रात गहरी हो रही है तू जा ” बाबा ने कहा

मैं- मुझे बताओ न मेरे माँ-बाप के बारे में बाबा

बाबा ने इकतारा उठाया और बजाने ;लगा. आंसू उसकी सफ़ेद दाढ़ी में कही खो गए.

ठण्ड बहुत बढ़ गयी थी , खेत पर पहुँच कर मैंने अलाव जलाया तो कुछ राहत मिली , मैंने पानी की मोटर चलाई और खेत में पहुँच गया ,, आज बिजली पूरी रात आने वाली थी , सरसों में पानी लगाना था . जैसे ही पानी आया मेरे पैर सुन्न से हो गए. ऐसा नहीं था की खेतो पर काम करने वाले नहीं थे, लोग काम करते भी थे पर न जाने क्यों मुझे इस मिटटी से बड़ा लगाव था .

बरसती ओस में भीगते हुए मैं पानी की लाइन बदलते हुए दूर अपनी झोपडी के पास जलते अलाव को देख रहा था , हौले से जलती आंच इस अँधेरी रात में बड़ी खूबसूरत लग रही थी . मैं पानी की लाइन बदल कर कस्सी उठाये अलाव की तरफ बढ़ ही रहा था की “छन छन ” की तेज आवाज ने मेरा ध्यान खींच लिया .

पाजेब की आवाज थी ये इतना समझ गया था , पर इस समय इस उजाड़ में कौन औरत आएगी,

“कोई है क्या ” मैंने आवाज दी .

कोई जवाब नहीं आया . आई तो बस पाजेब की आवाज .
 

brego4

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मैं- तुम जानते थे न उन्हें

बाबा- सब जानते थे उन्हें, वो जो पेड़ हैं न जिसके निचे तो घंटो बैठता है तेरी माँ ने लगाया था . बड़ा शौक था उसे , कहती थी मैं रहू न रहू ये पेड़ जरुर रहेगा. बड़ी नेक थी वो........
start of intrigue, curiosity and restlessness in readers your way of writing is beyond explanation

2 hi update mein story mein thrill ki koi kami nahi hai
 

Iron Man

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#2

रात अचानक से बहुत भारी हो गयी , ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था , छोटे मोटे झगडे मारपीट तो खैर चलती रहती थी पर ऐसे कभी किसी की लाश नहीं मिली थी, धीरे धीरे करके पूरा गाँव ही जमा हो गया था. एक दो लोगो ने मुनीम की लाश को देखा कोई जख्म नहीं, कोई मारपीट नहीं तो फिर ये मरा कैसे.

“लगता है हार्ट अटैक हो गया होगा ” किसी ने कहा

मुनीम की उम्र कोई ६५ के आस पास होगी तो ऐसा हो सकता था पर न जाने क्यों मुझे लग रहा था की उसे किसी ने मारा है . इस बखेड़े में एक बात छुट गयी थी की वो औरत कौन थी . और अब तो इतनी भीड़ हो गयी थी की कुछ भी अनुमान लगाना मुश्किल था .

अनुमान , हाँ पर इतना जरुर था की वो हो न हो मेरे ही मोहल्ले की थी की क्योंकि जिस गली में वो मुड़ी थी उधर हमारे ही घर थे . बाकि बची रात मैंने उस औरत के बारे में सोच सोच कर काटी की कौन हो सकती है वो , खैर सुबह मुझे करतार (कट्टु )मिला

मैं- साले कल कहाँ मरवा रहा था मैंने कितना ढूंढा तुझे

कट्टु- यार भाई, वो कल बापू साथ सो गया था तो मैं निकल नहीं पाया

मैं कट्टु को उस औरत के बारे में बताना चाहता था पर न जाने क्यों मैंने खुद को रोक लिया और हम बाते करते हुए जोहड़ की तरफ चल पड़े.

मैं- तुझे क्या लगता है मुनीम को हार्ट अटैक आया या किसी ने मारा उसे .

कट्टु- जो भी हुआ ठीक ही हुआ , साला मर गया लोगो के बही खाते में बहुत बढ़ा कर हिसाब लिखता था वो .

मैं- पुलिस को सुचना देनी चाहिए थी , वो तहकीकात करती

कट्टु- आजतक कभी पुलिस आई है क्या गाँव में , पंच लोग ही पुलिस बने फिरते है . वैसे माँ बता रही थी की तू आजकल मजार पर बहुत जाने लगा है . क्या करता है तू उधर ,

मैं- कुछ नहीं यार बस वैसे ही .

कट्टु- तुझे मालूम है न की अपने गाँव वाले उधर कम ही जाते है

मैं- यार अब इसमें क्या है , सब तो जाते है

कट्टु- चल छोड़, सुन मैं आज शहर जा रहा हूँ तू भी चल

मैं- ना रे

कट्टु- चल न , बस अड्डे होकर आयेंगे कोई नयी किताब आई होगी तो देख लेंगे .

मैं- फिर कभी

कट्टु- ठीक है मैं तो जाऊंगा ही सुन तेरी साइकिल ले जाऊ

मैं- ठीक है .

करतार के जान के बाद भी मैं बहुत देर तक जोहड़ पर बैठा रहा , घुटनों तक पैर पानी में दिए मैं बस उस औरत के बारे में सोचने लगा, काश वो मुनीम की लाश नहीं मिलती तो मेरे नसीब में एक चूत मिल गयी थी .

न जाने क्यों मेरे अन्दर एक तन्हाई थी, एक अजीब सी बेताबी ,एक उदासी मैं बस इन दिनों अकेला रहना चाहता था .

शायद इसका एक कारण चढ़ती जवानी भी हो सकती थी , जब इस उम्र में हार्मोन बदलते है , पर बस ऐसा ही था , एक बार फिर उस शाम मैं मजार के पास पहुँच गया था , पर आज वो बाबा इकतारा नहीं बजा रहा था , लोगो ने इंतज़ार किया पर उसका मूड नहीं हुआ . धीरे धीरे करके लोग जाने लगे. मैं उसी पेड़ के निचे बैठा था कम्बल ओढ़े.



“ओये मुसाफिरा ओथे क्यों बैठा है आज पास जरा ” बाबा ने आवाज दी .

मैं उसके पास गया .

मैं- आज इकतारा नहीं बजाया

बाबा- उसकी मर्जी, जब उसका मन हो बजे

मैं- आओ चा पीते है

बाबा- ठीक है .

मैंने चाय वाले को आवाज दी .

बाबा- कुछ परेशां लगता है मुसफिरा

मैं- मालूम नहीं , आजकल मेरा मन नहीं लगता कही भी ,

बाबा- होता है , भरोसा रख उस रब्ब पर . तेरे लिए भी कुछ लिखा होगा उसने .

मैंने बाबा को चाय का कप दिया और खुद भी चुस्की ली, बरसती ठण्ड में जैसे रूह को करार आ गया.

मैं- जानते हो बाबा मैं रोज यहाँ आकर क्यों बैठता हूँ .

बाबा- जानता हु मुसाफिरा भला मुझसे क्या छिपा है .

“तुमने देखा होगा उन्हें, वो आते थे न यहाँ ” मैंने कहा

बाबा- ठण्ड बढ़ रही है मुसफिरा घर जा .

मैं- तुम जानते थे न उन्हें

बाबा- सब जानते थे उन्हें, वो जो पेड़ हैं न जिसके निचे तो घंटो बैठता है तेरी माँ ने लगाया था . बड़ा शौक था उसे , कहती थी मैं रहू न रहू ये पेड़ जरुर रहेगा. बड़ी नेक थी वो.



अपनी माँ के बारे में सुन कर मेरी आँखों से आंसू गिर गए.

“ना मुसाफिरा न , इनको संभाल कर रख बड़े अनमोल है ये , रात गहरी हो रही है तू जा ” बाबा ने कहा

मैं- मुझे बताओ न मेरे माँ-बाप के बारे में बाबा

बाबा ने इकतारा उठाया और बजाने ;लगा. आंसू उसकी सफ़ेद दाढ़ी में कही खो गए.

ठण्ड बहुत बढ़ गयी थी , खेत पर पहुँच कर मैंने अलाव जलाया तो कुछ राहत मिली , मैंने पानी की मोटर चलाई और खेत में पहुँच गया ,, आज बिजली पूरी रात आने वाली थी , सरसों में पानी लगाना था . जैसे ही पानी आया मेरे पैर सुन्न से हो गए. ऐसा नहीं था की खेतो पर काम करने वाले नहीं थे, लोग काम करते भी थे पर न जाने क्यों मुझे इस मिटटी से बड़ा लगाव था .

बरसती ओस में भीगते हुए मैं पानी की लाइन बदलते हुए दूर अपनी झोपडी के पास जलते अलाव को देख रहा था , हौले से जलती आंच इस अँधेरी रात में बड़ी खूबसूरत लग रही थी . मैं पानी की लाइन बदल कर कस्सी उठाये अलाव की तरफ बढ़ ही रहा था की “छन छन ” की तेज आवाज ने मेरा ध्यान खींच लिया .

पाजेब की आवाज थी ये इतना समझ गया था , पर इस समय इस उजाड़ में कौन औरत आएगी,

“कोई है क्या ” मैंने आवाज दी .


कोई जवाब नहीं आया . आई तो बस पाजेब की आवाज .
:reading:
 

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मैं- तुम जानते थे न उन्हें

बाबा- सब जानते थे उन्हें, वो जो पेड़ हैं न जिसके निचे तो घंटो बैठता है तेरी माँ ने लगाया था . बड़ा शौक था उसे , कहती थी मैं रहू न रहू ये पेड़ जरुर रहेगा. बड़ी नेक थी वो........
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कोशिश बस यही है कि कुछ ऐसा लिखू जिसके साथ लोग जुड़ जाए ? आप लोग अपना क़ीमती समय कहानी को देते हो तो कुछ अच्छा मिलना चाहिए
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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वाह भाई मुसाफिर जी क्या ज़बरदस्त किरदार रचते हो की ऐसा लगता है असल में देख रहे हैं महसूस कर रहे हैं ना की पढ़ रहे हैं

बाबा का किरदार बेहद दिलचस्प व् रोमांचक बना है और सस्पेंस के लिए लंड मसलने वाली औरत है :vhappy1: और खतरे की घंटी मुनीम का क़त्ल व् दोस्त का अजीब सा बर्ताव व् गायब होना है
 

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रात अचानक से बहुत भारी हो गयी , ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था , छोटे मोटे झगडे मारपीट तो खैर चलती रहती थी पर ऐसे कभी किसी की लाश नहीं मिली थी, धीरे धीरे करके पूरा गाँव ही जमा हो गया था. एक दो लोगो ने मुनीम की लाश को देखा कोई जख्म नहीं, कोई मारपीट नहीं तो फिर ये मरा कैसे.

“लगता है हार्ट अटैक हो गया होगा ” किसी ने कहा

मुनीम की उम्र कोई ६५ के आस पास होगी तो ऐसा हो सकता था पर न जाने क्यों मुझे लग रहा था की उसे किसी ने मारा है . इस बखेड़े में एक बात छुट गयी थी की वो औरत कौन थी . और अब तो इतनी भीड़ हो गयी थी की कुछ भी अनुमान लगाना मुश्किल था .

अनुमान , हाँ पर इतना जरुर था की वो हो न हो मेरे ही मोहल्ले की थी की क्योंकि जिस गली में वो मुड़ी थी उधर हमारे ही घर थे . बाकि बची रात मैंने उस औरत के बारे में सोच सोच कर काटी की कौन हो सकती है वो , खैर सुबह मुझे करतार (कट्टु )मिला

मैं- साले कल कहाँ मरवा रहा था मैंने कितना ढूंढा तुझे

कट्टु- यार भाई, वो कल बापू साथ सो गया था तो मैं निकल नहीं पाया

मैं कट्टु को उस औरत के बारे में बताना चाहता था पर न जाने क्यों मैंने खुद को रोक लिया और हम बाते करते हुए जोहड़ की तरफ चल पड़े.

मैं- तुझे क्या लगता है मुनीम को हार्ट अटैक आया या किसी ने मारा उसे .

कट्टु- जो भी हुआ ठीक ही हुआ , साला मर गया लोगो के बही खाते में बहुत बढ़ा कर हिसाब लिखता था वो .

मैं- पुलिस को सुचना देनी चाहिए थी , वो तहकीकात करती

कट्टु- आजतक कभी पुलिस आई है क्या गाँव में , पंच लोग ही पुलिस बने फिरते है . वैसे माँ बता रही थी की तू आजकल मजार पर बहुत जाने लगा है . क्या करता है तू उधर ,

मैं- कुछ नहीं यार बस वैसे ही .

कट्टु- तुझे मालूम है न की अपने गाँव वाले उधर कम ही जाते है

मैं- यार अब इसमें क्या है , सब तो जाते है

कट्टु- चल छोड़, सुन मैं आज शहर जा रहा हूँ तू भी चल

मैं- ना रे

कट्टु- चल न , बस अड्डे होकर आयेंगे कोई नयी किताब आई होगी तो देख लेंगे .

मैं- फिर कभी

कट्टु- ठीक है मैं तो जाऊंगा ही सुन तेरी साइकिल ले जाऊ

मैं- ठीक है .

करतार के जान के बाद भी मैं बहुत देर तक जोहड़ पर बैठा रहा , घुटनों तक पैर पानी में दिए मैं बस उस औरत के बारे में सोचने लगा, काश वो मुनीम की लाश नहीं मिलती तो मेरे नसीब में एक चूत मिल गयी थी .

न जाने क्यों मेरे अन्दर एक तन्हाई थी, एक अजीब सी बेताबी ,एक उदासी मैं बस इन दिनों अकेला रहना चाहता था .

शायद इसका एक कारण चढ़ती जवानी भी हो सकती थी , जब इस उम्र में हार्मोन बदलते है , पर बस ऐसा ही था , एक बार फिर उस शाम मैं मजार के पास पहुँच गया था , पर आज वो बाबा इकतारा नहीं बजा रहा था , लोगो ने इंतज़ार किया पर उसका मूड नहीं हुआ . धीरे धीरे करके लोग जाने लगे. मैं उसी पेड़ के निचे बैठा था कम्बल ओढ़े.



“ओये मुसाफिरा ओथे क्यों बैठा है आज पास जरा ” बाबा ने आवाज दी .

मैं उसके पास गया .

मैं- आज इकतारा नहीं बजाया

बाबा- उसकी मर्जी, जब उसका मन हो बजे

मैं- आओ चा पीते है

बाबा- ठीक है .

मैंने चाय वाले को आवाज दी .

बाबा- कुछ परेशां लगता है मुसफिरा

मैं- मालूम नहीं , आजकल मेरा मन नहीं लगता कही भी ,

बाबा- होता है , भरोसा रख उस रब्ब पर . तेरे लिए भी कुछ लिखा होगा उसने .

मैंने बाबा को चाय का कप दिया और खुद भी चुस्की ली, बरसती ठण्ड में जैसे रूह को करार आ गया.

मैं- जानते हो बाबा मैं रोज यहाँ आकर क्यों बैठता हूँ .

बाबा- जानता हु मुसाफिरा भला मुझसे क्या छिपा है .

“तुमने देखा होगा उन्हें, वो आते थे न यहाँ ” मैंने कहा

बाबा- ठण्ड बढ़ रही है मुसफिरा घर जा .

मैं- तुम जानते थे न उन्हें

बाबा- सब जानते थे उन्हें, वो जो पेड़ हैं न जिसके निचे तो घंटो बैठता है तेरी माँ ने लगाया था . बड़ा शौक था उसे , कहती थी मैं रहू न रहू ये पेड़ जरुर रहेगा. बड़ी नेक थी वो.



अपनी माँ के बारे में सुन कर मेरी आँखों से आंसू गिर गए.

“ना मुसाफिरा न , इनको संभाल कर रख बड़े अनमोल है ये , रात गहरी हो रही है तू जा ” बाबा ने कहा

मैं- मुझे बताओ न मेरे माँ-बाप के बारे में बाबा

बाबा ने इकतारा उठाया और बजाने ;लगा. आंसू उसकी सफ़ेद दाढ़ी में कही खो गए.

ठण्ड बहुत बढ़ गयी थी , खेत पर पहुँच कर मैंने अलाव जलाया तो कुछ राहत मिली , मैंने पानी की मोटर चलाई और खेत में पहुँच गया ,, आज बिजली पूरी रात आने वाली थी , सरसों में पानी लगाना था . जैसे ही पानी आया मेरे पैर सुन्न से हो गए. ऐसा नहीं था की खेतो पर काम करने वाले नहीं थे, लोग काम करते भी थे पर न जाने क्यों मुझे इस मिटटी से बड़ा लगाव था .

बरसती ओस में भीगते हुए मैं पानी की लाइन बदलते हुए दूर अपनी झोपडी के पास जलते अलाव को देख रहा था , हौले से जलती आंच इस अँधेरी रात में बड़ी खूबसूरत लग रही थी . मैं पानी की लाइन बदल कर कस्सी उठाये अलाव की तरफ बढ़ ही रहा था की “छन छन ” की तेज आवाज ने मेरा ध्यान खींच लिया .

पाजेब की आवाज थी ये इतना समझ गया था , पर इस समय इस उजाड़ में कौन औरत आएगी,

“कोई है क्या ” मैंने आवाज दी .


कोई जवाब नहीं आया . आई तो बस पाजेब की आवाज .
Awesome update.
Munim ki maut raaz hi rah gayi kaise huyi esi chkkar me wo aurat bhi nikal gayi kahir uske muhalle ki hai to dekhte hai kya hota hai aage?
Maa aur pita dono nahi hai dono ka atit kuchh raj chhupaye hai jo Musfira ke jeevan pe asar dalega . Ye raat me kon aa gayi kheto me ?
 

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वाह भाई मुसाफिर जी क्या ज़बरदस्त किरदार रचते हो की ऐसा लगता है असल में देख रहे हैं महसूस कर रहे हैं ना की पढ़ रहे हैं

बाबा का किरदार बेहद दिलचस्प व् रोमांचक बना है और सस्पेंस के लिए लंड मसलने वाली औरत है :vhappy1: और खतरे की घंटी मुनीम का क़त्ल व् दोस्त का अजीब सा बर्ताव व् गायब होना है
बस कोशिश है कि एक ठीक ठाक कहानी लिख सकू
 
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